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उस रोज़ हम भी महिला दिवस मनाएंगे...


कल महिला दिवस है... एक तरफ़ देशभर में कार्यक्रम होंगे और महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर लंबे-चौड़े भाषण दिए जाएंगे... और दूसरी तरफ़ महिला दिवस से अनजान करोड़ों ग़रीब महिलाएं हर रोज़ की तरह सूरज निकलने से पहले उठेंगी... घर का काम-काज करेंगी... दोपहर के लिए रोटी बांधेंगी और फिर मज़दूरी के लिए निकल पड़ेंगी... कोई अपने दूधमुंहे बच्चे को पीठ से बांधकर ईंटें, मिट्टी, रेत, क्रैसर ढोएगी, तो कोई सड़क पर ही अपने बच्चे को बिठाकर पत्थर तोड़ेगी... फिर शाम को दिहाड़ी के पैसों से आटा, दाल, सब्ज़ी ख़रीदेगी और घर जाकर चूल्हा-चौका संभाल लेगी... दिन-रात के चौबीस घंटों में से अट्ठारह घंटे उसे काम करना है... वो भी एक दिन, एक हफ़्ता, एक महीना या एक साल नहीं, बल्कि ज़िंदगी भर... यानी जब तक उसके जिस्म में जान है, उसे काम करना है...
बहुत क़रीब से देखा है, इन मेहनतकश महिलाओं को... जिस रोज़ ऐसी एक भी मेहनतकश महिला के लिए कुछ कर पाएंगे, यक़ीनन उस, रोज़ हम भी महिला दिवस मनाएंगे...

चित्र : गूगल से साभार
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सिल-बट्टे...


बाज़ार में तरह-तरह की नामी कंपनियों के tomato ketchup और saus मिल जाएंगे, लेकिन जो ज़ायक़ा घरों में सिल-बट्टे पर बनने वाली टमाटर, अदरक, लहसुन, हरी मिर्च और हरे धनिये की चटनियों में है, वह कहीं और नहीं मिलेगा.
हालांकि अब घर-घर grinder mixer आ गए हैं. बाज़ार में भी हल्दी, मिर्च, धनिया से लेकर गरम मसाले तक पिसे हुए मिलने लगे हैं, लेकिन आज भी ऐसे घरों की कमी नहीं, जहां सभी मसाले सिल-बट्टे पर पीसे जाते हैं. हमारी नानी जान भी हमेशा सिल-बट्टे पर ही मसाला पीसा करती थीं. उनका कहना था कि खाने में जो ज़ायक़ा और ख़ुशबू सिल-बट्टे पर पिसे मसालों से आता है, वह grinder mixer में पिसे मसालों से नहीं आ पाता. हमारी एक मामी और उनकी बेटियां भी हमेशा सिल-बट्टे पर ही मसाला पीसती हैं. हालांकि इसमें मेहनत ज़्यादा है और वक़्त भी काफ़ी लग जाता है, लेकिन जिन्हें सिल-बट्टे के मसालों का ज़ायक़ा लग जाए, फिर कहां छूटता है.  हमारे घर में भी सिल-बट्टे वाली चटनी ही पसंद की जाती है. बहुत बरसों पहले जब हम नोएडा में जॉब करते थे और वहीं रहते थे, तब हमें नोएडा में सिल-बट्टा ख़रीदने के लिए बहुत घूमना पड़ा था. पुरानी दिल्ली में तो बहुत आसानी से मिल जाते हैं.

सिल- बट्टे को सही रखने के लिए इसे छेनी हथौड़ी से तराशा जाता है. गांव-क़स्बों में यह काम करने वाले गली-मुहल्लों में आवाज़ लगाते मिल ही जाते हैं. मगर बाज़ार मे मिलने वाले पिसे मसालों और grinder mixer की वजह से इन लोगों काम ख़त्म होता जा रहा है.

दैनिक अमृत विचार 




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सुनना...


आज के दौर में हर इंसान किसी न किसी बात को लेकर परेशान है... वो अपनी बात कहना चाहता है, लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं है... कोई किसी के दुख नहीं सुनना चाहता, क्योंकि उसकी अपनी परेशानियां है... दूसरों के दुख, उनकी तकलीफ़ें सुनकर वो अपने सर में दर्द नहीं करना चाहता...
ऐसे में हर इंसान इसी तलाश में रहता है कि उसे कोई ऐसा मिल जाए, जिससे वो अपनी बात कह सके... हमारी एक हमसाई हैं... उनकी अपनी बहुत सी घरेलू परेशानियां हैं... बहुत परेशान रहती हैं... अकसर उनकी किसी न किसी से लड़ाई होती रहती है... वजह है, वो परेशानियां, जिनका ज़िक्र वो किसी से नहीं कर पातीं और अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं...
एक दिन हमने उनसे कहा कि आप अपनी हर बात हमसे कह लिया करें, तब से वो अपनी बातें हमसे शेयर करनी लगीं... अकसर वो कहतीं कि आज ’उनसे’ बात करके ही रहूंगी, चाहे जो हो जाए... हमने उनसे कहा कि अंकल थके हुए घर आते हैं. आप उनसे लड़ाई-झगड़े की बातें करेंगी, तो वो आपसे दूर होने लगेंगे... बेहतर है कि घरेलू और रिश्तेदारों के झगड़े आप ख़ुद ही सुलझाएं... सबसे अच्छा ये है कि आप उन लोगों और उनकी बातों को नज़र अंदाज़ करें, जिनका मक़सद आपको तकलीफ़ देना है... जब वो लोग देखेंगे कि उनकी किसी बात से आपको तकलीफ़ ही नहीं हो रही है, तो वो आपको तकलीफ़ देना छोड़ देंगे... आप उन लोगों पर अपना वक़्त और अपने जज़्बात क्यों ज़ाया करती हैं, जो आपको रुलाते हैं... बेहतर है कि आप अपना वक़्त और जज़्बात उन लोगों पर निसार करें, जो आपसे मुहब्बत करते हैं, आपकी परवाह करते हैं...
दरअसल,किसी भी रिश्ते के लिए एक अच्छा श्रोता होना बहुत ज़रूरी है...
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बदलाव


इंसान हमेशा एक जैसा रहे, ये ज़रूरी तो नहीं... बाज़ दफ़ा अच्छे लोग बाद में बुरे हो जाते हैं, और बुरे लोग अच्छे बन जाते हैं... ज़िन्दगी में कई मोड़ ऐसे आया करते हैं कि इंसान बदल जाता है...
तक़रीबन चार बरस पहले की बात है... जिस इमारत में हमारी सहेली का फ़्लैट है, उसमें बनी एक दुकान एक शख़्स ने ख़रीदी और किराने की दुकान खोल ली... वो शख़्स की एक बहुत बुरी आदत थी कि वह हर लड़की-औरत को देखकर फ़िल्मी गाने गाता... नतीजतन, उस इलाक़े की औरतें उसे बुरा-भला कहतीं... कई औरतें कहतीं कि हम तो उस तरफ़ से भी नहीं जाते, रास्ता बदल लेते हैं, भले ही ज़्यादा क़दम चलना पड़े...
एक दिन हम अपनी सहेली के साथ नीचे उतरे, तो उसने देखकर गाना शुरू कर दिया... हमने कहा कि बहनों को देखकर भाई ऐसे गाने नहीं गाया करते...

एक रोज़ एक औरत उसे कोसने लगी... हमने कहा कि आप उसे क्यों कोसती हैं... दुआ करें कि ख़ुदा उसे हिदायत दे और वो सुधर जाए... इस वाक़िये के कुछ दिन बाद सुनने में आया कि उसकी दुकान में आग लग गई, काफ़ी नुक़सान हुआ... कुछ रोज़ बाद एक हादसे में वह ज़ख़्मी हो गया... हमारा वहां से गुज़रना हुआ, तो हमने उससे उसकी ख़ैरियत पूछी और कहा कि भाई अपना ख़्याल रखा करें...

वो दिन है और आज का दिन है... अब वो न तो किसी लड़की या औरत को देखकर कोई गाना गाता है न ही इमारत के आसपास किसी को फ़िज़ूल में ख़ड़े होने देता है...

एक रोज़ हमने उससे कहा कि हमारी सहेली घर पर अकेली है, इसलिए वह मेन गेट बंद करना चाहती है... उसका जो फ़्लैट ख़ाली पड़ा है, उसमें उसे कोई काम है, तो कर ले, ताकि वह दरवाज़ा बंद कर सके...
उसने कहा कि किसी तरह की फ़िक्र मत करना, तुम्हारा भाई नीचे ही है...
अब वह शख़्स आते-जाते सलाम करता है और ख़ैरियत पूछता है... कोई इतने जल्दी इतना बदल भी सकता है, कुछ लोग ये देखकर हैरान होते हैं...
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ईमान...


-फ़िरदौस ख़ान
हमारी एक आशनाई हैं... उन्हें बात-बात पर क़सम खाने की आदत है... हर बात पर कहती हैं कि अगर वे झूठ बोलें, तो उन्हें मरते वक़्त ईमान नसीब न हो... ’ईमान से’ तो उनका तकिया कलाम है...
हमने उनसे कई बार कहा कि इस तरह बात-बात पर क़सम न खाया करें... जिसे आपकी बात पर यक़ीन करना होगा, वो बिना क़सम के भी कर लेगा और जिसे यक़ीन नहीं करना होगा, वो यक़ीन नहीं करेगा, भले ही आप कितनी ही क़सम क्यों न खाएं... लेकिन उन्होंने अपनी आदत नहीं छोड़ी...
कुछ रोज़ पहले जब वह हमसे बात करते हुए क़सम खाने लगीं, तो हमने उनसे पूछा कि ईमान क्या है?
वह सकपका गईं और कहने लगीं कि ईमान, ईमान होता है... और क्या होता है...
हमने कहा कि ये बात तो हम भी जानते हैं कि ईमान, ईमान होता है, जैसे सूरज, सूरज होता है, पर आख़िर ईमान होता क्या है?
अब उन्हें ग़ुस्सा आ गया और कहने लगीं कि उन्हें नहीं पता कि ईमान क्या होता है... बस उन्होंने बचपन से सुना है कि ईमान होता है...
हमने कहा कि जब आपको ये ही नहीं पता कि ईमान होता क्या है, तो आप यूं ही ईमान की क़सम खाती रहती हैं...
हमने यही सवाल एक और शख़्स से किया तो, उन्होंने जवाब दिया कि जिसका ईमान कमज़ोर होता है, वही ऐसे सवाल करता है...

बहरहाल, जब तक इंसान को ये ही नहीं पता होगा कि ईमान आख़िर है क्या, तो वो ईमान की क्या ख़ाक हिफ़ाज़त करेगा...

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शर्म या फ़ख़्र की बात...


बाज़ दफ़ा लोग इसलिए भी अच्छे करने से दूर रहते हैं कि लोग क्या सोचेंगे ? जब कभी हम रिक्शे में जा रहे हों और ढलान आ जाए, तो रिक्शे से उतर जाते हैं... रिक्शे वाला मना करता है, लेकिन दिल नहीं मानता कि हम बैठे रहें और वो रिक्शे से उतर कर रिक्शा खींचे... कुछ लोग घूरते भी हैं, लेकिन हम परवाह नहीं करते, क्योंकि हमें ख़ुदा की परवाह करनी है, न कि लोगों की...

दिल्ली के कई बाज़ारों में सामान की ढुलाई होती है... मज़दूर ठेलों पर माल ढोते हैं... कई जगह चढ़ाई भी होती है... जब मज़दूर चढ़ाई पर मुश्किल से ठेला खींच रहा होता है, तो अकसर कई लोग उसकी मदद कर देते हैं... ट्रैफ़िक पुलिसकर्मियों को भी हमने इस तरह की मदद करते हुए देखा है.
इसी तरह रिक्शे वालों के पहिये के पास कुछ स्कूटर या बाइक सवार अपना पैर लगा देते हैं, जिससे उससे चढ़ाई में आसानी हो जाती है... अच्छा लगता है, ये सब देखकर... वाक़ई इंसानियत अभी ज़िन्दा है...
किसी की मदद करना शर्म की नहीं, बल्कि फ़ख़्र की बात है... 
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अच्छे दिन


फ़लों की बात तो दूर सब्ज़ियों के भाव भी आसमान छू रहे हैं. सब्ज़ी वाले भी अब किलो की जगह एक पाव के दाम बता रहे हैं, ताकि सुनने वाला बेहोश न हो जाए. और तोल में भी एक-एक माशे का ख़्याल रखने लगे हैं...
हमने कहा- भैया सब्ज़ी तोल रहे हो या सोना-चांदी.
वो चिड़कर बोला- मैडम जी ! ऐसी पार्टी को और दो वोट, आ गए न अच्छे दिन...
हमने कहा- भैया! अवाम की इस बदहाली में हमारा कोई योगदान नहीं है. हम ख़ुद 69 फ़ीसद अवाम की तरह 31 फ़ीसद के किए की सज़ा भुगत रहे हैं.

तस्वीर गूगल से साभार


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छत और बारिश


फ़िरदौस ख़ान
पिछले साल सर्दियों की बात है... हमारे मायके में दूसरी मंज़िल बनाई गई... जगह काफ़ी बड़ी थी... दीवारें बनकर तैयार हो चुकी थीं... जिस दिन काम पूरा हुआ, उसी दिन शाम को बारिश शुरू हो गई... सब बहुत परेशान थे... सीमेंट बह जाने का डर, ऐसे में तो दीवारें गिर जाएंगी... तभी जल्दी-जल्दी सबने मिलकर दीवारों पर प्लास्टिक की शीटें, पन्नी और सीमेंट के ख़ाली कट्टे डालने शुरू कर दिए... सभी दुआ मांग रहे कि बारिश रुक जाए... अल्लाह के करम से बारिश रुक गई...

कुछ दिन बाद लैंटर डला... लेबर के जाते ही थोड़ी देर बाद फिर बूंदाबांदी शुरू हो गई... अब क्या हो... सब फिर परेशान... दुआ मांगने लगे कि बारिश रुक जाए, वरना छत ख़राब हो जाएगी... थोड़े देर बाद बारिश रुक गई... सबने अल्लाह का शुक्र अदा किया और राहत की सांस ली...  हालांकि अगले दिन शाम को फिर हल्की बारिश हुई, लेकिन अब ख़तरा नहीं था...

कुछ दिन बाद हमारी गली में दस-बारह घर छोड़ कर किसी ने छत पर कमरा बनवाया... शायद पंडितों का घर था... वहां सब इसी तरह बोलते हैं, यानी इसका घर, उसका घर, ख़ैर...
हमने छत से देखा, लैंटर डल रहा था... उसी दिन शाम को फिर बारिश शुरू हो गई... हर रोज़ का यही मामूल बन गया था... जब देखो बूंदा-बंदी... हमने अम्मी से कहा कि आज ही पड़ौस में लैंटर डला है और बारिश होने लगी... अम्मी दुआ करने लगी कि बारिश रुक जाए, वरना उनकी छत ख़राब हो जाएगी...
अम्मी को इस तरह दुआ मांगते देखकर बहुत अच्छा लगा... दूसरों के लिए भी इतनी फ़िक्र करने वाले भला कितने लोग होते होंगे... भले ही कम हों, लेकिन हैं तो सही... नेक लोगों की वजह से ही अभी तक दुनिया क़ायम है... जिस दिन नेकी ख़्त्म हो जाएगी, दुनिया भी नेस्तनाबूद हो जाएगी...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

तस्वीर गूगल से साभार
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ईदी बनाम अहसान


कई साल पहले की बात है... हम रिश्ते के मामा के घर गए हुए थे... हमने अपने मामूज़ाद भाई ज़ुल्फ़िक़ार को ईदी में पांच सौ रुपये दे दिए, उसने बहुत ना-नुकर की... हमने कहा कि ईदी को मना नहीं करते... सो, उसने पैसे ले लिए... कुछ देर बाद मामी आईं, शायद वो पड़ौस में गई हुई थीं... हमने उन्हें मिठाई का डिब्बा दिया... उन्होंने बहुत ना-नुकर की और कहने लगीं, देने का फ़र्ज़ तो हमारा है, हम कैसे ले सकते हैं... हमने कहा कि अम्मी ने भिजवाई है... ख़ैर उन्होंने मिठाई ले ली...
कुछ देर बाद उनके जेठ आए... उन्होंने हमें और ज़ुल्फ़िक़ार को दो-दो सौ रुपये की ईदी दी... मामी फिर ना-नुकर करने लगीं, लेकिन बड़े मामा पैसे देकर चले गए... दोपहर में मामा आए, तो मामी कहने लगीं, तुम्हारे बड़े भाई आए थे. ज़ुल्फ़िक़ार को दो सौ रुपये दे गए हैं. जाओ अपनी भतीजी को तीन सौ रुपये दे आओ, हम किसी का अहसान नहीं रखते... मामा बोले, पहले कुछ खाने को दे दो, लेकिन वो नहीं मानी कहने लगी, पहले अहसान उतार कर आओ, फिर कुछ खाना-पीना...
हम सोचने लगे कि ये हमारे साथ भी यहीं करने वाली हैं... हुआ भी यही, जब हम चलने लगे, तो उन्होंने हमारे हाथ पर छह सौ रुपये रख दिए... हमने बहुत मना किया, लेकिन वो नहीं मानी...
घर आकर हमने अम्मी से कहा कि अब इस मामी की चौखट पर कभी क़दम नहीं रखेंगे...

ईदी तो ख़ुशी की चीज़ हुआ करती है और उन्होंने इसे ’अहसान’ कहकर ’बोझ’ बनाकर रख दिया... हम सोचने लगे, अगर मामी किसी को एक गिलास पानी पिलाती होंगी, तो सोचती होंगी कि उन्होंने सामने वाले पर कितना बड़ा अहसान किया है... ज़िन्दगी में हम प्यासे मर जाएंगे, लेकिन मामी से कभी एक बूंद पानी नहीं लेंगे...

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... और वो चली गई


कई साल पहले हमारे एक शनासा ने दिल्ली का एक क़िस्सा सुनाया था... आज न जाने क्यूं याद आ गया...
एक लड़का था और एक लड़की... लड़का बिहार का रहने वाला था... लड़की झारखंड की थी... दोनों में प्यार था, जैसा बताया गया... हुआ यूं कि एक रोज़ दोनों कहीं से आ रहे थे... लड़का मोटर साइकिल चला रहा था और लड़की उसके पीछे बैठी थी... जिस तरह लड़की ने उस लड़के को अपनी बांहों की गिरफ़्त में लिया हुआ था, उससे साफ़ ज़ाहिर था कि दोनों में मुहब्बत है...
रात का वक़्त था और सर्दियों का मौसम... हमारे शनासा अपने दोस्त के साथ सड़क किनारे खड़े बात कर रहे थे... तभी अचानक एक गाड़ी ने मोटर साइकिल को टक्कर मार दी... मोटर साइकिल घिसटते हुए दूर जा गिरी... लड़के को बहुत ज़्यादा चोट आई थी... वो सड़क पर बेसुध पड़ा था... चोट लड़की को भी चोट आई थी, लेकिन शायद उसे ज़्यादा चोट नहीं लगी थी... जल्द ही वह उठ बैठी और अपने कपड़े झाड़ते हुए उसने एक ऒटो को इशारा करके रोका... फिर उसमें बैठकर चली गई... उसने नज़र भरकर भी लड़के को नहीं देखा कि वह ज़िन्दा भी है या नहीं... बस उसे जाने की जल्दी थी और इस बात की फ़िक्र कि कहीं कोई उसे न देख ले...
हमारे शनासा ये सब देख रहे थे... उन्होंने अपने दोस्त की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया... कुछ और लोगों ने भी उनकी मदद की... उन्होंने लड़के के परिचितों को फ़ोन किया... लड़के के पैर में फ़्रेक्चर हो गया था... उस लड़के ने ही उन्हें बताया कि वह उस लड़की से प्यार करता है... उसे इस बात का दुख था कि लड़की उसे ज़ख़्मी हालत में सड़क पर पड़ा छोड़कर चली गई...

सोचते हैं, ये कैसी मुहब्बत है, जो अपने महबूब को ज़ख़्मी हालत में सड़क पर छोड़ कर चली जाए...
हम तो इसे मुहब्बत क़तई नहीं कहेंगे...

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भ्रष्ट कौन...?


हमारे मुल्क में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से दो वक़्त की रोटी नसीब हो पाती है... जिस दिन उन्हें काम नहीं मिलता, उस दिन उनके घर का चूल्हा भी नहीं जल पाता... ये लोग रोज़ कुंआ खोदते हैं और रोज़ पानी पीते हैं...

उम्मीदवार जब इन मेहनतकशों से अपने लिए मतदान के लिए कहते हैं, तो इनका जवाब होता है कि मतदान के लिए वे अपनी दिहाड़ी नहीं छोड़ सकते, क्योंकि अगर काम नहीं करेंगे, तो खाएंगे कहां से...?
इस पर उम्मीदवार इन लोगों से कहते हैं कि एक दिन की दिहाड़ी के पैसे हमसे ले लो और हमारे हक़ में मतदान कर दो... इस पर ये लोग (सभी नहीं) उम्मीदवार से दिहाड़ी के पैसे लेकर मतदान कर देते हैं...

हमारी नज़र में अपनी दिहाड़ी के पैसे लेकर मतदान करने वाले ये मज़दूर भ्रष्ट नहीं हैं... बल्कि भ्रष्ट वे लोग हैं, जो इनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाते हैं... और सबसे ज़्यादा भ्रष्ट वह व्यवस्था है, जिसमें ग़रीब आदमी एक दिन काम न करे, तो उसे और उसके परिजनों को भरपेट खाना तक नसीब नहीं हो पाता है...

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परछाइयां...


ज़िन्दगी की जद्दोजहद ने इंसान को जितना मसरूफ़ बना दिया है, उतना ही उसे अकेला भी कर दिया है...हालांकि...आधुनिक संचार के साधनों ने दुनिया को एक दायरे में समेट दिया है...मोबाइल, इंटरनेट के ज़रिये सात समन्दर पार किसी भी पल किसी से भी बात की जा सकती है... इसके बावजूद इंसान बहुत अकेला दिखाई देता है...बहुत अकेला...क्योंकि भौतिकतावाद ने 'अपनापन' जैसे जज़्बे को कहीं पीछे छोड़ दिया है... शायद, इसीलिए, लोग अब परछाइयों (वर्चुअल दुनिया) में रिश्ते तलाशने लगे हैं...

वाल्ट व्हिटमेन के शब्दों में " ओ राही! अगर तुझे मुझसे बात करने की इच्छा हुई, तो मैं भी तुझसे क्यों न बात करूं...
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विज्ञापन डराते हैं


टीवी पर दिनभर में जितने भी विज्ञापन आते हैं, उनमें ऐसे विज्ञापनों की भरमार रहती है, जिनमें लोगों को इतनी बुरी तरह डराया जाता है कि वे विज्ञापन ख़त्म होते ही उनके उत्पाद ख़रीदने के लिए दौड़ पड़ें... हाथ धोने से लेकर नहाने तक और बर्तन धोने से लेकर फ़र्श साफ़ करने तक के उत्पादों के विज्ञापनों में कीटाणुओं का डर दिखाया जाता है कि अगर फ़लां उत्पाद इस्तेमाल न किया, तो उनका बच्चा बीमार हो जाएगा...
शुक्र है कि ये विज्ञापन कीटाणुओं के संपूर्ण नाश के लिए कोई कीटनाशक पीने की सलाह नहीं देते...
यह हिंदुस्तान है, जहां धरती को मां कहकर पुकारा जाता है... गांव-देहात में आज भी चोट लगने पर बच्चे और बड़े अपने ज़ख़्म पर मिट्टी डाल लेते हैं...

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भ्रष्टाचार कहां नहीं है...

एक वाक़िया पेश है... कई साल पहले की बात है... एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार ने अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए इनामी योजना शुरू की... बड़े इनामों में एक कार, स्कॊलर्शिप (लाखों में), मोटरसाइकिलें और छोटे इनामों में कांच के चार गिलास शामिल थे... इस इनामी योजना की वजह से अख़बार की प्रसार संख्या काफ़ी बढ़ गई... ये इनाम जिन्हें मिलने थे, उन्हें ही मिले... यानी कार मिली अख़बार के मालिक के दामाद को... स्कॊलर्शिप मिली अख़बार के मालिक के चहेते संपादक के भतीजे को (क्योंकि तब संपादक की इकलौती संतान गोद में थी), मोटरसाइकिलें मिलीं अख़बारों के उन एजेंटों को, जो मोटी रक़म के विज्ञापन लाते थे...
अब बचे गिलास, तो कुछ गिलास अख़बार में काम करने वालों ने अपने परिचितों को दिलवा दिए... और बचे-खुचे गिलास पाठकों को इनाम के तौर पर दे दिए गए...
हर जगह यही हाल है...

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ईमानदार नेता...


कई साल पहले की बात है... हमारे मामा जान एक क़िस्सा सुना रहे थे... उनके किसी दोस्त ने उनसे कहा कि उन्हें एक सरकारी काम है और दूसरे शहर फ़लां नेता के पास जाना है... अगले रोज़ मामा जान अपने दोस्त के साथ उस नेता के घर पहुंच गए... उस नेता का घर बहुत मामूली था... घर देखकर उनके दोस्त ने मामा जान से कहा कि चलो वापस चलते हैं... मामा जान ने वजह पूछी, तो उनके दोस्त ने कहा कि यह नेता हमारा काम क्या ख़ाक कराएगा, जो अपने लिए कुछ नहीं कर पाया...
यानी नेता का घर आलीशान होना चाहिए... घर के बाहर दो-तीन शानदार गाड़ियां खड़ी होनी चाहिए...
ईमानदार नेताओं के बारे में यह है एक आम आदमी की सोच...

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मज़हब

कई साल पहले की बात है... हमारे दफ़्तर में एक लड़की आई... बहुत परेशान थी... उसकी मां सौतेली थी... उसके पास कोई काम नहीं था... हमसे उसकी जो मदद हुई, कर दी... उसे नौकरी मिल गई... उसे कभी कोई परेशानी होती, तो हमें बताती... उसके प्रेमी ने उसे धोखा दे दिया था... वह बहुत बुरी तरह टूट चुकी थी... अब वह शादी करके बस चाहती थी, ताकि अपने प्रेमी को भूल सके... अख़बारों में शादी के इश्तिहार देखा करती थी... फिर हमें बताती भी थी...
एक दिन वह हमारे पास आई और कहने लगी- डियर तुमने सॊरी कहना है...
हमने पूछा क्यों...?
कहने लगी कि मेरी दादी हमेशा कहा करती थीं कि मुसलमान बहुत ख़राब होते हैं... और मैं भी बचपन से मुसलमानों से नफ़रत करती थी... लेकिन तुमसे मिलकर मुसलमानों के प्रति मेरा नज़रिया बदल गया... तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो...
कितनी सच्चाई से उसने अपनी बात कही... हम उसकी इस बात को कभी भुला नहीं पाए...

दरअसल, कुछ लोग अपने मज़हब के नाम पर इतना ज़हर उगलते हैं कि उनके उस मज़हब से ही नफ़रत होने लगती है... शायद उसकी दादी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ हो...?

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नज़रिया...


अकसर छोटी-छोटी चीज़ें ज़िंदगी का नज़रिया बदल देती हैं... हमारी मम्मा सब्ज़ी, फलों के छिलके और सूखी रोटी कभी कूड़ेदान में नहीं डालतीं... इन्हें वह दरवाज़े के बाहर सड़क पर एक तरफ़ रखवा देती हैं... जिसे गायें खा लेती हैं... हमारे इलाक़े में बहुत-से आवारा पशु हैं, जो भूख लगने पर अकसर कूड़ा-कर्कट खाते देखे जाते हैं... सब्ज़ियों, फलों के छिलकों और सूखी रोटी को देखते ही ये खाने के लिए आ जाते हैं...
मम्मा की देखा-देखी अब गली की और महिलाएं भी ऐसा करने लगी हैं... हमारे यहां कचरा उठाने वाला हर रोज़ नहीं आता... ऐसे में सब्ज़ियों और फलों के छिलके बाहर डालने से जहां आवारा पशुओं का कुछ भला हो जाता है, वहीं छिलकों से कूड़ेदान का कूड़ा भी सड़ता नहीं है...
अब तो गली के कोने पर बिजली के खंबे के पास एक जगह बन गई है, जहां कुछ लोग हरा चारा भी लाकर डाल देते हैं...
जो चीज़ें हमारे काम की नहीं होतीं, उन्हें कूड़ेदान में फेंकने की बजाय उनका किसी ऐसी जगह इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां उनकी ज़रूरत हो...
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खाना बनाना...


दिल्ली में लड़कियों से यह बात सुनने को ख़ूब मिलती है कि उन्हें चाय बनानी तक नहीं आती... ऐसा कहने वाली लड़कियों में गांव-क़स्बों और छोटे शहरों से आने वाली वे लड़कियां भी शामिल हैं, जो दिल्ली में आकर पढ़ाई या नौकरी कर रही हैं... हमें आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि इसमें गर्व करने वाली कौन-सी बात है कि उन लड़कियों को चाय बनानी तक नहीं आती...
गर्व की बात तो यह होनी चाहिए कि उन्हें कई तरह की चाय बनानी आती है, वे किसी एक सब्ज़ी को कई तरीक़े से पका सकती हैं... उन्हें पंजाबी छोले-भठूरे से लेकर इडली-डोसा तक बनाना आता है... वे जितनी लज़ीज़ पूड़ी-कचौरी बना सकती हैं, उतना ही ज़ायक़ेदार मुग़लई खाना भी बना सकती हैं... उन्हें कई तरह के अचार और चटनियां बनानी आती हैं...
आज के दौर में लड़कियों की बात तो छोड़िये, लड़के भी अच्छा खाना बनाना जानते हैं... अकसर पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में लड़कों को घर से दूर रहना पड़ता है... ऐसे में वे कब तक बाहर का खाना खाएंगे... दिल्ली में दूर-दराज़ के इलाक़ों से आने वाले ज़्यादतर लड़के ख़ुद ही खाना बनाते हैं...
वैसे, भी अपनी मां के बाद ख़ुद बनाए गए खाने का ज़ायक़ा ही सबसे अच्छा होता है... यह बात हम अपने लिए कह रहे हैं...

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