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राहुल गांधी : भीड़ में भी तन्हा...

फ़िरदौस ख़ान
राहुल गांधी देश और राज्यों में सबसे लम्बे अरसे तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. वे एक ऐसे ख़ानदान के वारिस हैं, जिसने देश के लिए अपनी जानें क़ुर्बान की हैं. राहुल गांधी के लाखों-करोड़ों चाहने वाले हैं. देश-दुनिया में उनके प्रशंसकों की कोई कमी नहीं है. लेकिन इस सबके बावजूद वे अकेले खड़े नज़र आते हैं. उनके चारों तरफ़ एक ऐसा अनदेखा दायरा है, जिससे वे चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते.  एक ऐसी दीवार है, जिसे वे तोड़ नहीं पा रहे हैं. वे अपने आसपास बने ख़ोल में घुटन तो महसूस करते हैं, लेकिन उससे निकलने की कोई राह, कोई तरकीब उन्हें नज़र नहीं आती.

बचपन से ही उन्हें ऐसा माहौल मिला, जहां अपने-पराये और दोस्त-दुश्मन की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो गया था. उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके पिता राजीव गांधी का बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया. इन हादसों ने उन्हें वह दर्द दिया, जिसकी ज़रा सी भी याद उनकी आंखें भिगो देती है. उन्होंने कहा था,  "उनकी दादी को उन सुरक्षा गार्डों ने मारा, जिनके साथ वे बैडमिंटन खेला करते थे."
वैसे राहुल गांधी के दुश्मनों की भी कोई कमी नहीं है. कभी उन्हें जान से मार देने की धमकियां मिलती हैं, तो कभी उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके जाते हैं. गुज़शता अप्रैल में उनका जहाज़ क्रैश होते-होते बचा. कर्नाटक के हुबली में उड़ान के दौरान 41 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जहाज़ में तकनीकी ख़राबी आ गई और वह आठ हज़ार फ़ुट तक नीचे आ गया. उस वक़्त उन्हें लगा कि जहाज़ गिर जाएगा और उनकी जान नहीं बचेगी.  लेकिन न जाने किनकी दुआएं ढाल बनकर खड़ी हो गईं और हादसा टल गया. कांग्रेस ने राहुल गांधी के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का इल्ज़ाम लगाया.
किसी अनहोनी की आशंका की वजह से ही राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. बचपन में भी उन्हें गार्डन के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने की इजाज़त नहीं थी. खेलते वक़्त भी सुरक्षाकर्मी किसी साये की तरह उनके साथ ही रहा करते थे. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं." लेकिन ऐसा ज़्यादा वक़्त नहीं हो पाया और वे फिर से सुरक्षाकर्मियों के घेरे में क़ैद होकर रह गए.

हर वक़्त कड़ी सुरक्षा में रहना, किसी भी इंसान को असहज कर देगा, लेकिन उन्होंने इसी माहौल में जीने की आदत डाल ली. ख़ौफ़ के साये में रहने के बावजूद उनका दिल मुहब्बत से सराबोर है. वे एक ऐसे शख़्स हैं, जो अपने दुश्मनों के लिए भी दिल में नफ़रत नहीं रखते. वे कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि नफ़रत पालने वालों के लिए यह जेल होती है. मैं उनका आभार जताता हूं कि उन्होंने मुझे सभी को प्यार और सम्मान करना सिखाया.” अपने पिता की सीख को उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ढाला. इसीलिए उन्होंने अपने पिता के क़ातिलों तक को माफ़ कर दिया. उनका कहना है, "वजह जो भी हो, मुझे किसी भी तरह की हिंसा पसंद नहीं है. मुझे पता है कि दूसरी तरफ़ होने का मतलब क्या होता है. ऐसे में जब मैं जब हिंसा देखता हूं चाहे वो किसी के भी साथ हो रही हो, मुझे पता होता है कि इसके पीछे एक इंसान, उसका परिवार और रोते हुए बच्चे हैं. मैं ये समझने के लिए काफ़ी दर्द से होकर गुजरा हूं. मुझे सच में किसी से नफ़रत करना बेहद मुश्किल लगता है."
उन्होंने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का ज़िक्र करते हुए कहा था, "मुझे याद है जब मैंने टीवी पर प्रभाकरण के मुर्दा जिस्म को ज़मीन पर पड़ा देखा. ये देखकर मेरे मन में दो जज़्बे पैदा हुए. पहला ये कि ये लोग इनकी लाश का इस तरह अपमान क्यों कर रहे हैं और दूसरा मुझे प्रभाकरण और उनके परिवार के लिए बुरा महसूस हुआ."

राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल गांधी का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है. उन्होंने जब सुना कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दाख़िल कराए गए हैं, तो वे उनका हालचाल जानने के लिए अस्पताल पहुंच गए. वे इंसानियत को सर्वोपरि मानते हैं. अपने पिता की ही तरह अपने कट्टर विरोधियों की मदद करने में भी पीछे नहीं रहते. विभिन्न समारोहों में वे लाल्कृष्ण आडवाणी का भी ख़्याल रखते नज़र आते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है.
वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."

कहते हैं कि सच के रास्ते में मुश्किलें ज़्यादा आती हैं और राहुल गांधी को भी बेहिसाब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. बचपन से ही उनके विरोधियों ने उनके ख़िलाफ़ साज़िशें रचनी शुरू कर दी थीं.   उन पर लगातार ज़ाती हमले किए जाते हैं. इस बात को राहुल गांधी भी बख़ूबी समझते हैं, तभी तो उन्होंने विदेश जाने से पहले ट्वीट करके अपने विरोधियों से कहा था, "कुछ दिन के लिए देश से बाहर रहूंगा. भारतीय जनता पार्टी की सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी के दोस्तों, ज़्यादा परेशान मत होना. मैं जल्द ही वापस लौटूंगा."

राहुल गांधी एक नेता हैं, जो पार्टी संगठन को मज़बूत करने के लिए, पार्टी को हुकूमत में लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी के लोग ऐन चुनावों के मौक़ों पर ऐसे बयान दे जाते हैं, ऐसे काम कर जाते हैं, जिससे विरोधियों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा मिल जाता है. इन लोगों में वे लोग भी शामिल हैं, जो उनकी दादी, उनके पिता के क़रीबी रहे हैं. ताज़ा मिसाल पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की है, जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में शिरकत करके सियासी बवाल पैदा कर दिया.

बहरहाल, राहुल गांधी तमाम अफ़वाहों और अपने ख़िलाफ़ रची जाने वाली तमाम साज़िशों से अकेले ही जूझ रहे है, मुस्कराकर उनका सामना कर रहे हैं.

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राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने

फ़िरदौस ख़ान
एक लम्बे इंतज़ार के बाद आख़िरकार राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए. पिछले काफ़ी अरसे से पार्टी में उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठ रही थी. कांग्रेस नेताओं का मानना था कि पार्टी की बागडोर अब राहुल गांधी के सुपुर्द कर देनी चाहिए. सोमवार को पार्टी अध्यक्ष पद के प्रस्तावित चुनाव के लिए नामांकन की आख़िरी तारीख़ थी. राहुल गांधी के ख़िलाफ़ किसी ने भी परचा दाख़िल नहीं किया था. कांग्रेस नेता मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने कहा कि नामांकन के 89 प्रस्ताव दाख़िल किए गए थे. सभी वैध पाए गए. सिर्फ़ एक ही उम्मीदवार मैदान में है, इसलिए मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी के निर्वाचन की घोषणा करता हूं. कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी निर्विरोध चुन लिए गए हैं

ग़ौरतलब है कि अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसम्बर 1885 को हुई थी. 1885 में बोमेश चंद्र बनर्जी कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद 1886 में दादाभाई नौरोजी, 1887 में बदरूद्दीन तैय्यबजी, 1888 में जार्ज यूल, 1889 में सर विलियम वेडरबर्न, 1890 में सर फ़िरोज़शाह मेहता, 1891 में पी. आनन्द चार्लू,  1892 में बोमेश चन्द्र बनर्जी, 1893 में दादाभाई नौरोजी,  1894 में अलफ़्रेड वेब, 1895 में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, 1896 में रहीमतुल्ला सयानी, 1897 में सी. शंकरन नायर, 1898 में आनन्द मोहन बोस, 1899 में रमेश चन्द्र दत्त, 1900 में एनजी चन्द्रावरकर, 1901 में दिनशा इदुलजी वाचा, 1902 में एसएन बनर्जी, 1903 में लाल मोहन घोष, 1904 में सर हैनरी कॊटन, 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले, 1906 में दादाभाई नौरोजी, 1907 में डॉ. रास बिहारी घोष, 1909 में पंडित मदन मोहन मालवीय, 1910 में सर विलियम वेडर्बन, 1911 में पंडित बिशन नारायण धर, 1912 में आरएन माधोलकर, 1913 मेंसैयद मोहम्मद बहादुर, 1914 में भूपेन्द्रनाथ बसु, 1915 में सर सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा, 1916 में अम्बिका चरण मज़ूमदार, 1917 में एनी बेसेंट, 1918 में हसन इमाम और मदनमोहन मालवीय, 1919 में पंडित मोतीलाल नेहरू, 1920 में सी विजया राघवाचारियर, 1921 में सीआर दास, 1923 में लाला लाजपत राय और मुहम्मद अली, 1924 में मोहनदास करमचंद गांधी, 1925 में सरोजिनी नायडू, 1926 में एस श्रीनिवास आयंगार, 1927 में डॉ. एमए अंसारी, 1928 में मोतीलाल नेहरू, 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1931 में सरदार बल्लभभाई पटेल, 1932 में आर अमृतलाल, 1933 में नेल्ली सेन गुप्ता, 1934 में बाबू राजेन्द्र प्रसाद, 1936 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1938 में सुभाष चन्द्र बोस, 1940 में मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, 1946 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और सितंबर 1946 में आचार्य जेबी कृपलानी पार्टी अध्यक्ष बने. आज़ादी के बाद 1948 में बी पट्टाभि सीतारमय्या कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद 1950 में पुरुषोत्तम दास टंडन, 1951 में पंडित जवाहरलाल नेहरू, 1955 में यूएन ढेबर, 1960 में इंदिरा गांधी, 1961 में एन संजीव रेड्डी, 1962 में डी संजिवैया, 1964 में के कामराज, 1968 में एस निजिलिंगप्पा, 1969 में सी सुब्रमण्यम, 1970 में जगजीवन राम, 1971 में डी संजिवैया, 1972 में डॊ. शंकर दयाल शर्मा, 1975 में देवकांत बरूआ, 1976 में ब्रहमनंदा रेड्डी और 1978 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं. इंदिरा गांधी की मौत के बाद पंडित कमलापति त्रिपाठी कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए. फिर 1984 में राजीव गांधी को पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. उनके बाद 1991 में पी वी नरसिंह राव, 1996 में सीताराम केसरी और 1998 में सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया.

क़ाबिले-ग़ौर है कि मोतीलाल नेहरू जी से राहुल गांधी जी तक नेहरू परिवार के सिर्फ़ 6 लोग ही कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं. कांग्रेस की कट्टर विरोधी भारतीय जनता पार्टी के नेता इसे ’गांधी परिवार’ की पार्टी कहकर जनता को गुमराह करते हैं. कांग्रेस ने देश को सात प्रधानमंत्री दिए हैं, जिनमें जवाहरलाल नेहरू, गुलज़ारी लाल नन्दा, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह शामिल हैं. इनमें से सिर्फ़ तीन प्रधानमंत्री ही गांधी परिवार से हैं.

कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को दिल्ली में हुआ. वे देश के मशहूर गांधी-नेहरू परिवार से हैं. उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी हैं, जो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. राहुल गांधी कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और लोकसभा में उत्तर प्रदेश में स्थित अमेठी चुनाव क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं. राहुल गांधी को साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत का श्रेय दिया गया था. वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

राहुल गांधी की शुरुआती तालीम दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में हुई. उन्होंने प्रसिद्ध दून विद्यालय में भी कुछ वक़्त तक पढ़ाई की, जहां उनके पिता ने भी पढ़ाई की थी. सुरक्षा कारणों की वजह से कुछ अरसे तक उन्हें घर पर ही पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ी. साल 1989 में उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में दाख़िला लिया. उनका यह दाख़िला पिस्टल शूटिंग में उनके हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे से हुआ. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वे सुरक्षाकर्मियों के साथ कॉलेज आते थे. तक़रीबन सवा साल बाद 1990  में उन्होंने कॊलेज छोड़ दिया. उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि हासिल की. इसके बाद उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से  डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की.

राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक़ रहा है. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. उन्होंने बॊक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया. उनके बहुत से शौक़ उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं. अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी सीखी. उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था. उन्होंने भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीखा. वे अपनी सेहत का भी काफ़ी ख़्याल रखते हैं. कितनी ही मसरूफ़ियत क्यों न हो, वे कसरत के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं. वे रोज़ दस किलोमीटर तक जॉगिंग करते हैं. वे जापानी मार्शल आर्ट आइकीडो में ब्लैक बेल्ट हैं. एक बार उन्होंने कहा था, "मैं अभ्यास करता हूं, दौड़ता हूं, तैराकी करता हूं और आइकीडो में ब्लैक बेल्ट भी हूं." उन्हें फ़ुटबॊल बहुत पसंद है. लंदन में पढ़ने के दौरान वे फ़ुटबॊल के दीवाने थे.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

बहरहाल, राहुल गांधी के सामने कई चुनौतियां हैं, जिनका सामना उन्हें पूरी हिम्मत और कुशलता से करना है. 
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जब राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लिखने को कहा गया...

फ़िरदौस ख़ान
ये उन दिनों की बात है, जब कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव (अब उपाध्यक्ष) राहुल गांधी भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ खड़े थे... और उन्होंने साल 2011 में जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ पदयात्रा की थी... उन दिनों हम एक अख़बार के लिए काम कर रहे थे... हमसे कहा गया कि हमें एक तहरीर लिखनी है, जो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ हो और विपक्ष (अब सत्ता पक्ष) से जुड़े एक बड़े उद्योगपति के पक्ष में हो...
हमें ये बात बहुत ही नागवार गुज़री... हमारा मानना था कि हमें किसी ख़ास मुद्दे पर लिखने को कहा जाता... जिसका जैसा पक्ष होता, हम उसे उसी तरह पेश करते... बिना ये तय किए कि वह तहरीर किसकी हिमायत में जा रही है, और किसके ख़िलाफ़...
हमने कहा कि हम राहुल गांधी के ख़िलाफ़ नहीं लिखेंगे, अगर कोई बात उनके ख़िलाफ़ नहीं है तो... ऐसा करना सहाफ़त (पत्रकारिता) के उसूलों के ख़िलाफ़ है...
हमसे कहा गया कि हमें काम करना है, तो वही लिखना पड़ेगा, जो कहा जाएगा... हमने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया... और घर आ गए...
बाद में दफ़्तर से फ़ोन आया और हमें वापस बुला लिया गया... लेकिन फिर कभी हमसे राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लिखने को नहीं कहा... ये काम अब और लोग कर रहे थे... बाद में हमने काम छोड़ दिया...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)


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राहुल गांधी : एक मुकम्मल शख़्सियत

फ़िरदौस ख़ान 
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.

राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को दिल्ली में हुआ. वे देश के मशहूर गांधी-नेहरू परिवार से हैं. उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी हैं, जो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. राहुल गांधी कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और लोकसभा में उत्तर प्रदेश में स्थित अमेठी चुनाव क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं. राहुल गांधी को साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत का श्रेय दिया गया था. वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

राहुल गांधी की शुरुआती तालीम दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में हुई. उन्होंने प्रसिद्ध दून विद्यालय में भी कुछ वक़्त तक पढ़ाई की, जहां उनके पिता ने भी पढ़ाई की थी. सुरक्षा कारणों की वजह से कुछ अरसे तक उन्हें घर पर ही पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ी. साल 1989 में उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में दाख़िला लिया. उनका यह दाख़िला पिस्टल शूटिंग में उनके हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे से हुआ. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वे सुरक्षाकर्मियों के साथ कॉलेज आते थे. तक़रीबन सवा साल बाद 1990  में उन्होंने कॊलेज छोड़ दिया. उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि हासिल की. इसके बाद उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से  डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की.

राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक़ रहा है. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. उन्होंने बॊक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया. उनके बहुत से शौक़ उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं. अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी सीखी. उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था. उन्होंने भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीखा. वे अपनी सेहत का भी काफ़ी ख़्याल रखते हैं. कितनी ही मसरूफ़ियत क्यों न हो, वे कसरत के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं. वे रोज़ दस किलोमीटर तक जॉगिंग करते हैं. उन्हें फ़ुटबॊल बहुत पसंद है. लंदन में पढ़ने के दौरान वह फ़ुटबॊल के दीवाने थे.

स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वे लंदन चले गए, जहां उन्होंने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ तीन साल तक काम किया. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफ़ेसर माइकल यूजीन पोर्टर को ब्रैंड स्ट्रैटजी का विद्वान माना जाता है. सुरक्षा कारणों की वजह से राहुल गांधी ने रॉल विंसी के नाम से काम किया. उनके सहयोगी नहीं जानते थे कि वे राजीव गांधी के बेटे और इंदिरा गांधी के पौत्र के साथ काम कर रहे हैं.  राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं."

विदेश में रहते राहुल गांधी को दस साल हो गए थे. वे स्वदेश लौटे और फिर साल 2002 के आख़िर में उन्होंने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फ़र्म, बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड बनाई. रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ में दर्ज आवेदन के मुताबिक़ इस कंपनी का मक़सद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह और सहायता मुहैया करना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना था. साल 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हल्फ़नामे के मुताबिक़ बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड में राहुल गांधी की हिस्सेदारी 83 फ़ीसद थी. उनकी पढ़ाई की तरह उनके कारोबार में भी काफ़ी दिक़्क़तें आईं. सियासत की वजह से वे अपने कारोबार पर ख़ास तवज्जो नहीं दे पाए.

राहुल गांधी की सियासी ज़िन्दगी की शुरुआत भी अचानक ही हुई. वे साल 2003 में कांग्रेस की बैठकों और सार्वजनिक समारोहों में नज़र आए. एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए एक सद्भावना यात्रा पर वह अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पाकिस्तान भी गए. इसके बाद जनवरी 2004 में उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, तो उनके सियासत में आने की चर्चा शुरू हो गई. इस बारे में पूछने पर उन्होंने सिर्फ़ इतना कहकर कोई भी प्रतिक्रिया देने से साफ़ इंकार कर दिया था, "मैं राजनीति के ख़िलाफ़ नहीं हूं. मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूंगा और वास्तव में, करूंगा भी या नहीं."

फिर मार्च 2004 में लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ, तो राहुल गांधी ने सियासत में आने का ऐलान कर दिया. उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा. इससे पहले उनके चाचा संजय गांधी ने भी इसी क्षेत्र का नेतृत्व किया था. उस वक़्त उनकी मां सोनिया गांधी यहां से सांसद थीं. तब मीडिया के साथ अपने पहले साक्षात्कार में राहुल गांधी ने देश को जोड़ने वाले शख़्स के तौर पर ख़ुद को पेश किया. उन्होंने कहा था कि वे जातीय और धार्मिक तनाव को कम करने की कोशिश करेंगे. इलाक़े की अवाम ने राहुल गांधी को भरपूर समर्थन दिया. उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंदी को एक लाख वोटों से हराकर शानदार जीत हासिल की. इस दौरान उन्होंने सरकार या पार्टी में कोई ओहदा नहीं लिया और अपना सारा ध्यान मुख्य निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही केंद्रित किया.

फिर जनवरी 2006 में आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुए कांग्रेस के एक सम्मेलन में पार्टी के हज़ारों सदस्यों ने राहुल गांधी से पार्टी में और महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका निभाने की ग़ुज़ारिश की. इस पर राहुल गांधी ने कहा, "मैं इसकी सराहना करता हूं और मैं आपके जज़्बात और समर्थन के लिए शुक्रगुज़ार हूं. .मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं आपको मायूस नहीं करूंगा, लेकिन अभी धैर्य रखें." यह कहकर उन्होंने नेतृत्व वाली कोई भी बड़ी भूमिका निभाने से मना कर दिया. राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में पार्टी सचिवालय के एक फेरबदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया था. उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई.  साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी को तीन लाख तैंतीस हज़ार से शिकस्त देकर जीत दर्ज की. इस चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 जीतीं. इस तरह राहुल गांधी ने प्रदेश में कांग्रेस को ज़िन्दा करने का काम किया और उन्हें इसका श्रेय दिया गया. उन्होंने डेढ़ महीने में देश भर में 125 रैलियों को संबोधित किया.
राहुल गांधी को 19  जनवरी 2013 में कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया. क़ाबिले-ग़ौर है कि इससे पहले कांग्रेस में उपाध्यक्ष का पद नहीं होता था. लेकिन पार्टी में उनका महत्व बढ़ाने और उन्हें सोनिया गांधी का सबसे ख़ास सहयोगी बनाने के लिए पार्टी ने उपाध्यक्ष के पद का सृजन किया.

राहुल गांधी अपनी जनसभाओं में जिस तरह सांप्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी व अन्य सियासी दलों को निशाना बनाते हैं, उससे सभी दलों के होश उड़ जाते हैं. वे उन पर सधे राजनीतिक अंदाज़ में हमले करते हैं. एक संजीदा वक्ता की तरह तार्किक ढंग से वे सियासी दलों को चुन-चुन कर व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब देते हैं. उनके इसी अंदाज़ से दलों में बौखलाहट पैदा हो जाती है. वे समझ नहीं पाते कि राहुल के ‘आम आदमी’ का कौन सा तोड़ निकालें.

राहुल गांधी भाजपा के झूठे वादों और लोकपाल पर उसके चरित्र की जमकर बखिया उधेड़ते हैं. वे भाजपा द्वारा भ्रष्टाचारी नेताओं से हाथ मिलाने पर लोगों से सवाल करते हैं, तो उन्हें भीड़ से खुलकर जवाब भी मिलते हैं. उन्हीं जवाबों को आगे बढ़ाते हुए मंच से राहुल गांधी लोगों को बताते हैं कि ग़रीबों का मसीहा बनने वाले नेता कहते हैं कि राहुल गांधी पागल हो गया है, और इसके बाद वह आक्रामक हो जाते हैं. अपनी आस्तीनें चढ़ाकर हमलावर अंदाज़ में कहते हैं- ‘‘हां, मैं ग़रीबों का दुख-दर्द देखकर, प्रदेश की दुर्दशा देखकर पागल हो गया हूं. कोई कहता है कि राहुल गांधी अभी बच्चा है, वह क्या जाने राजनीति क्या होती है. तो मेरा कहना है कि हां, मुझे उनकी तरह राजनीति करनी नहीं आती. मैं सच्चाई और साफ़ नीयत वाली राजनीति करना चाहता हूं. मुझे उनकी राजनीति सीखने का शौक़ भी नहीं है. मायावती कहती हैं राहुल नौटंकीबाज़ है. तो मेरा कहना है कि अगर ग़रीबों का हाल जानना, उनके दुख-दर्द को समझना, नाटक है तो राहुल गांधी यह नाटक ताउम्र करता रहेगा."

राहुल गांधी प्रदेश को बदहाली से निकालने के लिए युवाओं से साथ के लिए हाथ बढ़ाते हैं. इस दौरान राहुल गांधी यह बताना नहीं भूलते कि वे यहां चुनाव जीतने नहीं, प्रदेश को बदलने आए हैं. यह उनकी इस साफ़गोई का सियासी दलों के पास कोई जवाब नहीं होता. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राहुल गांधी की बातों में दम है.
यह हक़ीक़त है कि वे हवाई नेताओं की तरह आसमान में नहीं उड़ते और न ही किसी पंचतारा सेलिब्रिटी की तरह रथ पर चढ़कर ज़िलों का दौरा करते हैं. उन्होंने खाटी देसी अंदाज़ में गांवों में रात रात बिताई. पगडंडियों पर कीचड़ की परवाह किए बिना चले और आम आदमी से बेलाग संवाद स्थापित करने की कोशिश की. आम आदमी को नज़दीक से जानने-समझने और अपना हाथ उसके हाथ में देने की पहल की.

राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे की दहाई में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता में अपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

कुल मिलाकर राहुल गांधी ऐसे क़द्दावर नेताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं, जिनके तूफ़ान से सियासी दलों के  हौसले  पस्त हो जाते हैं. हालत यह हो गई है कि कोई सियासी दल दाग़ी को लेता है, तो कोई दग़ाबाज़ी को सहारा बना लेता है. जब कोई चारा नहीं दिखता, तो कुछ सियासी दल राहुल पर व्यक्तिगत प्रहार करने में जुट जाते हैं.  मगर इससे राहुल गांधी को कोई नुक़सान नहीं होता, क्योंकि राजनीति की विरासत को संभालने वाला यह युवा नेता अब युवाओं, और अन्य वर्गों के साथ-साथ बुजुर्गों का भी चहेता बन चुका है. राहुल गांधी की जनसभाओं में दूर-दूर से आए बुज़ुर्ग यही कहते हैं कि लड़का ठीक ही तो कह रहा है, यही कुछ करेगा. महिलाओं में तो राहुल गांधी को लेकर काफ़ी क्रेज है. यह बात तो विरोधी दलों के नेता भी बेहिचक क़ुबूल  करते हैं. वे तो मज़ाक़ के लहजे में यहां तक कहते हैं कि अगर महिलाओं को किसी एक नेता को वोट देने को कहा जाए, तो सभी राहुल गांधी को ही देकर आएंगी. राहुल युवाओं ही नहीं, बल्कि बच्चों से भी घुलमिल जाते हैं. कभी किसी मदरसे में जाकर बच्चों से बात करते हैं, तो कभी किसी मैदान में खेल रहे बच्चों के साथ बातचीत शुरू कर देते हैं. यहां तक कि गांव-देहात में मिट्टी में खेल रहे बच्चों तक को गोद में उठाकर उसके साथ बच्चे बन जाते हैं. बच्चे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं. उन्हें अपनी भांजी मिराया और भांजे रेहान के साथ वक़्त बिताना भी बहुत अच्छा लगता है. उनके अच्छे बर्ताव की वजह से ही बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  सच है कि संस्कार विरासत में मिलते हैं, संस्कार घर से मिला करते हैं. अपने से बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है, तो बच्चों के लिए प्यार-दुलार है.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा था, ऐसे वक़्त में राहुल गांधी गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे थे. वे लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. वे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोयडा के नज़दीकी गांव भट्टा-पारसौल गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी वे सुबह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए थे. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया था. इसके बाद भी वे गांव लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया. और चौकस प्रशासन को भनक तक नहीं लगी. ऐसे हैं राहुल गांधी.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वे एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वे रोड शो कर चुके थे और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वे किसी दलित के घर भोजन करते हैं, तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल गांधी के आम लोगों से मिलने-जुलने के इस जज़्बे ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. हालत यह है कि लोगों से मिलने के लिए वह अपना सुरक्षा घेरा तक तोड़ देते हैं.

राहुल गांधी समझ चुके हैं कि जब तक वे आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वे सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख़्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वे भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल गांधी का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की थी, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है.

संसद में भी राहुल गांधी बेहद आक्रामक अंदाज़ में नज़र आते हैं. कालेधन पर तंज़ कसते हुए राहुल गांधी ने कहा था,  "काला धन सफ़ेद कर रहे हैं वित्तमंत्री. पहले कालाधन वापस लाने का वादा किया, अब उसे ही सफ़ेद करने का, यह उनकी फ़ेयर एंड लवली स्कीम है, काले पैसे को आप गोरा कर सकते हो. फ़ेयर एंड लवली योजना के तहत किसी को जेल नहीं होगी, जेटली जी के पास जाइये, आपका पैसा सफ़ेद हो जाएगा."  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा, "महात्मा गांधी हमारे हैं, सावरकर आपके हैं. आपने सावरकर को उठाकर फेंक दिया क्या? फेंक दिया, तो बहुत अच्छा किया." राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह रोज़गार सृजन के लिए काले रंग का एक बड़ा सा बब्बर शेर लिए घूम रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद युवाओं को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा, "आपने बब्बर शेर दिया तो दिया, लेकिन रोज़गार कितने दिए, यह किसी को मालूम नहीं. किसी के पास कोई आंकड़ा नहीं है." संसद में जब राहुल बोल रहे थे, तो भाजपा सांसद हंगामा करने लगे. इस पर राहुल गांधी ने कहा, मैं आरएसएस का नहीं हूं. मैं ग़लतियां करता हूं. मैं सब कुछ नहीं जानता, सब कुछ नहीं समझता. मैं जनता से बातचीत करके उनसे उनकी बात सुनकर और समझकर अपनी बात रखता हूं. हम में और आप में फ़र्क़ यही है कि आप सब जानते हैं और ग़लती नहीं करते, जबकि हम ग़लती करते हैं और उससे सीखते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "
वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.

प्रभावशाली घराने से होने के बावजूद राहुल गांधी में सादगी है. खाने के वक़्त मेज़ पर वे साथियों को प्लेटें दे देते हैं, अपनी प्लेटें ख़ुद किचन में रख आते हैं. किसी बुज़ुर्ग के पानी मांगने पर सेवकों से कहने की बजाय ख़ुद किचन से पानी लाकर दे देते हैं. सार्वजनिक मंचों पर उन्हें अकसर डॊ. मनमोहन सिंह व अन्य लोगों को पानी देते हुए देखा गया है. वे बनावटीपन से कोसों दूर हैं. वे संसद की सीढ़ियों पर सर नहीं नवाते. अगर उनकी कोई चीज़ गिर जाए, तो बिना किसी का इंतज़ार किए ख़ुद उठा लेते हैं. यहां तक कि अपनी कुर्सी तक ख़ुद उठाकर ले आते हैं. एक आयोजन में एक बुज़ुर्ग अपने जूते का फ़ीता नही बांध पा रहे थे. राहुल गांधी ने बेहिचक बढ़कर बुज़ुर्ग के जूते का फ़ीता बांधा और फिर उन्हें उठने में मदद की.

दुनिया की सबसे महंगी खुदरा हाई स्ट्रीट में शुमार दिल्ली की ख़ान मार्केट में राहुल का भी सबसे प्रिय हैंगआउट है.  उन्हें बरिस्ता में कॉफी पीते हुए या बाज़ार की बाहरी तरफ़ बुक शॊप्स में किताबों के वर्क़ पलटते देखा जा सकता है. वे खाने के बहुत शौक़ीन हैं. पुरानी दिल्ली का खाना भी उन्हें यहां ख़ींच लाता है. अपनी सुरक्षा की परवाह किए बग़ैर वे शाहजहानाबाद पहुंच जाते हैं.

राहुल गांधी को ख़ामोश शामें बहुत पसंद हैं. इसके साथ ही उन्हें दुनिया की चकाचौंध भी ख़ूब लुभाती है. वे रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं. अगर किसी से कोई वादा कर लें, तो उसे पूरा ज़रूर करते हैं.   बिल्कुल ऐसे हैं राहुल गांधी, जिन्हें लोग प्यार से ’आरजी’ भी कहते हैं.

एक आयोजन में एक बुज़ुर्ग अपने जूते का फ़ीता नही बांध पा रहे थे. राहुल गांधी ने बेहिचक बढ़कर बुज़ुर्ग के जूते का फ़ीता बांधा और फिर उन्हें उठने में मदद की. हासिल की. इसके बाद उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से  डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की.

राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक़ रहा है. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. उन्होंने बॊक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया. उनके बहुत से शौक़ उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं. अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी सीखी. उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था. उन्होंने भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीखा. वे अपनी सेहत का भी काफ़ी ख़्याल रखते हैं. कितनी ही मसरूफ़ियत क्यों न हो, वे कसरत के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं. वे रोज़ दस किलोमीटर तक जॉगिंग करते हैं. उन्हें फ़ुटबॊल बहुत पसंद है. लंदन में पढ़ने के दौरान वह फ़ुटबॊल के दीवाने थे.

स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वे लंदन चले गए, जहां उन्होंने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ तीन साल तक काम किया. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफ़ेसर माइकल यूजीन पोर्टर को ब्रैंड स्ट्रैटजी का विद्वान माना जाता है. सुरक्षा कारणों की वजह से राहुल गांधी ने रॉल विंसी के नाम से काम किया. उनके सहयोगी नहीं जानते थे कि वे राजीव गांधी के बेटे और इंदिरा गांधी के पौत्र के साथ काम कर रहे हैं.  राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं."

विदेश में रहते राहुल गांधी को दस साल हो गए थे. वे स्वदेश लौटे और फिर साल 2002 के आख़िर में उन्होंने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फ़र्म, बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड बनाई. रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ में दर्ज आवेदन के मुताबिक़ इस कंपनी का मक़सद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह और सहायता मुहैया करना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना था. साल 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हल्फ़नामे के मुताबिक़ बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड में राहुल गांधी की हिस्सेदारी 83 फ़ीसद थी. उनकी पढ़ाई की तरह उनके कारोबार में भी काफ़ी दिक़्क़तें आईं. सियासत की वजह से वे अपने कारोबार पर ख़ास तवज्जो नहीं दे पाए.

राहुल गांधी की सियासी ज़िन्दगी की शुरुआत भी अचानक ही हुई. वे साल 2003 में कांग्रेस की बैठकों और सार्वजनिक समारोहों में नज़र आए. एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए एक सद्भावना यात्रा पर वह अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पाकिस्तान भी गए. इसके बाद जनवरी 2004 में उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, तो उनके सियासत में आने की चर्चा शुरू हो गई. इस बारे में पूछने पर उन्होंने सिर्फ़ इतना कहकर कोई भी प्रतिक्रिया देने से साफ़ इंकार कर दिया था, "मैं राजनीति के ख़िलाफ़ नहीं हूं. मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूंगा और वास्तव में, करूंगा भी या नहीं."

फिर मार्च 2004 में लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ, तो राहुल गांधी ने सियासत में आने का ऐलान कर दिया. उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा. इससे पहले उनके चाचा संजय गांधी ने भी इसी क्षेत्र का नेतृत्व किया था. उस वक़्त उनकी मां सोनिया गांधी यहां से सांसद थीं. तब मीडिया के साथ अपने पहले साक्षात्कार में राहुल गांधी ने देश को जोड़ने वाले शख़्स के तौर पर ख़ुद को पेश किया. उन्होंने कहा था कि वे जातीय और धार्मिक तनाव को कम करने की कोशिश करेंगे. इलाक़े की अवाम ने राहुल गांधी को भरपूर समर्थन दिया. उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंदी को एक लाख वोटों से हराकर शानदार जीत हासिल की. इस दौरान उन्होंने सरकार या पार्टी में कोई ओहदा नहीं लिया और अपना सारा ध्यान मुख्य निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही केंद्रित किया.

फिर जनवरी 2006 में आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुए कांग्रेस के एक सम्मेलन में पार्टी के हज़ारों सदस्यों ने राहुल गांधी से पार्टी में और महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका निभाने की ग़ुज़ारिश की. इस पर राहुल गांधी ने कहा, "मैं इसकी सराहना करता हूं और मैं आपके जज़्बात और समर्थन के लिए शुक्रगुज़ार हूं. .मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं आपको मायूस नहीं करूंगा, लेकिन अभी धैर्य रखें." यह कहकर उन्होंने नेतृत्व वाली कोई भी बड़ी भूमिका निभाने से मना कर दिया. राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में पार्टी सचिवालय के एक फेरबदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया था. उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई.  साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी को तीन लाख तैंतीस हज़ार से शिकस्त देकर जीत दर्ज की. इस चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 जीतीं. इस तरह राहुल गांधी ने प्रदेश में कांग्रेस को ज़िन्दा करने का काम किया और उन्हें इसका श्रेय दिया गया. उन्होंने डेढ़ महीने में देश भर में 125 रैलियों को संबोधित किया.
राहुल गांधी को 19  जनवरी 2013 में कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया. क़ाबिले-ग़ौर है कि इससे पहले कांग्रेस में उपाध्यक्ष का पद नहीं होता था. लेकिन पार्टी में उनका महत्व बढ़ाने और उन्हें सोनिया गांधी का सबसे ख़ास सहयोगी बनाने के लिए पार्टी ने उपाध्यक्ष के पद का सृजन किया.

राहुल गांधी अपनी जनसभाओं में जिस तरह सांप्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी व अन्य सियासी दलों को निशाना बनाते हैं, उससे सभी दलों के होश उड़ जाते हैं. वे उन पर सधे राजनीतिक अंदाज़ में हमले करते हैं. एक संजीदा वक्ता की तरह तार्किक ढंग से वे सियासी दलों को चुन-चुन कर व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब देते हैं. उनके इसी अंदाज़ से दलों में बौखलाहट पैदा हो जाती है. वे समझ नहीं पाते कि राहुल के ‘आम आदमी’ का कौन सा तोड़ निकालें.

राहुल गांधी भाजपा के झूठे वादों और लोकपाल पर उसके चरित्र की जमकर बखिया उधेड़ते हैं. वे भाजपा द्वारा भ्रष्टाचारी नेताओं से हाथ मिलाने पर लोगों से सवाल करते हैं, तो उन्हें भीड़ से खुलकर जवाब भी मिलते हैं. उन्हीं जवाबों को आगे बढ़ाते हुए मंच से राहुल गांधी लोगों को बताते हैं कि ग़रीबों का मसीहा बनने वाले नेता कहते हैं कि राहुल गांधी पागल हो गया है, और इसके बाद वह आक्रामक हो जाते हैं. अपनी आस्तीनें चढ़ाकर हमलावर अंदाज़ में कहते हैं- ‘‘हां, मैं ग़रीबों का दुख-दर्द देखकर, प्रदेश की दुर्दशा देखकर पागल हो गया हूं. कोई कहता है कि राहुल गांधी अभी बच्चा है, वह क्या जाने राजनीति क्या होती है. तो मेरा कहना है कि हां, मुझे उनकी तरह राजनीति करनी नहीं आती. मैं सच्चाई और साफ़ नीयत वाली राजनीति करना चाहता हूं. मुझे उनकी राजनीति सीखने का शौक़ भी नहीं है. मायावती कहती हैं राहुल नौटंकीबाज़ है. तो मेरा कहना है कि अगर ग़रीबों का हाल जानना, उनके दुख-दर्द को समझना, नाटक है तो राहुल गांधी यह नाटक ताउम्र करता रहेगा."

राहुल गांधी प्रदेश को बदहाली से निकालने के लिए युवाओं से साथ के लिए हाथ बढ़ाते हैं. इस दौरान राहुल गांधी यह बताना नहीं भूलते कि वे यहां चुनाव जीतने नहीं, प्रदेश को बदलने आए हैं. यह उनकी इस साफ़गोई का सियासी दलों के पास कोई जवाब नहीं होता. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राहुल गांधी की बातों में दम है.
यह हक़ीक़त है कि वे हवाई नेताओं की तरह आसमान में नहीं उड़ते और न ही किसी पंचतारा सेलिब्रिटी की तरह रथ पर चढ़कर ज़िलों का दौरा करते हैं. उन्होंने खाटी देसी अंदाज़ में गांवों में रात रात बिताई. पगडंडियों पर कीचड़ की परवाह किए बिना चले और आम आदमी से बेलाग संवाद स्थापित करने की कोशिश की. आम आदमी को नज़दीक से जानने-समझने और अपना हाथ उसके हाथ में देने की पहल की.

राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे की दहाई में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता में अपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

कुल मिलाकर राहुल गांधी ऐसे क़द्दावर नेताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं, जिनके तूफ़ान से सियासी दलों के  हौसले  पस्त हो जाते हैं. हालत यह हो गई है कि कोई सियासी दल दाग़ी को लेता है, तो कोई दग़ाबाज़ी को सहारा बना लेता है. जब कोई चारा नहीं दिखता, तो कुछ सियासी दल राहुल पर व्यक्तिगत प्रहार करने में जुट जाते हैं.  मगर इससे राहुल गांधी को कोई नुक़सान नहीं होता, क्योंकि राजनीति की विरासत को संभालने वाला यह युवा नेता अब युवाओं, और अन्य वर्गों के साथ-साथ बुजुर्गों का भी चहेता बन चुका है. राहुल गांधी की जनसभाओं में दूर-दूर से आए बुज़ुर्ग यही कहते हैं कि लड़का ठीक ही तो कह रहा है, यही कुछ करेगा. महिलाओं में तो राहुल गांधी को लेकर काफ़ी क्रेज है. यह बात तो विरोधी दलों के नेता भी बेहिचक क़ुबूल  करते हैं. वे तो मज़ाक़ के लहजे में यहां तक कहते हैं कि अगर महिलाओं को किसी एक नेता को वोट देने को कहा जाए, तो सभी राहुल गांधी को ही देकर आएंगी. राहुल युवाओं ही नहीं, बल्कि बच्चों से भी घुलमिल जाते हैं. कभी किसी मदरसे में जाकर बच्चों से बात करते हैं, तो कभी किसी मैदान में खेल रहे बच्चों के साथ बातचीत शुरू कर देते हैं. यहां तक कि गांव-देहात में मिट्टी में खेल रहे बच्चों तक को गोद में उठाकर उसके साथ बच्चे बन जाते हैं. बच्चे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं. उन्हें अपनी भांजी मिराया और भांजे रेहान के साथ वक़्त बिताना भी बहुत अच्छा लगता है. उनके अच्छे बर्ताव की वजह से ही बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  सच है कि संस्कार विरासत में मिलते हैं, संस्कार घर से मिला करते हैं. अपने से बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है, तो बच्चों के लिए प्यार-दुलार है.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा था, ऐसे वक़्त में राहुल गांधी गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे थे. वे लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. वे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोयडा के नज़दीकी गांव भट्टा-पारसौल गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी वे सुबह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए थे. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया था. इसके बाद भी वे गांव लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया. और चौकस प्रशासन को भनक तक नहीं लगी. ऐसे हैं राहुल गांधी.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वे एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वे रोड शो कर चुके थे और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वे किसी दलित के घर भोजन करते हैं, तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल गांधी के आम लोगों से मिलने-जुलने के इस जज़्बे ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. हालत यह है कि लोगों से मिलने के लिए वह अपना सुरक्षा घेरा तक तोड़ देते हैं.

राहुल गांधी समझ चुके हैं कि जब तक वे आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वे सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख़्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वे भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल गांधी का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की थी, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है.

संसद में भी राहुल गांधी बेहद आक्रामक अंदाज़ में नज़र आते हैं. कालेधन पर तंज़ कसते हुए राहुल गांधी ने कहा था,  "काला धन सफ़ेद कर रहे हैं वित्तमंत्री. पहले कालाधन वापस लाने का वादा किया, अब उसे ही सफ़ेद करने का, यह उनकी फ़ेयर एंड लवली स्कीम है, काले पैसे को आप गोरा कर सकते हो. फ़ेयर एंड लवली योजना के तहत किसी को जेल नहीं होगी, जेटली जी के पास जाइये, आपका पैसा सफ़ेद हो जाएगा."  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा, "महात्मा गांधी हमारे हैं, सावरकर आपके हैं. आपने सावरकर को उठाकर फेंक दिया क्या? फेंक दिया, तो बहुत अच्छा किया." राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह रोज़गार सृजन के लिए काले रंग का एक बड़ा सा बब्बर शेर लिए घूम रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद युवाओं को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा, "आपने बब्बर शेर दिया तो दिया, लेकिन रोज़गार कितने दिए, यह किसी को मालूम नहीं. किसी के पास कोई आंकड़ा नहीं है." संसद में जब राहुल बोल रहे थे, तो भाजपा सांसद हंगामा करने लगे. इस पर राहुल गांधी ने कहा, मैं आरएसएस का नहीं हूं. मैं ग़लतियां करता हूं. मैं सब कुछ नहीं जानता, सब कुछ नहीं समझता. मैं जनता से बातचीत करके उनसे उनकी बात सुनकर और समझकर अपनी बात रखता हूं. हम में और आप में फ़र्क़ यही है कि आप सब जानते हैं और ग़लती नहीं करते, जबकि हम ग़लती करते हैं और उससे सीखते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "
वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.

प्रभावशाली घराने से होने के बावजूद राहुल गांधी में सादगी है. खाने के वक़्त मेज़ पर वे साथियों को प्लेटें दे देते हैं, अपनी प्लेटें ख़ुद किचन में रख आते हैं. किसी बुज़ुर्ग के पानी मांगने पर सेवकों से कहने की बजाय ख़ुद किचन से पानी लाकर दे देते हैं. सार्वजनिक मंचों पर उन्हें अकसर डॊ. मनमोहन सिंह व अन्य लोगों को पानी देते हुए देखा गया है. वे बनावटीपन से कोसों दूर हैं. वे संसद की सीढ़ियों पर सर नहीं नवाते. अगर उनकी कोई चीज़ गिर जाए, तो बिना किसी का इंतज़ार किए ख़ुद उठा लेते हैं. यहां तक कि अपनी कुर्सी तक ख़ुद उठाकर ले आते हैं. एक आयोजन में एक बुज़ुर्ग अपने जूते का फ़ीता नही बांध पा रहे थे. राहुल गांधी ने बेहिचक बढ़कर बुज़ुर्ग के जूते का फ़ीता बांधा और फिर उन्हें उठने में मदद की.

दुनिया की सबसे महंगी खुदरा हाई स्ट्रीट में शुमार दिल्ली की ख़ान मार्केट में राहुल का भी सबसे प्रिय हैंगआउट है.  उन्हें बरिस्ता में कॉफी पीते हुए या बाज़ार की बाहरी तरफ़ बुक शॊप्स में किताबों के वर्क़ पलटते देखा जा सकता है. वे खाने के बहुत शौक़ीन हैं. पुरानी दिल्ली का खाना भी उन्हें यहां ख़ींच लाता है. अपनी सुरक्षा की परवाह किए बग़ैर वे शाहजहानाबाद पहुंच जाते हैं.

राहुल गांधी को ख़ामोश शामें बहुत पसंद हैं. इसके साथ ही उन्हें दुनिया की चकाचौंध भी ख़ूब लुभाती है. वे रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं. अगर किसी से कोई वादा कर लें, तो उसे पूरा ज़रूर करते हैं.   बिल्कुल ऐसे हैं राहुल गांधी, जिन्हें लोग प्यार से ’आरजी’ भी कहते हैं.

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