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किताबों से रिश्ता...


किताबों से हमारा रिश्ता बहुत पुराना है या यूं कहें कि बचपन से ही किताबों से हमारी दोस्ती रही है... हमने अब तक कितनी किताबें पढ़ी हैं, यह ठीक से याद नहीं... लेकिन इतना ज़रूर याद है कि हमने अपनी ज़िन्दगी का बहुत ख़ूबसूरत वक़्त किताबों के बीच ही गुज़ारा है... और अब भी गुज़ार रहे हैं... आज हम अपनी पढ़ी किताबों की पहली फ़ेहरिस्त लिख रहे हैं...
Romeo Juliet : William Shakespeare
Hamlet : William Shakespeare
Julius Caesar : William Shakespeare
Doctor Faustus : Christopher Marlowe
Adam Bede : George Eliot
Far From the Madding Crowd : Thomas Hardy
Saint Joan : George Bernard Shaw
Mother : Maxim Gorky
Joseph Andrews : Henry Fielding
The Best Short Stories of O. Henry

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किताबें...


फ़िरदौस ख़ान
बचपन से ही हमें किताबें पढ़ने का शौक़ रहा है. घर में अम्मी को किताबें पढ़ते हुए देखते थे. उनकी देखादेखी हमें भी किताबें पढ़ने का शौक़ हो गया. पहले कॊमिक्स और कहानियों की किताबें पढ़ा करते थे. लोककथाएं हमें बहुत पसंद थीं, आज भी हैं. किताबों से हमें बहुत मुहब्बत है. अपने दोस्तों को भी उनकी सालगिरह पर किताबें ही देते हैं, लेकिन जिनका किताबों से कोई सरोकार नहीं यानी उन्हें किताबें पसंद नहीं, तो उनके लिए कोई दूसरा तोहफ़ा ख़रीदने में हमें काफ़ी सोचना पड़ता है... ख़ैर पसंद अपनी-अपनी.

दूरदर्शन में हमारे साथ एक बंगाली प्रोड्यूसर भी थे. उनसे बंगाली तहज़ीब को क़रीब से जानने का मौक़ा मिला. वैसे भी हम बांग्ला साहित्य पढ़ते रहे हैं. वहां के लोगों की एक बात हमें बेहद पसंद है और उनके इस जज़्बे की हम दिल से क़द्र करते हैं. बंगाल में लोग शादी-ब्याह में भी तोहफ़े के तौर पर किताबें भी देते हैं.

जब भी प्रगति मैदान में लगे मेले में जाने का मौक़ा मिलता है, तो हम उर्दू, अरबी, पंजाबी और हिन्दी की बहुत-सी किताबें ख़रीदते हैं. यह देखकर अच्छा लगता है कि किताबों के क़द्रदानों की आज भी कोई कमी नहीं है. जब भी घर जाना होता है, तो हमारी यही कोशिश रहती है कि अम्मी और बहन-भाइयों के लिए उनकी पसंद की कोई न कोई किताब लेकर जाएं. अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वानी की. हमारे घर पर एक अच्छी-ख़ासी लाइब्रेरी है. यहां भी हमारे पास किताबों का एक ज़ख़ीरा है.

किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ से दस किताबें पढ़ लेते थे. लाइब्रेरी में उर्दू और पंजाबी की किताबें पढ़ने वाले हम अकेले थे. उर्दू या पंजाबी का कोई बुज़ुर्ग पाठक कभी साल-दो-साल में ही वहां आता था. कई बार लाइब्रेरी के लोग किताबों को तरतीब से लगाने के लिए हमारी मदद लेते थे, तो कभी फटी-पुरानी या कभी-कभी नई किताबों के नाम, लेखक और प्रकाशक के नाम हिन्दी में लिखने में. हमें यह सब काम करना बहुत अच्छा लगता था.

किताबों से मुताल्लिक़ एक ख़ास बात. कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वो अच्छी किताब देखते ही आपसे मांग लेंगे. आपने एक बार किताब दे दी तो फिर मजाल है कि वो आपको वापस मिल जाए. किताबों के पन्ने मोड़ने, पैन से लाइनें खींचकर किताबों की अच्छी सूरत को बिगाड़ने में भी लोगों को बहुत मज़ा आता है. हमारे पास नामी कहानीकारों की कहानियों का एक संग्रह था. एक रोज़ हम उसे अपने साथ दफ़्तर ले गए. एक लड़की ने हमसे मांग लिया. कई महीने गुज़र गए, लेकिन उसने वापस नहीं किया. हमने पूछा तो कहने लगी-वक़्त ही नहीं मिला. ख़ैर क़रीब दो साल बाद हमारा उसके घर जाना हुआ, तो उसने उसे लौटा दिया. लेकिन उसे वापस पाकर हमें बेहद दुख हुआ. तक़रीबन हर सफ़े पर पैन से लाइनें खींची हुईं थीं. कवर पेज भी बेहद अजनबी लगा. जब भी उस किताब को देखते, तो बुरा लगता. छोटे भाई ने हमारी सालगिरह पर नई किताब लाकर दी और उस किताब को अलमारी से हटा दिया. ऐसे कितने ही क़िस्से हैं अपनी प्यारी किताबों से जुदा होने के...

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की जद्दोजहद में लोग किताबें पढ़ने के शौक़ को क़ायम नहीं रख पाते. जो लोग किताबें पढ़ने के शौक़ीन हैं, उनसे यही गुज़ारिश है कि वो इसे पूरा ज़रूर करें. ख़ैर, हमारा काम तो किताबों से ही जुड़ा है. किताबों की समीक्षा लिखते हैं, इस वजह से भी आए दिन कोई न कोई किताब मिलती ही रहती है और वक़्त निकालकर उसे पढ़ना भी होता है...

अलबत्ता, जांनिसार अख़्तर साहब का एक शेअर याद आता है-
ये इल्म का सौदा, ये रिसालें, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं...
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मीरांबाई की संघर्ष-यात्रा को बयां करता है ‘रंग राची’


फ़िरदौस ख़ान
सबसे पहले ‘रंग राची’ के लेखक सुधाकर अदीब साहब को बहुत-बहुत मुबारकबाद... उनकी हर किताब की तरह यह किताब भी लोकप्रिय हो, यही दुआ है...

जाने माने लेखक सुधाकर अदीब के नए उपन्यास ‘रंग राची’ का लोकार्पण आज नई दिल्ली में मंडी हाउस स्थित साहित्य अकादमी सभागार में किया गया. मीरांबाई की संघर्ष-यात्रा को केन्द्र में रखकर लिखे गए इस उपन्यास को लोकभारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

मीरा के जीवन संघर्ष पर रौशनी डालते हुए ‘रंग राची’ के लेखक सुधाकर अदीब कहते हैं कि मीरा ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धांत निर्मित किए, उन पर सबसे पहले वे ही चलीं. कृष्ण नाम संकीर्तन के सहारे मीरा ने भारत के दीन-दुखियारे समाज को उसी तरह एक सूत्र में पिरोने का काम किया जैसा कि उस भक्ति आंदोलन के युग में दूसरे संत करते आए थे. जो कार्य दक्षिण भारत में रामानुज कर चुके थे और जो कार्य रामानन्द ने उत्तर भारत में किया. जो कार्य कबीर, रैदास, चैतन्य और नरसिंह मेहता सरीखे अनेक संत एवं कविगण अपने-अपने तरीक़ों से करते आए थे, वही कार्य संत मीरा ने अपने तरीक़े से किया. दूसरे भक्त-संत जनसमर्थक थे और जनसाधारण में से ही आए थे. अतः सामन्ती व्यवस्था के वैभव और विभेद के प्रति उनके मन अरुचि होना नितांत स्वाभाविक बात थी. जबकि मीरा तो स्वयं ही सामन्ती व्यवस्था का अंग थीं. यदि चाहतीं तो वह भोग-विलासमय जीवन अपना सकती थीं, पर नहीं. वह बालपन से कृष्णार्पिता थीं. अतः उन्होंने वैभव पथ को त्यागकर साधना पथ को अपनाया. पुरुषप्रधान समाज में एक तथाकथित अबला स्त्री होकर भी उन्होंने उस निर्मम व्यवस्था का सात्विक विरोध किया, जो कृष्ण के वास्तविक गोप-समुदाय से उनके मिलन में बाधक थी. दरअसल मीरा का चरित्र स्त्री स्वतंत्रता और मुक्ति का सजीव उदाहरण है. उन्होंने जीवनपर्यंत तात्कालीन सामन्ती प्रथा को खुली चुनौती दी. वह अपने अपूर्व धैर्य के साथ उन तमाम कुप्रथाओं का सामना करती रहीं, जो स्त्रियों को लौह कपाटों के पीछे ढकेलने और उसे पत्थर की दीवारों की बन्दिनी बनाकर रखने, पति के अवसान के बाद जीते जी जलाकर सती कर देने, न मानने पर स्त्री का मानसिक और दैहिक शोषण करने की पाशविक प्रवृत्तियों थीं. मीरा का सत्याग्रह अपने युग का अनूठा एकाकी आंदोलन था, जिसकी वही अवधारक थीं, वही जनक थीं और वहीं संचालक. मीरा ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धांत निर्मित किए, उन पर सबसे पहले वे ही चलीं.

लोकार्पण समारोह में अपने अध्यक्षीय आशीर्वचन में वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि हिन्दी में बहुत कवयित्रियां हुई हैं, लेकिन जो स्थान मीरा ने बनाया वह सबके लिए आदर्श है. मीरा को करुणा, दया के पात्र के रूप में देखने की ज़रूरत नहीं है, मीरा स्त्रियों के स्वाभिमान की प्रतीक हैं. इस बेहतरीन उपन्यास के लिए मैं राजकमल प्रकाशन समूह व लेखक सुधाकर अदीब को शुभकामनाएं देता हूं.
समारोह में मुख्य अतिथि विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस उपन्यास की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह बहुत ही पठनीय उपन्यास है. इस उपन्यास की ख़ास बात यह है कि इसमें एक साथ पाठकों को शोध, निबंध, विचार सबका अनुभव होगा. मीरा की कविता की गहराई को सुधाकर जी ने बहुत ही गहराई से समझा है. इनका उपन्यास घी का लड्डू है और यही इसकी सार्थकता भी है.
मीरायन पत्रिका के संपादक सत्य नारायण समदानी ने मीरा के जीवन के ऐतिहासिक पक्ष को रेखांकित करते हुए मीरा से जुड़ी हुई कई भ्रांतियों को दूर किया. इस उपन्यास को मीरा के जीवन चरित का प्रमाणिक पुस्तक बताते हुए समदानी जी ने कहा कि मीरा मूलतः एक भक्त थीं. सुधारकर अदीब ने इस उपन्यास को लिखते समय इतिहास के साथ के न्याय किया है.
कवयित्री अनामिका ने उपन्यास के पात्रों के बीच के संबंधों के प्रस्तुतिकरण की ओर श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि एक रूपवति, गुणवति व विलक्षण स्त्री का अपने ससुर, पति, देवर सहित तमाम संबंधों में जीवंतता प्रदान करना मुश्किल काम है. सुधाकर जी ने अपने इस उपन्यास में इस युग के नज़रिये से उस युग की बात की है. राष्ट्र निर्माण की भूमिका में स्त्रियों के योगदान को इस उपन्यास में सही तरीक़े से प्रस्तुत किया गया है. तथ्यों का संयोजन बेहतरीन है.
प्रसिद्ध कथाकार चन्द्रकांता ने इस उपन्यास पर अपनी बात रखते हुए कहा कि रंग राची मीराबाई के जीवन का बहुआयामी दस्तावेज़ है. यह नियति से निर्वाण की कथा है. यहां मीरा की जन्मभूमि राजस्थान के रजवाड़ों की शौर्य गाथाएं भी हैं और सत्ता के लिए रचे गए षड्यंत्र भी. सोलहवीं शती के मेवाड़ के जीवन्त इतिहास के केन्द्र में है कृष्ण प्रेम की दीवानी स्वतंत्र चेता, स्वाभिमानी रूढ़ि भंजक अन्याय का प्रतिरोध करती, सर्वहित कामी स्त्री, जो पारिवारिक-सामाजिक प्रताड़ना सहती भी अपने कर्म-पथ से विचलित नहीं हुई. लेखक, मीरा की आन्तरिकता की हलचलों और द्वंद्वों को संवेदी स्वर दे कर पाठक के मन में संवेदना का उत्खनन करने में सफ़ल हुआ है. वास्तविक चरित्रों, घटनाओं, उपकथाओं में सोलहवीं सदी का मेवाड़ जीवित हो उठा है और शोषक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करती मीराबांई आज की संघर्षचेता स्त्री के साथ खड़ी नज़र आती हैं.
कार्यक्रम का संचालन अनुज ने किया और धन्यवाद ज्ञापन राजकमल समूह के निदेशक अशोक महेश्वरी ने किया. इस मौक़े पर साहित्य जगत के अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे.

लेखक : सुधाकर अदीब
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन
पहली मंज़िल, दरबारी बिल्डिंग
महात्मा गाँधी मार्ग, इलाहाबाद-211001
ईमेल : info@lokbhartiprakashan.com
दूरभाष : 0532-2427274
चलभाष : 09838514764
पृष्ठ : 448
मूल्य : 600 रुपये (हार्डबाऊंड)
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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पवित्र बाइबल...


गुज़श्ता दिनों हमने अपनी पढ़ी हुई अंग्रेज़ी की दस किताबों की पहली फ़ेहरिस्त लिखी थी... आज दूसरी फ़ेहरिस्त की बारी है... आज हम सिर्फ़ एक ही किताब का ज़िक्र करेंगे... वह किताब हमारे दिल के बेहद क़रीब है... और उस पाक किताब का नाम है The Bible यानी पवित्र बाइबल... यह ऐसी किताब है, जो सीधा दिल पर असर करती है... इसके लफ़्ज़ रूह की गहराई में उतर जाते हैं...
बाइबल हमें बताती है-
जब हम परमेश्वर के प्रेम को दूसरों के साथ बांटते हैं, तब हम उसके प्रति अपना प्रेम दिखाते हैं...

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