फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते

  


डॉ फ़िरदौस ख़ान
इंसान की ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा बचपन ही होता है, क्योंकि बचपन हर फ़िक्र से आज़ाद और बेगाना होता है। बचपन की यादें हमारे दिलो-दिमाग़ पर ऐसे नक़्श हो जाती हैं कि उन्हें वक़्त की धूल भी मिटा नहीं पाती।
 
और जब बात गर्मियों की छुट्टियों की हो, तो फिर कहना ही क्या। दूसरे बच्चों की तरह हमें भी सालभर गर्मियों की छुट्टी का इंतज़ार रहता था, क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों में हमें अपनी नानी जान के घर जाने का मौक़ा मिलता था। हम नानी जान के घर जाते थे। इससे पहले बहुत-सी तैयारियां की जाती थीं। उस वक़्त बैग्स का चलन ज़्यादा नहीं था। इसलिए सन्दूक़ में कपड़े रखे जाते थे। प्लास्टिक की टोकरी में खाने-पीने का सामान होता था यानी रास्ते के लिए पूड़ी-सब्ज़ी और पानी की बोतलें होती थीं। सामान क़ुली उठाता था। उस वक़्त रेलगाड़ियों में आज जैसी भीड़-भाड़ नहीं होती थी। रेल में हमें बहुत अच्छा लगता था। खिड़की की सीट हमें ही मिलती थी। खिड़की से भागते हुए दरख़्तों को देखना कितना भला लगता था। ख़ैर, आज भी उतना ही भला लगता है। रस्ते में गंगा आती, तो हम उसमें सिक्के डालते थे। हापुड़ के पापड़ और गजरौले के पेड़े खाते। सफ़र में खाने का भी अपना ही लुत्फ़ है।         
  
हमारे नाना के बाग़ थे, जिनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और शरीफ़े के अलावा और भी बहुत से फलों के दरख़्त थे। हम अपने भाइयों और मामाज़ाद बहनों के साथ दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़ते और खाते थे। दरख़्तों पर चढ़कर फल तोड़कर खाने के लुत्फ़ को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी फलों के दरख़्तों को देखकर बचपन में उन पर चढ़ना याद आता है।  

बाग़ के पास एक बड़ा तालाब भी था। एक बार वहां खेलते हुए तालाब में गिर भी गए थे। अल्लाह का शुक्र है कि हमें पानी में से निकाल लिया गया। वहां का लज़ीज़ खाना, रबड़ी, छोले-समौसे, नारियल के बुरादे की कुल्फ़ी और बरगद के पत्तों पर रखी मलाई बर्फ़ बहुत याद आती है।      

जिस साल नानी के घर नहीं जाते, उस साल अपने ही घर में ख़ूब मज़े करते। हमारा घर बहुत बड़ा था। उसका आंगन भी बहुत बड़ा था। घर में बग़ीचा था। बग़ीचे में फलों के बहुत से दरख़्त थे। इनमें आम, अमरूद, जामुन, शहतूत और गूलर के कई दरख़्त थे। गर्मियों की छुट्टियों में हम ख़ूब मस्ती करते, शरारतें करते, धमा चौकड़ी करते। दरख़्तों पर चढ़ते और फल तोड़ते। दादी जान कहती थीं कि जामुन और गूलर के दरख़्त पर नहीं चढ़ना चाहिए, क्योंकि इसकी लकड़ी कमज़ोर होती है। हमारे घर के पास एक बड़ा मैदान था। उस मैदान में बहुत से दरख़्त थे। वहां पीपल, बरगद, नीम, शीशम, करंद और खजूर आदि के भी बहुत से दरख़्त थे। शीशम की डालों पर झूला डालकर भी खूब झूलते थे।
  
हमारे घर में माशा अल्लाह फुलवारी भी बहुत थी। इनमें बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, मोगरा जैसे बहुत से फूलों के पौधे व बेलें थीं। हमारा घर ही नहीं, बल्कि आसपास का इलाक़ा भी इन फूलों की ख़ुशबू से महकता रहता था। अम्मी को मोगरा के फूल पहनने का बहुत शौक़ था। वे चाँदी के तार की बालियों में बेला के फूलों को पिरोकर कानों में पहना करती थीं और बालों में बेला के गजरे भी लगाती थीं। हमारी दादी जान भी कानों में फूल पहना करती थीं। वे मेज़ पर रखे पंखों पर फूलों के गजरे डाल देतीं, जिससे सारा घर-आँगन महक उठता था। हमारे घर से बहुत से लोग फूल ले जाते थे और फिर उनके गजरे व हार बनाते थे। घर के पास एक मन्दिर था। बहुत से लोग मन्दिर में देवी-देवताओं को चढ़ाने के लिए फूल लेकर जाते थे।   
  
हमें लू की वजह से गर्मियों की भरी दोपहरी में बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। इसलिए हम घर के भीतर ही रहते और दोपहर ढलने का इंतज़ार करते थे। कई बार हम घरवालों की नज़र से बचकर बाहर खेलने चले जाते थे। आँगन में तख़्त बिछे होते थे। उन पर सफ़ेद चादरें बिछी होतीं और गाव तकिये क़रीने से लगे हुए होते थे। शाम को घर के सब लोग इन्हीं पर बैठते थे। शाम को दादी तरह-तरह के पकौड़े बनाती थीं। रूह अफ़ज़ा शर्बत भी बनता था। उसमें बहुत-सी बर्फ़ डाली जाती थी।    

गर्मियों में हम छत पर सोया करते थे। शाम को छत की साफ़-सफ़ाई की जाती। फिर पानी छिड़का जाता, ताकि छत ठंडी हो जाए। छत पर चटाइयां बिछाई जातीं। फिर उन पर दरियां बिछाई जातीं। दरियों पर रंग-बिरंगी कढ़ाई वाली चादरें बिछाई जातीं और तकिये रखे जाते। क़रीब में ही पानी से भरी मिट्टी की सुराहियां रखी जातीं, गिलास रखे जाते। हम बच्चे अपनी-अपनी छोटी सुराहियां अपने सिरहाने रख लिया करते थे, ताकि रात में प्यास लगे तो अपनी ही सुराही से पानी पी लें। हमें दादी-नानी ने ही नहीं, बल्कि पापा ने भी बचपन में कहानियां सुनाई हैं।   

हमारे घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। ननिहाल और ददिहाल में सब लोग पढ़े-लिखे थे। नाना जान और दादा जान दोनों ही दानिशमंद थे। हमारी अम्मी को भी लिखने और पढ़ने का बहुत शौक़ था। वे शायरा थीं और बहुत शानदार लिखती थीं।

हमारे घर किताबों की एक अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी थी। उनमें अरबी, उर्दू, इंग्लिश और हिन्दी की किताबों की भरमार थी। आज भी यही हाल है। बरसों पहले इनमें पंजाबी की किताबें भी शामिल हो गईं। अम्मी की देखा-देखी हमें भी किताबों से मुहब्बत हो गई। बचपन में ही हमने लिखना शुरू कर दिया था। हमें डायरी लिखने का भी शौक़ था, जो आज भी है। डायरी में हम अपनी बातों के अलावा अपने पसंदीदा शायरों की ग़ज़लें, गीत और नज़्में लिखा करते थे। आज भी लिखते हैं। हमारी डायरी में शायरा इशरत आफ़रीन की एक ग़ज़ल दर्ज है- 
यूं ही किसी के ध्यान में अपने आप में गाती दोपहरें
नर्म गुलाबी जाड़ों वाली बाल सुखाती दोपहरें

सारे घर में शाम ढले तक खेल वो धूप और छाँव का
लिपे पुते कच्चे आंगन में लोट लगाती दोपहरें
जीवन-डोर के पीछे हैरां भागती टोली बच्चों की
गलियों-गलियों नंगे पाँव धूल उड़ाती दोपहरें

सरगोशी करते पर्दे कुंडी खटकाता नटखट दिन
दबे-दबे क़दमों से तपती छत पर जाती दोपहरें

कमरे में हैरान खड़े आईना जैसे हंसते दिन
ख़ुद से लड़कर गौरैया-सी शोर मचाती दोपहरें

वही मुज़ाफ़ातों के भेद भरे सन्नाटों वाले घर
गुड़ियों के लब सी कर उनका ब्याह रचाती दोपहरें

खिड़की के टूटे शीशों पर एक कहानी लिखती हैं
मंढे हुए पीले काग़ज़ से छनकर आती दोपहरें

नीम तले वो कच्चे धागे रंगती हुई पुरानी याद
घेरा डाले छोटी-छोटी हाथ बटाती दोपहरें

फटी-पुरानी कथरी ओढ़े धूप सेंकते बूढ़े दिन
पेशानी तक पल्लू खींचे चिलम बनाती दोपहरें

पानी की तक़सीम के पीछे जलते खेत सुलगते घर
और खेतों की ज़र्द मुंडेरों पर कुम्हलाती दोपहरें

पुरवाई से लड़ते कितने वर्क़ पुरानी यादों के
सौग़ातों के संदूक़ों को धूप दिखाती दोपहरें

दुखती आंखें ज़ख़्मी पोरें उलझे धागों जैसे दिन
बादल जैसी ओढ़नियों पर फूल खिलाती दोपहरें

ओढ़नियों के उड़ते बादल रंगों के बाज़ारों में
चूड़ी की दुकानों से वो हमें बुलाती दोपहरें

सुनते हैं अब उन गलियों में फूल शरारे खिलते हैं
ख़ून की होली खेल रही हैं रंग नहाती दोपहरें

ये तो मेरे ख़्वाब नहीं हैं ये तो मेरा शहर नहीं
किस जानिब से आ निकली हैं ये गहनाती दोपहरें          

वाक़ई, बचपन से वाबस्ता यादें बहुत दिलकश होती हैं। बशीर बद्र साहब ने क्या ख़ूब कहा है- 
उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख़ हवा में 
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते...  

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अम्मी से हालात का मुक़ाबला करना सीखा


अम्मी जान कहा करती हैं कि इंसान को कभी बुज़दिल नहीं होना चाहिए. बचपन में बिजली चली जाती और अंधेरे में हमें दूसरे कमरे में जाने में ख़ौफ़ आता, तो अम्मी कहतीं कि अंधेरे में भी तो वही कमरा है, जो रौशनी में है. फिर ये ख़ौफ़ क्यों? एक बार अम्मी ने दुकान से कोई चीज़ लाने को कहा. हमने कहा कि भाई को साथ भेज दो. अम्मी ने कहा कि ख़ुद लाओ, सहारे मत तलाशो. कल अगर पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना हुआ, तो क्या तब भी भाई को साथ लेकर जाओगी. अम्मी ने हमेशा हमें आत्मनिर्भर बनने का सबक़ पढ़ाया. आज हम जिस क़ाबिल हैं, अपनी अम्मी और अब्बू की वजह से ही हैं. (अब्बू के बारे में अगली पोस्ट में लिखेंगे)

हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, हमने हमेशा उनका मुक़ाबला किया है. एक छोटा सा वाकि़या याद आ रहा है. बहुत पुरानी बात है. तारीख़ भी याद है 25 सितम्बर 1999. उस वक़्त हम अमर उजाला में Correspondent थे. फ़ील्ड में गए हुए थे. वापस लौटते वक़्त एक्सीडेंट हो गया. बहुत चोट आई. हम ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे. बहुत ख़ून बह रहा है. हम दफ़्तर से तक़रीबन तीन सौ क़दम की दूरी पर थे. कुछ लोग मदद के लिए आगे आए. हमने कहा कि हम ठीक हैं. हम जैसे-तैसे दफ़्तर पहुंचे. दफ़्तर में उस वक़्त दो लोग मौजूद थे, कंप्यूटर ऑपरेटर संजय और दूसरा ऒफ़िस बॊय. दोनों हमें देखकर घबरा गए. बोले मैम क्या हुआ? हमने कहा कि बस मामूली सा एक्सीडेंट हुआ है. वे बोले- आपको अस्पताल ले चलते हैं. हमने संजय से कहा कि हम बोलते हैं, जल्दी से स्टोरी टाइप करो. हमने दुपट्टे को ज़ख़्म पर लपेटा और स्टोरी लिखवाने लगे. दर्द की वजह से बुरा हाल था, लेकिन उस वक़्त हमें अपनी तकलीफ़ से ज़्यादा इस बात की फ़िक्र थी कि स्टोरी जल्द से जल्द अख़बार के लिए भेज दी जाए, ताकि वह बाक़ी संस्करणों में भी छप सके. बहुत अहम ख़बर थी.
हम बोल रहे थे और संजय टाइप कर रहा था. उसने हमें स्टोरी पढ़वाई और फिर भेज दी.
इसके बाद वे दोनों हमें अस्पताल लेकर गए.
हमारे ब्यूरो चीफ़ अशोक वर्मा सर और बाक़ी पत्रकार साथी भी हमें देखने आए. ब्यूरो चीफ़ ने हमें शाबाशी दी और कहा कि अपनी ज़िम्मेदारी और काम के प्रति यही जज़्बा होना चाहिए.

करियर के दौरान ऐसा बहुत बार हुआ है कि तेज़ बुख़ार में भी हमने बीस-बीस घंटे काम किया है. अख़बार हो, रेडियो हो या फिर दूरदर्शन, ऐसा अकसर होता था कि तबीयत ख़राब होने के बावजूद हम काम करते. देश का एक मशहूर साप्ताहिक है, अकसर उस अख़बार के लेख ख़ुद अख़बारों की सुर्ख़ियां बनते हैं. उसके सम्पादक कहते थे कि हम अख़बार के लिए आख़िरी वक़्त तक जगह ख़ाली रखते हैं, क्योंकि हमें मालूम है कि तुम वक़्त पर लेख भेज दोगी.
वह इंसान ही क्या, जिसे अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं...

(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

सर !
क्या आपको याद है?

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हमें आंधियों से निस्बत है...


-डॉ. फिरदौस ख़ान  
आंधियों का मौसम शुरू हो चुका है. हमें आंधियां बहुत पसंद हैं. हमें आंधियों से निस्बत है. ये इस बात की अलामत हैं कि हमारा पसंदीदा माह यानी माहे-जून आने वाला है. माहे-जून में गर्मी अपने शबाब पर हुआ करती है. आलम ये कि दिन के पहले पहर से ही लू चलने लगती है. गरम हवाओं की वजह से सड़कें भी सुनसान हो जाती हैं. धूल भरी आंधियां भी ऐसे चलती हैं, मानो सबकुछ उड़ा कर ले जाना चाहती हैं. दहकती दोपहरें भी अलसाई-सी लगती हैं. बचपन में इस मौसम में दिल नहीं लगता था. दादी जान कहा करती थीं कि ये हवायें मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं. इसलिए मन उड़ा-उड़ा रहता है. और कहीं भी मन नहीं लगता. तब से दादी जान की बात मान ली कि इस मौसम में ऐसा ही होता है. फिर भी हमें जून बहुत अच्छा लगता है. इस मौसम से मुहब्बत हो गई. दहकती दोपहरें, गरम हवायें, धूल भरी आंधियां. और किसी की राह तकती एक वीरान सड़क. वाक़ई, सबकुछ बहुत अच्छा लगता है. बहुत ही अच्छा. जैसे इस मौसम से जनमों-जनमों का नाता हो. एक ख़ास बात यह है कि जून की शुरुआत ही हमारी सालगिरह यानी एक जून से होती है. अम्मी की सालगिरह भी 27 जून को है, पर एक अगस्त को उनका साथ छूट गया. लेकिन वो हममें हमेशा ज़िन्दा रहेंगी.  और फिर उनकी सालगिरह भी तो इसी माह में है, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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निडर पत्रकारिता की मिसाल: 10 मुस्लिम महिला चेहरे



डॉ. फ़िरदौस ख़ान को 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' कहा जाता है। वे एक विद्वान, कवयित्री, कहानीकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं जिनका काम आध्यात्मिकता और साहित्य को जोड़ता है।

सूफ़ी परम्परा से जुड़ी फ़िरदौस ने 'फ़हम अल-क़ुरआन' और 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' जैसी किताबें लिखी हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी से जुड़ी रहीं फिरदौस ने उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में लिखकर सद्भाव और सेवा का संदेश दिया है।

एक झलक देखें  

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बारिश की उदासी...


 
रात से बारिश हो रही है. लड़की को बारिश का मौसम हमेशा से अच्छा लगता है, लेकिन आज न जाने क्यों वह उदास है. कुछ बरस पहले जब जाड़ों के आख़िर में बारिश हुई थी, तब वो साथ था. दोनों साथ-साथ चल रहे थे. आसमान में काली घटा छाई हुई थी, बिल्कुल सावन की तरह. वो बहुत कम बात करते थे, शायद इसलिए कि वो बिना कहे ही एक-दूसरे के दिल की बात जान लिया करते थे. अचानक बारिश होने लगती है. वो भीग जाते हैं. जाड़े में भीगने की वजह से लड़की को बुख़ार आ जाता है. बाद में लड़के का दोस्त बताता है कि लड़का भी बुख़ार से तप रहा है. लड़की सोचती है कि अगर वो उसके पास होती, तो उसे अदरक वाली चाय बनाकर पिलाती. उसके माथे और सीने पर विक्स लगाती, लेकिन वो उसके पास नहीं है.
आज भी बारिश हो रही है. ठंडी हवायें चल रही हैं. लेकिन वो परदेस में है. शायद यही सोचकर लड़की उदास है.
डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
Firdaus Diary
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ख़ामोश रात की तन्हाई में...

नज़्म
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क़ पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...
-फ़िरदौस ख़ान
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इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...


मेरे महबूब !
मुझे हर उस शय से मुहब्बत है, जो तुम से वाबस्ता है. हमेशा से मुझे सफ़ेद रंग अच्छा लगता है. बाद में जाना कि ऐसा क्यों था. तुम्हें जब भी देखा सफ़ेद दूधिया लिबास में देखा. लोगों के हुजूम में तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे चांद ख़ुद ज़मीं पर उतर आया हो. सच तुम इस ज़मीं का चांद ही तो हो, जिससे मेरी ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है.
जब तुम परदेस में होते हो तो अपना देस भी बेगाना लगने लगता है. हर पल तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहता है. कभी ऐसा भी होता है कि परदेस ही अपना सा लगने लगता है, क्योंकि तुम वहां जो हो. सच मुहब्बत भी क्या शय है, जो ख़ुदा के क़रीब पहुंचा देती है. जबसे तुम्हें चाहा है, तब से ख़ुदा को पहचाना है. हर वक़्त तुम्हीं को क़रीब पाया है. सावन में जब आसमां पर काली घटाएं छा जातीं हैं और फिर बारिश की बूंदें प्यासी धरती की प्यास बुझाती हैं. जाड़ो में कोहरे से घिरी सुबह क्यारियों में महकते गुलाब फ़िज़ां में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेर देते हैं. और गर्मियों की तपती दोपहरों और सुलगती रातों में भी हर सिम्त तुम ही तुम नज़र आते हो.
तुम्हारे बग़ैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता.
ख़्वाजा मुहम्मद ख़ां ताहिर साहब ने सच ही तो कहा है-
फिर ज़ुलैख़ा न नींद भर सोई
जबसे यूसुफ़ को ख़्वाब में देखा...
मुझे वो सड़क भी बेहद अज़ीज़ है, जो तुम्हारे शहर तक जाती है. वैसे मैं जहां रहती हूं, वहां से कई सड़कें तुम्हारे शहर तक जाती हैं. पर आज तक ये नहीं समझ पाई कि मैं किस राह पर अपना क़दम रखूं कि तुम तक पहुंच जाऊं, लेकिन दिल को एक तसल्ली ज़रूर है कि इन अनजान राहों में इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...  
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान

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नजूमी...


कुछ अरसे पहले की बात है... हमें एक नजूमी मिला,  जिसकी बातों में सहर था... उसके बात करने का अंदाज़ बहुत दिलकश था... कुछ ऐसा कि कोई परेशान हाल शख़्स उससे बात करे, तो अपनी परेशानी भूल जाए... उसकी बातों के सहर से ख़ुद को जुदा करना मुश्किल था...
उसने हमसे बात की... कुछ कहा, कुछ सुना... यानी सुना कम और कहा ज़्यादा... क्योंकि वह सामने वाले को बोलने का मौक़ा ही नहीं देता था... और सुनने वाला भी बस उसे सुनता ही रह जाए...
उसके बात करने का अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि इंसान चांद की तमन्ना करे, तो वो उसे अहसास करा दे कि चांद ख़ुद उसके आंचल में आकर सिमट जाए...
चांद तो आसमान की अमानत है, भला वह ज़मीन पर कैसे आ सकता है... ये बात सुनने वाला भी जानता है और कहने वाला भी...
लेकिन चांद को अपने आंचल में समेट लेना का कुछ पल का अहसास इंसान को वो ख़ुशी दे जाता है, जिसे लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता... चांद को पाने के ये लम्हे और इन लम्हों के अहसास की शिद्दत रूह की गहराइयों में उतर जाती है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...
यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो उसे  दोज़ख़ की आग का क्या ख़ौफ़...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है... इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है... इश्क़ में रूहानियत होती है... इश्क़, बस इश्क़ होता है... किसी इंसान से हो या ख़ुदा से...

हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...

बुजुर्गों से सुना है कि शायरों की बख़्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना...शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते...उन्हें  दोज़ख़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे  दोज़ख़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है...जब हम अपने महबूब (चाहे वो काल्पनिक ही क्यूं न हो) से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी  दोज़ख़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?

बंदे को तो अपने महबूब (ख़ुदा) की  दोज़ख़ भी उतनी ही अज़ीज़ होती है, जितनी जन्नत... जिसे इश्क़ की दौलत मिली हो, फिर उसे कायनात की किसी और शय की ज़रूरत ही कहां रह जाती है, भले ही वो जन्नत ही क्यों न हो...

जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए, तो वो ख़ुद ब ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है... इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है... जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है...

किसी ने क्या ख़ूब कहा है-
मुकम्मल दो ही दानों पर
ये तस्बीह-ए-मुहब्बत है
जो आए तीसरा दाना
ये डोर टूट जाती है

मुक़र्रर वक़्त होता है
मुहब्बत की नमाज़ों का
अदा जिनकी निकल जाए
क़ज़ा भी छूट जाती है

मोहब्बत की नमाज़ों में
इमामत एक को सौंपो
इसे तकने उसे तकने से
नीयत टूट जाती है

मुहब्बत दिल का सजदा है
जो है तैहीद पर क़ायम
नज़र के शिर्क वालों से 
मुहब्बत रूठ जाती है


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नाम का पास


फ़िल्म 'गाइड' में नायक राजू को रात में ठंड से ठिठुरता देखकर कोई उसे ज़र्द कपड़ा ओढ़ा जाता है. इसी कपड़े की वजह से गांववाले उसे संत-महात्मा समझ लेते हैं. वह गांववालों को समझाने की बहुत कोशिश करता है कि वह कोई संत या महात्मा नहीं है. लेकिन लोग उसकी एक बात नहीं सुनते. आख़िरकार वह गांववालों के यक़ीन को क़ायम रखने के लिए अपनी जान तक क़ुर्बान कर देता है. असल ज़िन्दगी में ऐसे कितने लोग होंगे, जो अपने नाम और रुतबे का पास रखते होंगे.
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान 


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