पूरे चाँद की रात

 

डॉ फ़िरदौस ख़ान
आज भी पूरे चाँद की रात है. हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती हुई... अंगनाई में लगी चमेली में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को और रूमानी बना रहे हैं... नींद आंखों से कोसों दूर है... कल से वह दिल्ली से बाहर हैं... आज रात भी शायद नींद न आए... चाँद अब भी आसमान में मुस्करा रहा है... उसकी दूधिया चाँदनी अंगनाई में बिखरी हुई है... चमेली की शाख़ें हवा से झूम रही हैं... मौसम बदल रहा है... हवा में ख़ुनकी है... सोचती हूं कोई किताब ही पढ़ ली जाए... मेज़ पर कृष्ण चंदर की कहानियों की उर्दू की एक किताब रखी है, जिसे कई बार पढ़ चुके हैं...

हमें कृष्ण चंदर की किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है... यह कृष्ण चंदर के लेखन की ख़ासियत रही कि उन्होंने जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी दुश्वारियों को पेश किया, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी जज़्बे को भी अपनी रचनाओं में इस तरह पेश किया कि पढ़ने वाला उसी में खोकर रह गया. उनके उपन्यास मिट्टी के सनम में एक नौजवान की बचपन यादें हैं, जिसका बचपन कश्मीर की हसीन वादियों में बीता. इसे प़ढकर बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं. इसी तरह उनकी कहानी पूरे चांद की रात तो दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया ही नहीं जा सकता है. बानगी देखिए:-
अप्रैल का महीना था. बादाम की डालियां फूलों से लद गई थीं और हवा में बर्फ़ीली ख़ुनकी के बावजूद बहार की लताफ़त आ गई थी. बुलंद व बाला तिनकों के नीचे मख़मली दूब पर कहीं कहीं बर्फ़ के टुकड़े सफ़ेद फूलों की तरह खिले हुए नज़र आ रहे थे. अगले माह तक ये सफ़ेद फूल इसी दूब में जज़्ब हो जाएंगे और दूब का रंग हरा सब्ज़ हो जाएगा और बादाम की शाख़ों पर हरे हरे बादाम पुखराज के नगीनों की तरह झिलमिलाएंगे नीलगूं पहाड़ों के चेहरों से कोहरा दूर होता जाएगा. लेकिन अभी अप्रैल का महीना था. अभी पत्तियां नहीं फूटी थीं. अभी पहाड़ों पर बर्फ़ का कोहरा था. अभी पगडंडियों का सीना भेड़ों की आवाज़ से गूंजा न था. अभी समल की झील पर कंवल के चिराग़ रौशन न हुए थे. झील का गहरा सब्ज़ पानी अपने सीने के अंदर उन लाखों रूपों को छुपाए बैठा था, जो बहार की आमद पर यकायक उसकी सतह पर एक मासूम और बेलोस हंसी की तरह खिल जाएंगे. पुल के किनारे-किनारे बादाम के पेड़ों की शाख़ों पर शिगूफ़े चमकने लगे थे. अप्रैल में ज़मिस्तान की आख़िरी शब में जब बादाम के फूल जागते हैं और बहार की नक़ीब बनकर झील के पानी में अपनी किश्तियां तैराते हैं. फूलों के नन्हे-नन्हे शिकारे सतह आब पर रक्सा व लरज़ा बहार की आमद के मुंतज़िर हैं.

और अब मैं अड़तालीस बरस के बाद लौट के आया हूं. मेरे बेटे मेरे साथ हैं. मेरी बीवी मर चुकी है, लेकिन मेरे बेटों की बेटियां और उनके बच्चे मेरे साथ हैं और हम लोग सैर करते-करते समल झील के किनारे आ निकले हैं और अप्रैल का महीना है और दोपहर से शाम हो गई है और मैं देर तक पुल के किनारे खड़ा बादामों के पेड़ों की क़तारें देखता जाता हूं और ख़ुनक हवा में सफ़ेद शगू़फों के गुच्छे लहराते जाते हैं और पगडंडी की ख़ाक पर से किसी के जाने पहचाने क़दमों की आवाज़ सुनाई नहीं देती. एक हसीन दोशीज़ा लड़की हाथों में एक छोटी सी पोटली दबाए पुल पर से भागती हुई गुज़र जाती है और मेरा दिल धक से रह जाता है. दूर बस्ती में कोई बीवी अपने ख़ाविंद को आवाज़ दे रही है. वह उसे खाने पर बुला रही है. कहीं से एक दरवाज़ा बुलंद होने की आवाज़ आती है और एक रोता हुआ बच्चा यकायक चुप हो जाता है. छतों से धुआं निकल रहा है और परिंदे शोर मचाते हुए एकदम दरख्तों की घनी शाख़ों में अपने पर फड़फड़ाते हैं और फिर एकदम चुप हो जाते हैं. ज़रूर कोई गा रहा है और उसकी आवाज़ गूंजती गूंजती उफ़क़ के उस पार गुम होती जा रही है. मैं पुल को पार करके आगे बढ़ता हूं. मेरे बेटे और उनकी बीवियां और बच्चे मेरे पीछे आ रहे हैं. वे अलग-अलग टोलियों में बटे हुए हैं. यहां पर बादाम के पेड़ों की क़तार ख़त्म हो गई. तल्ला भी ख़त्म हो गया. झील का किनारा है. यह ख़ूबानी का दरख्त है, लेकिन कितना बड़ा हो गया है. मगर किश्ती, यह किश्ती है. मगर क्या यह वही किश्ती है. सामने वह घर है. मेरी पहली बहार का घर. मेरी पूरे चांद की रात की मुहब्बत.

घर में रौशनी है. बच्चों की सदाएं हैं. कोई भारी आवाज़ में गाने लगता है. कोई बुढ़िया चीख़कर उसे चुप करा देती है. मैं सोचता हूं, आधी सदी हो गई. मैंने उस घर को नहीं देखा. देख लेने में क्या हर्ज है. मुझे घर के अंदर घुसते देखकर मेरे घर के सदस्य भी अंदर चले आए थे. बच्चे एक दूसरे से बहुत जल्द मिलजुल गए. हम दोनों आहिस्ता-आहिस्ता बाहर चले आए. आहिस्ता-आहिस्ता झील के किनारे चलते गए. मैंने कहा-मैं आया था. मगर तुम्हें किसी दूसरे नौजवान के साथ देखकर वापस चला गया था. वह बोली-अरे वह तो मेरा सगा भाई था. वह फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी. वह मुझसे मिलने आया था, उसी रोज़ तुम भी आने वाले थे. वह वापस जा रहा था. मैंने उसे रोक लिया कि तुमसे मिलके जाए. तुम फिर आए ही नहीं. वह एकदम संजीदा हो गई. छह बरस मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया. तुम्हारे जाने के बाद मुझे ख़ुदा ने एक बेटा दिया. तुम्हारा बेटा. मगर एक साल बाद वह भी मर गया. चार साल और मैंने तुम्हारी राह देखी, मगर तुम नहीं आए. फिर मैंने शादी कर ली.

हम दोनों चुप हो गए. बच्चे खेलते-खेलते हमारे पास आ गए. उसने मेरी पोती को उठा लिया, मैंने उसके पोते को. और हम ख़ुशी से एक दूसरे को देखने लगे. उसकी पुतलियों में चांद चमक रहा था और वह चांद हैरत और मुसर्रत से कह रहा था- इंसान मर जाते हैं, लेकिन ज़िंदगी नहीं मरती. बहार ख़त्म हो जाती है, लेकिन फिर दूसरी बहार आ जाती है. छोटी-छोटी मुहब्बतें भी ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन ज़िंदगी की बड़ी और अज़ीम सच्ची मुहब्बतें हमेशा क़ायम रहती हैं. तुम दोनों पिछले बहार में न थे. यह बहार तुमने देखी. उससे अगली बहार में तुम न होगे. लेकिन ज़िंदगी फिर भी होगी और जवानी भी होगी और ख़ूबसूरती और रानाई और मासूमियत भी. बच्चे हमारी गोद से उतर पड़े, क्योंकि वे अलग से खेलना चाहते थे. वे भागते हुए ख़ूबानी के दरख्त के क़रीब चले गए. जहां किश्ती बंधी थी. मैंने पूछा-यह वही दरख़्त है. उसने मुस्कराकर कहा- नहीं यह दूसरा दरख़्त है.
(पूनम की एक रात में लिखी तहरीर)
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पूनम की रात...


आज
पूनम की रात है
और चांद
आसमान में
मुस्करा रहा है
तारे भी
खिलखिला रहे हैं

सच
कितनी भली है
पूनम की ये चांदनी रात
दिल चाहता है
इसे सहेज कर
रख लूं

क्या ख़बर
ज़िन्दगी की
कोई अंधियारी रात
इसकी यादों से ही
रौशन हो जाए
और
ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर
उजाला बिखर जाए...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
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ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा


 -डॉ फ़िरदौस ख़ान
अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है.
इश्क़ वह आग है, जिससे दोज़ख़ भी पनाह मांगती है. कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है. जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो, उसे दोज़ख़ की आग का क्या खौफ़. जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो उससे हुआ है. उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है. उस महबूब से जो सिर्फ़ जिस्म नहीं है. वह तो ख़ुदा के नूर का वह क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है. किसी इंसान से हो या ख़ुदा से. जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए तो वह ख़ुद-ब-ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है. इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है, जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है. हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.
विसाले-हक़ हुआ. सूफ़ियों ने इश्क़ को इबादत का दर्जा दिया है.

पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बुल्ले शाह कहते हैं-
करम शरा दे धरम बतावन
संगल पावन पैरी
ज़ात, मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा
इश्क़ शरा दा वैरी
वह तो अल्लाह को पाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने प्रेम के मार्ग को अपनाया, क्योंकि प्रेम किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करता. बुल्ले शाह के जन्म स्थान और समय को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं, लेकिन ज़्यादातर विद्वानों ने उनका जीवनकाल 1680 ईस्वी से 1758 ईस्वी तक माना है. तारीख़े-नफ़े उल्साल्कीन के मुताबिक़, बुल्ले शाह का जन्म सिंध (पाकिस्तान) के उछ गीलानीयां गांव में सखि शाह मुहम्मद दरवेश के घर हुआ था. उनका नाम अब्दुल्ला शाह रखा गया था. मगर सूफ़ी कवि के रूप में विख्यात होने के बाद वह बुल्ले शाह कहलाए. वह जब छह साल के थे, तब उनके पिता पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उछ गीलानीयां छोड़कर साहीवाल में मलकवाल नामक बस्ती में रहने लगे. इस दौरान चौधरी पांडो भट्टी किसी काम से तलवंडी आए थे. उन्होंने अपने एक मित्र से ज़िक्र किया कि लाहौर से 20 मील दूर बारी दोआब नदी के तट पर बसे गांव पंडोक में मस्जिद के लिए किसी अच्छे मौलवी की ज़रूरत है. इस पर उनके मित्र ने सखि शाह मुहम्मद दरवेश से बात करने की सलाह दी. अगले दिन तलवंडी के कुछ बुज़ुर्ग चौधरी पांडो भट्टी के साथ दरवेश साहब के पास गए और उनसे मस्जिद की व्यवस्था संभालने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. इस तरह बुल्ले शाह पंडोक आ गए. यहां उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. वह अरबी और फ़ारसी के विद्वान थे, मगर उन्होंने जनमानस की भाषा पंजाबी को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. प्रसिद्ध क़िस्सा हीर-रांझा के रचयिता सैयद वारिस शाह उनके सहपाठी थे. बुल्ले शाह ने अपना सारा जीवन इबादत और लोक कल्याण में व्यतीत किया. उनकी एक बहन भी थीं, जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर ख़ुदा की इबादत की. बुल्ले शाह लाहौर के संत शाह इनायत क़ादिरी शत्तारी के मुरीद थे. इश्क़े-हक़ीक़ी के बारे में बुल्ले शाह कहते हैं-
इश्क़े-हक़ीक़ी ने मुथ्थी कु़डे
मैनूं दस्सो पिया दा देसा
कियो इश्क़ असां ते आया है
तूं आया है मैं पाया है...
यानी प्रेम के देवता ने मेरा मन चुरा लिया है. मुझे बताओ कि पिया का देश कहां है. इश्क़ मेरे पास क्यों आया है. ओ इश्क़, तू आया है और मैंने तुझे महसूस किया है.
अल्लाह का पहला वर्ण (अरबी, फ़ारसी, उर्दू) है अलिफ़ का आकार 1 के समान होता है. यह परमात्मा की अद्वैतता को इंगित करता है. चूंकि बुल्ले शाह अल्लाह से अलग नहीं होना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कहा है-

इक्को अलिफ़ पढ़ो छुटकारा आये
यानी मुक्ति के लिए सिर्फ़ अलिफ़ पढ़ना ही काफ़ी है.
इश्क़ में वियोग भी होता है. वियोग में ही प्रेमी गिले-शिकवे करता है. यहां तक कि वह अपने प्रियतम को संगदिल और बेरहम भी कह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
कीह बेदर्दां संग यारी
रोवन अखियां ज़ारो ज़ारी
सानूं गए बेदर्दी छडके
हिजरे संग सीने विच ग़ड के
जिस्मो जिंद नू लै गए क़ढ के
इह गल कर गए हैंसयारी...
यानी बेदर्दी के साथ इश्क़ का क्या कहना. मेरी आंखें तो अविरल आंसू बहाती हैं. वह बेरहम महबूब मेरे सीने में वियोग रूपी कटार घोंपकर, मेरी जान निकालकर ले गया. उसने यह सब ब़डी बेरहमी के साथ किया. प्रेमी को दुनिया की कोई परवाह नहीं होती. वह हर तरह की निंदा सहन कर लेता है. ईश्वर वियोग में उसे तकली़फ महसूस होती है. बुल्ले शाह कहते हैं-
बिरहों आ व़डया विच वेह़डे
ज़ोरों ज़ोर देवे तन घेरे
दारू दर्द नां बझो तेरे
मैं सजनां बाझ मारीनी हां
मित्तर पियारे कारन नी
मैं लोक पियारे कारन नी
मैं लोक अलाहमे लैनी हां...
यानी विरह ने मेरे आंगन में आकर मुझे अपने प्रकोप से बेहोश कर दिया. इसके अलावा तकली़फ दूर करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मैं तो प्रियतम के बिना मर रही हूं. मैं अपने प्रिय के लिए लोगों के उलाहने सुन रही हूं. कभी-कभी प्रेमी प्रियतम के उन गहन प्रेम सपनों को देखता है, जिसमें प्रियतम पलभर के लिए दर्शन देकर ओझल हो जाता है. उस व़क्त प्रेमी पी़डा से कराह उठता है. बुल्ले शाह कहते हैं-
देखो नीं पियारा मैनूं सुफने में छल गया
प्रेमी की ज़िंदगी में एक व़क्त ऐसा भी आता है, जब वह वियोग की रात गुज़र जाती है और फिर मिलन की सुबह आती है. उस व़क्त प्रेमी खुशी से नाच उठता है. वह दूसरों से मुबारकबाद लेना चाहता है. बुल्ले शाह कहते हैं- आओ सैयो रल दियो वधाई
मैं वर पाया रांझा माही...
यानी आओ दोस्तों, सब मिलकर मुझे मुबारकबाद दो. मैंने अपने महबूब यानी अपने खुदा को पा लिया है. हीर की तरह यह रहस्यवादी भी अपने प्रियतम रांझा की तलाश में भटकता रहा. प्रियतम एक जोगी के वेश में आया और प्रेमी ख़ुद को प्रियतम की जोगन कहता है. बुल्ले शाह के शब्दों में-
रांझा जोगिण बण आया
वाह सांगी सांग रचाया
रांझा जोगी ते मैं जुगियाणीं
इस दी खातर भरसां पाणीं
ऐवें पिछली उमर विहाणी
इस हुण मैनूं भरमाया...
यानी प्रियतम योगी के रूप में आया है. बहरुपिए ने ब़डा सुंदर नाटक रचाया है. रांझा एक जोगी है और मैं उसकी जोगन. उसके लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूं. मेरा पिछला जन्म तो बेकार हो गया. उसने मुझे अब मोहित कर लिया है. बुल्ले शाह ने अन्य सूफ़ियों की तरह ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया. उनकी रचनाओं में हिंदुस्तान के विभिन्न संप्रदायों का प्रभाव साफ़ नज़र आता है.
बुल्ले शाह के मुताबिक़ आत्मा ता परमात्मा की ही एक अभिन्न अंग है. परमात्मा प्रत्येक आत्मा में विराजमान है और स्वेच्छा से बोलता है. वह कहते हैं-
नाल महबूब सिरे दी बाज़ी
जिस ने कुल तबक लै साजी
मन मेरे विच जोत बिराजी
आपे ज़ाहिर हाल बताया...
यानी अपने महबूब के लिए अपने सिर की बाज़ी लगा दी है, जिसने सारी कायनात को बनाया है. मेरे दिल में वह रूहानी रौशनी मौजूद है, जो जिस्म के ज़रिये खुद को दर्शाती है. यह रूहानी रौशनी खुदा के इश्क़ से वाबस्ता है. लेकिन इसकी अपनी कोई ख्वाहिश नहीं है. यह ख़ुदा के हुक्म से ही अपने अलग-अलग रूपों में रहती है. ख़ुदा के हुक्म से ही मिट्टी की देह के रूप में नाचती है. वह कहते हैं-
मैं मेरी है ना तेरी है
एह अंत ख़ाक दी ढेरी है
एक ढेरी होई खेरी है
ढेरी नु नाच नचाई दा
हुण किस तो आप लुकाई दा...

यानी मैं यानी देह न मेरी है, न तेरी है. इसका अंत तो मिट्टी के ढेर के रूप में होता है, जो इधर-उधर बिखर जाती है. मिट्टी के इस ढेर में जब आत्मा प्रविष्ट होती है तो यह ढेर नाचता है. अब तुम ख़ुद को किससे छुपा रहे हो. बुल्ले शाह दुनिया को भ्रम या मायावी नहीं मानते. ख़ुदा ने ही इस दुनिया को बनाया है. इंसान जन्म लेता है और फिर एक रोज़ मर जाता है. यही इस सृष्टि का नियम है. वह कहते हैं-
मैं सुपना सभ जग वी सुपना
सुपना लोक बिबाणा
ख़ाकी ख़ाक सियों रल जागा
कुझ नहीं ज़ोर घीणांणा...

यानी मैं एक सपना हूं और पूरी दुनिया भी एक सपना है. सब इंसान भी एक सपना ही हैं. जो मिट्टी में जन्म लेगा, वह एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा. यह सब बिना किसी ज़ोर के ख़ुद-ब-ख़ुद ही हो जाएगा.
भले ही बुल्ले शाह की धरती अब पाकिस्तान हो, लेकिन हिंदुस्तान में भी उन्हें उतना ही माना जाता है, जितना पाकिस्तान में. उनका कलाम, उनका संदेश तो पूरी दुनिया के लिए है. दरअसल, बुल्ले शाह हिंदुस्तान और पाकिस्तान के महान सूफ़ी कवि होने के साथ इन दोनों मुल्कों की सांझी विरासत के भी प्रतीक हैं. बुल्ले शाह के बारे में कहा जाता है कि मेरा शाह-तेरा शाह, बुल्ले शाह. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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अमरुद का पेड़


सच... बचपन बहुत ही प्यारा होता है. बचपन में छोटी-छोटी बातों में भी हम बहुत ख़ुश हो जाते हैं. हमारा ददिहाल वाला घर बहुत बड़ा था. उसमें बड़े-बड़े कमरे, बड़ा दालान और एक बड़ा आँगन था. आँगन में नल लगा हुआ था. क्यारी थी, जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे. आँगन में तीन अमरुद के पेड़ लगे हुए थे. हम सुबह उठकर सबसे पहले ये देखते थे कि कितने अमरुद पके हैं. जब कोई पका अमरुद दिख जाता तो उसे तोड़कर खा लेते. जब कई दिन इंतज़ार करने के बाद पका अमरुद नज़र नहीं आता, तो गदरा या कच्चा अमरुद ही तोड़ लिया जाता. अमरुद के लिए बचपन की ये दीवानगी याद आती, तो चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है.

अब फ़्रिज में फल रखे रहते हैं, लेकिन उन्हें खाने की वो दीवानगी नहीं है. आज भी अमरूदों को देखकर बचपन के दिन याद आ जाते हैं. दरअसल, ख़ुशियां तो छोटी-छोटी चीज़ों में ही छुपी होती हैं, लेकिन हम बड़ी-बड़ी ख़ुशियों में तलाशते रहते हैं, जो हमें कभी नहीं मिलतीं या तब मिलती हैं, जब हमारी ज़िन्दगी में उनकी कोई अहमियत ही नहीं रहती.
डॉ  फ़िरदौस ख़ान       
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तबीयत


जब तबीयत ठीक नहीं होती. बुख़ार से जिस्म निढाल होता है. आराम करते-करते भी कोफ़्त होने लगती है, ऐसे में अपने कमरे के सिवा सबकुछ कितना भला लगता है. दिल चाहता है कि बाहर कहीं घूमकर आएं. खिड़की से झांकते आसमान के आख़िरी किनारे तक. दिल चाहता है कि उड़कर किसी तरह नीले आसमान में तैर रहे दूधिया बादलों को छू लें. कहीं दूर दिखाई दे रहे दरख़्त की छांव में टहल आएं. खिड़की से नज़र आ रही सड़क पर बेमक़सद चलते रहें.
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...
यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो उसे  दोज़ख़ की आग का क्या ख़ौफ़...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है... इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है... इश्क़ में रूहानियत होती है... इश्क़, बस इश्क़ होता है... किसी इंसान से हो या ख़ुदा से...

हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...

बुजुर्गों से सुना है कि शायरों की बख़्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना...शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते...उन्हें  दोज़ख़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे  दोज़ख़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है...जब हम अपने महबूब (चाहे वो काल्पनिक ही क्यूं न हो) से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी  दोज़ख़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?

बंदे को तो अपने महबूब (ख़ुदा) की  दोज़ख़ भी उतनी ही अज़ीज़ होती है, जितनी जन्नत... जिसे इश्क़ की दौलत मिली हो, फिर उसे कायनात की किसी और शय की ज़रूरत ही कहां रह जाती है, भले ही वो जन्नत ही क्यों न हो...

जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए, तो वो ख़ुद ब ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है... इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है... जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है...

किसी ने क्या ख़ूब कहा है-
मुकम्मल दो ही दानों पर
ये तस्बीह-ए-मुहब्बत है
जो आए तीसरा दाना
ये डोर टूट जाती है

मुक़र्रर वक़्त होता है
मुहब्बत की नमाज़ों का
अदा जिनकी निकल जाए
क़ज़ा भी छूट जाती है

मोहब्बत की नमाज़ों में
इमामत एक को सौंपो
इसे तकने उसे तकने से
नीयत टूट जाती है

मुहब्बत दिल का सजदा है
जो है तैहीद पर क़ायम
नज़र के शिर्क वालों से 
मुहब्बत रूठ जाती है


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मुहब्बत से महकते ख़त



ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है. मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो. और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो. ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है. उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें. दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़. सीधे दिल में उतर जाते हैं. अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो. मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं, और फिर यूं ही उम्र बीत जाए.

कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा, क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी. लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली. और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया. किसी बेल-बूटे की तरह, कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया कि 'तुम' मेरे हो.

एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान

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हमारी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना

संगीत प्रकृति के कण-कण में बसा है. चिड़ियों की चहचहाहट, नदियों का कल-कल करता जल, झरनों की झर-झर, हवा की सांय-सांय और रिमझिम बूंदों की टिप-टिप. सभी में संगीत मौजूद है. हिन्दुस्तानी संस्कृति और संगीत का चोली-दामन का साथ है. घर में कोई मंगल कार्य हो या कोई त्योहार, कोई भी गीत-संगीत के बिना मुकम्मल ही नहीं होता.

यह हमारी ख़ुशनसीबी है कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत ग्रहण करने का मौक़ा मिला. कई साल हमने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना की है. संगीत की देवी सरस्वती की वन्दना से सुर साधना का सफ़र शुरू हुआ. हमारे गुरुजी श्री बालकृष्ण बजाज जी देवी सरस्वती की वन्दना से ही रियाज़ शुरू करते थे. इस दौरान कई संगीत के कार्यक्रमों में जाने का मौक़ा मिला. कई सम्मान भी मिले, लेकिन सबसे बड़ा सम्मान यही था कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को क़रीब से जानने, समझने और सीखने का मौक़ा मिला.

हिन्दुस्तान में आज भी पारम्परिक कलाओं में गुरु-शिष्य की परम्परा  क़ायम है. हमें भी एक ऐसे गुरु मिले, जिस पर किसी भी शिष्य को नाज़ होगा.
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।


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गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं...



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बात उन दिनों की है जब हम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. हर रोज़ सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद रियाज़ शुरू होता था. क़रीब दो घंटे तक सुरों की साधना. इस दौरान दिल को जो सुकून मिलता था. उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है.

इसके बाद कॉलेज जाना और कॉलेज से ऑफ़िस. ऑफ़िस के बाद फिर गुरु जी के पास जाना. संध्या, सरस्वती की वन्दना के साथ शुरू होती. गुरुजी सबसे पहले संगीत की देवी मां सरस्वती की वन्दना से ही रियाज़ शुरू करते थे और फिर वही सुरों की साधना का सिलसिला जारी रहता. हमारे गुरुजी बालकृष्ण बजाज जी, संगीत के प्रति बहुत ही समर्पित थे. वो जितने संगीत के प्रति समर्पित थे उतना ही अपने शिष्यों के प्रति भी स्नेह रखते थे. उनकी पत्नी भी बहुत अच्छे स्वभाव की गृहिणी थीं. गुरुजी के बेटे सन्नी और बेटी शैली हम सबके साथ ही शिक्षा ग्रहण करते थे. कुल मिलाकर बहुत ही पारिवारिक माहौल था.

हमारा बी.ए फ़ाइनल का संगीत का इम्तिहान था. एक राग के गायन के वक़्त हम कुछ भूल गए. हमारे नोट्स की कॉपी हमारे ही कॉलेज के एक सहपाठी के पास थी, जो उसने अभी तक लौटाई नहीं थी. अगली सुबह इम्तिहान था. हम बहुत परेशान थे कि क्या करें. इसी कशमकश में हमने गुरुजी के घर जाने का फ़ैसला किया. शाम को क़रीब सात बजे हम गुरुजी के घर गए.

वहां का मंज़र देखकर पैरों तले की ज़मीन निकल गई. घर के बाहर सड़क पर सफ़ेद शामियाना लगा था. दरी पर बैठी बहुत-सी औरतें रो रही थीं. हम अन्दर गए, आंटी (गुरुजी की पत्नी को हम आंटी कहते हैं) ने बताया कि गुरुजी के बड़े भाई श्री हरिकृष्ण बजाज की सड़क हादसे में मौत हो गई है. और वो दाह संस्कार के लिए शमशान गए हैं. हम उन्हें सांत्वना देकर वापस आ गए.

रात के क़रीब डेढ़ बजे गुरुजी हमारे घर आए. मोटर साइकिल उनका बेटा चला रहा था और गुरुजी पीछे तबले थामे बैठे थे.

अम्मी ने हमें नींद से जगाया. हम कभी भी रात को जागकर पढ़ाई नहीं करते थे, बल्कि सुबह जल्दी उठकर पढ़ना ही हमें पसंद था .हम बैठक में आए.

गुरुजी ने कहा - तुम्हारी आंटी ने बताया था की तुम्हें कुछ पूछना था. कल तुम्हारा इम्तिहान भी है. मैंने सोचा- हो सकता है, तुम्हें कोई ताल भी पूछनी हो इसलिए तबले भी ले आया. गुरुजी ने हमें क़रीब एक घंटे तक शिक्षा दी.

गुरुजी अपने भाई के दाह संस्कार के बाद सीधे हमारे पास ही आ गए थे. ऐसे गुरु पर भला किसको नाज़ नहीं होगा, जिन्होंने ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी अपनी शिष्या के प्रति अपने दायित्व को निभाया हो.

संत कबीर जी ने ऐसे ही समर्पित गुरु के बारे में कहा है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।

हमारे गुरु जी गुरु-शिष्य परम्परा की जीवंत मिसाल हैं.
गुरुजी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं.
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वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा

 


वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा
तुझको भूलें न कभी याद दिलाते गुज़रा

ज़िन्दगी ख़्वाब नहीं, ख़्वाब का धोखा है फ़क़्त
नाम उसका ही हक़ीक़त था, बताते गुज़रा

चाँदनी रोती रही, नींद न शब को आई
चाँद तन्हाई का पैग़ाम सुनाते गुज़रा

वक़्त मौसम की तरह है, न भरोसा करना
कब वो ठहरा है कहीं, मिलते-मिलाते गुज़रा

ज़िन्दगी ख़ार सही, ख़ार की ज़द में रहते
ज़ख़्म ऐसा था के बस आस मिटाते गुज़रा

बारहा रोक ही लेती है रफ़ाक़त उसकी
इक मुसाफ़िर कहां ’फ़िरदौस’ से आते गुज़रा
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


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