इंतज़ार


हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम मिस्र के बाशिन्दों को काहिनों के ज़ुल्म से निजात दिलाने की मुहिम में जुटे हैं. वे मिस्र के बाशिन्दों को ख़ुशहाल ज़िन्दगी देने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. अपना घरबार छोड़कर मिस्र के गोशे-गोशे की ख़ाक छान रहे हैं.

और बानो ज़ुलैख़ा अपने यूसुफ़ के इंतज़ार में पलकें बिछाये बैठी हैं. उन्हें यक़ीन है कि कभी न कभी ये हिज्र का मौसम ज़रूर बीतेगा और उन्हें अपने यूसुफ़ का क़ुर्ब हासिल होगा.


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नमाज़


मेरे महबूब !
तुम फ़ज्र की ठंडक हो 
इशराक़ की सुर्ख़ी हो 
चाश्त का रौशन सूरज हो
ज़ुहर की खिली धूप हो 
अस्र की सुहानी शाम हो 
मग़रिब का सुरमई उजाला हो 
इशा की महकती रात हो
तहज्जुद की दुआ हो 
मेरे महबूब 
तुम ही तो मेरी इबादत का मरकज़ हो...
-फ़िरदौस ख़ान  

शब्दार्थ : फ़ज्र, इशराक़, चाश्त, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और तहज्जुद –मुख़तलिफ़ अवक़ात की नमाज़ों के नाम हैं.      
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तुम


मेरे महबूब !
तुम हवाओं में होते हो 
तो आसमान की बुलंदियों को
छू लेते हो...
तुम ज़मीन पर होते हो
तो कुशादा तवील रास्तों से 
गुज़र जाते हो...
और 
तुम समन्दर में होते हो
तो उसकी गहराइयों में 
उतर जाते हो
जैसे दिल की गहराई में 
उतर जाते हो, उसमें बस जाते हो...
-फ़िरदौस ख़ान  
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ऑल इंडिया रेडियो


ऑल इंडिया रेडियो से हमारा दिल का रिश्ता है. रेडियो सुनते हुए ही बड़े हुए. बाद में रेडियो से जुड़ना हुआ. 
ऑल इंडिया रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम 21 दिसम्बर 1996 को प्रसारित हुआ था. इसकी रिकॉर्डिंग 15 दिसम्बर को हुई थी. कार्यक्रम का नाम था उर्दू कविता पाठ. इसमें हमने अपनी ग़ज़लें पेश की थीं. उस दिन घर में सब कितने ख़ुश थे. पापा की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था. रेडियो से हमारी न जाने कितनी ख़ूबसूरत यादेँ जुड़ी हुई हैं. 
आज भी रेडियो से उतना ही लगाव है. 
रेडियो के सभी चाहने वालों को विश्व रेडियो दिवस की मुबारकबाद 🌺
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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इबादत


मेरे महबूब !
तुम फ़ज्र की ठंडक हो 
इशराक़ की सुर्ख़ी हो 
चाश्त की धूप हो
ज़ुहर की तपिश हो 
अस्र की महक हो 
मग़रिब की छांव हो 
इशा की दुआ हो
और
तहज्जुद की इबादत हो 
मेरे महबूब 
तुम ही तो मेरी इबादत का मरकज़ हो...
-फ़िरदौस ख़ान  
शब्दार्थ : फ़ज्र, इशराक़, चाश्त, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और तहज्जुद –मुख़तलिफ़ अवक़ात की नमाज़ों के नाम हैं.   
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ग़ज़ल


ज़िन्दगी में जीने का बस यही सहारा है
बन्दगी तुम्हारी है, ज़िक्र भी तुम्हारा है

घर में अर्शे-आज़म से, रहमतें उतर आईं 
सरवरे-दो आलम को, मैंने जब पुकारा है

मन्नतों के धागों को बांध के महब्बत से
औलिया की चौखट पर हाथ भी पसारा है

ग़म नहीं, ख़ज़ां भी हो, या बहार का मौसम 
साथ हमसफ़र है तो, ख़ुल्द का नज़ारा है

मैं ज़मीं प्यासी, तुम भीगता हुआ सावन 
ज़िन्दगी के गुलशन को तुमने ही निखारा है

तुम फ़िरौन हो तो क्या, ज़ालिमों ये मत भूलो
जो ख़ुदा तुम्हारा है, वह  ख़ुदा हमारा है

शुक्रे-ख़ुदा में फ़िरदौस अब, सर को रख के सजदे में 
हर घड़ी ये कहती हैं, ख़ूब ही संवारा है 
-फ़िरदौस ख़ान
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उम्मीद


मेरे महबूब! 
ज़ुल्म-ओ-सितम के 
इस दौर में 
उम्मीद की रौशनी हो तुम... 
-फ़िरदौस ख़ान
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यादें


मेरे महबूब! 
ये बूंदें हैं या तुम्हारी यादें
जो ज़िन्दगी को महका रही हैं... 
-फ़िरदौस ख़ान
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रौशनी


मेरे महबूब! 
गहरे स्याह अंधेरे में
जगमगाती रौशनी हो तुम... 
-फ़िरदौस ख़ान
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क़ुर्ब




मेरे महबूब! 
तुम्हारा क़ुर्ब
क़ुर्बे-इलाही है
तुम्हारे साये में
मेरी बेचैन रूह सुकून पाती है... 
-फ़िरदौस ख़ान

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