तबीयत


जब तबीयत ठीक नहीं होती. बुख़ार से जिस्म निढाल होता है. आराम करते-करते भी कोफ़्त होने लगती है, ऐसे में अपने कमरे के सिवा सबकुछ कितना भला लगता है. दिल चाहता है कि बाहर कहीं घूमकर आएं. खिड़की से झांकते आसमान के आख़िरी किनारे तक. दिल चाहता है कि उड़कर किसी तरह नीले आसमान में तैर रहे दूधिया बादलों को छू लें. कहीं दूर दिखाई दे रहे दरख़्त की छांव में टहल आएं. खिड़की से नज़र आ रही सड़क पर बेमक़सद चलते रहें.
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...
यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो उसे  दोज़ख़ की आग का क्या ख़ौफ़...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है... इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है... इश्क़ में रूहानियत होती है... इश्क़, बस इश्क़ होता है... किसी इंसान से हो या ख़ुदा से...

हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...

बुजुर्गों से सुना है कि शायरों की बख़्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना...शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते...उन्हें  दोज़ख़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे  दोज़ख़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है...जब हम अपने महबूब (चाहे वो काल्पनिक ही क्यूं न हो) से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी  दोज़ख़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?

बंदे को तो अपने महबूब (ख़ुदा) की  दोज़ख़ भी उतनी ही अज़ीज़ होती है, जितनी जन्नत... जिसे इश्क़ की दौलत मिली हो, फिर उसे कायनात की किसी और शय की ज़रूरत ही कहां रह जाती है, भले ही वो जन्नत ही क्यों न हो...

जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए, तो वो ख़ुद ब ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है... इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है... जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है...

किसी ने क्या ख़ूब कहा है-
मुकम्मल दो ही दानों पर
ये तस्बीह-ए-मुहब्बत है
जो आए तीसरा दाना
ये डोर टूट जाती है

मुक़र्रर वक़्त होता है
मुहब्बत की नमाज़ों का
अदा जिनकी निकल जाए
क़ज़ा भी छूट जाती है

मोहब्बत की नमाज़ों में
इमामत एक को सौंपो
इसे तकने उसे तकने से
नीयत टूट जाती है

मुहब्बत दिल का सजदा है
जो है तैहीद पर क़ायम
नज़र के शिर्क वालों से 
मुहब्बत रूठ जाती है


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मुहब्बत से महकते ख़त



ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है. मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो. और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो. ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है. उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें. दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़. सीधे दिल में उतर जाते हैं. अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो. मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं, और फिर यूं ही उम्र बीत जाए.

कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा, क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी. लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली. और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया. किसी बेल-बूटे की तरह, कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया कि 'तुम' मेरे हो.

एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान

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हमारी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना

संगीत प्रकृति के कण-कण में बसा है. चिड़ियों की चहचहाहट, नदियों का कल-कल करता जल, झरनों की झर-झर, हवा की सांय-सांय और रिमझिम बूंदों की टिप-टिप. सभी में संगीत मौजूद है. हिन्दुस्तानी संस्कृति और संगीत का चोली-दामन का साथ है. घर में कोई मंगल कार्य हो या कोई त्योहार, कोई भी गीत-संगीत के बिना मुकम्मल ही नहीं होता.

यह हमारी ख़ुशनसीबी है कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत ग्रहण करने का मौक़ा मिला. कई साल हमने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना की है. संगीत की देवी सरस्वती की वन्दना से सुर साधना का सफ़र शुरू हुआ. हमारे गुरुजी श्री बालकृष्ण बजाज जी देवी सरस्वती की वन्दना से ही रियाज़ शुरू करते थे. इस दौरान कई संगीत के कार्यक्रमों में जाने का मौक़ा मिला. कई सम्मान भी मिले, लेकिन सबसे बड़ा सम्मान यही था कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को क़रीब से जानने, समझने और सीखने का मौक़ा मिला.

हिन्दुस्तान में आज भी पारम्परिक कलाओं में गुरु-शिष्य की परम्परा  क़ायम है. हमें भी एक ऐसे गुरु मिले, जिस पर किसी भी शिष्य को नाज़ होगा.
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।


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गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं...



डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बात उन दिनों की है जब हम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. हर रोज़ सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद रियाज़ शुरू होता था. क़रीब दो घंटे तक सुरों की साधना. इस दौरान दिल को जो सुकून मिलता था. उसे शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है.

इसके बाद कॉलेज जाना और कॉलेज से ऑफ़िस. ऑफ़िस के बाद फिर गुरु जी के पास जाना. संध्या, सरस्वती की वन्दना के साथ शुरू होती. गुरुजी सबसे पहले संगीत की देवी मां सरस्वती की वन्दना से ही रियाज़ शुरू करते थे और फिर वही सुरों की साधना का सिलसिला जारी रहता. हमारे गुरुजी बालकृष्ण बजाज जी, संगीत के प्रति बहुत ही समर्पित थे. वो जितने संगीत के प्रति समर्पित थे उतना ही अपने शिष्यों के प्रति भी स्नेह रखते थे. उनकी पत्नी भी बहुत अच्छे स्वभाव की गृहिणी थीं. गुरुजी के बेटे सन्नी और बेटी शैली हम सबके साथ ही शिक्षा ग्रहण करते थे. कुल मिलाकर बहुत ही पारिवारिक माहौल था.

हमारा बी.ए फ़ाइनल का संगीत का इम्तिहान था. एक राग के गायन के वक़्त हम कुछ भूल गए. हमारे नोट्स की कॉपी हमारे ही कॉलेज के एक सहपाठी के पास थी, जो उसने अभी तक लौटाई नहीं थी. अगली सुबह इम्तिहान था. हम बहुत परेशान थे कि क्या करें. इसी कशमकश में हमने गुरुजी के घर जाने का फ़ैसला किया. शाम को क़रीब सात बजे हम गुरुजी के घर गए.

वहां का मंज़र देखकर पैरों तले की ज़मीन निकल गई. घर के बाहर सड़क पर सफ़ेद शामियाना लगा था. दरी पर बैठी बहुत-सी औरतें रो रही थीं. हम अन्दर गए, आंटी (गुरुजी की पत्नी को हम आंटी कहते हैं) ने बताया कि गुरुजी के बड़े भाई श्री हरिकृष्ण बजाज की सड़क हादसे में मौत हो गई है. और वो दाह संस्कार के लिए शमशान गए हैं. हम उन्हें सांत्वना देकर वापस आ गए.

रात के क़रीब डेढ़ बजे गुरुजी हमारे घर आए. मोटर साइकिल उनका बेटा चला रहा था और गुरुजी पीछे तबले थामे बैठे थे.

अम्मी ने हमें नींद से जगाया. हम कभी भी रात को जागकर पढ़ाई नहीं करते थे, बल्कि सुबह जल्दी उठकर पढ़ना ही हमें पसंद था .हम बैठक में आए.

गुरुजी ने कहा - तुम्हारी आंटी ने बताया था की तुम्हें कुछ पूछना था. कल तुम्हारा इम्तिहान भी है. मैंने सोचा- हो सकता है, तुम्हें कोई ताल भी पूछनी हो इसलिए तबले भी ले आया. गुरुजी ने हमें क़रीब एक घंटे तक शिक्षा दी.

गुरुजी अपने भाई के दाह संस्कार के बाद सीधे हमारे पास ही आ गए थे. ऐसे गुरु पर भला किसको नाज़ नहीं होगा, जिन्होंने ऐसे नाज़ुक वक़्त में भी अपनी शिष्या के प्रति अपने दायित्व को निभाया हो.

संत कबीर जी ने ऐसे ही समर्पित गुरु के बारे में कहा है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।

हमारे गुरु जी गुरु-शिष्य परम्परा की जीवंत मिसाल हैं.
गुरुजी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं.
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वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा

 


वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा
तुझको भूलें न कभी याद दिलाते गुज़रा

ज़िन्दगी ख़्वाब नहीं, ख़्वाब का धोखा है फ़क़्त
नाम उसका ही हक़ीक़त था, बताते गुज़रा

चाँदनी रोती रही, नींद न शब को आई
चाँद तन्हाई का पैग़ाम सुनाते गुज़रा

वक़्त मौसम की तरह है, न भरोसा करना
कब वो ठहरा है कहीं, मिलते-मिलाते गुज़रा

ज़िन्दगी ख़ार सही, ख़ार की ज़द में रहते
ज़ख़्म ऐसा था के बस आस मिटाते गुज़रा

बारहा रोक ही लेती है रफ़ाक़त उसकी
इक मुसाफ़िर कहां ’फ़िरदौस’ से आते गुज़रा
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


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चाँदनी रात में कुछ भीगे ख़्यालों की तरह




चांदनी रात में कुछ भीगे ख़्यालों की तरह
मैंने चाहा है तुम्हें दिन के उजालों की तरह

साथ तेरे जो गुज़ारे थे कभी कुछ लम्हें
मेरी यादों में चमकते हैं मशालों की तरह

इक तेरा साथ क्या छूटा हयातभर के लिए
मैं भटकती रही बेचैन ग़ज़ालों की तरह

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

तेरे आने की ख़बर लाई हवा जब भी कभी
धूप छाई मेरे आंगन में दुशालों की तरह

कोई सहरा भी नहीं, कोई समन्दर भी नहीं
अश्क आँखों में हैं वीरान शिवालों की तरह
 
पलटे औराक़ कभी हमने गुज़श्ता पल के
दूर होते गए ख़्वाबों से मिसालों की तरह
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
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इंसान का टूटना


दुनिया की हर चीज़ टूटने के बाद फ़ना हो जाती है, लेकिन इंसान टूटने के बाद बनता है और अपने असली मुक़ाम को पहुंचता है. इसलिए ज़िन्दगी में कभी टूट जाओ, तो उदास या परेशान होने की बजाय ख़ुद को समेटों और किसी नये मशग़ले में लग जाओ. इंशा अल्लाह कोई न कोई मुक़ाम ज़रूर हासिल कर लोगे.
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


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तू मेरे गोकुल का कान्हा, मैं हूं तेरी राधा रानी...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है. इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना, क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है, उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है. उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है. वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है. इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है. इश्क़ में रूहानियत होती है. इश्क़, बस इश्क़ होता है, किसी इंसान से हो या ख़ुदा से.

अगर इंसान अल्लाह या ईश्वर से इश्क़ करे, तो फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़कर उसकी इबादत की है या फिर किसी मन्दिर में बैठकर कर उसे याद किया है.
 
एक गीत
तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान

अर्चना चावजी की आवाज़ में गीत

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डॉ. फ़िरदौस ख़ान का परिचय


डॉ. फ़िरदौस ख़ान एक इस्लामी विदुषी, शायरा, कहानीकार, लेखिका, पटकथा लेखिका, निबंधकार, पत्रकार, सम्पादक और अनुवादक हैं। उन्हें ‘लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी’ के नाम से जाना जाता है। उनके लेखन की ख़ासियत ये है कि वे जितनी शिद्दत से ज़िन्दगी की दुश्वारियों को पेश करती हैं, उतनी ही नफ़ासत के साथ मुहब्बत के रेशमी व मख़मली अहसास को अपनी शायरी में बयां करती हैं। उनकी शायरी दिलो-दिमाग़ में ऐसे रच-बस जाती है कि उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका एक-एक लफ़्ज़ रूह पर नक़्श हो जाता है। उन्हें जो फ़न मिला है, वह बहुत कम शायरों को नसीब होता है। उनका कलाम गर्मियों की झुलसा देने वाली तपिश में पीपल की घनी और ठंडी छांव जैसा है, प्यासी धरती पर पड़ी सावन की रिमझिम फुहारों जैसा है, और कंपकंपा देने वाली ठंड में जाड़ो की नरम गुनगुनी धूप जैसा है। 

साहित्य 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान रूहानियत में यक़ीन रखती हैं और सूफ़ी सिलसिले से जुड़ी हैं। वे अपनी अम्मी मरहूमा ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी ख़ान और अपने अब्बू मरहूम सत्तार अहमद ख़ान को अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने ‘फ़हम अल क़ुरआन’ लिखा है, जो उनकी ज़िन्दगी का शाहकार है। वे कहती हैं- “हमारी अम्मी बहुत नेक और इबादतगुज़ार ख़ातून थीं। हमने बचपन से ही उन्हें इबादत करते हुए पाया। उन्हें देखकर हमारी दिलचस्पी इबादत में हो गई। साथ ही बहुत कम उम्र से रूहानी इल्म हासिल करने की चाह भी पैदा हो गई। फ़हम अल क़ुरआन लिखते वक़्त हमें इस बात का भी अहसास हुआ कि हमने अपनी ज़िन्दगी फ़ानी चीज़ों के लिए ज़ाया नहीं की। दरअसल, हमारी ज़िन्दगी का मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। हमारा काम इसी मंज़िल तक पहुंचने का रास्ता है, इसी क़वायद का एक हिस्सा है।” 

उन्होंने सूफ़ी-संतों के जीवन और उनके दर्शन पर आधारित किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह के ‘ज्ञान गंगा’ ने प्रकाशित किया था। यह किताब चर्चा में बनी हुई है। भक्ति और सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर पीएचडी करने वाले शोधार्थी इस किताब को ख़ूब पसंद करते हैं। 

उन्होंने बचपन में ही लिखना शुरू कर दिया था। वे बताती हैं- “जब हम छठी जमात में पढ़ते थे। तब एक नज़्म लिखी थी। अम्मी और अब्बू को नज़्म सुनाई, तो उन्हें बहुत पसंद आई। अब्बू ने उसे एक सांध्यकालीन अख़बार में शाया होने के लिए दे दिया और वह नज़्म शाया भी हो गई। नज़्म ख़ूब सराही गई। इस तरह लिखने और छपने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक मुसलसल जारी है। सांध्यकालीन अख़बार से शुरू हुआ यह सिलसिला देश-विदेश के अख़बारों और पत्रिकाओं तक पहुंच गया। 

उनकी कहानी ‘बढ़ते क़दम’ साक्षरता पर आधारित थी. साक्षरता अभियान से संबंधित पत्र-पत्रिकाओं में यह कहानी ख़ूब शाया हुई थी. यह कहानी ढाबे पर काम करने वाले राजकुमार नामक एक बच्चे की है, जिससे उसका मालिक कल्लू शिक्षा दिलाने का वादा करता है और उससे कहता है कि कल सुबह वह उसे मास्टर जी के पास ले जाएगा.

मीडिया 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान ने दूरदर्शन केन्द्र, आकाशवाणी और देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में कई सालों तक काम किया है। वे दूरदर्शन केन्द्र के समाचार अनुभाग की प्रख्यात सम्पादक और आकाशवाणी की मनोरंजन प्रसारक रह चुकी हैं।
वे कहती हैं- “आकाशवाणी से हमारा दिल का रिश्ता है। रेडियो सुनते हुए ही बड़े हुये। बाद में रेडियो से जुड़ना हुआ। रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम 21 दिसम्बर 1996 को प्रसारित हुआ था। उस दिन घर में सब कितने ख़ुश थे। पापा की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। रेडियो से हमारी न जाने कितनी ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हुई हैं।  आज भी रेडियो से उतना ही लगाव है। इसी तरह दूरदर्शन के साथ भी हमारी ख़ूबसूरत यादें वाबस्ता हैं। बचपन में जब दूरदर्शन देखते थे, तब ये सोचा भी नहीं था कि कभी हम ख़ुद इसका हिस्सा बनेंगे। नवम्बर 2002 में प्रोडयूसर व सहायक समाचार सम्पादक के तौर पर दूरदर्शन से जुड़ना हुआ। वह वक़्त भी ज़िन्दगी का बहुत ख़ूबसूरत और यादगार वक़्त रहा।“    

इसके अलावा उन्होंने कई समाचार चैनलों में भी अपनी प्रतिभा का योगदान दिया है। उन्होंने कई वृत्तचित्र, टेलीविज़न नाटक और रेडियो नाटक भी लिखे हैं। वे देश और विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों, समाचार और फ़ीचर एजेंसियों के लिए लिखती हैं। देश का शायद ही ऐसा कोई अख़बार हो, जिसमें उनकी रचनाएं शाया न हुई हों। वे मासिक ‘पैग़ामे-मादरे-वतन’ की सम्पादक और मासिक वंचित जनता में सम्पादकीय सलाहकार भी रही हैं। फ़िलहाल वे स्टार न्यूज़ एजेंसी में सम्पादक हैं।

मुशायरे और कवि सम्मेलन
डॉ. फ़िरदौस ख़ान मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं। कई बरसों तक उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन की तालीम भी ली है। वे बताती हैं- “जब सुप्रसिद्ध गीतकार गोपालदास नीरज के सम्पादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘गीतकार’ में गीत प्रकाशित हुआ, तो दूर-दूर से मुशायरों और कवि सम्मेलनों के लिए आमंत्रण आने लगे। भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में शिरकत करने का भी मौक़ा मिला। इसके अलावा अनेक गोष्ठियों में भी हिस्सा लिया।”      

सम्मान
उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल सम्पादन और श्रेष्ठ लेखन के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है। न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ द्वारा हिन्दी दिवस के मौक़े पर 14 सितम्बर 2014 को दिल्ली में साहित्यिक विषयों पर लेखन के लिए उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अमेरिकन बायोग्राफ़िकल इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेशनल वीमेन’स एडवाइज़री बोर्ड द्वारा साल 2005 की कामयाब महिलाओं की सूची के लिए उनका नामांकन किया गया था। राजकीय महाविद्यालय हिसार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हरियाणा लघु समाचार-पत्र एसोसिएशन द्वारा उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ पत्रकार’ अवॉर्ड से नवाज़ा गया। इसके अलावा भी उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें दो डॉक्टरेट की मानद उपाधियां भी शामिल हैं। वे कहती हैं- “हमारे अल्फ़ाज़, हमारे जज़्बात और ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि हमारे लफ़्ज़ ही हमारी पहचान हैं। पाठक हमारे लिखे को पसंद करते हैं, यही हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।” 

अनुवाद 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान कई भाषाओं की जानकार हैं। वे उर्दू, हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखती हैं। विदेशों में उनकी अंग्रेज़ी कवितायें बहुत पसंद की जाती हैं। उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम् का पंजाबी अनुवाद किया है, जो ख़ूब चर्चित हुआ। वे राजकीय महाविद्यालय हिसार की पंजाबी की पत्रिका ‘भोर दा तारा’ की सम्पादक भी रही हैं। उन्होंने राहुल गांधी पर एक नज़्म भी लिखी, जो ख़ूब सराही गई।   

ब्लॉग 
डॉ. फ़िरदौस ख़ान ब्लॉग भी लिखती हैं। उनके कई ब्लॉग हैं। ‘फ़हम अल क़ुरआन’ उनका क़ुरआन करीम का ब्लॉग है, जिसमें उनका लिखा फ़हम अल क़ुरआन पढ़ा जा सकता है। ‘फ़िरदौस डायरी’ गीत, ग़ज़ल, नज़्में, कहानियां व अन्य साहित्यिक तहरीरों का ब्लॉग है। ‘मेरी डायरी’ समाज, पर्यावरण, स्वास्थ्य, साहित्य, कला-संस्कृति, राजनीति व समसामयिक विषयों की तहरीरों का ब्लॉग है। ‘द प्रिंसेस ऑफ़ वर्ड्स’ इंग्लिश नज़्मों और तहरीरों का ब्लॉग है। ‘जहांनुमा’ उर्दू तहरीरों का ब्लॉग है। ‘हीर’ पंजाबी तहरीरों का ब्लॉग है। ‘राहे-हक़’ रूहानी तहरीरों का ब्लॉग है। 
 
देश सेवा  
डॉ. फ़िरदौस ख़ान देश सेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने नागरिक सुरक्षा विभाग हिसार में पोस्ट वार्डन के तौर पर कई साल काम किया है। इसके अलावा वे अनुराग साहित्य केन्द्र की संस्थापक और अध्यक्षा भी हैं।   

देश के सुप्रसिद्ध लेखकों और पत्रकारों ने उनके बारे में कई बार लिखा है। हाल ही में प्रकाशित श्री यादवेन्द्र यादव की पुस्तक 'भारतीय मुस्लिमों की गौरव गाथाएं' में उन्हें एक ऐसी लेखिका के रूप में शामिल किया गया है, जो अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई हैं और समाज को एक नई दिशा दे रही हैं।    

अपनी अभिलाषाओं के बारे में वे कहती हैं- “हमने ज़िन्दगी में जो चाहा, वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला। ज़मीन चाही, तो आसमान मिला। इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की ‘चाह’ ही नहीं रही।” वे अपने बारे में कहती हैं-
नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है…












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