ये इक़रार है मुहब्बत का


दिल चाहता है कि महबूब को अपना बना लें. ये इक़रार है मुहब्बत का यानी कलमा. 
दिल चाहता है कि महबूब से ख़ूब बातें करें. ये गुफ़्तगू है मुहब्बत की यानी नमाज़. 
दिल चाहता है कि महबूब की बातें सुनें. ये चाहत है मुहब्बत की यानी क़ुरआन की तिलावत.  
दिल चाहता है कि महबूब की याद में खाना-पीना छोड़ दें. ये शिद्दत है मुहब्बत की यानी रोज़ा.
दिल चाहता है कि महबूब के लिए माल ख़र्च करें. ये कैफ़ियत है मुहब्बत की यानी ज़कात.
दिल चाहता है कि महबूब के घर के चक्कर लगाएं. ये दीवानगी है मुहब्बत की यानी हज.
दिल चाहता है कि महबूब पर जान निसार कर दें. ये इन्तेहा है मुहब्बत की यानी जिहाद.  
फ़िरदौस ख़ान
        
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लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी : रवीश कुमार

सम्मानीय रवीश जी !
आप हमेशा से ही हमारे लिए आदर्श रहे हैं. हमें इस बात का हमेशा फ़ख़्र रहेगा कि हम उस दौर में हैं, जब आप हैं.पत्रकारिता भी आप पर नाज़ करती होगी. आपने साबित कर दिया कि इंसान के लिए ईमान सबसे क़ीमती चीज़ है. आपको याद होगा कि आपने हमारे बारे में एक तहरीर लिखी थी, जो दैनिक हिन्दुस्तान में 26 मई 2010 को शाया हुई थी. आज उस पर नज़र पड़ी, तो सोचा कि इसके लिए एक बार फिर से आपको शुक्रिया कहें. आपके ये शब्द 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' हमारे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं हैं.इसके लिए हम हमेशा आपके तहेदिल से शुक्रगुज़ार रहेंगे.    
-फ़िरदौस ख़ान  


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सिल-बट्टे...


बाज़ार में तरह-तरह की नामी कंपनियों के tomato ketchup और saus मिल जाएंगे, लेकिन जो ज़ायक़ा घरों में सिल-बट्टे पर बनने वाली टमाटर, अदरक, लहसुन, हरी मिर्च और हरे धनिये की चटनियों में है, वह कहीं और नहीं मिलेगा.
हालांकि अब घर-घर grinder mixer आ गए हैं. बाज़ार में भी हल्दी, मिर्च, धनिया से लेकर गरम मसाले तक पिसे हुए मिलने लगे हैं, लेकिन आज भी ऐसे घरों की कमी नहीं, जहां सभी मसाले सिल-बट्टे पर पीसे जाते हैं. हमारी नानी जान भी हमेशा सिल-बट्टे पर ही मसाला पीसा करती थीं. उनका कहना था कि खाने में जो ज़ायक़ा और ख़ुशबू सिल-बट्टे पर पिसे मसालों से आता है, वह grinder mixer में पिसे मसालों से नहीं आ पाता. हमारी एक मामी और उनकी बेटियां भी हमेशा सिल-बट्टे पर ही मसाला पीसती हैं. हालांकि इसमें मेहनत ज़्यादा है और वक़्त भी काफ़ी लग जाता है, लेकिन जिन्हें सिल-बट्टे के मसालों का ज़ायक़ा लग जाए, फिर कहां छूटता है.  हमारे घर में भी सिल-बट्टे वाली चटनी ही पसंद की जाती है. बहुत बरसों पहले जब हम नोएडा में जॉब करते थे और वहीं रहते थे, तब हमें नोएडा में सिल-बट्टा ख़रीदने के लिए बहुत घूमना पड़ा था. पुरानी दिल्ली में तो बहुत आसानी से मिल जाते हैं.

सिल- बट्टे को सही रखने के लिए इसे छेनी हथौड़ी से तराशा जाता है. गांव-क़स्बों में यह काम करने वाले गली-मुहल्लों में आवाज़ लगाते मिल ही जाते हैं. मगर बाज़ार मे मिलने वाले पिसे मसालों और grinder mixer की वजह से इन लोगों काम ख़त्म होता जा रहा है.

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इंतज़ार


हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम मिस्र के बाशिन्दों को काहिनों के ज़ुल्म से निजात दिलाने की मुहिम में जुटे हैं. वे मिस्र के बाशिन्दों को ख़ुशहाल ज़िन्दगी देने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. अपना घरबार छोड़कर मिस्र के गोशे-गोशे की ख़ाक छान रहे हैं.

और बानो ज़ुलैख़ा अपने यूसुफ़ के इंतज़ार में पलकें बिछाये बैठी हैं. उन्हें यक़ीन है कि कभी न कभी ये हिज्र का मौसम ज़रूर बीतेगा और उन्हें अपने यूसुफ़ का क़ुर्ब हासिल होगा.


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अल्लाह तुम्हें अर्श पे मारूफ़ करेगा


अल्लाह तुम्हें अर्श पे मारूफ़ करेगा 
करते रहो ज़मीन पे गुमनाम इबादत

करते नहीं ख़्याल ग़रीबो यतीम का 
हो जाएगी हर किस्म की नाकाम इबादत
-फ़िरदौस ख़ान 
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ख़त


मेरे महबूब !
मेरी ज़िन्दगी
वो गुमशुदा ख़त है
जिसका पता तुम हो...
-फ़िरदौस ख़ान 
 

Mere Mahboob !
Meri Zindagi 
Wo Gumshuda Khat Hai
Jiska Pataa TUM ho...
-Firdaus Khan


Photo Curtesy by Google
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इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...


मेरे महबूब !
मुझे हर उस शय से मुहब्बत है, जो तुम से वाबस्ता है. हमेशा से मुझे सफ़ेद रंग अच्छा लगता है. बाद में जाना कि ऐसा क्यों था. तुम्हें जब भी देखा सफ़ेद दूधिया लिबास में देखा. लोगों के हुजूम में तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे चांद ख़ुद ज़मीं पर उतर आया हो. सच तुम इस ज़मीं का चांद ही तो हो, जिससे मेरी ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है.
जब तुम परदेस में होते हो तो अपना देस भी बेगाना लगने लगता है. हर पल तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहता है. कभी ऐसा भी होता है कि परदेस ही अपना सा लगने लगता है, क्योंकि तुम वहां जो हो. सच मुहब्बत भी क्या शय है, जो ख़ुदा के क़रीब पहुंचा देती है. जबसे तुम्हें चाहा है, तब से ख़ुदा को पहचाना है. हर वक़्त तुम्हीं को क़रीब पाया है. सावन में जब आसमां पर काली घटाएं छा जातीं हैं और फिर बारिश की बूंदें प्यासी धरती की प्यास बुझाती हैं. जाड़ो में कोहरे से घिरी सुबह क्यारियों में महकते गुलाब फ़िज़ां में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेर देते हैं. और गर्मियों की तपती दोपहरों और सुलगती रातों में भी हर सिम्त तुम ही तुम नज़र आते हो.
तुम्हारे बग़ैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता.
ख़्वाजा मुहम्मद ख़ां ताहिर साहब ने सच ही तो कहा है-
फिर ज़ुलैख़ा न नींद भर सोई
जबसे यूसुफ़ को ख़्वाब में देखा...
मुझे वो सड़क भी बेहद अज़ीज़ है, जो तुम्हारे शहर तक जाती है. वैसे मैं जहां रहती हूं, वहां से कई सड़कें तुम्हारे शहर तक जाती हैं. पर आज तक ये नहीं समझ पाई कि मैं किस राह पर अपना क़दम रखूं कि तुम तक पहुंच जाऊं, लेकिन दिल को एक तसल्ली ज़रूर है कि इन अनजान राहों में इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...  
-फ़िरदौस ख़ान

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मुहब्बत



जब इंसान को किसी से मुहब्बत हो जाया करती है, तो फिर उसका वजूद, उसका अपना नहीं रह जाता. दिल उसका होता है, लेकिन धड़कनें किसी और की. जिस्म अपना होता है, लेकिन रूह किसी और की, क्योंकि उसकी अपनी रूह तो अपने महबूब की चाह में भटकती फिरा करती है.

बक़ौल बुल्ले शाह-
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई
सद्दी मैनूं धीदो रांझा हीर न आखो कोई
रांझा मैं विच, मैं रांझे विच ग़ैर ख़िआल न कोई
मैं नाहीं ओह आप है अपणी आप करे दिलजोई
जो कुछ साडे अन्दर वस्से जात असाडी सोई
जिस दे नाल मैं न्योंह लगाया ओही जैसी होई
चिट्टी चादर लाह सुट कुडिये, पहन फ़कीरां दी लोई
चिट्टी चादर दाग लगेसी, लोई दाग न कोई
तख़्त हज़ारे लै चल बुल्ल्हिआ, स्याली मिले न ढोई
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई...

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हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता...


संगीत दिलो-दिमाग़ को बहुत सुकून देता है. अगर भक्ति संगीत की बात की जाए, तो यह रूह की गहराई तक में उतर जाता है. हमारी पसंद के बहुत से भक्ति गीत हैं, जिन्हें सुनते हुए हम उम्र बिता सकते हैं. ऐसा ही एक गीत है- मंगल भवन अमंगल हारी. साल 1975 में आई फ़िल्म 'गीत गाता चल' में इसे सचिन पर फ़िल्माया गया था.
इस गीत को जब भी सुनते हैं, एक अजीब-सा सुकून मिलता है. 

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम-2
हो, होइहै वही जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढ़ाये साखा
हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपद काल परखिये चारी
हो, जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
हो, जाकी रही भावना जैसी
रघु मूरति देखी तिन तैसी
रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
हो, हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता
राम सिया राम सिया राम जय जय राम...
बहरहाल, हम यह गीत सुनते हैं...
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झाड़ू की सींकों का घर...


जी, हां ये बात बिल्कुल सच है. जो चीज़ हमारे लिए बेकार है, उससे किसी का आशियाना भी बन सकता है.    
बहुत साल पहले की बात है. अक्टूबर का ही महीना था. हमने देखा कि कई कबूतर आंगन में सुखाने के लिए रखी झाड़ू की सींकें निकाल रहे हैं. हर कबूतर बड़ी मशक़्क़त से एक सींक खींचता और उड़ जाता. हमने सोचा कि देखें कि आख़िर ये कबूतर झाड़ू की सीकें लेकर कहां जा रहे हैं. हमने देखा कि एक कबूतर सामने के घर के छज्जे पर रखे एक कनस्तर में सींकें इकट्ठी कर रहा है और दो कबूतर दाईं तरफ़ के घर की दीवार में बने रौशनदान में एक घोंसला बना रहे हैं. कबूतरों के उड़ने के बाद हमने झाड़ू को खोल कर उसकी सींकें बिखेर दीं, ताकि वे आसानी से अपने नन्हे घर के लिए सींकें ले जा सकें. अब हमने इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया. पुरानी छोटी झाड़ुओं को फेंकने की बजाय संभाल कर रख देते हैं. जब इस मौसम में कबूतर झाड़ू की सींके खींचने लगते हैं, तो हमें पता चल जाता है कि ये अपना घोंसला बनाने वाले हैं. गुज़श्ता दो दिनों में कबूतर हमारी दो झाड़ुओं की सींकें लेकर जा चुके हैं. 
हम चमेली व दीगर पौधों की सूखी टहनियों के छोटे-छोटे टुकड़े करके पानी के कूंडों के पास बिखेर देते हैं, ताकि पानी पीने के लिए आने वाले परिन्दों इन्हें लेकर जा सकें. 

आपसे ग़ुज़ारिश है कि अगर आपके आसपास भी परिन्दे हैं, तो आप भी अपनी पुरानी झाड़ुओं की सींकें कबूतरों के लिए रख दें, ताकि इनसे उनके नन्हे आशियाने बन सकें.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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