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आज फ़ादर्स डे है...


आज फ़ादर्स डे है... हमारे लिए हर पल ही फ़ादर्स डे है, क्योंकि हम अपने पापा के वजूद का ही एक हिस्सा हैं और पापा आज भी हम में ज़िन्दा हैं...
हमारे पापा ख़ुद से ज़्यादा अपने बच्चों को चाहते थे. पापा को घर आते देख हम उनके पास दौड़ जाते और पापा घर में दाख़िल होने से पहले ही हमें गोद में उठा लेते और चीज़ दिलाने ले जाते. सोते में एक लफ़्ज़ मुंह से निकलता-पानी, तो पापा हमें पानी पिलाते. हमें याद नहीं कि बचपन में कभी हमने ख़ुद उठकर पानी पिया हो. पापा हमें स्कूल लेकर जाते. फिर स्कूल से लेकर भी आते. जब तक पापा ज़िन्दा रहे, हम घर जाते तो उन्हें घर से बाहर ही बेचैन टहलते देखते. पापा कहते- फ़िरदौस आने वाली है. और वो हमारे इंतज़ार में घर के बाहर ही टहलते रहते. ये जानते हुए कि हमारे घर आने में अभी कई घंटे बाक़ी हैं. हमसे पहले कभी पापा ने खाना नहीं खाया. कभी हमारी आंखें नम नहीं होने दीं. ये है हमारे पापा की हमारे लिए मुहब्बत. पापा के जाने के बाद ही दुख-तकलीफ़ का अहसास हुआ. ज़िन्दगी में पापा की कमी सबसे ज़्यादा खलती है.
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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पापा की बरसी


ज़िन्दगी में कुछ वाक़ियात ऐसे हुआ करते हैं, जो इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं. पापा का जाना भी एक ऐसा ही वाक़िया है. कहते हैं कि किसी लड़की का किसी मर्द से पहला प्यार, उसके वालिद से ही होता है. बिल्कुल सच है... पापा से हमें कितनी मुहब्बत है, इसका अहसास पापा के जाने के बाद ही हुआ.
पापा को इस दुनिया से गए 15 साल हो चुके हैं, लेकिन ये कल ही की बात लगती है. उस दिन 8 जुमादा उल अव्वल 1432 हिजरी की पीर की रात थी. अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से 11 अप्रैल 2011 थी. 
पापा की याद को समर्पित एक नज़्म...
पापा
आप बहुत याद आते हो...
मैं जानती हूं
अब आप इस दुनिया में नहीं हो
लेकिन
दिल हरगिज़ ये मानने को राज़ी नहीं
कि आप इस दुनिया से चले गए...

पापा
आप आज भी मुझमें ज़िन्दा हो
हर आहट पर लगता है
आप आओगे और पूछोगे
मेरी शहज़ादी कैसी है...

पापा
आपसे बिछड़ कर
आपकी शहज़ादी बहुत उदास रहती है
क्योंकि
आपकी तरह उसे चाहने वाला कोई नहीं

पापा
उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा
जब आपकी शहज़ादी आपके पास होगी
और
फिर हम हमेशा साथ रहेंगे...
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन...


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पापा !

पापा !
सरकारे-दो आलम
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सदक़े में
आप पर हमेशा
अल्लाह की रहमत बरसती रहे
और
अज़ल से अबद तक
उसकी रहमत के साये में रहें, आमीन...
-फ़िरदौस ख़ान
Happy Father's day
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मई दिवस और पापा

कल मज़दूर दिवस है. पहली मई के दिन पापा सुबह-सवेरे तैयार होकर मई दिवस के कार्यक्रमों में जाते थे. पापा ठेकेदार थे. लोगों के घर बनाते थे. छोटी-बड़ी इमारतें बनाते थे. उनके पास हमेशा कमज़ोर और बूढ़े मिस्त्री-मज़दूर हुआ करते थे. हमने पापा से पूछा कि लोग ताक़तवर और जवानों को रखना पसंद करते हैं, फिर आप कमज़ोर और बूढ़े लोगों को काम पर क्यों रखते हैं. पापा जवाब देते कि इसीलिए तो इन्हें रखता हूं, क्योंकि सबको जवान और ताक़तवर मिस्त्री-मज़दूर चाहिए. ऐसे में कमज़ोर और बूढ़े लोग कहां जाएंगे. अगर इन्हें काम नहीं मिलेगा, तो इनका और इनके परिवार का क्या होगा.

हमें अपने पापा पर फ़ख़्र है. उन्होंने कभी किसी का शोषण नहीं किया. किसी से तयशुदा घंटों से ज़्यादा काम नहीं करवाया, बल्कि कभी-कभार वक़्त से पहले ही उन्हें छोड़ दिया करते थे. अगर कोई मज़दूर भूखा होता, तो उसे अपना खाना खिला दिया करते थे. फिर ख़ुद शाम को जल्दी आकर खाना खाते. पापा ने न कभी कमीशन लिया और न ही किसी से एक पैसा ज़्यादा लिया. इसीलिए हमेशा नुक़सान में रहते. अपने बच्चों के लिए न तो दौलत जोड़ पाए और न ही कोई जायदाद नहीं बना पाए.

हमें इस बात पर फ़ख़्र है कि पापा ने हलाल की कमाई से अपने बच्चों की परवरिश की.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

मेहनतकशों को मज़दूर दिवस की मुबारकबाद 
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पापा ! आप बहुत याद आते हो...


बचपन में सुना था... जब कोई मर जाता है, तो वह तारा बन जाता है... आसमान में चमकता हुआ एक सितारा... यह बात साईंस से परे की है... सिर्फ़ मानने या न मानने की... रात में जब भी आसमान को देखते हैं, तो लगता है कि पापा भी सितारा बन गए होंगे... आसमान में चमकते अनगिनत सितारों में किसी एक सितारे के रूप में पापा भी होंगे... जो हमें देख रहे होंगे... बस हमने भी एक सितारा तलाश लिया... वही सितारा, जो चमेली के पास बैठने पर आसमान में अपने सबसे क़रीब नज़र आता है... चम्पा के महकते फूलों के गुच्छे के ठीक ऊपर... अब यह हर रोज़ का शग़ल बन गया है... चमेली के पास चटाई बिछाकर बैठ जाना और आसमान में चमकते सितारे को देखना... ऐसा लगता है, जैसे पापा भी रोज़ रात को हमारे आने का इंतज़ार करते हैं...
वो भी अपने पापा से इतना ही प्यार करते हैं, क्या वो भी अपने पापा को इस तरह आसमान में सितारों के बीच तलाशते होंगे... कभी पूछेंगे उनसे...
पापा ! आप बहुत याद आते हो... मिस यू...
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उनकी आंखें...


कुछ लोग ज़िन्दगी का हासिल हुआ करते हैं... वो भी हमारे ज़िन्दगी का हासिल हैं... उनकी तस्वीर हमेशा हमारी डायरी में रहती है... जब भी मन उदास होता है...हम उस तस्वीर को देखते रहते हैं... घंटों ऐसे ही बीत जाते हैं, पता नहीं चलता कि कब दोपहर से शाम हुई और कब रात से सुबह हो गई. अपनी पूरी उम्र उस तस्वीर को देखते रह सकते हैं...
कितनी सच्ची हैं उनकी आंखें... कितनी मुहब्बत है उन आंखों में... पापा की आंखों में भी बहुत मुहब्बत थी... जब भी कोई दिल दुखाता है, तो दिल चाहता है कि पापा की गोद में सर रख कर बहुत रोयें... पर हम ऐसा नहीं कर सकते... क्योंकि पापा तो क़ब्र में सो रहे हैं... काश ! हम भी पापा की क़ब्र में जाकर उनके सीने पर सर रख कर कुछ देर सुकून से सो सकते... जिस तरह बचपन में सोया करते थे...
पापा के जाने के बाद उनकी आंखों में वो मुहब्बत देखी,  जिसके आगे दोनों जहां की हर शय छोटी मालूम होती है... इसलिए उनके साये में हमारी रूह सुकून पाती है...
कितनी प्यारी हैं उनकी आंखें... न जाने कौन-सा सहर है इनमें, कोई एक बार देखे, तो बस इन्हीं का ही होकर रह जाता है... कितनी गहरी हैं ये आंखें... शायद समन्दर से भी ज़्यादा गहरी... जो एक बार इनमें डूबा, तो फिर कभी बाहर नहीं आया... 


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पापा की तस्बीह


कुछ चीज़ें ऐसी हुआ करती हैं, जिन्हें इंसान बहुत संभालकर रखता है. इन चीज़ों से इंसान की यादें वाबस्ता होती हैं, उसके जज़्बात जुड़े होते हैं.
हमारे पास भी ऐसी कई चीज़ें हैं, जैसे पीतल-तांबे के बहुत से बर्तन जो अम्मी ने हमें दिए. वो बर्तन अम्मी को उनकी अम्मी ने दिए थे. फ़िलहाल बात तस्बीह की करते हैं. एक तस्बीह जो हमें बहुत अज़ीज़ है. ये वो तस्बीह है, जो अकसर पापा के हाथ में हुआ करती थी. और पापा क़ुरैशिये से बनी टोपी ओढ़कर तस्बीह पर कुछ न कुछ पढ़ते रहते थे. ये टोपी हमने उस वक़्त बुनी थी, जब हम छठी जमात में पढ़ते थे. पापा को इस टोपी से बहुत प्यार था. ख़्वाब में पापा नज़र आते हैं, तो यही टोपी पहने होते हैं.
पापा के जाने के बाद पापा की ख़ास चीज़ें हम भाई-बहनों ने आपस में बांट लीं. जैसे टोपी, तस्बीह, शिनाख़्ती कार्ड वग़ैरह. हमारे हिस्से में तस्बीह आई. हमने अपनी तस्बीह छोड़कर इस तस्बीह पर पढ़ना शुरू किया. क़रीब साल भर पहले की बात है, तस्बीह खो गई. यूं लगा जैसे किसी ने हमारी रूह को जिस्म से अलग कर दिया है. हम बदहवास होकर तस्बीह ढूंढने लगे. हम सफ़र में अकसर तस्बीह पढ़ते रहते हैं. एक मर्तबा लगा कि शायद तस्बीह बस में छूट गई, ये सोच कर जान हल्कान होने लगी. हमने दरूद शरीफ़ पढ़ते हुए तस्बीह तलाशनी शुरू की. कहा जाता है कि कोई चीज़ गुम हो जाए, तो दरूद शरीफ़ पढ़ते हुए उसे ढूंढो, चीज़ फ़ौरन नज़र के सामने आ जाएगी. अल्लाह का शुक्र कि तस्बीह हमें मिल गई.
हमने तस्बीह संभालकर रख दी. उस ताक़ में जहां कलाम पाक, दीगर किताबें और इत्र वग़ैरह रखा रहता है. हम अब उस तस्बीह पर नहीं पढ़ते. ख़ौफ़ आता है कि कहीं फिर से वो गुम न हो जाए. पापा की तस्बीह हमें बहुत अज़ीज़ है. उसके हर दाने में पापा की अंगुलियों ला लम्स (छुअन) है.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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पापा

हमारा बचपन
ज़िन्दगी में कुछ वाक़ियात ऐसे हुआ करते हैं, जो इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं... पापा का जाना भी एक ऐसा ही वाक़िया है. पापा को इस दुनिया से गए चार साल हो गए हैं, लेकिन ये कल ही की बात लगती है... उस दिन 11 अप्रैल 2011 यानी 8 जुमादा अल अव्वल 1432 हिजरी का पीर की रात थी... अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से आज पापा की बरसी है... पापा की याद को समर्पित एक नज़्म...

पापा
आप बहुत याद आते हो...
मैं जानती हूं
अब आप इस दुनिया में नहीं हो
लेकिन
दिल हरगिज़ ये मानने को राज़ी नहीं
कि आप इस दुनिया से चले गए...

पापा
आप आज भी मुझमें ज़िन्दा हो
हर आहट पर लगता है
आप आओगे और पूछोगे
मेरी शहज़ादी कैसी है...

पापा
आपसे बिछड़ कर
आपकी शहज़ादी बहुत उदास रहती है
क्योंकि
आपकी तरह उसे चाहने वाला कोई नहीं

पापा
उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा
जब आपकी शहज़ादी आपके पास होगी
और
फिर हम हमेशा साथ रहेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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