वो मेरे महबूब हैं


महबूब...  महबूब और इश्क़... इश्क़ और इबादत... इबादत और ख़ुदा...  आसमान के काग़ज़ पर चांदनी की रौशनाई से महबूब का तअरुफ़ लिखने बैठें, तो कायनात की हर शय छोटी पड़ जाए...
महबूब में ख़ुदा दिखता है... और जिसमें ख़ुदा दिखता है, उसका तअरुफ़ अल्फ़ाज़ में भला कोई कैसे कराए... अहसासात, जज़्बात... हरुफ़ की दुनिया से परे हैं... क्या कोई खिली धूप को बांध पाया है, क्या कोई चांदनी को पकड़ पाया है... नहीं... क़तई नहीं...
फिर भी हमने कोशिश की है, उनका तअरुफ़ लिखने की... मुलाहिज़ा फ़रमाएं..

वो मेरे महबूब हैं
जिनका चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं...

जिनका ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं...

वो हैं मेरे महबूब
जिन से मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं...

उनकी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
उनके इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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माहे-जून...


आंधियों का मौसम शुरू हो चुका है... हमें आंधियां बहुत पसंद हैं... ये इस बात की अलामत हैं कि हमारा पसंदीदा माह यानी माहे-जून आने वाला है... माहे-जून में गर्मी अपने शबाब पर हुआ करती है... आलम यह कि दिन के पहले पहर से ही लू चलने लगती है... गरम हवाओं की वजह से सड़कें भी सुनसान हो जाती हैं... धूल भरी आंधियां भी ऐसे चलती हैं, मानो सबकुछ उड़ा कर ले जाना चाहती हैं... दहकती दोपहरें भी अलसाई-सी लगती हैं... बचपन में इस मौसम में दिल नहीं लगता था... दादी जान कहा करती थीं कि ये हवाएं मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं... इसलिए मन उड़ा-उड़ा रहता है... और कहीं भी मन नहीं लगता... तब से दादी जान की बात मान ली कि इस मौसम में ऐसा ही होता है... फिर भी हमें जून बहुत अच्छा लगता है... दहकती दोपहरें, गरम हवाएं, धूल भरी आंधियां... और किसी की राह तकती वीरान सड़क... वाक़ई, सबकुछ बहुत अच्छा लगता है... बहुत ही अच्छा... जैसे इस मौसम से जनमों-जनमों का नाता हो... एक ख़ास बात यह है कि जून की शुरुआत ही हमारी सालगिरह यानी एक जून से होती है... और फिर उनकी सालगिरह भी तो इसी माह में है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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ईस्टर

ये त्यौहार ही तो हुआ करते हैं, जब लोग इकट्ठे होते हैं... एक-दूजे से मिलते हैं... कुछ अपनी कहते हैं, कुछ अपनी सुनाते हैं... हमारी कई सहेलियां हैं, जो विदेशों में रहती हैं... त्यौहार के मौक़े पर वे अपने मायके आती हैं और उनसे मुलाक़ात हो जाती है... ये त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखते हैं, बहुत-सी यादें ताज़ा हो जाती हैं... कई सहेलियों से मिलना,  वाक़ई कितना अच्छा लगता है... ये दिन बहुत प्यारे होते हैं, यादगार होते हैं, जिन्हें हम ज़िन्दगी की किताब में संजो कर रख लिया करते हैं...
आज ईस्टर है... ईस्टर संडे, गुड फ़्राइडे के बाद आने वाले इतवार को मनाया जाता है... ईसाई मान्यता के मुताबिक़ सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद तीसरे दिन यीशु (ईसा मसीह) दोबारा ज़िन्दा हो गए थे... ईस्टर ख़ुशी का दिन होता है... इस त्यौहार को ज़िन्दगी में नये बदलाव के प्रतीक के तौर पर मनाए जाने की रिवायत है. यीशु के चाहने वाले गिरजाघर जाते हैं, अपने ईष्ट को याद करते हैं, प्रभु भोज में शामिल होते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं...
आप सभी को ईस्टर मुबारक हो...

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पापा की बरसी


ज़िन्दगी में कुछ वाक़ियात ऐसे हुआ करते हैं, जो इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं... पापा का जाना भी एक ऐसा ही वाक़िया है... कहते हैं कि किसी लड़की का किसी मर्द से पहला प्यार, उसके वालिद से ही होता है... बिल्कुल सच है... पापा से हमें कितनी मुहब्बत है, इसका अहसास पापा के जाने के बाद ही हुआ...
पापा को इस दुनिया से गए छह साल हो गए हैं, लेकिन ये कल ही की बात लगती है... उस दिन 8 जुमादा उल अव्वल 1432 हिजरी का पीर की रात थी... अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से 11 अप्रैल 2011 थी... आज पापा की बरसी है...
पापा की याद को समर्पित एक नज़्म...

पापा
आप बहुत याद आते हो...
मैं जानती हूं
अब आप इस दुनिया में नहीं हो
लेकिन
दिल हरगिज़ ये मानने को राज़ी नहीं
कि आप इस दुनिया से चले गए...

पापा
आप आज भी मुझमें ज़िन्दा हो
हर आहट पर लगता है
आप आओगे और पूछोगे
मेरी शहज़ादी कैसी है...

पापा
आपसे बिछड़ कर
आपकी शहज़ादी बहुत उदास रहती है
क्योंकि
आपकी तरह उसे चाहने वाला कोई नहीं

पापा
उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा
जब आपकी शहज़ादी आपके पास होगी
और
फिर हम हमेशा साथ रहेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन...


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पापा ! आप बहुत याद आते हो...


बचपन में सुना था... जब कोई मर जाता है, तो वह तारा बन जाता है... आसमान में चमकता हुआ एक सितारा... यह बात साईंस से परे की है... सिर्फ़ मानने या न मानने की... रात में जब भी आसमान को देखते हैं, तो लगता है कि पापा भी सितारा बन गए होंगे... आसमान में चमकते अनगिनत सितारों में किसी एक सितारे के रूप में पापा भी होंगे... जो हमें देख रहे होंगे... बस हमने भी एक सितारा तलाश लिया... वही सितारा, जो चमेली के पास बैठने पर आसमान में अपने सबसे क़रीब नज़र आता है... चम्पा के महकते फूलों के गुच्छे के ठीक ऊपर... अब यह हर रोज़ का शग़ल बन गया है... चमेली के पास चटाई बिछाकर बैठ जाना और आसमान में चमकते सितारे को देखना... ऐसा लगता है, जैसे पापा भी रोज़ रात को हमारे आने का इंतज़ार करते हैं...
वो भी अपने पापा से इतना ही प्यार करते हैं, क्या वो भी अपने पापा को इस तरह आसमान में सितारों के बीच तलाशते होंगे... कभी पूछेंगे उनसे...
पापा ! आप बहुत याद आते हो... मिस यू...
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उनकी आंखें...



कुछ लोग ज़िन्दगी का हासिल हुआ करते हैं... वो भी हमारे ज़िन्दगी का हासिल हैं... उनकी तस्वीर हमेशा हमारी डायरी में रहती है... जब भी मन उदास होता है...हम उस तस्वीर को देखते रहते हैं... घंटों ऐसे ही बीत जाते हैं, पता नहीं चलता कि कब दोपहर से शाम हुई और कब रात से सुबह हो गई. अपनी पूरी उम्र उस तस्वीर को देखते रह सकते हैं...
कितनी सच्ची हैं उनकी आंखें... कितनी मुहब्बत है उन आंखों में... पापा की आंखों में भी बहुत मुहब्बत थी... जब भी कोई दिल दुखाता है, तो दिल चाहता है कि पापा की गोद में सर रख कर बहुत रोयें... पर हम ऐसा नहीं कर सकते... क्योंकि पापा तो क़ब्र में सो रहे हैं... काश ! हम भी पापा की क़ब्र में जाकर उनके सीने पर सर रख कर कुछ देर सुकून से सो सकते... जिस तरह बचपन में सोया करते थे...
पापा के जाने के बाद उनकी आंखों में वो मुहब्बत देखी,  जिसके आगे दोनों जहां की हर शय छोटी मालूम होती है... इसलिए उनके साये में हमारी रूह सुकून पाती है...


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दुआ, उन्हें दें


सबसे प्यारी दुआ वो हुआ करती है, जो महबूब के लिए की जाए...महबूब को दी जाए...
जब कोई हमें लंबी उम्र की दुआ देता है, तो दिल चाहता है कि उससे कह दें-
हमारे अज़ीज़ ! हमें लंबी उम्र की दुआ मत दो, क्योंकि हमारे होने या न होने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा... फ़र्क़ पड़ेगा, तो सिर्फ़ हमारे घरवालों और कुछ अपनों को...
लंबी उम्र की दुआ देनी है, तो उसे दो, जिसके होने न होने से एक दुनिया को बहुत फ़र्क़ पड़ता है... बहुतों की उम्मीदें उससे वाबस्ता हैं...
कुछ लोगों को ख़ुदा ने इतनी ताक़त बख़्शी है कि वे करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं...

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इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...


मेरे महबूब !
मुझे हर उस शय से मुहब्बत है, जो तुम से वाबस्ता है... हमेशा से मुझे सफ़ेद रंग अच्छा लगता है... बाद में जाना कि ऐसा क्यों था...तुम्हें जब भी देखा सफ़ेद दूधिया लिबास में देखा... लोगों के हुजूम में तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे चांद ख़ुद ज़मीं पर उतर आया हो... सच तुम इस ज़मीं का चांद ही तो हो, जिससे मेरी ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...

जब तुम परदेस में होते हो तो अपना देस भी बेगाना लगने लगता है...हर पल तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहता है...कभी ऐसा भी होता है कि परदेस ही अपना-सा लगने लगता है, क्योंकि तुम वहां जो हो...सच मुहब्बत भी क्या शय है, जो ख़ुदा के क़रीब पहुंचा देती है... जबसे तुम्हारी परस्तिश की है, तब से ख़ुदा को पहचाना है... हर वक़्त तुम्हीं को क़रीब पाया है... सावन में जब आसमां पर काली घटाएं छा जातीं हैं और फिर बारिश की बूंदें प्यासी धरती की प्यास बुझाती हैं... जाड़ों में कोहरे से घिरी सुबह क्यारियों में महकते गुलाब फ़िज़ां में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेर देते हैं...और गर्मियों  की तपती दोपहरों में धूल भरी आंधियां चलती  और सुलगती रातों में भी हर सिम्त तुम ही तुम नज़र आते हो... ख़ामोश शामें भी अच्छी लगती हैं और चांद-सितारों से सजी रात की महफ़िलों का शोर-शराबा भी तुम्हारी याद दिलाता है...
तुम्हारे बग़ैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता...

ख़्वाजा मुहम्मद ख़ां ताहिर साहब ने सच ही तो कहा है-
फिर ज़ुलैख़ा न नींद भर सोई
जबसे यूसुफ़ को ख़्वाब में देखा...

मुझे वो सड़क भी बेहद अज़ीज़ है, जो तुम्हारे शहर तक जाती है...वैसे मैं जहां रहती हूं, वहां से कई सड़कें तुम्हारे शहर तक जाती हैं...पर आज तक यह नहीं समझ पाई कि मैं किस राह पर अपना क़दम रखूं कि तुम तक पहुंच जाऊं...लेकिन दिल को एक तसल्ली ज़रूर है कि इन अनजान राहों में इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...
-फ़िरदौस ख़ान

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मेरे मसीहा...

कुछ लोग घने नूरे-इलाही की मानिंद हुआ करते हैं... उनसे मिलकर ज़िन्दगी के अंधेरे छंट जाया करते हैं... हमारी ज़िन्दगी में भी एक ऐसी ही रूहानी हस्ती शरीक हुई है... उन्हें समर्पित एक नज़्म...

मेरे मसीहा...
मेरे अज़ीज़, मेरे मसीहा
सोचती हूं
तुम्हें किस किस तरह पुकारूं

मेरे मसीहा
तुम्हारी रफ़ाक़त के साये में
मेरी बेचैन रूह सुकून पाती है...

तुम्हारी गुफ़्तगू की ख़ुशबू से
दिलो-दिमाग़ महक उठते हैं...

तुम्हारी अक़ीदत के नूर से
मेरी ज़िन्दगी रौशन है...

तुम पर हमेशा
अल्लाह की रहमत बरसती रहे
और
अज़ल से अबद तक
मैं तुम्हारे ज़ेरे-साये में रहूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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फ़ासला रहे तुमसे...

फ़्रिरदौस ख़ान
गुज़श्ता वक़्त का वाक़िया है... हमारे घर एक ऐसे मेहमान को आना था, जिनका ताल्लुक़ रूहानी दुनिया से है... हम उनके आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे... जिस दिन उन्हें आना था, वह नहीं आए... हम रातभर सो न पाये... फिर अगले दिन भी सुबह से ही उनके आने का इंतज़ार कर रहे थे... ऐसा पहले भी कई मर्तबा हुआ कि हमने उनके आने का इंतज़ार किया, मगर वह नहीं आए... दिल उदास हो गया, क्योंकि वह आएंगे ही, इसका ऐतबार हमें कम था...
अम्मी ने हमारी हालत देखकर कहा- परेशान मत हो... तुम्हारे लिए वह ’एक’ हैं... लेकिन उनके लिए तुम जैसे ’हज़ारों’ होंगे...
हमारी अम्मी ने वाक़ई कितना सही कहा था...

हमें माज़ी का एक वाक़िया याद आ गया... हमारी मुलाक़ात एक ’बुज़ुर्ग’ से हुई... वह हमारे शहर में पहली मर्तबा आए थे... हमने बहुत से लोगों ने उनकी मुलाक़ात कराई... वे लोग उन्हें अपने घर बुलाने लगे... जैसे-जैसे उन लोगों से उनकी क़रीबी हुई, उन्होंने हमारे घर आना बंद कर दिया... एक रोज़ हमने उनसे कहा कि आप हमारे शहर में आते हैं और हमसे बिना मिले चले जाते हैं... इस पर उन्होंने ऐसा जवाब दिया, जिसकी उम्मीद हमें क़तई नहीं थी... उन्होंने कहा, इस शहर में मेरे और भी चाहने वाले हैं...

नये वाक़िये ने पुराने वाकि़ये को फिर से सामने लाकर खड़ा कर दिया... अब अहद कर लिया है कि जिसके ’हज़ारों’ चाहने वाले होंगे, उससे फ़ासले से ही मिला करेंगे...

शाज़ तमकनत ने क्या ख़ूब कहा है-
कोई गिला कोई शिकवा ज़रा रहे तुमसे
ये आरज़ू है कि इक सिलसिला रहे तुमसे...
हर एक शख़्स की होती है अपनी मजबूरी
मैं उस जगह हूं जहां फ़ासला रहे तुमसे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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