कुछ यादें...

नज़्म
कुछ यादें
उन हसीं लम्हों की
अमानत होती हैं
जब ज़मीन पर
चांदनी की चादर बिछ जाती है
फूल अपनी-अपनी भीनी-भीनी महक से
फ़िज़ा को रूमानी कर देते हैं
हर सिम्त मुहब्बत का मौसम
अंगड़ाइयां लेने लगता है
पलकें
सुरूर से बोझल हो जाती हैं
और
दिल चाहता है
ये वक़्त यहीं ठहर जाए
एक पल में
कई सदियां गुज़र जाएं...
-फ़िरदौस ख़ान
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लोहड़ी, जो रस्म ही रह गई...

फ़िरदौस ख़ान
तीज-त्यौहार हमारी तहज़ीब और रवायतों को क़ायम रखे हुए हैं. ये ख़ुशियों के ख़ज़ाने भी हैं. ये हमें ख़ुशी के मौक़े देते हैं. ख़ुश होने के बहाने देते हैं. ये लोक जीवन का एक अहम हिस्सा हैं. इनसे किसी भी देश और समाज की संस्कृति व सभ्यता का पता चलता है. मगर बदलते वक़्त के साथ तीज-त्यौहार भी पीछे छूट रहे हैं. कुछ दशकों पहले तक जो त्यौहार बहुत ही धूमधाम के साथ मनाए जाते थे, अब वे महज़ रस्म अदायगी तक ही सिमट कर रह गए हैं. इन्हीं में से एक त्यौहार है लोहड़ी.
लोहड़ी उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा और पंजाब का एक प्रसिद्ध त्यौहार है. लोहड़ी के की शाम को लोग सामूहिक रूप से आग जलाकर उसकी पूजा करते हैं. महिलाएं आग के चारों और चक्कर काट-काटकर लोकगीत गाती हैं. लोहड़ी का एक विशेष गीत है. जिसके बारे में कहा जाता है कि एक मुस्लिम फ़कीर था. उसने एक हिन्दू अनाथ लड़की को पाला था. फिर जब वो जवान हुई तो उस फ़क़ीर ने उस लड़की की शादी के लिए घूम-घूम के पैसे इकट्ठे किए और फिर धूमधाम से उसका विवाह किया. इस त्यौहार से जुड़ी और भी कई किवदंतियां हैं. कहा जाता है कि सम्राट अकबर के जमाने में लाहौर से उत्तर की ओर पंजाब के इलाकों में दुल्ला भट्टी नामक एक दस्यु या डाकू हुआ था, जो धनी ज़मींदारों को लूटकर ग़रीबों की मदद करता था.
जो भी हो, लेकिन इस गीत का नाता एक लड़की से ज़रूर है. यह गीत आज भी लोहड़ी के मौक़े पर खूब गया जाता है.
लोहड़ी का गीत
सुंदर मुंदरीए होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
दुल्ले धी ब्याही होए
सेर शक्कर पाई होए
कुड़ी दे लेखे लाई होए
घर घर पवे बधाई होए
कुड़ी दा लाल पटाका होए
कुड़ी दा शालू पाटा होए
शालू कौन समेटे होए
अल्ला भट्टी भेजे होए
चाचे चूरी कुट्टी होए
ज़िमींदारां लुट्टी होए
दुल्ले घोड़ दुड़ाए होए
ज़िमींदारां सदाए होए
विच्च पंचायत बिठाए होए
जिन जिन पोले लाई होए
सी इक पोला रह गया
सिपाही फड़ के ले गया
आखो मुंडेयो टाणा टाणा
मकई दा दाणा दाणा
फकीर दी झोली पाणा पाणा
असां थाणे नहीं जाणा जाणा
सिपाही बड्डी खाणा खाणा
अग्गे आप्पे रब्ब स्याणा स्याणा
यारो अग्ग सेक के जाणा जाणा
लोहड़ी दियां सबनां नूं बधाइयां...
यह गीत आज भी प्रासंगिक हो, जो मानवता का संदेश देता है.
एक अन्य किवदंती के मुताबिक़ क़रीब ढाई हज़ार साल पहले पूर्व पंजाब के एक छोटे से उत्तरी भाग पर एक लोहड़ी नाम के राजा-गण का राज्य था. उसके दो बेटे थे, जो वे हमेशा आपस में लड़ते और इसी तरह मारे गए. राजा बेटों के वियोग में दुखी रहने लगा. इसी हताशा में उसने अपने राज्य में कोई भी ख़ुशी न मनाए की घोषणा कर दी. प्रजा राजा से दुखी थी. राजा के अत्याचार दिनों-दिन बढ़ रहे थे. आखिर तंग आकर जनता ने राजा हो हटाने का फैसला कर लिया. राजा के बड़ी सेना होने के बावजूद जनता ने एक योजना के तहत राजा को पकड़ लिया और एक सूखे पेड़ से बांधकर उसे जला दिया. इस तरह अत्याचारी राजा मारा गया और जनता के दुखों का भी अंत हो गया. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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सुर्ख़ फूल पलाश के...


फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं.
पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है. एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं.

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है.  इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है.

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं.
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.

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किताबे-इश्क़ की पाक आयतें...


मेरे महबूब
मुझे आज भी याद हैं
वो लम्हे
जब तुमने कहा था-
तुम्हारी नज़्में
महज़ नज़्में नहीं हैं
ये तो किताबे-इश्क़ की
पाक आयतें हैं...
जिन्हें मैंने हिफ़्ज़ कर लिया है...
और
मैं सोचने लगी-
मेरे लिए तो
तुम्हारा हर लफ़्ज़ ही
कलामे-इलाही की मानिंद है
जिसे मैं कलमे की तरह
हमेशा पढ़ते रहना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान




शब्दार्थ हिफ़्ज़ - याद करना
*तस्वीर गूगल से साभार
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दीदार...

तारीख़ 8 जनवरी 2017... इस्लामी हिजरी 1437, 9 रबीउल आख़िर,
दिन इतवार... वक़्त इशराक़... जगह दिल्ली...

हमारी एक रूहानी नज़्म
दीदार...
मेरे मौला !
न तू मुझसे ग़ाफ़िल
न मैं तुझसे ग़ाफ़िल
न तू मुझसे जुदा
न मैं तुझसे जुदा
तू मुझ में है
और मैं तुझ में...
दरमियां हमारे
कोई पर्दा न रहा
मैंने
कायनात के हर ज़र्रे में
तेरा दीदार किया है...
-फ़िरदौस ख़ान


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रूह की तस्कीन

मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं...

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं...

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...


मेरे महबूब !
अज़ल से अबद तक
ऐसा ही होता आया है
और
ऐसा ही होता रहेगा
मुहब्बत के नसीब में
हिज्र के दिन हैं
और
हिज्र की ही रातें हैं...

जान !
मैं नहीं जानती
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा
भी है या नहीं...

मैं सिर्फ़ ये जानती हूं
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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इंतज़ार

इंतज़ार के लम्हे कितने अज़ाब हुआ करते हैं... एक-एक लम्हा सदियों सा गुज़रता है... लगता है कि वक़्त कहीं ठहर गया है... आंखें सिर्फ़ उन्हें ही देखना चाहती हैं, कान उनकी दिलकश आवाज़ सुनने को तरसते रहते हैं... हवा का शोख़ झोंका उनके लम्स का अहसास बनकर रूह की गहराइयों में उतर जाता है... और फिर सारा वजूद कांप उठता है...
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नजूमी...


कुछ अरसे पहले की बात है... हमें एक नजूमी मिला,  जिसकी बातों में सहर था... उसके बात करने का अंदाज़ बहुत दिलकश था... कुछ ऐसा कि कोई परेशान हाल शख़्स उससे बात करे, तो अपनी परेशानी भूल जाए... उसकी बातों के सहर से ख़ुद को जुदा करना मुश्किल था...
उसने हमसे बात की... कुछ कहा, कुछ सुना... यानी सुना कम और कहा ज़्यादा... क्योंकि वह सामने वाले को बोलने का मौक़ा ही नहीं देता था... और सुनने वाला भी बस उसे सुनता ही रह जाए...
उसके बात करने का अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि इंसान चांद की तमन्ना करे, तो वो उसे अहसास करा दे कि चांद ख़ुद उसके आंचल में आकर सिमट जाए...
चांद तो आसमान की अमानत है, भला वह ज़मीन पर कैसे आ सकता है... ये बात सुनने वाला भी जानता है और कहने वाला भी...
लेकिन चांद को अपने आंचल में समेट लेना का कुछ पल का अहसास इंसान को वो ख़ुशी दे जाता है, जिसे लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता... चांद को पाने के ये लम्हे और इन लम्हों के अहसास की शिद्दत रूह की गहराइयों में उतर जाती है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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रूह परदेस में

मेरे महबूब !
जिस्म देस में है
और
रूह परदेस में...
-फ़िरदौस ख़ान

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