इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...फ़िरदौस ख़ान

अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...
यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो उसे दोज़ख की आग का क्या खौफ़...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है... इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है... इश्क़ में रूहानियत होती है... इश्क़, बस इश्क़ होता है... किसी इंसान से हो या ख़ुदा से...

हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...

बुजुर्गों से सुना है कि शायरों की बख्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना...शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते...उन्हें दोज़क़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे दोज़क़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है...जब हम अपने महबूब (चाहे वो काल्पनिक ही क्यूं न हो) से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी दोज़क़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?

बंदे को तो अपने महबूब (ख़ुदा) की दोज़ख भी उतनी ही अज़ीज़ होती है, जितनी जन्नत... जिसे इश्क़ की दौलत मिली हो, फिर उसे कायनात की किसी और शय की ज़रूरत ही कहां रह जाती है, भले ही वो जन्नत ही क्यों न हो...


जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए तो वो ख़ुद ब ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है... इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है... जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है...
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मन से उगते हैं अग्निगंधा के फूल...


हमारा प्यारा भाई है अरुण...यानी अरुण सिंह क्रांति...वह जितना अच्छा इंसान है, उतना ही उम्दा लेखक भी है...हम समझते हैं कि किसी भी इंसान को अच्छा लेखक, अच्छा कवि,  अच्छा कलाकार (या अच्छा कोई और) होने से पहले एक अच्छा इंसान होना चाहिए...क्योंकि एक अच्छा इंसान ही अच्छा लेखक, अच्छा कवि, अच्छा कलाकार (या अच्छा कोई और) हो सकता है...हमें अपने भाई अरुण पर नाज़ है...ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम लोग मिलते हैं, जिन पर हम गर्व कर सकें...भाई अरुण में बहुत सी ख़ूबियां हैं... हाल में अरुण की एक किताब प्रकाशित हुई है...इस किताब की भूमिका हमने ही लिखी है...और इस किताब की समीक्षा भी लिखी है...           

उषाकाल का केसरिया आकाश. श्वेत रंग के बाड़े से टेक लगाए एक हल्का आसमानी रंग का पहिया. बाड़े के अंदर हरी, मखमली, कुछ पंक-युक्त घास. एक सूखा वृक्ष, जिससे झड़े आग्नेय-वर्णी पुष्पों को चुनकर टोकरी में एकत्रित करता एक बालक. युवा कवि अरुण सिंह क्रांति के पहले काव्य-संग्रह अग्निगंधा के फूल का ऐसा शानदार आवरण बरबस ही पुस्तक को उठाकर उसके पृष्ठ टटोलने को बाध्य करता है.
कवि के पिता, माता और गुरु के चरणों में समर्पित इस काव्य संग्रह की प्रस्तावना में कवि ने अपने अंदर एक कवि के जन्म लेने का कारण मातृ प्रेरणा बताया है. कवि के मन में लीक से हटकर कुछ करने की भावना रही. इसे उसने बखूबी अंजाम भी दिया है.
अरुण सिंह क्रांति का परिचय दिया जाए, तो वह मन से एक कवि, शौक़ से एक लेखक, पेशे से पत्रकार, परंपरा से ज्योतिषी, अनुवांशिकता से गणित के कोच और आत्मा से एक क्रांतिकारी हैं.
प्रस्तुत काव्य-संग्रह में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो अपने आप में विरली हैं. पहला तो कविताओं का एक विशेष क्रम है. कवि ने पुस्तक का आरंभ मां से किया है, और उपसंहार भी मां से ही किया है. कविताओं की क्रमश: योजना में पहले मां, फ़िर ज्ञान की देवी सरस्वती, फ़िर गुरु, फिर राष्ट्र और समाज, फ़िर नारी-शक्ति, फ़िर एक ऐतिहासिक प्रसंग को स्पर्श करते हुए कवि अपने हृदय के स्पंदनों को काव्य-रूप देता हुआ, प्रेम की हर अभिव्यक्ति को शब्द देता है. कवि सौंदर्य, मन के मंथन, कवि होने का गर्व, आत्म-आलोचना, एक मृत्यु पत्र लिखने के बाद अपनी कविताओं में अग्निगंधा का मर्म बताते हुए फ़िर से मां तक पहुंच जाता है. मां से मां तक की यह यात्रा देखकर ऐसा लगता है, मानो कवि अपने अंतर-ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा कर फ़िर से अपने मूल पर, अपने जीवन-स्त्रोत पर लौट आया हो.
दूसरी विशेषता है, हर कविता के साथ संलग्न एक प्रासंगिक रेखाचित्र. विभु दत्ता द्वारा बनाए ये रेखाचित्र भी जीवंत लगते हैं और अपने-अपने काव्य-विशेष का पूरा मर्म समेटे जान पड़ते हैं.
तीसरी विशेषता है, हर कविता के अंत में बने छोटे-छोटे चिन्ह इन चिन्हों के प्रयोग से कवि में छिपी वैज्ञानिकता का आभास होता है. हर चिन्ह अपनी कविता का मूल-भाव स्पष्ट करता है.
चौथी विशेषता है, पुस्तक का शीर्षक, जिसमें अग्निगंधा शब्द का प्रयोग किया गया है. अग्निगंधा-काव्य को समझाते हुए कवि ने एक कविता में लिखा है-
काव्य नहीं ये मन की
झंझावात से उड़ती धूल है
द्रव्य-भावना नहीं
ये लौह-मनस के चुभते त्रिशूल हैं
न समझो इन शब्दों को
भावुक रचना, श्रृंगार-सी
इन शब्दों में मेरे मन की
हर चाह, दाह और आह बसी
मथित-मन में ये महकते
अग्निगंधा फूल हैं
दग्ध-दिल के ये दहकते
अग्निगंधा फूल हैं
पुस्तक के शीर्षक के संबंध में कवि अरुण ने गूढ़ दार्शनिक भाषा में स्पष्ट किया है- जब भी मन में कोई सामयिक या आकस्मिक अंधेरा व्याप्त होता है, जिसमें सभी मार्ग दिखने बंद हो जाते हैं और बाह्य-जगत का कोई भी पदार्थ वहां रोशनी नहीं कर पाता, तो मैं स्वयं का ही मन जलाता हूं, जिससे एक अग्निगंधा का वृक्ष पनपता है, जिसके प्रकाश और सुगंध लिए फूलभभविषय के लिए मेरे लक्ष्य की ओर जाने वाले मार्गों को प्रकाशयुक्त और सुगंधित बनाते हैं और जिसकी लकड़ी दीर्घ-काल तक मार्गों को प्रकाशित बनाए रखने के लिए जलाने के काम भी आती है. जब ये पुष्प और लकड़ी समाप्त या कम होने लगती है, तो मैं फिर से मन को जलाता हूं.
पांचवीं और महत्वपूर्ण विशेषता है, कवि कीभभाषा-शैली और विषय की विविधता. जहां एक ओर कवि ने संस्कृत-निष्ठ हिंदी का छंदबद्ध प्रयोग किया है, वहीं कई स्थानों पर एक उन्मुक्त खड़ी बोली का भी सुंदर तालमेल देखने को मिलता है. अरुण की कविताओं में श्रृंगार रस, करुण रस, रौद्र रस, वीर रस व शांत रस का अद्‌भुत संयोग है. रचनाएं विभिन्न प्रतीकों और लगभग सभी प्रमुख अलंकारों से परिपूर्ण हैं. कहीं उच्चकोटि का नाद-सौंदर्य, तो कहीं मनभभावन शब्द-सौंदर्य दिखता है और विषय की विविधता भी शानदार है. कवि ने एक ही पुस्तक में किसी शहीद के प्रेम पत्र से लेकर शहीदों की राख के शोधन, देशभक्ति का व्यवसायीकरण, जलियावाला बाग की आत्म वेदना, आतंकवाद की आलोचना, सांप्रदायिक-सद्‌भाव, देश के विभाजन का दर्द, प्रतिभा-पलायन की विडंबना, सत्य की विजय का विश्वास, एक नए समाज को बनाने का स्वप्न, नारी-शक्ति का गुणगान, रावण की आत्मग्लानि, प्रेमिका से प्रणय-निवेदन, विरह-वेदना, वसंत और फाग के सौंदर्य से लेकर अपने मन में छिपे देवत्व और पशुत्व, दोनों की विवेचना को स्थान दिया है.
पुस्तक के मूल-भाव के बारे में प्रकाशक का कहना है-कवि की रचनाओं में मुख्य सरोकार हैं, मातृभक्ति, राष्ट्रीयता, प्रेम, मानस-मंथन और आत्मबोध. यह भी कहा जा सकता है कि ये उनकी काव्य-सृष्टि के पंच-तत्त्व हैं. कहीं स्वतंत्र रूप में, तो कहीं सम्मिलित होकर ये तत्व उनकी रचनाओं को अलंकृत करते हैं. ये शब्द ही अपने आप में कवि की रचनाओं में उत्कृष्ट विविधता के प्रमाण हैं. बेशक, यह पुस्तक शब्दों के इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कविताओं का एक ऐसा संग्रह है, जिसे कोई भी बार-बार पढ़ना चाहेगा और जितना पढ़ता जाएगा, उतने ही नए अर्थ और भाव सामने आते जाएंगे.

कृति : अग्निगंधा के फूल
विधा : कविता
कवि : अरुण सिंह क्रांति
प्रकाशन : सिनमन टील प्रकाशन, गोवा
मूल्य : 250 रुपये
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सुर्ख़ गुलाबों का दिन...


मेरे महबूब! 
आज रोज़ डे है... सुर्ख़ गुलाबों का दिन...महकती यादों का दिन...सोचती हूं कि तुम्हें गुलाब कैसे भेजूं...तुम तो बहुत दूर हो... शायद तुम्हें याद भी नहीं होगा कि आज रोज़ डे है...लेकिन मुझे तो याद है...आज का दिन...बहरहाल तुम्हारे हिस्से के गुलाब तो तुम्हें मिल ही जाएंगे... नेक दुआओं के साथ... हमें तो मिल ही चुके हैं हमारे गुलाब...तुम्हारी मुहब्बत के रूप में... 
मेरे महबूब... हम जानते हैं कि इस वक़्त हमसे ज़्यादा इस मुल्क को तुम्हारी ज़रूरत है...हम भले ही तुमसे दूर हैं, लेकिन रूहानी तौर पर हर वक़्त तुम्हारे साथ हैं...दुआ करते हैं कि तुम फ़तह हासिल कर अपने घर लौटो...
 
करूं न याद अगर किस तरह भुलाऊं उसे
ग़ज़ल बहाना करूं और गुनगुनाऊं उसे
वो ख़ार-ख़ार है शाख़े-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूं  फिर भी गले लगाऊं उसे... 
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मुहब्बत से महकते ख़त...



ख़त...सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं...जब भी इन्हें पढ़ो तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है...मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो...और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो... ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है...उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें... दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़...सीधे दिल में उतर जाते हैं...अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो...मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं...और फिर यूं ही उम्र बीत जाए...

कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा तो तुम पर निसार होने को जी चाहा...क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी...लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली...और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया...किसी बेल-बूटे की तरह...कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया...कि 'तुम' मेरे हो...

एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस खुनक (ठंडक ) को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान


तस्वीर गूगल से साभार
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कगवा बिन सूनी है अपनी अटरिया...


अला या बरावल बैनिहल अंता मुख़बिरी 
फ़हल ख़ुबूंमिल ग़ायबीन तुबशिशारेन...         
यानी... ऐ कांव-कान की रट लगाने वाले फ़क़ीर कौवे! आज तू किसी दोस्त से जुदा होने की ख़बर लाया है...या किसी बिछड़े दोस्त के मिलने की ख़ुशी दे रहा है... 

कौवे की आवाज़ आज भी बहुत भली लगती है...बिलकुल अपने बचपन की तरह... बचपन में देखा था-जब भी कौवा बोलता था...दादी जान कहती थीं कि आज ज़रूर कोई मेहमान आने वाला है...पूछने पर वो बतातीं थीं कि कौवा जब भी मुंडेर पर बोले तो समझ लो कि घर में कोई आने वाला है...दादी जान की इस बात पर भरोसा कर हम सोचने लगते कि ज़रूर ननिहाल से कोई आने वाला है...शाम को दादी जान कहतीं- देखो मैंने कहा था न कि कोई मेहमान आएगा...यह इत्तेफ़ाक़ ही था कि जिस दिन दादी जान ऐसा कहतीं कोई न कोई आ ही जाता...वैसे हमारे घर मेहमानों का आना-जाना रोज़ का ही था...दादा जान शहर की एक जानी-मानी हस्ती जो थे...लेकिन हमें तो अपने मामा का इंतज़ार रहता था...वैसे भी कहते हैं- चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा...मामा कहा करते हैं कि 'मामा' में दो 'मा' होते हैं, इसलिए वो मां से दोगुना प्यार करते हैं अपने भांजी-भांजों से... यह सही भी है...हमें अपने ननिहाल से बहुत ही प्यार-दुलार मिला है...

कौआ...एक ऐसा स्याह परिंदा जिसने गीतों में अपनी जगह बनाई है...आज भी कौवे को बोलता देखते हैं तो दादी जान की बात याद आ जाती है...फ़र्क़ बस इतना है कि तब मामा का इंतज़ार होता था...और आज न जाने किसका इंतज़ार है...
सच!  कौवा भी किसी क़ासिद की तरह ही नज़र आता है, जब किसी का इंतज़ार होता है...
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नारी का मन...


फ़िरदौस ख़ान
एक नारी का मन प्रेमियों के बिना शायद स्थिर नहीं रह पाता...क्या यह सच है...क्या नारी का मन सचमुच इतना चंचल होता है कि उसे स्थिर रखने के लिए एक पुरुष की ज़रूरत पड़ती है...  क्या नारी बंधन में ही सुख पाती है...बंधन भी ऐसा जिसमें वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से बंधती है...या फिर वह किसी पुरुष को बांधे रखना चाहती है...
        
प्रसिद्ध इतालवी लेखक रोबर्तो कलासो की किताब 'क भारतीय मानस और देवताओं की कहानियांमें अर्जुन के एक साल के अज्ञातवास का ज़िक्र करते हुए रोबर्तो कलासो लिखते हैं- "एक वर्ष कठिनाई भरासंघर्ष पूर्णबुरी तरह थका देने वालालेकिन आवेगपूर्ण था. संध्या समय कन्याओं का एक छोटा समूह उन्हें घेरकर बैठ जाता और वह दैत्योंराजाओंराज कन्याओं और योद्धाओं की मनोरंजक कथाएं सुनाते. लड़कियां उन्हें सारा समय घेरे रहतीं और उनका नृत्य मुद्राओं तथा हाव-भाव का अनुसरण करतीं. दिन का समय प्राय: नृत्यशाला में बीतता था. विराट एक समृद्ध राज्य का राजा थाकिंतु समस्याएं भी अनेक थीं. सबसे बड़ी समस्या तो बेटी उत्तरा स्वयं थी. अर्जुन ने मन ही मन प्रण किया कि वह उत्तरा को स्पर्श तक नहीं करेंगेलेकिन न जाने क्या बात थीदोनों का समय अधिकतर साथ-साथ ही बीतता था. अर्जुन ने अपने मन को बस इतना ही अधिकार दिया था कि वह उत्तरा को लेकर कल्पना का ताना-बाना बुन सकते थे. उत्तरा के लिए तो स्थिति और भी दारुण थी. अभी तक वह बहुत छोटी थी-किसी बच्ची जैसीजो अपने अदृश्य  प्रेमी के घेरे से बाहर आ रही थी धीरे-धीरे. सर्वप्रथम उसे प्राप्त करने वालों में था सोम. फिर आया गंधर्व. तीसरे अदृश्य पति थे अग्नि और चौथा एक मनुष्य हो सकता था. एक नारी का मन प्रेमियों के बिना शायद स्थिर नहीं रह पाता. वह पहले सोम के साथ रहती रहीफिर गंधर्व और फिर अग्नि के साथ. अब एक मानव प्रेमी की प्रतीक्षा कर रही थी. वह कोई भी हो सकता था. उस मनुष्य की खोज अर्जुन में पूरी हो गई जो उत्तरा को नृत्य-संगीत की शिक्षा दे रहे थे. लेकिन अर्जुन के लिए इतना ही पर्याप्त थाइससे अधिक कुछ नहीं. वह उत्तरा की अति निकटता के बचकर चलते थे. उत्तरा ने दुख भरे स्वर में कहाआप तो किसी गंधर्व से भी दुर्लभ हैं और देवताओं से भी अधिक अप्राप्य. आप भले ही मुझसे दूर-दूर रहेंमैं तो आप में समाई हूं...कहते-कहते वह रो पड़ी. इस रूदन में दुख नहींगहन आनंद की अनुभूति बोल रही थी. अर्जुन अब समझ सके कि उर्वशी ने उनसे कैसा भयानक प्रतिशोध लिया है. क्योंकि उन्होंने उर्वशी को अपनी मां समझते हुए ठुकरा दिया था. इसलिए उन्हें उत्तरा को भी अस्वीकार करना थाअपनी बेटी मानकर."   

बंधन...आख़िर बंधन ही होता है... भले वह प्रेम का ही क्यों न हो... मन तो चंचल है...और वो अरमानों के पंखों के साथ सपनों के आसमान में उड़ान भरने को आतुर रहता है... 
क्या प्रेम सिर्फ़ एक बार ही होता है...या फिर बार-बार हो सकता है...उत्तरा ने कई बार प्रेम किया...अलग-अलग पुरुषों से...सभी के साथ वह संतुष्ट रही... क्या कोई महिला अपने प्रेमी या साथी के बिछड़ने पर उम्रभर उसका शोक मनाती रहे...या उसे भी नया प्रेमी या साथी तलाश लेना चाहिए... 
अपने सहकर्मी पुरुष के एक सवाल के जवाब में एक लड़की ने जवाब दिया-मैं बॉय फ्रेंड नहीं पालती... एक दूसरी लड़की का कहना था कि बॉय फ्रेंड परेशानी का सबब बन जाते हैं...यानी रोक-टोक लगाना... इससे न मिलो, उससे बात न करो...ख़ुद भी कोई काम नहीं करके देंगे...और किसी दूसरे से काम कराने पर उसमें हज़ार ऐब निकाल देंगे... इसलिए बॉय फ्रेंड रखकर कौन मुसीबत मोल ले... एक और लड़की कहती है-जब तक किसी के साथ संबंध मधुर है, तब तक तो ठीक है...लेकिन जैसे ही रिश्ते में कटुता आने लगे तो बेहतर है कि ऐसे रिश्ते को तोड़ दिया जाए... 

मेरी एक दोस्त की खाला को किसी लड़के से प्रेम हो गया... लड़के के घरवालों को रिश्ता मंज़ूर नहीं था...वजह लड़की उनकी ज़ात की नहीं थी... कुछ वक़्त बाद लड़के ने अपने घरवालों की पसंद से शादी कर ली, लेकिन खाला ने शादी नहीं की... उस लड़के का आज भरा पूरा परिवार है...बीवी है, बच्चे हैं... वह लड़का तो अपनी नई ज़िन्दगी में मस्त हो गया...लेकिन उम्र के आख़िरी पड़ाव में वो अकेले ही दिन गुज़ार रही हैं... आख़िर इस प्यार ने उन्हें क्या दिया...? अगर वह भी अपना नया साथी चुन लेतीं तो शायद आज उनकी ज़िन्दगी इतनी वीरान नहीं होती... आख़िर नारी का मन ऐसा क्यों होता है...?

क़रीब दो साल पहले मेरी दोस्त की शादी हुई है...उसे भी एक लड़के से प्रेम था...दोनों की ज़ात अलग थी... लड़के में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो समाज की ज़ात-बिरादरी की दीवार तोड़ कर उसे अपना पाता... मेरी दोस्त बहुत रोती थी, इसलिए कि उसे बुज़दिल लड़के से प्रेम हुआ...आख़िर वह रोती भी कितने दिन... उसने अपने घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली...  

सोचती हूं कि कौन सही है...? किसी के बिछड़ने पर उम्रभर उसके ग़म में डूबी रहने वाली खाला या नया साथी चुनकर ज़िन्दगी  के  रास्ते पर आगे बढ़ जाने वाली दोस्त... बेशक, दोस्त ही सही है...क्योंकि ज़िन्दगी तो एक बार ही मिलती है...फिर उसे किसी ऐसे व्यक्ति के लिए क्यों बर्बाद किया जाए, जो या तो तुम्हें छोड़कर चला गया है...या वो कभी तुम्हारा हो ही नहीं सकता...

तस्वीर : गूगल से साभार  
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हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार...



आज जब मेल देखा तो...एस साहब की एक तहरीर मिली...एस साहब पिछले काफ़ी अरसे से हमारी तहरीरें पढ़ते हैं... मेल भी करते रहते हैं...कई बार जवाब न पाकर नाराज़ भी होते हैं...फिर मुआफ़ी मांगने पर मुआफ़ भी कर देते हैं... कभी-कभार फ़ोन पर भी बात हो जाती है...एस साहब एक नेक दिल इंसान हैं...उनसे बात करके हमेशा अच्छा लगता है...बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जिनसे बात करके मुसर्रत हासिल होती है...वरना आज की मशीनी ज़िन्दगी में कहां वक़्त होता है किसी से गुफ्तगू करने का...ज़रूरत पड़ने पर ही किसी को फ़ोन किया जाता है...या फिर कुछ रिश्ते निभाने के लिए मजबूरन फ़ोन करना पड़ता है...
बहरहाल, बात नज़्म की पिछले दो दिन से एस साहब से बात नहीं हो पाई...लेकिन इसका फ़ायदा ही हुआ...हमें एक बेहतरीन नज़्म पढ़ने को मिल गई...पेश है एस साहब की नज़्म-

हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार...

तुम्हारे न होने वाला मेरा ये दिन
इर्दगिर्द मेरे हो निर्जन समंदर...
पास से दूर दूर तक फैला... दूर आसमां छूता.
आसपास की हवाओं में तुम्हारी आहट का इंतज़ार...
दिन भर था
और दिन अघटित-सा गुज़रता भी रहा...
मुझे मालूम है जीना है मुझे, यूं  ही...
पर तुम्हारा कुछ पल मुझसे  बात कर लेना,
या एक मेल  ही भेजना...
जीने के लिए  नाकाफ़ी तो नहीं
दूरियों का अहसास है, भौगोलिक भी  बद्ध भी...
फिर क्यों कुछ मांग सकूं तुमसे,  मेरे वश में जो  नहीं.
सब कुछ असंभव सा ही तो है
और आशंका  तुम्हारे भीतर तो कहीं  भी नहीं...
पर क्या  अगर  कोई पसंद आ  जाए किसी को
उसकी नियती उसे पा लेना ही  तो नहीं...
पर फिर भी तुम्हारी कुछ लम्हों की  रिश्ता निभाई
मुझ में दिन भर की  खुशी छोड़  जाए...
जो खुशी मुझे  टूंकी या लंबे अंतराल सी भी  लगे...
खुशी जिसे मैं खींचता चलूं दिन की शाम तक या देर रात तक.
या फिर कुछ और देर तक ...
मैं यह भी जानूं
तुम्हारी ज़िंदगी का किनारा कहीं ओर है.
यह मैं जानूं
पर तुम्हें तो मालूम ही है...आधिकारिक तौर पर
असमंजस में तो मैं रहूं...
पर यही तो होना है
मेरे चाहने  न चाहने से क्या होगा...
एक वक़्त वो भी तो आएगा जब मेरी चाह दरकिनार हो जाएगी,
अनायास सहज ही...
और बचे रहेंगे
छोटे-छोटे अहसासों के हरे-हरे लम्हे
जो तुमने ही कभी-कभार  डाले थे
मेरी झोली में...
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