तुम्हारे नाम का कलमा...

मेरे महबूब
मेरी ज़िन्दगी का
जब आख़िरी लम्हा आए
मेरे होंठों पे
तुम्हारे नाम का कलमा आए...
-फ़िरदौस ख़ान

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आख़िरी लम्हे

मेरे महबूब !
मैं अकसर ज़िन्दगी के उन आख़िरी लम्हों के बारे में सोचा करती हूं, जब मौत सिरहाने ख़ड़ी होगी... सांसें थम रही होंगी... धड़कनें भी धीमी हो जाएंगी... ख़ून रगों में जमने लगेगा और जिस्म ठंडा पड़ना शुरू हो जाएगा...
उस वक़्त मैं किस हाल में रहूंगी... तुम्हें लेकर क्या कुछ दिलो-दिमाग़ में चल रहा होगा... क्या उस वक़्त तुम मेरे क़रीब रहोगे... मेरा हाथ अपने हाथ में थामे... तुम्हारी निगाहें मुझसे क्या कुछ कह रही होंगी...

या मेरी निगाहें तुम्हें ढूंढ रही होंगी... आख़िर तुम्हें पाने के लिए मुझे कितने जनम लेने होंगे... जन्म-जन्मांतर मेरे वजूद पर सिर्फ़ तुम्हारा ही हक़ रहेगा...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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अमलतास... तपती धूप में सड़कों के किनारे लगे अमलतास के दरख़्त कितने भले लगते हैं... पीले फूलों के गुच्छे मानो अपने पास बुला रहे हों और कह रहे हों-
ओ राही ! आओ, कुछ देर हमारे साये में सुकून पा लो... फिर अपने सफ़र पर आगे बढ़ जाना...
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सफ़र

कभी-कभी इन क़दमों को सफ़र भी कितने रास आते हैं... ये ज़िन्दगी भी तो एक सफ़र ही है... एक ऐसा सफ़र जिसकी मंज़िल का कहीं कोई पता नहीं... बे मक़सद-सी, बे मतलब सी ज़िन्दगी... एक ऐसी ज़िन्दगी जैसे किसी को सेहरा में फेंक दिया हो, हर तरफ़ रेत ही रेत... मुसाफ़िर कहां जाए, और कहां न जाए... या फिर किसी गहरे समंदर में फेंक दिया हो... दूर तक सिर्फ़ पानी ही पानी है... कहीं कोई किनारा ही नज़र नहीं आता... लेकिन रेगिस्तान में भटकना तो है, समंदर में डूबते-डूबते तैरना है और तैरते-तैरते डूबना है... आख़िर ये सफ़र कभी न कभी, कहीं न कहीं जाकर ख़त्म तो होगा ही...

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मां! तुझे सलाम...


बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनकी मां उनके पास होती है...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनके साथ उनकी मां की दुआएं होती हैं...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जो दूसरों की मां की भी इज़्ज़त करते हैं, और उनसे दुआएं पाते हैं...
लेकिन 
बहुत बदनसीब होते हैं वो लोग, जो न अपनी मां की इज़्ज़त करते हैं और न ही दूसरों की मांऑं की...
आज मदर डे हैं...हम अपनी अम्मी से दूर हैं...बहुत दूर...लेकिन दिल के बहुत क़रीब हैं...हम बहुत ख़ुशनसीब हैं कि अम्मी की दुआएं हमारे साथ हमेशा रहती हैं...आज भी सुबह सबसे पहले हमने अपनी अम्मी को ही फ़ोन किया...
उनके  लिए ख़ुश हैं कि वो अपनी मां के साथ हैं...
आप सभी को मदर डे की दिली मुबारकबाद...

मां! तुझे सलाम... 
-फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी  सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा  उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन... (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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पूरे चांद की रात

आज पूरे चांद की रात है... हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती हुई... अंगनाई में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को और रूमानी बना रहे हैं... नींद आंखों से कोसों दूर है... पिछले कई दिन से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई... चांद आसमान में मुस्करा रहा है...उसकी दूधिया चांदनी अंगनाई में बिखरी हुई है... शाख़ें हवा से झूम रही हैं... गर्मी के मौसम के बावजूद हवा में ठंडक है... बादलों के दूधिया टुकड़े आसमान में कहीं-कहीं तैर रहे हैं... लेकिन जिन्हें दिल ढूंढ रहा है, बस वही नहीं हैं...
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ताजिर...

मेरे महबूब
बहुत बड़े ताजिर हो तुम
जो भी तुम्हें देखे
बिन मोल
ख़ुद-ब-ख़ुद बिक जाता है...
-फ़िरदौस ख़ान

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उसे कैसे पता...

कई बरस पहले का वाक़िया है... हम अपनी भाभी के घर आए हुए थे... वहां हमने दुआओं की एक किताब देखी... हमें किताब बहुत अच्छी लगी... किताबों से हमें बहुत लगाव है... अगर किताब दुआओं की हो, तो फिर बात ही क्या है... उन्होंने हमें पढ़ने के लिए वो किताब दे दी... हम उसे हर रोज़ पढ़ने लगे... हमारी एक सहेली ने वो किताब देखी, तो कहा कि उसे भी यह किताब चाहिए... हम उसके साथ जामा मस्जिद गए. किताबों की तकरीबन सभी दुकानें छान मारीं, लेकिन वो किताब नहीं मिली... दुकानदारों ने बताया कि अब यह किताब नहीं मिलती...  हमारी सहेली ने उस जैसी एक किताब ले ली...

कुछ माह पहले हमारी भाभी ने कहा कि उन्हें वो किताब पढ़नी है... यानी उन्हें अपनी किताब वापस चाहिए थी... अब दुआओं की इस किताब से बिछड़ने का वक़्त आ गया था... हमें बिल्कुल ऐसी ही किताब चाहिए थी... लेकिन ऐसी किताब तो कहीं मिली ही नहीं थी... यह सोचकर दिल उदास हो गया...

एक रोज़ हम अपनी भाभी के साथ उनकी बहन के घर गए... वहां हमने बिल्कुल उस जैसी किताब देखी... भाभी ने बताया कि बहुत साल पहले ये किताबें किसी ने तक़सीम की थीं... किताब बिल्कुल नई थी, यानी उसे पढ़ा नहीं जाता था... हमने हौले से अपनी भाभी से पूछा कि अगर ये किताब पढ़ी नहीं जाती है, तो क्या ये हमें मिल सकती है, हम इसका हदिया दे देंगे... उन्होंने कहा कि वह किताब नहीं देंगी...

ख़ैर, हमारा ज़ेहन इस किताब से हट ही नहीं रहा था... हमें यही किताब चाहिए थी, इस जैसी नहीं... किताब की चाह में हम फिर से जामा मस्जिद गए... किताबों की दुकानों पर इसे तलाशा... हर जगह बस यही जवाब मिला कि यह किताब अब नहीं मिलती... हमने सोचा कि जिस जगह ये किताब शाया हुई थी, वहीं जाया जाए... हम वहां भी गए, लेकिन वहां भी नाकामी ही हासिल हुई... हम मायूस होकर वापस जामा मस्जिद आ गए... हम सड़क किनारे खड़े थे...
एक शख़्स ने पूछा, क्या चाहिए... हमने कहा कि दुआओं की किताब... वो शख़्स किताब की एक दुकान के अंदर गया और हमें किताब लाकर दे दी... हमने जैसे उसे खोला, उसने हमसे कहा, "ये वही किताब है न, जो आप हर रोज़ पढ़ती हैं..."

इस किताब का हदिया उन किताबों से आधे से भी कम था, जो उस ’जैसी’ किताबें थीं... हालांकि वो इस किताब के आसपास भी नहीं ठहरती थीं... हम कुछ देर जामा मस्जिद घूमने के बाद उस दुकान में गए, जहां से वो किताब लाई गई थी... हमने दुकानदार से उस किताब के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि उनके पास ऐसी कोई किताब नहीं है... इसके बाद हम ख़ुशी-ख़ुशी किताब लेकर घर आ गए...

जब किताब पढ़ने बैठे, तो उस शख़्स के वही बोल कानों में गूंज उठे, "ये वही किताब है न, जो आप हर रोज़ पढ़ती हैं..."
आख़िर उसे कैसे पता कि हम हर रोज़ यही किताब पढ़ते हैं...?
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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मज़दूर दिवस


आज मज़दूर दिवस है... यानी हमारा दिन... हम भी तो मज़दूर ही हैं... हमें अपने मज़दूर होने पर फ़ख़्र है... हमारे काम के घंटे तय नहीं हैं.... सुबह से लेकर देर रात तक कितने ही काम करने पड़ते हैं... यह बात अलग है कि हमारा काम लिखने-पढ़ने का है... इसके अलावा हम घर का काम भी कर लेते हैं... घर की साफ़-सफ़ाई, कपड़े-बर्तन धोना, खाना बनाना जैसे काम भी अकसर करने पड़ते हैं... किसी का ख़ून चूसकर अपनी तिजोरियां भरकर 'अमीर’ कहलाने से कहीं बेहतर है 'मज़दूर’ हो जाना...

सभी मेहनतकशों से कहना चाहेंगे कि अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते रहना.. हक़ सिर्फ़ मांगने से नहीं मिलता, उसे हासिल किया जाता है... मेहनत कभी ज़ाया नहीं जाती...
बक़ौल साहिर लुधियानवी-
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी...
-फ़िरदौस ख़ान 



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तेरा हिज्र

जो रूह में बसा हो... उसका साथ होना क्या और दूर होना क्या... मुहब्बत तो दिल से हुआ करती है, रूह से हुआ करती है... ऐसे में दूरियां कोई मायने नहीं रखती...
निदा फ़ाज़ली साहब ने भी क्या ख़ूब कहा है-
तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है...

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