तुम्हें कौन-से फूल भेजूं...

फिरदौस खान
फूल…फ़िज़ा में भीनी-भीनी महक बिखेरते रंग-बिरंगे फूल किसी का भी मन मोह लेने के लिए काफ़ी हैं…सुबह का कुहासा हो या गुलाबी शाम की ठंडक…पौधों को पानी देते वक़्त कुछ लम्हे बेला, गुलाब और चंपा-चमेली के साथ बिताने का मौक़ा मिल ही जाता है…गुलाबों में तो अभी नन्हीं कोंपलें ही फूट रही हैं, जबकि चमेली और चंपा के फूल शाम को महका रहे हैं…फूलों के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर ही बेमानी लगता है… उन्हें महकते सुर्ख़ गुलाब पसंद हैं और हमें सफ़ेद फूल ही भाते हैं, चाहे वे गुलाब के हों, बेला, चमेली, चम्पा, जूही या फिर रात की रानी के...
फूल प्रेम का प्रतीक हैं…आस्था और श्रद्धा प्रकट करने के लिए भी फूलों से बेहतर और कोई सांसारिक वस्तु नहीं है…कहते हैं कि देवी-देवताओं को उनके प्रिय फूल भेंट कर प्रसन्न किया जा सकता है… श्रद्धालु अपने इष्ट देवी-देवताओं को उनके प्रिय फूल अर्पित कर मनचाही मुराद पाते हैं…
हमारे देश में ख़ासकर हिंदू धर्म में विभिन्न धार्मिक कार्यों में फूलों का विशेष महत्व है. धार्मिक अनुष्ठान, पूजा और आरती आदि फूलों के बिना पूरे ही नहीं माने जाते हैं. भगवान विष्णु को कमल, मौलसिरी, जूही, चंपा, चमेली, मालती, वासंती, वैजयंती कदम्ब, अपराजिता, केवड़ा और अशोक के फूल बहुत प्रिय हैं. भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है. इसलिए उनकी पूजा में पीले रंग के फूल विशेष रूप से शामिल किए जाते हैं. भगवान श्रीकृष्ण को परिजात यानी हरसिंगार, पलाश, मालती, कुमुद, करवरी, चणक, नंदिक और वनमाला के फूल प्रिय हैं. इसलिए उन्हें ये फूल अर्पित करने की परंपरा है. कहा जाता है कि परिजात का पेड़ स्वर्ग का वृक्ष है और यह देवताओं को बहुत प्रिय है. रुक्मणि को परिजात के फूल बहुत पसंद थे, इसलिए श्रीकृष्ण परिजात को धरती पर ले आए थे. भगवान शिव को धतूरे के फूल, नागकेसर के फूल, कनेर, सूखे कमल गट्टे, कुसुम, आक, कुश और बेल-पत्र आदि प्रिय हैं. सूर्य देव को कूटज के फूल, कनेर, कमल, चंपा, पलाश, आक और अशोक आदि के फूल भी प्रिय हैं. धन और एश्वर्य की देवी लक्ष्मी को कमल सबसे प्रिय है. उन्हें लाल रंग प्रिय है. देवी दुर्गा को भी लाल रंग प्रिय है और देवी सरस्वती को सफ़ेद रंग प्रिय है. इसलिए लक्ष्मी और दुर्गा को लाल और सरस्वती को सफ़ेद रंग के फूल अर्पित किए जाते हैं. कमल का फूल सभी देवी-देवताओं को बहुत प्रिय है. इसकी पंखु़ड़ियां मनष्य के गुणों की प्रतीक हैं, जिनमें पवित्रता, दया, शांति, मंगल, सरलता और उदारता शामिल है. इसका आशय यही है कि मनुष्य जब इन गुणों को अपना लेता है तब वह भी ईश्वर को कमल के फूल की तरह ही प्रिय हो जाता है. कमल कीचड़ में उगता है और उससे ही पोषण लेता है, लेकिन हमेशा कीचड़ से अलग ही रहता है. यह इस बात का भी प्रतीक है कि सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस तरह गुज़ारा जाए. क़ाबिले-ग़ौर है कि किसी भी देवता के पूजन में केतकी के फूल नहीं चढ़ाए जाते. ये फूल वर्जित माने जाते हैं…जबकि गणेश जी को तुलसीदल को छोड़कर सभी प्रकार के फूल चढ़ाए जा सकते हैं. शिव जी को केतकी के साथ केवड़े के फूल चढ़ाना भी वर्जित है. देवी-देवताओं को उनके प्रिय फूल अर्पित कर उन्हें प्रसन्न करने और मनचाही मुरादें मांगने की सदियों पुरानी परंपरा है… 
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

सफ़ेद फूल...


सफ़ेद फूल... सफ़ेद फूलों में हमारी रूह बसती है... सफ़ेद फूल हमें बचपन से ही बहुत पसंद हैं...
बेला, गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली, मोगरा, रात की रानी के सफ़ेद फूल खिलते हैं, तो फ़िज़ा महक उठती है... और इन सफ़ेद फूलों की भीनी-भीनी महक मन को लुभाती है... इन सफ़ेद फूलों पर हम यूं ही जां निसार नहीं करते... कुछ तो बात है इनमें...

बुज़ुर्ग औरतें कहती हैं कि सफ़ेद फूलों पर असरात होते हैं... बरसों पहले हमने कई चमेली के पौधे लगाए थे, जो बहुत फैल गए थे... कई औरतों ने कहा कि चमेली घर में लगाना ठीक नहीं है... उसके बाद से अम्मी ने चमेली के कई बड़े झाड़ हटवा दिए... चमेली का एक पौधा हमने अपने नये घर में लगाया... कुछ महीनों में चमेली ख़ूब फैल गई... छत तक ऊंची हो गई... चमेली को यूं फलते-फूलते देखकर बहुत अच्छा लगता है... आंगन में सफ़ेद फूलों के कई पौधे हैं... एक सफ़ेद रंग का सदाबहार भी लगाया हुआ है, ताकि हमारे आंगन में सफ़ेद फूल हमेशा खिलते रहें...
(ज़िन्दगी किताब का एक वर्क़)

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

एक तस्वीर...


कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे... उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता... फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...
हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

विश


अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि हमें टूटते तारे बहुत दिखते हैं... जब भी हम रात में खुले आसमान के नीचे बैठकर स्याह आसमान में चमकते चांद-सितारों को देखते हैं, तो हमें कोई बहुत ही चमकता हुआ तारा अपनी तरफ़ बढ़ता दिखता है... बहुत ही तेज़ी से वो हमारी तरफ़ आता है, उसके आसपास बहुत ही रौशनी होती है... फिर बहुत नीचे आकर वो नज़रों से ओझल हो जाता है... अकसर ऐसा होता है...  घर के फ़र्द कहते हैं कि उन्हें तो कोई टूटता तारा नज़र नहीं आया, फिर तुम्हें ही ये टूटते तारे क्यों दिखते हैं.. इसका जवाब हमारे पास नहीं है...
कहते हैं कि टूटते तारे को देखकर कोई 'विश’ मांगी जाए, तो पूरी ज़रूर होती है... छत पर देर तक जागकर चांद-तारों को निहारना अच्छा लगता है... लेकिन टूटते तारे को देखकर मन दुखी हो जाता है... इसलिए कभी टूटते तारे को देखकर कोई 'विश’ नहीं मांगी... अपनी ख़ुशी के लिए किसी का यूं टूटकर बिखर जाना, कभी दिल ने गवारा नहीं किया... शायद इसीलिए एक 'विश’ आज तक ’विश’ ही रह गई...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ


फ़िरदौस ख़ान
फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के वह शायर हैं, जो जंगे-आज़ादी से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक से जुडे रहे. उनकी ज़ाती ज़िंदगी बेहद कड़वाहटों से भरी हुई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपने कलाम को इश्क़ के रंगों से सजाया. वह कहते हैं-
तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ
इस एक चिराग़ से कितने चिराग़ जल उठे फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनका असली नाम रघुपति सहाय था, लेकिन उन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी नाम से लेखन किया. उन्होंने एमए किया और आईसीएस में चुने गए. 1920 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी स्वराज आंदोलन में शामिल हो गए. वह डेढ़ साल तक जेल में भी रहे और यहां से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू के कहने पर अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ़्तर में अवर सचिव बना दिए गए. नेहरू के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और 1930 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बन गए. उन्होंने 1959 तक यहां अध्यापन कार्य किया.

फ़िराक़ गोरखपुरी को 1968 में पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. अगले साल 1969 में उन्हें साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया. फिर 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी का मनोनीत सदस्य नियुक्त किया गया. 1981 में उन्हें ग़ालिब अकादमी अवॉर्ड दिया गया. उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग़मा, गुले-राना, मशाल, रूहे-कायनात, रूप, शबिस्तां, सरगम, बज़्मे-ज़िंदगी रंगे-शायरी, धरती की करवट, गुलबाग़, रम्ज़ कायनात, चिराग़ां, शोला व साज़, हज़ार दास्तान, और उर्दू की इश्क़िया शायरी शामिल हैं. उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियां भी लिखीं. उनकी उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुईं.

लोकभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब शायर दानिशवर फ़िराक़ गोरखपुरी में लेखक अली अहमद फ़ातमी ने फ़िराक़ की ज़िंदगी और उनकी कृतियों पर रौशनी डाली है. आम तौर पर ख़्याल किया जाता है कि फ़नकार को ऐसी बुनियाद और कमज़ोर हालात से बेनियाज़ होना चाहिए. ग़ालिब ज़िंदगी भर परेशान रहे, अपनी बीवी की शिकायत करते रहे. अपनी तमाम मुस्कराहटों के साथ जीवन पद्धति निभाते रहे. इसलिए मुश्किलें आसान लगने लगीं. मंटों ने तो हंस-हंस कर जीना सीखा था. ज़िंदगी की सारी तल्ख़ियां अपनी हंसी में पी गया और भी अच्छे फ़नकारों ने कुछ ऐसे ही जिया होगा.
29 जून, 1914 को उनका विवाह हुआ, लेकिन वह पत्नी को पसंद नहीं करते थे. इसका उनकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी, एक साहब ने मेरी शादी एक ऐसे ख़ानदान और एक ऐसी लड़की से कर दी कि मेरी ज़िंदगी एक नाक़ाबिले-बर्दाश्त अज़ाब बन गई. पूरे एक साल तक मुझे नींद न आई. उम्र भर मैं इस मुसीबत को भूल नहीं सका. आज तक मैं इस बात के लिए तरस गया कि मैं किसी को अपना कहूं ओर कोई मुझे अपना समझे.

फ़िराक़ के इश्क़ और मोहब्बत के चर्चे आम रहे. वह इस क़िस्म की शौहरत चाहते भी थे. कभी-कभी ख़ुद भी क़िस्सा बना लिया करते थे, ताकि ज़माना उन्हें एक आदर्श आशिक़ समझे. वह ख़ुद लिखते हैं-इन तकली़फ़देह और दुख भरे हालात में मैंने शायरी की ओर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी आवाज़ को पाने लगा. अब जब शायरी शुरू की तो मेरी कोशिश यह हुई कि अपनी नाकामियों और आने ज़ख्मी ख़ुलूस के लिए अशआर के मरहम तैयार करूं. मेरी ज़िंदगी जितनी तल्ख़ हो चुकी थी, उतने ही पुरसुकून और हयात अफ़ज़ा अशआर कहना चाहता था. फ़िराक़ का ख़्याल है कि इस उलझन, द्वंद्व और टकराव से बाहर निकलने में सिर्फ़ एक भावना काम करती है और वह है इश्क़.

इश्क़ अपनी राह ले तो दिल क्या पूरी दुनिया जीत सकता है, बस इन दर्जों और हालात के ज्ञान की ज़रूरत हुआ करती है. फ़िराक़ का इश्क़, इस दर्जे का इश्क़ न सही जहां ख़ुदा और बंदे का फ़र्क़ उठ जाया करता है. फ़िराक़ का वह रास्ता न था. वह भक्ति और ईश्वर प्रेम की दुनिया के आदमी न थे. वह शमा में जलकर भस्म हो जाने पर यक़ीन भी नहीं रखते थे, बल्कि वह उस दुनिया के आशिक़ थे, जहां इंसान बसते हैं और उनका ख़्याल है कि इंसान का इंसान से इश्क़ ज़िंदगी और दुनिया से इश्क़ की बुनियाद जिंस (शारीरिक संबंध) है. किसी से जुनून की हद तक प्यार, ऐसा प्यार जो हड्डी तक को पिघला दे, जो दिलो-दिमाग़ में सितारों की चमक, जलन और पिघलन भर दे. फिर कोई भी फ़लसफ़ा हो, फ़लसफ़ा-ए-इश्क़ से आगे उसकी चमक हल्की रहती है. हर फ़लसफ़ा इसी परिपेक्ष्य, इसी पृष्ठभूमि को तलाश करता रहता है. फ़िराक़ ने जब होश व हवास की आंखें खोलीं दाग़ और अमीर मीनाई का चिराग़ गुल हो रहा था. स़िर्फ उर्दू शायरी में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक नई बिसात बिछ रही थी. क़ौमी ज़िंदगी एक नए रंग रूप से दो चार थी. समाजवाद का बोलबाला था. वह समाजवाद से प्रभावित हुए. प्रगतिशील आंदोलन से जु़डे. वह स्वीकार करते हैं इश्तेराकी फ़लसफ़े ने मेरे इश्क़िया शायरी और मेरी इश्क़िया शायरी को नई वुस्अतें (विस्तार) और नई मानवियत (अर्थ) अता की.
अब उनकी शायरी में बदलाव देखने को मिला. बानगी देखिए-

तेरा फ़िराक़ तो उस दम तेरा फ़िराक़ हुआ
जब उनको प्यार किया मैंने जिनसे प्यार नहीं

फ़िराक़ एक हुए जाते हैं ज़मानों मकां
तलाशे दोस्त में मैं भी कहां निकल आया

तुझी से रौनक़े-बज़्मे-हयात है ऐ दोस्त
तुझी से अंजुमने-महर व माह है रौशन

ज़िदगी को भी मुंह दिखाना है
रो चुके तेरे बेक़रार बहुत

हासिले हुस्नो-इश्क़ बस है यही
आदमी आदमी को पहचाने

इस दश्त को नग़मों से गुलज़ार बना जाएं
जिस राह से हम गुज़रें कुछ फूल खिला जाएं

अजब क्या कुछ दिनों के बाद ये दुनिया भी दुनिया हो
ये क्या कम है मुहब्बत को मुहब्बत कर दिया मैंने

क्या है सैर गहे ज़िंदगी में रुख़ जिस सिम्त
तेरे ख़्याल टकरा के रह गया हूं मैं

फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे- शायरी उस हैजान (अशांति) का नाम है, जिसमें सुकून के सिफ़ात (विशेषता) पाए जाएं. सुकून से उनका मतलब रक़्स की हरकतों में संगीत के उतार-च़ढाव से है.उनके कुछ अशआर देखिए-
रफ़्ता-रफ़्ता इश्क़ मानूसे-जहां होता गया
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम

मेहरबानी को मुहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह अब मुझसे तेरी रंजिशें बेजा भी नहीं

बहुत दिनों में मुहब्बत को यह हुआ मालूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वह रात, रात हुई

इश्क़ की आग है वह आतिशे-सोज़ फ़िराक़
कि जला भी न सकूं और बुझा भी न सकूं

मुहब्बत ही नहीं जिसमें वह क्या दरसे-अमल देगा
मुहब्बत तर्क कर देना भी आशिक़ ही को आता है

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

तेरी निगाहों से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया है रगे जां में नश्तर फिर भी

फ़िराक़ गोरखपुरी का देहांत 3 मार्च, 1982 को नई दिल्ली में हुआ. बेशक वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जनमानस को अपनी शायरी के ज़रिये ज़िंदगी की दुश्वारियों में भी मुस्कुराते रहने का जो पैग़ाम दिया, वह हमेशा मायूस लोगों की रहनुमाई करता रहेगा. बहरहाल, यह किताब फ़िराक़ गोरखपुरी और उनकी शायरी को समझने का बेहतर ज़रिया है, जो यक़ीनन उनके प्रशंसकों को पसंद आएगी. किताब में उर्दू अल्फ़ाज़ को उर्दू लहजे में ही पेश किया गया है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : शायर दानिशवर फ़िराक़ गोरखपुरी
लेखक अली : अहमद फ़ातमी
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

परिजात के फूल...


काफ़ी अरसे पहले की बात है... हम अपने कमरे में बैठे थे, तभी हमारी आ गईं और कहने लगीं आज मन्दिर चलते हैं. हमने कहा क्या बात है, आज कोई ख़ास दिन है. वे कहने लगीं कि मन्दिर के पास मेला जैसा माहौल होता है. मन्दिर भी हो आएंगे और कुछ चूड़ियां और मोती की मालाएं भी ले आएंगे. हमें कांच की चूड़ियों और मोती की मालों का बचपन से ही शौक़ रहा है. हमने अम्मी से पूछा, तो वो कहने लगीं. ठीक है, साथ में सुशीला को भी लेती जाना. सुशीला आंटी हमारी हमसाई थीं.

हम मन्दिर गए. मन्दिर के पास पूरी हाट लगी थी. लोग ख़रीदारी कर रहे थे.. हमारी सहेलियां भी ख़रीदारी में लग गईं. सोचा जब तक सहेलियां ख़रीदारी कर रही हैं, तब तक मन्दिर की वाटिका ही देख ली जाए. वाटिका बहुत सुन्दर थी. त्रिवेणी के अलावा फूलों के कई पेड़ थे. उनमें परिजात का पेड़ भी था. पूरा पेड़ सफ़ेद फूलों से भरा हुआ था. हमने कहीं सुना था कि परिजात का पेड़ स्वर्ग का वृक्ष है और यह देवताओं को बहुत प्रिय है. रुक्मणि को परिजात के फूल बहुत पसंद थे, इसलिए श्रीकृष्ण परिजात को धरती पर ले आए थे. हम मन ही मन में रुक्मणि का शुक्रिया अदा करने लगे,  क्योंकि शायद रुक्मणि की वजह से ही आज हम इस पेड़ के इतने क़रीब थे.

पेड़ के पास बहुत से फूल बिखरे पड़े थे. हम ज़मीन पर बैठकर फूल चुनने लगे, तभी मन्दिर के पुजारी, वहां आ गए और कहने लगे कि ज़मीन से फूल क्यों चुन रही हो. इस पेड़ से जितने चाहो फूल तोड़ सकती हो. हमने पंडित जी का शुक्रिया अदा किया और परिजात के फूल तोड़कर अपने दुपट्टे में इकट्ठे करने लगे. हमने एक अंजुली फूल इकट्ठे कर लिए. तब तक हमारी सहेलियां और आंटी भी वहां आ गईं. फिर हम मन्दिर के अंदर दाख़िल हुए. वहां छोटे-छोटे मन्दिर बने थे. किसी में राम और सीता की मूर्ति थी, किसी में हनुमान जी की मूर्ति थी, किसी में देवी संतोषी की, तो किसी में किसी और देवता की मूर्ति सजी थी. आंटी ने सभी मन्दिरों में घंटी बजाकर माथा टेका. हमारी सहेलियां भी ऐसा ही कर रही थीं. हम भी सबके साथ-साथ चल रहे थे.

आख़िर में एक और मन्दिर आया, जिसमें श्रीकृष्ण की मनोहारी प्रतिमा थी. पीला लिबास धारण किए हुए. हाथ में बांसुरी और होंठों पर मोहक मुस्कान. हम सोचने लगे. श्रीकृष्ण के इसी रूप पर फ़िदा होकर रसखान से लेकर अमीर ख़ुसरो तक कितने ही सूफ़ी-संतों ने श्रीकृष्ण पर गीत रच डाले हैं. हम फ़ौरन प्रतिमा की तरफ़ बढ़े और हमारे हाथ में जितने परिजात के फूल थे, सभी श्रीकृष्ण के क़दमों में रख दिए.

तभी पंडित जी बोल पड़े- ऐसा लगता है, जैसे श्रीकृष्ण की राधा ने ही पुष्प भेंट किए हों. आंटी और हमारी सहेलियों ने पंडित जी की हां में हां मिलाई. हमने प्रसाद लिया और घर आ गए.

परिजात के फूल चुनने से लेकर श्रीकृष्ण के क़दमों में रखने तक हमने जो लम्हे जिए और वो हमारी इक उम्र का सरमाया हैं. आज भी जब परिजात के फूल देखते हैं, तो दिल को अजीब-सा सुकून महसूस होता है. हम नहीं जानते कि श्रीकृष्ण और परिजात के फूलों से हमारा कौन-सा रिश्ता है.
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

भूख

एक साहब ने हमसे सवाल किया-
अगर खाना सामने रखा हो, तो क्या उसे खाये बिना पेट भर जाएगा ?

इसके दो जवाब हैं- एक दुनियावी और दूसरा रूहानी...
पहला, खाना खाये बिना पेट नहीं भर सकता... अल्लाह ने जिस्म दिया है, पेट दिया है, तो भूख भी दी है, जो खाना खाने से ही मिट सकती है...

बाज़ वक़्त खाना खाने से भी भूख नहीं मिटती... इसी से वाबस्ता एक वाक़िया है... तक़रीबन तीन साल पहले की बात है... हम भाई के घर आए हुए थे... दोपहर का वक़्त था... खाने में क़ौरमा और नान था... बहुत ज़्यादा भूख लगी हो, तो भी पौने या एक नान से पेट भर जाता है... हमने पूरा नान खाया, लेकिन
अब भी बहुत भूख लगी थी... लग रहा था, जैसे हमने एक लुक़मा तक न खाया हो... भूख में एक लुक़मा भी खा लिया जाए, तो कुछ तो तसल्ली होती है, लेकिन यहां तो वो भी नहीं... भूख से हमारा बुरा हाल था... हम पानी पीकर दस्तरख़ान से उठ गए...  शर्म की वजह से और खा नहीं सकते थे...
तक़रीबन एक-डेढ़ घंटे तक यूं ही बैचैन रहे... समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर माजरा क्या है... फिर हमने एक कटोरी में छोटी इलायची रखी देखीं... हमने एक इलायची ली... एक दुआ पढ़ी और उसे खा लिया... यक़ीन जानिये भूख ग़ायब हो चुकी थी... पेट भरे होने का अहसास होने लगा...

अब दूसरा रूहानी जवाब, जब इंसान रोज़े में होता है, तो उसके सामने दुनिया की नेमतें रख दी जाएं, तो भी उसका दिल नहीं ललचाता... इंसान जब रूहानी ज़िन्दगी जीने लगता है, तो जिस्म की ज़रूरतें उसके लिए बेमानी हो जाया करती हैं... उसे सिर्फ़ अपनी रूह की ग़िज़ा चाहिए होती है, रूह की ग़िज़ा मुहब्बत है, इबादत है... मुहब्बत और इबादत में ख़ुद को फ़ना करने में जो सुकून है, उसके सामने दुनियावी लज़्ज़तें बेमानी हैं...

अब जिस्म है, तो भूख भी होगी... ऐसे लोगों को ज़ायक़े से कोई लेना-देना नहीं होता... सिर्फ़ पेट भरना होता है, भले ही रूखी रोटी क्यों न हो... हम भूख से कम खाना खाते हैं... दिन में सिर्फ़ दो ही वक़्त खाना खाते हैं...  कई बार सिर्फ़ एक वक़्त ही खाना खाते हैं... ऐसा नहीं है कि हम जानबूझ कर ऐसा करते हैं... क़ुदरती ये हमारी आदत में शुमार है... खाने से पहले हमें एक गिलास पानी ज़रूर चाहिए...

जो लोग रूहानी ज़िन्दगी बसर करते हैं, वो हमारी इस तहरीर को अच्छे से समझ सकते हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

चेहरे

कुछ चेहरे ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें देखकर इंसान ख़ुद को भूल जाता है... हवासों पर बेख़ुदी तारी हो जाती है... दिल सजदे में झुक जाता है... शायद यही लम्हे हुआ करते हैं, जब बंदा अपने ख़ुदा के और भी क़रीब हो जाता है...
इंदीवर साहब ने क्या ख़ूब लिखा है-
अपना रूप दिखाने को तेरे रूप मे खुद ईश्वर होगा...
तुझे देख कर जग वाले पर यक़ीन नहीं क्यूं कर होगा
जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा...
(Firdaus Diary)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

मेहनत और कामयाबी

बहुत से लोग बुलंदी पर पहुंचने के लिए, अपनी कोई ख़ास पहचान बनाने के लिए जद्दो-जहद करते हैं... दिन-रात मेहनत करते हैं... इनमें से जो लोग कामयाब हो जाते हैं... दुनिया उन्हें सलाम करती है, सर-आंखों पर बिठाती है... उनकी जद्दो-जहद की तारीफ़ों के पुल बांधे जाते हैं, लेकिन जो लोग कामयाब नहीं हो पाते, वे गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं... कोई उनका ज़िक्र तक नहीं करता... उनकी मेहनत, उनकी जद्दो-जहद ज़ाया हो जाती है...
यही तो दुनिया का दस्तूर है... उगते सूरज को सलाम करना... 
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...


मेरे महबूब !
अज़ल से अबद तक
ऐसा ही होता आया है
और
ऐसा ही होता रहेगा
मुहब्बत के नसीब में
हिज्र के दिन हैं
और
हिज्र की ही रातें हैं...

जान !
मैं नहीं जानती
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा
भी है या नहीं...

मैं सिर्फ़ ये जानती हूं
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...
-फ़िरदौस ख़ान

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS