मई दिवस और पापा

कल मज़दूर दिवस है. पहली मई के दिन पापा सुबह-सवेरे तैयार होकर मई दिवस के कार्यक्रमों में जाते थे. पापा ठेकेदार थे. लोगों के घर बनाते थे. छोटी-बड़ी इमारतें बनाते थे. उनके पास हमेशा कमज़ोर और बूढ़े मिस्त्री-मज़दूर हुआ करते थे. हमने पापा से पूछा कि लोग ताक़तवर और जवानों को रखना पसंद करते हैं, फिर आप कमज़ोर और बूढ़े लोगों को काम पर क्यों रखते हैं. पापा जवाब देते कि इसीलिए तो इन्हें रखता हूं, क्योंकि सबको जवान और ताक़तवर मिस्त्री-मज़दूर चाहिए. ऐसे में कमज़ोर और बूढ़े लोग कहां जाएंगे. अगर इन्हें काम नहीं मिलेगा, तो इनका और इनके परिवार का क्या होगा.

हमें अपने पापा पर फ़ख़्र है. उन्होंने कभी किसी का शोषण नहीं किया. किसी से तयशुदा घंटों से ज़्यादा काम नहीं करवाया, बल्कि कभी-कभार वक़्त से पहले ही उन्हें छोड़ दिया करते थे. अगर कोई मज़दूर भूखा होता, तो उसे अपना खाना खिला दिया करते थे. फिर ख़ुद शाम को जल्दी आकर खाना खाते. पापा ने न कभी कमीशन लिया और न ही किसी से एक पैसा ज़्यादा लिया. इसीलिए हमेशा नुक़सान में रहते. अपने बच्चों के लिए न तो दौलत जोड़ पाए और न ही कोई जायदाद नहीं बना पाए.

हमें इस बात पर फ़ख़्र है कि पापा ने हलाल की कमाई से अपने बच्चों की परवरिश की.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

मेहनतकशों को मज़दूर दिवस की मुबारकबाद 
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मज़दूर दिवस


कल मज़दूर दिवस है... यानी हमारा दिन... हम भी तो मज़दूर ही हैं... हमें अपने मज़दूर होने पर फ़ख़्र है... हमारे काम के घंटे तय नहीं हैं.... सुबह से लेकर देर रात तक कितने ही काम करने पड़ते हैं... यह बात अलग है कि हमारा काम लिखने-पढ़ने का है... इसके अलावा हम घर का काम भी कर लेते हैं... घर की साफ़-सफ़ाई, कपड़े-बर्तन धोना, खाना बनाना जैसे काम भी अकसर करने पड़ते हैं... किसी का ख़ून चूसकर अपनी तिजोरियां भरकर 'अमीर’ कहलाने से कहीं बेहतर है 'मज़दूर’ हो जाना...

सभी मेहनतकशों से कहना चाहेंगे कि अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते रहना.. हक़ सिर्फ़ मांगने से नहीं मिलता, उसे हासिल किया जाता है... मेहनत कभी ज़ाया नहीं जाती...
बक़ौल साहिर लुधियानवी-
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी...
-फ़िरदौस ख़ान 



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उस रोज़ हम भी महिला दिवस मनाएंगे...


कल महिला दिवस है... एक तरफ़ देशभर में कार्यक्रम होंगे और महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर लंबे-चौड़े भाषण दिए जाएंगे... और दूसरी तरफ़ महिला दिवस से अनजान करोड़ों ग़रीब महिलाएं हर रोज़ की तरह सूरज निकलने से पहले उठेंगी... घर का काम-काज करेंगी... दोपहर के लिए रोटी बांधेंगी और फिर मज़दूरी के लिए निकल पड़ेंगी... कोई अपने दूधमुंहे बच्चे को पीठ से बांधकर ईंटें, मिट्टी, रेत, क्रैसर ढोएगी, तो कोई सड़क पर ही अपने बच्चे को बिठाकर पत्थर तोड़ेगी... फिर शाम को दिहाड़ी के पैसों से आटा, दाल, सब्ज़ी ख़रीदेगी और घर जाकर चूल्हा-चौका संभाल लेगी... दिन-रात के चौबीस घंटों में से अट्ठारह घंटे उसे काम करना है... वो भी एक दिन, एक हफ़्ता, एक महीना या एक साल नहीं, बल्कि ज़िंदगी भर... यानी जब तक उसके जिस्म में जान है, उसे काम करना है...
बहुत क़रीब से देखा है, इन मेहनतकश महिलाओं को... जिस रोज़ ऐसी एक भी मेहनतकश महिला के लिए कुछ कर पाएंगे, यक़ीनन उस, रोज़ हम भी महिला दिवस मनाएंगे...

चित्र : गूगल से साभार
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