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ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com
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साम्प्रदायिक सदभाव की अलख जगाती पुस्तक


मोहम्मद अफ़ज़ाल
प्रस्तुत पुस्तक ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में लेखिका फ़िरदौस ख़ान का उद्देश्य हिन्दुस्तान की उस तहज़ीब को प्रकाश में लाना है, जिसकी बुनियाद पर भारतीय समाज परवान चढ़ा. किसी भी देश की आत्मा को अगर समझना है, तो उसके लिए उस देश के समाज और उसकी प्रवृत्ति का अध्ययन अति आवश्यक है. जिस समाज का आधार प्रेम हो, वहां मानवता है. और अहिंसा मानवता का प्रतीक है. सम्राट अशोक के हाथ में जब तक तलवार रही, वह क्रूर और ज़ालिम कहलाया. जब उसने अहिंसा का दामन थामा, तो वह एक महान सम्राट अशोक बन गया. संसार में अगर कहीं कोई ऐसा समाज है, जहां मानवता, प्रेम और अहिंसा जिसके आचरण में विद्यमान है, वह हमारा प्रिय देश हिन्दुस्तान ही है. इसका वातावरण, जलवायु और इसकी मिट्टी जिसकी ख़ुशबू इतनी लुभावनी और मनभावन है कि जब उसकी ख़ुशबू वातावरण में रच-बसकर संसार में फैली तो इसकी ठंडक और महक को अरब तक महसूस किया गया और संसार के लिए देश आकर्षण आ केंद्र बन गया.

कोई व्यक्ति मानवता, प्रेम और अहिंसा का पाठ पढ़ने के लिए इस देश की ओर आकर्षित हुआ, तो कोई ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए हाथ में कांसा-ए- गदाई (भिक्षा पात्र) के साथ इसकी संस्कृति को नये आयाम देने के लिए यहां आया. क्योंकि वे जानते थे कि जिस सम्मान और प्रेम की उन्हें तलाश है, वह इसी पवित्र धरती पर उन्हें मिल सकता है. कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने तलवार के बल पर इसकी सभ्यता और संस्कृति को तबाह करने की कोशिश की, तो किसी ने छल-कपट और बल के द्वारा इस समाज की एकता की जड़ें हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन ऋषि-मुनियों और औलिया, पीर-फ़क़ीरों ने अपनी अमर वाणी द्वारा मानवता, प्रेम और अहिंसा के इस दीपक को कभी बुझने नहीं दिया. उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया कि किसी जलधारा, मज़हब और धर्मों के उदगम स्थान अलग-अलग हो सकते हैं. मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करके निरंतर आगे बढ़ना उनके जीवन का प्रतीक है, लेकिन संगम ही उसको अमरता प्रदान करता है.

 ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक के नाम से ही यह ज्ञात हो जाता है कि इसमें ऐसी महान हस्तियों का बखान है, जिन्होंने संसार के किसी अन्य भूमि के टुकड़े पर जन्म लिया हो, लेकिन इस देश की माटी, संस्कृति के आकर्षण, मोह, ज्ञान और प्रेरणा से अपने आपको अछूता न रख सके तथा उनके क़दम बरबस इस धरती की ओर खींच लाए. कुछ ऐसे महापुरुष भी इस पुस्तक के केंद्र में हैं, जिनका जन्म इस धरती पर मुस्लिम परिवार में हुआ, लेकिन उनकी लेखनी और जीवन शैली पर हिन्दू देवी-देवताओं का राज था. रसखान मुस्लिम होते हुए भी दूसरे जन्म की कामना करते हैं. वह भी इस शर्त के साथ कि जन्म चाहे किसी भी रूप में हो, लेकिन जन्म स्थल ब्रज ही हो. सम्राट अकबर की पत्नी ताजबीबी भगवान श्रीकृष्ण की भक्त थीं, जिसे सम्राट अकबर ने भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा चित्र भेंट किया, जिसकी क़ीमत चित्रकार को इतनी दी कि उसे जीवन में कोई और चित्र बनाने की आवश्यकता ही न पड़े. इसके अलावा संत लालदास, भक्त लतीफ़ शाह, पेमी, अब्दुल समद, संत वाजिंद, संत बाबा मलेक ऐसे नाम हैं, जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुस्तान की संस्कृति की सेवा की. इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्होंने यह कार्य किसी मुस्लिम देश में किया होता, तो उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता. मगर हमारी संस्कृति की महान उपलब्धि यही है कि हिन्दू परिवार में जन्म लेकर इस्लाम और मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर हिन्दू संस्कृति का बखान किया गया है अर्थात अभिव्यक्ति की आज़ादी भी हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत पुस्तक में 55 महान हस्तियों का बखान किया है. उनमें से कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिन्होंने न तो इस धरती पर जन्म लिया और न ही वे कभी इस धरती पर आकर बसे, लेकिन उन्होंने भी अत्यंत कठिन मार्ग पर चलकर जनमानस की सेवा की. अर्थात जन्म,  उदगम स्थान और मार्ग कोई भी हो दानवता रूपी क्रूर राक्षस को इस धरती से मिटाना उनका उद्देश्य रहा. संसार में जहां कहीं भी प्रेम, मानवता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाता है, वहां भी भारतीय संस्कृति की ही आत्मा बसती है. लेखिका ने जिस सुंदर ढंग से 55 महान अनमोल मोतियों को पुस्तक रूपी अटूट माला में पिरो दिया, जिसका लाभ दिव्य दृष्टि रखने वाले पारखी पाठकजन अवश्य उठाएंगे.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान का इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य मुस्लिम संत-फ़क़ीरों द्वारा जगाई गई प्रेम, अहिंसा और भाईचारे की अलख से जनमानस को अवगत कराना है. ये संत-फ़क़ीर बेशक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक और गंगा-जमुनी तहज़ीब के स्तंभ हैं. अफ़सोस की बात तो यह है कि इनका ज़िक्र अकसर लोगों की ज़ुबान पर आता तो है,  लेकिन वो इसकी आत्मा से दूर और इसके अर्थ से आज तक नावाक़िफ़ रहे हैं. इस तहज़ीब को परवान चढ़ाने के लिए सिर्फ़ हाथ से हाथ मिलाना काफ़ी नहीं, बल्कि साथ-साथ चलकर ऐसे मधुर संगम को प्राप्त करना है, जहां केवल प्रेम, अहिंसा और मानवता का वास हो.
(लेखक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

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हज़रत जुनैद बग़दादी


फ़िरदौस ख़ान
जुनैद बग़दादी प्रसिध्द सूफ़ी संत हैं. वे संत हज़रत सक्ती क़े भांजे और शिष्य थे. उन्हें शिक्षा और अमल का उद्गम माना जाता है. ईश्वर भक्ति और त्याग के प्रतीक संत जुनैद बग़दादी ने लोगों को कर्तव्य पालन और लोककल्याण का संदेश दिया. इसके बावजूद उनके विरोधी उन्हें अधर्मी और काफ़िर कहकर पुकारते थे.

बचपन में जब एक दिन वे मदरसे से आ रहे थे तो उन्होंने रास्ते में अपने पिता को रोते हुए देखा. उन्होंने इसका कारण पूछा तो उनके पिता ने बताया कि आज मैंने कुछ दिरहम (मुद्रा) तुम्हारे मामा हज़रत सक्ती को भेजे थे, लेकिन उन्होंने इन्हें लेने से साफ़ इंकार कर दिया. जब ईश्वर के भक्तों को मेरे कडे परिश्रम की कमाई पसंद नहीं तो फिर मेरा जीवन भी व्यर्थ है. जुनैद बग़दादी पिता से दिरहम लेकर अपने मामा की कुटिया पर पहुंचे. हज़रत सक्ती ने पूछा कौन है? उन्होंने जवाब दिया कि मैं जुनैद हूं और अपने पिता की ओर से भेंट लेकर आया हूं, इसे स्वीकार कर कृतार्थ कीजिए. मगर जब जुनैद ने इसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि आपको उस ईश्वर का वास्ता जिसने आप को संत बनाया और मेरे पिता को सांसारिक व्यक्ति बनाकर दोनों के साथ ही न्याय किया है. मेरे पिता ने अपना कर्तव्य पूरा किया और अब आप अपने नैतिक दायित्व का पालन करें. उनकी यह बात सुनकर हज़रत सक्ती ने दरवाज़ा खोल दिया और उन्हें गले से लगा लिया. उसी दिन हज़रत सक्ती ने जुनैद को अपना शिष्य बना लिया.

सात साल की छोटी उम्र में वे अपने पीर हज़रत सक्ती के साथ मक्का की यात्रा पर गए थे. तभी वहां सूफियों में आभार की परिभाषा पर चर्चा हो रही थी. सबने अपने-अपने विचार रखे. हज़रत सक्ती ने उनसे भी अपने विचार व्यक्त करने को कहा. गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने कहा कि आभार की परिभाषा यह है, जब ईश्वर सुख-एश्वर्य दे तो इसे लेने वाला इसके कारण अल्लाह की अवज्ञा न करे. मक्का से वापस आकर उन्होंने शीशों की दुकान खोली, मगर दुकानदारी में उनका ज़रा भी मन नहीं लगा. वे कहते हैं कि मनुष्य को नैतिक शिक्षा अपने आसपास के वातावरण से ही मिल जाती है. निष्ठा की शिक्षा उन्होंने एक हज्जाम से प्राप्त की थी. एक बार मक्का में वे एक हज्जाम के पास गए तो देखा कि वे किसी धनवान की हजामत बना रहा है. उन्होंने उससे आग्रह किया कि वह ईश्वर के लिए उनकी भी हजामत बना दे. यह सुनकर हज्जाम ने धनवान की हजामत छोड़कर उनके बाल काटने शुरू कर दिए. बाल काटने के बाद हज्जाम ने उनके हाथ में एक पुडिया दी, जिसमें कुछ रेज़गारी लिपटी हुई थी और कहा कि इसे अपने काम में ख़र्च कर लेना. पुडिया लेकर उन्होंने संकल्प लिया कि उन्हें जो कुछ मिलेगा उसे वे इस हज्जाम को दे देंगे. कुछ समय बाद बसरा में एक व्यक्ति ने अशर्फियों से भरी थैली उन्हें भेंट की. वे उस थैली को लेकर हज्जाम के पास गए. थैली देखकर हज्जाम ने कहा कि उसने तो उनकी सेवा केवल अल्लाह के लिए की थी, इसलिए वह इसे स्वीकार नहीं कर सकता.

जुनैद बग़दादी कहते हैं कि अल्लाह के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी भी किसी पर उपकार करके अहसान नहीं जताता और न ही उसके बदले में उससे कुछ चाहता है. वे लोगों को नेकी और सच्चाई के रास्ते पर चलने की सीख देते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को सीमित साधनों में ही प्रसन्न रहना चाहिए. सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं. जिस अल्लाह ने सुख दिया है, दुख भी उसी की देन है. इसलिए मनुष्य को दुखों से घबराने की बजाय सदा अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए. वे स्वयं भी रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा करते थे. अमीर उन्हें बहुमूल्य रत्न और वस्तुएं भेंट करते थे, लेकिन वे इन्हें लेने से साफ इंकार कर देते थे. वे कहते थे कि सूफियों को धन की ज़रूरत नहीं है. अगर कोई उन्हें कुछ देना ही चाहता है तो वे ज़रूरतमंदों की मदद करे, जिससे ईश्वर भी उससे प्रसन्न रहे. वे अपने साथ बुरा बर्ताव करने वाले लोगों को उनकी गलती के लिए माफ करके उनकी भी मदद करते थे. एक बार चोर ने उनका कुर्ता चुरा लिया और दूसरे दिन जब बाज़ार में उन्होंने चोर को कुर्ता बेचते देखा. ख़रीदने वाला चोर से कह रहा था कि अगर कोई गवाही दे दे कि यह माल तेरा ही है तो मैं ख़रीद सकता हूं. उन्होंने कहा कि मैं वाकिफ़ हूं. यह सुनकर ख़रीदार ने कुर्ता ख़रीद लिया.

उनका कहना था कि तकलीफ़ पर शिकायत न करते हुए सब्र करना बंदगी की बेहतर अलामत है. सच्चा बंदा वही है जो न तो हाथ फैलाए और न ही झगड़े. तवक्कुल सब्र का नाम है जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है कि वे लोग जो सब्र करते हैं और अपने मालिक पर भरोसा करते हैं. सब्र की परिभाषा यह है कि जो लोगों से दूर करके अल्लाह के करीब कर दे. तवक्कुल का मतलब यह है कि तुम अल्लाह के ऐसे बंदे बन जाओ जैसे आदिकाल में थे. फ़रमाया कि यकीन नाम है इल्म का, दिल में इस तरह बस जाने का जिसमें बदलाव न हो सके. यकीन का मतलब यह है कि गुरूर को छोड़कर दुनिया से बे नियाज़ हो जाओ. उनका यह भी कहना था कि जिसकी ज़िन्दगी रूह पर निर्भर हो वह रूह निकलते ही मर जाता है और जिसकी ज़िन्दगी का आधार ख़ुदा पर हो वह कभी नहीं मरता, बल्कि भौतिक जिन्दगी से वास्तविक ज़िन्दगी हासिल कर लेता है. फरमाया अल्लाह की रचना से प्रेरणा हासिल न करने वाली आंख का अंधा होना ही अच्छा है और जो जबान अल्लाह के गुणगान से महरूम हो उसका बंद होना ही बेहतर है. जो कान हक़ की बात सुनने से मजबूर हो उसका बहरा होना अच्छा है और जो जिस्म इबादत से महरूम हो उसका मुर्दा होना ही बेहतर है.

वे भाईचारे और आपसी सद्भाव में विश्वास रखते थे. एक बार किसी ने उनसे कहा कि आज के दौर में दीनी भाइयों की कमी है. इस पर उन्होंने जवाब दिया कि तुम्हारे विचार में दीनी भाई केवल वे हैं जो तुम्हारी परेशानियों को हल कर सकें तब तो निश्चित ही वे कम हैं और अगर तुम वास्तविक दीनी भाइयों की कमी समझते हो तो तुम झूठे हो, क्योंकि दीनी भाई का वास्तविक अर्थ यह है कि जिनकी मुश्किलों का हल तुम्हारे पास हो और सारे मामलों को हल करने में तुम्हारी मदद शामिल हो जाए और ऐसे दीनी भाइयों की कमी नहीं है. जुनैद बग़दादी की यह बात आज भी समाज के लिए बेहद प्रासंगिक है.

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हज़रत फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़

फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ पहले डाकू थे. वे राहगीरों को लूटते थे. बाद में लूट का माल अपने साथियों में बांट देते और जो चीज़ पसंद आती, उसे अपने पास रख लेते. रिवायत यह भी है कि वे बड़े रहम दिल और बहादुर थे. जिस काफ़िले में कोई औरत होती या जिनके पास थोड़ी रक़म होती, उनको नहीं लूटते थे और जिसको लूटते थे उसके पास कुछ न कुछ माल ज़रूर छोड़ देते थे. उनकी एक ख़ासियत यह थी कि वे डाकू होने के साथ-साथ अल्लाह की इबादत भी करते थे. वे नियमित रूप से अपने साथियों के साथ मिलकर नमाज़ पढ़ते और रोज़े (व्रत) भी रखते. मगर एक वाक़िये ने उनकी ज़िन्दगी को पूरी तरह बदल दी. उन्होंने सारे बुरे काम छोड़ कर अपनी ज़िन्दगी अल्लाह की इबादत और लोक कल्याण में ही गुज़ारने का संकल्प ले लिया.

एक बार जंगल में से एक क़ाफ़िला आया. क़ाफ़िले वालों ने जब यह सुना कि यह इलाक़ा फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ का है, तो वे डर से कांपने लगे. एक व्यक्ति के पास बहुत-सा धन था. उसने सोचा कि अगर धन को जंगल में कहीं छुपा दिया जाए, तो यह लुटने से बच जाएगा. इसलिए वह सुरक्षित स्थान की खोज में निकल पड़ा. इसी दौरान उसने देखा कि एक जगह एक संत (फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़) ख़ेमे में नमाज़ पढ़ रहा है. वह वहीं खड़ा हो गया और संत की नमाज़ पूरी होने का इंतज़ार करने लगा. संत ने नमाज़ पूरी करने के बाद दुआ के लिए हाथ उठाने से पहले उस व्यक्ति को इशारा किया कि वह धन की पोटली को वहीं रख दे. उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया और फिर वापस क़ाफ़िले में आ गया. डाकुओं ने क़ाफ़िले को लूट लिया. बाद में राहगीर संत के ख़ेमे में गया, तो वहां का नज़ारा देखकर हैरान रह गया. वहां डाकू लूट का माल बांट रहे थे. इतने में फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ की नज़र राहगीर पर पड़ी, तो उन्होंने उससे कहा कि उसने जहां पोटली रखी थी, वहीं से उठा ले. राहगीर अपनी पोटली लेकर चला गया. इसके बाद एक डाकू ने फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ से पूछा कि आपने उस पोटली को वापस क्यों दे दिया? सारा धन तो उसी में था. इस पर उन्होंने जवाब दिया कि उस व्यक्ति ने मुझ पर विश्वास करके अपनी अमानत मुझे सौंपी थी, इसलिए मैं उसके साथ विश्वासघात भला कैसे कर सकता था.

इसी तरह एक और क़ाफ़िले को लूटने के बाद जब डाकू भोजन करने बैठे, तो एक राहगीर ने उनसे पूछा कि उनका सरदार कहां है? इस पर डाकुओं ने बताया कि वे दरिया किनारे नमाज़ पढ़ रहे हैं. राहगीर ने कहा कि क्या वे भोजन नहीं करते? एक डाकू ने जवाब दिया कि उनका रोज़ा (व्रत) है. राहगीर ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए फिर पूछा कि इन दिनों न तो रमज़ान हैं और न ही नमाज़ का वक़्त. डाकू ने बताया कि वे नफ़िल पढ़ रहे हैं. यह सुनकर राहगीर फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ के पास गया और पूछा कि अल्लाह की इबादत के साथ डकैती का क्या जोड़ है. उन्होंने राहगीर से पूछा कि क्या तूने क़ुरआन पढ़ा है? उसने हां में जवाब दिया, तो फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ ने यह आयत पढ़ी-
व आख़रूना आत-र-फ़ू बिज़ुनु बिहिम ख़-ल-तू अ-म-लन सालिहन
यानी दूसरों ने अपने गुनाहों का इक़रार करते हुए नेक कामों को उसके साथ गुडमुड कर दिया. वह राहगीर उनकी बात सुनकर ख़ामोश हो गया.

कहते हैं कि फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ एक महिला से प्रेम करते थे और लूट के माल का अपना हिस्सा उसी के पास भेज देते थे. वे अकसर उसके पास जाते थे. एक बार रात में कोई क़ाफ़िला आकर ठहरा और उसमें एक व्यक्ति इस आयत की तिलावत कर रहा था-
अलम यानी लिल्लज़ीन आमनू तख़ श-अ कुलबुहुम बिज़िक रिल्लाहि
यानी क्या ईमान वालों के लिए वह वक़्त नहीं आया कि उनका दिल अल्लाह के ज़िक्र से ख़ौफ़ज़दा हो जाए.

यह सुनकर फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ को बेहद दुख हुआ. उन्होंने अल्लाह से अपने गुनाहों के लिए माफ़ी मांगते हुए संकल्प लिया कि अब वे सारे बुरे काम छोड़कर मानवता की सेवा करेंगे. उन्होंने जिन लोगों को लूटा था, उनके पास जाकर क्षमा मांगी. उनकी सद्भावना को देखते हुए लोग उन्हें क्षमा कर देते थे. मगर एक यहूदी ने उन्हें क्षमा नहीं किया. उनके ज़्यादा आग्रह करने पर उसने शर्त रखी कि अगर वे वहां स्थित एक टीले को हटा दें, तो वह उन्हें क्षमा कर देगा. इस पर फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ ने टीले की मिट्टी को अपने सिर पर ढोना शुरू कर दिया. इसी दौरान एक भयंकर आंधी आई और टीले को उड़ाकर ले गई. इसके बाद उसने एक और शर्त रख दी कि अगर वे उसके सिरहाने रखी अशर्फ़ियों की थैली उठाकर उसे दे दें, तो वे उन्हें क्षमा कर देगा. उन्होंने ऐसा ही किया. यहूदी ने थैली खोली, तो वह हैरान रह गया. इसके बाद उसने यह शर्त रखी कि पहले मुझे मुसलमान कर लो, फिर माफ़ करूंगा और उन्होंने कलमा पढ़ाकर उसे मुसलमान कर लिया. इस्लाम क़ुबूल करने के बाद उसने बताया कि उसने तौरेत (धार्मिक ग्रंथ) में पढ़ा था कि जिसकी तौबा सच्ची होती है, उसके हाथ से मिट्टी भी सोना बन जाती है, लेकिन मुझे इस पर विश्वास नहीं था. इसलिए उसने थैली में मिट्टी भरकर रखी थी, जो उनका हाथ लगते ही सोना हो गई. मुझे यक़ीन हो गया कि आपका दीन सच्चा है.

फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ अपने अपराधों की सज़ा पाने के लिए ख़ुद बादशाह के दरबार में भी हाज़िर हुए और उससे दंड देने का आग्रह किया. मगर बादशाह ने उन्हें सज़ा देने की बजाय उनका आदर सत्कार किया.

एक बार की बात है कि फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ अपने बच्चे को गोद में लिए हुए प्यार कर रहे थे कि बच्चे ने सवाल किया कि क्या आप मुझे अपना महबूब समझते हैं. उन्होंने फ़रमाया कि बेशक. फिर बच्चे ने पूछा कि अल्लाह को भी महबूब समझते हैं. फिर एक दिल में दो चीज़ों की मुहब्बत कैसे जमा हो सकती है. यह सुनते ही बच्चे को गोद से उतार कर वे इबादत में मसरूफ़ हो गए. उनके बारे में मशहूर है कि उन्हें तीस साल तक किसी ने कभी हंसते हुए नहीं देखा, लेकिन जब उनके बेटे का इंतक़ाल हो गया, तो वे मुस्कराते रहे. जब लोगों ने इसकी वजह पूछी, तो उन्होंने फ़रमाया कि अल्लाह इसकी मौत से ख़ुश हुआ है, इसलिए मैं भी उसकी ख़ुशी में ख़ुश हूं.

फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ ने अपना सारा जीवन लोक कल्याण में व्यतीत किया. वे सत्संग कर लोगों को नेकी और सच्चाई के रास्ते पर चलने का उपदेश देते थे.  उनका जीवन मानवता से भटके लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है. आज दुनियाभर में जेहाद के नाम पर आतंक का माहौल है. जो लोग धर्म के नाम पर क़त्ले-आम कराते हैं, उन्हें फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ के जीवन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)

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हज़रत इब्राहिम-बिन-अदहम


फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत इब्राहिम-बिन-अदहम पहले बलख़ के बादशाह थे. मगर सूफ़ियाना रंग उन पर इस तरह चढ़ा कि उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर फ़क़ीर की ज़िन्दगी अपना ली. बलख़ छोड़कर वे मक्का आ गए और वहीं लकड़ियां काटकर अपना गुज़ारा करने लगे. लकड़ियां बेचकर उन्हें जो कुछ मिलता उसका एक बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंदों को बांट देते. उनका जीवन त्याग और जन कल्याण की एक बेहतरीन मिसाल है.

जब वे बलख़ के बादशाह थे, तो एक दिन छत पर सोते वक़्त उन्हें आहट सुनाई दी. इस पर उनकी नींद खुल गई और उन्होंने पूछा कि कौन है? तभी जवाब मिला कि तेरा परिचित. उन्होंने पूछा कि वह यहां क्या कर रहा है, तो जवाब मिला कि वह ऊंट ढूंढ रहा है. उन्होंने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा कि छत पर ऊंट भला कैसे मिल सकता है? इस पर जवाब मिला कि जब तू बादशाह रहते हुए अल्लाह को पाने की कामना कर सकता है, तो फिर छत पर ऊंट भी मिल सकता है. उनका दिल अल्लाह की इबादत की तरफ़ लगाने वाले हज़रत ख़िज्र (देवदूत) थे. इसी तरह एक दिन जब इब्राहिम-बिन-अदहम अपने दरबार में बैठे थे, तो तभी हज़रत ख़िज्र वहां आए और इधर-उधर कुछ ढूंढने लगे. इस पर बादशाह ने पूछा कि वे क्या तलाश रह हैं? हज़रत ख़िज्र ने जवाब दिया कि मैं इस सराय में ठहरना चाहता हूं. उन्होंने बताया कि यह सराय नहीं, बल्कि उनका महल है. हज़रत ख़िज्र ने सवाल किया कि इससे पहले यहां कौन रहता था. उन्होंने बताया कि इससे पहले उनके पूर्वज यहां रहते थे. फिर हज़रत ख़िज्र ने कहा कि इस स्थान पर इतने लोग रहकर जा चुके हैं, तो यह सराय ही है. यह कहकर वे चले गए.

जब बादशाह को उनकी बात का मतलब समझ आया, तो वे जंगल में चले गए. वहां उनकी मुलाक़ात एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग से हुई, जिन्होंने उन्हें इस्मे- आज़म की तालीम दी. वे हमेशा अल्लाह की इबादत में मसरूफ़ रहते. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात हज़रत ख़िज्र से हुई, जिन्होंने बताया कि वे बुज़ुर्ग उनके भाई इलियास हैं. इसके बाद उन्होंने हज़रत ख़िज्र से दीक्षा ली.

एक बार की बात है कि बादशाह शिकार के लिए जंगल में गए. जब उन्होंने हिरण का शिकार करने के लिए हथियार उठाया, तो वह बोल पड़ा और उनसे कहने लगा कि क्या अल्लाह ने उन्हें यह जीवन दूसरों को सताने के लिए ही दिया है? हिरण की बात सुनकर उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने कभी किसी को भी कष्ट न पहुंचाने का वादा करते हुए मानवता की सेवा करने का संकल्प लिया. दरअसल, जड़ या बेज़ुबान चीज़ों का बोलना इंसान के ज़मीर की आवाज़ होती है, जो उसे किसी भी ग़लत काम को करने से रोकती है. जो व्यक्ति अपने ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका अनुसरण करता है, वे बुराई के रास्ते पर जाने से बच जाता है. मगर जो लोग ज़मीर की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे मानवता को त्यागकर पशुवत प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जो बाद में समाज और स्वयं उनके लिए घातक सिद्ध होती है.

इब्राहिम-बिन-अदहम का राजपाट से मोह भंग हो गया था. वे अपनी पत्नी और दूधमुंहे बच्चे को छोड़कर जंगल की तरफ़ चले गए. वहां उन्होंने एक लकड़हारे को अपने शाही वस्त्र देकर उसके मामूली कपड़े ले लिए. इन्हीं कपड़ों को धारण कर वे आगे की यात्रा पर निकल पड़े. घूमते-घूमते वे नेशापुर पहुंच गए और वहां की एक गुफ़ा में अपना डेरा जमाया. इस गुफ़ा में उन्होंने नौ साल तक अल्लाह की इबादत की. इसी दौरान हफ़्ते में एक दिन वे जंगल से लकड़ियां काटते और उन्हें बाज़ार में बेचकर जो कुछ मिलता उसके कुछ हिस्से से रोटी ख़रीदते और बाक़ी हिस्सा ज़रूरतमंदों में बांट देते.

वे मुरीदों को हमेशा यह हिदायत करते थे कि कभी किसी औरत या कमसिन लड़के को नज़र भरकर नहीं देखना और हज के दौरान तो बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है, क्योंकि तवाफ़ में बहुत-सी औरतें और कमसिन लड़के भी शरीक होते हैं. एक बार तवाफ़ की हालत में एक लड़का सामने आ गया और न चाहते हुए भी उनकी निगाहें उस पर जम गईं. तवाफ़ के बाद मुरीदों ने कहा कि अल्लाह आप पर रहम करे, क्योंकि आपने हमें जिस चीज़ से रोकने की हिदायत की थी, आप ख़ुद उसमें शामिल हो गए. क्या आप इसकी वजह बयान कर सकते हैं?

उन्होंने फ़रमाया कि जब मैंने बल्ख़ छोड़ा था उस वक़्त मेरा बेटा छोटा बच्चा था और मुझे पूरा यक़ीन है कि यह वही बच्चा है. इसके बाद उनके एक मुरीद ने बच्चे को तलाश किया और उससे उसके वालिद के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह बलख़ के बादशाह इब्राहिम-बिन-अदहम का बेटा है, जो बरसों पहले सल्तनत छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए कहीं चले गए हैं. मुरीद ने उनके बेटे और बीवी को इब्राहिम-बिन-अदहम से मिलवाया. जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को गले से लगाया, तो उसकी मौत हो गई. जब मुरीद ने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा कि उन्हें ग़ैब से आवाज़ आई थी कि तू हमसे दोस्ती का दावा करता है और फिर अपने बेटे से भी मुहब्बत जताता है. यह सुनकर उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह ! या तो बेटे की जान ले ले या फिर मुझे मौत दे दे. अल्लाह ने बेटे के हक़ में दुआ क़ुबूल की.

एक बार की बात है कि इब्राहिम-बिन-अदहम दजला नदी के किनारे बैठे अपनी गुदड़ी सील रहे थे. तभी किसी आदमी ने आकर उनसे पूछा की बलख़ की सल्तनत छोडक़र आपको क्या मिला? उन्होंने एक सुई दरिया में डाल दी और इशारा किया. तभी हज़ारों मछलियां मुंह में एक-एक सोने की सुई लेकर सामने आ गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें तो केवल अपनी ही सुई चाहिए. फिर एक छोटी मछली मुंह में सुई लेकर सामने आ गई. उन्होंने उस आदमी को बताया कि सल्तनत छोड़ने के बाद उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि इंसान को हक़ीक़त में किस चीज़ की ज़रूरत होती है.

एक बार उन्होंने पानी के लिए कुएं में डोल डाला, तो उसमें सोना भरकर आ गया. दोबारा डालने पर डोल चांदी से भरा हुआ मिला और तीसरी बार डाला, तो उसमें हीरे और जवाहारात भरे हुए थे. चौथी बार डोल कुएं में डालते वक़्त उन्होंने कहा कि उन्हें तो सिर्फ़ पानी ही चाहिए. इसके बाद डोल पानी से भरा हुआ मिला. उन्होंने उस आदमी को समझाया कि धन-दौलत और एश्वर्य नश्वर हैं. मनुष्य का जीवन इनके बिना भी गुज़र सकता है, लेकिन अल्लाह की इबादत और जन सेवा ही मनुष्य के हमेशा काम आती है. अल्लाह भी दूसरों के लिए जीने वाले लोगों को ही पसंद करता है. वे कहते थे कि अल्लाह पर हमेशा यक़ीन रखना चाहिए, क्योंकि वे कभी किसी को मायूस नहीं करता.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)
तस्वीर गूगल से साभार
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हज़रत अबुल हसन ख़रक़ानी


फ़िरदौस ख़ान
अबुल हसन ख़रक़ानी प्रसिद्ध सूफ़ी संत हैं. उनका असली नाम अबुल हसन हैं, मगर ख़रक़ान में जन्म लेने की वजह से वे अबुल हसन ख़रक़ानी के नाम से विख्यात हुए. सुप्रसिद्ध ग्रंथकार हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार के मुताबिक़ एक बार सत्संग में अबुल हसन ख़रक़ानी ने बताया कि उन्हें उस वक़्त की बातें भी याद हैं, जब वे अपनी मां के गर्भ में चार महीने के थे.

अबुल हसन ख़रक़ानी एक चमत्कारी संत थे, लेकिन उन्होंने कभी लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी दैवीय शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया. वे कहते हैं कि अल्लाह अपने यश के लिए चमत्कार दिखाने वालों से चमत्कारी शक्तियां वापस ले लेता है. उन्होंने अपनी शक्तियों का उपयोग केवल लोककल्याण के लिए किया. एक बार उनके घर कुछ मुसाफ़िर आ गए, जो बहुत भूखे थे. उनकी पत्नी ने कहा कि घर में दो-चार ही रोटियां हैं, जो इतने मेहमानों के लिए बहुत कम पड़ेंगी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि सारी रोटियों को साफ़ कपड़े से ढककर मेहमानों के सामने रख दो. उनकी पत्नी ने ऐसा ही किया. मेहमानों ने भरपेट रोटियां खाईं, मगर वे कम न पड़ीं. मेहमान तृप्त होकर उठ गए, तो उनकी पत्नी ने कपड़ा हटाकर देखा, तो वहां एक भी रोटी नहीं थी. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि अगर और भी मेहमान आ जाते, तो वे भी भरपेट भोजन करके ही उठते.

वे बाहरी दिखावे में विश्वास न रखकर कर्म में यकीन करते थे. वे कहते हैं कि जौ और नमक की रोटी खाने या टाट के वस्त्र पहन लेने से कोई सूफ़ी नहीं हो जाता. अगर ऐसा होता, तो ऊन वाले और जौ खाने वाले जानवर भी सूफ़ी कहलाते. अबुल हसन ख़रक़ानी कहते हैं कि सूफ़ी वह है जिसके दिल में सच्चाई और अमल में निष्ठा हो. वे शिष्य नहीं बनाते थे, क्योंकि उन्होंने भी स्वयं किसी गुरु से दीक्षा नहीं ली थी. वे कहते थे कि उनके लिए अल्लाह ही सब कुछ है. मगर इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि सांसारिक लोग अल्लाह के इतने करीब नहीं होते, जितने संत-फ़कीर होते हैं. इसलिए लोगों को संतों के प्रवचनों का लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि संतों का तो बस एक ही काम होता है अल्लाह की इबादत और लोककल्याण के लिए सत्संग करना.

एक बार किसी क़ाफ़िले को ख़तरनाक रास्ते से यात्रा करनी थी. क़ाफ़िले में शामिल लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से आग्रह किया कि वे उन्हें कोई ऐसी दुआ बता दें, जिससे वे यात्रा की मुसीबतों से सुरक्षित रहें. इस पर उन्होंने कहा कि जब भी तुम पर कोई मुसीबत आए, तो तुम मुझे याद कर लेना. मगर लोगों ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया. काफ़ी दूरी तय करने के बाद एक जगह डाकुओं ने क़ाफ़िले पर धावा बोल दिया. एक व्यक्ति जिसके पास बहुत-सा धन और क़ीमती सामान था, उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद किया. जब डाकू क़ाफ़िले को लूटकर चले गए, तो क़ाफ़िले वालों ने देखा कि उनका तो सब सामान लुट चुका है, लेकिन उस व्यक्ति का सारा सामान सुरक्षित है. लोगों ने उससे इसकी वजह पूछी, तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अबुल हसन ख़रक़ानी को याद कर उनसे सहायता की विनती की थी. इस वाक़िये के कुछ वक़्त बाद जब क़ाफ़िला वापस ख़रक़ान आया, तो लोगों ने अबुल हसन ख़रक़ानी से कहा कि हम अल्लाह को याद करते रहे, मगर हम लुट गए और उस व्यक्ति ने आपका नाम लिया, तो वह बच गया. इस पर अबुल हसन ख़रक़ानी ने कहा कि तुम केवल ज़ुबानी तौर पर अल्लाह को याद करते हो, जबकि संत सच्चे दिल से अल्लाह को याद करते हैं. अगर तुमने मेरा नाम लिया होता, तो मैं तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ करता.

एक बार वे अपने बाग की खुदाई कर रहे थे, तो वहां से चांदी निकली. उन्होंने उस जगह को बंद करके दूसरी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से सोना निकला. फिर तीसरी और चौथी जगह से खुदाई शुरू की, तो वहां से भी हीरे-जवाहरात निकले, लेकिन उन्होंने किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया और फ़रमाया कि अबुल हसन इन चीज़ों पर मोहित नहीं हो सकता. ये तो क्या अगर दोनों जहां भी मिल जाएं, तो भी अल्लाह से मुंह नहीं मोड़ सकता. हल चलाते में जब नमाज़ का वक़्त आ जाता, तो वे बैलों को छोड़कर नमाज़ अदा करने चले जाते. जब वे वापस आते तो ज़मीन तैयार मिलती.

वे लोगों को अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करने की सीख भी देते थे. अबुल हसन ख़रक़ानी और उनके भाई बारी-बारी से जागकर अपनी मां की सेवा करते थे. एक रात उनके भाई ने कहा कि आज रात भी तुम ही मां की सेवा कर लो, क्योंकि मैं अल्लाह की इबादत करना चाहता हूं. उन्होंने अपने भाई की बात मान ली. जब उनके भाई इबादत में लीन थे, तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि ''अल्लाह ने तेरे भाई की मग़फ़िरत की और उसी के ज़रिये से तेरी भी मग़फ़िरत कर दी.'' यह सुनकर उनके भाई को बड़ी हैरानी हुई और उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह की इबादत की, इसलिए इसका पहला हकदार तो मैं ही था. तभी उसे ग़ैबी आवाज़ सुनाई दी कि ''तू अल्लाह की इबादत करता है, जिसकी उसे ज़रूरत नहीं है. अबुल हसन ख़रक़ानी अपनी मां की सेवा कर रहा है, क्योंकि बीमार ज़ईफ़ मां को इसकी बेहद ज़रूरत है.'' यानी, अपने माता-पिता और दीन-दुखियों की सेवा करना भी इबादत का ही एक रूप है. वे कहते थे कि मुसलमान के लिए हर जगह मस्जिद है, हर दिन जुमा है और हर महीना रमज़ान है. इसलिए बंदा जहां भी रहे अल्लाह की इबादत में मशग़ूल रहे. एक रोज़ उन्होंने ग़ैबी आवाज़ सुनी कि ''ऐ अबुल हसन जो लोग तेरी मस्जिद में दाख़िल हो जाएंगे उन पर जहन्नुम की आग हराम हो जाएगी और जो लोग तेरी मस्जिद में दो रकअत नमाज़ अदा कर लेंगे उनका हश्र इबादत करने वाले बंदों के साथ होगा.''

अपनी वसीयत में उन्होंने ज़मीन से तीस गज़ नीचे दफ़न होने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी. अबुल हसन ख़रक़ानी यह भी कहते थे कि किसी भी समाज को शत्रु से उतनी हानि नहीं पहुंचती, जितनी कि लालची विद्वानों और गलत नेतृत्व से होती है. इसलिए यह ज़रूरी है कि लोग यह समझें कि हक़ीक़त में उनके लिए क्या सही है और क्या ग़लत.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)

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हज़रत दाऊद ताई

फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत दाऊद ताई ने अपनी सारी ज़िन्दगी अल्लाह की इबादत में गुज़ारी. वे भक्ति, वैराग्य और त्याग का प्रतीक थे. हर व्यक्ति की तरह वे भी साधारण मनुष्य थे, लेकिन उनके जीवन में एक मोड़ ऐसा आया कि जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी. एक बार एक फ़क़ीर अल्लाह की मुहब्बत से सराबोर एक गीत गा रहा था-
कौन-सा तेरा चेहरा ख़ाक में नहीं मिले
और कौन-सी तेरी आंख ज़मीन पर नहीं बही
यह शेअर उनके दिल को छू गया. उन्होंने आत्ममंथन किया और फिर संसार और सांसारिक जीवन उन्हें व्यर्थ लगने लगा. बेख़ुदी की हालत में वह हज़रत इमाम अबु हनीफ़ा की ख़िदमत में हाज़िर हुए और पूरा वाक़िया उनसे बयान करके कहा कि मेरा दिल अब दुनिया भर गया है. आप कोई रास्ता बताएं कि दिल को कुछ सुकून हासिल हो. यह सुनकर इमाम साहब ने फरमाया कि एकांत में चले जाओ. उन्होंने ऐसा ही किया. कुछ वक़्त बाद इमाम साहब ने फ़रमाया कि अब यह बेहतर है कि लोगों से मिलो और उनकी बातों पर सब्र करो. इसके बाद वे संतों की संगत में रहने लगे. इसी दौरान प्रसिद्ध संत हबीब राई से उनकी मुलाक़ात हुई. संत से प्रभावित होकर उन्होंने उनसे दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए.

उन्हें विरासत में बीस दीनार मिले थे. वे उसी में ख़ुश रहते थे. जब किसी ने उनसे पूछा कि क्या संतों को धन का संग्रह करना शोभा देता है, तो उन्होंने कहा कि इन दीनारों की वजह उन्हें रोज़ी-रोटी के लिए कोई काम नहीं करना पड़ता और वे निश्चिंत होकर अल्लाह की इबादत कर सकते हैं. इसलिए ज़िन्दगीभर के लिए यह रक़म उनके लिए काफ़ी है. उन्हें अल्लाह की इबादत के अलावा किसी और चीज़ में कोई दिलचस्पी नहीं थी. दिन-रात वे इबादत में ही लीन रहते थे. इबादत की वजह से उन्होंने निकाह भी नहीं किया. जब उनके परिचित उनसे शादी की बात करते, तो वे कहते थे कि जब उनके पास अल्लाह के अलावा किसी और के लिए ज़रा भी वक़्त नहीं, तो फिर शादी करके किसी लड़की की ज़िन्दगी क्यों बर्बाद करूं. किसी ने पूछा दाढ़ी में कंघी क्यों नहीं करते, तो उन्होंने फ़रमाया कि अल्लाह से फ़ुर्सत मिले, तो करूं भी. उन्हें भोजन करने में वक़्त बर्बाद करना भी तकलीफ़देह महसूस होता था. इसलिए वे तरल भोजन ही करते थे. अगर किसी दिन तरल भोजन न मिलता, तो भोजन में पानी डालकर उसे पी लेते थे, ताकि अपना ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त अल्लाह की इबादत में ही बिता सकें.

वे जिस मकान में रहते थे, वह बहुत पुराना और जर्जर हालत में था. जब उसका एक हिस्सा गिर गया, तो वे दूसरे हिस्से में रहने लगे और जब वह भी ढह गया, तो दरवाज़े के पास आकर रहने लगे. जब मोहल्ले वालों ने कहा कि वे मकान की मरम्मत करा लें, तो उन्होंने कहा कि उन्हें अल्लाह की इबादत से इतना वक़्त ही नहीं मिलता कि वे घर की तरफ़ ध्यान दें. जिस प्रकार भारतीय दर्शन में इंद्रियों पर नियंत्रण को जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है, उसी प्रकार संत दाऊद ताई ने भी इंद्रियों पर नियंत्रण को सुखी जीवन का आधार क़रार दिया है. उनका कहना है कि इंद्रियों के सुख के जाल में फंसकर मनुष्य अच्छे-बुरे की पहचान भूल जाता है. वे ख़ुद भी इससे दूर रहते थे. एक बार की बात है कि रमज़ान के दिनों में वे धूप में बैठे अल्लाह की इबादत कर रहे थे. उनकी मां ने जब देखा कि रोज़े में भी वे चिलचिलाती धूप में बैठे हैं, तो उन्होंने दाऊद ताई से छांव में आ जाने के लिए कहा. इस पर दाऊद ताई ने कहा कि जब वे अल्लाह की इबादत के लिए बैठे थे, तब यहां छांव ही थी और अब यहां धूप आ गई, तो फिर वे केवल इंद्रियों के सुख के लिए छांव में क्यों आएं.

वे कहते थे कि मनुष्य को सीमित साधनों में ही संतुष्ट रहना चाहिए, क्योंकि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है. जब व्यक्ति की एक इच्छा पूरी हो जाती है, तो वे कोई और इच्छा पूरी करना चाहता है. एक के बाद एक इसी तरह इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों में वे अपना सारा जीवन बर्बाद कर लेता है. अगर मनुष्य अपनी इच्छाओं को सीमित रखे, तो वे ज़्यादा सुखी रह सकता है. ऐसा व्यक्ति समाज के लिए भी बेहद उपयोगी होता है. जब पैतृक संपत्ति में मिले उनके दीनार ख़त्म हो गए, तो उन्होंने एक ईमानदार व्यक्ति को अपना मकान बेच दिया, ताकि उन्हें हलाल की कमाई ही मिले. धीरे-धीरे उनकी यह रक़म भी ख़त्म होने लगी. हारून रशीद ने उन्हें कुछ अशर्फ़ियां भेंट करनी चाहीं, तो उन्होंने उन्हें लेने से साफ़ इंकार कर दिया. जब हारून रशीद ने उनसे आग्रह किया कि वे उनसे कम-से-कम एक अशर्फ़ी तो भेंट स्वरूप स्वीकार कर लें, तो उन्होंने कहा कि उनके पास जो रक़म है, वे उनके लिए काफ़ी है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अल्लाह से विनती की है कि जब उनके पास मौजूद यह राशि भी ख़त्म हो जाए, तो वह उन्हें इस संसार से बुला ले, ताकि उन्हें किसी का अहसान न लेना पड़े. अल्लाह ने अपने बंदे की दुआ को क़ुबूल किया. जब उनकी सारी रक़म ख़त्म हो गई, तो वे इस नश्वर संसार को छोड़कर सदा के लिए सर्वशक्तिमान अल्लाह के पास चले गए.

किसी ने संत दाऊद ताई को ख़्वाब में उड़ते हुए यह कहते सुना कि आज मुझे क़ैद से आज़ादी मिल गई है. सुबह वह व्यक्ति ख़्वाब की ताबीर पूछने के लिए दाऊद ताई के घर पास पहुंचा, तो उसे वहां उनके इंतक़ाल की ख़बर मिली. वह व्यक्ति अपने ख़्वाब की ताबीर समझ गया. रिवायत है कि इंतक़ाल के वक़्त आसमान से यह आवाज़ आई कि दाऊद ताई अपनी मुराद को पहुंच गया और अल्लाह तअला भी उनसे ख़ुश है. उन्होंने वसीयत की थी कि उन्हें दीवार के नीचे दफ़न किया जाए. उनकी इस वसीयत को पूरा कर दिया गया.

वे हमेशा दुखी रहते थे और फ़रमाया करते थे कि जिसे हर पल मुसीबतों का सामना करना हो, उसे ख़ुशी किस तरह हासिल हो सकती है. संत दाऊद ताई लोगों को परनिंदा से दूर रहने की सीख देते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को सदैव अपने अंदर झांककर देखना चाहिए. उसे आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि कहीं उसकी वजह से किसी दूसरे को दुख तो नहीं पहुंचा है. ऐसा करने से व्यक्ति अनेक बुराइयों से बच जाता है. एक बार संत दाऊद ताई से कोई ग़लती हो गई. अपनी ग़लती को याद कर वे अकसर रोने लगते. जब कोई उनसे रोने का कारण पूछता, तो वे कहते कि वे अपनी ग़लती को कभी भूल नहीं पाते. इसलिए रोने लगते हैं. वे कहते थे कि इंसान को अपनी ग़लतियों से सबक़ हासिल करना चाहिए और गुनाह के लिए अल्लाह से माफ़ी मांगनी चाहिए. बेशक, संत दाऊद ताई का जीवन लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है.

(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)
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हज़रत ज़ू-उल-नून मिस्री

फ़िरदौस ख़ान
प्रसिध्द सूफ़ी संत ज़ू-उल-नून मिस्र के रहने वाले थे. इसलिए उनका नाम ज़ू-उल-नून मिस्री पड़ा. लोग उन्हें नास्तिक समझते थे. मगर वे अल्लाह के सच्चे बंदे थे. उनका जीवन त्याग, भक्ति और सद्भावना का प्रतीक है. एक बार की बात है कि वे किश्ती में यात्रा कर रहे थे. इसी दौरान एक व्यापारी का क़ीमती मोती खो गया. किश्ती में सवार लोगों ने ज़ू-उल-नून मिस्री पर मोती की चोरी का संदेह जताते हुए उन्हें पीटना शुरू कर दिया. ज़ू-उल-नून मिस्री ने अल्लाह से दुआ की कि वह उनकी मदद करे, क्योंकि वे बेगुनाह हैं. तभी लोगों ने देखा कि हज़ारों मछलियां मुंह में एक-एक मोती लेकर सामने आ गईं. उन्होंने एक मोती लेकर व्यापारी को दे दिया. व्यापारी और उन्हें मारने वाले लोगों ने उनसे माफ़ी मांगी. इस वाक़िये के बाद उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई.

इस्लाम में ग़ैर मुस्लिमों के साथ अच्छा व्यवहार करने को कहा गया है. इस्लाम में यह भी कहा गया है कि जो मुसलमान ग़ैर मुस्लिमों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, अल्लाह उनको पसंद नहीं करता. एक बार ज़ू-उल-नून मिस्री को भी एक यहूदी पर इसी तरह की एक टिप्पणी करने की वजह से अल्लाह से फटकार खानी पड़ी थी. हुआ यूं कि ज़ू-उल-नून मिस्री ने देखा कि बर्फ़ पड़ने के मौसम में एक यहूदी बर्फ़ की चादर के ऊपर पक्षियों के लिए दाने डाल रहा है. इस पर ज़ू-उल-नून मिस्री ने पूछा कि वह क्या कर रहा है? यहूदी ने जवाब दिया कि वह ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पक्षियों को दाने डाल रहा है, क्योंकि बर्फ़ के कारण पक्षियों को दाने नहीं मिले होंगे और वे भूखे होंगे. मुसलमान होने के अभिमान में चूर ज़ू-उल-नून मिस्री ने कहा कि अल्लाह ग़ैर मुसलमानों के दाने डालने से ख़ुश नहीं होता. यहूदी ने जवाब दिया कि मेरा ईश्वर मुझे देख रहा है. बस, मेरे लिए यही काफ़ी है. इसके बाद हज के दिनों में ज़ू-उल-नून मिस्री ने देखा कि यहूदी बड़े उत्साह के साथ काबे की परिक्रमा कर रहा है. यह देखकर उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने अल्लाह से कहा कि उसने एक ग़ैर मुस्लिम को छोटे-से काम का इतना बड़ा तोहफ़ा क्यों दिया है. इस पर उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि अल्लाह के लिए सभी मनुष्य समान हैं. यह सुनकर ज़ू-उल-नून मिस्री को अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह और उस यहूदी से माफ़ी मांगी.

एक बार की बात है कि ज़ू-उल-नून मिस्री एक जंगल से गुज़र रहे थे. उन्होंने देखा कि एक पेड़ से एक अंधा पक्षी उतरा. ज़ू-उल-नून मिस्री सोच ही रहे थे कि यह बेचारा किस तरह अपना पेट भरता होगा. इतने में उस पक्षी ने ज़मीन को खोदना शुरू किया. ज़मीन में से दो प्यालियां निकलीं. सोने की प्याली में तिल थे और चांदी की प्याली में गुलाब जल था. उसने तिल खाए और गुलाब जल पिया. पेट भरने के बाद वह फिर से अपने पेड़ पर जाकर बैठ गया. यह माजरा देखकर ज़ू-उल-नून मिस्री को अल्लाह पर दृढ़ विश्वास हो गया. उन्होंने सोचा कि जिसे अल्लाह पर यक़ीन है, उसे किसी भी चीज़ के लिए फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है. वहां से वह जंगल में घूमने की गर्ज़ से आगे बढ़ गए, जहां उनके कुछ पुराने दोस्त मिल गए. घूमते-घूमते उन लोगों को जंगल में एक ख़ज़ाना मिला, जिसके ऊपर एक तख़्ती लगी थी. इस तख़्ती पर अल्लाह का नाम लिखा था. उनके दोस्तों ने ख़ज़ाना आपस में बांट लिया, लेकिन ज़ू-उल-नून मिस्री ने ख़ज़ाने की तरफ़ देखा तक नहीं और अल्लाह का नाम लिखी तख़्ती उठा ली. उन्होंने अदब से अल्लाह के नाम को चूमा, सिर और आंखों से लगाया. उसी रात उन्हें ख़्वाब में बशारत हुई कि- ''ऐ ज़ू-उल-नून मिस्री तूने अल्लाह के नाम की इज़्ज़त की. दौलत के बजाय अल्लाह के नाम को पसंद किया. इसके बदल में अल्लाह ने तेरे लिए इल्म और हिकमत के दरवाज़े खोल दिए हैं.''

ज़ू-उल-नून मिस्री लोगों को सादगी से जीवन जीने का उपदेश देते थे. वे कहते थे कि व्यक्ति को मेहनत की कमाई से जो भी मिले, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए. एक बार की बात है कि ज़ू-उल-नून मिस्री के एक शिष्य को विरासत में एक लाख दीनार मिले, तो उसने उन्हें ख़र्च करने का फ़ैसला किया. मगर ज़ू-उल-नून मिस्री ने उसके बालिग़ होने तक उसे ख़र्च करने से मना कर दिया. बालिग़ होने पर शिष्य ने सभी दीनार ज़रूरतमंदों में बांट दिए. एक दिन ज़ू-उल-नून मिस्री को पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो शिष्य को दीनार बांटने का अफ़सोस हुआ. इस पर ज़ू-उल-नून मिस्री ने मिट्टी की तीन गोलियां बनाकर मुट्ठी में बंद कीं. मुट्ठी खोली, तो वे बेशक़ीमती रत्न बन चुकी थीं. उन्होंने रत्नों को पानी में फेंक दिया और अपने शिष्य को नसीहत की कि फ़क़ीरों को दौलत से दूर ही रहना चाहिए.
लोग उन्हें धर्म-भ्रष्ट समझते थे. उन्होंने ख़लीफ़ा से ज़ू-उल-नून मिस्री की शिकायत की. ख़लीफ़ा ने उन्हें बुलाया, तो सिपाहियों ने उनके हाथों और पैरों में लोहे की बेड़ियां डालकर उन्हें दरबार में पेश किया. ख़लीफ़ा ने उन्हें कारागार में डलवा दिया. वे चालीस दिन तक क़ैद रहे. उनकी बहन प्रतिदिन उनके लिए रोटी लेकर आती थी. जब वे कारागार से आज़ाद हुए, तो उनकी बहन ने देखा कि सारी रोटियां वैसे ही रखी हुई हैं. ज़ू-उल-नून मिस्री ने एक भी रोटी नहीं खाई. बहन ने वजह पूछी, तो उन्होंने बताया कि दरोग़ा दुष्ट प्रवृत्ति का व्यक्ति है. वे उसके हाथ से छूकर आई रोटियां भला कैसे खा सकते हैं? क़ैद से आज़ाद होकर जब वे ख़लीफ़ा के पास गए, तो उसने कई सवाल किए. उनके वाजिब जवाब सुनकर ख़लीफ़ा बहुत ख़ुश हुआ और उसने ज़ू-उल-नून मिस्री को सम्मान के साथ वापस मिस्र भेज दिया.

मिस्र के लोग उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते थे. इसके बावजूद ज़ू-उल-नून मिस्री के मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी. वे कहते थे कि वे तो हमेशा अल्लाह में की मुहब्बत और उसकी इबादत में लीन रहते हैं. इसलिए किसी और के बारे में कुछ भी सोचने का उनके पास ज़रा भी समय नहीं है. कहते हैं, जब उनका इंतक़ाल हुआ और लोगों ने जनाज़े की नमाज़ पढ़ी, तो उनकी एक अंगुली ऊपर को उठ गई, जिस तरह नमाज़ पढ़ने के दौरा न एक आयत पढ़ने पर अंगुली उठाते हैं. लोगों ने जब यह देखा, तो उन्हें बहुत हैरानी हुई. उन्होंने अंगुली को सीधा करने की बहुत कोशिश की, मगर वह सीधी नहीं हुई. जब मिस्र वालों को इसकी जानकारी मिली, तो उन्हें बहुत दुख पहुंचा, क्योंकि उन्होंने ज़िन्दगीभर ज़ू-उल-नून मिस्री के साथ दुशमनों जैसा बर्व्यताव किया. उनकी उठी हुई अंगुली इस बात का सबूत थी कि उन्हें अल्लाह के सिवा किसी और से कोई भी वास्ता नहीं था. इसलिए उन्होंने मिस्र के लोगों के प्रति कभी अपने मन में कोई द्वेष-भाव नहीं रखा.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)
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प्रकाश स्तंभ जैसी किताब : इंद्रेश कुमार


हमारी किताब ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया गया है...  इसकी ‘प्रस्तावना’ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इंद्रेश कुमार ने लिखी है...इसी प्रस्तावना को यहां प्रकाशित कर रही हूं...

लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.

इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) हज, (4) रो्ज़ा और (5) ज़कात. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.

इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.

हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.

एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं

शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया

इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.

भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.

मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
(लेखक इंद्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)

किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) 
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan
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विश्व पुस्तक मेले में हमारी किताब...




विश्व पुस्तक मेले में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर हमारी किताब
यूं तो पुस्तक प्रेमियों को हमेशा ही विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतज़ार रहता है...लेकिन इस बार बात अलग थी...क्योंकि हमारी किताब भी विश्व पुस्तक मेले में प्रदर्शित होने वाली थी...वो दिन भी आया जब राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे पुस्तक मेले में हमारी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' भी छाई रही... इसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने शाया किया है. अपनी किताब को यहां देखकर बेहद ख़ुशी हुई...जैसा नाम से ही ज़ाहिर होता है...हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों और फ़क़ीरों  की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्‍तुत किया गया है...

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित 19वां विश्व पुस्तक मेला राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में 30 जनवरी को शुरू हुआ. सात फ़रवरी तक चले इस पुस्तक मेले का उदघाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने किया. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि विश्व पुस्तक मेला एक संवृद्ध विरासत है. इस पुस्तक मेले का मक़सद हज़ारों किताबों  को ज़्यादा से ज़्यादा  लोगों तक पहुंचाना है. अपने एक संदेश में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल  ने कहा कि किताबें मानव ज्ञान का भंडार हैं और यह महत्वपूर्ण है कि देश के पाठकों के लिए सभी क्षेत्र से जुड़ी पुस्तकें उपलब्ध हों.
देश-विदेश के तक़रीबन 1,200 प्रकाशकों ने पुस्तक मेले में अपनी किताबों की प्रदर्शनी लगाई. तक़रीबन  4,200 वर्गमीटर में फैले इस मेला क्षेत्र में 2,400 बुक स्टॉल लगाए गए.  इस साल पिछले साल से ज़्यादा स्टॉल लगे.  हालत यह रही कि हॉल के बाहर भी काफ़ी जगह प्रकाशकों को दी गई . मेले में तक़रीबन 90  फ़ीसदी अंग्रेजी की किताबें थीं.  अमेरिका और ब्रिटेन के बाद हिन्दुस्तान अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन का तीसरा सबसे बड़ा देश है. हिन्दुस्तान दुनिया के बड़े पुस्तक बाजारों में एक है और इसी वजह से दुनियाभर के प्रकाशकों ने हिन्दुस्तान का रुख़ किया है. साल 2006 के फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में दूसरी बार अथिति देश होना, साल 2009 के लंदन पुस्तक मेले का ‘मार्केट फोकस’ होना और 2009 के मास्को पुस्तक मेले में अथिति देश होना पुस्तक बाज़ार में हिन्दुस्तान के महत्व को रेखांकित करता है. अन्य भाषाओं का ज़िक्र करें तो यहां 18 से ज़्यादा भाषाओं में किताबें प्रकाशित होती हैं.  यहां विभिन्न भाषाओं के 12 हज़ार से ज़्यादा प्रकाशक हैं, जो हर साल तक़रीबन एक लाख किताबें प्रकाशित करते हैं. यहां सबसे ज़्यादा किताबें क्षेत्रीय भाषाओं में छपती हैं. इनमें हिंदी पहले स्थान पर है.

इस बार का मेला राष्ट्रकुल खेल को समर्पित किया गया था. इस पुस्तक मेले की विषय वस्तु ‘रीडिंग अवर कॉमनवेल्थ’ यानी ‘हमारे साझा वैभव का अध्ययन’ थी. राष्ट्रकुल खेल के नाम एक पूरा पवेलियन था, जिसमें खेल से जुड़ी दुनियाभर की किताबें थीं.  इसके लिए कैटलॉग भी बनाया गया था, ताकि बाद में भी उन किताबों के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की जा सके. देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू पर अलग से किताबें प्रदर्शित की गईं . इनमें नेहरू पर लिखी दुनियाभर की किताबों को शामिल किया गया. मेले में एक बाल पवेलियन भी था, जिसमें अनेक एनजीओ द्वारा बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियां शामिल थीं.

ग़ौरतलब है कि मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट द्वारा हर दूसरे साल विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है. यह एक स्वायत्त संगठन है और इसका काम किताबों को बढ़ावा देना है. इसके अलावाब भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन सह-संयोजक के तौर पर इस मेले में शामिल रहता है. यह भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तत्वावधान में काम करता है. यह देश के व्यापार और उद्योगों के विकास के लिए काम करता है. विश्व  पुस्तक मेले के आयोजन का मक़सद जनमानस में किताबों के लिए दिलचस्पी  पैदा करना है.

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा  द्विवार्षिक विश्व पुस्तक मेला पहली बार 1972 में दिल्ली के विंडसर पैलेस इलाक़े में लगा था. तक़रीबन 7780 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित इस मेले में 200 प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था. अगली बार यानी 1976 में लगे दूसरे विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशकों की तादाद बढ़कर 266 हो गई थी.  इस साल 42,839 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित 19वें विश्व पुस्तक मेले में 1234 प्रकाशकों ने शिरकत की. 2006 में आयोजित पुस्तक मेले में 10 लाख से ज़्यादा लोग आए थे, जबकि इस साल इनकी तादाद तक़रीबन 20 लाख तक पहुंच गई थी.

दुनियाभर के प्रकाशक सैकड़ों नई किताबें लेकर आए. प्रभात प्रकाशन के प्रमुख प्रभात कुमार ने बताया कि वे पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृषण आडवाणी की मेरा देश मेरा जीवन और फ़िरदौस ख़ान की किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत के सहित कई अच्छी किताबें लेकर आए, जिन्हें बहुत सराहा गया. राजकमल प्रकाशन की किताबें भी मेले में छाई रहीं. किताब घर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत का कहना है कि वे 35 नईं किताबें लेकर आए. इनमें साहित्यिक पुस्तकों के अलावा ज्ञान-विज्ञान से संबंधित किताबें भी शामिल थीं. ओशियन बुक्स के निदेशक डॉ. पीयूष कुमार भी हिंदी और अंग्रेजी की सौ से ज़्यादा नई किताबें लाए., जिनमें हिंदी की किताबें ज़्यादा थीं. रॉली बुक्स और डायमंड बुक्स ने भी कई नई किताबें प्रदर्शित कीं.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार कहते हैं- लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफलताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे. मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.




किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत 
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये


प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006


प्रभात प्रकाशन 
4/19, आसफ़  अली रोड, दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 23289555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan





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