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ग़ालिब की डायरी है दस्तंबू


फ़िरदौस ख़ान
हिन्दुस्तान के बेहतरीन शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने उर्दू शायरी को नई ऊंचाई दी. उनके ज़माने में उर्दू शायरी इश्क़, मुहब्बत, विसाल, हिज्र और हुस्न की तारी़फों तक ही सिमटी हुई थी, लेकिन ग़ालिब ने अपनी शायरी में ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को शामिल किया. उनकी शायरी में हक़ीक़त के रंग हैं, तो फ़लसफ़े की रोशनीभी है. हालांकि उस व़क्त कुछ लोगों ने उनका मज़ाक़ भी उ़डाया, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की. यहां तक कि ब्रिटिश हुकूमत को भी उन्होंने काफ़ी सराहा. उन्होंने 1857 के आंदोलन के दौरान रूदाद लिखी. फ़ारसी में लिखी इस रूदाद को दस्तंबू नाम से प्रकाशित कराया गया फ़ारसी में दस्तंबू का मतलब है फूलों का गुलदस्ता.

हाल में राजकमल ने दस्तंबू का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है. फ़ारसी से इसका हिंदी अनुवाद डॉ. सैयद ऐनुल हसन और संपादन अब्दुल बिस्मिल्लाह ने किया है. मिर्ज़ा ग़ालिब दस्तंबू के ज़रिए अंग्रेजों से कुछ आर्थिक सहायता हासिल करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मुंशी हरगोपाल तफ्त को कई लंबे-लंबे ख़त लिखकर किताब को जल्द प्रकाशित कराने का अनुरोध किया. इन ख़तों को भी इस किताब में प्रकाशित किया गया है. इसके साथ ही किताब के आख़िर में क्वीन विक्टोरिया की शान में लिखा क़सीदा भी है, जिससे अंग्रेज़ों के प्रति ग़ालिब की निष्ठा को समझा जा सकता है, भले ही वह उनकी मजबूरी ही क्यों न हो!

दरअसल, मिर्ज़ा ग़ालिब की इस डायरी में 1857 के हालात को पेश किया गया है. अंग्रेज़ों के दमन से परेशान होकर जब हिंदुस्तान के जांबाज़ों ने 31 मई, 1857 को सामूहिक विद्रोह करने का फ़ैसला किया, तब सैनिक मंगल पांडे ने 29 मार्च, 1857 को चर्बी लगे कारतूसों का इस्तेमाल करने से इंकार करके इस आंदोलन की शुरुआत की. नतीजतन, मंगल पांडे को गिरफ्तार कर लिया गया और 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें अंतत: फांसी दे दी गई. इस पर भारतीय सैनिकों ने बग़ावत करते हुए 10 मई, 1857 को ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया. आंदोलन की आग सबसे पहले मेरठ में भड़की. इसके बाद सैनिक दिल्ली आ गए और कर्नल रिप्ले को मार दिया. आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने भी सख्ती बरती और नरसंहार शुरू हो गया. उस वक़्त ग़ालिब पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाक़े में रहते थे. उन्होंने क़त्लेआम अपनी आंखों से देखा था. उनके कई दोस्त मारे जा चुके थे और कई दोस्त दिल्ली छो़डकर चले गए थे. ग़ालिब अकेले अपने घर में मुसीबत से भरी ज़िंदगी जी रहे थे. दस्तंबू में उन्होंने अपने तल्ख़ अनुभवों को मार्मिकता से पेश किया है. इसमें उन्होंने 11 मई, 1857 की हालत का काव्यात्मक वर्णन भी किया है. ख़ास बात यह है कि उन्होंने अंग्रेजों की प्रशंसा करते हुए बाग़ियों को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई है.

किताब की शुरुआत हम्द यानी ईश प्रार्थना से हुई है और इसके बाद ग़ालिब ने अपनी रूदाद लिखी है. वह लिखते हैं-
मैं इस किताब में जिन शब्दों के मोती बिखेर रहा हूं, पाठकगण उनसे अनुमान लगा सकते हैं कि मैं बचपन से ही अंग्रेज़ों का नमक खाता चला आ रहा हूं. दूसरे शब्दों में कहना चाहिए कि जिस दिन से मेरे दांत निकले हैं, तब से आज तक इन विश्वविजेताओं ने ही मेरे मुंह तक रोटी पहुंचाई है. ज़ाहिर है कि ग़ालिब ने जिस अंग्रेज़ सरकार का नमक खाया था, वह उनकी नज़र में बेहद इंसाफ़  पसंद और मासूम सरकार थी. हालांकि ग़ालिब का रिश्ता मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र से भी था और ज़फ़र की शायरी के वह  उस्ताद थे. शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद्दौला के ख़िताब से नवाज़ा. बाद में उन्हें मिर्ज़ा नोशा के ख़िताब से भी सम्मानित किया गया. वह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में महत्वपूर्ण दरबारी थे. उन्हें बहादुर शाह ज़फ़र के ब़डे बेटे फ़क़रुद्दीन मिर्ज़ा का शिक्षक तैनात किया गया. इसके अलावा वह म़ुगल दरबार के शाही इतिहासकार भी रहे. इसके बावजूद वह बादशाह से मुतमईन नहीं थे. वे लिखते हैं-
मैं हफ्ते में दो बार बादशाह के महल में जाता था और अगर उसकी इच्छा होती, तो कुछ समय वहां बैठता था, अन्यथा बादशाह के व्यस्त होने की वजह से थोड़ी देर में ही दीवान-ए-ख़ास से उठकर अपने घर की ओर चल देता था. इस बीच जांची हुई रचनाओं को या तो ख़ुद वहां पहुंचा देता या बादशाह के दूतों को दे देता था, ताकि वे बादशाह तक पहुंचा दें. बस, मेरा इतना ही काम था और दरबार से मेरा इतना ही नाता था. हालांकि यह छोटा-सा सम्मान, मानसिक और शारीरिक दृष्टि से आरामदायक और दरबारी झगड़ों से दूर था, लेकिन आर्थिक दृष्टि से सुखप्रद नहीं था. उस पर भी ग्रहों का चक्कर मेरे इस छोटे-से सम्मान को मिट्टी में मिला देने पर तुला हुआ था.

अंग्रज़ों से ग़ालिब को आर्थिक संरक्षण भी मिला और सम्मान भी. लिहाज़ा वह उनके प्रशंसक हो गए. अंग्रेजों और भारतीयों की तुलना करते हुए वह लिखते हैं-
एक वह आदमी, जो नामवर और सुविख्यात था, उसकी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल गई थी. दूसरा वह, जिसके पास न इज्ज़त थी और न ही दौलत, उसने अपना पांव चादर से बाहर फैला दिया.

दरअसल, ग़ालिब शासक को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे, इसलिए उनकी नज़र में राजद्रोह का मतलब देशद्रोह था. वह ख़ुद कहते हैं-
ख़ुदा जिसे शासन प्रदान करता है, निश्चय ही उसे धरती को जीतने की शक्ति भी प्रदान करता है. इसलिए जो व्यक्ति शासकों के विरुद्ध कार्य करता है, वह इसी लायक़ है कि उसे सिर पर जूते पड़ें. शासित का शासक से लड़ना अपने आपको मिटाना है.

ग़ालिब पहले शायर नहीं थे, जिन्होंने राज दरबार के प्रति अपनी निष्ठा ज़ाहिर की, बल्कि उस दौर के अनेक साहित्यकारों ने ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया. भारतेन्दु हरिश्चंद्र पर भी इस तरह के आरोप लगे, लेकिन ग़ालिब का अपना अंदाज़ था. हालांकि भारतेन्दु ने अंग्रेज़ी शासन की आलोचना भी की. भले ही ग़ालिब ने दस्तंबू में अंग्रेज़ी हुकूमत की सराहना की है, लेकिन शायरी के लिहाज़ से यह किताब लाजवाब है. अंग्रेज़ों की मौत का ज़िक्र करते हुए वे लिखते हैं-
दुख होता है उन रूपवती, कोमल, चंद्रमुखी और चांदी जैसे बदन वाली अंग़्रेज महिलाओं की मौत पर. उदास हो जाता है मन, उन अंग्रेज़ बालकों के असामयिक अंत पर, जो अभी संसार को भली-भांति देख भी नहीं पाए थे. स्वयं वे फूलों की भांति थे और फूलों को देखकर हंस पड़ते थे.
उन्होंने विद्रोह के दौरान दिल्ली के बाशिंदों की बदहाली का भी बेहद मार्मिक वर्णन किया है. वह लिखते हैं-
15 सितंबर से हर घर बंद प़डा हुआ है. न तो कोई सौदा बेचने वाला है और न ही कोई ख़रीदने वाला. गेहूं बेचने वाले कहां हैं कि उनसे गेहूं ख़रीदकर आटा पिसवा सकूं. धोबी कहां, जो कपड़ों की बदबू दूर हो. नाई कहां, जो बाल काटे. भंगी कहां, जो घर का कूड़ा साफ़ करे.
जब दिल्ली में क़त्लेआम हो रहा था, तब ग़ालिब अपने घर में बंद थे. वह लिखते हैं-ऐसे वातावरण में मुझे कोई भय नहीं था. ऐसे में मैंने ख़ुद से कहा कि मैं क्यों किसी से भयभीत रहूं. मैंने तो कोई पाप किया नहीं है, इसलिए मैं सज़ा का पात्र नहीं हूं. न तो अंग्रेज़ बेगुनाह को मारते हैं, और न ही नगर की हवा मेरे प्रतिकूल है. मुझे क्या पड़ी है कि ख़ुद को हलकान करूं. मैं एक कोने में, अपने घर में ही बैठा अपनी क़लम से बातें करूं और क़लम की नोक से आंसू बहाऊं. यही मेरे लिए अच्छा है.
मेरी खोली ख़ाली है
मेरे आशा-तरु के पत्ते झ़ड चुके हैं
या ख़ुदा ! मैं कब तक इस बात से ख़ुश होता रहूं
कि मेरी शायरी हीरा है
और ये हीरे मेरी ही खान के ख़ज़ाने हैं
ग़ालिब क़िस्मत पर बहुत यक़ीन करते थे, तभी तो वह लिखते हैं-
जन्म से जो भाग्य में लिखा है, उसे बदला नहीं जा सकता. हर जन्मी का भाग्य एक अदृश्य फ़रमान में बंद है, जिसमें न कोई आरंभ है और न कोई अंत. सभी को वही मिला है, जो उस फ़रमान में लिखा हुआ है. हमारे सुख और दुख उसी से संचालित हैं. इसलिए हमें बुज़दिल और डरपोक नहीं होना चाहिए, बल्कि छोटे बच्चों की भांति वक़्त के रंगों का हंसी-ख़ुशी तमाशा देखना चाहिए.

बहरहाल, इस किताब के ज़रिये राजकमल प्रकाशन ने हिंदी पाठकों को मिर्ज़ा ग़ालिब की दस्तंबू से रूबरू होने का मौक़ा दिया है, जो सराहनीय है. दरअसल, अनुवाद के ज़रिए हिंदी पाठक उर्दू, फ़ारसी और अन्य भाषाओं की महान कृतियों को पढ़ पाते हैं. किताब के आख़िर  में मुश्किल शब्दों का अर्थ दिया गया है, जिससे पाठकों को इसे समझने में आसानी होगी. कुल मिलाकर यह एक बेहतरीन किताब है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी) 

समीक्ष्य कृति : दस्तंबू 
लेखक : मिर्ज़ा ग़ालिब
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
क़ीमत : 200 रुपये

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मैं तुझे फिर मिलूंगी...


फ़िरदौस ख़ान
अमृता प्रीतम की रचनाओं को पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है...शायद इसलिए कि उन्होंने भी वही लिखा जिसे उन्होंने जिया...
अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा. पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त, 1919 में जन्मी अमृता प्रीतम पंजाबी की लोकप्रिय लेखिका थीं. उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने क़रीब एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है. उनकी कई रचनाओं का अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. अमृता की पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हुई. इसमें उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए उसके वक़्त के हालात बयां किए थे.
अज्ज आखां वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरक़ा फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां तैनू वारिस शाह नू कहिण

ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया. इससे पहले उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत किया गया. अमृता को 1988 में अंतरराष्ट्रीय बल्गारिया वैरोव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें 1982 में देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया. अमृता प्रीतम जनवरी 2002 में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं. उनकी मौत 31 अक्टूबर, 2005 को नई दिल्ली में हुई.

अमृता प्रीतम ने रसीदी टिकट में अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखा है, यूं तो मेरे भीतर की औरत सदा मेरे भीतर के लेखक से सदा दूसरे स्थान पर रही है. कई बार यहां तक कि मैं अपने भीतर की औरत का अपने आपको ध्यान दिलाती रही हूं. स़िर्फ लेखक का रूप सदा इतना उजागर होता है कि मेरी अपनी आंखों को भी अपनी पहचान उसी में मिलती है. पर ज़िंदगी में तीन वक़्त ऐसे आए हैं, जब मैंने अपने अंदर की सिर्फ़ औरत को जी भर कर देखा है. उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया. वहां उस वक़्त थोड़ी सी भी ख़ाली जगह नहीं थी, जो उसकी याद दिलाती. यह याद केवल अब कर सकती हूं, वर्षों की दूरी पर खड़ी होकर. पहला वक़्त तब देखा था जब मेरी उम्र पच्चीस वर्ष की थी. मेरे कोई बच्चा नहीं था और मुझे प्राय: एक बच्चे का स्वप्न आया करता था. जब मैं जाग जाती थी. मैं वैसी की वैसी ही होती थी, सूनी, वीरान और अकेली. एक सिर्फ़ औरत, जो अगर मां नहीं बन सकती थी तो जीना नहीं चाहती थी. और जब मैंने अपनी कोख से आए बच्चे को देख लिया तो मेरे भीतर की निरोल औरत उसे देखती रह गई.

दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा था, जब एक दिन साहिर आया था, उसे हल्का सा बुख़ार चढ़ा हुआ था. उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था. उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने विक्स मली थी. कितनी ही देर मलती रही थी, और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खड़े-खड़े मैं पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र ग़ुजार सकती हूं. मेरे अंदर की सिर्फ़ औरत को उस समय दुनिया के किसी काग़ज़ क़लम की आवश्यकता नहीं थी.

और तीसरी बार यह सिर्फ़ औरत मैंने तब देखी थी, जब अपने स्टूडियो में बैठे हुए इमरोज़ ने अपना पतला सा बु्रश अपने काग़ज़ के ऊपर से उठाकर उसे एक बार लाल रंग में डुबोया था और फिर उठकर उस बु्रश से मेरे माथे पर बिंदी लगा दी थी. मेरे भीतर की इस सिर्फ़ औरत की सिर्फ़ लेखक से कोई अदावत नहीं. उसने आप ही उसके पीछे, उसकी ओट में ख़डे होना स्वीकार कर लिया है. अपने बदन को अपनी आंखों से चुराते हुए, और शायद अपनी आंखों से भी, और जब तक तीन बार उसने अगली जगह पर आना चाहा था, मेरे भीतर के सिर्फ़ लेखक ने पीछे हटकर उसके लिए जगह ख़ाली कर दी थी.

मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम को लेकर कई क़िस्से हैं. अमृता प्रीतम ने भी बेबाकी से साहिर के प्रति अपने प्रेम को बयां किया है. वह लिखती हैं, मैंने ज़िंदगी में दो बार मुहब्बत की. एक बार साहिर से और दूसरी बार इमरोज़ से. अक्षरों के साये में जवाहर लाल नेहरू और एडविना पर लिखी एक किताब का हवाला देते हुए वह कहती हैं, मेरा और साहिर का रिश्ता भी कुछ इसी रोशनी में पहचाना जा सकता है, जिसके लंबे बरसों में कभी तन नहीं रहा था, सिर्फ़ मन था, जो नज़्मों में धड़कता रहा दोनों की.

लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिए आता था, तो जैसे मेरी ही ख़ामोशी से निकला हुआ ख़ामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था. वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था. और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े-छोटे टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी, एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले जलाती थी, और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं. वह कहती हैं-
मेरे इस जिस्म में
तेरा सांस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
उम्र की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क़ की महक
कुछ तेरी सांसों में
कुछ हवा में मिल गई

अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में इमरोज़ के बारे में भी विस्तार से लिखा है. एक जगह वह लिखती हैं:-
मुझ पर उसकी पहली मुलाक़ात का असर-मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था. मन में कुछ घिर आया, और तेज़ बुख़ार चढ़ गया. उस दिन-उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था-बहुत बुख़ार है? इन शब्दों के बाद उसके मुंह से केवल एक ही वाक्य निकला था- आज एक दिन में मैं कई साल बड़ा हो गया हूं.
कभी हैरान हो जाती हूं. इमरोज़ ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत, जो उसकी अपनी ख़ुशी का मुख़ालिफ़ है. एक बार मैने हंसकर कहा था, ईमू! अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिलता, और वह मुझे, मुझसे भी आगे, अपनाकर कहने लगा- मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ पढ़ते हुए ढूंढ लेता. सोचती हूं, क्या ख़ुदा इस जैसे इंसान से कहीं अलग होता है. अपनी एक कविता में वह अपने जज़्बात को कुछ इस तरह बयां करती है-
मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूं
कि वक़्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी

एक बार जब अमृता प्रीतम से पूछा गया कि ज़िंदगी में उन्हें किस चीज़ ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया तो जवाब में उन्होंने एक क़िस्सा सुनाते हुए कहा था, 1961 में जब मैं पहली बार रूस गई थी तब ताजिकस्तान में एक मर्द और एक औरत से मिली, जो एक नदी के किनारे लकड़ी की एक कुटिया बनाकर रहते थे. औरत की नीली और मर्द कि काली आंखों में क्षण-क्षण जिए हुए इश्क़ का जलाल था. पता चला अब कि साठ-सत्तर बरस की उम्र इश्क़ का एक दस्तावेज़ है. मर्द की उठती जवानी थी, जब वह किसी काम से कश्मीर से यहां आया था और उस नीली आंखों वाले सुंदरी की आंखों में खोकर यहीं का होकर रहा गया था और फिर कश्मीर नहीं लौटा. वह दो देशों की नदियों की तरह मिले और उनका पानी एक हो गया. वे यहीं एक कुटिया बनाकर रहने लगे. अब यह कुटिया उनके इश्क़ की दरगाह है औरत माथे पर स्कार्फ बांधकर और गले में एक चोग़ा पहनकर जंगल के पेड़ों की देखभाल करने लगी और मर्द अपनी पट्टी का कोट पहनकर आज तक उसके काम में हाथ बंटाता है. वहां मैंने हरी कुटिया के पास बैठकर उनके हाथों उस पहाड़ी नदी का पानी पीया और एक मुराद मांगी थी कि मुझे उनके जैसी ज़िंदगी नसीब हो. यह ख़ुदा के फज़ल से कहूंगी कि मुझे वह मुराद मिली है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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रहें न रहें हम, महका करेंगे…


फ़िरदौस ख़ान
मशहूर शायर एवं गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरारुल हसन ख़ान था. उनका जन्म एक अक्टूबर, 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद में हुआ था. उनके पिता पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक थे. मजरूह ने दरसे-निज़ामी का कोर्स किया. इसके बाद उन्होंने लखनऊ के तकमील उल तिब कॉलेज से यूनानी पद्धति की डॉक्टरी की डिग्री हासिल की. फिर वह हकीम के तौर पर काम करने लगे, मगर उन्हें यह काम रास नहीं आया, क्योंकि बचपन से ही उनकी दिलचस्पी शेरो-शायरी में थी. जब भी मौक़ा मिलता, वह मुशायरों में शिरकत करते. उन्होंने अपना तख़ल्लुस मजरूह रख लिया. शायरी से उन्हें ख़ासी शोहरत मिली. वह मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से विख्यात हुए.

उन्होंने अपना हकीमी का काम छोड़ दिया. एक मुशायरे में उनकी मुलाक़ात मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से हुई. 1945 में वह एक मुशायरे में शिरकत करने मुंबई गए, जहां उनकी मुलाक़ात फ़िल्म निर्माता ए आर कारदार से हुई. कारदार उनकी शायरी पर फ़िदा थे. उन्होंने मजरूह सुल्तानपुरी से अपनी फ़िल्म में गीत लिखने की पेशकश की, लेकिन मजरूह ने इससे इंकार कर दिया, क्योंकि वह फ़िल्मों के लिए गीत लिखने को अच्छा नहीं मानते थे. जब मजरूह ने जिगर मुरादाबादी को यह बात बताई, तो उन्होंने सलाह दी कि वह फ़िल्मों के लिए गीत लिखें, इससे उन्हें शोहरत के साथ-साथ दौलत भी हासिल होगी. मजरूह सुल्तानपुरी को जिगर मुरादाबादी की बात पसंद आ गई और फिर उन्होंने फ़िल्मों में गीत लिखना शुरू कर दिया. मशहूर संगीतकार नौशाद ने मजरूह सुल्तानपुरी को एक धुन सुनाई और उनसे उस धुन पर एक गीत लिखने को कहा. मजरूह ने उस धुन पर गेसू बिखराए, बादल आए झूम के, गीत लिखा. इससे नौशाद ख़ासे प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी नई फ़िल्म शाहजहां के लिए गीत लिखने की पेशकश कर दी. मजरूह ने हर दौर के संगीतकारों के साथ काम किया. वह वामपंथी विचारधारा से ख़ासे प्रभावित थे. वह प्रगतिशील लेखक आंदोलन से भी जुड़ गए थे. उन्होंने 1940 के दशक में मुंबई में एक नज़्म माज़-ए-साथी जाने न पाए, पढ़ी थी. तत्कालीन सरकार ने इसे सत्ता विरोधी क़रार दिया था. सरकार की तरफ़ से उन्हें माफ़ी मांगने को कहा गया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया. नतीजतन, उन्हें डेढ़ साल मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में बिताने पड़े. उनका कहना था-
मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर
लोग आते गए और कारवां बनता गया

मजरूह भले ही फ़िल्मों के लिए गीत लिखते रहे, लेकिन उनका पहला प्यार ग़ज़ल ही रही-
मिली जब उनसे नज़र बस रहा था एक जहां
हटी निगाह तो चारों तरफ़ थे वीराने

उन्होंने शायरी को महज़ मोहब्बत के जज़्बे तक सीमित न रखकर उसमें ज़िंदगी की जद्दोजहद को भी शामिल किया. उन्होंने ज़िंदगी को आम आदमी की नज़र से भी देखा और एक दार्शनिक के नज़रिये से भी. जेल में रहने के दौरान 1949 में लिखा उनका फ़िल्मी गीत-एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल… ज़िंदगी की सच्चाई को बयान करता है. बक़ौल बेकल उत्साही, मजरूह एक ऐसे शायर थे, जिनके कलाम में समाज का दर्द झलकता था. उन्हें एक हद तक प्रयोगवादी शायर और गीतकार भी कहा जा सकता है. उन्होंने अवध के लोकगीतों का रस भी अपनी रचनाओं में घोला था. इससे पहले शायरी की किसी और रचना में ऐसा नहीं देखा गया था. उन्होंने फ़िल्मी गीतों को साहित्य की बुलंदियों पर पहुंचाने में अहम किरदार निभाया. 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म ऊंचे लोग का यह गीत इस बात की तस्दीक करता है-
एक परी कुछ शाद सी, नाशाद-सी
बैठी हुई शबनम में तेरी याद की
भीग रही होगी कहीं कली-सी गुलज़ार की
जाग दिल-ए-दीवाना

1993 में उन्हें सिनेमा जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया. यह पुरस्कार पाने वाले वह पहले गीतकार थे. इसके अलावा 1965 में वह फ़िल्म दोस्ती में अपने गीत-चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे… के लिए फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए. मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशकों से भी ज़्यादा अरसे तक क़रीब तीन सौ फ़िल्मों के लिए तक़रीबन चार हज़ार गीत लिखे. मजरूह ने 24 मई, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी शायरी ने उन्हें अमर बना दिया. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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एक असाधारण सृजनशील कलाकार रबीन्द्रनाथ ठाकुर


फ़िरदौस ख़ान
रबीन्द्रनाथ ठाकुर को आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है. वे बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे. वे एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, जिन्हें 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इतना ही नहीं, वे एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं. भारत का राष्ट्रगान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएं हैं. ग़ौरतलब है कि उनका जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता के जो़डासांको ठाकुरबा़डी में हुआ था. उनकी शुरुआती शिक्षा सेंट ज़ेवियर स्कूल में हुई. इसके बाद 1878 में उन्होंने इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में दाख़िला ले लिया. फिर उन्होंने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में क़ानून का अध्ययन किया, लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए. दरअसल, बहुमुखी प्रतिभा के धनी रबीन्द्रनाथ का बचपन से ही कला के प्रति रुझान था और कविताएं और कहानियां लिखना उन्हें बेहद पसंद था. हालांकि उनके पिता देबेंद्रनाथ ठाकुर यही चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर वकील बने, लेकिन रबीन्द्रनाथ का मन कला और साहित्य को कब का समर्पित हो चुका था. आख़िरकार पिता को बेटे की ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा और उन्होंने रबीन्द्रनाथ पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां डाल दीं. 1883 में मृणालिनी देवी से उनका विवाह हुआ.

गौरतलब है कि रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था. उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और 1877 में महज़ सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी. उनकी शुरुआती रचनाओं में बनफूल और कवि काहिनी उल्लेखनीय हैं. किड़ओ कोमल, प्रभात संगीत, छबि ओ गान, मानसी में उनकी काव्य शैली का विकास सा़फ़ झलकता है. इसी तरह सोनार तरी नामक काव्य संग्रह में विश्व जीवन की आनंद चेतना का पहला स्वर फूटता है, जो चित्रा में बुलंदी तक पहुंचता है. उसी वक़्त नैवेद्य काव्य संग्रह में भक्ति के प्रति उनकी व्याकुलता नज़र आती है, जो बाद में गीतांजलि में और भी तीव्र हो उठती है. ब्रिटिश सरकार ने 1913 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया था, लेकिन जलियांवाला बाग़ के नरसंहार से मर्माहत होकर उन्होंने यह उपाधि वापस कर दी. 1916 में उनका काव्य संग्रह श्लाका प्रकाशित हुआ. इसके बाद पलातक, पूरबी, प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका, पत्रपुट, आरोग्य, शेषलेखा आदि काव्य संग्रह प्रकाशित हुए और ख़ूब सराहे भी गए. रबीन्द्रनाथ ठाकुर पारंपरिक बंधनों से मुक्त होकर सृजन करने में विश्वास करते थे. उन्होंने पद्य की तरह गद्य की रचना भी बचपन से ही शुरू कर दी थी. उनके निबंध उनके शिल्प कार्य केबेहतरीन उदाहरण हैं. इनमें विचारों की गंभीरता के साथ भाषा शैली भी उत्कृष्ट है. उनका श्रेष्ठ गद्य ग्रंथ जीवनस्मृति है, जिसमें जीवन के अनेक चित्र अंकित हैं. उन्होंने 1888 में आधुनिक बांग्ला साहित्य में छोटी कहानी का सृजन करके एक नई विधा की शुरुआत की, जिसे बाद में कई साहित्यकारों ने अपनाया.

1884 में उनका पहला उपन्यास करुणा प्रकाशित हुआ. उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में चोखेर बाली, नौका डूबी, गोरा, घरे-बाइरे आदि उल्लेखनीय हैं. नाटक के क्षेत्र में भी उन्होंने बेहतरीन काम किया. बाल्मीकि प्रतिभा और मायेर खेला उनके शुरुआती गीतिनाट्य हैं. राजा ओ रानी, विसर्जन और चित्रांगदा में उनकी उत्कृष्ट नाट्य प्रतिभा के दर्शन होते हैं. उनका सांकेतिक नाटक रक्तकरबी उनकी श्रेष्ठ कृतियों में से एक है. काव्य, स्वर, नाट्य और नृत्य से सजा उनका नाटक नटीर पूजा, श्यामा आदि भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं. शारदोत्सव, राजा, अचलायतन और फाल्गुनी भी उनके प्रसिद्ध नाटकों में शामिल हैं. उन्होंने तक़रीबन 2230 गीतों की भी रचना की, जो रबीन्द्र संगीत के नाम से जाने जाते हैं. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित उनके ये गीत ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने में समेटे हुए हैं.

रबीन्द्रनाथ ठाकुर सियालदह और शजादपुर स्थित अपनी पैतृक संपत्ति की देखभाल के लिए 1891 में पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) आ गए और तक़रीबन दस साल तक यहीं रहे. उन्होंने यहां के जनमानस के सुख-दुख को बेहद क़रीब से देखा और अपनी रचनाओं में उसका मार्मिक वर्णन भी किया, जिसे उनकी कहनानियों दीन-हीनों और छोटे-मोटे दुख में महसूस किया जा सकता है. वे प्रकृति प्रेमी थे, इसलिए वे चाहते थे कि विद्यार्थी प्रकृति के बीच रहकर अध्ययन करें. इसी मक़सद से 1901 में उन्होंने सियालदह छोड़ दिया और उसी साल शांति निकेतन नामक एक विद्यालय की स्थापना की, जो 1921 में विश्व भारतीय विश्वविद्यालय बन गया. उनकी रचनाओं में आसमान, सूरज, चांद, सितारे, बरसात, बलखाती नदियां, पेड़ और लहलहाते खेतों का मनोहारी चित्रण मिलता है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ और वे देश-विदेश में मशहूर हो गए. रबीन्द्रनाथ के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए. 1902 और 1907 के बीच उनकी पत्नी और उनके दो बच्चों की मौत हो गई. इस दुख से उबरने के लिए उन्होंने अपना सारा वक़्त काम में लगा दिया. एक वक़्त ऐसा भी आया, जब शांति निकेतन की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब हो गई. धन संग्रह के लिए गुरुदेव ने नाटकों का मंचन शुरू कर दिया. उस वक़्त महात्मा गांधी ने उन्हें साठ हज़ार रुपये का चेक दिया था. कहा जाता है कि रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने ही गांधी जी को महात्मा का विशेषण दिया था. ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त में उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया. यहां भी उन्होंने ज़िंदगी के तमाम रंगों को कैनवास पर उकेरा. उनके चित्र भी उनकी अन्य कृतियों की तरह दुनिया भर में सराहे गए. हालांकि उन्होंने चित्रकला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, बावजूद इसके उन्होंने ब्रुश, रूई और अपनी उंगलियों को रंग में डुबोकर कैनवास पर मन के भावों को उकेर दिया.

रबीन्द्रनाथ ठाकुर की मौत 7 अगस्त, 1941 को कलकत्ता में हुई. भले ही आज यह महान कलाकार हमारे बीच नहीं है, लेकिन अपनी महान रचनाओं के कारण वे हमेशा याद किए जाते रहेंगे. वे कहा करते थे, विश्वास वह पक्षी है, जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
कैफ़ियात मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी के सात काव्य संग्रहों का संकलन है, जिसमें इनकार, आख़िर-ए-शब, मसनवी, आवारा सजदे, इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा, इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा: दूसरा इजलास और मुतफ़र्रिक़ात शामिल हैं. 19 जनवरी 1909 को उत्तर प्रदेश के आज़मढ़ ज़िले के गांव मिज्वां में जन्मे कैफ़ी आज़मी का असली नाम अख़्तर हुसैन रिज़वी था. उन्होंने फ़िल्मों में भी गीत लिखे, जिन्हें सुनकर आज भी लोग झूम उठते हैं. उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. 1970 में उन्हें फ़िल्म सात हिन्दुस्तानी के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार दिया गया. इसके बाद 1975 में उन्हें आवारा सजदे के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. इसी साल उन्हें फ़िल्म गरम हवा के लिए फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला. 10 मई 2002 को मुम्बई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. उनकी मौत के क़रीब एक दशक बाद यह संकलन प्रकाशित हुआ है. इस बारे में शबाना आज़मी कहती हैं- “कैफ़ियात कैफ़ी साहब की कुल्लियात (समग्र) है. इसे उनकी ज़िन्दगी में प्रकाशित होना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं हो सका. मुझे इसका ग़म है.”

अपने बारे में कैफ़ी आज़मी कहते थे- “अपने बारे में यक़ीन के साथ सिर्फ़ इतना कह सकता हूं कि मैं महकूम (ग़ुलाम) हिन्दुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद हिन्दुस्तान में बूढ़ा हुआ और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में मरूंगा. यह किसी मज्ज़ूब की बड़ या दीवाने का सपना नहीं है. समाजवाद के लिए सारे संसार में और ख़ुद मेरे अपने देश में एक मुद्दत से जो अज़ीम जद्दोजहद हो रही है, उससे हमेशा जो मेरा और मेरी शायरी का ताल्लुक़ रहा है, इस यक़ीन ने उसी की कोख से जन्म लिया है.”

कैफ़ी आज़मी की चार बहनों की टीबी से मौत हो गई थी. इसलिए उनके वालिद सोचते थे कि उन्होंने अपने बेटों को अंग्रेज़ी तालीम दी है, इसलिए यह सब हो रहा है. उन्होंने फ़ैसला किया कि वह कैफ़ी को मौलवी बनाएंगे और इसके लिए उन्हें लखनऊ में सुल्तानुल मदारिस में दाख़िल करा दिया गया. यहां कैफ़ी ने छात्रों के साथ मिलकर एक कमेटी बनाई और अपनी मांगें पूरी कराने के लिए मुहिम शुरू कर दी. उन्होंने बैठकें कीं, हड़तालें कीं और आख़िर में अपनी मांगें मनवा कर ही दम लिया. इसी दौरान उन्होंने प्राइवेट इम्तिहान देकर कई डिग्रियां हासिल कर लीं, जिनमें लखनऊ यूनिवर्सिटी से दबीर माहिर (फ़ारसी), दबीर कामिल (फ़ारसी), आलिम (अरबी) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से आला क़ाबिल (उर्दू), मुंशी (फ़ारसी) और मुंशी कामिल (फ़ारसी) शामिल हैं. बक़ौल अफ़साना निगार आयशा सिद्दीक़ी- “कैफ़ी साहब को उनके बुज़ुर्गों ने एक दीनी मदरसे में इसलिए दा़ख़िल किया था कि वहां यह फ़ातिहा पढ़ना सीख जाएंगे. कैफ़ी साहब इस मदरसे में मज़हब पर फ़ातिहा पढ़कर निकल आए. कैफ़ी साहब ने ग्यारह साल की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल लिखी थी. बेगम अख़्तर ने इसे अपनी आवाज़ दी और यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान में मशहूर हो गई-
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े...”

किताब के शुरू में शबाना आज़मी भी अपने पिता की ज़िन्दगी के कई प्रसंगों को बयां करती हैं. वह लिखती हैं- “कैफ़ी साहब की ज़िन्दगी एक ऐसे इंसान, एक ऐसे शायर की कहानी है, जिसने ज़िन्दगी को पूरी तरह भरपूर जी कर देखा है और चौरासी बरस की उम्र में भी उनके हौसलों में कोई थकान नहीं दिखाई दी. 8 फ़रवरी 1973 को उन पर फ़ालिज का असर हुआ था. हम सबको लगा कि शायद आइन्दा वह कुछ न कर सकें. पांच दिनों बाद उन्हें होश आया. वह मुश्किल से बोल सकते थे. उसी हालत में उन्होंने शमा ज़ैदी को एक नज़्म लिखवाई- धमाका. उस धमाके के बारे में जो उन्होंने पांच दिन पहले अपने दिमाग़ में महसूस किया था और उसी महीने में अस्पताल से निकलने से पहले ही उन्होंने अपनी एक नज़्म ज़िन्दगी लिख डाली. मैं समझती हूं, ज़िन्दगी उनकी बेहतरीन नज़्मों में से एक है-
आज अंधेरा मेरी नस-नस में उतर जाएगा
आंखें बुझ जाएंगी, बुझ जाएंगे अहसास-ओ-शऊर
और ये सदियों से जलता सा, सुलगता-सा वजूद
इससे पहले कि मेरी बेटी के वो फूल से हाथ
गर्म रुख़सार को ठंडक बख़्शे
इससे पहले कि मेरे बेटे का मज़बूत बदन
जान-ए- मफ़्लूज में शक्ति भर दे
इससे पहले कि मेरी बीवी के होंठ
मेरे होंठों की तपिश पी जाएं
राख हो जाएगा जलते-जलते
और फिर राख बिखर जाएगी...

यह नज़्म निराशा और नाउम्मीदी पर नहीं, उस आशा और उम्मीद पर ख़त्म होती है कि एक दिन ज़िन्दगी मौत से डरना छोड़ देगी. दरअसल उनकी बात सिर्फ़ एक इंसान के दिल की बात नहीं, दुनिया के सारे इंसानों के दिलों की बात हो जाती है और महसूस करते हैं कि उनकी शायरी में सिर्फ़ उनका नहीं, हमारा आपका सबका दिल धड़क रहा है.”

कैफ़ी आज़मी अपनी बेटी शबाना से बहुत मुहब्बत करते थे. 18 सितम्बर 1974 को लिखी उनकी नज़्म ‘एक दुआ’ में उनकी यही मुहब्बत झलकती है-
अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझे
बस इक दुआ कि खु़दा तुझको कामयाब करे
वह टांक दे तेरे आंचल में चांद और तारे
तू अपने वास्ते जिसको भी इंतिख़ाब करे...

उन्होंने अपनी पत्नी शौकत आज़मी को सम्बोधित करते हुए एक नज़्म इंतिसाब (समर्पण) लिखी, जिसमें वह कहते हैं-
ऐसा झोंका भी इक आया था कि दिल बुझने लगा
तूने उस हाल में भी मुझको संभाले रक्खा
कुछ अंधेरे जो मिरे दम से मिले थे तुझको
आफ़रीं तुझको कि नाम उनका उजाले रक्खा
मेरे ये सजदे जो आवारा भी, बदनाम भी हैं
अपनी चौखट पे सजा ले जो तेरे काम के हों...

कैफ़ी को अपनी एक नज़्म बोसा के लिए अपने साथियों की आलोचना का शिकार होना पड़ा था. हुआ यूं कि टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन के मज़दूरों की हड़ताल के दौरान कैफी ने एक रूमानी नज़्म लिखी. मज़दूरों की ह़डताल नाकाम रही और उन्होंने इसके लिए उनकी नज़्म को ज़िम्मेदार ठहराया-
जब भी चूम लेता हूं इन हसीन आंखों को
सौ चिराग़ अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं
फूल क्या, शिगू़फ़े क्या, चांद क्या, सितारे क्या
सब रक़ीब क़दमों पर सर झुकाने लगते हैं
लम्हे भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है
लम्हे भर को सब पत्थर मुस्कराने लगते हैं...

उनकी नज़्म अंदेशे भी लोकप्रिय नज़्मों में शुमार की जाती है. इसमें प्रेमिका की मनोस्थिति का शानदार तरीक़े से चित्रण किया गया है. नज़्म का एक-एक लफ़्ज़ दर्द को अपने में समेटे नज़र आता है-
दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क आंखों ने पिए और न बहाए होंगे
बंद कमरे में जो ख़त मेरे जलाए होंगे
इक-इक हर्फ़ ज़मीं पे उभर आया होगा
उसने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी
मिट के इक ऩक्श ने सौ शक्ल दिखाई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तऱफ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा...

वे तरक़्क़ी पसंद इंसान थे. उन्होंने हमेशा अपनी बीवी और बेटी को भी यही सिखाया कि उनमें आत्मविश्वास हो और वे अपने पैरों पर खड़ी हों, अपने सपनों को साकार करें. यह सोच उनके कलाम में भी झलकती है-
जिसमें जलता हूं उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िन्दगी जेहद में है, सब्र के क़ाबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आंसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नकहत, ख़म-ए-गेसू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फलना-फूलना है तुझे...

वे गंगा-जमुनी तहज़ीब के पक्षधर थे. बाबरी मस्जिद की शहादत पर उन्होंने नज़्म दूसरा बनबास लिखी. इस नज़्म में सांप्रदायिकता पर कड़ा प्रहार किया गया है. कैफ़ी आज़मी लिखते हैं-
राम बनबास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया, जो नगर में आए
रक़्स-ए-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को स्रीराम ने सोचा होगा
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो घर में आए
पांव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहां खू़न के गहरे धब्बे
पांव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे
राजधानी की फ़िज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनबास मुझे...

कैफ़ियात एक बेहतरीन किताब है. इसकी ख़ास बात यह भी है कि इसमें फ़ारसी के शब्दों का हिन्दी अनुवाद दिया गया है, ताकि ग़ैर उर्दू भाषी पाठकों को इसे समझने में मुश्किल पेश न आए. कैफ़ी साहब का कलाम ख़ालिस उर्दू में है, इसलिए इससे उन लोगों को भी फ़ायदा होगा, जो उर्दू शायरी पसंद करते हैं, लेकिन फ़ारसी लिपि पढ़ नहीं सकते हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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फ़िरदौसी का शाहकार शाहनामा


न मीरम अज़इन, पस की मन ज़िन्देअम
कि तु़ख्मे सु़ख्न रा कराकन्दे अम

अपने इस शेअर में फ़ारसी के मशहूर शायर फ़िरदौसी कहते हैं कि मैं कभी मरूंगा नहीं, क्योंकि मैंने फ़ारसी शायरी के जो बीज बिखेरे हैं, वे दुनिया के रहने तक लहलहाते रहेंगे और मैं उनकी वजह से हमेशा ज़िंदा रहूंगा. बेशक, फ़िरदौसी ने अपने शेअर रूपी शब्द तहज़ीब की धरती पर बिखेर दिए और तब से शाहनामा की शक्ल में वे आज भी फ़िरदौसी को ज़िंदा रखे हुए हैं और रहती दुनिया तक उनके कलाम की रौशनी तहज़ीब की राहों को रौशन करती रहेगी.
शाहनामा के लिए फ़िरदौसी दुनिया भर में जाने जाते हैं. उनका जन्म 940 में ईरान के ख़ुरासान के तूस क़स्बे में हुआ था. उनका पूरा नाम अबू अल क़ासिम हसन बिन अली तूस है. उन्होंने अपनी कालजयी कृति शाहनामा में ईरान के उन बादशाहों के बारे में लिखा है, जिनसे वह मुतासिर रहे. शाहनामा में 60 हज़ार शेअर हैं. इसे पूरा करने में उन्हें 30 साल लग गए. उन्होंने 25 फ़रवरी, 1010 को इसे मुकम्मल किया. यह महान कृति उन्होंने सुल्तान महमूद ग़ज़नवी को समर्पित की, जिसने 999 में ख़ुरासान पर फ़तह हासिल की थी. कहा जाता है कि महमूद ग़ज़नवी ने फ़िरदौसी से वादा किया था कि वह शाहनामा के हर शेअर केलिए उन्हें सोने की एक दीनार देंगे. बरसों की मेहनत के बाद जब शाहनामा तैयार हो गया और फ़िरदौसी इसे लेकर महमूद ग़ज़नबी के दरबार में गए तो उन्हें हर शेअर के लिए एक दीनार नहीं, बल्कि एक दिरहम देने को कहा गया. इस पर नाराज़ होकर फ़िरदौसी लौट आए और उन्होंने एक दिरहम भी नहीं लिया. इस वादाख़िलाफ़ी से ग़ुस्साये फ़िरदौसी ने महमूद ग़ज़नबी के ख़िलाफ़ हज्व (निंदा कविता) लिखी, जिसके शेअर पूरी सल्तनत में आग की तरह फैल गए. सुल्तान की बदनामी होने लगी. महमूद ग़ज़नवी से उसके विश्वासपात्र मंत्रियों ने आग्रह किया कि फ़िरदौसी को उसी रक़म का भुगतान कर दिया जाए, जो तय हुई थी, क्योंकि इससे जहां उनकी बदनामी रुक जाएगी, वहीं इस अमर कृति के लिए सुल्तान का इक़बाल भी बुलंद होगा. सुल्तान को यह बात पसंद आई और उसने साठ हज़ार सोने की दीनारें ऊंटों पर लदवाकर फ़िरदौसी के पास भेज दीं. जिस वक़्त ये दीनारें फ़िरदौसी के घर पहुंचीं, उस वक़्त घर से उनका जनाज़ा निकल रहा था. पूरी उम्र मुफ़लिसी में काटने के बाद फ़िरदौसी की ज़िंदगी ख़त्म हो चुकी थी. यह रक़म फ़िरदौसी की इकलौती बेटी को देने की पेशकश की गई, लेकिन उसने इसे लेने से इंकार कर दिया. इस तरह सुल्तान हमेशा फ़िरदौसी का क़र्ज़दार रहा.
हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब फ़िरदौसी में प्रस्तुतकर्ता नासिरा शर्मा ने शाहनामा की कई रचनाओं को पेश किया है. इसके साथ ही उन्होंने शाहनामा की विशेषताओं पर भी रौशनी डाली है. फ़िरदौसी को शाहनामा लिखने का ख्याल क्यों आया, इस बारे में वह लिखती हैं-वह ईरान के प्रसिद्ध कवि दकीक़ी का ज़िक्र करना नहीं भूलते हैं, जिन्होंने शाहनामा को गशतासब नामा के नाम से लिखना शुरू किया था. मगर अपने ही ग़ुलाम के हाथों क़त्ल हो जाने की वजह से यह काम अधूरा छूट गया. उसको जब फ़िरदौसी ने पढ़ा, तो उस काम को पूरा करने का प्रण किया. इसके बाद अबू मंखूर बिन मोहम्मद और सुल्तान महमूद के प्रशंसा गान के बाद वास्तव में शाहनामा की शुरुआत हुई. इसकी शुरुआत ईरान के पहले बादशाह क्यूमर्स से होकर सासानी दौर के पतन पर ख़त्म होती है. इसमें मुहब्बत, बग़ावत, बहादुरी, जंग, इंसानित और हैवानियत के कई क़िस्से मिलते हैं. इसे तीनों हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहला वह जो लोक साहित्य पर आधारित है, दूसरा वह जो काल्पनिक कथाओं पर है और तीसरा वह जो ईरान का इतिहास है. इस महाकाव्य में फ़िरदौसी को अमर बनाने वाली कालजयी रचनाएं हैं, जो बार-बार पढ़ी और गाई जाती हैं, मसलन दास्तान-ए-बीज़न व मनीज़ा, सियावुश व सुदाबे, रुदाबे व जालज़र, रुस्तम व सोहराब, शतरंज की पैदाइश, शाह बहराम के क़िस्से, सिकंदर व क़ैद, जहाक़ व कावेह आहंगर आदि शामिल हैं.
दरअसल, अरबों की सत्ता का ध्वज जब ईरान पर फहराने लगा, तो ईरानी बुद्धिजीवियों के सामने भारी संकट खड़ा हुआ कि आख़िर  इस विदेशी सत्ता के साथ वे कैसा बर्ताव करें. इसी मुद्दे पर ईरानी बुद्धिजीवी वर्ग दो हिस्सों में विभाजित हो गया. एक वर्ग वह था, जो अरबी भाषा के बढ़ते सरोकार को पूर्णतया दरबार, धार्मिक स्थलों और जनसमुदाय में पनपता देख रहा था और सोच रहा था कि इस तरह से ईरानी भाषा और साहित्य का कोई नामलेवा नहीं बचेगा. शायद ईरानी विचार की भी गुंजाइश बाक़ी नहीं बचेगी और अरबी भाषा के साथ अरब विचार भी ईरानी दिल और दिमाग़ पर छा जाएंगे. इसलिए ज़रूरी है कि भाषा के झग़डे में न प़डकर ईरानी सोच को जीवित रखा जाए. इस वर्ग के ईरानी लेखक बड़ी संख्या में अरबी भाषा में उतना लेखन कार्य करने लगे और दरबार एवं विभिन्न स्थलों पर महत्वपूर्ण पद पाने लगे. दूसरा वर्ग पूर्ण रूप से अरब सत्ता से बेज़ार था. उसकी तरफ़ पीठ घुमाकर अपनी भाषा साहित्य को बचाने और संजोने की तीव्र इच्छा उसमें मचल उठी. सत्ता के विरोध में वह तलवार लेकर खड़ा तो नहीं हो सकता था, मगर वर्तमान को नकारते हुए भविष्य के लिए ज़रूर कुछ रच सकता था. इसी श्रेणी के बुद्धिजीवियों में सबसे पहला नाम फ़िरदौसी का है, जिसमें उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया है-
बसी रंज में बुर्दम दर इन साल सी
अजम ज़िन्दा करदम बेदिन पारसी
यानी तीस साल की कोशिशों से मैंने यह महाकाव्य रचा है और फ़ारसी ने अजम (गूंगा) को अमर बना दिया. यहां अजम शब्द की व्याख्या करना ज़रूरी हो जाता है. अरबी भाषा का उच्चारण चूंकि हलक़ पर ज़ोर देकर होता है, तो उसकी ध्वनि में एक तेज़ी और भारीपन होता है, जबकि फ़ारसी भाषा में उच्चारण करते हुए ज़्यादातर जीभ के बीच के हिस्से और नोक का इस्तेमाल होता है, जिससे शब्द मुलायम और सुरीली ध्वनि लिए निकलते हैं. इतनी मद्धिम ध्वनि सुनने की आदत चूंकि अरबों को नहीं थी, इसलिए उन्होंने उपेक्षा भाव से ईरानियों को गूंगा कहना शुरू कर दिया था.
शाहनामा का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. सबसे पहला अनुवाद अरबी भाषा में छठी सदी में हुआ था. कवाम उद्दीन अबुल़फतेह ईसा बिन अली इब्ने मोहम्मद इसफाहनी ने यह अनुवाद अयूब अल फ़ातेह ईसाबिन मुल्क अब्दुल अबूबकर के नाम किया था. इसके बाद 914 हिजरी में तातार अली टुनदी ने संपूर्ण शाहनामा का अनुवाद तुर्की भाषा में किया था. तुर्की भाषा गद्य में अनुवाद का काम मेहंदी साहिब मनसबान उस्मान के दरबार में पूरा हुआ. यह अनुवाद उस्मान को 1030 हिजरी में भेंट किया गया. कुछ साल बाद 1043 हिजरी में दाराशिकोह के बेटे हुमायूं के वक़्त लाहौर में उसके दरबार के तवक्कुल बक ने शमशीर खां की फ़रमाइश पर शाहनामा के कुछ हिस्सों का गद्य और पद्य में अनुवाद मुनर्ताखिब उल तवारी़ख नाम से फ़ारसी में किया गया. पश्चिमी देशों में शाहनामा का अनुवाद सबसे पहले लंदन में 1774 में डब्ल्यू योन्स ने किया, लेकिन पूरी कृति का अनुवाद करने वाले पहले स्वदेशी जोज़फ़ शामप्यून, जो कलकत्ता में 1785 में छपा था. इसके बाद लुडोल्फ़, हैगरमैन, पेरिस में 1802 में जॉन ओहसॉन के अनुवाद सामने आए. ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1811 में शाहनामा का अनुवाद फोर्ट विलियम कॉलेज में अरबी फ़ारसी के प्रोफ़ेसर लुम्सडेन से कराया. इसके अनुवादों की फ़ेहरिस्त ख़ासी लंबी है. 

ख़ुरासान प्रांत की राजधानी मशहद से कुछ दूरी पर नीशापुर में फ़िरदौसी की क़ब्र है. यहां एक बड़ा ख़ूबसूरत बाग़ है, जिसमें फ़िरदौसी की संगमरमर की मूर्ति है. फ़िरदौसी की क़ब्र के पास की दीवारों पर उनके शेअर लिखे हुए हैं. कहा जाता है कि सदियों पहले फ़िरदौसी को दफ़नाने के लिए जब किसी क़ब्रिस्तान में जगह नहीं मिली तो उन्हें इसी बाग़ में दफ़ना दिया गया. अब यह बाग़ फ़ारसी भाषा और साहित्य प्रेमियों के लिए एक दर्शनीय स्थल के तौर पर मशहूर हो चुका है. साहित्य प्रेमी अपने महबूब शायर को याद करते हुए यहां आते हैं. शाहनामा ईरान का इतिहास ही नहीं, बल्कि ईरानी अस्मिता की पहचान है. इस महाकाव्य की तुलना होमर के इलियड और महर्षि वेदव्यास के महाभारत से की जा सकती है. 
बहरहाल, यह किताब साहित्य प्रेमियों को बेहद पसंद आएगी, क्योंकि इसमें शाहनामा के बारे में संक्षिप्त मगर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है. इसके साथ ही इसमें शाहनामा की कई रचनाओं का हिन्दी  अनुवाद भी पेश किया गया है. 
समीक्ष्य कृति : फ़िरदौसी
प्रस्तुति : नासिरा शर्मा
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स
क़ीमत : 135 रुपये
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एक किताब जो आपकी ज़िंदगी बदल देगी


फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरती किसे नहीं भाती. हर इंसान ख़ूबसूरती से प्यार करता है, चाहे वह तन की हो या फिर मन की. वह ख़ूबसूरत चीज़ों को देखना चाहता है. हम फूलों को इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि वे बेहद ख़ूबसूरत होते हैं और हमें ख़ुशी देते हैं. इंसान ख़ुद को भी ख़ूबसूरत देखना चाहता है. इसलिए वह रंग-बिरंगी पोशाकें पहनता है, ज़ेवर से ख़ुद को सजाता-संवारता है और कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल कर अपना रंग-रूप निखारता है. लेकिन सिर्फ़ ख़ूबसूरती ही काफ़ी नहीं होती, इंसान के विचार, उसके काम और उसका मन ख़ूबसूरत होना लाज़िमी है. ये गुण इंसान को अपने परिवार से मिलते हैं. पहले के दौर में जहां इंसान में सिर्फ़ अच्छे गुण होना ही काफ़ी माना जाता था, वहीं आज के दौर में इंसान का जिस्मानी रूप से ख़ूबसूरत होना भी मायने रखने लगा है. ख़ूबसूरती आत्मविश्वास का पर्याय बनती जा रही है.  इंटरव्यू पर जाने से पहले लोग दिमाग़ी कसरत की बजाय अपने कपड़ों और मेकअप पर ज़्यादा तवज्जो देने लगे हैं. बदलते परिवेश के मद्देनज़र अब जगह-जगह ख़ूबसूरत बनाने के सेंटर भी खुलने लगे हैं. कोई क़द बढ़ाने का दावा करता है, तो कोई गोरा बनाने का. इंसान को सुडौल बनाने के लिए भी सेंटर खुले हुए हैं. बाज़ार में सौंदर्य से संबंधित कई किताबों की भी भरमार है.

हाल में डायमंड बुक्स ने नमिता जैन की एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है आख़िरी 5 किलो कैसे घटाएं. इस किताब में वज़न घटाने के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है. नमिता जैन जीवनशैली और वज़न नियंत्रण विशेषज्ञ हैं. इससे पहले उनकी चार सप्ताह में वज़न कैसे घटाएं और टीन फिटनेस गाइड नामक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. इस किताब में वह उन आख़िरी पांच किलो वज़न के बारे में बात कर रही हैं, जो अमूमन वज़न घटाने की प्रक्रिया के आख़िर में अटक कर रह जाता है. उन्होंने वज़न घटाने के लिए एक संपूर्ण पहल अपनाने पर ज़ोर दिया है, जिसमें डाइट और व्यायाम के साथ मानसिक सेहत भी शामिल है. दरअसल, डायटिंग करने वाले को एक खिलाड़ी की तरह होना चाहिए. जीतने के लिए शुरू ही नहीं, आख़िर भी अच्छा होना चाहिए. लेकिन होता इसका बिल्कुल उल्टा है, क्योंकि वज़न कम करने के लिए एक लक्ष्य की ज़रूरत होती है और आप अपने लक्ष्य के जितना क़रीब आते हैं, उसे पाना उतना ही मुश्किल होता है. बहुत-सी ऐसी किताबें हैं, जो आपको लक्ष्य शुरू करने के लिए प्रेरित करती तो हैं, पर आख़िर तक पहुंचा नहीं पातीं. इसके विपरीत बहुत-सी किताबें वज़न घटाने में बहुत मददगार साबित होती हैं. नमिता कहती हैं, जब भी वज़न घटाना हो तो सोच-समझकर संतुलित आहार लेना बहुत ज़रूरी हो जाता है. बेशक यह धीमी प्रक्रिया आपके धैर्य की परीक्षा लेती है, पर आख़िर में जीतते आप ही हैं.
उन्होंने किताब में उन लोगों के बारे में भी ज़िक्र किया है, जो ग़लत और हानिकारक तरीक़ों से वज़न घटाने के उपाय तलाशते हैं जैसे भूखे रहना या फिर व्यायाम की अति कर देना. अमूमन इन तरीक़ों को अपनाकर फ़ौरी तौर पर फ़ायदा तो पा लेते हैं, लेकिन वे जान नहीं पाते कि ये सब उनके लिए कितना नुक़सानदेह हो सकता है. आजकल हेल्थ फार्म का चलन बढ़ गया है और यहां जाकर लोग अपने वज़न को नियंत्रित करने में लगे हुए होते हैं, जबकि यह तभी तक आपके लिए फ़ायदेमंद हो सकता है, जब तक आप घर आकर भी उसी अनुशासित जीवनशैली को अपनाते हैं, जबकि ऐसा संभव नहीं हो पाता. उन्होंने संतुलित आहार लेने पर ज़ोर दिया है. वह कहती हैं, केवल भोजन की कैलोरी न गिनें, उस भोजन पर भी ध्यान दें, जिससे कैलोरी मिलती है. फिटनेस लक्ष्य के प्रति इन कुछ आख़िरी क़दमों में आपको एक ऐसा संपूर्ण भोजन चाहिए, जो आपको पूरी तरह से ऊर्जा और तंदुरुस्ती का तोहफ़ा दे सके. मिनिरल्स, प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ, फल-सब्ज़ियां, वसा और चीनी के मेल से आपका आहार संतुलित हो सकता है. किताब में विभिन्न कैलोरी की ज़रूरत के मुताबिक़ मेन्यू भी दिया गया है, ताकि हर व्यक्ति अपनी ज़रूरत के हिसाब से डाइट ले सके. आख़िरी पांच किलो वज़न घटाने की प्रक्रिया में सब चीज़ें बहुत महत्व रखती हैं, जो कुछ भी खाएं, उस पर नज़र रखनी होगी. कहीं ऐसा न हो कि आप भी यही कहती सुनाई दें कि मैं तो कुछ खाती ही नहीं, पता नहीं वज़न कैसे बढ़ गया. इसलिए यह ज़रूरी है कि हमें जब भूख लगती है तो हम सबसे पहले अपने आसपास या रसोई की अलमारियों में रखी चीज़ों को ही खाते हैं. अगर वहां सेहतमंद खाद्य पदार्थ रखे होंगे तो निश्चित रूप से आप वही खाएंगे, इसलिए जब भी रसोई का सामान ख़रीदने जाएं, तो जंक फूड ख़रीदने से बचें और ऐसी चीज़ें लें, जो वज़न घटाने में मदद करें और साथ ही पोषण संबंधी कमियों को भी पूरा कर सकें. तेल रहित व्यंजन विधियां देने के बाद किताब में व्यायाम और फिटनेस दिनचर्या पर चर्चा की बारी आती है.
हर व्यक्ति को अपने कार्य, जीवनशैली और ज़रूरत के मुताबिक़ वर्कआउट प्लान बनाना चाहिए. यह ज़रूरी नहीं कि आपके पास जिम के महंगे उपकरण ही हों. अगर जिम जाने की सुविधा या वक़्त न हो तो सैर भी कर सकते हैं. यह आसान और सुरक्षित होने के साथ-साथ किफ़ायती भी है. इसके बाद वह योगासनों की चर्चा करती हैं. उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी जीवनशैली में किसी न किसी रूप में व्यायाम को शामिल करना चाहिए. अगर व्यायाम से बोरियत हो तो कोई दूसरा तरीक़ा खोजें.
किताब के 39 अध्याय हैं और हर अध्याय के आख़िर में टिप्स दिए गए हैं, जो बेहद महत्वपूर्ण हैं. इसी तरह एक अध्याय के आख़िर में वह कहती हैं कि जहां भी जाएं, पानी की बोतल साथ रखें. व्यायाम या स़फर के दौरान थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें. हर खाने के साथ पानी पीने की आदत डालें. पानी पीने के लिए प्यास लगने का इंतज़ार न करें. अगर ऐसा करते हैं तो इसका मतलब है कि आपमें पानी की कमी हो रही है. दरअसल, पानी पीने से भूख मिटती है और नई ऊर्जा मिलती है. दोनों ही वज़न घटाने के बेहतरीन नुस्खें हैं. ताज़े फल और सब्ज़ियां खाएं. भूख लगने पर ही खाएं और पेट भरते ही खाना बंद कर दें. लिफ्ट की बजाय घर और कार्यालय में सीढ़ियों का इस्तेमाल करें. चलते-फिरते रहें. लगातार बैठे रहने से हाथों-पैरों में जकड़न आती है. चलने-फिरने से रक्त संचार बना रहता है. सुबह जल्दी उठकर सैर पर जाएं. सुबह की धूप से मिलने वाले विटामिन डी से हड्डियों मज़बूत होंगी. थो़डा संगीत सुनें और घर का कामकाज भी करें.

किताब के चौथे हिस्से में माइंड पावर की बात की गई है. जब मन पर नियंत्रण होता है, तो शरीर भी उसी के हिसाब से चलता है. आपको भी अपने मन को ताक़तवर बनाना है, ताकि वह लक्ष्य तक जाने में मददगार हो सके. आख़िर में वह पाठकों से अनुरोध करती हैं कि जब वे अपने वज़न घटाने के लक्ष्य की ओर कुछ क़दम बढ़ाएं तो ख़ुद को दुलारना न भूलें. अपनी पीठ थपथपाएं, क्योंकि वज़न घटाना कोई मज़ाक़ नहीं है. आपने कड़ी मेहनत और लगन से यह लक्ष्य पाया है. तनाव से दूर रहें और आख़िरी पांच किलो घटाने की यह लड़ाई जीत लें. आख़िरी पांच किलो को अलविदा कहें और एक सेहतमंद ज़िंदगी से हाथ मिलाएं.

बेशक, यह किताब आपको वज़न घटाने के लिए प्रेरित करते हुए आपके लक्ष्य तक पहुंचने में आपकी मदद करती है, लेकिन यह क़तई न भूलें कि इस राह पर चलना तो आप ही को है. इसलिए अपने मन को मज़बूत करें, और चल पड़ें अपने लक्ष्य की ओर. इंसान चाहे तो वह अपनी लगन और मेहनत के बूते हर उस लक्ष्य को हासिल कर सकता है, जिसे वह पाना चाहता है. बहरहाल, यह किताब उन पाठकों के लिए बेहद फ़ायदेमंद है, जो अपनी फिटनेस को लेकर फ़िक्रमंद रहते हैं. इस किताब में उनके कई ऐसे सवालों के जवाब मिल जाएंगे, जो वे जानना चाहते हैं. फिटनेस के लिहाज़ से यह किताब संग्रहणीय है और पाठकों को पसंद आएगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : आख़िरी 5 किलो कैसे घटाएं
लेखिका : नमिता जैन
प्रकाशक : डायमंड बुक्स
क़ीमत : 125 रुपये

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ख़ुरासान की रोचक लोक कथाएं...


फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर के देशों की अपनी संस्कृति और सभ्यता है. लोक कथाएं भी इसी संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक हैं. लोक कथाओं से किसी देश, किसी समाज की संस्कृति और उनकी सभ्यता का पता चलता है. बचपन में सभी ने अपनी नानी या दादी से लोक कथाएं सुनी होंगी. लोक कथाओं में ज़िंदगी के अनुभवों का निचो़ड़ होता है. ये लोक कथाएं सीख देती हैं. लोक कथाएं कैसे और कब वजूद में आईं, यह बताना तो बेहद मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि इनका इतिहास बहुत पुराना है. लोक कथाएं विभिन्न देशों में सांस्कृतिक घनिष्ठता को बढ़ाती हैं. भारत और ईरान में साहित्यिक आदान-प्रदान का दौर जारी है. लोकभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित नासिरा शर्मा की किताब क़िस्सा जाम का, ईरान के ख़ुरासान की लोक कथाओं पर आधारित है. इसमें लेखिका ने ईरान के कवि मोहसिन मोहन दोस्त की लोक कथाओं का हिंदी अनुवाद पेश किया है. अनुवाद का काम कोई आसान नहीं होता. इसमें इस बात का ख़ास ख्याल रखना होता है कि मूल तहरीर का भाव क़ायम रहे. नासिरा शर्मा ख़ुद कहती हैं कि ये सारे क़िस्से ख़ुरासानी बोली में थे. फ़ारसी जानने के बावजूद उनके इशारों और मुहावरों को समझना आसान नहीं था, क्योंकि ये चीज़ें शब्दकोष में नहीं मिलतीं. उन्हें केवल कोई ईरानी ही बता सकता है. लेकिन कोशिश यही की गई कि ये क़िस्से ज्यों के त्यों पाठकों तक पहुंचाएं जाएं, ताकि उनका अर्थ वही रहेख जो क़िस्सागो कहना चाहता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के फ़ारसी भाषा तथा साहित्य विभाग के अध्यक्ष सैय्यद अमीर आबिदी कहते हैं कि ख़ुरासान एक चौराहे की तरह है, जहां ईरान की सभ्यता तथा संस्कृति संगठित हुई और जहां से अन्य क्षेत्रों में फैली. तूस, निशापुर और मशहद के केंद्र सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक रहे और जहां पर उमर, ख़य्याम और फ़िरदौसी जैसे चिराग़ अब भी जीवित हैं. ख़ुरासान की ये लोक कथाएं निशापुर और दमगान से निकले हुए फीरोजों की तरह भव्य और सारगर्भित हैं. इस किताब में तीन तरह के क़िस्से शामिल हैं. पहले में दर्शन का चिंतन है, दूसरे में बादशाहों के ज़रिये दुनियावी बर्ताव का ज्ञान है और तीसरे में परियों और हब्शियों के क़िस्से हैं, जो बताते हैं कि ख़ुदा ने इंसान को जो ताक़त बख्शी है, वह किसी और प्राणी के पास नहीं है. इसी ताक़त की बदौलत इंसान मुश्किल से मुश्किल हालात का सामना करते हुए अपनी जीत का परचम लहराता रहा है. इस किताब में अनेक रोचक लोक कथाएं हैं, जो पाठकों को आख़िर तक बांधे रखने में सक्षम हैं. बानगी देखिए-

एक रोज़ एक व्यापारी मछलियों से भरा टब लेकर घर पहुंचा. उसकी बला सी सुंदर पत्नी ने मछलियों को देखकर अपने चेहरे को नक़ाब से छुपा लिया, ताकि टब की मछलियां उसे न देख सकें. इस तरह मुंह छुपाये रही, ताकि उसका पति उसे सती सावित्री जैसी समझे.
जब भी व्यापारी घर में रहता कभी भी वह अपना मुंह हौज़ में न धोती और कहती-नर मछलियां कहीं मेरे पाप का कारण न बन जाएं. इस लाज से भरे अपने स्वभाव के कारण वह व्यापारी के सामने कभी हौज़ के समीप न जाती. एक दिन व्यापारी अपनी स्त्री के साथ बैठा हुआ था. एक नौकर भी वहीं खड़ा था. व्यापारी की स्त्री ने पहले की ही तरह नर मछलियों की बातें कीं और ब़डी अदा से शर्माई. यह सब देखकर वह नौकर हंस प़डा.
व्यापारी ने पूछा-क्यों हंसे तुम?
कुछ नहीं, यूं ही हंस दिया.

बिना कारण कैसी हंसी? सुनकर नौकर कुछा नहीं बोला, ख़ामोश ख़डा रहा. यह देखकर व्यापारी चिढ़ गया. उसका क्रोध देखकर नौकर डर गया और बोला-आपकी सुंदर स्त्री आपके ही घर के तहख़ाने में चालीस जवानों को बंद किए है. जब आप शिकार को चले जाते हैं तो वह उनके साथ रंगरेलियां मनाती है. यह सुनते ही व्यापारी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और वह बोला-मैं सच्चाई जानकर ही दम लूंगा. कल शिकार पर जा रहा हूं, परंतु लौटकर तुम्हारे ही घर आऊंगा. फिर सोचूंगा कि मुझे क्या करना है. दूसरे दिन व्यापारी दोबारा शिकार को चला गया और लौटकर उसी नौकर के घर पहुंचा और बोला-मुझे गधे पर रखे ख़ुरजीन (थैला) में छुपाकर वह जगह दिखाओ, जहां मेरी स्त्री चालीस जवानों के साथ गुलछर्रे उड़ाती है. इस काम के बदले में मैं तुमको सौ मन ज़ा़फ़रान दूंगा. नौकर सुनते ही राज़ी हो गया.  नौकर ने दरवेश का सा भेस बदला और ख़ुरजीन में व्यापारी को बिठाकर चल पड़ा. गली में घुसते ही दूर से ही गाने बजाने की आवाज़ें सुनाई पड़ने लगीं. नौकर आगे बढ़ता गया और व्यापारी के पीछे जाकर दरवाज़ा खटखटाया और गाने लगा-
आओ देखो, स्त्रियों के जाल व फ़रेब
बिया बेनीगर इन मकरे ज़नान
हाला हाज़िर कुन सदमन ज़ा़फ़रान
अब तो दो मुझे सौ मन ज़ा़फ़रान

बार-बार वह गाता जा रहा जब तक दरवाज़ा खुल न गया. व्यापारी ने देखा सामने मह़िफल जमी थी.  गवैये बैठे गाना गा रहे थे, साज़ बजा रहे थे. चालीस जवान प्यालों में शराब पी रहे थे और व्यापारी की स्त्री मस्त-मस्त मदहोश-सी कभी इस युवक की गोद में, कभी उस युवक की गोद में जाती और दरवेश से कहती-वहीं पंक्तियां बार-बार गाओ-
आओ देखो, स्त्रियों के जाल व फ़रेब
अब तो दो मुझे सौ मन ज़ा़फरान
सुबह होने से पहले यह महफ़िल ख़त्म हुई. दरवेश व व्यापारी दोनों एक साथ लौटे. व्यापारी की स्त्री ने उन चालीस जवानों को एक-एक करके तह़खाने में भेजा और दरवाज़ा बंद करके मस्त, नशे में चूर, झूमती-सी बेख़बर सो गई. व्यापारी थैले से बाहर निकला और नौकर को हुक्म दिया कि जब तक मैं सोकर न उठूं, इसको संदूक़ में बंद करके एक किनारे रख दो. सुबह जब स्त्री की आंख खुली तो वह सबकुछ समझ गई. उसको संदूक़ से निकालकर व्यापारी के हुक्म से घो़डे की दुम से बांधकर जंगल की ओर भेज दिया गया. व्यापारी ने उन चालीस जवानों को आज़ाद किया और तह़खाने से ऊपर बुलाकर पूछा-असली माजरा क्या था?

वे बोले- संध्या के समय जब हम इधर से गुज़रे तो छत पर खड़ी आपकी स्त्री को देखते ही हम उसके रूप-लावण्य की चमक से बेहोश हो जाते. जब होश आता तो अपने को तह़खाने में पाते. जब आप शिकार पर चले जाते तो हमारे बंध खोले जाते और हम रंगरेलियां मनाते.

किताब में प्रस्तुत लोक कथाएं पाठक को ईरान की संस्कृति और सभ्यता से परिचित कराती हैं. नासिरा शर्मा की यह कोशिश सराहनीय है. इससे हिंदुस्तान के लोगों को ईरानी सभ्यता को जानने का मौक़ा मिलेगा. दरअसल, इस तरह की कोशिशें विभिन्न देशों के बीच रिश्तों को और बेहतर बनाने का काम करती हैं. आज के दौर में ऐसे कार्यों की बेहद ज़रूरत है. साहित्य देश की सरहदों को नहीं मानता. वह तो उन हवाओं की तरह है, जो जहां से गुज़रती हैं, माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं.

किताब रोचक है, लेकिन कई जगह भाषा की अशुद्धियां हैं. उर्दू शब्दों को ग़लत तरीक़े से लिखा गया है. हिंदी में उर्दू के शब्द लिखते वक़्त अकसर नुक्ता ग़लत लगा दिया जाता है, जिससे उर्दू जानने वालों को वे शब्द काफ़ी अखरते हैं. बेहतर हो नु़क्ता लगाया ही न जाए. बहरहाल, किताब रोचकता से सराबोर है, जिसे पाठक पढ़ना पसंद करेंगे.

समीक्ष्य कृति : क़िस्सा जाम का  
लेखिका : नासिरा शर्मा
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन      
क़ीमत : 225 रुपये
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फ़िल्मी गीतों में महकी साहित्य की ख़ुशबू...


पिछले दिनों फ़िल्मी गीतकार स्वर्गीय शैलेन्द्र जी के मित्र अनिल सराफ़ के छोटे भाई नलिन सराफ़ ने अपनी एक किताब भेजी थी... हमने इस किताब की समीक्षा की... इसे बहुत सराहा गया... काफ़ी लोगों के मेल और फ़ोन आए... पेश है समीक्षा... 

फ़िल्मी गीतों में महकी साहित्य की ख़ुशबू...
फ़िरदौस ख़ान
गीतकार शैलेंद्र ने फ़िल्मों में भी साहित्य की महक को बरक़रार रखा, इसलिए काव्य प्रेमियों ने उन्हें गीतों का राजकुमार कहा है. शैलेंद्र मन से कवि ही थे, तभी तो उनके फ़िल्मी गीतों में भी काव्य की पावन गंगा बहती है. उनसे प्रभावित होकर उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने उन्हें कविराज का ख़िताब दिया था. मुंबई के शैलेंद्र प्रशंसक परिवार ने उनकी याद में एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है मौसम सुहाना और ये मौसम हसीं. इस किताब में शैलेंद्र के गीतों, कविताओं और उनसे जुड़े संस्मरणसंग्रहीत हैं. संकलनकर्ता नलिन सराफ़ का कहना है कि मेरे बड़े भाई श्री अनिल जी, जो शैलेंद्र जी के अभिन्न मित्र रहे हैं, चाहते हैं कि उनकी रचनाएं और अनछुए जीवन के प्रसंग लोगों के सामने आएं. इसी विचार ने धीरे-धीरे मूर्तरूप लिया और नतीजतन यह पुस्तक आपके सामने है. शैलेंद्र की कई फ़िल्मी रचनाएं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं, कई फ़िल्मी गीत जो रिकॉर्ड तो हुए, लेकिन परदे तक नहीं पहुंचे, कुछ अनूठे जीवन प्रसंग, लोगों के अपने अनुभव, उनके कई दुर्लभ चित्र और हस्तलिखित पत्र आदि को इस किताब में शामिल किया गया है.

नलिन सराफ़ कहते हैं, शैलेंद्र का असली नाम शंकर दस राव है, लेकिन साहित्य में शंकर शैलेंद्र और फ़िल्मों में वह शैलेंद्र नाम से जाने जाते हैं. बिहार के एक खेतीहर मज़दूर का वंशज, मिलेट्री हॉस्पिटल के मामूली फौजी क्लर्क का पुत्र जिसका जन्म एक निर्धन दलित परिवार में हुआ और बचपन अत्यंत तकली़फ़ों में गुज़रा. वह अपनी प्रतिभा, कुशाग्र बुद्धि और लगन के कारण ही शंकर दास राव से प्रसिद्ध कवि-गीतकार शैलेंद्र की मंज़िल तक पहुंच पाया. मेरा उनसे काव्यात्मक परिचय 1954 में फ़िल्म बूट पालिश से हुआ, जिसका गीत नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? मेरे अंतर्मन को छू गया. कालांतर में उन्होंने बताया कि यह गीत उन्हें अपने बच्चे की बंद मुट्ठियों को देखकर उपजा था. वह कर्मयोगी थे. वह भाग्य पर आंख मूंदकर विश्वास करने वालों में से नहीं थे. इसलिए इस गीत में उन्होंने यह बात ज़ाहिर की-मुट्ठी में है तक़दीर हमारी, हमने क़िस्मत को वश में किया है. वैसे वह जीवन की किसी भी घटना को अपने गीतों में सहज पिरो देते थे. उनकी प्रारंभिक ग़ैर फ़िल्मी रचनाएं रोज़मर्रा की ज़िंदगी, मध्यमवर्गीय समस्याओं, मज़दूरों का मानसिक द्वंद्व लिए होती थीं. वे मूलत: मज़दूर हृदय इंसान थे, अत: उनकी रचनाओं में इसकी झलक सा़फ़ नज़र आती है. वह अपनी लेखनी के बल पर क्रांति लाने के पक्षधर थे. प्रसिद्ध गायक तलत महमूद के कहने पर उन्होंने एक ख़ूबसूरत गीत लिखा था-
है सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है ख़ुशी, आंसू भी छलकते आते हैं…

वह लोक नाट्य मंच यानी इप्टा से शुरू से जु़डे थे. उसके हर कार्यक्रम में पूरे जोश से सक्रिय रहते और अपने गीत सुनाया करते थे. ऐसे ही एक कार्यक्रम में पृथ्वीराज कपूर ने उनका गीत- जलता है पंजाब सुना और बेहद प्रभावित हुए. उन्होंने राजकपूर से इसकी चर्चा की, जो स्वयं के बैनर तले फ़िल्म निर्माण शुरू कर चुके थे. राजकपूर ने ऐसे की एक कार्यक्रम में उनका गीत-मोरी बगिया में आग लगाय गयो गोरा परदेशी सुना और मोहित हो उठे. उन्होंने शैलेंद्र से फ़िल्मों के लिए लिखने को कहा, लेकिन उनके प्रस्ताव को शैलेंद्र ने बड़ी नम्रता और दृढ़ता से यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि मैं फ़िल्मों के लिए नहीं लिखता. मगर आगे जाकर पारिवारिक मजबूरियों की वजह से उन्होंने राजकपूर से मुलाक़ात की और इस तरह वह आरके बैनर के स्थायी गीतकार बन गए, साथ ही शंकर-जयकिशन के भी. इसके अलावा उन्होंने प्राय: सभी प्रमुख संगीतकारों के साथ काम किया. उन्होंने नए संगीतकारों के लिए भी लिखा. राजकपूर की फ़िल्मों की कथावस्तु और उनके विचार शैलेंद्र के विचारों से मेल खाते थे. वह अपनी फ़िल्म में अधिक से अधिक गीत शैलेंद्र के ही रखना चाहते थे. इसका प्रमुख कारण उनकी सरल एवं गेय शब्दावली तो था ही, साथ ही उनके गीत पूरे दृश्य को आत्मसात कर कहानी का हिस्सा बन जाते थे और उसके प्रवाह को आगे बढ़ाने में सहायक होते थे. राजकपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर के शीर्ष गीत के मुखड़े की प्रेरणा उन्हें श्रीमदभगवद गीता से मिली. यह गीत-जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां, राजकपूर के लिए लिखा गया आख़िरी गीत था, वह भी सिर्फ़ मुखड़ा ही लिख पाए, जिसे बाद में उनके बेटे शैली ने पूरा किया.

एक बार उनसे पूछा गया कि कभी आपने अपनी आत्मकथा को काव्य रूप में ढाला या ढालने की सोची? जवाब में उन्होंने श्री 420 के गीत-दिल का हाल सुने दिलवाला की इन पंक्तियों का ज़िक्र किया-
छोटे से घर में ग़रीब का बेटा
मैं भी हूं मां के नसीब का बेटा
रंजो-ग़म बचपन के साथी
आंधियों में जली जीवन की बाती
भूख ने बड़े प्यार से पाला
ख़ुश हूं, मगर आबाद नहीं मैं
मंज़िल मेरे पास खड़ी है
पांव में लेकिन बेड़ी पड़ी है
टांग अड़ाता है दौलत वाला…

शैलेंद्र बंगाली भाषा और बंगाल के लोक संगीत के बड़े प्रशंसक थे. यही वजह थी कि सलिल चौधरी ने जब अपना हिंदी फ़िल्मी सफ़र बिमल राय की फ़िल्म दो बीघा ज़मीन से शुरू किया तो उनकी पहली पसंद शैलेंद्र थे. उन्होंने अपने यादगार गीत-संगीत की रचना से उस फ़िल्म को अमर बना दिया. इसके बाद सलिल चौधरी ने अधिकांश फ़िल्में उन्हीं के साथ कीं. एसडी बर्मन के साथ भी उन्होंने कई फ़िल्में के गीत लिखे. उन्होंने 1955 की फ़िल्म मुनीमजी का शिव विवाह और मद भरे नैन के गीतों से लेकर 1967 की ज्वैलथीफ तक में अनेक मधुर गीत लिखे. बर्मन दा के साथ गाइड के गीतों ने तो फ़िल्म को अमरत्व तक पहुंचा दिया. गाइड से शैलेंद्र के जुड़ाव की एक रोचक गाथा है. एक रात बर्मन दा के विशेष आग्रह पर शैलेंद्र उनसे मिलने होटल सन एंड सेंड में गए, जहां वह देवानंद और विजय आनंद के साथ बैठे हुए थे. दादा ने बताया कि गोल्डी (विजय आनंद) गाइड के गीत शैलेंद्र से लिखवाना चाहते हैं. शैलेंद्र पहले भी विजय आनंद की फ़िल्म बाज़ार के लिए गीत लिख चुके थे. शैलेंद्र थोड़ा सकपकाए, क्योंकि गाइड के लिए वह दूसरे गीतकार को अनुबंधित कर चुके थे और दो गाने रिकॉर्ड भी हो चुके थे. लेकिन विजय आनंद ने ज़ोर देकर कहा कि गाइड के कथानक के साथ सिर्फ़ आप ही के गीत आत्मसात हो सकते हैं. शैलेंद्र ने इस आत्मीय दबाव पर सोचकर कहा कि पहले आप उस गीतकार को उसका पूरा पारिश्रमिक देकर मुक्त कर दीजिए. भले ही उससे आपको और नहीं लिखवाना है. अपने पारिश्रमिक के रूप में उन्होंने एक भारी रक़म की मांग रख दी, जो इस गीतकार की रक़म और उस व़क्त की प्रचलित रक़म से कई गुना ज़्यादा थी. विजय आनंद ने उसे फ़ौरन मंज़ूर करते हुए उन्हें अनुबंधित कर लिया. उसी वक़्त उन्होंने एक गीत का यह मुखड़ा लिखकर उन्हें दे दिया-
दिन ढल जाए, हाय रात न जाए
तू तो न आई, तेरी याद सताए…

इस फ़िल्म के सभी गीत बहुत लोकप्रिय हुए. इस बारे में देवानंद का कहना है, गाइड के गीत इसकी सबसे बड़ी ताक़त थे. मैं हमेशा मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी और नीरज से मुतासिर रहा, पर उसके गीतों में शैलेंद्र ने जैसे अपनी आत्मा उंडेल दी थी. बक़ौल लता मंगेशकर, उनके दिल में सदा एक आग धधकती रहती, जो इस अन्यायी समाज-व्यवस्था को फूंक देना चाहती थी. फ़िल्मी गीतों की हज़ार-हज़ार बंदिशों में रहकर भी वह दर्द और वह आग उनके गीतों में स्पष्ट दिखाई देती थी. बाबू जगजीवनराम ने कहा था कि संत रविदास के बाद शैलेंद्र हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय हरिजन कवि हैं. शायर और फ़िल्मी गीतकार हसरत जयपुरी के मुताबिक़, शैलेंद्र जैसा हिंदी फ़िल्म गीतकार आज तक न कोई हुआ है और न कोई होगा.

30 अगस्त, 1923 को जन्मे शैलेंद्र ने 14 दिसंबर, 1966 को आख़िरी सांस ली. उनकी पत्नी शकुंतला शैलेंद्र कहती हैं, मन की अंधियारी सतहों पर एकाएक यादों के सौ-सौ मोती झिलमिलाने लगते हैं. बिछोह पर बना कुहासा धीमे-धीमे छंटने लगता है और हंसता-मुस्कराता अतीत मुझे अपने आप में समेट लेता है. स्वर्गीय पति की यादों के मेले जैसे इर्द-गिर्द जु़डने लगते हैं और अनगिनत फूलों की महक मेरी सांसों में समा उठती है. फिर मादक रस में डूबी हुई उनकी गुनगुनाहट पल-प्रतिपल मन प्राणों को दुलारने लगती है-मैं तो तुम्हारे पास हूं शकुन. भले ही दुनिया के लिए मर गया हूं, पर तुम्हारे लिए तो हमेशा जीवित रहूंगा. राजकपूर शैलेंद्र की मौत से बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने कहा था, कमबख्त शायर था न. जाने के लिए भी उसने क्या दिन चुना? मेरा जन्मदिन.

शैलेंद्र कबीर, सूरदास, तुलसीदास आदि की तरह सरल और सीधी बात काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने वाले गीतकार थे. उन्होंने आम आदमी की बोली में उनके दिल दिल की बात सामने रख दी. यही वजह है कि उनके गीत सीधे दिल में उतर जाते हैं. भले ही हिंदी साहित्य ने उनकी उपेक्षा की, लेकिन भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग ने 1985 में प्रकाशित देशभक्ति की कविताएं संकलन में भारतेंदु हरिश्चंद्र, हरिओम, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत जैसे महान कवियों की रचनाओं के साथ शैलेंद्र की भी एक कविता प्रकाशित कर उन्हें सम्मानित किया.
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग, तो उतार ला ज़मीन पर…
बहरहाल, पाठकों ख़ासकर शैलेंद्र के प्रशंसकों के लिए यह एक बेहतरीन किताब है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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मेवात के जोह़ड और गंवई दस्तूर


फ़िरदौस ख़ान
भारत एक कृषि प्रधान देश है. इसलिए प्राचीनकाल से ही यहां तालाबों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. तालाब उपयोगी होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग भी रहे हैं. भारत में जल देवता को पूज्य मानते हुए तालाबों की पूजा-अर्चना की जाती रही है. आज भी गांव-देहात में मंगल कार्यों के मौक़ों पर महिलाएं इकट्ठी होकर तालाबों को पूजती हैं. पुराने ज़माने में जहां लोग प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करते हुए उनका संरक्षण भी किया करते थे, वहीं आज के दौर में इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग करके विनाशकारी माहौल पैदा किया जा रहा है. प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन की वजह से ही आज जल, जंगल और ज़मीन पर ख़तरे के बादल छाये हुए हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्राकृतिक संसाधनों की उपयोगिता को जानते और समझते थे, तभी उन्होंने कहा था कि क़ुदरत सभी की ज़रूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन एक व्यक्ति का भी लालच पूरा नहीं कर सकती. लेकिन आज व्यक्ति के लालच की वजह से कहीं सूखे, तो कहीं बाढ़ के हालात बन गए हैं.
           
राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेवात का जोहड़ में मेवात के जोह़डों पर रौशनी डाली गई है. इसके साथ ही मेवात में आज़ादी के आंदोलन और विभाजन, मेवात को लेकर महात्मा गांधी के सपने, मेवात में रचनात्मकता को चुनौतियों और मेवात के इतिहास के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है.
हरियाणा के फिरोजपुर झिरका, नूंह, पलवल, सोता, फ़रीदाबाद, गुड़गांव, राजस्थान के रामगढ़, किशनगढ़, खैरपल, तिजारा, कुम्हेर, डीग, पहा़डी और उत्तर प्रदेश के आगरा और मथुरा के यमुना तट के हिस्से को मेवात इलाक़ा कहा जाता है. बक़ौल लेखक राजेन्द्र सिंह, महात्मा गांधी का मेवात में जोहड़ पुस्तक महात्मा गांधी द्वारा अपने जीते जी मेवात के लिए किए गए समर्पण की दास्तान है. महात्मा गांधी ने मेवात को बचाने-बसाने के लिए 19 दिसंबर, 1947 को सोहना (हरियाणा) और नोगांवा (राजस्थान) के बीच घासेडा गांव में जाकर राजस्थान के अलवर-भरतपुर से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़-मथुरा-आगरा बाग़पत से आए और हरियाणा के मेवों की सभा में जाकर उन्हें यहीं बसे रहने को कहा. जब ये लोग अच्छे से अपनी जगह बसे रहे तो पाकिस्तान गए बहुत से मेव वापस आकर मेवात में बसे. उन्होंने अपनी पुरानी धरती मेवात में वापस जाने की मांग की. बापू के विश्वास से उजड़ता मेवात बच गया. जो उजड़े थे, वे वापस आकर बस गए. यह मेवों का मेवात बन गया. भारत की राजधानी ख़ासकर राष्ट्रपति भवन मेवों के गांव उजाड़ कर अंग्रेजों ने बनाया था. जिन्हें आज मेव कहते हैं, वे मीणा, राजपूत, गुर्जर, अहीर, त्यागी, जाट थे, जो धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गए थे. ये अरावली पहाड़ियों की कंदराओं, चोटियों पर छुपकर रहना पसंद करते थे. पहाड़ियों में अपने घर बनाकर रहते थे. झोपड़ी को चारों तरफ़ से घेरकर पेड़ों के झुरमुट में रहना इन्हें पसंद था. इनका जीवन जंगल, जंगली जानवरों के शिकार पर चलता था. इसलिए अरावली पर्वत मालाओं में इनके लिए अनुकूल थीं. मेवाती में इसे काला पहाड़ कहते हैं. इस पहाड़ी क्षेत्र के बहुत से गांव जोहड़ से पानीदार बने हुए थे. जोहड़ ही इनका सबकुछ है.

हमारे पूर्वज जानते थे कि तालाबों से जंगल और ज़मीन का पोषण होता है. भूमि के कटाव एवं नदियों के तल में मिट्टी के जमाव को रोकने में भी तालाब मददगार होते हैं. इसलिए वे वर्षा के जल को उसी स्थान पर रोक लेते थे. उनकी जल के प्रति एक विशेष प्रकार की चेतना और उपयोग करने की समझ थी. इस चेतना के कारण ही गांव के संगठन की सूझबूझ से गांव के सारे पानी को विधिवत उपयोग में लेने के लिए तालाब नाए जाते थे. इन तालाबों से अकाल के समय भी पानी मिल जाता था. इनके निर्माण, रखरखाव, मरम्मत आदि के कामों से गांव के संगठन को मज़बूत बनाने में मदद मिलती थी. मेवात आज भी तालाबों को खरा मानता है. उन्हें बनाता-संभालता है. उनके घरेलू सभी काम तालाब से पूरे होते हैं, और सभी ग्रामवासी मिलकर मेहनत करके जोहड़ बनाते थे.

तालाबों के रखरखाव के लिए गांव के लोग सर्वसम्मति से कुछ नियम भी बनाते थे, जिसे गंवई दस्तूर कहा जाता था. ये दस्तूर गंवई बही में भी लिखे जाते थे या मौखिक परंपरा के ज़रिये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते जाते थे. गांव में आने वाले बाहरी व्यक्ति को भी इन गंवई दस्तूर का पालन करना प़डता था. अलवर ज़िले के गांवों के गंवई दस्तूर के मुताबिक़, तालाब की आगोर में कोई जूता लेकर प्रवेश नहीं करता था. शौचादि के हाथ अलग से पानी लेकर आगोर के बाहर ही धोये जाते थे. आगोर में किसी गांव सभा की अनुमति के बिना मिट्टी खोदना मना होता था. हर साल जेष्ठ माह में पूरा गांव ही मिलका आगोर से मिट्टी निकालता था. आगोर से ही नहीं, बल्कि तालाब के जलग्रहण क्षेत्र तक में शौचादि के लिए जाना मना था. किसी प्रकार गंदगी फैलाने वाले को तालाब की स़फाई करके प्रायश्चित करने का सुझाव दिया जाता था. प्रायश्चित के लिए तालाब की पाल पर पे़ड लगाने तथा उसके ब़डा होने तक उसकी देखभाल करने की परंपरा थी. तालाब के जलग्रहण क्षेत्र से मिट्टी कटकर नहीं आए और तालाब में जमा नहीं हो, इसकी व्यवस्था तालाब बनाते समय ही कर दी जाती थी. इससे लंबे समय तक तालाब उथले नहीं हो पाते थे. जब तालाब की मरम्मत करने की ज़रूरत होती थी, पूरा गांव मिल-बैठकर, तय करके इस काम को करता था. तालाब से निकलने वाली मिट्टी खेतों में डालने या कुम्हारों के काम आती थी. तालाब को गांव की सार्वजनिक संपत्ति माना जाता था. गांव के लोग जब किसी दूसरे गांव को जाते थे, तो सबसे पहले वह तालाब को अपने गांव की संपत्ति में गिनाया करते थे. गांव का जैसा तालाब होता था, वैसा ही उस गांव को माना जाता था. गांव का तालाब अच्छा है तो उस गांव को समृद्ध, संगठित, शक्तिशाली माना जाता था. यह भी कि वह गांव अपने महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम है, यह मान लिया जाता था. यह परंपरा 1860 तक चली. इसके बाद अंग्रेजों ने इन परंपराओं को ख़त्म करने के लिए कई योजनाएं बनाईं. अंग्रेजों की नीतियों ने रंग दिखाना शुरू किया और ग्राम समाज के टूट जाने के कारण तालाबों का निर्माण, रखरखाव और मरम्मत बंद हो गई. तालाबों के साथ-साथ गांव के संगठन भी बिखरने लगे. इसके बावजूद आज भी मेवात का सामुदायिक संगठन देश के दूसरे हिस्सों से इस मामले में काफ़ी अच्छा है.
बड़े बांध बनाने पर भारत सरकार 2008 तक अरबों-खरबों रुपये ख़र्च कर चुकी है. इन योजनाओं से दो करोड़ हैक्टेयर ज़मीन सिंचित होने का सरकारी दावा किया गया था, लेकिन हक़ीक़त में आज कितनी ज़मीन की सिंचाई ये योजनाएं कर रही हैं, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. देश में तालाबों की उपेक्षा करने की भूल आज भी की जा रही है. 1950 में देश के कुल सिंचित क्षेत्र की 17 फ़ीसद सिंचाई तालाबों से की जाती थी. तालाबों में पाए गए शिलालेख इसका प्रमाण हैं. पिछले बरसों के भयंकर अकाल ने एक फिर तालाबों की याद दिलाई है. इसलिए गत वर्षों में छोटे-बड़े दस हज़ार से ज़्यादा तालाब, जोहड़, बांध बनाए गए या उनकी मरम्मत कराई गई है. इन पर तक़रीबन 15 करोड़ रुपये ख़र्च हुए. मिसाल के तौर पर गोपालपुर गांव को ही लें, जहां 1986 में सिंचाई और पीने के पानी वाले कुएं सूख गए थे. ज़मीन में कुछ पैदा ही नहीं हो रहा था. तभी इस गांव के तालाबों के निर्माण का काम शुरू किया गया और 1987 के जून तक तीन बड़े तालाब बनाए गए. गांव वाले इन्हें बांध कहते हैं. इनके निर्माण कार्य में दस हज़ार रुपये की क़ीमत का गेहूं दिया गया. जुलाई 1987 में इस इलाक़े में कुल 13 सेंटीमीटर वर्षा हुई. यह सारी वर्षा एक साथ ही 48 घंटे के अंदर हो चुकी थी. इनके पानी से ज़मीन पुन: सजल हुई और गांव के आसपास के 20 कुओं का जलस्तर बढ़कर ऊपर आ गया. वर्षा का पानी अपने साथ जंगल और पहाड़ियों से पत्ते आदि बहाकर ले आया था, जो तालाबों की तली में बैठ गया. बड़े तालाब खेतों की ज़मीन पर बने हुए थे. इसलिए नवंबर तक तालाबों का पानी तो नीचे की ज़मीन की सिंचाई करने के काम में ले लिया गया और तालाब के पेटे में गेहूं की फ़सल बो दी गई. एक फ़सल में केवल इन तालाबों की ज़मीन से ही तीन सौ क्विंटल अनाज पैदा हुआ, जिसकी क़ीमत तक़रीबन पौन लाख होती है. इसके अलावा तालाब में पूरे साल पानी भरा रहा. इसे पशुओं के पीने के काम में लिया गया और तालाब के चारों तरफ़ उगी घास पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल की गई. इसके साथ ही वातावरण भी हराभरा रहा.

हमारे देश में ऐसी अनगिनत मिसालें मिल जाएंगी, जब लोगों ने ख़ुद पहल करते इस तरह के बेहतरीन कामों को अंजाम दिया है. बहरहाल, यह किताब मेवात के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मुहैया कराती है. चूंकि किताब के लेखक राजेन्द्र सिंह अपने विद्यार्थी जीवन से ही संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े रहे हैं और आजकल गंगा नदी की अविरलता और निर्मलता के लिए संघर्षरत हैं. उन्होंने जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है. फ़िलहाल वह भारत सरकार के नदी जोड़ योजना के पर्यावरण विशेषज्ञ समिति एवं योजना आयोग के अंतर मंत्रालय समूह और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य हैं. इस किताब में उनके कार्यों की झलक भी साफ़ दिखाई पड़ती है. यह कहना ग़लत न होगा कि यह किताब जल संरक्षण के प्रति पाठकों को जागरूक करती नज़र आती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : मेवात का जोहड़
लेखक : राजेन्द्र सिंह
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
क़ीमत : 400 रुपये 

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हे अमर बलिदानी तुझे शत शत प्रणाम


फ़िरदौस ख़ान
हिंदुस्तान को फ़िरंगियों की ग़ुलामी से आज़ाद कराने के लिए इस धरती के सपूतों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी, लेकिन यह हमारे देश की बदक़िस्मती ही है कि राजनेताओं ने इस आज़ादी को केवल सत्ता हासिल करने का ज़रिया ही समझा. देश की अधिकांश आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है. एक तरफ़ मुट्ठी भर लोग गगनचुंबी इमारतों में बैठकर ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ लाखों लोग खुले आसमान के नीचे ज़िंदगी गुज़ारने के लिए मजबूर हैं. यह कैसी आज़ादी है, जहां जनता के साथ समान बर्ताव नहीं किया जाता है. महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद समाजवादी शासन व्यवस्था के घोर समर्थक थे. उनके प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके सपने को साकार करें. राजकमल प्रकाशन ने चन्द्रशेखर आज़ाद नामक एक किताब प्रकाशित की है. यह किताब चंद्रशेखर आज़ाद के विश्‍वसनीय साथी विश्‍वनाथ वैशम्पायन की किताब अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद पर आधारित है. किताब के लेखक मलवेन्दर जीत सिंह व़ढैच और राजवन्ती मान ने चंद्रशेखर के जीवन वृतांत के साथ उनके युग की महान गाथा को बहुत ही करीने से पेश किया है. बेशक, चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है.

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में हुआ था. उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के गांव बदर के रहने वाले थे. आज़ाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल के वक्त अपना पैतृक गांव छोड़कर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में बस गए, जो अब झाबुआ ज़िले में आता है. यहीं चंद्रशेखर का बचपन बीता. बड़ा होने पर वे माता-पिता को छोड़कर बनारस चले गए, जहां उनके फूफा पंडित शिवविनायक मिश्र रहते थे. उन्हीं की मदद से उन्होंने संस्कृत विद्यापीठ में दाख़िला ले लिया और संस्कृत का अध्ययन करने लगे. उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी. विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना देते थे. चंद्रशेखर इससे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने का प्रण लिया. दरअसल, 1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने उनको उद्वेलित कर दिया था. इसलिए वे असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत करने लगे. एक दिन वे धरना देते हुए पकड़े गए. उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट की अदालत में पेश किया गया. उन्होंने चंद्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया-
तुम्हारा नाम क्या है?
मेरा नाम आज़ाद है.
तुम्हारे पिता का क्या नाम है?
मेरे पिता का नाम स्वाधीन है.
तुम्हारा घर कहां पर है?
मेरा घर जेलख़ाना है.
मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए. उन्होंने चंद्रशेखर को पंद्रह बेंतों की सज़ा सुना दी. जल्लाद ने चंद्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए. हर बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी. पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था. वह हर बेंत के साथ महात्मा गांधी की जय या भारत माता की जय बोलते जाते थे. जब पूरे बेंत लगाए जा चुके, तो जेल के  नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने रख दिए. बालक चंद्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल से बाहर आ गए. इस पर बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. अब वे चंद्रशेखर आज़ाद कहलाने लगे. देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसका ज़िक्र करते हुए लिखा है-ऐसे ही क़ायदे (क़ानून) तोड़ने के लिए एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सज़ा दी गई. उसे नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया. जैसे-जैसे बेंत उस पर प़डते थे और उसकी चम़डी उधे़ड डालते थे, वह भारत माता की जय! चिल्लाता था. हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया. बाद में वही ल़डका उत्तर भारत के आतंककारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना.

ग़ौरतलब है कि 1922 में महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन बंद कर देने से चंद्रशेखर की विचारधारा में बदलाव आया और वे अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रांति के समर्थक बन गए. दरअसल, उस वक्त बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ था. चंद्रशेखर आज़ाद मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए. क्रांतिकारियों का वह दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से जाना जाता था. इस संगठन के ज़रिए उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल की अगुवाई में पहले 9 अगस्त, 1925 को काकोरी कांड किया और फ़रार हो गए. इसके बाद 1927 में बिस्मिल के चार प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का गठन किया. उन्होंने भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉन्डर्स का क़त्ल करके लिया. इसके बाद उन्होंने दिल्ली पहुंच कर असेंबली बम कांड को अंजाम दिया. वे 27 फ़रवरी, 1931 को अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार-विमर्श कर रहे थे. मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक नाटबाबर ने आज़ाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया. इस दौरान पुलिस और चंद्रशेखर के बीच गोलीबारी हुई, जिससे उनकी मौत हो गई. कहा जाता है कि चंद्रशेखर ज़िंदा गिरफ्तार नहीं होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ख़ुद पर गोली चलाकर अपनी जान ले ली. वे आज़ाद जिए और आख़िर तक पुलिस के हाथ न आए. उनकी शहादत पर महात्मा गांधी ने कहा था, चंद्रशेखर की मृत्यु से मैं आहत हूं. ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं. आज़ाद भारत के सपने का ज़िक्र करते हुए वे अक्सर झूम झूमकर गाते थे-
जेहि दिन होईहैं सुरजवा
अरहर के दलिया, धान के भतुआ 
खूब कचरके खैबेना 
अरे जेहि दिन होई हैं सुरजवा 

मगर देश की आज़ादी को वे अपनी आंखों से नहीं देख पाए. हालांकि चंद्रशेखर आज़ाद के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर असंख्य युवाओं ने क्रांति के मार्ग पर क़दम बढ़ाए. बहरहाल, 235 पृष्ठों की यह किताब महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद पर आधारित एक बेहतरीन दस्तावेज़ है, जिससे हमें उस वक्त की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की भी सटीक जानकारी मिलती है. यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि समकालीन संदर्भों में यह किताब अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. किताब की भाषा सरल है. इसमें चित्रों को भी शामिल किया गया है, जिससे इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है. अलबत्ता, देश की आज़ादी के लिए भारतीय क्रांतिकारियों के त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता है-
ज़ालिम फलक ने लाख मिटाने की फ़िक्र की
हर दिल में अक्स रह गया, तस्वीर रह गई
हे अमर बलिदानी तुझे शत शत प्रणाम. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : चंद्रशेखर आज़ाद
लेखक : मलवेन्दर जीत सिंह वढ़ैच, राजवन्ती मान 
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

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फ़िल्‍मों में लोक संगीत की महक


फ़िरदौस ख़ान
भारत गांवों का देश है. गांवों में ही हमारी लोक कला और लोक संस्कृति की पैठ है. लेकिन गांवों के शहरों में तब्दील होने के साथ-साथ हमारी लोककलाएं भी लुप्त होती जा रही हैं. इन्हीं में से एक है लोक संगीत. संगीत हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. संगीत के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर करना भी बेमानी लगता है. संगीत को इस शिखर तक पहुंचाने का श्रेय बोलती फ़िल्मों को जाता है. इससे पहले फ़िल्मों में संगीत का इस्तेमाल तो होता था, लेकिन तकनीकी तौर पर रिकॉर्ड नहीं बनाए जा सकते थे. फ़िल्मों में संगीत की शुरुआत 1931 में बनी फ़िल्म आलम आरा से हुई. यह देश की पहली बोलती फ़िल्म थी. फ़िल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी ने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुए पहली बार रिकॉर्ड मशीन का इस्तेमाल किया. यह फ़िल्म 14 मार्च, 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में प्रदर्शित हुई. फ़िल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि पुलिस को भीड़ पर क़ाबू पाने के लिए मदद बुलानी पड़ी थी. इसका संगीत फ़िरोज़ मिस्त्री ने दिया था. इसमें आवाज़ देने के लिए उस वक़्त तरन ध्वनि तकनीक का इस्तेमाल किया गया. फ़िल्म के गीतों के बारे में कहा जाता है कि उनकी धुनों का चुनाव अर्देशिर ईरानी ने किया था. गीतों के चुनाव के बाद उनके फ़िल्मांकन की समस्या रही होगी. उसकी कोई मिसाल ईरानी के सामने नहीं थी और न ही बूम जैसा कोई ध्वनि उपकरण था. सारे गाने टैनार सिंगल सिस्टम कैमरे की मदद से सीधे फ़िल्म पर ही रिकॉर्ड होने थे और यह काम काफ़ी मुश्किल था. इस फ़िल्म में स्वर देकर डब्ल्यूए ख़ान पहले स्वर देने वाले गायक बने. अफ़सोस की बात है कि इस फ़िल्म के गाने रिकॉर्ड नहीं किए जा सके. फ़िल्म में कुल सात गाने थे. इनमें से एक गीत फ़क़ीर का किरदार निभाने वाले अभिनेता वज़ीर मुहम्मद ख़ान ने गाया था. गीत के बोल थे- ’दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे, ताक़त है अगर देने की’. यह हिंदी सिनेमा का पहला गाना था. एक और गाने के बारे में एलवी प्रसाद ने अपने संस्मरण में लिखा है- वह गीत सितारा की बहन अलकनंदा ने गाया था. इसके बोल थे-’बलमा कहीं होंगे’.

फ़िल्म के संगीत में सिर्फ़ तीन वाद्य यंत्रों तबला, हारमोनियम और वायलिन का इस्तेमाल किया गया था. फ़िल्म के लिए अमेरिका से टैनार साउंड सिस्टम मंगवाया गया. उसके साथ उपकरण का प्रशिक्षण देने के लिए विलफ़ोर्ड डेमिंग नाम के साउंड इंजीनियर आए थे. अर्देशिर और उनके सहयोगी रुस्तम भड़ूचा ने उनसे रिकॉर्डिंग की बारीकियां सीखीं और फ़िल्म की रिकॉर्डिंग की. इस फ़िल्म के साथ ही भारतीय फ़िल्म जगत में पार्श्व गायिकी और पार्श्व संगीत का एक ऐसा दौर शुरू हुआ, जो आज तक भारतीय फ़िल्म की जान है. यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ़िल्म संगीत की पहचान बना हुआ है. फ़िल्मों में ज़्यादा से ज़्यादा गाने देने की होड़ लग गई. अयूब ए ख़ान और मास्टर निसार जैसे संगीतकारों का मुक़द्दर चमक उठा. फ़िल्म ’लैला मजनूं’ में 22 गाने थे और फ़िल्म ’शकुंतला’ में 42 गाने रखे गए थे. फ़िल्म ’इंद्रसभा’ में 71 गाने थे, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. दरअसल, फ़िल्में संगीत से ही चलती थीं. इन फ़िल्मों की कहानी महज़ दो गीतों के बीच की जगह भरने के लिए होती थी. ’इंद्रसभा’ के संगीतकार नागरदास बहुत प्रसिद्ध हुए थे. बक़ौल सुप्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक श्याम बेनेगल, आलम आरा सिर्फ़ एक सवाक फ़िल्म नहीं थी, बल्कि यह बोलने और गाने वाली फ़िल्म थी, जिसमें बोलना कम और गाना ज़्यादा था. इस फ़िल्म में कई गीत थे और इसने फ़िल्मों में गाने के ज़रिये कहानी को कहे जाने या बढ़ाए जाने की परंपरा शुरू की.

फ़िल्मों में पार्श्व गायन की शुरुआत संगीतकार आरसी बोराल की फ़िल्म ’धूप छांव’ से हुई. इस फ़िल्म के पार्श्व गायक केसीडे थे, जिन्होंने ’आज मेरे घर मोहन आया’ गाना गाया था. 1934 में केदारनाथ शर्मा की फ़िल्म ’देवदास’ आई, जो अपने मधुर संगीत की वजह से बहुत लोकप्रिय हुई. इसमें केएल सहगल ने पार्श्व गायन के साथ-साथ देवदास का किरदार निभाया था. फ़िल्म ’क़िस्मत’ का गाना- ’दूर हटो ऐ दुनिया वालों ! हिंदुस्तान हमारा है’, बहुत लोकप्रिय हुआ. संगीतकार नौशाद ने अपनी फ़िल्मों में शास्त्रीय संगीत का बखू़बी इस्तेमाल किया. इसके साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश के लोकगीतों का बेहतरीन इस्तेमाल कर कर्णप्रिय धुनें तैयार कीं. बाद में कई संगीतकारों ने इसे आगे बढ़ाते हुए देश के विभिन्न हिस्सों के लोक संगीत पर आधारित धुनें बनाईं. नौशाद की फ़िल्म ’रतन’ के गाने ’अंखिया मिला के, जिया भरमा के चले नहीं जाना’ ने तो धूम मचा दी थी. 1945 के बाद के दौर में प्रेमकथा पर आधारित फ़िल्में बनीं. संगीत की धुनों में भी बदलाव आया. साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया जाने लगा कि पार्श्व में नायक-नायिका की आवाज़ मिलती-जुलती गायक-गायिकाओं की ली जाए. उस वक़्त के गायकों में केएल सहगल, मुहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद और गायिकाओं में नूरजहां और सुरैया थीं. 1950 से 1960 तक का दशक न केवल शास्त्रीय संगीत पर आधारित धुनों के लिए मशहूर हुआ, बल्कि इस दौर में फ़िल्मों में ग़ज़लों और लोकगीतों का भी इस्तेमाल हुआ. नौशाद की फ़िल्म ’मुग़ले-आज़म’ ने तो अपने मधुर सगीत के लिए सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए. इसके सभी गाने शास्त्रीय संगीत पर आधारित थे.

अनिल विश्वास की फ़िल्म तराना में तलत महमूद द्वारा गाई ग़ज़ल ’सीने में सुलगते हैं अरमां, आंखों में उदासी छाई है’, राग यमन में थी. लोकगीतों का इस्तेमाल भी फ़िल्मों में एक नई शैली की शुरुआत थी. एसडी बर्मन ने पहली बार फ़िल्म ’तलाश’ में बंगाल के भटियाली लोकगीत का इस्तेमाल किया. उन्होंने फ़िल्म ’गाईड’ में यहां कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहां’ और फ़िल्म ’सुजाता’ के गीत ’सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मीत’, में लोकधुनों को अपनाया. संगीतकार ओपी नैयर ने अपनी फ़िल्मों में पंजाबी धुनों का खू़ब इस्तेमाल किया. फ़िल्म ’फागुन’ में आशा भोंसले की आवाज़ में गाया गया गाना ’एक परदेसी मेरा दिल ले गया’, बहुत लोकप्रिय हुआ. 1975 में बनी फ़िल्म ’प्रतिज्ञा’ का मुहम्मद रफ़ी का गाया गाना ’मैं जट यमला पगला दीवाना’ आज भी पसंद किया जाता है. फ़िल्म ’नया दौर’  का गाना ’ ये देश है वीर जवानों का’ भी ख़ासा मशहूर हुआ.
इस फ़िल्म की हीर ’उठ नींद से मिर्ज़ेया जाग जा’ भी बहुत मशहूर हुई. फ़िल्म ’मिलन’ के गीत ’सावन का महीना, पवन करे सोर’ से भी माटी की महक आती है. संगीतकार शंकर जयकिशन का संगीतबद्ध फ़िल्म ’तीसरी क़सम’ का गाना ’ पान खाय सैंया हमार भी’ लोकप्रिय गीत है.
 संगीत में बदलाव के इस दौर में संगीतकारों ने पश्चिमी संगीत की धुनों का भी इस्तेमाल किया. संगीतकार ओपी नैयर ने ये है ’बॉम्बे मेरी जान’, सी रामचंद्र ने ’गोरे-गोरे ओ बांके छोरे, शोला जो भड़के’ और ’ईना मीना डीका’ जैसे गानों को संगीत दिया.

किशन धवन की मुंशी प्रेमचंद की दो बैलों की कथा पर आधारित फ़िल्म ’हीरा मोती’ का गीत ’कौन रंग हीरा, कौन रंग मोती’ भी प्रचलित लोकगीत है. फ़िल्म ’गोदान’ का गीत ’पुरबा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा’ भी लोक संगीत पर आधारित है.
फ़िल्म ’लावारिस’ का गीत ’मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है’ और फ़िल्म ’सिलसिला’ का होली का गीत ’रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे’ भी लोकगीतों से ही प्रभावित हैं. पहले दोनों ही फ़िल्मों में इन गीतों के गीतकार के तौर पर हरिवंश राय बच्चन का नाम दिया गया था, लेकिन बाद में हटा लिया गया. जेपी दत्ता की फ़िल्म ’उमराव जान’ में जावेद अख़्तर द्वारा पेश किया गया गीत ’अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजौ’ भी मशहूर लोकगीत है, जिसके रचयिता अमीर खु़सरो हैं. इसी तरह फ़िल्म ’ग़ुलामी’ का गीत ’ज़िहाले मस्ती मक़म बरंजिश’ भी फ़ारसी के गीत से प्रेरित है. फ़िल्म ’लम्हे’ का गीत ’मोरनी बागा में बोले आधी रात मा’ राजस्थानी लोक संगीत से प्रभावित है. इसके अलावा शम्मी कपूर और ओपी नैयर ने फ़िल्मों में याहू नामक नई शैली का इस्तेमाल किया. फ़िल्म ’जंगली’ में शंकर जयकिशन द्वारा निर्देशित मुहम्मद रफ़ी का गाया गाना ’चाहे कोई मुझे जंगली कहे याहू’ बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद आया दौर किशोर कुमार की नई शैली यूडली का. फ़िल्म ’आराधना’ और ’अमर प्रेम’ आदि के गानों में यूडली का इस्तेमाल किया गया. इन फ़िल्मों का संगीत एसडी बर्मन ने दिया. वक़्त के साथ-साथ फ़िल्म संगीत में भी बदलाव आता गया. फ़िल्मों से शास्त्रीय संगीत लुप्त होता गया और इसकी जगह पर चोली और खंडाला जैसे गाने आ गए. लेकिन कई संगीतकारों ने अच्छी धुनें तैयार कीं. फिल्म ’लेकिन’, ’रुदाली’, ’दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’, ’दिल तो पागल है’, ’दिल से’, ’साजन’ और ’कुछ-कुछ होता है’ ’फ़ना’ आदि फ़िल्मों का संगीत सुमधुर और कर्णप्रिय रहा. फ़िल्म ’दिल्ली छह’ के गीत ’सैंया छेड़ देवे, ननद चुटकी लेवे, ससुराल गेंदा फूल’ छत्तीसगढ़ का लोकगीत है. इस लोकगीत को सबसे पहले 1972 में रायपुर की जोशी बहनों ने गाया था. गंगाराम शिवारे के लिखे इस गीत को भुलवाराम यादव ने अपनी आवाज़ दी थी. फ़िल्म ’पीपली लाइव’ का महंगाई डायन खाय जात है, भी लोक संगीत पर आधारित है. अनुराग कश्यप की फ़िल्म ’गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ का लोकगीत ’तार बिजली से पतले हमारे पिया’ बिहार और झारखंड में विवाह के मौक़े पर गाया जाता है. इस गीत को गाने वाली वाली बिहार की जानी मानी लोक गायिका पदमश्री शारदा सिन्हा का कहना है कि फ़िल्मों से लोक संगीत को बड़ा मंच मिलता है और जिन फ़िल्मों में मूल लोक संगीत को अपनाया गया है, उनमें से ज़्यादातर फ़िल्में कामयाब रही हैं. सोहेल ख़ान की फ़िल्म ’मैंने प्यार किया’ के गीत ’कहे तोसे सजना’ के ज़रिये हिंदी सिनेमा में प्रवेश करने वाली लोक गायिका शारदा सिन्हा के गीतों में लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत का सम्मिश्रण है. उनका गाया फ़िल्म ’हम आपके हैं कौन’ का गीत ’बाबुल जो तुमने सिखाया’ भी ख़ासा लोकप्रिय हुआ था. मौजूदा संगीत का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि नए लोग प्रतिभावान हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर की गायिकी पर बाज़ार हावी है. नए गीतों के बोल उन्हें अच्छे नहीं लगते और लोक संगीत के नाम पर भी रीमिक्स परोसा जा रहा है. उनमें शुद्धता का अभाव है. हालांकि स्थानीय स्तर पर लोक संगीत की कई अल्बम आए दिन रिलीज़ होती रहती हैं. लोकगायकों की अल्बमों में ठेठ लोक संगीत की महक बरक़रार रहती है, लेकिन नए गायकों की अल्बमों में लोक संगीत की शुद्धता की कमी खलती है.

गांवों और क़स्बों में आज भी लोक संगीत का बड़ा महत्व है. मांगलिक कार्यों में महिलाएं आंचलिक गीत गाती हैं. लोक संगीत के बिना कोई भी उत्सव पूरा नहीं हो पाता है. आज भी सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए जनसंपर्क विभाग लोक गायकों की मदद लेता है. मगर शहरों में लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गीत लेते जा रहे हैं. लेकिन यह कहना ग़लत न होगा कि फ़िल्में लोक संगीत के प्रचार-प्रसार का बेहतर ज़रिया साबित हो सकती हैं. इन गीतों में ही हमारी संस्कृति की आत्मा बसी है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग


फ़िरदौस ख़ान
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी क्रांतिकारी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं. नोबेल पुरस्कार के लिए नामित फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर साम्यवादी होने और इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ लिखने के भी आरोप लगते रहे. उनका जन्म 11 फ़रवरी, 1911 को पाकिस्तान के स्यालकोट शहर में हुआ था. उनके पिता वकील थे. रिवायत के मुताबिक़, उनकी शुरुआती तालीम उर्दू, अरबी और फ़ारसी में हुई. इसके बाद उन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल और लाहौर विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. उन्होंने 1933 में अंग्रेज़ी और 1934 में अरबी में एमए किया. कुछ वक़्त तक उन्होंने अमृतसर के एमएओ कॉलेज में बतौर लेक्चरर काम किया. मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर 1936 में वह प्रगतिवादी लेखक संघ से जुड़ गए. उन्होंने उस वक़्त मार्क्सवादी नेता सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर प्रगतिवादी लेखक संघ की पंजाब शाखा की स्थापना की. 1938 से 1946 तक उन्होंने उर्दू साहित्यिक मासिक अदब-ए-लतीफ़ का संपादन किया. 1941 में उनके छंदों का पहला काव्य संकलन नक़्श-ए-फ़रियादी प्रकाशित हुआ, जो बेहद सराहा गया. 1952 में दस्त-ए-सबा, 1956 में ज़िंदानामा, 1964 में दस्ते-तहे-संग, 1971 में सरे-वादिए-सीना, 1978 में शाम-ए-शहर-ए-यारां, 1980 में मेरे दिल मेरे मुसाफिर प्रकाशित हुआ, जबकि ग़ुबार-ए-अय्याम (दिनों की गर्द) उनकी मौत के बाद प्रकाशित हुआ. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने गद्य रचनाएं भी कीं. 1963 में उनके लेखों का संग्रह मीज़ान प्रकाशित हुआ. 1971 में सलीबें मेरे दरीचे प्रकाशित हुआ, जो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा पत्नी को लिखे गए ख़तों का संग्रह है. 1973 में उनके भाषणों, लेखों और साक्षात्कारों का संग्रह माताए-लौह-ओ-क़लम प्रकाशित हुआ, जो उनके चाहने वालों को ख़ासा पसंद आया. 1962 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया.

उन्होंने एक अंग्रेज़ महिला एलिस जॉर्ज से शादी की और दिल्ली आकर बस गए. ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और कर्नल के पद तक पहुंचे. 1942 से लेकर 1947 तक वह सेना में रहे, लेकिन हिंदुस्तान के बंटवारे के वक़्त वह पद से इस्तीफ़ा देकर लाहौर वापस चले गए. वहां उन्होंने इमरोज़ और पाकिस्तान टाइम्स का संपादन किया. 1951 में लियाक़त अली खां की सरकार के तख्तापलट की साज़िश के आरोप में उन्हें जेल जाना पड़ा और 1955 में वह क़ैद से रिहा हुए. इसके बाद 1962 तक वह लाहौर में पाकिस्तानी कला परिषद में रहे. 1963 में उन्होंने यूरोप, अल्जीरिया और मध्य पूर्व का भ्रमण किया और अगले साल स्वदेश लौटे. 1958 में स्थापित एशिया-अफ्रीका लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में वह भी शामिल थे. भारत-पाक के 1965 के युद्ध के वक़्त वह पाक के सूचना मंत्रालय में कार्यरत थे. 1978 में वह एशियाई-अफ्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष बने और 1982 तक बैरूत (लेबनान) में कार्यरत रहे. 1982 में वापस लाहौर लौट आए. 1978 से उन्होंने एशियाई-अफ्रीकी लेखक संघ के मुखपत्र लोटस का संपादन भी किया. उनका निधन 73 साल की उम्र में 20 नवंबर, 1984 को लाहौर में हुआ.

उन्होंने पाकिस्तानी फ़िल्मों में गीत भी लिखे. उनकी यह ग़ज़ल बहुत मशहूर हुई, जो उन्होंने हैदराबाद के मशहूर शायर मख़दूम मुहीउद्दीन को समर्पित की थी, जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन में शिरकत की थी-
आपकी याद आती रही रात भर
चांदनी दिल दुखाती रही रात भर
गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात भर… 

उनके गीत भी बहुत मशहूर हुए, जिनमें से एक है-जब तेरी समंदर आंखों में-
ये धूप किनारा, शाम ढले
मिलते हैं दोनों व़क्त जहां
जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर को अमर, पल भर में धुआं
इस धूप किनारे पल दो पल
होंठों की लपक, बांहों की छनक
ये मेल हमारा, झूठ न सच
क्यूं रार करो, क्यूं दोष धरो
किस कारन झूठी बात करो
जब तेरी समंदर आंखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोएंगे घर दर वाले
और राही अपनी रह लेगा...

उनकी शायरी में रूमानियत है और महबूब से शिकवे-गिले भी-
आके वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझसे
जिसने इस दिल को परी़खाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था
आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवां गुज़रे हैं जिनसे उसी रानाई के
जिसकी इन आंखों ने बेसूद इबादत की है...

उनका कलाम नौजवानों के दिल की आवाज़ बन गया. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी में जहां रूमानियत मिलती है, वहीं मौजूदा हालात का तब्सिरा भी मिलता है. पहले जहां प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका ही सब कुछ थी, लेकिन अब वह सिर्फ़ कुछ है, सब कुछ नहीं. वह कहते हैं-
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूं हो जाए
यूं न था, मैंने फ़क़्त चाहा था यूं हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग...

जब उन्हें देशद्रोह-रावलपिंडी साज़िश मामले में जेल जाना पड़ा, तो उनके कलाम में भी उनकी ज़िंदगी की तरह बदलाव आ गया. उनकी ग़ज़ल का यह शेअर पाकिस्तानी फ़ौजी हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत का प्रतीक बन गया-
वो बात, सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है...

उन्होंने सियासत पर भी जमकर क़लम चलाई. उनके कलाम में अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी छाए रहे, मामला चाहे अफ्रीका की आज़ादी का हो या अरबों के संघर्ष का. अफ्रीकी स्वतंत्रता प्रेमियों के लिए उन्होंने जहां नज़्म अफ्रीका कम बैक लिखी, वहीं साम्राज्यवादियों से संघर्षरत अरबों के लिए सर-ए-वादी-ए-सीना, बैरूत में किए गए जनसंहार के खिला़फ एक नग़मा कर्बला-ए-बैरूत लिखकर अपने ग़ुस्से का इज़हार किया. फ़िलीस्तीन के शहीदों को श्रद्धांजलि पेश करते हुए वह लिखते हैं-
मैं जहां पर भी गया अर्ज़-ए-वतन
तेरी तज़लील के दाग़ों की जलन दिल में लिए
तेरी हुरमत के चिराग़ों की लगन दिल में लिए
तेरी उल्फ़त, तेरी यादों की कसक साथ गई
तेरे नारंज शगूफ़ों की महक साथ गई
सारे अनदेखे राफ़ीक़ों का जिलौ साथ रहा
कितने हाथों से हम आग़ोश मेरा हाथ रहा...

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के कलाम में मानव प्रेम भी है और दबे-कुचले लोगों का दर्द भी इसमें झलकता है. यही उनकी शायरी की जान भी है-
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
देख के आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने हैं कह ले...

दरअसल, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की समूची शायरी आम इंसान के दर्द को बयां करती है. यह पीड़ितों की आवाज़ बनकर बुलंद होती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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