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अम्मी


अम्मी 
ज़िन्दगी की तपती धूप में 
घने दरख़्त की मानिन्द थीं
जिनके साये में 
हमारी रूह सुकून पाती थी...

अब अम्मी नहीं हैं
उम्र का तवील सफ़र है
राह में दुश्वारियों के ख़ार हैं 
पाँव ज़ख़्मी हैं 
और चलना मुहाल है... 

काश !
माँयें कभी नहीं मरतीं
वो हमेशा ज़िन्दा रहतीं 
अपने बच्चों के लिए...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान 
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बस, एक घर ऐसा हो...


घर...कितना सुकून समाया है, इस एक लफ्ज़ में... घर महज़ ईंट-गारे से बनी चारदीवारी पर टिकी छत का नाम नहीं है... और न ही उस छत का नाम है जिसके नीचे कई लोग रहते हैं... क्योंकि ऐसी जगह मकान तो हो सकती है, लेकिन घर क़तई नहीं... हमने बरसों पहले एक घर का तसव्वुर किया था और फिर उसी तसव्वुर को अल्फ़ाज़ में पिरोकर सहेज लिया था... बरसों तक सहेजकर रखे गए उसी तसव्वुर को आज एक दुआ के साथ पोस्ट कर रहे हैं... इंसान अपने लिए जैसा घर चाहता है, उसे वैसा घर नसीब हो... आमीन

घर
एक घर ऐसा हो
जिसकी बुनियाद
खुलूस की ईंटों से बनी हो
जिसके आंगन में
बेला और मेहंदी महकती हों
जिसकी क्यारियों में
रफ़ाक़तों के फूल खिलते हों
जिसकी दीवारें
क़ुर्बतों की सफ़ेदी से पुती हों
जिसकी छत पर
दुआएं
चांद-सितारे बनकर चमकती हों
जिसके दालान में
हसरतें अंगड़ाइयां लेती हों
जिसके दरवाज़ों पर
उम्र की हसीन रुतें
दस्तक देती हों
जिसकी खिड़कियों में
बच्चों-सी मासूम ख़ुशियां
मुस्कराती हों
और
जिसकी मुंडेरों पर
अरमानों के परिन्दे चहकते हों
बस, एक घर ऐसा हो
-डॉ फ़िरदौस ख़ान

Courtesy :  Image Mikki Senkarik 


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ख़ामोश रात की तन्हाई में...

नज़्म
जब कभी
ख़ामोश रात की तन्हाई में
सर्द हवा का इक झोंका
मुहब्बत के किसी अनजान मौसम का
कोई गीत गाता है तो
मैं अपने माज़ी के
वर्क़ पलटती हूं
तह-दर-तह
यादों के जज़ीरे पर
जून की किसी गरम दोपहर की तरह
मुझे अब भी
तुम्हारे लम्स की गर्मी वहां महसूस होती है
और लगता है
तुम मेरे क़रीब हो...
-फ़िरदौस ख़ान
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पूनम की रात...


आज
पूनम की रात है
और चांद
आसमान में
मुस्करा रहा है
तारे भी
खिलखिला रहे हैं

सच
कितनी भली है
पूनम की ये चांदनी रात
दिल चाहता है
इसे सहेज कर
रख लूं

क्या ख़बर
ज़िन्दगी की
कोई अंधियारी रात
इसकी यादों से ही
रौशन हो जाए
और
ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर
उजाला बिखर जाए...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान
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मुहब्बत से महकते ख़त



ख़त... सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं. जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है. मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो. और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो. ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है. उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें. दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़. सीधे दिल में उतर जाते हैं. अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो. मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं, और फिर यूं ही उम्र बीत जाए.

कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा, क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी. लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली. और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया. किसी बेल-बूटे की तरह, कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया कि 'तुम' मेरे हो.

एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान

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मेरे महबूब...


आज उनकी सालगिरह है, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं... इस मुबारक मौक़े पर उन्हें समर्पित एक नज़्म ’मेरे महबूब’ पेश-ख़िदमत है...
मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरआन है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं…

तुम्हारी मुहब्बत ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं…
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


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वो मेरे महबूब हैं


महबूब...  महबूब और इश्क़... इश्क़ और इबादत... इबादत और ख़ुदा...  आसमान के काग़ज़ पर चांदनी की रौशनाई से महबूब का तअरुफ़ लिखने बैठें, तो कायनात की हर शय छोटी पड़ जाए...
महबूब में ख़ुदा दिखता है... और जिसमें ख़ुदा दिखता है, उसका तअरुफ़ अल्फ़ाज़ में भला कोई कैसे कराए... अहसासात, जज़्बात... हरुफ़ की दुनिया से परे हैं... क्या कोई खिली धूप को बांध पाया है, क्या कोई चांदनी को पकड़ पाया है... नहीं... क़तई नहीं...
फिर भी हमने कोशिश की है, उनका तअरुफ़ लिखने की... मुलाहिज़ा फ़रमाएं..

मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं…
-फ़िरदौस ख़ान


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बरसात का मौसम...

नज़्म
गर्मियों का मौसम भी
बिलकुल
ज़िन्दगी के मौसम-सा लगता है...
भटकते बंजारे से
दहकते आवारा दिन
और
विरह में तड़पती जोगन-सी
सुलगती लम्बी रातें...
काश!
कभी ज़िन्दगी के आंगन में
आकर ठहर जाए
बरसात का मौसम...
-फ़िरदौस ख़ान
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फूल पलाश के...


फूल पलाश के
वक़्त के समन्दर में
यादों का जज़ीरा हैं
जिसके हर ज़र्रे में  
ख़्वाबों की धनक फूटती है
फ़िज़ाओं में
चाहत के गुलाब महकते हैं
जिसकी हवायें 
रूमानी नग़में गुनगुनाती हैं
जिसके जाड़ों पर
क़ुर्बतों का कोहरा छाया होता है
जिसकी गर्मियों में
तमन्नायें अंगड़ाइयां लेती हैं
जिसकी बरसात
रफ़ाक़तों से भीगी होती है
फूल पलाश के
इक उम्र का
हसीन सरमाया ही तो हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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तुम एक ख़्वाब लगते हो...




कभी
मैं सोचती
ज़ुल्फ़ों की घनी, महकी, नरम छांव में
तुम्हें बिठाकर
वो सभी जज़्बात से सराबोर अल्फ़ाज़ 
जो मैंने बरसों से
अपने दिल की गहराइयों में
छुपाकर रखे
तुम्हारे सामने बिखेर दूं
और तुम
मेरे जज़्बात, मेरे अहसासात पढ़ लो
लेकिन
मेरा ज़हन
मेरा साथ नहीं देता
क्यूंकि
मेरी रूह, मेरे ख्यालात
कहते हैं-
कहीं ये एक ख़्वाब ही न हो
और
ये तसव्वुर करके
मेरा वजूद सहम जाता है
बस, ख़्वाब के टूटने के खौफ़ से
पता नहीं क्यूं
तुम एक ख़्वाब लगते हो
और मैं
उम्र की रहगुज़ारों में
भटकती रहती हूं
बस इक ख़्वाब को अपने हमराह लिए
जो मेरा अपना है...
-फ़िरदौस ख़ान

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किताबें…


तस्वीरें और ख़त
यादों का ज़ख़ीरा ही तो हैं
जिस पर
हमेशा के लिए
बस जाने को
दिल चाहता है...
-फ़िरदौस ख़ान

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तब झूठा लगता है हर लफ़्ज़ मुहब्बत का...




हर रोज़ की तरह
जब
सुबह का सूरज
दस्तक देता है
ज़िन्दगी के
नये दिन की चौखट पर
और
फिर से शुरू होता है
तन्हाई का
एक और मुश्किल सफ़र...

जब
उम्र की तपती दोपहरी में
जिस्म तरसता है
ठंडी छांव को...

जब
सुरमई शाम को
बिखरते ख़्वाबों की किरचें
लहू-लुहान करती हैं
अरमानों के पांव को...

जब
लम्बी तन्हा रात में
अहसास सुलगते हैं
अंगारों से...

तब, वाक़ई
झूठा लगता है
हर लफ़्ज़ मुहब्बत का...
-फ़िरदौस ख़ान
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वो नज़्म...


वो नज़्म
जो कभी
तुमने मुझ पर लिखी थी
एक प्यार भरे रिश्ते से
आज बरसों बाद भी
उस पर नज़र पड़ती है तो
यूं लगता है
जैसे
फिर से वही लम्हें लौट आए हैं
वही मुहब्बत का मौसम
वही चम्पई उजाले वाले दिन
जिसकी बसंती सुबहें
सूरज की बनफ़शी किरनों से
सजी होती थीं
जिसकी सजीली दोपहरें
चमकती सुनहरी तेज़ धूप से
सराबोर होती थीं
जिसकी सुरमई शामें
रूमानियत के जज़्बे से
लबरेज़ होती थीं
और
जिसकी मदहोश रातों पर
चांदनी अपना वजूद लुटाती थी
सच !
कितनी कशिश है
तुम्हारे चंद लफ़्जों में
जो आज भी
मेरी उंगली थामकर
मुझे मेरे माज़ी की तरफ़
ले चलते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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तुम समझ लेना, मैं तुम्हें याद करती हूं...

जब सुबह सूरज की
चंचल किरनें
पेशानी को चूमें
और शोख़ हवायें 
बालों को सहलायें
तब
तुम समझ लेना
मैं तुम्हें याद करती हूं...

जब
ज़मीन पर
चांदनी की चादर
बिछ जाए
और फूल
अपनी भीनी-भीनी महक से
माहौल को
रूमानी कर दें
हर सिम्त
मुहब्बत का मौसम
अंगड़ाइयां लेने लगे
तब
तुम समझ लेना
मैं तुम्हें याद करती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान
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कितना भला लगता है पतझड़ भी कभी-कभी


कितना लुभावना होता है
पतझड़ भी कभी-कभी
बाग़ों में
ज़मीं पे बिखरे
सूखे ज़र्द पत्तों पर
चलना
कितना भला लगता है कभी-कभी

माहौल को रूमानी बनातीं
दरख़्तों की, वीरान शाख़ों पर
चहकते परिन्दों की आवाज़ें
कितनी भली लगती हैं कभी-कभी

क्यारियों में लगे
गेंदे और गुलाब के
खिलते फूलों की
भीनी-भीनी ख़ुशबू
आंगन में कच्ची दीवारों पर, चढ़ती धूप
कितनी भली लगती है, कभी-कभी

सच! पतझड़ का भी
अपना ही रंग
बसंत और बरसात की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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मन्नतों के पीले धागे


बस्ती से दूर
किसी ख़ामोश मक़ाम पर
बने दूधिया मज़ारों के पास खड़े
दरख़्त की शाख़ों पर बंधे
मन्नतों के पीले धागे
कितने बीते लम्हों की
याद दिला जाते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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सुलगते अहसास...


ज़िन्दगी के आंगन में
मुहब्बत की चांदनी बिखरी है
हसरतों की क्यारी में
सतरंगी ख़्वाबों के फूल खिले हैं
ख़्वाहिशों के बिस्तर पर
सुलगते अहसास की चादर है
इंतज़ार की चौखट पर
बेचैन निगाहों के पर्दे हैं
माज़ी के जज़ीरे पर
यादों की पुरवाई है
फिर भी
ज़िन्दगी के आंगन में
मुहब्बत की चांदनी बिखरी है...
-फ़िरदौस ख़ान 
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कितने वर्क़ पुरानी यादों के...


ज़िन्दगी की किताब में
कितने वर्क़ पुरानी यादों के
आज भी
मैंने सहेजकर रखे हैं...

कुछ वर्क़
क़ुर्बतों की खुशबू से सराबोर हैं
हथेलियों पर सजी
गीली मेहंदी की
भीनी-भीनी महक की तरह...

और
कुछ वर्क़
हिज्र की स्याह रातों से वाबस्ता हैं
जाड़ों की कोहरे से ढकी
उदास शाम की तरह...

मैंने
आज भी सहेजकर रखा है
पुरानी यादों को
कच्चे ताक़ में रखी
पाक किताबों की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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मुहब्बत के फूल...


मेरे महबूब !
उम्र की रहगुज़र में 
हर क़दम पर मिले 
तुम्हारी मुहब्बत के फूल...
अहसास की शिद्दत से दहकते 
जैसे सुर्ख़ गुलाब के फूल...

उम्र की तपती दोपहरी में 
घनी ठंडी छांव से 
जैसे पीले अमलतास के फूल...

आंखों में इन्द्रधनुषी सपने संजोये
गोरी हथेलियों पर सजे 
जैसे ख़ुशरंग मेहंदी के फूल...  

दूधिया चांदनी रात में 
ख़्वाहिशों के बिस्तर पर बिछे 
जैसे महकते बेला के फूल...

मेरे महबूब 
मुझे हर क़दम पर मिले 
तुम्हारी मुहब्बत के फूल...
-फ़िरदौस ख़ान  

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ख़त


मेरे महबूब !
मेरी ज़िन्दगी
वो गुमशुदा ख़त है
जिसका पता तुम हो...
-फ़िरदौस ख़ान 
 

Mere Mahboob !
Meri Zindagi 
Wo Gumshuda Khat Hai
Jiska Pataa TUM ho...
-Firdaus Khan


Photo Curtesy by Google
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