मीरांबाई की संघर्ष-यात्रा को बयां करता है ‘रंग राची’


फ़िरदौस ख़ान
सबसे पहले ‘रंग राची’ के लेखक सुधाकर अदीब साहब को बहुत-बहुत मुबारकबाद... उनकी हर किताब की तरह यह किताब भी लोकप्रिय हो, यही दुआ है...

जाने माने लेखक सुधाकर अदीब के नए उपन्यास ‘रंग राची’ का लोकार्पण आज नई दिल्ली में मंडी हाउस स्थित साहित्य अकादमी सभागार में किया गया. मीरांबाई की संघर्ष-यात्रा को केन्द्र में रखकर लिखे गए इस उपन्यास को लोकभारती प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

मीरा के जीवन संघर्ष पर रौशनी डालते हुए ‘रंग राची’ के लेखक सुधाकर अदीब कहते हैं कि मीरा ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धांत निर्मित किए, उन पर सबसे पहले वे ही चलीं. कृष्ण नाम संकीर्तन के सहारे मीरा ने भारत के दीन-दुखियारे समाज को उसी तरह एक सूत्र में पिरोने का काम किया जैसा कि उस भक्ति आंदोलन के युग में दूसरे संत करते आए थे. जो कार्य दक्षिण भारत में रामानुज कर चुके थे और जो कार्य रामानन्द ने उत्तर भारत में किया. जो कार्य कबीर, रैदास, चैतन्य और नरसिंह मेहता सरीखे अनेक संत एवं कविगण अपने-अपने तरीक़ों से करते आए थे, वही कार्य संत मीरा ने अपने तरीक़े से किया. दूसरे भक्त-संत जनसमर्थक थे और जनसाधारण में से ही आए थे. अतः सामन्ती व्यवस्था के वैभव और विभेद के प्रति उनके मन अरुचि होना नितांत स्वाभाविक बात थी. जबकि मीरा तो स्वयं ही सामन्ती व्यवस्था का अंग थीं. यदि चाहतीं तो वह भोग-विलासमय जीवन अपना सकती थीं, पर नहीं. वह बालपन से कृष्णार्पिता थीं. अतः उन्होंने वैभव पथ को त्यागकर साधना पथ को अपनाया. पुरुषप्रधान समाज में एक तथाकथित अबला स्त्री होकर भी उन्होंने उस निर्मम व्यवस्था का सात्विक विरोध किया, जो कृष्ण के वास्तविक गोप-समुदाय से उनके मिलन में बाधक थी. दरअसल मीरा का चरित्र स्त्री स्वतंत्रता और मुक्ति का सजीव उदाहरण है. उन्होंने जीवनपर्यंत तात्कालीन सामन्ती प्रथा को खुली चुनौती दी. वह अपने अपूर्व धैर्य के साथ उन तमाम कुप्रथाओं का सामना करती रहीं, जो स्त्रियों को लौह कपाटों के पीछे ढकेलने और उसे पत्थर की दीवारों की बन्दिनी बनाकर रखने, पति के अवसान के बाद जीते जी जलाकर सती कर देने, न मानने पर स्त्री का मानसिक और दैहिक शोषण करने की पाशविक प्रवृत्तियों थीं. मीरा का सत्याग्रह अपने युग का अनूठा एकाकी आंदोलन था, जिसकी वही अवधारक थीं, वही जनक थीं और वहीं संचालक. मीरा ने स्त्रियों के संघर्ष के लिए जो सिद्धांत निर्मित किए, उन पर सबसे पहले वे ही चलीं.

लोकार्पण समारोह में अपने अध्यक्षीय आशीर्वचन में वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि हिन्दी में बहुत कवयित्रियां हुई हैं, लेकिन जो स्थान मीरा ने बनाया वह सबके लिए आदर्श है. मीरा को करुणा, दया के पात्र के रूप में देखने की ज़रूरत नहीं है, मीरा स्त्रियों के स्वाभिमान की प्रतीक हैं. इस बेहतरीन उपन्यास के लिए मैं राजकमल प्रकाशन समूह व लेखक सुधाकर अदीब को शुभकामनाएं देता हूं.
समारोह में मुख्य अतिथि विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस उपन्यास की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह बहुत ही पठनीय उपन्यास है. इस उपन्यास की ख़ास बात यह है कि इसमें एक साथ पाठकों को शोध, निबंध, विचार सबका अनुभव होगा. मीरा की कविता की गहराई को सुधाकर जी ने बहुत ही गहराई से समझा है. इनका उपन्यास घी का लड्डू है और यही इसकी सार्थकता भी है.
मीरायन पत्रिका के संपादक सत्य नारायण समदानी ने मीरा के जीवन के ऐतिहासिक पक्ष को रेखांकित करते हुए मीरा से जुड़ी हुई कई भ्रांतियों को दूर किया. इस उपन्यास को मीरा के जीवन चरित का प्रमाणिक पुस्तक बताते हुए समदानी जी ने कहा कि मीरा मूलतः एक भक्त थीं. सुधारकर अदीब ने इस उपन्यास को लिखते समय इतिहास के साथ के न्याय किया है.
कवयित्री अनामिका ने उपन्यास के पात्रों के बीच के संबंधों के प्रस्तुतिकरण की ओर श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि एक रूपवति, गुणवति व विलक्षण स्त्री का अपने ससुर, पति, देवर सहित तमाम संबंधों में जीवंतता प्रदान करना मुश्किल काम है. सुधाकर जी ने अपने इस उपन्यास में इस युग के नज़रिये से उस युग की बात की है. राष्ट्र निर्माण की भूमिका में स्त्रियों के योगदान को इस उपन्यास में सही तरीक़े से प्रस्तुत किया गया है. तथ्यों का संयोजन बेहतरीन है.
प्रसिद्ध कथाकार चन्द्रकांता ने इस उपन्यास पर अपनी बात रखते हुए कहा कि रंग राची मीराबाई के जीवन का बहुआयामी दस्तावेज़ है. यह नियति से निर्वाण की कथा है. यहां मीरा की जन्मभूमि राजस्थान के रजवाड़ों की शौर्य गाथाएं भी हैं और सत्ता के लिए रचे गए षड्यंत्र भी. सोलहवीं शती के मेवाड़ के जीवन्त इतिहास के केन्द्र में है कृष्ण प्रेम की दीवानी स्वतंत्र चेता, स्वाभिमानी रूढ़ि भंजक अन्याय का प्रतिरोध करती, सर्वहित कामी स्त्री, जो पारिवारिक-सामाजिक प्रताड़ना सहती भी अपने कर्म-पथ से विचलित नहीं हुई. लेखक, मीरा की आन्तरिकता की हलचलों और द्वंद्वों को संवेदी स्वर दे कर पाठक के मन में संवेदना का उत्खनन करने में सफ़ल हुआ है. वास्तविक चरित्रों, घटनाओं, उपकथाओं में सोलहवीं सदी का मेवाड़ जीवित हो उठा है और शोषक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करती मीराबांई आज की संघर्षचेता स्त्री के साथ खड़ी नज़र आती हैं.
कार्यक्रम का संचालन अनुज ने किया और धन्यवाद ज्ञापन राजकमल समूह के निदेशक अशोक महेश्वरी ने किया. इस मौक़े पर साहित्य जगत के अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे.

लेखक : सुधाकर अदीब
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन
पहली मंज़िल, दरबारी बिल्डिंग
महात्मा गाँधी मार्ग, इलाहाबाद-211001
ईमेल : info@lokbhartiprakashan.com
दूरभाष : 0532-2427274
चलभाष : 09838514764
पृष्ठ : 448
मूल्य : 600 रुपये (हार्डबाऊंड)
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

आदत


एक क़िस्सा बहुत मशहूर है. एक शख़्स किसी नजूमी के पास गया और बोला- मेरी दुख-तकलीफ़ें कब ख़त्म होंगी ?
नजूमी बोला- बस छह-सात महीने और इसी तरह चलेगा.
उस शख़्स ने फिर पूछा- उसके बाद ?
नजूमी बोला- उसके बाद क्या, तुझे दुख-तकलीफ़ों की आदत पड़ जाएगी.
--------------
अमूमन ऐसा ही होता है... जब हम किसी मुसीबत में मुबतला होते हैं, तब हमें बहुत तकलीफ़ होती है... उसके बाद फिर आदत पड़ जाती है... ख़ासकर रिश्तों के मामले में... कोई बार-बार रूठता रहे, तो इंसान उसे मनाता है... लेकिन जब कोई इसे अपनी आदत ही बना ले, तो सामने वाला सब्र करके बैठ जाता है...
(Firdaus Diary)
तस्वीर गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

हज़रत फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़

फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ पहले डाकू थे. वे राहगीरों को लूटते थे. बाद में लूट का माल अपने साथियों में बांट देते और जो चीज़ पसंद आती, उसे अपने पास रख लेते. रिवायत यह भी है कि वे बड़े रहम दिल और बहादुर थे. जिस काफ़िले में कोई औरत होती या जिनके पास थोड़ी रक़म होती, उनको नहीं लूटते थे और जिसको लूटते थे उसके पास कुछ न कुछ माल ज़रूर छोड़ देते थे. उनकी एक ख़ासियत यह थी कि वे डाकू होने के साथ-साथ अल्लाह की इबादत भी करते थे. वे नियमित रूप से अपने साथियों के साथ मिलकर नमाज़ पढ़ते और रोज़े (व्रत) भी रखते. मगर एक वाक़िये ने उनकी ज़िन्दगी को पूरी तरह बदल दी. उन्होंने सारे बुरे काम छोड़ कर अपनी ज़िन्दगी अल्लाह की इबादत और लोक कल्याण में ही गुज़ारने का संकल्प ले लिया.

एक बार जंगल में से एक क़ाफ़िला आया. क़ाफ़िले वालों ने जब यह सुना कि यह इलाक़ा फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ का है, तो वे डर से कांपने लगे. एक व्यक्ति के पास बहुत-सा धन था. उसने सोचा कि अगर धन को जंगल में कहीं छुपा दिया जाए, तो यह लुटने से बच जाएगा. इसलिए वह सुरक्षित स्थान की खोज में निकल पड़ा. इसी दौरान उसने देखा कि एक जगह एक संत (फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़) ख़ेमे में नमाज़ पढ़ रहा है. वह वहीं खड़ा हो गया और संत की नमाज़ पूरी होने का इंतज़ार करने लगा. संत ने नमाज़ पूरी करने के बाद दुआ के लिए हाथ उठाने से पहले उस व्यक्ति को इशारा किया कि वह धन की पोटली को वहीं रख दे. उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया और फिर वापस क़ाफ़िले में आ गया. डाकुओं ने क़ाफ़िले को लूट लिया. बाद में राहगीर संत के ख़ेमे में गया, तो वहां का नज़ारा देखकर हैरान रह गया. वहां डाकू लूट का माल बांट रहे थे. इतने में फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ की नज़र राहगीर पर पड़ी, तो उन्होंने उससे कहा कि उसने जहां पोटली रखी थी, वहीं से उठा ले. राहगीर अपनी पोटली लेकर चला गया. इसके बाद एक डाकू ने फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ से पूछा कि आपने उस पोटली को वापस क्यों दे दिया? सारा धन तो उसी में था. इस पर उन्होंने जवाब दिया कि उस व्यक्ति ने मुझ पर विश्वास करके अपनी अमानत मुझे सौंपी थी, इसलिए मैं उसके साथ विश्वासघात भला कैसे कर सकता था.

इसी तरह एक और क़ाफ़िले को लूटने के बाद जब डाकू भोजन करने बैठे, तो एक राहगीर ने उनसे पूछा कि उनका सरदार कहां है? इस पर डाकुओं ने बताया कि वे दरिया किनारे नमाज़ पढ़ रहे हैं. राहगीर ने कहा कि क्या वे भोजन नहीं करते? एक डाकू ने जवाब दिया कि उनका रोज़ा (व्रत) है. राहगीर ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए फिर पूछा कि इन दिनों न तो रमज़ान हैं और न ही नमाज़ का वक़्त. डाकू ने बताया कि वे नफ़िल पढ़ रहे हैं. यह सुनकर राहगीर फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ के पास गया और पूछा कि अल्लाह की इबादत के साथ डकैती का क्या जोड़ है. उन्होंने राहगीर से पूछा कि क्या तूने क़ुरआन पढ़ा है? उसने हां में जवाब दिया, तो फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ ने यह आयत पढ़ी-
व आख़रूना आत-र-फ़ू बिज़ुनु बिहिम ख़-ल-तू अ-म-लन सालिहन
यानी दूसरों ने अपने गुनाहों का इक़रार करते हुए नेक कामों को उसके साथ गुडमुड कर दिया. वह राहगीर उनकी बात सुनकर ख़ामोश हो गया.

कहते हैं कि फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ एक महिला से प्रेम करते थे और लूट के माल का अपना हिस्सा उसी के पास भेज देते थे. वे अकसर उसके पास जाते थे. एक बार रात में कोई क़ाफ़िला आकर ठहरा और उसमें एक व्यक्ति इस आयत की तिलावत कर रहा था-
अलम यानी लिल्लज़ीन आमनू तख़ श-अ कुलबुहुम बिज़िक रिल्लाहि
यानी क्या ईमान वालों के लिए वह वक़्त नहीं आया कि उनका दिल अल्लाह के ज़िक्र से ख़ौफ़ज़दा हो जाए.

यह सुनकर फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ को बेहद दुख हुआ. उन्होंने अल्लाह से अपने गुनाहों के लिए माफ़ी मांगते हुए संकल्प लिया कि अब वे सारे बुरे काम छोड़कर मानवता की सेवा करेंगे. उन्होंने जिन लोगों को लूटा था, उनके पास जाकर क्षमा मांगी. उनकी सद्भावना को देखते हुए लोग उन्हें क्षमा कर देते थे. मगर एक यहूदी ने उन्हें क्षमा नहीं किया. उनके ज़्यादा आग्रह करने पर उसने शर्त रखी कि अगर वे वहां स्थित एक टीले को हटा दें, तो वह उन्हें क्षमा कर देगा. इस पर फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ ने टीले की मिट्टी को अपने सिर पर ढोना शुरू कर दिया. इसी दौरान एक भयंकर आंधी आई और टीले को उड़ाकर ले गई. इसके बाद उसने एक और शर्त रख दी कि अगर वे उसके सिरहाने रखी अशर्फ़ियों की थैली उठाकर उसे दे दें, तो वे उन्हें क्षमा कर देगा. उन्होंने ऐसा ही किया. यहूदी ने थैली खोली, तो वह हैरान रह गया. इसके बाद उसने यह शर्त रखी कि पहले मुझे मुसलमान कर लो, फिर माफ़ करूंगा और उन्होंने कलमा पढ़ाकर उसे मुसलमान कर लिया. इस्लाम क़ुबूल करने के बाद उसने बताया कि उसने तौरेत (धार्मिक ग्रंथ) में पढ़ा था कि जिसकी तौबा सच्ची होती है, उसके हाथ से मिट्टी भी सोना बन जाती है, लेकिन मुझे इस पर विश्वास नहीं था. इसलिए उसने थैली में मिट्टी भरकर रखी थी, जो उनका हाथ लगते ही सोना हो गई. मुझे यक़ीन हो गया कि आपका दीन सच्चा है.

फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ अपने अपराधों की सज़ा पाने के लिए ख़ुद बादशाह के दरबार में भी हाज़िर हुए और उससे दंड देने का आग्रह किया. मगर बादशाह ने उन्हें सज़ा देने की बजाय उनका आदर सत्कार किया.

एक बार की बात है कि फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ अपने बच्चे को गोद में लिए हुए प्यार कर रहे थे कि बच्चे ने सवाल किया कि क्या आप मुझे अपना महबूब समझते हैं. उन्होंने फ़रमाया कि बेशक. फिर बच्चे ने पूछा कि अल्लाह को भी महबूब समझते हैं. फिर एक दिल में दो चीज़ों की मुहब्बत कैसे जमा हो सकती है. यह सुनते ही बच्चे को गोद से उतार कर वे इबादत में मसरूफ़ हो गए. उनके बारे में मशहूर है कि उन्हें तीस साल तक किसी ने कभी हंसते हुए नहीं देखा, लेकिन जब उनके बेटे का इंतक़ाल हो गया, तो वे मुस्कराते रहे. जब लोगों ने इसकी वजह पूछी, तो उन्होंने फ़रमाया कि अल्लाह इसकी मौत से ख़ुश हुआ है, इसलिए मैं भी उसकी ख़ुशी में ख़ुश हूं.

फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ ने अपना सारा जीवन लोक कल्याण में व्यतीत किया. वे सत्संग कर लोगों को नेकी और सच्चाई के रास्ते पर चलने का उपदेश देते थे.  उनका जीवन मानवता से भटके लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है. आज दुनियाभर में जेहाद के नाम पर आतंक का माहौल है. जो लोग धर्म के नाम पर क़त्ले-आम कराते हैं, उन्हें फ़ुज़ैल-बिन-अयाज़ के जीवन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

हज़रत इब्राहिम-बिन-अदहम


फ़िरदौस ख़ान
प्रसिद्ध सूफ़ी संत इब्राहिम-बिन-अदहम पहले बलख़ के बादशाह थे. मगर सूफ़ियाना रंग उन पर इस तरह चढ़ा कि उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर फ़क़ीर की ज़िन्दगी अपना ली. बलख़ छोड़कर वे मक्का आ गए और वहीं लकड़ियां काटकर अपना गुज़ारा करने लगे. लकड़ियां बेचकर उन्हें जो कुछ मिलता उसका एक बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंदों को बांट देते. उनका जीवन त्याग और जन कल्याण की एक बेहतरीन मिसाल है.

जब वे बलख़ के बादशाह थे, तो एक दिन छत पर सोते वक़्त उन्हें आहट सुनाई दी. इस पर उनकी नींद खुल गई और उन्होंने पूछा कि कौन है? तभी जवाब मिला कि तेरा परिचित. उन्होंने पूछा कि वह यहां क्या कर रहा है, तो जवाब मिला कि वह ऊंट ढूंढ रहा है. उन्होंने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा कि छत पर ऊंट भला कैसे मिल सकता है? इस पर जवाब मिला कि जब तू बादशाह रहते हुए अल्लाह को पाने की कामना कर सकता है, तो फिर छत पर ऊंट भी मिल सकता है. उनका दिल अल्लाह की इबादत की तरफ़ लगाने वाले हज़रत ख़िज्र (देवदूत) थे. इसी तरह एक दिन जब इब्राहिम-बिन-अदहम अपने दरबार में बैठे थे, तो तभी हज़रत ख़िज्र वहां आए और इधर-उधर कुछ ढूंढने लगे. इस पर बादशाह ने पूछा कि वे क्या तलाश रह हैं? हज़रत ख़िज्र ने जवाब दिया कि मैं इस सराय में ठहरना चाहता हूं. उन्होंने बताया कि यह सराय नहीं, बल्कि उनका महल है. हज़रत ख़िज्र ने सवाल किया कि इससे पहले यहां कौन रहता था. उन्होंने बताया कि इससे पहले उनके पूर्वज यहां रहते थे. फिर हज़रत ख़िज्र ने कहा कि इस स्थान पर इतने लोग रहकर जा चुके हैं, तो यह सराय ही है. यह कहकर वे चले गए.

जब बादशाह को उनकी बात का मतलब समझ आया, तो वे जंगल में चले गए. वहां उनकी मुलाक़ात एक अल्लाह वाले बुज़ुर्ग से हुई, जिन्होंने उन्हें इस्मे- आज़म की तालीम दी. वे हमेशा अल्लाह की इबादत में मसरूफ़ रहते. इसी दौरान उनकी मुलाक़ात हज़रत ख़िज्र से हुई, जिन्होंने बताया कि वे बुज़ुर्ग उनके भाई इलियास हैं. इसके बाद उन्होंने हज़रत ख़िज्र से दीक्षा ली.

एक बार की बात है कि बादशाह शिकार के लिए जंगल में गए. जब उन्होंने हिरण का शिकार करने के लिए हथियार उठाया, तो वह बोल पड़ा और उनसे कहने लगा कि क्या अल्लाह ने उन्हें यह जीवन दूसरों को सताने के लिए ही दिया है? हिरण की बात सुनकर उन्हें अपनी ग़लती का अहसास हुआ और उन्होंने कभी किसी को भी कष्ट न पहुंचाने का वादा करते हुए मानवता की सेवा करने का संकल्प लिया. दरअसल, जड़ या बेज़ुबान चीज़ों का बोलना इंसान के ज़मीर की आवाज़ होती है, जो उसे किसी भी ग़लत काम को करने से रोकती है. जो व्यक्ति अपने ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका अनुसरण करता है, वे बुराई के रास्ते पर जाने से बच जाता है. मगर जो लोग ज़मीर की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं. वे मानवता को त्यागकर पशुवत प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जो बाद में समाज और स्वयं उनके लिए घातक सिद्ध होती है.

इब्राहिम-बिन-अदहम का राजपाट से मोह भंग हो गया था. वे अपनी पत्नी और दूधमुंहे बच्चे को छोड़कर जंगल की तरफ़ चले गए. वहां उन्होंने एक लकड़हारे को अपने शाही वस्त्र देकर उसके मामूली कपड़े ले लिए. इन्हीं कपड़ों को धारण कर वे आगे की यात्रा पर निकल पड़े. घूमते-घूमते वे नेशापुर पहुंच गए और वहां की एक गुफ़ा में अपना डेरा जमाया. इस गुफ़ा में उन्होंने नौ साल तक अल्लाह की इबादत की. इसी दौरान हफ़्ते में एक दिन वे जंगल से लकड़ियां काटते और उन्हें बाज़ार में बेचकर जो कुछ मिलता उसके कुछ हिस्से से रोटी ख़रीदते और बाक़ी हिस्सा ज़रूरतमंदों में बांट देते.

वे मुरीदों को हमेशा यह हिदायत करते थे कि कभी किसी औरत या कमसिन लड़के को नज़र भरकर नहीं देखना और हज के दौरान तो बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है, क्योंकि तवाफ़ में बहुत-सी औरतें और कमसिन लड़के भी शरीक होते हैं. एक बार तवाफ़ की हालत में एक लड़का सामने आ गया और न चाहते हुए भी उनकी निगाहें उस पर जम गईं. तवाफ़ के बाद मुरीदों ने कहा कि अल्लाह आप पर रहम करे, क्योंकि आपने हमें जिस चीज़ से रोकने की हिदायत की थी, आप ख़ुद उसमें शामिल हो गए. क्या आप इसकी वजह बयान कर सकते हैं?

उन्होंने फ़रमाया कि जब मैंने बल्ख़ छोड़ा था उस वक़्त मेरा बेटा छोटा बच्चा था और मुझे पूरा यक़ीन है कि यह वही बच्चा है. इसके बाद उनके एक मुरीद ने बच्चे को तलाश किया और उससे उसके वालिद के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि वह बलख़ के बादशाह इब्राहिम-बिन-अदहम का बेटा है, जो बरसों पहले सल्तनत छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए कहीं चले गए हैं. मुरीद ने उनके बेटे और बीवी को इब्राहिम-बिन-अदहम से मिलवाया. जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को गले से लगाया, तो उसकी मौत हो गई. जब मुरीद ने वजह पूछी, तो उन्होंने कहा कि उन्हें ग़ैब से आवाज़ आई थी कि तू हमसे दोस्ती का दावा करता है और फिर अपने बेटे से भी मुहब्बत जताता है. यह सुनकर उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह ! या तो बेटे की जान ले ले या फिर मुझे मौत दे दे. अल्लाह ने बेटे के हक़ में दुआ क़ुबूल की.

एक बार की बात है कि इब्राहिम-बिन-अदहम दजला नदी के किनारे बैठे अपनी गुदड़ी सील रहे थे. तभी किसी आदमी ने आकर उनसे पूछा की बलख़ की सल्तनत छोडक़र आपको क्या मिला? उन्होंने एक सुई दरिया में डाल दी और इशारा किया. तभी हज़ारों मछलियां मुंह में एक-एक सोने की सुई लेकर सामने आ गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें तो केवल अपनी ही सुई चाहिए. फिर एक छोटी मछली मुंह में सुई लेकर सामने आ गई. उन्होंने उस आदमी को बताया कि सल्तनत छोड़ने के बाद उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया कि इंसान को हक़ीक़त में किस चीज़ की ज़रूरत होती है.

एक बार उन्होंने पानी के लिए कुएं में डोल डाला, तो उसमें सोना भरकर आ गया. दोबारा डालने पर डोल चांदी से भरा हुआ मिला और तीसरी बार डाला, तो उसमें हीरे और जवाहारात भरे हुए थे. चौथी बार डोल कुएं में डालते वक़्त उन्होंने कहा कि उन्हें तो सिर्फ़ पानी ही चाहिए. इसके बाद डोल पानी से भरा हुआ मिला. उन्होंने उस आदमी को समझाया कि धन-दौलत और एश्वर्य नश्वर हैं. मनुष्य का जीवन इनके बिना भी गुज़र सकता है, लेकिन अल्लाह की इबादत और जन सेवा ही मनुष्य के हमेशा काम आती है. अल्लाह भी दूसरों के लिए जीने वाले लोगों को ही पसंद करता है. वे कहते थे कि अल्लाह पर हमेशा यक़ीन रखना चाहिए, क्योंकि वे कभी किसी को मायूस नहीं करता.
(हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत से)
तस्वीर गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

सजदा...


मेरे मौला
मेरा एक सजदा
तो ऐसा हो
जो तुझे पसंद आ जाए...
-फ़िरदौस ख़ान

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

मेरे मौला तू सबसे बड़ा है...

सब कहते हैं-
तू सबसे ताक़तवर है
मैं भी मानती हूं
कि तू सबसे ताक़तवर है
क्योंकि
तू जो चाहता है
वो कर सकता है
सबसे बढ़कर
तुझे ख़ुश रहने का हक़ हासिल है
तूने कायनात बनाई
अपनी ख़ुशी के लिए
तूने आदम, जिन्नात
और हैवानों को पैदा किया
अपनी ख़ुशी के लिए
तूने उन्हें छोटी-बड़ी ख़ुशियां दीं
अपनी ख़ुशी के लिए
तूने उनसे उनकी ख़ुशियां छीनी
अपनी ख़ुशी के लिए
तूने उन्हें मौत के हवाले किया
अपनी ख़ुशी के लिए
बेशक, मेरे मौला तू सबसे बड़ा है...
-फ़िरदौस ख़ान

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

हे अमर बलिदानी तुझे शत शत प्रणाम


फ़िरदौस ख़ान
हिंदुस्तान को फ़िरंगियों की ग़ुलामी से आज़ाद कराने के लिए इस धरती के सपूतों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी, लेकिन यह हमारे देश की बदक़िस्मती ही है कि राजनेताओं ने इस आज़ादी को केवल सत्ता हासिल करने का ज़रिया ही समझा. देश की अधिकांश आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है. एक तरफ़ मुट्ठी भर लोग गगनचुंबी इमारतों में बैठकर ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ लाखों लोग खुले आसमान के नीचे ज़िंदगी गुज़ारने के लिए मजबूर हैं. यह कैसी आज़ादी है, जहां जनता के साथ समान बर्ताव नहीं किया जाता है. महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद समाजवादी शासन व्यवस्था के घोर समर्थक थे. उनके प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके सपने को साकार करें. राजकमल प्रकाशन ने चन्द्रशेखर आज़ाद नामक एक किताब प्रकाशित की है. यह किताब चंद्रशेखर आज़ाद के विश्‍वसनीय साथी विश्‍वनाथ वैशम्पायन की किताब अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद पर आधारित है. किताब के लेखक मलवेन्दर जीत सिंह व़ढैच और राजवन्ती मान ने चंद्रशेखर के जीवन वृतांत के साथ उनके युग की महान गाथा को बहुत ही करीने से पेश किया है. बेशक, चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है.

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में हुआ था. उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के गांव बदर के रहने वाले थे. आज़ाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल के वक्त अपना पैतृक गांव छोड़कर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में बस गए, जो अब झाबुआ ज़िले में आता है. यहीं चंद्रशेखर का बचपन बीता. बड़ा होने पर वे माता-पिता को छोड़कर बनारस चले गए, जहां उनके फूफा पंडित शिवविनायक मिश्र रहते थे. उन्हीं की मदद से उन्होंने संस्कृत विद्यापीठ में दाख़िला ले लिया और संस्कृत का अध्ययन करने लगे. उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी. विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना देते थे. चंद्रशेखर इससे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने का प्रण लिया. दरअसल, 1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने उनको उद्वेलित कर दिया था. इसलिए वे असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत करने लगे. एक दिन वे धरना देते हुए पकड़े गए. उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट की अदालत में पेश किया गया. उन्होंने चंद्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया-
तुम्हारा नाम क्या है?
मेरा नाम आज़ाद है.
तुम्हारे पिता का क्या नाम है?
मेरे पिता का नाम स्वाधीन है.
तुम्हारा घर कहां पर है?
मेरा घर जेलख़ाना है.
मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए. उन्होंने चंद्रशेखर को पंद्रह बेंतों की सज़ा सुना दी. जल्लाद ने चंद्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए. हर बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी. पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था. वह हर बेंत के साथ महात्मा गांधी की जय या भारत माता की जय बोलते जाते थे. जब पूरे बेंत लगाए जा चुके, तो जेल के  नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने रख दिए. बालक चंद्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल से बाहर आ गए. इस पर बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. अब वे चंद्रशेखर आज़ाद कहलाने लगे. देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसका ज़िक्र करते हुए लिखा है-ऐसे ही क़ायदे (क़ानून) तोड़ने के लिए एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सज़ा दी गई. उसे नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया. जैसे-जैसे बेंत उस पर प़डते थे और उसकी चम़डी उधे़ड डालते थे, वह भारत माता की जय! चिल्लाता था. हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया. बाद में वही ल़डका उत्तर भारत के आतंककारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना.

ग़ौरतलब है कि 1922 में महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन बंद कर देने से चंद्रशेखर की विचारधारा में बदलाव आया और वे अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रांति के समर्थक बन गए. दरअसल, उस वक्त बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ था. चंद्रशेखर आज़ाद मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए. क्रांतिकारियों का वह दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से जाना जाता था. इस संगठन के ज़रिए उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल की अगुवाई में पहले 9 अगस्त, 1925 को काकोरी कांड किया और फ़रार हो गए. इसके बाद 1927 में बिस्मिल के चार प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का गठन किया. उन्होंने भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉन्डर्स का क़त्ल करके लिया. इसके बाद उन्होंने दिल्ली पहुंच कर असेंबली बम कांड को अंजाम दिया. वे 27 फ़रवरी, 1931 को अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार-विमर्श कर रहे थे. मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक नाटबाबर ने आज़ाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया. इस दौरान पुलिस और चंद्रशेखर के बीच गोलीबारी हुई, जिससे उनकी मौत हो गई. कहा जाता है कि चंद्रशेखर ज़िंदा गिरफ्तार नहीं होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ख़ुद पर गोली चलाकर अपनी जान ले ली. वे आज़ाद जिए और आख़िर तक पुलिस के हाथ न आए. उनकी शहादत पर महात्मा गांधी ने कहा था, चंद्रशेखर की मृत्यु से मैं आहत हूं. ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं. आज़ाद भारत के सपने का ज़िक्र करते हुए वे अक्सर झूम झूमकर गाते थे-
जेहि दिन होईहैं सुरजवा
अरहर के दलिया, धान के भतुआ 
खूब कचरके खैबेना 
अरे जेहि दिन होई हैं सुरजवा 

मगर देश की आज़ादी को वे अपनी आंखों से नहीं देख पाए. हालांकि चंद्रशेखर आज़ाद के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर असंख्य युवाओं ने क्रांति के मार्ग पर क़दम बढ़ाए. बहरहाल, 235 पृष्ठों की यह किताब महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद पर आधारित एक बेहतरीन दस्तावेज़ है, जिससे हमें उस वक्त की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की भी सटीक जानकारी मिलती है. यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि समकालीन संदर्भों में यह किताब अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. किताब की भाषा सरल है. इसमें चित्रों को भी शामिल किया गया है, जिससे इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है. अलबत्ता, देश की आज़ादी के लिए भारतीय क्रांतिकारियों के त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता है-
ज़ालिम फलक ने लाख मिटाने की फ़िक्र की
हर दिल में अक्स रह गया, तस्वीर रह गई
हे अमर बलिदानी तुझे शत शत प्रणाम. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : चंद्रशेखर आज़ाद
लेखक : मलवेन्दर जीत सिंह वढ़ैच, राजवन्ती मान 
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

उम्मीद


फ़िरदौस खान
अमूमन ’उम्मीद’ को लेकर ’गिलास’ की मिसाल दी जाती है, जो आधा पानी से भरा हुआ या आधा ख़ाली है... कहा जाता है कि आशावादी कहेगा कि गिलास आधा भरा हुआ है... और निराशावादी कहेगा कि गिलास आधा ख़ाली है...
अगर गिलास सचमुच पूरा ही ख़ाली हो, तो...?
तो भी आशावादी रहो और शुक्र करो कि कम से कम गिलास तो है...
अगर गिलास न हो, तो...?
तो भी आशावादी रहो और शुक्र करो कि अगर गिलास गुम हो जाता या चोरी हो जाता तो...
कम से कम गिलास के खोने के दुख से तो बच गए...

तस्वीर गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

खाने में नख़रे


हम खाना खाते वक़्त हज़ार नख़रे करते हैं... हमें ये सब्ज़ी पसंद नहीं, हमें वो सब्ज़ी पसंद नहीं... दूध पीने के मामले में भी सौ नख़रे... मां से कितनी ही मिन्नतें करवाने के बाद दूध पीते हैं...  अमूमन हर आम घर की ये कहानी है...
लेकिन हम ये नहीं जानते कि इस दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें न तो पेट भरने के लिए रोटी मिलती है और न ही पीने के लिए साफ़ पानी... करोड़ों लोग हर रोज़ भूखे पेट सोते हैं... दुनिया भर में लोग भूख से मर रहे हैं...
लाखों बच्चों को दूध तो क्या, पीने के लिए पेटभर उबले चावल का पानी तक नसीब नहीं होता... और भूख से बेहाल बच्चे दम तोड़ देते हैं...
अल्लाह ने जो दिया है, उसका शुक्र अदा करके उसे ख़ुशी-ख़ुशी खा लेना चाहिए... क्या हुआ अगर एक दिन घर में हमारी पसंद की सब्ज़ी नहीं बनी है तो...
तस्वीर गूगल से साभार

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

ख़ाक से उन्सियत


धूल भरी आंधियों वाला मई-जून का मौसम कब का गुज़र चुका है... ये रिमझिम बारिश की फुहारों का मौसम है... लेकिन ये दिल है कि अब भी उसी आंधियों के ख़ाक-धूल वाले मौसम में जाकर ठहर जाता है... क्यूं इतनी उन्सियत है इसे, गर्द भरे मौसम से... शायद इसलिए कि इंसान का वजूद ही ख़ाक से बना है और एक रोज़ इसे ख़ाक में ही मिल जाना है... और सबसे बढ़कर ज़िन्दगी भी तो ख़ाक हो चुकी है... फिर क्यूं न इसे ख़ाक से उन्सियत हो...
(Firdaus Diary)

तस्वीर गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS