तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...


मेरे महबूब !
अज़ल से अबद तक
ऐसा ही होता आया है
और
ऐसा ही होता रहेगा
मुहब्बत के नसीब में
हिज्र के दिन हैं
और
हिज्र की ही रातें हैं...

जान !
मैं नहीं जानती
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा
भी है या नहीं...

मैं सिर्फ़ ये जानती हूं
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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किसी का चले जाना

ज़िन्दगी में कितने लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें हम जानते हैं, लेकिन उनसे कोई राब्ता नहीं रहता... अचानक एक अरसे बाद पता चलता है कि अब वह शख़्स इस दुनिया में नहीं रहा, तो होश फ़ाख़्ता हो जाते हैं... हमें एक ऐसे ही शख़्स के बारे में पता चला, जो अब इस दुनिया में नहीं है... फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल तलाशी...  बहुत पुरानी एक पोस्ट नज़र आई... हमने उस शख़्स को फ़्रेंड रिक्वेस्ट भेजी, फ़ॊलो किया, मैसेज किया,  कमेंट लिखा, ये जानते हुए कि फ़्रेंड रिक्वेस एक्सेप्ट करने के लिए अब वह इस दुनिया में नहीं है... न ही हमें हमारे मैसेज का जवाब मिलेगा और न ही वह कमेंट को लाइक कर सकता है और न ही जवाब दे सकता है...
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हिज्र का मौसम

मेरे महबूब !
ये हिज्र का मौसम है
और
इस हिज्र के मौसम में
दिन और रात
तवील हो जाते हैं
बिल्कुल रोज़े-मेहशर की तरह...

कब सुबह होती है
कब दोपहर ढलती है
कब शाम घिर आती है
और कब रात दहक उठती है

इस ठहरे हुए इक पल में
सदियां गुज़र जाती है
क्योंकि
ये हिज्र का मौसम है...
-फ़िरदौस ख़ान
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एक क़बूतर, जिसे हम कभी भूल नहीं पाएंगे...

जो चीज़ें हमें ख़ुशी देती हैं, दुख भी अकसर उन्हीं से मिला करता है... किसी से लगाव होना एक इंसानी फ़ितरत है, एक अहसास है... लगाव जहां ख़ुशी देता है, वहीं आंखें भी नम कर देता है...

हाल ही की बात है... हमने खिड़की खोली तो, सामने वाले घर की खिड़की के नीचे एक क़बूतर लटका हुआ था... उसकी गर्दन में मांझा फंसा हुआ था... यौमे-आज़ादी के दिन दिन भर ख़ूब पतंगें उड़ाई गईं... किसी कटी पतंग का मांझा क़बूतर की गर्दन में फंस गया... जिससे उसकी मौत हो गई...

हमारी निगाहें आज इसी क़बूतर को तलाश रही थीं... लेकिन हमें ये नहीं पता था कि वह मर चुका है... दरअसल, इस क़बूतर की गर्दन पर एक निशान था... हम जब भी दाना डालने जाते, वह सबसे पहले आ जाता... अगर दाना ख़त्म हो जाता, और उसके भूख लग रही होती, तो अंगनाई में हमारा सामने टहलने लगता... उसे देखकर हम समझ जाते कि उसे भूख लगी है...

कुछ दिन पहले की बात है... बहुत तेज़ बारिश हुई थी... सारा दाना बारिश के पानी में बह गया... हम अंगनाई धो रहे थे... वह कबूतर हमारे सामने आकर मुंडेर पर बैठ गया... हमने उनसे कहा कि क़बूतर को दाना डाल दो... उन्होंने कहा कि तुम ही दाना डालो... हमने कहा कि हम अंगनाई धो रहे हैं, आप ही दाना डाल दो... उन्होंने दाना डाला, लेकिन क़बूतर दूर बैठा देखता रहा, दाने के पास नहीं आया... उन्होंने कहा, "मैंने पहले ही कहा था कि तुम दाना डालो. देखा क़बूतर नहीं आया न... वो तुम्हारे डाले हुए दाने ही खाएगा"...

जैसे ही हम दाना डालने के लिए गए, हमें देखते ही क़बूतर नीच आ गया... और दाना चुगने लगा... उसकी देखादेखी और क़बूतर भी आ गए...

सच ! परिन्दों को भी कितनी पहचान होती है अपने-पराये की...  न जाने क्यों उसका अक्स हमारी नज़रों के सामने से हट ही नहीं पा रहा है... इस क़बूतर को हम कभी नहीं भूल पाएंगे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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सजदा...

मेरे महबूब !
दुनिया
इसे शिर्क कहे
या
गुनाहे-कबीरा
मगर
ये हक़ीक़त है
दिल ने
एक सजदा
तुम्हें भी किया है
और तभी से
मेरी रूह सजदे में है...
-फ़िरदौस ख़ान
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इल्मे-सीना

इल्मे-सीना इल्मे-सीना के बारे में बहुत कम लोग जानना चाहते हैं... दरअसल, इल्मे-सीना आपको किताबों में नहीं मिलता... इसे समझना पड़ता है... और इसे समझने के लिए एक रौशन ज़ेहन और वसीह दिल चाहिए...
जिस तरह पानी को साफ़ रखने के लिए साफ़ बर्तन की ज़रूरत होती है, उसी तरह इल्मे-सीना के लिए भी दिल का साफ़ होना बेहद ज़रूरी है... इसके लिए एक ऐसा दिल चाहिए, जो ख़ुदग़र्ज़ न हो, कमज़र्फ़ न हो... इतनी समझ चाहिए कि इंसान समझ सके कि क्या सही है और क्या ग़लत है... दूसरों में ऐब तलाशने की बजाय ख़ुद के अंदर झांकना होगा... और ये जानना होगा कि कहीं हमारे चेहरे पर ही तो गर्द नहीं जमी है, और हम सारा क़ुसूर आइने को दे रहे हैं... इसके लिए ऊंच-नीच, जात-पांत और किसी भी तरह के भेदभाव से ऊपर उठना होगा... यह भी याद रखना होगा कि ख़ुदा की मख़लूक से नफ़रत करके ख़ुदा को नहीं पाया जा सकता...
कबीर चचा कह गए हैं-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय...
यक़ीन करें, जिसने प्रेम के ढाई आखर पढ़ लिए और समझ लिए, उसका बेड़ा पार हो गया...
(Firdaus Diary)

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परिजात के फूल...


काफ़ी अरसे पहले की बात है... हम अपने कमरे में बैठे थे, तभी हमारी आ गईं और कहने लगीं आज मन्दिर चलते हैं. हमने कहा क्या बात है, आज कोई ख़ास दिन है. वे कहने लगीं कि मन्दिर के पास मेला जैसा माहौल होता है. मन्दिर भी हो आएंगे और कुछ चूड़ियां और मोती की मालाएं भी ले आएंगे. हमें कांच की चूड़ियों और मोती की मालों का बचपन से ही शौक़ रहा है. हमने अम्मी से पूछा, तो वो कहने लगीं. ठीक है, साथ में सुशीला को भी लेती जाना. सुशीला आंटी हमारी हमसाई थीं.

हम मन्दिर गए. मन्दिर के पास पूरी हाट लगी थी. लोग ख़रीदारी कर रहे थे.. हमारी सहेलियां भी ख़रीदारी में लग गईं. सोचा जब तक सहेलियां ख़रीदारी कर रही हैं, तब तक मन्दिर की वाटिका ही देख ली जाए. वाटिका बहुत सुन्दर थी. त्रिवेणी के अलावा फूलों के कई पेड़ थे. उनमें परिजात का पेड़ भी था. पूरा पेड़ सफ़ेद फूलों से भरा हुआ था. हमने कहीं सुना था कि परिजात का पेड़ स्वर्ग का वृक्ष है और यह देवताओं को बहुत प्रिय है. रुक्मणि को परिजात के फूल बहुत पसंद थे, इसलिए श्रीकृष्ण परिजात को धरती पर ले आए थे. हम मन ही मन में रुक्मणि का शुक्रिया अदा करने लगे,  क्योंकि शायद रुक्मणि की वजह से ही आज हम इस पेड़ के इतने क़रीब थे.

पेड़ के पास बहुत से फूल बिखरे पड़े थे. हम ज़मीन पर बैठकर फूल चुनने लगे, तभी मन्दिर के पुजारी, वहां आ गए और कहने लगे कि ज़मीन से फूल क्यों चुन रही हो. इस पेड़ से जितने चाहो फूल तोड़ सकती हो. हमने पंडित जी का शुक्रिया अदा किया और परिजात के फूल तोड़कर अपने दुपट्टे में इकट्ठे करने लगे. हमने एक अंजुली फूल इकट्ठे कर लिए. तब तक हमारी सहेलियां और आंटी भी वहां आ गईं. फिर हम मन्दिर के अंदर दाख़िल हुए. वहां छोटे-छोटे मन्दिर बने थे. किसी में राम और सीता की मूर्ति थी, किसी में हनुमान जी की मूर्ति थी, किसी में देवी संतोषी की, तो किसी में किसी और देवता की मूर्ति सजी थी. आंटी ने सभी मन्दिरों में घंटी बजाकर माथा टेका. हमारी सहेलियां भी ऐसा ही कर रही थीं. हम भी सबके साथ-साथ चल रहे थे.

आख़िर में एक और मन्दिर आया, जिसमें श्रीकृष्ण की मनोहारी प्रतिमा थी. पीला लिबास धारण किए हुए. हाथ में बांसुरी और होंठों पर मोहक मुस्कान. हम सोचने लगे. श्रीकृष्ण के इसी रूप पर फ़िदा होकर रसखान से लेकर अमीर ख़ुसरो तक कितने ही सूफ़ी-संतों ने श्रीकृष्ण पर गीत रच डाले हैं. हम फ़ौरन प्रतिमा की तरफ़ बढ़े और हमारे हाथ में जितने परिजात के फूल थे, सभी श्रीकृष्ण के क़दमों में रख दिए.

तभी पंडित जी बोल पड़े- ऐसा लगता है, जैसे श्रीकृष्ण की राधा ने ही पुष्प भेंट किए हों. आंटी और हमारी सहेलियों ने पंडित जी की हां में हां मिलाई. हमने प्रसाद लिया और घर आ गए.

परिजात के फूल चुनने से लेकर श्रीकृष्ण के क़दमों में रखने तक हमने जो लम्हे जिए और वो हमारी इक उम्र का सरमाया हैं. आज भी जब परिजात के फूल देखते हैं, तो दिल को अजीब-सा सुकून महसूस होता है. हम नहीं जानते कि श्रीकृष्ण और परिजात के फूलों से हमारा कौन-सा रिश्ता है.
-फ़िरदौस ख़ान
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दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...


एक सवाल अकसर पूछा जाता है, दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
अमूमन लोग इसका जवाब भी जानते हैं... कई बार हम जानते हैं, और समझते भी हैं, लेकिन अपने ख़्यालात को, अपने अहसासात को बयान करने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं मिल पाते... सोचा, आज इसी पर लिखा जाए...
दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में है, यानी वो चाहे, तो फ़ौरन आपका काम कर सकता है...
इसके बावजूद वो आपका काम नहीं करता... बहाने बनाता है...
तो ये हुआ जान-पहचान वाला... अगर दोस्त होता, तो अपना काम छोड़कर आपका काम करता...
फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में नहीं है, यानी वो चाहने पर भी आपका काम नहीं कर सकता है...
वो आपका काम करने की कोशिश करता है...
ये आपका दोस्त है... क्योंकि उसने आपके लिए कोशिश तो की...
बाज़ दफ़ा ऐसा भी होता है कि दोस्त आपके वक़्त पर काम नहीं आते और जान-पहचान वाले काम आ जाते हैं... अपवाद तो हर जगह ही हुआ करते हैं... हैं न...?
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ये बारिश है...

मेरे महबूब !
ये बारिश है
या
तुम्हारी मुहब्बत
जिसने
मेरी रूह तक को भिगो डाला...
-फ़िरदौस ख़ान

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दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है

एक सवाल अकसर पूछा जाता है, दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
अमूमन लोग इसका जवाब भी जानते हैं... कई बार हम जानते हैं, और समझते भी हैं, लेकिन अपने ख़्यालात को, अपने अहसासात को बयान करने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं मिल पाते... सोचा, आज इसी पर लिखा जाए...
दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में है, यानी वो चाहे, तो फ़ौरन आपका काम कर सकता है...
इसके बावजूद वो आपका काम नहीं करता... बहाने बनाता है...
तो ये हुआ जान-पहचान वाला... अगर दोस्त होता, तो अपना काम छोड़कर आपका काम करता...

फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में नहीं है, यानी वो चाहने पर भी आपका काम नहीं कर सकता है...
वो आपका काम करने की कोशिश करता है...
ये आपका दोस्त है... क्योंकि उसने आपके लिए कोशिश तो की...

बाज़ दफ़ा ऐसा भी होता है कि दोस्त आपके वक़्त पर काम नहीं आते और जान-पहचान वाले काम आ जाते हैं... अपवाद तो हर जगह ही हुआ करते हैं... हैं न...?

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दोस्तियां...


फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग सिर्फ़ सोशल साइट्स तक ही महदूद हुआ करते हैं, सोशल साइट्स पर आए, तो दुआ-सलाम हो गया, वरना तुम अपने घर और हम अपने घर... कुछ लोग कारोबार यानी दफ़्तर तक की महदूद होते हैं... आमना-सामना हुआ, तो हाय-हैलो हो गई... कुछ लोग सोशल फ़ील्ड तक ही महदूद  रहा करते हैं...

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो मेहमानों की तरह घर पर भी आ जाते है, और मेहमान नवाज़ी के बाद रुख़्सत हो जाते हैं... इन सबके बीच कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो हमारे बावर्चीख़ाने तक आते हैं... यक़ीन मानिये, जो दोस्तियां या रिश्ते घर के बावर्चीख़ाने तक पहुंच जाते हैं... वो ताउम्र के हो जाते हैं...

हमारी बचपन से एक आदत रही है...  स्कूल से कॊलेज और कॊलेज से दफ़्तर तक जिन लोगों से हमारी आशनाई रही है, उनसे हमने घर तक का रिश्ता रखा... यानी हमारे घरवाले उन सभी लोगों को जानते हैं, और उन लोगों के घरवाले भी हमसे वाक़िफ़ हैं... ये हमने अपने परिवार से ही सीखा... पापा के दोस्तों के घरवाले और हमारी अम्मी की सहेलियों के घरवालों का हमारे घर आना-जाना रहता था... हमने भी ऐसा ही किया... त्यौहारों पर अपनी सहेलियों/ अपने दफ़्तर के सहकर्मियों को घर पर बुलाना... उनके घर जाना... इस तरह सब हमारे पारिवारिक दोस्त होकर रहे... फ़ेसबुक पर ऐसे कई लोग हैं, जो हमारे पारिवारिक मित्र हैं... अगर हमारा फ़ोन ना मिले, तो वे हमारे घर के नंबर पर फ़ोन कर लेते हैं... फ़ेसबुक पर एक ऐसे पारिवारिक मित्र भी हैं, जिन्हें हम अपनी दूसरी मां कहते हैं... क्योंकि वो हमारी इतनी ही फ़िक्र करते हैं, जितनी कोई मां अपने बच्चे की करती है...

कई साल पहली की बात है... हमारे एक आशनाई अपनी बहन के साथ घर आए... हमारी तबीयत ठीक नहीं थी... वह बोले कि भूख लग रही है... हमने कहा कि आज हमने खाना नहीं पकाया... आप शिबली से पकवा लें... कहने लगे कि अब हंस कर पकाओ या रोकर, पर खाना तुम्हारे हाथ का ही खाऊंगा... इसलिए उठो, और कुछ पका लो...
हमने मन न होते हुए भी बिरयानी पकाकर दी... उनकी बहन भी कम नहीं थी... छुट्टी के दिन आ जाती और कहती कि आज कुछ नई चीज़ खाने का मन है... चलो, कुछ पकाकर खिलाओ... हम नये-नये पकवान बनाते... कभी कोई मुग़लई पकवान बनाते, तो कभी दक्षिणी भारयीय व्यंजन... वह खाकर कहती, किसी होटल में शेफ़ थी क्या... :) हम मूवी देखते... कॊल्ड ड्रिंक्स पीते... बहुत अच्छा वक़्त बीतता...
जिस दिन उनकी अम्मी बिरयानी बनातीं, अल सुबह ही हमारे पास कॊल आ जाती कि शाम को घर पर बिरयानी पक रही है... इसलिए दफ़्तर से सीधा घर आ जाना... और दिन भर न जाने कितनी कॊल्स आतीं...

हमने घर तक का रिश्ता रखा, इसलिए स्कूल के दिनों तक की दोस्तियां आज भी क़ायम हैं... रिश्तों में उतनी ही शिद्दत और ताज़गी है, जितनी शुरू में हुआ करती है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं


हमारे दोस्तों में अमूमन सभी तरह के लोग हैं... आस्तिक हैं, नास्तिक भी हैं... ईसाई भी हैं, मुस्लिम भी हैं, हिन्दू भी हैं, सिख भी हैं...
संघी भी हैं, जमाती भी हैं. कम्युनिस्ट भी हैं, कांग्रेसी भी हैं, समाजवादी भी हैं...
शाकाहारी भी हैं, मांसाहारी भी हैं... ऐसे लोग भी हैं, जो शराब तो क्या सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते. ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें शाराब न मिले, तो नींद नहीं आती...
सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे दोस्तों में ऐसा कोई नहीं है, जो जबरन सामने वाले से अपनी बात मनवाने की कोशिश करे, और उसकी बात न मानने पर दोस्ती ख़त्म कर दे...
हमारे आपस में मतभेद हो सकते हैं, हुए भी हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं हुआ... यही सबसे ख़ुशनुमा बात है... हमें अपने दोस्तों पर नाज़ है... अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं... हैं न...

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दुआ, उन्हें दें


सबसे प्यारी दुआ वो हुआ करती है, जो महबूब के लिए की जाए...महबूब को दी जाए...
जब कोई हमें लंबी उम्र की दुआ देता है, तो दिल चाहता है कि उससे कह दें-
हमारे मोहसिन ! हमारे अज़ीज़ !
हमें लंबी उम्र की दुआ मत दो, क्योंकि हमारे होने या न होने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा... फ़र्क़ पड़ेगा, तो सिर्फ़ हमारे घरवालों और कुछ अपनों को...
लंबी उम्र की दुआ देनी है, तो उसे दो, जिसके होने न होने से एक दुनिया को बहुत फ़र्क़ पड़ता है... बहुतों की उम्मीदें उससे वाबस्ता हैं...
कुछ लोगों को ख़ुदा ने इतनी ताक़त बख़्शी है कि वे करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं...

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बारिश...

मेरे महबूब !
ये बारिश का मौसम
ये मिट्टी की सौंधी महक
ये रिमझिम बूंदों का रक़्स
ये बौछारें, ये फुहारें
ये बारिश में भीगना
कितना अच्छा लगता है...
मानो
हिज्र का मौसम बीत गया है...
-फ़िरदौस ख़ान

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मुहब्बत के रंग

आज फ़िज़ा में मुहब्बत के रंग बिखरे हैं... दिल ख़ुशी से झूम रहा है...नाच रहा है... ऐसे ही तो लम्हे हुआ करते हैं, जब बेख़ुदी में ख़ुदा को पा लेने की तमन्ना अंगड़ाइयां लेने लगती है...
अमीर ख़ुसरो साहब का कलाम याद आ गया-
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब-ए-इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे...
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ज़ियारत-गाह

मेरे महबूब !
हर वो मुल्क
हर वो शहर
हर वो जगह
मेरे लिए ज़ियारत-गाह है
जहां तुमने क़दम रखे
क्योंकि
उस ज़मीन का
हर ज़र्रा
मेरे लिए क़ाबिले-एहतराम है...
-फ़िरदौस ख़ान

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क़ातिल उधर भी हैं, क़ातिल इधर भी हैं...

ये देखकर बहुत दुख होता है कि धर्म के नाम पर, मज़हब के नाम पर आज बेगुनाहों का ख़ून बहाया जा रहा है... ऐसी ख़बरे देख-सुन कर तकलीफ़ होती है...

क़ातिल उधर भी हैं
क़ातिल इधर भी हैं...

वो धर्म के नाम पर
हत्या करते हैं
ये भी मज़हब के नाम पर
क़त्ल करते हैं
क़ातिल उधर भी हैं
क़ातिल इधर भी हैं...

उन्हें मानवता से
कोई सरोकार नहीं है
इन्हें भी इंसानियत से
कोई सरोकार नहीं है
क़ातिल उधर भी हैं
क़ातिल इधर भी हैं...

निर्दोषों का रक्त बहाकर
उनके मुख चमकते हैं
बेगुनाहों का ख़ून बहाकर
इनके चेहरे भी दमकते हैं
क़ातिल उधर भी हैं
क़ातिल इधर भी हैं...

मानवता के शव पर
वे अपना ध्यज लहराते हैं
इंसानियत की लाश पर
ये भी अपना परचम फहराते हैं...
क़ातिल उधर भी हैं
क़ातिल इधर भी हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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डायरी लिखनी चाहिए

हमें डायरी लिखने की आदत है... स्कूल के वक़्त से ही डायरी लिख रहे हैं... कुछ साल पहले अंतर्जाल पर भी बलॊग लिखना शुरू किया... शुरुआत हिंदी से की थी... बाद में उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में भी बलॊग लिखने लगे... डायरी लिखना ही नहीं, पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता है... अकसर अपनी पुरानी डायरियां पढ़ने बैठ जाते हैं... दरअसल, डायरी ज़िंदगी की एक किताब ही हुआ करती है, जिसके औराक़ (पन्नों) पर हमारी यादें दर्ज होती हैं... वो यादें, जो हमारे माज़ी का अहम हिस्सा हैं...

इन दिनों डायरी लेखन ख़ूब हो रहा है. डायरी, आत्मकथा का ही एक रूप है. फ़र्क़ बस ये है कि आत्मकथा में पूरी ज़िन्दगी का ज़िक्र होता है और ज़िन्दगी के ख़ास वाक़ियात ही इसमें शामिल किए जाते हैं, जबकि डायरी में रोज़मर्रा की उन सभी बातों को शामिल किया जाता है, जिससे लेखक मुतासिर होता है. डायरी में अपनी ज़ाती बातें होती हैं, समाज और देश-दुनिया से जुड़े क़िस्से हुआ करते है. डायरी लेखन जज़्बात से सराबोर होता है, क्योंकि इसे अमूमन रोज़ ही लिखा जाता है. इसलिए उससे जुड़ी तमाम बातें ज़ेहन में ताज़ा रहती हैं. डायरी लिखना अपने आप में ही बहुत ख़ूबसूरत अहसास है. डायरी एक बेहद क़रीबी दोस्त की तरह है, क्योंकि इंसान जो बातें किसी और से नहीं कह पाता, उसे डायरी में लिख लेता है. हमारे मुल्क में भी डायरी लेखन एक जानी-पहचानी विधा बन चुकी है. इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए साहित्य जगत ने भी इसे क़ुबूल कर लिया है. बलॊग ने आज इसे घर-घर पहुंचा दिया है. उन्होंने कहा कि डायरी का ज़िक्र तेरह साल की एनी फ्रेंक के बिना अधूरा है. नीदरलैंड पर नाज़ी क़ब्ज़े के दौरान दो साल उसके परिवार ने छिपकर ज़िन्दगी गुज़ारी. बाद में नाज़ियों ने उन्हें पकड़ लिया और शिविर में भेज दिया, जहां उसकी मां की मौत हो गई. बाद में टायफ़ाइड की वजह से ऐनी और उसकी बहन ने भी दम तोड़ दिया. इस दौरान एनी ने अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों को डायरी में लिखा था. जब रूसियों ने उस इलाक़े को आज़ाद करवाया, तब एनी की डायरी मिली. परिवार के ऑटो फ्रैंक ने ’द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल’ नाम से इसे शाया कराया.  दुनियाभर की अनेक भाषाओं इसका में अनुवाद हो चुका है. और ये दुनिया की सबसे ज़्यादा लोकप्रिय डायरी में शुमार की जाती है.
डायरी लिखनी चाहिए... डायरी में लिखी गईं ख़ूबसूरत बातें ताज़ा फूलों की तरह होती हैं... जो ख़ुशी देती हैं... हम बरसों से डायरी लिख रहे हैं...

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बेचैन रूहें...

बेचैन रूहें बार-बार इस दुनिया में आती हैं... यानी वो बार-बार जन्म लेती हैं... बेचैन रूहें अपनी अधूरी ज़िन्दगी को मुकम्मल करने, अपनी लाहासिल ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए बार जिस्मों का लिबास पहनती हैं... इन रूहों का ताल्लुक़ अपनी पिछली ज़िन्दगी से होता है... वही जगह, वही हालात, वही जज़्बात...



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Happy Birthday Dear Mom

इंसान की असल ज़िन्दगी वही हुआ करती है, जो वो इबादत में गुज़ारता है, मुहब्बत में गुज़ारता है, ख़िदमत-ए-ख़ल्क में गुज़ारता है...
बचपन से देखा, अम्मी आधी रात में उठ जातीं और फिर तहज्जुद की नमाज़ पढ़तीं... नमाज़ के बाद तिलावत करतीं... तस्बीह पढ़तीं... इसी तरह उन्हें सुबह हो जाती... हमने भी अपनी अम्मी की देखादेखी तहज्जुद पढ़नी शुरू की... जब तहज्जुद में नमाज़ के लिए ख़ड़े होते हैं, तो अम्मी का ख़्याल आ जाता है कि वो भी नमाज़ पढ़ रही होंगी... मां बच्चे के लिए पहला दर्स होती है, उस्ताद होती है... हमने भी अपनी अम्मी से ही उर्दू, हिन्दी, इंग्लिश सीखी... ज़िन्दगी के हर मुक़ाम पर अम्मी हमेशा साथ रहीं... इम्हितान होते, तो अम्मी इतनी फ़िक्र करतीं, मानो उनके इम्तिहान हों... जब नतीजा आता, तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं होता...

किसी भी इंसान की ज़िन्दगी में मां का जो मु़क़ाम होता है,  वो कभी किसी और का नहीं हो सकता... मां दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत औरत होती है... मां से अच्छा खाना कोई बना ही नहीं सकता... मां से ज़्यादा ख़्याल भी कोई नहीं रख सकता... हर बेटी की तरह हम भी हमेशा अपनी अम्मी जैसा ही बनना चाहते थे... अम्मी की हर बात अच्छी लगती...
आज अम्मी की सालगिरह है... अल्लाह हमारी अम्मी को, दुनिया की हर अम्मी को दोनों जहां की ख़ुशियां दे, आमीन...
Happy Birthday Dear Mom
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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ईद की रौनक़े

हर सिम्त ईद की रौनक़े हैं... ईद के ख़ूबसूरत जोड़े भी आ गए... ज़ेवर आ गए... हरी, नीली, पीली, लाल, गुलाबी, कत्थई, सतरंगी और भी बहुत से शोख़ रंगों की चूड़ियां भी आ गईं... न जाने कितने महीने इन्हें पहनेंगे... मेहंदी भी आ गई... ईद की कोई चीज़ नहीं, जो न आई हो... जो आई हैं, वो भी इफ़रात में... फिर भी न जाने क्यों दिल में एक ख़लिश सी है... एक ख़ामोशी का बहता दरिया है, जो न जाने कहां बहाकर ले जाना चाहता है...
पापा ! आपकी कमी बहुत खलती है... और वो भी तो क़रीब नहीं, जिनकी आंखों में मुहब्बत रहती है...
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हमारा लिखना सार्थक हुआ...

कई साल पहले की बात है. गर्मियों का मौसम था. सूरज आग बरसा रहा था. दोपहर के वक़्त कुछ पत्रकार साथी बैठे बातें कर रहे थे. बात झुलसती गरमी से शुरू हुई और सियासत पर पहुंच गई. टेलीविज़न चल रहा था. उस वक़्त कांग्रेस की हुकूमत थी. यानी केंद्र और दिल्ली राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. एक विपक्षी नेता भाषण दे रहा था. ये देखकर दुख हुआ कि वह कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहा था. हम ख़बरें देख रहे थे. ये देखकर दुख के साथ अफ़सोस भी हुआ कि एक पत्रकार साथी भी कांग्रेस नेता का मज़ाक़ उड़ाने लगे. शायद इसकी वजह यह थी कि वह भी उसी विचारधारा के थे, जिस विचारधारा का वह नेता था. जो अपने भाषण के ज़रिये अपने संस्कारों और तहज़ीब का प्रदर्शन कर रहा था.
मीटिंग ख़त्म हुई. लेकिन उस नेता के शब्द कानों में गूंज रहे थे. साथ ही पत्रकार का रवैया भी नागवार गुज़रा था. हम काफ़ी देर तक सोचते रहे. राहुल गांधी कांग्रेस के नेता हैं और एक ऐसे परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं, जिसने देश के लिए अनेक क़ुर्बानियां दी हैं. लेकिन यह देखकर दुख होता है कि अपने ही देश में राहुल गांधी को न जाने कैसे-कैसे नामों से ट्रोल किया जाता है. एक गिरोह ने उन्हें ’पप्पू’ और ’अमूल बेबी’ जैसे नाम देकर उनका मज़ाक़ उड़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी. यह राहुल गांधी की शिष्टता ही है, कि वे अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ ’जी’ लगाते हैं. जबकि उनके विरोधी भले ही वे देश के बड़े से बड़े पद पर हों, राहुल गांधी के लिए ऊल-जलूल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. यह देख और सुनकर बुरा लगता था.
तब ज़ेहन में आया कि क्यों न राहुल गांधी को कोई अच्छा-सा नाम दिया जाए. तब हमने फ़ेसबुक पर एक राहुल गांधी की एक तस्वीर पोस्ट किया और उसके कैप्शन में लिखा-
हिन्दुस्तान का शहज़ादा
हमने अपने बलॊग्स पर ’हिन्दुस्तान का शहज़ादा’ नाम से लिखना शुरू किया. फ़ेसबुक पर इस नाम से एक पेज भी बनाया. हमारे पास विपक्षी पार्टी के एक शख़्स का फ़ोन आया. उन्होंने इस बारे में हमसे बात की. उन्होंने कहा कि आगे चलकर तुम्हारा दिया उपनाम ’शह्ज़ादा’ मशहूर हो जाएगा. ठीक ऐसा ही हुआ भी. यह नाम चलन में आ गया. अब उनके विरोधी ’शहज़ादा’ लक़ब का इस्तेमाल करने लगे. यहां तक कि जो उन्हें ’पप्पू’ और ’अमूल बेबी’ कहा करते थे, वे लोग अब उन्हें शहज़ादा कहने लगे थे.
हमारा लिखना सार्थक हुआ...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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ईद तो हो चुकी

एक शनासा ने पूछा- ईद कब है?
हमने कहा- ईद तो हो चुकी...
उन्होंने हैरत से देखते हुए कहा- अभी तो रमज़ान चल रहे हैं...
हमने कहा- ओह... आप उस ईद की बात कर रहे हैं...
वह बोले- आप किस ईद की बात कर रही हैं ?
हमने जवाब दिया- उसी ईद की जो कुछ पहर पहले दबे पांव आई और चली गई... महबूब की सालगिरह से बढ़कर भी क्या कोई त्यौहार होता है...

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मेरे महबूब...


आज उनकी सालगिरह है, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं... इस मुबारक मौक़े पर उन्हें समर्पित एक नज़्म ’मेरे महबूब’ पेश-ख़िदमत है...
मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं…
-फ़िरदौस ख़ान


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अवाम की उम्मीद हैं राहुल गांधी

राहुल गांधी जी की सालगिरह 19 जून पर विशेष
फ़िरदौस ख़ान 
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक ऐसी शख़्सियत के मालिक हैं, जिनसे कोई भी मुतासिर हुए बिना नहीं रह सकता. उनके बारे में लिखना इतना आसान नहीं है. लिखने बैठें, तो लफ़्ज़ कम पड़ जाएंगे.  देश के प्रभावशाली राज घराने से होने के बावजूद उनमें ज़र्रा भर भी ग़ुरूर नहीं है.  उनकी भाषा में मिठास और मोहकता है, जो सभी को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है. वे विनम्र इतने हैं कि अपने विरोधियों के साथ भी सम्मान से पेश आते हैं, भले ही उनके विरोधी उनके लिए कितनी ही तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल क्यों न करते रहें. किसी भी हाल में वे अपनी तहज़ीब से पीछे नहीं हटते. उनके कट्टर विरोधी भी कहते हैं कि राहुल का विरोध करना उनकी पार्टी की नीति का एक अहम हिस्सा है, लेकिन ज़ाती तौर पर वे राहुल गांधी को बहुत पसंद करते हैं. वे ख़ुशमिज़ाज, ईमानदार, मेहनती और सकारात्मक सोच वाले हैं.  आज देश को उनके जैसे ही नेता की बेहद ज़रूरत है. वे मुल्क की अवाम की उम्मीद हैं. हिन्दुस्तान की उम्मीद हैं.

राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को दिल्ली में हुआ. वे देश के मशहूर गांधी-नेहरू परिवार से हैं. उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी हैं, जो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. राहुल गांधी कांग्रेस में उपाध्यक्ष हैं और लोकसभा में उत्तर प्रदेश में स्थित अमेठी चुनाव क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं. राहुल गांधी को साल 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली शानदार जीत का श्रेय दिया गया था. वे सरकार में कोई किरदार निभाने की बजाय पार्टी संगठन में काम करना पसंद करते हैं, इसलिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री का ओहदा लेने से साफ़ इंकार कर दिया था.

राहुल गांधी की शुरुआती तालीम दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में हुई. उन्होंने प्रसिद्ध दून विद्यालय में भी कुछ वक़्त तक पढ़ाई की, जहां उनके पिता ने भी पढ़ाई की थी. सुरक्षा कारणों की वजह से कुछ अरसे तक उन्हें घर पर ही पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ी. साल 1989 में उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में दाख़िला लिया. उनका यह दाख़िला पिस्टल शूटिंग में उनके हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे से हुआ. उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया. वे सुरक्षाकर्मियों के साथ कॉलेज आते थे. तक़रीबन सवा साल बाद 1990  में उन्होंने कॊलेज छोड़ दिया. उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि हासिल की. इसके बाद उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से  डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की.

राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक़ रहा है. उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला. उन्होंने बॊक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया. उनके बहुत से शौक़ उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं. अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नज़दीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी सीखी. उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था. उन्होंने भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीखा. वे अपनी सेहत का भी काफ़ी ख़्याल रखते हैं. कितनी ही मसरूफ़ियत क्यों न हो, वे कसरत के लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं. वे रोज़ दस किलोमीटर तक जॉगिंग करते हैं. उन्हें फ़ुटबॊल बहुत पसंद है. लंदन में पढ़ने के दौरान वह फ़ुटबॊल के दीवाने थे.

स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वे लंदन चले गए, जहां उन्होंने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ तीन साल तक काम किया. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफ़ेसर माइकल यूजीन पोर्टर को ब्रैंड स्ट्रैटजी का विद्वान माना जाता है. सुरक्षा कारणों की वजह से राहुल गांधी ने रॉल विंसी के नाम से काम किया. उनके सहयोगी नहीं जानते थे कि वे राजीव गांधी के बेटे और इंदिरा गांधी के पौत्र के साथ काम कर रहे हैं.  राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें वह ज़िन्दगी नहीं मिल पाई, जिसे कोई आम इंसान जीता है. वे अपनी ज़िन्दगी जीना चाहते थे, एक आम इंसान की ज़िन्दगी. राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम ज़िन्दगी जी सकूं."

विदेश में रहते राहुल गांधी को दस साल हो गए थे. वे स्वदेश लौटे और फिर साल 2002 के आख़िर में उन्होंने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फ़र्म, बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड बनाई. रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ में दर्ज आवेदन के मुताबिक़ इस कंपनी का मक़सद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह और सहायता मुहैया करना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना था. साल 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हल्फ़नामे के मुताबिक़ बेकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड में राहुल गांधी की हिस्सेदारी 83 फ़ीसद थी. उनकी पढ़ाई की तरह उनके कारोबार में भी काफ़ी दिक़्क़तें आईं. सियासत की वजह से वे अपने कारोबार पर ख़ास तवज्जो नहीं दे पाए.

राहुल गांधी की सियासी ज़िन्दगी की शुरुआत भी अचानक ही हुई. वे साल 2003 में कांग्रेस की बैठकों और सार्वजनिक समारोहों में नज़र आए. एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए एक सद्भावना यात्रा पर वह अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पाकिस्तान भी गए. इसके बाद जनवरी 2004 में उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, तो उनके सियासत में आने की चर्चा शुरू हो गई. इस बारे में पूछने पर उन्होंने सिर्फ़ इतना कहकर कोई भी प्रतिक्रिया देने से साफ़ इंकार कर दिया था, "मैं राजनीति के ख़िलाफ़ नहीं हूं. मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूंगा और वास्तव में, करूंगा भी या नहीं."

फिर मार्च 2004 में लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ, तो राहुल गांधी ने सियासत में आने का ऐलान कर दिया. उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा. इससे पहले उनके चाचा संजय गांधी ने भी इसी क्षेत्र का नेतृत्व किया था. उस वक़्त उनकी मां सोनिया गांधी यहां से सांसद थीं. तब मीडिया के साथ अपने पहले साक्षात्कार में राहुल गांधी ने देश को जोड़ने वाले शख़्स के तौर पर ख़ुद को पेश किया. उन्होंने कहा था कि वे जातीय और धार्मिक तनाव को कम करने की कोशिश करेंगे. इलाक़े की अवाम ने राहुल गांधी को भरपूर समर्थन दिया. उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंदी को एक लाख वोटों से हराकर शानदार जीत हासिल की. इस दौरान उन्होंने सरकार या पार्टी में कोई ओहदा नहीं लिया और अपना सारा ध्यान मुख्य निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही केंद्रित किया.

फिर जनवरी 2006 में आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुए कांग्रेस के एक सम्मेलन में पार्टी के हज़ारों सदस्यों ने राहुल गांधी से पार्टी में और महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका निभाने की ग़ुज़ारिश की. इस पर राहुल गांधी ने कहा, "मैं इसकी सराहना करता हूं और मैं आपके जज़्बात और समर्थन के लिए शुक्रगुज़ार हूं. .मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं आपको मायूस नहीं करूंगा, लेकिन अभी धैर्य रखें." यह कहकर उन्होंने नेतृत्व वाली कोई भी बड़ी भूमिका निभाने से मना कर दिया. राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में पार्टी सचिवालय के एक फेरबदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया था. उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई.  साल 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी को तीन लाख तैंतीस हज़ार से शिकस्त देकर जीत दर्ज की. इस चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 जीतीं. इस तरह राहुल गांधी ने प्रदेश में कांग्रेस को ज़िन्दा करने का काम किया और उन्हें इसका श्रेय दिया गया. उन्होंने डेढ़ महीने में देश भर में 125 रैलियों को संबोधित किया.
राहुल गांधी को 19  जनवरी 2013 में कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया. क़ाबिले-ग़ौर है कि इससे पहले कांग्रेस में उपाध्यक्ष का पद नहीं होता था. लेकिन पार्टी में उनका महत्व बढ़ाने और उन्हें सोनिया गांधी का सबसे ख़ास सहयोगी बनाने के लिए पार्टी ने उपाध्यक्ष के पद का सृजन किया.

राहुल गांधी अपनी जनसभाओं में जिस तरह सांप्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी व अन्य सियासी दलों को निशाना बनाते हैं, उससे सभी दलों के होश उड़ जाते हैं. वे उन पर सधे राजनीतिक अंदाज़ में हमले करते हैं. एक संजीदा वक्ता की तरह तार्किक ढंग से वे सियासी दलों को चुन-चुन कर व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब देते हैं. उनके इसी अंदाज़ से दलों में बौखलाहट पैदा हो जाती है. वे समझ नहीं पाते कि राहुल के ‘आम आदमी’ का कौन सा तोड़ निकालें.

राहुल गांधी भाजपा के झूठे वादों और लोकपाल पर उसके चरित्र की जमकर बखिया उधेड़ते हैं. वे भाजपा द्वारा भ्रष्टाचारी नेताओं से हाथ मिलाने पर लोगों से सवाल करते हैं, तो उन्हें भीड़ से खुलकर जवाब भी मिलते हैं. उन्हीं जवाबों को आगे बढ़ाते हुए मंच से राहुल गांधी लोगों को बताते हैं कि ग़रीबों का मसीहा बनने वाले नेता कहते हैं कि राहुल गांधी पागल हो गया है, और इसके बाद वह आक्रामक हो जाते हैं. अपनी आस्तीनें चढ़ाकर हमलावर अंदाज़ में कहते हैं- ‘‘हां, मैं ग़रीबों का दुख-दर्द देखकर, प्रदेश की दुर्दशा देखकर पागल हो गया हूं. कोई कहता है कि राहुल गांधी अभी बच्चा है, वह क्या जाने राजनीति क्या होती है. तो मेरा कहना है कि हां, मुझे उनकी तरह राजनीति करनी नहीं आती. मैं सच्चाई और साफ़ नीयत वाली राजनीति करना चाहता हूं. मुझे उनकी राजनीति सीखने का शौक़ भी नहीं है. मायावती कहती हैं राहुल नौटंकीबाज़ है. तो मेरा कहना है कि अगर ग़रीबों का हाल जानना, उनके दुख-दर्द को समझना, नाटक है तो राहुल गांधी यह नाटक ताउम्र करता रहेगा."

राहुल गांधी प्रदेश को बदहाली से निकालने के लिए युवाओं से साथ के लिए हाथ बढ़ाते हैं. इस दौरान राहुल गांधी यह बताना नहीं भूलते कि वे यहां चुनाव जीतने नहीं, प्रदेश को बदलने आए हैं. यह उनकी इस साफ़गोई का सियासी दलों के पास कोई जवाब नहीं होता. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राहुल गांधी की बातों में दम है.
यह हक़ीक़त है कि वे हवाई नेताओं की तरह आसमान में नहीं उड़ते और न ही किसी पंचतारा सेलिब्रिटी की तरह रथ पर चढ़कर ज़िलों का दौरा करते हैं. उन्होंने खाटी देसी अंदाज़ में गांवों में रात रात बिताई. पगडंडियों पर कीचड़ की परवाह किए बिना चले और आम आदमी से बेलाग संवाद स्थापित करने की कोशिश की. आम आदमी को नज़दीक से जानने-समझने और अपना हाथ उसके हाथ में देने की पहल की.

राहुल गांधी एक परिपक्व राजनेता हैं. इसके बावजूद उन्हें अमूल बेबी कहना उनके ख़िलाफ़ एक साज़िश का हिस्सा ही कहा जा सकता है. भूमि अधिग्रहण मामले को ही लीजिए. राहुल ने भूमि अधिग्रहण को लेकर जिस तरह पदयात्रा की, वह कोई परिपक्व राजनेता ही कर सकता है. हिंदुस्तान की सियासत में ऐसे बहुत कम नेता रहे हैं, जो सीधे जनता के बीच जाकर उनसे संवाद करते हैं. नब्बे की दहाई में बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम ने गांव-गांव जाकर पार्टी को मज़बूत करने का काम किया था, जिसका फल बसपा को सत्ता के रूप में मिला. चौधरी देवीलाल ने भी इसी तरह हरियाणा में आम जनता के बीच जाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. दक्षिण भारत में भी कई राजनेताओं ने पद यात्रा के ज़रिये जनता में अपनी पैठ बनाई और सत्ता हासिल की.

कुल मिलाकर राहुल गांधी ऐसे क़द्दावर नेताओं की फ़ेहरिस्त में शुमार हो चुके हैं, जिनके तूफ़ान से सियासी दलों के  हौसले  पस्त हो जाते हैं. हालत यह हो गई है कि कोई सियासी दल दाग़ी को लेता है, तो कोई दग़ाबाज़ी को सहारा बना लेता है. जब कोई चारा नहीं दिखता, तो कुछ सियासी दल राहुल पर व्यक्तिगत प्रहार करने में जुट जाते हैं.  मगर इससे राहुल गांधी को कोई नुक़सान नहीं होता, क्योंकि राजनीति की विरासत को संभालने वाला यह युवा नेता अब युवाओं, और अन्य वर्गों के साथ-साथ बुजुर्गों का भी चहेता बन चुका है. राहुल गांधी की जनसभाओं में दूर-दूर से आए बुज़ुर्ग यही कहते हैं कि लड़का ठीक ही तो कह रहा है, यही कुछ करेगा. महिलाओं में तो राहुल गांधी को लेकर काफ़ी क्रेज है. यह बात तो विरोधी दलों के नेता भी बेहिचक क़ुबूल  करते हैं. वे तो मज़ाक़ के लहजे में यहां तक कहते हैं कि अगर महिलाओं को किसी एक नेता को वोट देने को कहा जाए, तो सभी राहुल गांधी को ही देकर आएंगी. राहुल युवाओं ही नहीं, बल्कि बच्चों से भी घुलमिल जाते हैं. कभी किसी मदरसे में जाकर बच्चों से बात करते हैं, तो कभी किसी मैदान में खेल रहे बच्चों के साथ बातचीत शुरू कर देते हैं. यहां तक कि गांव-देहात में मिट्टी में खेल रहे बच्चों तक को गोद में उठाकर उसके साथ बच्चे बन जाते हैं. बच्चे उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं. उन्हें अपनी भांजी मिराया और भांजे रेहान के साथ वक़्त बिताना भी बहुत अच्छा लगता है. उनके अच्छे बर्ताव की वजह से ही बुज़ुर्ग उन्हें स्नेह करते हैं, उनके सर पर शफ़क़त का हाथ रखते हैं, उन्हें दुआएं देते हैं.  वे युवाओं के चहेते हैं. राहुल गांधी अपने विरोधियों का नाम भी सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नाम के साथ जी लगाते हैं.  सच है कि संस्कार विरासत में मिलते हैं, संस्कार घर से मिला करते हैं. अपने से बड़ों के लिए उनके दिल में सम्मान है, तो बच्चों के लिए प्यार-दुलार है.

जब भ्रष्टाचार और महंगाई के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र सरकार का चौतरफ़ा विरोध हो रहा था, ऐसे वक़्त में राहुल गांधी गांव-गांव जाकर जनमानस से एक भावनात्मक रिश्ता क़ायम कर रहे थे. वे लोगों से मिलने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. वे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोयडा के नज़दीकी गांव भट्टा-पारसौल गए. उन्होंने आसपास के गांवों का भी दौरा कर ग्रामीणों से बात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का आश्वासन भी दिया- इससे पहले भी वे सुबह मोटरसाइकिल से भट्टा-पारसौल गांव जा चुके हैं. उस वक़्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया था. इस बार भी वह गुपचुप तरीक़े से ही गांव गए थे. न तो प्रशासन को इसकी ख़बर थी और न ही मीडिया को इसकी भनक लगने दी गई. हालांकि उनके दौरे के बाद प्रशासन सक्रिय हो गया था. इसके बाद भी वे गांव लखीमपुर में पीड़ित परिवार के घर गए और उन्हें इंसाफ़ दिलाने का वादा किया. और चौकस प्रशासन को भनक तक नहीं लगी. ऐसे हैं राहुल गांधी.

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर राहुल गांधी द्वारा निकाली गई पदयात्रा से सियासी हलक़ों में चाहे जो प्रतिक्रिया हुई हो, लेकिन यह हक़ीक़त है कि राहुल गांधी ने ग्रेटर नोएडा के ग्रामीणों के साथ जो वक़्त बिताया, उसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे. इन लोगों के लिए यह किसी सौग़ात से कम नहीं था कि उन्हें कांग्रेस के युवराज के साथ वक़्त गुज़ारने का मौक़ा मिला. अपनी पदयात्रा के दौरान पसीने से बेहाल राहुल ने शाम होते ही गांव बांगर के किसान विजय पाल की खुली छत पर स्नान किया. फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने घर पर बनी रोटी, दाल और सब्ज़ी खाई. ग्रामीणों ने उन्हें पूड़ी-सब्ज़ी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. गांव में बिजली की क़िल्लत रहती है, इसलिए ग्रामीणों ने जेनरेटर का इंतज़ाम किया, लेकिन राहुल ने पंखा भी बंद करवा दिया. वे एक आम आदमी की तरह ही बांस और बांदों की चारपाई पर सोये. यह कोई पहला मौक़ा नहीं था जब राहुल गांधी इस तरह एक आम आदमी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. इससे पहले भी वे रोड शो कर चुके थे और उन्हें इस तरह के माहौल में रहने की आदत है. कभी वे किसी दलित के घर भोजन करते हैं, तो कभी किसी मज़दूर के  साथ ख़ुद ही परात उठाकर मिट्टी ढोने लगते हैं. राहुल गांधी के आम लोगों से मिलने-जुलने के इस जज़्बे ने उन्हें लोकप्रिय बनाया. राहुल जहां भी जाते हैं, उन्हें देखने के लिए, उनसे मिलने के लिए लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता है. हालत यह है कि लोगों से मिलने के लिए वह अपना सुरक्षा घेरा तक तोड़ देते हैं.

राहुल गांधी लोगों की मदद करने से कभी पीछे नहीं रहते. इस मामले में वह अपनी सुरक्षा की ज़रा भी परवाह नहीं करते. एक बार वह अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी से लौट रहे थे. रास्ते में उन्होंने एक ज़ख़्मी व्यक्ति को सड़क पर तड़पते देखा, तो क़ाफ़िला रुकवा लिया. उन्होंने एंबुलेंस बुलवाई और ज़ख़्मी व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया. उन्होंने विधायक और पार्टी प्रवक्ता को उसके इलाज की ज़िम्मेदारी सौंपी. इस दौरान सुरक्षा की परवाह किए बिना वह काफ़ी देर तक सड़क पर खड़े रहे.
राहुल गांधी जब पीड़ितों से मिलने सहारनपुर पहुंचे, तो वहां एक बच्चा भी था. उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठा लिया. उन्होंने बच्चों से प्यार से बातें कीं और फिर घटना के बारे में पूछा. इस पर बच्चे ने कहा कि अंकल हमारा घर जल गया है, बस्ता भी जल गया और सारी किताबें भी जल गईं. घर बनवा दो, नया बस्ता और किताबें दिलवा दो. इस पर राहुल गांधी ने एक स्थानीय कांग्रेस नेता को उस बच्चे का घर बनवाकर देने और नया बस्ता व किताबें दिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी. वे मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी पीड़ित किसानों से मिलने पहुंच गए. शासन-प्रशासन से उन्हें किसानों से मिलने से रोकने के लिए भरपूर कोशिश कर ली, लेकिन वे भी किसानों से मिले बिना दिल्ली नहीं लौटे, भले उन्हें गिरफ़्तार होना पड़ा. वे आक्रामक रुख़ अख्तियार करते हुए कहते हैं, मोदी किसानों का क़र्ज़ नहीं माफ़ कर सकते, सही रेट और बोनस नहीं दे सकते, मुआवज़ा नहीं दे सकते, सिर्फ़ किसानों को गोली दे सकते हैं.

राहुल गांधी समझ चुके हैं कि जब तक वे आम आदमी की बात नहीं करेंगे, तब तक वे सियासत में आगे नहीं ब़ढ पाएंगे. इसके लिए उन्होंने वह रास्ता अख़्तियार किया, जो बहुत कम लोग चुनते हैं. वे भाजपा की तरह एसी कल्चर की राजनीति नहीं करना चाहते. राहुल गांधी का कहना है कि उन्होंने किसानों की असल हालत को जानने के लिए पदयात्रा शुरू की थी, क्योंकि दिल्ली और लखनऊ के एसी कमरों में बैठकर किसानों की हालत पर सिर्फ़ तरस खाया जा सकता है, उनकी समस्याओं को न तो जाना जा सकता है और न ही उन्हें हल किया जा सकता है.

संसद में भी राहुल गांधी बेहद आक्रामक अंदाज़ में नज़र आते हैं. कालेधन पर तंज़ कसते हुए राहुल गांधी ने कहा था,  "काला धन सफ़ेद कर रहे हैं वित्तमंत्री. पहले कालाधन वापस लाने का वादा किया, अब उसे ही सफ़ेद करने का, यह उनकी फ़ेयर एंड लवली स्कीम है, काले पैसे को आप गोरा कर सकते हो. फ़ेयर एंड लवली योजना के तहत किसी को जेल नहीं होगी, जेटली जी के पास जाइये, आपका पैसा सफ़ेद हो जाएगा."  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का ज़िक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा, "महात्मा गांधी हमारे हैं, सावरकर आपके हैं. आपने सावरकर को उठाकर फेंक दिया क्या? फेंक दिया, तो बहुत अच्छा किया." राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वह रोज़गार सृजन के लिए काले रंग का एक बड़ा सा बब्बर शेर लिए घूम रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद युवाओं को नौकरी नहीं दे पा रहे हैं. उन्होंने कहा, "आपने बब्बर शेर दिया तो दिया, लेकिन रोज़गार कितने दिए, यह किसी को मालूम नहीं. किसी के पास कोई आंकड़ा नहीं है." संसद में जब राहुल बोल रहे थे, तो भाजपा सांसद हंगामा करने लगे. इस पर राहुल गांधी ने कहा, मैं आरएसएस का नहीं हूं. मैं ग़लतियां करता हूं. मैं सब कुछ नहीं जानता, सब कुछ नहीं समझता. मैं जनता से बातचीत करके उनसे उनकी बात सुनकर और समझकर अपनी बात रखता हूं. हम में और आप में फ़र्क़ यही है कि आप सब जानते हैं और ग़लती नहीं करते, जबकि हम ग़लती करते हैं और उससे सीखते हैं.

राहुल गांधी छल और फ़रेब की राजनीति नहीं करते. वे कहते हैं,  ''मैं गांधीजी की सोच से राजनीति करता हूं. अगर कोई मुझसे कहे कि आप झूठ बोल कर राजनीति करो, तो मैं यह नहीं कर सकता. मेरे अंदर ये है ही नहीं. इससे मुझे नुक़सान भी होता है. 'मैं झूठे वादे नहीं करता. "  वे कहते हैं, 'सत्ता और सच्चाई में फ़र्क़ होता है. ज़रूरी नहीं है, जिसके पास सत्ता है उसके पास सच्चाई है. गुजरात में एक आयोजित एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' पर तंज़ करते हुए कहते हैं, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है, तो हमारी सरकार हर किसी के लिए होगी न कि केवल एक व्यक्ति के लिए. अपने 'मन की बात' कहने के बजाय हमारी सरकार आपके मन की बात सुनने का प्रयास करेगी.

राहुल गांधी हमेशा सच के साथ खड़े दिखाई देते हैं. कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में नेशनल हेराल्ड के संस्मरणीय संस्करण के लोकार्पण समारोह में उन्होंने कहा कि मौजूदा वक़्त में जो लोग सच्चाई के साथ हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. दलितों को मारा जा रहा है, अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और मीडिया को धमकाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के एडिटर एक दिन मेरे पास आए. मैंने उनसे कहा, अगर आपको किसी दिन कांग्रेस पार्टी या मेरे ख़िलाफ़ कुछ लिखना हो, तो बिना ख़ौफ़ के लिखें. ये वो चीज़ है, जो हम नेशनल हेराल्ड से चाहते हैं. सच्चाई से डरने की ज़रूरत नहीं है और ना चुप रहने की.

वे कहते हैं, "जब भी मैं किसी देशवासी से मिलता हूं. मुझे सिर्फ़ उसकी भारतीयता दिखाई देती है. मेरे लिए उसकी यही पहचान है. अपने देशवासियों के बीच न मुझे धर्म, ना वर्ग, ना कोई और अंतर दिखता है."  क़ाबिले-ग़ौर है कि एक सर्वे में विश्वसनीयता के मामले में दुनिया के बड़े नेताओं में राहुल गांधी को तीसरा दर्जा मिला हैं, यानी दुनिया भी उनकी विश्वसनीयता का लोहा मानती है.

प्रभावशाली घराने से होने के बावजूद राहुल गांधी में सादगी है. खाने के वक़्त मेज़ पर वे साथियों को प्लेटें दे देते हैं, अपनी प्लेटें ख़ुद किचन में रख आते हैं. किसी बुज़ुर्ग के पानी मांगने पर सेवकों से कहने की बजाय ख़ुद किचन से पानी लाकर दे देते हैं. सार्वजनिक मंचों पर उन्हें अकसर डॊ. मनमोहन सिंह व अन्य लोगों को पानी देते हुए देखा गया है. वे बनावटीपन से कोसों दूर हैं. वे संसद की सीढ़ियों पर सर नहीं नवाते. अगर उनकी कोई चीज़ गिर जाए, तो बिना किसी का इंतज़ार किए ख़ुद उठा लेते हैं. यहां तक कि अपनी कुर्सी तक ख़ुद उठाकर ले आते हैं. एक आयोजन में एक बुज़ुर्ग अपने जूते का फ़ीता नही बांध पा रहे थे. राहुल गांधी ने बेहिचक बढ़कर बुज़ुर्ग के जूते का फ़ीता बांधा और फिर उन्हें उठने में मदद की.

दुनिया की सबसे महंगी खुदरा हाई स्ट्रीट में शुमार दिल्ली की ख़ान मार्केट में राहुल का भी सबसे प्रिय हैंगआउट है.  उन्हें बरिस्ता में कॉफी पीते हुए या बाज़ार की बाहरी तरफ़ बुक शॊप्स में किताबों के वर्क़ पलटते देखा जा सकता है. अमूमन वे सफ़ेद कुर्ता-पायजामा और सफ़ेद कुर्ता-नीली जींस में नज़र आते हैं. वे खाने के बहुत शौक़ीन हैं. पुरानी दिल्ली का खाना भी उन्हें यहां ख़ींच लाता है. अपनी सुरक्षा की परवाह किए बग़ैर वे शाहजहानाबाद पहुंच जाते हैं.

राहुल गांधी को ख़ामोश शामें बहुत पसंद हैं. इसके साथ ही उन्हें दुनिया की चकाचौंध भी ख़ूब लुभाती है. वे रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं. अगर किसी से कोई वादा कर लें, तो उसे पूरा ज़रूर करते हैं.   बिल्कुल ऐसे हैं राहुल गांधी, जिन्हें लोग प्यार से ’आरजी’ भी कहते हैं.


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बुलंदी...


बुलंदी सबको नसीब नहीं हुआ करती, लेकिन बुलंदी सबको अच्छी लगती है... बुलंदी पर पहुंचना एक ख़्वाब होता है, लेकिन बुलंदी की अपनी हदें हुआ करती हैं, कुछ मजबूरियां हुआ करती हैं... जिनकी वजह से इंसान आम ज़िन्दगी नहीं गुज़ार पाता और छोटी-छोटी ख़ुशियों को तरस जाता है... मिसाल देखें-
लड़के ने लड़की से पूछा :  ईदी में क्या लेना है ?
लड़की : हरे कांच की चूड़ियां...
लड़का : मंगा दूंगा
लड़की :  नहीं, ख़ुद लाकर देना
लड़का : कहां से लाऊं ?
लड़की  :  दिल्ली में चूड़ियों की दुकानों की कमी है क्या ?
लड़का : जान ! बहुत मजबूर हूं, क़ाहिरा के बाज़ार से तुम्हें चूड़ियां लाकर दे सकता हूं, लेकिन दिल्ली के बाज़ार में चूड़ियां लेने ख़ुद नहीं जा सकता...

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आज फ़ादर्स डे है...


आज फ़ादर्स डे है... हमारे लिए हर पल ही फ़ादर्स डे है, क्योंकि हम अपने पापा के वजूद का ही एक हिस्सा हैं और पापा आज भी हम में ज़िन्दा हैं...
हमारे पापा ख़ुद से ज़्यादा अपने बच्चों को चाहते थे... पापा को घर आते देख हम उनके पास दौड़ जाते और पापा घर में दाख़िल होने से पहले ही हमें गोद में उठा लेते और चीज़ दिलाने ले जाते... सोते में एक लफ़्ज़ मुंह से निकलता-पानी, तो पापा हमें पानी पिलाते... हमें याद नहीं कि बचपन में कभी हमने ख़ुद उठकर पानी पिया हो... पापा हमें स्कूल लेकर जाते... फिर स्कूल से लेकर भी आते... जब तक पापा ज़िन्दा रहे, हम घर जाते तो उन्हें घर से बाहर ही बेचैन टहलते देखते... पापा कहते- फ़िरदौस आने वाली है... और वो हमारे इंतज़ार में घर के बाहर ही टहलते रहते... ये जानते हुए कि हमारे घर आने में अभी कई घंटे बाक़ी हैं... हमसे पहले कभी पापा ने खाना नहीं खाया... कभी हमारी आंखें नम नहीं होने दीं... ये है हमारे पापा की हमारे लिए मुहब्बत... पापा के जाने के बाद ही दुख-तकलीफ़ का अहसास हुआ... ज़िन्दगी में पापा की कमी सबसे ज़्यादा खलती है...
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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नेशनल हेराल्ड से उम्मीद जगी

फ़िरदौस ख़ान
अख़बारों का काम ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना होता है. सूचनाओं के इसी प्रसार-प्रचार को पत्रकारिता कहा जाता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है.  लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जिस तरह पिछले चंद सालों में कुछ मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के तमाम क़ायदों को ताख़ पर रखकर ’कारोबारी’ राह अपना ली है, उससे मीडिया के प्रति जनमानस का भरोसा कम हुआ है. ऐसा नहीं है कि सभी अख़बार या ख़बरिया चैनल बिकाऊ हैं. कुछ अपवाद भी हैं. जिस देश का मीडिया बिकाऊ होगा, उस देश के लोगों की ज़िन्दगी आसान नहीं होगी. पिछले कई साल से देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. जिस तरह से सरेआम लोगों पर हमला करके उनकी हत्याएं की जा रही हैं, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले दलितों, किसानों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, ऐसे में मीडिया की ख़ामोशी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है. अराजकता भरे दौर में ऐसे अख़बारों की ज़रूरत महसूस की जा रही है, जो सच्चे हों, जिन पर अवाम भरोसा कर सके, जो चंद सिक्कों के लिए अपना ज़मीर न बेचें, जो जनमानस को गुमराह न करें.

ऐसे में कांग्रेस के अख़बार नेशनल हेराल्ड के प्रकाशन का शुरू होना, ख़ुशनुमा अहसास है. गुज़श्ता 12 जून कोकर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में इसके संस्मरणीय संस्करण का लोकार्पण किया गया. यह अख़बार दिल्ली से साप्ताहिक प्रकाशित किया जाएगा.  इस मौक़े पर राहुल गांधी ने कहा कि मौजूदा वक़्त में जो लोग सच्चाई के साथ हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. दलितों को मारा जा रहा है, अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और मीडिया को धमकाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के एडिटर एक दिन मेरे पास आए. मैंने उनसे कहा, अगर आपको किसी दिन कांग्रेस पार्टी या मेरे ख़िलाफ़ कुछ लिखना हो, तो बिना ख़ौफ़ के लिखें. ये वो चीज़ है, जो हम नेशनल हेराल्ड से चाहते हैं. सच्चाई से डरने की ज़रूरत नहीं है और ना चुप रहने की.

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रता सेनानियों ने लखनऊ से 9 सितंबर, 1938 को नेशनल हेराल्ड नाम से एक अख़बार शुरू किया था. उस वक़्त यह अख़बार जनमानस की आवाज़ बना और जंगे-आज़ादी में इसने अहम किरदार अदा किया. शुरुआती दौर में जवाहरलाल नेहरू ही इसके संपादक थे. प्रधानमंत्री बनने तक वे हेराल्ड बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के चेयरमैन भी रहे. उन्होंने अख़बार के अंतर्राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर भी काम किया. अख़बार लोकप्रिय हुआ. साल 1968 में दिल्ली से इसके संस्करण का प्रकाशन शुरू हो गया.  हिंदी में नवजीवन और उर्दू में क़ौमी आवाज़ के नाम से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे. अख़बार को कई बार बुरे दौर से गुज़रना पड़ा और तीन बार इसका प्रकाशन बंद किया गया. पहली बार यह अंग्रेज़ी शासनकाल में उस वक़्त बंद हुआ, जब अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय अख़बारों के ख़िलाफ़ दमनकारी रवैया अपनाया था. नतीजतन, 1942 से 1945 तक नेशनल हेराल्ड को अपना प्रकाशन बंद करना पड़ा. फिर साल 1945 में अख़बार का प्रकाशन शुरू किया गया. साल 1946 में फ़िरोज़ गांधी को नेशनल हेराल्ड का प्रबंध निदेशक का कार्यभार सौंपा गया. वे 1950 तक उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी संभाली. इस दौरान अख़बार की माली हालत में भी कुछ सुधार हुआ. लेकिन आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद अख़बार को दो साल के लिए बंद कर दिया गया.  कुछ वक़्त बाद अख़बार शुरू हुआ, लेकिन साल 1986 में एक बार फिर से इस पर संकट के बादल मंडराने लगे, लेकिन राजीव गांधी के दख़ल की वजह से इसका प्रकाशन होता रहा. मगर माली हालत ख़राब होने की वजह से अप्रैल 2008 में इसे बंद कर दिया गया.

क़ाबिले-ग़ौर है कि असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी (एजेएल ) के तहत नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन किया जाता था, जो एक सेक्शन-25 कंपनी थी. इस तरह की कंपनियों का मक़सद कला-साहित्य आदि को प्रोत्साहित करना होता है. मुनाफ़ा कमाने के लिए इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता. मुनाफ़ा न होने के बावजूद यह कंपनी काफ़ी अरसे तक नुक़सान में चलती रही. कांग्रेस ने असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी को चलाए रखने के लिए कई साल तक बिना ब्याज़ के उसे क़र्ज़  दिया. मार्च 2010 तक कंपनी को दिया गया क़र्ज़ 89.67 करोड़ रुपये हो गया. बताया जाता है कि कंपनी के पास दिल्ली और मुंबई समेत कई शहरों में रीयल एस्टेट संपत्तियां हैं. इसके बावजूद कंपनी ने कांग्रेस का क़र्ज़ नहीं चुकाया. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा को 22 मार्च 2002 को कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. इसके कई साल बाद 23 नवंबर 2010 को यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड नाम की सेक्शन-25 कंपनी सामने आई. गांधी परिवार के क़रीबी सुमन दुबे और सैम पित्रोदा जैसे लोग इसके निदेशक थे. अगले महीने 13 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी को इस कंपनी का निदेशक बनाया गया. अगले ही साल 22 जनवरी 2011 को सोनिया गांधी भी यंग इंडिया के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल हो गईं. उनके साथ-साथ  मोतीलाल वोरा और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य ऑस्कर फ़र्नांडीज भी यंग इंडियन के बोर्ड में शामिल किए गए. इस कंपनी के 38-38 फ़ीसद शेयरों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की हिस्सेदारी है, जबकि के 24 फ़ीसद शेयर मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के नाम हैं. दिसंबर 2010 में असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी के प्रबंधकों ने 90 करोड़ रुपये के क़र्ज़ बदले पूरी कंपनी यंग इंडियन के हवाले कर दी. यंग इंडियन ने इस अधिग्रहण के लिए 50 लाख रुपये का भुगतान किया. इस तरह यह कंपनी यंग इंडियन की सहायक कंपनी बन गई.

बहरहाल, कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड शुरू करके सराहनीय काम किया है. पिछले कुछ अरसे से ऐसे ही अख़बार की ज़रूरत महसूस की जा रही थी. आज का अख़बार कल का साहित्य है, इतिहास है. अख़बार दुनिया और समाज का आईना हैं. देश-दुनिया में में जो घट रहा है, वह सब सूचना माध्यमों के ज़रिये जन-जन तक पहुंच रहा है. आज के अख़बार-पत्रिकाएं भविष्य में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साहिब होंगे, क्योंकि इनके ज़रिये ही आने वाली पीढ़ियां आज के हालात के बारे में जान पाएंगी. इसके ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. पत्रकारिता सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करती है. अख़बारों के ज़रिये अवाम को सरकार की नीतियों और उसके कार्यों का पता चलता है. ठीक इसी तरह अख़बार जनमानस की बुनियादी ज़रूरतों, समस्याओं और उनकी आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं.

यह बात समझनी होगी कि मीडिया का काम ’सरकार’ या ’वर्ग’ विशेष का गुणगान करना नहीं है. जहां सरकार सही है, वहां सरकार की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब सत्ताधारी लोग तानाशाही रवैया अपनाते हुए जनता पर क़हर बरपाने लगें, तो उसका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए.  मीडिया को जनता की आवाज़ बनना चाहिए, न कि सरकार का भोंपू.
चूंकि, नेशनल हेराल्ड एक सियासी पार्टी का अख़बार है, इसलिए इसे अवाम में अपनी साख बनाए रखने के लिए फूंक-फूंक कर क़दम रखना होगा. इसके हिन्दी, उर्दू व अन्य भाषाओं के संस्करण भी प्रकाशित होने चाहिए.

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इंतज़ार के रंग...

मेरे महबूब !
हिज्र के मौसम में
आसमान पर छाई
काली घनघोर घटाओं ने
फ़िज़ा में
कितने रंग बिखेरे हैं
बिल्कुल
तुम्हारे इंतज़ार की तरह...
एक रंग हिज्र का
एक रंग विसाल का
और
एक रंग इंतज़ार का
जो अज़ल से जारी है...
-फ़िरदौस ख़ान

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खाने के वक़्त मौत

ज्योतिष एक ऐसा इल्म है, जो माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल के बारे में कई बातें बता देता है... बशर्त बताने वाला इसमें माहिर हो, इसका आलिम हो... हमने बहुत सी बातें सच होते हुए देखी हैं... हमारे नाना जान इल्मे-नजूम के जानकार थे... वे भी जो बताते थे, वह सही साबित होता था... फ़िलहाल दो वाक़ियात का ज़िक्र कर रहे हैं...

हमारे बचपन की बात है... हमारे दादा जान के एक दोस्त थे... वे ज्योतिष शास्त्र के विद्वान थे...  सितारों की चाल देखकर वे जो बताते थे, वह सच होता था... उनकी बताई दो बातें हमने भी देखीं हैं, जो सौ फ़ीसद सही साबित हुईं...

पहली, हम अपने पुराने घर आए थे... पापा हमें पहुंचा कर वापस चले गए थे... कुछ रोज़ बाद हम और हमारे भाइयों की तबियत बहुत ख़राब हो गई... दादा जान के दोस्त पापा से मिले और उन्होंने उनसे कहा कि बेटा आज ही अपने शहर चले जाओ... पापा ने वजह पूछी, तो वे टाल गए... पापा आए और उन्होंने हम अबको बीमार पाया... चंद रोज़ बाद हमारे दादा जान का इंतक़ाल हो गया... कुछ अरसे बाद हम सब वापस अपने घर आ गए...

दूसरी, पापा के दोस्त के पिता ने एक बार दादा जान के दोस्त से अपनी मौत के बारे में पूछा... उन्होंने बताने से मना कर दिया और कहा कि ऐसी बातें नहीं जाननी चाहिए... लेकिन उन्होंने ज़िद कर ली... इस पर उन्होंने कहा कि मैं बस एक बात बताऊंगा, उससे आगे मत पूछना... वे मान गए... उन्होंने बताया कि तुम्हारी मौत खाने के वक़्त होगी... उन्होंने अपनी मौत के बारे में पूछ तो लिया, लेकिन फिर उन पर मौत का ख़ौफ़ ऐसा तारी हुआ कि उन्होंने अपनी पसंदीदा मछली खानी छोड़ दी... उन्हें लगता था कि शायद मछली का कांटा उनके हलक़ में फंस जाएगा, जिससे उनकी मौत हो जाएगी...

इस तरह कई बरस बीत गए... एक दिन वे ग्राहकों से पैसे इकट्ठे करने गांव गए हुए थे... उनके पीछे उनके बेटे की किसी बात पर पड़ौस के दुकानदार से लड़ाई हो गई और वह बंदूक़ लेने के लिए घर चला गया. वे गांव से लौटकर आए और अपनी गद्दी पर बैठ गए... तभी पड़ौस का दुकानदार आया और उनके सिर पर लाठी से कई वार कर दिया... मौक़े पर ही उनकी मौत हो गई... उस वक़्त दोपहर का एक बज रहा था, यानी खाने का वक़्त था... उनकी भविष्यवाणी सच हुई...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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दुआ... एक पुरअसरार सदा

दुआ... कितनी पाकीज़गी है इस एक लफ़्ज़ में... दुआ क्या होती है... दुआ, वो होती है, जो दिल से निकलती है और सीधे अर्श तक जाती है... दुआ में बहुत असर होता है... दुआ नामुमकिन को भी मुमकिन बना देती है... इस ज़मीन से उस आसमान तक अगर सबसे ज़्यादा पुरअसरार कोई सदा है, तो वो दुआ की है...
बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जो किसी की दुआओं में रहा करते हैं...

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सालगिरह का दुआओं से लबरेज़ तोहफ़ा...



गुज़श्ता साल 2012 की एक जून को हमारी सालगिरह थी...उस रोज़ हम अपने घर में थे...अपनी अम्मी, भाइयों, भाभी, बहन और दीगर रिश्तेदारों के साथ...जब हम घर होते हैं, तब इंटरनेट से दूर ही रहना पसंद करते हैं...आख़िर कुछ वक़्त घरवालों के लिए भी तो होना ही चाहिए न...

आपकी सबकी तरफ़ से हमें सालगिरह की शुभकामनाएं मिलीं...हमारे फ़ेसबुक की वाल, मैसेज बॉक्स आप सबकी दुआओं से भरा हुआ है... इसी तरह हमारे मेल के इनबॉक्स भी दुआओं से लबरेज़ हैं... सच कितना अपनापन है यहां भी...कौन क़ुर्बान न हो जाए इस ख़ुलूस और मुहब्बत पर...यही तो सरमाया हुआ करता है उम्रभर का ...जिसे हम हमेशा संभाल कर रख लेना चाहते हैं अपनी ज़िन्दगी की किताब में...

हर साल हमें सालगिरह के तोहफ़े में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर मिलता है, जो हमारी उम्र का सरमाया बन जाता है...इस बार भी ऐसा एक तोहफ़ा मिला, जो आज से पहले शायद ही किसी भाई ने अपनी बहन को दिया हो... यह अल्लाह का हम पर बहुत बड़ा करम रहा है कि हमें भाई बहुत अच्छे मिले...वो सगे भाई हों या फिर मुंहबोले भाई... हम जिस तोहफ़े का ज़िक्र कर रहे हैं, वो हमें दिया है हमारे मुंहबोले भाई मन्नान रज़ा रिज़वी ने...मन्नान हमें बहुत अज़ीज़ हैं...यह तोहफ़ा दुआओं से लबरेज़ एक नज़्म की सूरत में है...जिसे पढ़कर अहसास हुआ कि किस तरह मुहब्बत ज़र्रे को भी आफ़ताब बना देती है...हमारे भाई मन्नान ने भी तो यही सब किया है...हमें अर्श से उठाकर आसमां की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है...

मन्नान से क्या कहें...? हमारे जज़्बात के आगे अल्फ़ाज़ भी कम पड़ गए हैं... एक दुआ है कि अल्लाह हमारे भाई को हमेशा सलामत और ख़ुश रखे...और ऐसा भाई दुनिया की हर बहन को मिले...आमीन...       
हम अपने भाई का ख़त और नज़्म पोस्ट कर रहे हैं...

ख़त
अस्सलामु अलैकुम व  रहमतुल्लाही व बरकतुह
उम्मीद है मिज़ाज अक़द्दस बख़ैर होंगे... आपकी ख़ैरियत ख़ुदावंद करीम से नेक मतलूब है...
प्यारी बाजी... आपके योम-ए-पैदाइश के मौक़े पर हम क़लब की इन्तहाई गहराइयों से आपको मुबारकबाद पेश करते हैं...हमारी दुआ है कि  ये दिन आपकी ज़िन्दगी में हर बार नई ख़ुशियों के साथ आए...
ख़ुदा आपके तमाम मक़ासिद हक़ा में कामयाबी अता करते हुए आपकी मसरूफ़ियत में कमी और मक़बूलियत में इज़ाफ़ा फ़रमाये... और हमेशा नज़र-ए-बद से महफ़ूज़ रखे...आमीन...
फ़क़्त ख़ैर अंदेश
मन्नान रज़ा रिज़वी 

नज़्म
बयां हो अज़म आख़िर किस तरह से आपका फ़िरदौस
क़लम की जान हैं, फ़ख्र-ए-सहाफ़त साहिबा फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

सहाफ़त के जज़ीरे से ये वो शहज़ादी आई है
मिली हर लफ़्ज़ को जिसके मुहब्बत की गवाही है
हर एक तहरीर पे जिनकी फ़साहत नाज़ करती है
सहाफ़त पर वो और उन पर सहाफ़त नाज़ करती है
वो हैं शहज़ादी-ए-अल्फ़ाज़ यानी साहिबा फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

क़लम जब भी उठा हक़ व सदाक़त की ज़बां बनकर
बयान फिर राज़ दुनिया के किए राज़दां बनकर
मियान-ए-हक़ व बातिल फ़र्क़ यूं वाज़ा किया तुमने
तकल्लुफ़ बर तरफ़ क़ातिल को है क़ातिल लिखा तुमने
तेरा हर लफ़्ज़ बातिल के लिए है आईना फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

कभी मज़मून में पिन्हा किया है दर्दे-मिल्लत को
कभी अल्फ़ाज़ का जामा दिया अंदाज़-ए-उल्फ़त को
यक़ीं महकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातहा आलम
सफ़र इस सिम्त में जारी रहा है आपका हर दम
अदा हक़ सहाफ़त आपने यूं है किया फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

हर इक लब रहे जारी कुछ ऐसा साज़ बन जाए
ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्म तुम मज़लूम की आवाज़ बन जाओ
हों चर्चे हर ज़बां पर आम इक दिन तेरी शौहरत के
हर  इक तहरीर मरहम सी लगे ज़ख्मों पे मिल्लत के
तुम्हारे हक़ में करते हैं अनस ये ही दुआ फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...
-मन्नान रज़ा रिज़वी


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तुम्हारे नाम का कलमा...

मेरे महबूब
मेरी ज़िन्दगी का
जब आख़िरी लम्हा आए
मेरे होंठों पे
तुम्हारे नाम का कलमा आए...
-फ़िरदौस ख़ान

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आख़िरी लम्हे

मेरे महबूब !
मैं अकसर ज़िन्दगी के उन आख़िरी लम्हों के बारे में सोचा करती हूं, जब मौत सिरहाने ख़ड़ी होगी... सांसें थम रही होंगी... धड़कनें भी धीमी हो जाएंगी... ख़ून रगों में जमने लगेगा और जिस्म ठंडा पड़ना शुरू हो जाएगा...
उस वक़्त मैं किस हाल में रहूंगी... तुम्हें लेकर क्या कुछ दिलो-दिमाग़ में चल रहा होगा... क्या उस वक़्त तुम मेरे क़रीब रहोगे... मेरा हाथ अपने हाथ में थामे... तुम्हारी निगाहें मुझसे क्या कुछ कह रही होंगी...

या मेरी निगाहें तुम्हें ढूंढ रही होंगी... आख़िर तुम्हें पाने के लिए मुझे कितने जनम लेने होंगे... जन्म-जन्मांतर मेरे वजूद पर सिर्फ़ तुम्हारा ही हक़ रहेगा...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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अमलतास... तपती धूप में सड़कों के किनारे लगे अमलतास के दरख़्त कितने भले लगते हैं... पीले फूलों के गुच्छे मानो अपने पास बुला रहे हों और कह रहे हों-
ओ राही ! आओ, कुछ देर हमारे साये में सुकून पा लो... फिर अपने सफ़र पर आगे बढ़ जाना...
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सफ़र

कभी-कभी इन क़दमों को सफ़र भी कितने रास आते हैं... ये ज़िन्दगी भी तो एक सफ़र ही है... एक ऐसा सफ़र जिसकी मंज़िल का कहीं कोई पता नहीं... बे मक़सद-सी, बे मतलब सी ज़िन्दगी... एक ऐसी ज़िन्दगी जैसे किसी को सेहरा में फेंक दिया हो, हर तरफ़ रेत ही रेत... मुसाफ़िर कहां जाए, और कहां न जाए... या फिर किसी गहरे समंदर में फेंक दिया हो... दूर तक सिर्फ़ पानी ही पानी है... कहीं कोई किनारा ही नज़र नहीं आता... लेकिन रेगिस्तान में भटकना तो है, समंदर में डूबते-डूबते तैरना है और तैरते-तैरते डूबना है... आख़िर ये सफ़र कभी न कभी, कहीं न कहीं जाकर ख़त्म तो होगा ही...

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मां! तुझे सलाम...


बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनकी मां उनके पास होती है...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनके साथ उनकी मां की दुआएं होती हैं...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जो दूसरों की मां की भी इज़्ज़त करते हैं, और उनसे दुआएं पाते हैं...
लेकिन 
बहुत बदनसीब होते हैं वो लोग, जो न अपनी मां की इज़्ज़त करते हैं और न ही दूसरों की मांऑं की...
आज मदर डे हैं...हम अपनी अम्मी से दूर हैं...बहुत दूर...लेकिन दिल के बहुत क़रीब हैं...हम बहुत ख़ुशनसीब हैं कि अम्मी की दुआएं हमारे साथ हमेशा रहती हैं...आज भी सुबह सबसे पहले हमने अपनी अम्मी को ही फ़ोन किया...
उनके  लिए ख़ुश हैं कि वो अपनी मां के साथ हैं...
आप सभी को मदर डे की दिली मुबारकबाद...

मां! तुझे सलाम... 
-फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी  सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा  उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन... (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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पूरे चांद की रात

आज पूरे चांद की रात है... हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती हुई... अंगनाई में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को और रूमानी बना रहे हैं... नींद आंखों से कोसों दूर है... पिछले कई दिन से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई... चांद आसमान में मुस्करा रहा है...उसकी दूधिया चांदनी अंगनाई में बिखरी हुई है... शाख़ें हवा से झूम रही हैं... गर्मी के मौसम के बावजूद हवा में ठंडक है... बादलों के दूधिया टुकड़े आसमान में कहीं-कहीं तैर रहे हैं... लेकिन जिन्हें दिल ढूंढ रहा है, बस वही नहीं हैं...
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ताजिर...

मेरे महबूब
बहुत बड़े ताजिर हो तुम
जो भी तुम्हें देखे
बिन मोल
ख़ुद-ब-ख़ुद बिक जाता है...
-फ़िरदौस ख़ान

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उसे कैसे पता...

कई बरस पहले का वाक़िया है... हम अपनी भाभी के घर आए हुए थे... वहां हमने दुआओं की एक किताब देखी... हमें किताब बहुत अच्छी लगी... किताबों से हमें बहुत लगाव है... अगर किताब दुआओं की हो, तो फिर बात ही क्या है... उन्होंने हमें पढ़ने के लिए वो किताब दे दी... हम उसे हर रोज़ पढ़ने लगे... हमारी एक सहेली ने वो किताब देखी, तो कहा कि उसे भी यह किताब चाहिए... हम उसके साथ जामा मस्जिद गए. किताबों की तकरीबन सभी दुकानें छान मारीं, लेकिन वो किताब नहीं मिली... दुकानदारों ने बताया कि अब यह किताब नहीं मिलती...  हमारी सहेली ने उस जैसी एक किताब ले ली...

कुछ माह पहले हमारी भाभी ने कहा कि उन्हें वो किताब पढ़नी है... यानी उन्हें अपनी किताब वापस चाहिए थी... अब दुआओं की इस किताब से बिछड़ने का वक़्त आ गया था... हमें बिल्कुल ऐसी ही किताब चाहिए थी... लेकिन ऐसी किताब तो कहीं मिली ही नहीं थी... यह सोचकर दिल उदास हो गया...

एक रोज़ हम अपनी भाभी के साथ उनकी बहन के घर गए... वहां हमने बिल्कुल उस जैसी किताब देखी... भाभी ने बताया कि बहुत साल पहले ये किताबें किसी ने तक़सीम की थीं... किताब बिल्कुल नई थी, यानी उसे पढ़ा नहीं जाता था... हमने हौले से अपनी भाभी से पूछा कि अगर ये किताब पढ़ी नहीं जाती है, तो क्या ये हमें मिल सकती है, हम इसका हदिया दे देंगे... उन्होंने कहा कि वह किताब नहीं देंगी...

ख़ैर, हमारा ज़ेहन इस किताब से हट ही नहीं रहा था... हमें यही किताब चाहिए थी, इस जैसी नहीं... किताब की चाह में हम फिर से जामा मस्जिद गए... किताबों की दुकानों पर इसे तलाशा... हर जगह बस यही जवाब मिला कि यह किताब अब नहीं मिलती... हमने सोचा कि जिस जगह ये किताब शाया हुई थी, वहीं जाया जाए... हम वहां भी गए, लेकिन वहां भी नाकामी ही हासिल हुई... हम मायूस होकर वापस जामा मस्जिद आ गए... हम सड़क किनारे खड़े थे...
एक शख़्स ने पूछा, क्या चाहिए... हमने कहा कि दुआओं की किताब... वो शख़्स किताब की एक दुकान के अंदर गया और हमें किताब लाकर दे दी... हमने जैसे उसे खोला, उसने हमसे कहा, "ये वही किताब है न, जो आप हर रोज़ पढ़ती हैं..."

इस किताब का हदिया उन किताबों से आधे से भी कम था, जो उस ’जैसी’ किताबें थीं... हालांकि वो इस किताब के आसपास भी नहीं ठहरती थीं... हम कुछ देर जामा मस्जिद घूमने के बाद उस दुकान में गए, जहां से वो किताब लाई गई थी... हमने दुकानदार से उस किताब के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि उनके पास ऐसी कोई किताब नहीं है... इसके बाद हम ख़ुशी-ख़ुशी किताब लेकर घर आ गए...

जब किताब पढ़ने बैठे, तो उस शख़्स के वही बोल कानों में गूंज उठे, "ये वही किताब है न, जो आप हर रोज़ पढ़ती हैं..."
आख़िर उसे कैसे पता कि हम हर रोज़ यही किताब पढ़ते हैं...?
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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मज़दूर दिवस


आज मज़दूर दिवस है... यानी हमारा दिन... हम भी तो मज़दूर ही हैं... हमें अपने मज़दूर होने पर फ़ख़्र है... हमारे काम के घंटे तय नहीं हैं.... सुबह से लेकर देर रात तक कितने ही काम करने पड़ते हैं... यह बात अलग है कि हमारा काम लिखने-पढ़ने का है... इसके अलावा हम घर का काम भी कर लेते हैं... घर की साफ़-सफ़ाई, कपड़े-बर्तन धोना, खाना बनाना जैसे काम भी अकसर करने पड़ते हैं... किसी का ख़ून चूसकर अपनी तिजोरियां भरकर 'अमीर’ कहलाने से कहीं बेहतर है 'मज़दूर’ हो जाना...

सभी मेहनतकशों से कहना चाहेंगे कि अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते रहना.. हक़ सिर्फ़ मांगने से नहीं मिलता, उसे हासिल किया जाता है... मेहनत कभी ज़ाया नहीं जाती...
बक़ौल साहिर लुधियानवी-
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी...
-फ़िरदौस ख़ान 



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तेरा हिज्र

जो रूह में बसा हो... उसका साथ होना क्या और दूर होना क्या... मुहब्बत तो दिल से हुआ करती है, रूह से हुआ करती है... ऐसे में दूरियां कोई मायने नहीं रखती...
निदा फ़ाज़ली साहब ने भी क्या ख़ूब कहा है-
तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है...

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मेरी इब्तिदा

मेरे महबूब !
मेरी इब्तिदा भी तुम हो
और
मेरी इंतेहा भी तुम है
तुम्हीं तो हो
अज़ल से अब्द तक...
मेरे महबूब
तुम्हें देखा
तो जाना कि इबादत क्या है...
-फ़िरदौस ख़ान
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वो मेरे महबूब हैं


महबूब...  महबूब और इश्क़... इश्क़ और इबादत... इबादत और ख़ुदा...  आसमान के काग़ज़ पर चांदनी की रौशनाई से महबूब का तअरुफ़ लिखने बैठें, तो कायनात की हर शय छोटी पड़ जाए...
महबूब में ख़ुदा दिखता है... और जिसमें ख़ुदा दिखता है, उसका तअरुफ़ अल्फ़ाज़ में भला कोई कैसे कराए... अहसासात, जज़्बात... हरुफ़ की दुनिया से परे हैं... क्या कोई खिली धूप को बांध पाया है, क्या कोई चांदनी को पकड़ पाया है... नहीं... क़तई नहीं...
फिर भी हमने कोशिश की है, उनका तअरुफ़ लिखने की... मुलाहिज़ा फ़रमाएं..

मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहता हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं…

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं…
-फ़िरदौस ख़ान


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माहे-जून...


आंधियों का मौसम शुरू हो चुका है... हमें आंधियां बहुत पसंद हैं... ये इस बात की अलामत हैं कि हमारा पसंदीदा माह यानी माहे-जून आने वाला है... माहे-जून में गर्मी अपने शबाब पर हुआ करती है... आलम यह कि दिन के पहले पहर से ही लू चलने लगती है... गरम हवाओं की वजह से सड़कें भी सुनसान हो जाती हैं... धूल भरी आंधियां भी ऐसे चलती हैं, मानो सबकुछ उड़ा कर ले जाना चाहती हैं... दहकती दोपहरें भी अलसाई-सी लगती हैं... बचपन में इस मौसम में दिल नहीं लगता था... दादी जान कहा करती थीं कि ये हवाएं मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं... इसलिए मन उड़ा-उड़ा रहता है... और कहीं भी मन नहीं लगता... तब से दादी जान की बात मान ली कि इस मौसम में ऐसा ही होता है... फिर भी हमें जून बहुत अच्छा लगता है... दहकती दोपहरें, गरम हवाएं, धूल भरी आंधियां... और किसी की राह तकती वीरान सड़क... वाक़ई, सबकुछ बहुत अच्छा लगता है... बहुत ही अच्छा... जैसे इस मौसम से जनमों-जनमों का नाता हो... एक ख़ास बात यह है कि जून की शुरुआत ही हमारी सालगिरह यानी एक जून से होती है... और फिर उनकी सालगिरह भी तो इसी माह में है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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ईस्टर

ये त्यौहार ही तो हुआ करते हैं, जब लोग इकट्ठे होते हैं... एक-दूजे से मिलते हैं... कुछ अपनी कहते हैं, कुछ अपनी सुनाते हैं... हमारी कई सहेलियां हैं, जो विदेशों में रहती हैं... त्यौहार के मौक़े पर वे अपने मायके आती हैं और उनसे मुलाक़ात हो जाती है... ये त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखते हैं, बहुत-सी यादें ताज़ा हो जाती हैं... कई सहेलियों से मिलना,  वाक़ई कितना अच्छा लगता है... ये दिन बहुत प्यारे होते हैं, यादगार होते हैं, जिन्हें हम ज़िन्दगी की किताब में संजो कर रख लिया करते हैं...
आज ईस्टर है... ईस्टर संडे, गुड फ़्राइडे के बाद आने वाले इतवार को मनाया जाता है... ईसाई मान्यता के मुताबिक़ सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद तीसरे दिन यीशु (ईसा मसीह) दोबारा ज़िन्दा हो गए थे... ईस्टर ख़ुशी का दिन होता है... इस त्यौहार को ज़िन्दगी में नये बदलाव के प्रतीक के तौर पर मनाए जाने की रिवायत है. यीशु के चाहने वाले गिरजाघर जाते हैं, अपने ईष्ट को याद करते हैं, प्रभु भोज में शामिल होते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं...
आप सभी को ईस्टर मुबारक हो...

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पापा की बरसी


ज़िन्दगी में कुछ वाक़ियात ऐसे हुआ करते हैं, जो इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं... पापा का जाना भी एक ऐसा ही वाक़िया है... कहते हैं कि किसी लड़की का किसी मर्द से पहला प्यार, उसके वालिद से ही होता है... बिल्कुल सच है... पापा से हमें कितनी मुहब्बत है, इसका अहसास पापा के जाने के बाद ही हुआ...
पापा को इस दुनिया से गए छह साल हो गए हैं, लेकिन ये कल ही की बात लगती है... उस दिन 8 जुमादा उल अव्वल 1432 हिजरी का पीर की रात थी... अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से 11 अप्रैल 2011 थी... आज पापा की बरसी है...
पापा की याद को समर्पित एक नज़्म...
पापा
आप बहुत याद आते हो...
मैं जानती हूं
अब आप इस दुनिया में नहीं हो
लेकिन
दिल हरगिज़ ये मानने को राज़ी नहीं
कि आप इस दुनिया से चले गए...

पापा
आप आज भी मुझमें ज़िन्दा हो
हर आहट पर लगता है
आप आओगे और पूछोगे
मेरी शहज़ादी कैसी है...

पापा
आपसे बिछड़ कर
आपकी शहज़ादी बहुत उदास रहती है
क्योंकि
आपकी तरह उसे चाहने वाला कोई नहीं

पापा
उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा
जब आपकी शहज़ादी आपके पास होगी
और
फिर हम हमेशा साथ रहेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन...


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पापा ! आप बहुत याद आते हो...


बचपन में सुना था... जब कोई मर जाता है, तो वह तारा बन जाता है... आसमान में चमकता हुआ एक सितारा... यह बात साईंस से परे की है... सिर्फ़ मानने या न मानने की... रात में जब भी आसमान को देखते हैं, तो लगता है कि पापा भी सितारा बन गए होंगे... आसमान में चमकते अनगिनत सितारों में किसी एक सितारे के रूप में पापा भी होंगे... जो हमें देख रहे होंगे... बस हमने भी एक सितारा तलाश लिया... वही सितारा, जो चमेली के पास बैठने पर आसमान में अपने सबसे क़रीब नज़र आता है... चम्पा के महकते फूलों के गुच्छे के ठीक ऊपर... अब यह हर रोज़ का शग़ल बन गया है... चमेली के पास चटाई बिछाकर बैठ जाना और आसमान में चमकते सितारे को देखना... ऐसा लगता है, जैसे पापा भी रोज़ रात को हमारे आने का इंतज़ार करते हैं...
वो भी अपने पापा से इतना ही प्यार करते हैं, क्या वो भी अपने पापा को इस तरह आसमान में सितारों के बीच तलाशते होंगे... कभी पूछेंगे उनसे...
पापा ! आप बहुत याद आते हो... मिस यू...
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