तेरा हिज्र

जो रूह में बसा हो... उसका साथ होना क्या और दूर होना क्या... मुहब्बत तो दिल से हुआ करती है, रूह से हुआ करती है... ऐसे में दूरियां कोई मायने नहीं रखती...
निदा फ़ाज़ली साहब ने भी क्या ख़ूब कहा है-
तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है...

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इल्मे-सीना

इल्मे-सीना इल्मे-सीना के बारे में बहुत कम लोग जानना चाहते हैं... दरअसल, इल्मे-सीना आपको किताबों में नहीं मिलता... इसे समझना पड़ता है... और इसे समझने के लिए एक रौशन ज़ेहन और वसीह दिल चाहिए...
जिस तरह पानी को साफ़ रखने के लिए साफ़ बर्तन की ज़रूरत होती है, उसी तरह इल्मे-सीना के लिए भी दिल का साफ़ होना बेहद ज़रूरी है... इसके लिए एक ऐसा दिल चाहिए, जो ख़ुदग़र्ज़ न हो, कमज़र्फ़ न हो... इतनी समझ चाहिए कि इंसान समझ सके कि क्या सही है और क्या ग़लत है... दूसरों में ऐब तलाशने की बजाय ख़ुद के अंदर झांकना होगा... और ये जानना होगा कि कहीं हमारे चेहरे पर ही तो गर्द नहीं जमी है, और हम सारा क़ुसूर आइने को दे रहे हैं... इसके लिए ऊंच-नीच, जात-पांत और किसी भी तरह के भेदभाव से ऊपर उठना होगा... यह भी याद रखना होगा कि ख़ुदा की मख़लूक से नफ़रत करके ख़ुदा को नहीं पाया जा सकता...
कबीर चचा कह गए हैं-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय...
यक़ीन करें, जिसने प्रेम के ढाई आखर पढ़ लिए और समझ लिए, उसका बेड़ा पार हो गया...
(Firdaus Diary)

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मेरी इब्तिदा

मेरे महबूब !
मेरी इब्तिदा भी तुम हो
और
मेरी इंतेहा भी तुम है
तुम्हीं तो हो
अज़ल से अब्द तक...
मेरे महबूब
तुम्हें देखा
तो जाना कि इबादत क्या है...
-फ़िरदौस ख़ान
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वो मेरे महबूब हैं


महबूब...  महबूब और इश्क़... इश्क़ और इबादत... इबादत और ख़ुदा...  आसमान के काग़ज़ पर चांदनी की रौशनाई से महबूब का तअरुफ़ लिखने बैठें, तो कायनात की हर शय छोटी पड़ जाए...
महबूब में ख़ुदा दिखता है... और जिसमें ख़ुदा दिखता है, उसका तअरुफ़ अल्फ़ाज़ में भला कोई कैसे कराए... अहसासात, जज़्बात... हरुफ़ की दुनिया से परे हैं... क्या कोई खिली धूप को बांध पाया है, क्या कोई चांदनी को पकड़ पाया है... नहीं... क़तई नहीं...
फिर भी हमने कोशिश की है, उनका तअरुफ़ लिखने की... मुलाहिज़ा फ़रमाएं..

वो मेरे महबूब हैं
जिनका चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं...

जिनका ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं...

वो हैं मेरे महबूब
जिन से मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं...

उनकी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
उनके इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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माहे-जून...


आंधियों का मौसम शुरू हो चुका है... हमें आंधियां बहुत पसंद हैं... ये इस बात की अलामत हैं कि हमारा पसंदीदा माह यानी माहे-जून आने वाला है... माहे-जून में गर्मी अपने शबाब पर हुआ करती है... आलम यह कि दिन के पहले पहर से ही लू चलने लगती है... गरम हवाओं की वजह से सड़कें भी सुनसान हो जाती हैं... धूल भरी आंधियां भी ऐसे चलती हैं, मानो सबकुछ उड़ा कर ले जाना चाहती हैं... दहकती दोपहरें भी अलसाई-सी लगती हैं... बचपन में इस मौसम में दिल नहीं लगता था... दादी जान कहा करती थीं कि ये हवाएं मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं... इसलिए मन उड़ा-उड़ा रहता है... और कहीं भी मन नहीं लगता... तब से दादी जान की बात मान ली कि इस मौसम में ऐसा ही होता है... फिर भी हमें जून बहुत अच्छा लगता है... दहकती दोपहरें, गरम हवाएं, धूल भरी आंधियां... और किसी की राह तकती वीरान सड़क... वाक़ई, सबकुछ बहुत अच्छा लगता है... बहुत ही अच्छा... जैसे इस मौसम से जनमों-जनमों का नाता हो... एक ख़ास बात यह है कि जून की शुरुआत ही हमारी सालगिरह यानी एक जून से होती है... और फिर उनकी सालगिरह भी तो इसी माह में है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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ईस्टर

ये त्यौहार ही तो हुआ करते हैं, जब लोग इकट्ठे होते हैं... एक-दूजे से मिलते हैं... कुछ अपनी कहते हैं, कुछ अपनी सुनाते हैं... हमारी कई सहेलियां हैं, जो विदेशों में रहती हैं... त्यौहार के मौक़े पर वे अपने मायके आती हैं और उनसे मुलाक़ात हो जाती है... ये त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखते हैं, बहुत-सी यादें ताज़ा हो जाती हैं... कई सहेलियों से मिलना,  वाक़ई कितना अच्छा लगता है... ये दिन बहुत प्यारे होते हैं, यादगार होते हैं, जिन्हें हम ज़िन्दगी की किताब में संजो कर रख लिया करते हैं...
आज ईस्टर है... ईस्टर संडे, गुड फ़्राइडे के बाद आने वाले इतवार को मनाया जाता है... ईसाई मान्यता के मुताबिक़ सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद तीसरे दिन यीशु (ईसा मसीह) दोबारा ज़िन्दा हो गए थे... ईस्टर ख़ुशी का दिन होता है... इस त्यौहार को ज़िन्दगी में नये बदलाव के प्रतीक के तौर पर मनाए जाने की रिवायत है. यीशु के चाहने वाले गिरजाघर जाते हैं, अपने ईष्ट को याद करते हैं, प्रभु भोज में शामिल होते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं...
आप सभी को ईस्टर मुबारक हो...

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पापा की बरसी


ज़िन्दगी में कुछ वाक़ियात ऐसे हुआ करते हैं, जो इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं... पापा का जाना भी एक ऐसा ही वाक़िया है... कहते हैं कि किसी लड़की का किसी मर्द से पहला प्यार, उसके वालिद से ही होता है... बिल्कुल सच है... पापा से हमें कितनी मुहब्बत है, इसका अहसास पापा के जाने के बाद ही हुआ...
पापा को इस दुनिया से गए छह साल हो गए हैं, लेकिन ये कल ही की बात लगती है... उस दिन 8 जुमादा उल अव्वल 1432 हिजरी का पीर की रात थी... अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से 11 अप्रैल 2011 थी... आज पापा की बरसी है...
पापा की याद को समर्पित एक नज़्म...

पापा
आप बहुत याद आते हो...
मैं जानती हूं
अब आप इस दुनिया में नहीं हो
लेकिन
दिल हरगिज़ ये मानने को राज़ी नहीं
कि आप इस दुनिया से चले गए...

पापा
आप आज भी मुझमें ज़िन्दा हो
हर आहट पर लगता है
आप आओगे और पूछोगे
मेरी शहज़ादी कैसी है...

पापा
आपसे बिछड़ कर
आपकी शहज़ादी बहुत उदास रहती है
क्योंकि
आपकी तरह उसे चाहने वाला कोई नहीं

पापा
उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा
जब आपकी शहज़ादी आपके पास होगी
और
फिर हम हमेशा साथ रहेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन...


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पापा ! आप बहुत याद आते हो...


बचपन में सुना था... जब कोई मर जाता है, तो वह तारा बन जाता है... आसमान में चमकता हुआ एक सितारा... यह बात साईंस से परे की है... सिर्फ़ मानने या न मानने की... रात में जब भी आसमान को देखते हैं, तो लगता है कि पापा भी सितारा बन गए होंगे... आसमान में चमकते अनगिनत सितारों में किसी एक सितारे के रूप में पापा भी होंगे... जो हमें देख रहे होंगे... बस हमने भी एक सितारा तलाश लिया... वही सितारा, जो चमेली के पास बैठने पर आसमान में अपने सबसे क़रीब नज़र आता है... चम्पा के महकते फूलों के गुच्छे के ठीक ऊपर... अब यह हर रोज़ का शग़ल बन गया है... चमेली के पास चटाई बिछाकर बैठ जाना और आसमान में चमकते सितारे को देखना... ऐसा लगता है, जैसे पापा भी रोज़ रात को हमारे आने का इंतज़ार करते हैं...
वो भी अपने पापा से इतना ही प्यार करते हैं, क्या वो भी अपने पापा को इस तरह आसमान में सितारों के बीच तलाशते होंगे... कभी पूछेंगे उनसे...
पापा ! आप बहुत याद आते हो... मिस यू...
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उनकी आंखें...



कुछ लोग ज़िन्दगी का हासिल हुआ करते हैं... वो भी हमारे ज़िन्दगी का हासिल हैं... उनकी तस्वीर हमेशा हमारी डायरी में रहती है... जब भी मन उदास होता है...हम उस तस्वीर को देखते रहते हैं... घंटों ऐसे ही बीत जाते हैं, पता नहीं चलता कि कब दोपहर से शाम हुई और कब रात से सुबह हो गई. अपनी पूरी उम्र उस तस्वीर को देखते रह सकते हैं...
कितनी सच्ची हैं उनकी आंखें... कितनी मुहब्बत है उन आंखों में... पापा की आंखों में भी बहुत मुहब्बत थी... जब भी कोई दिल दुखाता है, तो दिल चाहता है कि पापा की गोद में सर रख कर बहुत रोयें... पर हम ऐसा नहीं कर सकते... क्योंकि पापा तो क़ब्र में सो रहे हैं... काश ! हम भी पापा की क़ब्र में जाकर उनके सीने पर सर रख कर कुछ देर सुकून से सो सकते... जिस तरह बचपन में सोया करते थे...
पापा के जाने के बाद उनकी आंखों में वो मुहब्बत देखी,  जिसके आगे दोनों जहां की हर शय छोटी मालूम होती है... इसलिए उनके साये में हमारी रूह सुकून पाती है...


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दुआ, उन्हें दें


सबसे प्यारी दुआ वो हुआ करती है, जो महबूब के लिए की जाए...महबूब को दी जाए...
जब कोई हमें लंबी उम्र की दुआ देता है, तो दिल चाहता है कि उससे कह दें-
हमारे अज़ीज़ ! हमें लंबी उम्र की दुआ मत दो, क्योंकि हमारे होने या न होने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा... फ़र्क़ पड़ेगा, तो सिर्फ़ हमारे घरवालों और कुछ अपनों को...
लंबी उम्र की दुआ देनी है, तो उसे दो, जिसके होने न होने से एक दुनिया को बहुत फ़र्क़ पड़ता है... बहुतों की उम्मीदें उससे वाबस्ता हैं...
कुछ लोगों को ख़ुदा ने इतनी ताक़त बख़्शी है कि वे करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं...

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इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...


मेरे महबूब !
मुझे हर उस शय से मुहब्बत है, जो तुम से वाबस्ता है... हमेशा से मुझे सफ़ेद रंग अच्छा लगता है... बाद में जाना कि ऐसा क्यों था...तुम्हें जब भी देखा सफ़ेद दूधिया लिबास में देखा... लोगों के हुजूम में तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे चांद ख़ुद ज़मीं पर उतर आया हो... सच तुम इस ज़मीं का चांद ही तो हो, जिससे मेरी ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...

जब तुम परदेस में होते हो तो अपना देस भी बेगाना लगने लगता है...हर पल तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहता है...कभी ऐसा भी होता है कि परदेस ही अपना-सा लगने लगता है, क्योंकि तुम वहां जो हो...सच मुहब्बत भी क्या शय है, जो ख़ुदा के क़रीब पहुंचा देती है... जबसे तुम्हारी परस्तिश की है, तब से ख़ुदा को पहचाना है... हर वक़्त तुम्हीं को क़रीब पाया है... सावन में जब आसमां पर काली घटाएं छा जातीं हैं और फिर बारिश की बूंदें प्यासी धरती की प्यास बुझाती हैं... जाड़ों में कोहरे से घिरी सुबह क्यारियों में महकते गुलाब फ़िज़ां में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेर देते हैं...और गर्मियों  की तपती दोपहरों में धूल भरी आंधियां चलती  और सुलगती रातों में भी हर सिम्त तुम ही तुम नज़र आते हो... ख़ामोश शामें भी अच्छी लगती हैं और चांद-सितारों से सजी रात की महफ़िलों का शोर-शराबा भी तुम्हारी याद दिलाता है...
तुम्हारे बग़ैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता...

ख़्वाजा मुहम्मद ख़ां ताहिर साहब ने सच ही तो कहा है-
फिर ज़ुलैख़ा न नींद भर सोई
जबसे यूसुफ़ को ख़्वाब में देखा...

मुझे वो सड़क भी बेहद अज़ीज़ है, जो तुम्हारे शहर तक जाती है...वैसे मैं जहां रहती हूं, वहां से कई सड़कें तुम्हारे शहर तक जाती हैं...पर आज तक यह नहीं समझ पाई कि मैं किस राह पर अपना क़दम रखूं कि तुम तक पहुंच जाऊं...लेकिन दिल को एक तसल्ली ज़रूर है कि इन अनजान राहों में इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...
-फ़िरदौस ख़ान

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मेरे मसीहा...

कुछ लोग घने नूरे-इलाही की मानिंद हुआ करते हैं... उनसे मिलकर ज़िन्दगी के अंधेरे छंट जाया करते हैं... हमारी ज़िन्दगी में भी एक ऐसी ही रूहानी हस्ती शरीक हुई है... उन्हें समर्पित एक नज़्म...

मेरे मसीहा...
मेरे अज़ीज़, मेरे मसीहा
सोचती हूं
तुम्हें किस किस तरह पुकारूं

मेरे मसीहा
तुम्हारी रफ़ाक़त के साये में
मेरी बेचैन रूह सुकून पाती है...

तुम्हारी गुफ़्तगू की ख़ुशबू से
दिलो-दिमाग़ महक उठते हैं...

तुम्हारी अक़ीदत के नूर से
मेरी ज़िन्दगी रौशन है...

तुम पर हमेशा
अल्लाह की रहमत बरसती रहे
और
अज़ल से अबद तक
मैं तुम्हारे ज़ेरे-साये में रहूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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फ़ासला रहे तुमसे...

फ़्रिरदौस ख़ान
गुज़श्ता वक़्त का वाक़िया है... हमारे घर एक ऐसे मेहमान को आना था, जिनका ताल्लुक़ रूहानी दुनिया से है... हम उनके आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे... जिस दिन उन्हें आना था, वह नहीं आए... हम रातभर सो न पाये... फिर अगले दिन भी सुबह से ही उनके आने का इंतज़ार कर रहे थे... ऐसा पहले भी कई मर्तबा हुआ कि हमने उनके आने का इंतज़ार किया, मगर वह नहीं आए... दिल उदास हो गया, क्योंकि वह आएंगे ही, इसका ऐतबार हमें कम था...
अम्मी ने हमारी हालत देखकर कहा- परेशान मत हो... तुम्हारे लिए वह ’एक’ हैं... लेकिन उनके लिए तुम जैसे ’हज़ारों’ होंगे...
हमारी अम्मी ने वाक़ई कितना सही कहा था...

हमें माज़ी का एक वाक़िया याद आ गया... हमारी मुलाक़ात एक ’बुज़ुर्ग’ से हुई... वह हमारे शहर में पहली मर्तबा आए थे... हमने बहुत से लोगों ने उनकी मुलाक़ात कराई... वे लोग उन्हें अपने घर बुलाने लगे... जैसे-जैसे उन लोगों से उनकी क़रीबी हुई, उन्होंने हमारे घर आना बंद कर दिया... एक रोज़ हमने उनसे कहा कि आप हमारे शहर में आते हैं और हमसे बिना मिले चले जाते हैं... इस पर उन्होंने ऐसा जवाब दिया, जिसकी उम्मीद हमें क़तई नहीं थी... उन्होंने कहा, इस शहर में मेरे और भी चाहने वाले हैं...

नये वाक़िये ने पुराने वाकि़ये को फिर से सामने लाकर खड़ा कर दिया... अब अहद कर लिया है कि जिसके ’हज़ारों’ चाहने वाले होंगे, उससे फ़ासले से ही मिला करेंगे...

शाज़ तमकनत ने क्या ख़ूब कहा है-
कोई गिला कोई शिकवा ज़रा रहे तुमसे
ये आरज़ू है कि इक सिलसिला रहे तुमसे...
हर एक शख़्स की होती है अपनी मजबूरी
मैं उस जगह हूं जहां फ़ासला रहे तुमसे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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इश्क़ का रंग

मेरे महबूब !
होली
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इन्द्रधनुषी रंगों में
तुम्हारे इश्क़ का रंग भी शामिल है...
-फ़िरदौस ख़ान
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होलिया में उड़े रे गुलाल...


फ़िरदौस ख़ान
मेरे महबूब !
होली
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इंद्रधनुषी रंगों में
तुम्हारे इश्क़ का रंग भी शामिल है...
हिन्दुस्तानी त्योहार हमें बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, क्योंकि ये त्योहार मौसम से जुड़े होते हैं, प्रकृति से जुड़े होते हैं. हर त्योहार का अपना ही रंग है, बिल्कुल मन को रंग देने वाला. बसंत पंचमी के बाद रंगों के त्योहार होली का उल्लास वातावरण को उमंग से भर देता है. होली से कई दिन पहले बाज़ारों, गलियों और हाटों में रंग, पिचकारियां सजने लगती हैं. छोटे क़स्बों और गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता है. महिलाएं कई दिन पहले से ही होलिका दहन के लिए भरभोलिए बनाने लगती हैं. भरभोलिए गाय के गोबर से बने उन उपलों को कहा जाता है, जिनके बीच में छेद होता है. इन भरभेलियों को मूंज की रस्सी में पिरोकर माला बनाई जाती है. हर माला में सात भरभोलिए होते हैं. इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाने के बाद होलिका दहन में डाल दिया जाता है. होली का सबसे पहला काम झंडा लगाना है. यह झंडा उस जगह लगाया जाता है, जहां होलिका दहन होना होता है. मर्द और बच्चों चैराहों पर लकड़िया इकट्ठी करते हैं. होलिका दहन के दिन दोपहर में विधिवत रूप से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है. महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए घरों में पकवानों का भोग लगाती हैं. रात में मुहूर्त के समय होलिका दहन किया जाता है. किसान गेहूं और चने की अपनी फ़सल की बालियों को इस आग में भूनते हैं. देर रात तक होली के गीत गाए जाते हैं और लोग नाचकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं.
होली के अगले दिन को फाग, दुलहंदी और धूलिवंदन आदि नामों से पुकारा जाता है. हर राज्य में इस दिन को अलग नाम से जाना जाता है. बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा कहते हैं. फगु का मतलब होता है, लाल रंग और पूरा चांद. पूर्णिमा का चांद पूरा ही होता है. हरित प्रदेश हरियाणा में इसे धुलैंडी कहा जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पल्लू में ईंट आदि बांधकर अपने देवरों को पीटती हैं. यह सब हंसी-मज़ाक़ का ही एक हिस्सा होता है. महाराष्ट्र में होली को रंगपंचमी और शिमगो के नाम से जाना जाता है. यहां के आम बाशिंदे जहां रंग खेलकर होली मनाते हैं, वहीं मछुआरे नाच के कार्यक्रमों का आयोजन कर शिमगो मनाते हैं. पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा की मूर्तियों का मनोहारी श्रृंगार कर शोभा यात्रा निकाली जाती है. शोभा यात्रा में शामिल लोग नाचते-गाते और रंग उड़ाते चलते हैं. तमिलनाडु में होली को कामान पंडिगई के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन कामदेव की पूजा की जाती है. किवदंती है कि शिवजी के क्रोध के कारण कामदेव जलकर भस्म हो गए थे और उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें दोबारा जीवनदान मिला.
इस दिन सुबह से ही लोग रंगों से खेलना शुरू कर देते हैं. बच्चे-बड़े सब अपनी-अपनी टोलियां बनाकर निकल पड़ते हैं. ये टोलियां नाचते-गाते रंग उड़ाते चलती हैं. रास्ते जो मिल जाए, उसे रंग से सराबोर कर दिया जाता है. महिलाएं भी अपने आस पड़ोस की महिलाओं के साथ इस दिन का भरपूर लुत्फ़ उठाती हैं. इस दिन दही की मटकियां ऊंचाई पर लटका दी जाती हैं और मटकी तोड़ने वाले को आकर्षक इनाम दिया जाता है. इसलिए युवक इसमें बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं.
रंग का यह कार्यक्रम सिर्फ़ दोपहर तक ही चलता है. रंग खेलने के बाद लोग नहाते हैं और भोजन आदि के बाद कुछ देर विश्राम करने के बाद शाम को फिर से निकल पड़ते हैं. मगर अब कार्यक्रम होता है, गाने-बजाने का और प्रीति भोज का. अब तो होली से पहले ही स्कूल, कॊलेजों व अन्य संस्थानों में होली के उपलक्ष्य में समारोहों का आयोजन किया जाता है. होली के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें खीर, पूरी और गुझिया शामिल है. गुझिया होली का ख़ास पकवान है. पेय में ठंडाई और भांग का विशेष स्थान है.
होली एक ऐसा त्योहार है, जिसने मुग़ल शासकों को भी प्रभावित किया. अकबर और जहांगीर भी होली खेलते थे. शाहजहां के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-ए-पाशी के नाम से पुकारा जाता था. पानी की बौछार को आब-ए-पाशी कहते हैं. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी होली मनाते थे. इस दिन मंत्री बादशाह को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं देते थे. पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक सफ़रनामे मे होली का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया है. हिन्दू साहित्यकारों ही नहीं मुस्लिम सूफ़ियों ने भी होली को लेकर अनेक कालजयी रचनाएं रची हैं. अमीर ख़ुसरो साहब कहते हैं-
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब ऐ इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे...
होली के दिन कुछ लोग पक्के रंगों का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसके कारण जहां उसे हटाने में कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है, वहीं इससे एलर्जी होने का ख़तरा भी बना रहता है. हम और हमारे सभी परिचित हर्बल रंगों से ही होली खेलते हैं. इन चटक़ रंगों में गुलाबों की महक भी शामिल होती है. इन दिनों पलाश खिले हैं. इस बार भी इनके फूलों के रंग से ही होली खेलने का मन है.

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बारिश

आज मौसम बहुत ख़ुशगवार है... बिल्कुल चम्पई उजाले और सरमई अंधेरे वाले दिन... आसमान पे छाई काली घनघोर घटायें... और बरसता-भीगता मौसम माहौल को रूमानी बना रहा है...
गुज़श्ता वक़्त में ऐसे ही सुहाने मौसम में लिखी एक नज़्म का एक शेअर पेश है...
बारिश में भीगती है कभी उसकी याद तो
इक आग-सी हवा में लगाती हैं बारिशें...
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साहिर लुधियानवी हर पल के शायर थे...

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फ़िरदौस ख़ान
लफ़्ज़ों के जादूगर और हर दिल अज़ीज़ शायर साहिर का असली नाम अब्दुल हयी साहिर था, लेकिन उन्होंने इसे बदल कर साहिर लुधियानवी रख लिया था. उनका जन्म 8 मार्च, 1921 में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था. उनके पिता बेहद अमीर थे. घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, लेकिन माता-पिता के अलगाव के बाद वह अपनी मां के साथ रहे और इस दौरान उन्हें ग़ुरबत में दिन गुज़ारने पड़े. उन्होंने लुधियाना के ख़ालसा हाईस्कूल से दसवीं की. गवर्नमेंट कॉलेज से 1939 में उन्हें निकाल दिया गया था. बाद में इसी कॉलेज में वह मुख्य अतिथि बनकर आए थे. यहां से संबंधित उनकी नज़्म बहुत मशहूर हुई-
इस सर ज़मीन पे आज हम इक बार ही सही
दुनिया हमारे नाम से बेज़ार ही सही
लेकिन हम इन फ़िज़ाओं के पाले हुए तो हैं
गर यहां नहीं तो यहां से निकाले हुए तो हैं...

1943 में वह लाहौर आ गए और उसी साल उन्होंने अपना पहला कविता संग्रह तलखियां शाया कराया, जो बेहद लोकप्रिय हुआ और उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई. इसके बाद 1945 में वह प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार लाहौर के संपादक बन गए. बाद में वह द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी संपादक बने. इस पत्रिका में उनकी एक नज़्म को पाकिस्तान सरकार ने अपने ख़िलाफ़ बग़ावत मानते हुए उनके विरुद्ध वारंट जारी कर दिया. 1949 में उन्होंने लाहौर छोड़ दिया और दिल्ली आ गए. यहां उनका दिल नहीं लगा और वह मुंबई चले आए. वहां वह उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के संपादक बने. इसी साल उन्होंने फ़िल्म आज़ादी की राह के लिए गीत लिखे. संगीतकार सचिन देव बर्मन की फ़िल्म नौजवान के गीत ठंडी हवाएं लहरा के आएं…ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई. इसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने सचिन देव बर्मन के अलावा, एन दत्ता, शंकर जयकिशन और ख़य्याम जैसे संगीतकारों के साथ काम किया. साहिर एक रूमानी शायर थे. उन्होंने ज़िंदगी में कई बार मुहब्बत की, लेकिन उनका इश्क़ कभी परवान नहीं चढ़ पाया. वह अविवाहित रहे. कहा जाता है कि एक गायिका ने फ़िल्मों में काम पाने के लिए साहिर से नज़दीकियां बढ़ाईं और बाद में उनसे किनारा कर लिया. इसी दौर में साहिर ने एक ख़ूबसूरत नज़्म लिखी-
चलो इक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों
चलो इक बार फिर से…
न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूं दिलनवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से
चलो इक बार फिर से…

साहिर ने फ़िल्मी दुनिया में भी अपनी शायरी का कमाल दिखाया. उनके गीतों और नज़्मों का जादू सिर चढ़कर बोलता था. उनका नाम जिस फ़िल्म से जु़ड जाता था, उसमें वह सर्वोपरि होते थे. वह किसी के सामने नहीं झुकते थे, चाहे वह लता मंगेशकर हों या फिर सचिन देव बर्मन. वह संगीतकार से ज़्यादा मेहनताना लेते थे और ताउम्र उन्होंने इसी शर्त पर फ़िल्मों में गीत लिखे. हर दिल अज़ीज़ इस शायर ने कभी घुटने नहीं टेके, न शायरी में और न सिनेमा में. उनकी आन-बान-शान किसी फ़िल्मी सितारे से कम न थी. उन्हें भी फ़िल्मी सितारों की तरह चमचमाती महंगी गाड़ियों का शौक़ था. अपनी फ़ितरत की वजह से वह आलोचनाओं का भी शिकार रहे. वह अपने गीत को समूची फ़िल्म कृति से भारी समझते थे और इस बात को वह डंके की चोट पर कहते भी थे. यश चोपड़ा की फ़िल्म कभी-कभी के गीतों को याद कीजिए. फ़िल्म की शुरुआत में ही साहिर के दो गीत रखे गए, जो बेहद लोकप्रिय हुए-
कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है
कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए
तू अबसे पहले सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिए…

मैं पल दो पल का शायर हूं
पल दो पल मेरी जवानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है
पल दो पल मेरी कहानी है…

साहिर सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी सिद्धांतवादी थे. वह लाहौर में साहिर साक़ी नामक एक मासिक उर्दू पत्रिका निकालते थे. पत्रिका घाटे में चल रही थी. साहिर की हमेशा यह कोशिश रहती थी कि कम ही क्यों न हो, लेकिन लेखक को उसका मेहनताना ज़रूर दिया जाए. एक बार वह ग़ज़लकार शमा लाहौरी को वक़्त पर पैसे नहीं भेज सके. शमा लाहौरी को पैसों की सख्त ज़रूरत थी. वह ठंड में कांपते हुए साहिर के घर पहुंच गए. साहिर ने उन्हें चाय बनाकर पिलाई. इसके बाद उन्होंने खूंटी पर टंगा अपना महंगा कोट उतारा और उन्हें सौंपते हुए कहा, मेरे भाई, बुरा न मानना, लेकिन इस बार नक़द के बदले जिंस में मेहनताना क़ुबूल कर लो. ऐसे थे साहिर. 25 अक्टूबर, 1980 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया, लेकिन अपनी शायरी की बदौलत वह गीतों में आज भी ज़िंदा हैं. उनकी महान रचनाओं ने उन्हें अमर कर दिया है. रहती दुनिया तक लोग उनके गीत गुनगुनाते रहेंगे. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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लड़कियां...


लड़कियां
डरी-सहमी लड़कियां
चाहकर भी
मुहब्बत की राह पर
क़दम नहीं रख पातीं
क्योंकि
वो डरती हैं
उन नज़रों से
जो हमेशा
उन्हें घूरा करती हैं
उनके हंसने-मुस्कराने
की वजहें पूछी जाती हैं
उनके चहकने पर
तानें कसे जाते हैं
उनके देर तक जागने पर
सवालों के तीर छोड़े जाते हैं...

लड़कियां
मजबूर और बेबस लड़कियां
चाहकर भी
अपनी मुहब्बत का
इक़रार नहीं कर पातीं
क्योंकि
वो डरती हैं
कहीं कोई उनकी आंखों में
महकते ख़्वाब न देख ले
कहीं कोई उनकी तेज़ होती
धड़कनें न सुन ले
कहीं कोई उनके चेहरे से
महबूब का नाम न पढ़ ले

सच
कितनी बेबस होती हैं
ये लड़कियां...
-फ़िरदौस ख़ान
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तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ

फ़िरदौस ख़ान
फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के वह शायर हैं, जो जंगे-आज़ादी से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक से जुडे रहे. उनकी ज़ाती ज़िंदगी बेहद कड़वाहटों से भरी हुई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपने कलाम को इश्क़ के रंगों से सजाया. वह कहते हैं-
तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ
इस एक चिराग़ से कितने चिराग़ जल उठे फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनका असली नाम रघुपति सहाय था, लेकिन उन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी नाम से लेखन किया. उन्होंने एमए किया और आईसीएस में चुने गए. 1920 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी स्वराज आंदोलन में शामिल हो गए. वह डेढ़ साल तक जेल में भी रहे और यहां से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू के कहने पर अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ़्तर में अवर सचिव बना दिए गए. नेहरू के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और 1930 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बन गए. उन्होंने 1959 तक यहां अध्यापन कार्य किया.

फ़िराक़ गोरखपुरी को 1968 में पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. अगले साल 1969 में उन्हें साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया. फिर 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी का मनोनीत सदस्य नियुक्त किया गया. 1981 में उन्हें ग़ालिब अकादमी अवॉर्ड दिया गया. उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग़मा, गुले-राना, मशाल, रूहे-कायनात, रूप, शबिस्तां, सरगम, बज़्मे-ज़िंदगी रंगे-शायरी, धरती की करवट, गुलबाग़, रम्ज़ कायनात, चिराग़ां, शोला व साज़, हज़ार दास्तान, और उर्दू की इश्क़िया शायरी शामिल हैं. उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियां भी लिखीं. उनकी उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुईं.

आम तौर पर ख़्याल किया जाता है कि फ़नकार को ऐसी बुनियाद और कमज़ोर हालात से बेनियाज़ होना चाहिए. ग़ालिब ज़िंदगी भर परेशान रहे, अपनी बीवी की शिकायत करते रहे. अपनी तमाम मुस्कराहटों के साथ जीवन पद्धति निभाते रहे. इसलिए मुश्किलें आसान लगने लगीं. मंटों ने तो हंस-हंस कर जीना सीखा था. ज़िंदगी की सारी तल्ख़ियां अपनी हंसी में पी गया और भी अच्छे फ़नकारों ने कुछ ऐसे ही जिया होगा.

29 जून, 1914 को उनका विवाह ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी हुआ, लेकिन वह पत्नी को पसंद नहीं करते थे. इसका उनकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी, एक साहब ने मेरी शादी एक ऐसे ख़ानदान और एक ऐसी लड़की से कर दी कि मेरी ज़िंदगी एक नाक़ाबिले-बर्दाश्त अज़ाब बन गई. पूरे एक साल तक मुझे नींद न आई. उम्र भर मैं इस मुसीबत को भूल नहीं सका. आज तक मैं इस बात के लिए तरस गया कि मैं किसी को अपना कहूं ओर कोई मुझे अपना समझे.

फ़िराक़ के इश्क़ और मोहब्बत के चर्चे आम रहे. वह इस क़िस्म की शौहरत चाहते भी थे. कभी-कभी ख़ुद भी क़िस्सा बना लिया करते थे, ताकि ज़माना उन्हें एक आदर्श आशिक़ समझे. वह ख़ुद लिखते हैं-इन तकली़फ़देह और दुख भरे हालात में मैंने शायरी की ओर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी आवाज़ को पाने लगा. अब जब शायरी शुरू की तो मेरी कोशिश यह हुई कि अपनी नाकामियों और आने ज़ख्मी ख़ुलूस के लिए अशआर के मरहम तैयार करूं. मेरी ज़िंदगी जितनी तल्ख़ हो चुकी थी, उतने ही पुरसुकून और हयात अफ़ज़ा अशआर कहना चाहता था. फ़िराक़ का ख़्याल है कि इस उलझन, द्वंद्व और टकराव से बाहर निकलने में सिर्फ़ एक भावना काम करती है और वह है इश्क़.

इश्क़ अपनी राह ले तो दिल क्या पूरी दुनिया जीत सकता है, बस इन दर्जों और हालात के ज्ञान की ज़रूरत हुआ करती है. फ़िराक़ का इश्क़, इस दर्जे का इश्क़ न सही जहां ख़ुदा और बंदे का फ़र्क़ उठ जाया करता है. फ़िराक़ का वह रास्ता न था. वह भक्ति और ईश्वर प्रेम की दुनिया के आदमी न थे. वह शमा में जलकर भस्म हो जाने पर यक़ीन भी नहीं रखते थे, बल्कि वह उस दुनिया के आशिक़ थे, जहां इंसान बसते हैं और उनका ख़्याल है कि इंसान का इंसान से इश्क़ ज़िंदगी और दुनिया से इश्क़ की बुनियाद जिंस (शारीरिक संबंध) है. किसी से जुनून की हद तक प्यार, ऐसा प्यार जो हड्डी तक को पिघला दे, जो दिलो-दिमाग़ में सितारों की चमक, जलन और पिघलन भर दे. फिर कोई भी फ़लसफ़ा हो, फ़लसफ़ा-ए-इश्क़ से आगे उसकी चमक हल्की रहती है. हर फ़लसफ़ा इसी परिपेक्ष्य, इसी पृष्ठभूमि को तलाश करता रहता है. फ़िराक़ ने जब होश व हवास की आंखें खोलीं दाग़ और अमीर मीनाई का चिराग़ गुल हो रहा था. स़िर्फ उर्दू शायरी में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक नई बिसात बिछ रही थी. क़ौमी ज़िंदगी एक नए रंग रूप से दो चार थी. समाजवाद का बोलबाला था. वह समाजवाद से प्रभावित हुए. प्रगतिशील आंदोलन से जु़डे. वह स्वीकार करते हैं इश्तेराकी फ़लसफ़े ने मेरे इश्क़िया शायरी और मेरी इश्क़िया शायरी को नई वुस्अतें (विस्तार) और नई मानवियत (अर्थ) अता की.
अब उनकी शायरी में बदलाव देखने को मिला. बानगी देखिए-

तेरा फ़िराक़ तो उस दम तेरा फ़िराक़ हुआ
जब उनको प्यार किया मैंने जिनसे प्यार नहीं

फ़िराक़ एक हुए जाते हैं ज़मानों मकां
तलाशे दोस्त में मैं भी कहां निकल आया

तुझी से रौनक़े-बज़्मे-हयात है ऐ दोस्त
तुझी से अंजुमने-महर व माह है रौशन

ज़िदगी को भी मुंह दिखाना है
रो चुके तेरे बेक़रार बहुत

हासिले हुस्नो-इश्क़ बस है यही
आदमी आदमी को पहचाने

इस दश्त को नग़मों से गुलज़ार बना जाएं
जिस राह से हम गुज़रें कुछ फूल खिला जाएं

अजब क्या कुछ दिनों के बाद ये दुनिया भी दुनिया हो
ये क्या कम है मुहब्बत को मुहब्बत कर दिया मैंने

क्या है सैर गहे ज़िंदगी में रुख़ जिस सिम्त
तेरे ख़्याल टकरा के रह गया हूं मैं

फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे- शायरी उस हैजान (अशांति) का नाम है, जिसमें सुकून के सिफ़ात (विशेषता) पाए जाएं. सुकून से उनका मतलब रक़्स की हरकतों में संगीत के उतार-च़ढाव से है.उनके कुछ अशआर देखिए-
रफ़्ता-रफ़्ता इश्क़ मानूसे-जहां होता गया
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम

मेहरबानी को मुहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह अब मुझसे तेरी रंजिशें बेजा भी नहीं

बहुत दिनों में मुहब्बत को यह हुआ मालूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वह रात, रात हुई

इश्क़ की आग है वह आतिशे-सोज़ फ़िराक़
कि जला भी न सकूं और बुझा भी न सकूं

मुहब्बत ही नहीं जिसमें वह क्या दरसे-अमल देगा
मुहब्बत तर्क कर देना भी आशिक़ ही को आता है

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

तेरी निगाहों से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया है रगे जां में नश्तर फिर भी

फ़िराक़ गोरखपुरी का देहांत 3 मार्च, 1982 को नई दिल्ली में हुआ. बेशक वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जनमानस को अपनी शायरी के ज़रिये ज़िंदगी की दुश्वारियों में भी मुस्कुराते रहने का जो पैग़ाम दिया, वह हमेशा मायूस लोगों की रहनुमाई करता रहेगा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी-
अब तुमसे रुख़्सत होता हू, आओ संभालो साज़े-ग़ज़ल
नये तराने छेड़ो, मेरे नग़मों को नींद आती है...
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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ज़िन्दगी की हथेली पर मौत की लकीरें हैं...


मेरे महबूब !
तुमको पाना
और
खो देना
ज़िन्दगी के दो मौसम हैं

बिल्कुल
प्यास और समन्दर की तरह
या शायद
ज़िन्दगी और मौत की तरह

लेकिन
अज़ल से अबद तक
यही रिवायत है-
ज़िन्दगी की हथेली पर
मौत की लकीरें हैं...
और
सतरंगी ख़्वाबों की
स्याह ताबीरें हैं

मेरे महबूब !
तुमको पाना
और
खो देना
ज़िन्दगी के दो मौसम हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ
अज़ल - आदि
अबद - अंत
स्याह - काला
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दहकते पलाश का मौसम...


हर मौसम की अपनी ख़ूबसूरती हुआ करती है... इस मौसम की रौनक़ पलाश के सुर्ख़ फूल है... इस दिल फ़रेब मौसम पर एक नज़्म पेश है...
नज़्म
मेरे महबूब !
ये दहकते पलाश का मौसम है
क्यारियों में
सुर्ख़ गुलाब महक रहे हैं
बर्फ़ीले पहाड़ों के लम्स से
बहकी सर्द हवायें
मुहब्बत के गीत गाती हैं
बनफ़शी सुबहें
कोहरे की चादर लपेटे हैं
अलसाई दोपहरें
गुनगुनी धूप सी खिली हैं
और
गुलाबी शामें
तुम्हारे मुहब्बत से भीगे पैग़ाम लाती हैं
लेकिन
तुम न जाने कब आओगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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हश्र


हमारी नज़्म ’हश्र’ उन ’अमन पसंदों’ के नाम, जिन्होंने दुनिया को दोज़ख़ बनाकर रख दिया है...
अमन पसंदो !
तुम अपने मज़हब के नाम पर
क़त्ल करते हो मर्दों को
बरहना करते हो औरतों को
और
मौत के हवाले कर देते हो
मासूम बच्चों को
क्योंकि
तुम मानते हो
ऐसा करके तुम्हें जन्नत मिल जाएगी
जन्नती शराब मिल जाएगी
हूरें मिल जाएंगी...

लेकिन-
क़यामत के दिन
मैदाने-हश्र में
जब तुम्हें आमाल नामे सौंपे जाएंगे
तुम्हारे हर छोटे-बड़े आमाल
तुम्हें दिखाए जाएंगे
तुम्हारे आमाल में शामिल होंगी
उन मर्दों की चीख़ें
जिन्हें तुमने क़त्ल किया
उन औरतें की बददुआएं
जिन्हें तुमने बरहना किया
और
उन मासूमों की आहें
जिन्हें तुमने मौत की नींद सुला दिया...

कभी सोचा है
उस वक़्त
तुम्हारा क्या हश्र होगा...
-फ़िरदौस ख़ान

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प्रिया राजवंश : परी कथा सी ज़िंदगी

फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरत और मिलनसार प्रिया राजवंश की ज़िंदगी की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है. पहाड़ों की ख़ूबसूरती के बीच पली-बढ़ी एक लड़की कैसे लंदन पहुंचती है और फिर वापस हिंदुस्तान आकर फ़िल्मों में नायिका बन जाती है. एक ऐसी नायिका जिसने फ़िल्में तो बहुत कम कीं, इतनी कम कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है, लेकिन अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ और दिलकश आवाज़ से उसने सबका दिल जीत लिया.

प्रिया राजवंश का जन्म 1937 में नैसर्गिक सौंदर्य के शहर शिमला में हुआ था. उनका बचपन का नाम वीरा था. उनके पिता सुंदर सिंह वन विभाग में कंजरवेटर थे. प्रिया राजवंश ने शिमला में ही पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने कई अंग्रेज़ी नाटकों में हिस्सा लिया. जब उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से ब्रिटेन गए, तो प्रिया राजवंश ने लंदन की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाख़िला ले लिया. सौभाग्य से उन्हें फ़िल्मों में भी काम करने का मौक़ा मिल गया. हुआ यूं कि लंदन के एक फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींची. चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर यह तस्वीर देखी तो वह प्रिया राजवंश की ख़ूबसूरती के क़ायल हो गए. उन दिनों चेतन आनंद को अपनी फ़िल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी. 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने देश पर हमला कर दिया था. हिंदुस्तानी फ़ौज को भारी नुक़सान हुआ था और फ़ौज को पीछे हटना पड़ा. इस थीम पर चेतन आनंद हक़ीक़त नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने प्रिया राजवंश से संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के लिए चुन लिया गया. 1964 में बनी इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान प्रिया राजवंश ने चेतन आनंद की हर स्तर पर मदद की. संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन, निर्देशन, अभिनय और संपादन तक में उनका दख़ल रहा. चेतन आनंद उन दिनों अपनी पत्नी उमा से अलग हो चुके थे. इसी दौरान प्रिया राजवंश और चेतन आनंद एक दूसरे के क़रीब आ गए और फिर ज़िंदगी भर साथ रहे. प्रिया राजवंश उम्र में चेतन आनंद से तक़रीबन 22 साल छोटी थीं, लेकिन उम्र का फ़ासला उनके बीच कभी नहीं आया.

प्रिया राजवंश ने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया. फ़िल्म हक़ीक़त के बाद 1970 में उनकी फ़िल्म हीर रांझा आई. 1973 में हिंदुस्तान की क़सम और हंसते ज़ख्म, 1977 में साहेब बहादुर, 1981 में क़ुदरत और 1985 में हाथों की लकीरें आई. प्रिया राजवंश ने सिर्फ़ चेतन आनंद की फ़िल्मों में ही काम किया और चेतन ने भी हक़ीक़त के बाद प्रिया राजवंश को ही अपनी हर फ़िल्म में नायिका बनाया. उन्हें फ़िल्मों के बहुत से प्रस्ताव मिलते थे, लेकिन वह इंकार कर देती थीं. उनकी खुशी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ चेतन आनंद के साथ थी. हालांकि दोनों ने विवाह नहीं किया था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में उन्हें पति-पत्नी ही माना जाता था. चेतन आनंद के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में वह बहुत सुखी थीं. कहा जाता है कि हीर रांझा प्रिया राजवंश को केंद्र में रखकर ही बनाई गई थी. इस फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि इसके सारे संवाद पद्य यानी काव्य रूप में हैं, जिन्हें कैफ़ी आज़मी ने लिखा था. इसे काव्य फ़िल्म कहना ग़लत न होगा. इसके गीत भी कैफ़ी आज़मी ने ही लिखे थे. प्रिया राजवंश पर फ़िल्माया गया गीत-मिलो न तुम तो, हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है…बहुत मशहूर हुआ. इसी तरह फ़िल्म हंसते जख्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा और मदन मोहन के संगीत से सजा गीत-बेताब दिल की तमन्ना यही है…आज भी लोग गुनगुना उठते हैं.

अंग्रेज़ी के लेखक आरके नारायण के उपन्यास गाइड पर आधारित फ़िल्म गाइड बनाने के वक़्त पहला विवाद नायिका को लेकर ही हुआ था. देव आनंद माला सिन्हा को नायिका रोज़ी की भूमिका के लिए लेना चाहते थे, लेकिन चेतन की पसंद प्रिया राजवंश थीं. विजय आनंद का मानना था कि रोज़ी की भूमिका वहीदा रहमान से बेहतर कोई और अभिनेत्री नहीं निभा सकती, लेकिन वहीदा रहमान राज खोसला के साथ काम नहीं करती थीं. दरअसल, हुआ यह था कि देव आनंद गाइड के निर्देशन के लिए पहले ही राज खोसला से बात कर चुके थे. अब उन्हें राज खोसला और वहीदा रहमान में से किसी एक को चुनना था. चेतन आनंद और विजय आनंद ने वहीदा का समर्थन किया और फिर चेतन आनंद की सलाह पर निर्देशन की ज़िम्मेदारी विजय आनंद को सौंप दी गई. वहीदा रहमान ने कमाल का अभिनय किया और फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुई.

प्रिया राजवंश की ज़िंदगी में अकेलापन और परेशानियां उस वक़्त आईं, जब 6 फ़रवरी, 1997 को चेतन आनंद का देहांत हो गया. प्रिया राजवंश अकेली रह गईं. वह जिस बंगले में रहती थीं, उसकी क़ीमत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. चेतन के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद प्रिया राजवंश को इस बंगले से निकाल देना चाहते थे, लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी के साथ मिलकर 27 मार्च, 2000 को प्रिया राजवंश का बेहरहमी से क़त्ल कर दिया. मुंबई की एक अदालत ने प्रिया राजवंश हत्याकांड में 31 जुलाई, 2002 को केतन आनंद और विवेक आनंद तथा उनके सहयोगियों नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.

कुछ अरसा पहले चेतन आनंद की ज़िंदगी पर आधारित उनकी पत्नी उमा और बेटे केतन आनंद की एक किताब आई थी. इस किताब में ज़िंदगीभर चेतन आनंद के साथ रहने वाली प्रिया राजवंश का ज़िक्र नहीं के बराबर है. दरअसल, चेतन आनंद ने अपने लिए अलग एक बंगला बनवाया था, जिसमें वह प्रिया राजवंश के साथ रहा करते थे. यही बंगला बाद में प्रिया राजवंश की मौत की वजह बना यानी एक बंगले के लालच ने प्रिया राजवंश से उनकी ज़िंदगी छीन ली. वह अपने घर में मृत पाई गई थीं. उनके हत्यारों को तो अदालत ने सज़ा दे दी, लेकिन उनके प्रशंसक शायद ही उनके क़ातिलों को कभी मा़फ़ कर पाएं. अपनी फ़िल्मों की बदौलत वह हमेशा हमारे बीच रहेंगी, मुस्कराती और चहकती हुई. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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दोस्ती...रफ़ाक़त...एक अनछुआ अहसास है...


दोस्ती...रफ़ाक़त...एक अनछुआ अहसास है...रफ़ाक़त का यह जज़्बा, हवा के उस झोंके की मानिंद नहीं, जो खुली, महकी ज़ुल्फ़ों से एक पल के लिए अठखेलियां करता गुज़र जाए...किसी अनजान दिशा में...बल्कि यह तो वो दायिमी अहसास है जो रूह की गहराई में उतर जाता है...हमेशा के लिए...फिर यही अहसास आंखों में समाकर मुसर्रत और होंठों पर आकर दुआ बन जाता है...दोस्ती को किसी दायरे में क़ैद नहीं किया जा सकता...यह अहसास ओस की कोई बूंद नहीं जो ज़रा-सी गर्मी से फ़ना हो जाए...यह तो वो अहसास है जो नीले आसमान की तरह वसीह और समन्दर की मानिंद गहरा है...
फ्रांसिस बेकन ने बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में दोस्ती के इस जज़्बे को बयान किया है... वे कहते हैं...
A man cannot speak to his son but as a father; to his wife but as a husband; to his enemy but upon terms: whereas a friend may speak as the case requires, and not as it sorteth with the person. But to enumerate these things were endless; I have given the rule, where a man cannot fitly play his own part; if he have not a friend, he may quit the stage.
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अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं


हमारे दोस्तों में अमूमन सभी तरह के लोग हैं... आस्तिक हैं, नास्तिक भी हैं... ईसाई भी हैं, मुस्लिम भी हैं, हिन्दू भी हैं, सिख भी हैं...
संघी भी हैं, जमाती भी हैं. कम्युनिस्ट भी हैं, कांग्रेसी भी हैं, समाजवादी भी हैं...
शाकाहारी भी हैं, मांसाहारी भी हैं... ऐसे लोग भी हैं, जो शराब तो क्या सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते. ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें शाराब न मिले, तो नींद नहीं आती...
सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे दोस्तों में ऐसा कोई नहीं है, जो जबरन सामने वाले से अपनी बात मनवाने की कोशिश करे, और उसकी बात न मानने पर दोस्ती ख़त्म कर दे...
हमारे आपस में मतभेद हो सकते हैं, हुए भी हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं हुआ... यही सबसे ख़ुशनुमा बात है... हमें अपने दोस्तों पर नाज़ है... अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं... हैं न...

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ख़ुशी


फ़िरदौस ख़ान
कभी-कभार इंसान बहुत ख़ुश होता है... इतना ख़ुश कि उसे लगता है, सारी कायनात ख़ुशी से झूम रही है... वो अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करना चाहता है, सबको बता देना चाहता है कि आज वो बहुत ख़ुश है... उसे वो ख़ुशी मिली है, जिसका वो तसव्वुर भी नहीं कर सकता था... उसे वो ख़ुशी मिली है, जिसे पाना उसके लिए नामुमकिन था... लेकिन ख़ुदा के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है... ख़ुदा इंसान के लिए नामुमकिन को भी मुमकिन कर देता है... ऐसे में दिल चाहता है कि जी भर कर अपने ख़ुदा का शुक्र अदा करें, और सजदे में ही पड़े रहें...
बस, एक ऐसी ख़ुशी ज़िन्दगी को मुकम्मल कर दिया करती है...

अगर देखी जहां में तो नबूवत आपकी देखी
करम देखा, अमल देखा, मिसाले-ज़िन्दगी देखी
न हो मायूस पंछी, इक ज़ियारत यूं भी होती है
उसी को देख जिसने मदीने की गली देखी...

(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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सूफ़ियाना बसंत पंचमी...

फ़िरदौस ख़ान
सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है... हमारे पीर की ख़ानकाह में बसंत पंचमी मनाई गई... बसंत का साफ़ा बांधे मुरीदों ने बसंत के गीत गाए... हमने भी अपने पीर को मुबारकबाद दी...

बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं... क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं...
कहा जाता है कि यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी... हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) को अपने भांजे सैयद नूह की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने पीर की ये हालत देखी न गई... वह उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे... एक बार हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे... उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास हिन्दू श्रद्धालु नाच-गा रहे हैं... ये देखकर हज़रत अमीर ख़ुसरो को बहुत अच्छा लगा... उन्होंने इस बारे में मालूमात की कि तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए...
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वह भी अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे... फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुच्छे बनाए और नाचते-गाते हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) के पास पहुंच गए... अपने मुरीद को इस तरह देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई... तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो बसंत पंचमी मनाने लगे...

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ऋतु बसंत की मादक बेला, तुझ बिन सूनी ओ हरजाई



आज बसंत पंचमी है... इस मौसम से बहुत-सी यादें वाबस्ता हैं... जैसे आज के दिन पीले कपड़े पहनना...कवि सम्मलेन आयोजित करना...और सभी से ग़ुज़ारिश करना कि वे पीले कपड़े पहनकर आएं... सभी साथी कई रोज़ पहले से ही बसंत पंचमी के लिए पीले कपड़े ख़रीदने और सिलवाने शुरू कर देते थे... हमारा एक ग्रुप हुआ करता था... सभी पत्रकार थे... उनमें कुछ कवि और कुछ साहित्य प्रेमी थे... सब दूर-दूर शहरों में जा बसे हैं...
बहरहाल, आप सभी को बसंत पंचमी की तहे-दिल से मुबारकबाद...

गीत
ऋतु बसंत की मादक बेला
तुझ बिन सूनी ओ हरजाई
मन का दर्पण बिखरा-बिखरा
जैसे अम्बर की तन्हाई...

कंगन, पायल, झूमर, झांझर
सांझ सुहानी, नदी किनारा
आकुल, आतुर, विरह-व्यथित मन
पंथ प्रिय का देख के हारा
कल की यादें बांह में ले के
मुझको सता रही अमराई...

क्षण, रैना, दिन सब ही बीते
बीत गईं कितनी सदियां
नयन मिलन की आस लिए हैं
ले भूली-बिसरी सुधियां
अंग-अंग जल उठे विरह में
ऐसी मंद चली पुरवाई...
-फ़िरदौस ख़ान

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मुतासिर...

इंसान कभी भी, किसी से भी मुतासिर हो सकता है... कोई एक शख़्स होता है, जिसकी शख़्सियत ऐसी हुआ करती है कि वह किसी के भी दिलो-दिमाग़ पर छा जाता है... लाख कोशिश करने पर भी ज़ेहन ख़ुद को उससे जुदा नहीं कर पाता... किसी शख़्स की कोई एक बात ही तो हुआ करती है, जिसकी वजह से वह हमारे वजूद पर इस क़द्र छा जाता है कि उसके सिवा कुछ और नज़र ही नहीं आता... कब वह हमारे ख़्वाबों में आने लगता है... कब उसका नाम कलमे की तरह हमारी ज़बान पर चढ़ जाता है, कब उसकी तस्वीर हमारी आंखों में बस जाती है, हमें पता ही नहीं चलता... शयद कुछ चीज़ें हमारे अपने अख़्तियार में नहीं हुआ करतीं...

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कुछ चेहरे

कुछ चेहरे ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें देखकर इंसान ख़ुद को भूल जाता है... हवासों पर बेख़ुदी तारी हो जाती है... दिल सजदे में झुक जाता है... शायद यही लम्हे हुआ करते हैं, जब बंदा अपने ख़ुदा के और भी क़रीब हो जाता है...
इंदीवर साहब ने क्या ख़ूब लिखा है-
अपना रूप दिखाने को तेरे रूप मे खुद ईश्वर होगा...
तुझे देख कर जग वाले पर यक़ीन नहीं क्यूं कर होगा
जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा...
(Firdaus Diary)
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तेरी एक भी सांस किसी और सांस में समाई तो...

कुछ अरसा पहले पंजाबी की एक नज़्म पढ़ी थी... जिसका एक-एक लफ़्ज़ दिल की गहराइयों में उतर गया... पेश है नज़्म का हिन्दी अनुवाद :

तेरी एक भी बूंद
कहीं और बरसी तो
मेरा बसंत
पतझड़ में बदल जाएगा...

तेरी एक भी किरन
किसी और आंख में चमकी तो
मेरी दुनिया
अंधी हो जाएगी...


तेरी एक भी सांस
किसी और सांस में समाई तो
मेरी ज़िन्दगी
तबाह हो जाएगी...

इस नज़्म में लड़की अपने महबूब से सवाल करती है. उसका महबूब उसे क्या जवाब देता है, यह तो हम नहीं जानते... लेकिन इतना ज़रूर है कि हर मुहब्बत करने वाली लड़की का अपने महबूब से शायद यही सवाल होता होगा... और न जाने कितनी ही लड़कियों को अपने महबूब से वो हक हासिल नहीं हो पाता होगा, जिसकी वो तलबगार हैं... और फिर उनकी ज़िन्दगी में बहार का मौसम शबाब पर आने से पहले ही पतझड़ मे बदल जाता है. मुहब्बत के जज़्बे से सराबोर उनकी दुनिया जुदाई के रंज से स्याह हो जाती है और उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए तबाह हो जाती है...और यही दर्द लफ़्जों का रूप धारण करके गीत, नज़्म या ग़ज़ल बन जाता है..
कास्पियन सागर के पास काकेशिया के पर्वतों की उंचाइयों पर बसे दाग़िस्तान के पहाड़ी गांव में जन्मे मशहूर लोक-कवि रसूल हमज़ातोव भी कहते हैं गीतों का जन्म दिल में होता है. फिर दिल उन्हें ज़बान तक पहुंचाता है. उसके बाद ज़बान उन्हें सब लोगों के दिल तक पहुंचा देती है और सारे लोगों के दिल वो गीत आने वाली सदियों को सौंप देते हैं.

-फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...
यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...

इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख़ की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग दहकती हो उसे  दोज़ख़ की आग का क्या ख़ौफ़...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (वजूद) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा है, जिसकी एक बूंद के आगे सारी कायनात बेनूर लगती है... इश्क़ इंसान को ख़ुदा के बेहद क़रीब कर देता है... इश्क़ में रूहानियत होती है... इश्क़, बस इश्क़ होता है... किसी इंसान से हो या ख़ुदा से...

हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला जो उसका एक घूंट भी पीता. आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...

बुजुर्गों से सुना है कि शायरों की बख़्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना...शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते...उन्हें  दोज़ख़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे  दोज़ख़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है...जब हम अपने महबूब (चाहे वो काल्पनिक ही क्यूं न हो) से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी  दोज़ख़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?

बंदे को तो अपने महबूब (ख़ुदा) की  दोज़ख़ भी उतनी ही अज़ीज़ होती है, जितनी जन्नत... जिसे इश्क़ की दौलत मिली हो, फिर उसे कायनात की किसी और शय की ज़रूरत ही कहां रह जाती है, भले ही वो जन्नत ही क्यों न हो...

जब इश्क़े-मजाज़ी (इंसान से इश्क़) हद से गुज़र जाए, तो वो ख़ुद ब ख़ुद इश्क़े-हक़ीक़ी (ख़ुदा से इश्क़) हो जाता है... इश्क़ एक ख़ामोश इबादत है... जिसकी मंज़िल जन्नत नहीं, दीदारे-महबूब है...

किसी ने क्या ख़ूब कहा है-
मुकम्मल दो ही दानों पर
ये तस्बीह-ए-मुहब्बत है
जो आए तीसरा दाना
ये डोर टूट जाती है

मुक़र्रर वक़्त होता है
मुहब्बत की नमाज़ों का
अदा जिनकी निकल जाए
क़ज़ा भी छूट जाती है

मोहब्बत की नमाज़ों में
इमामत एक को सौंपो
इसे तकने उसे तकने से
नीयत टूट जाती है

मुहब्बत दिल का सजदा है
जो है तैहीद पर क़ायम
नज़र के शिर्क वालों से 
मुहब्बत रूठ जाती है


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मुहब्बत


जब इंसान को किसी से मुहब्बत हो जाया करती है, तो फिर उसका वजूद, उसका अपना नहीं रह जाता... दिल उसका होता है, लेकिन धड़कनें किसी और की... जिस्म अपना होता है, लेकिन रूह किसी और की, क्योंकि उसकी अपनी रूह तो अपने महबूब की चाह में भटकती फिरा करती है...

बक़ौल बुल्ले शाह-
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई
सद्दी मैनूं धीदो रांझा हीर न आखो कोई
रांझा मैं विच, मैं रांझे विच ग़ैर ख़िआल न कोई
मैं नाहीं ओह आप है अपणी आप करे दिलजोई
जो कुछ साडे अन्दर वस्से जात असाडी सोई
जिस दे नाल मैं न्योंह लगाया ओही जैसी होई
चिट्टी चादर लाह सुट कुडिये, पहन फ़कीरां दी लोई
चिट्टी चादर दाग लगेसी, लोई दाग न कोई
तख़्त हज़ारे लै चल बुल्ल्हिआ, स्याली मिले न ढोई
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई...

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दुआएं...


दुआएं...
मायूसियों के अंधेरे में
उम्मीद की किरनें हैं...
मुश्किलों की धूप में
घने दरख़्त का साया हैं...
दुआएं...
जो हमेशा साथ रहती हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...


मेरे महबूब !
अज़ल से अबद तक
ऐसा ही होता आया है
और
ऐसा ही होता रहेगा
मुहब्बत के नसीब में
हिज्र के दिन हैं
और
हिज्र की ही रातें हैं...

जान !
मैं नहीं जानती
मेरी क़िस्मत में
तुम्हारा साथ लिखा
भी है या नहीं...

मैं सिर्फ़ ये जानती हूं
कि मैं जहां भी रहूं
जिस हाल में भी रहूं
ये दुनिया हो
या वो दुनिया
तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में

फ़िरदौस ख़ान
ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की. गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था...शायद यह किसी भी महबूब का अपनी महबूबा को परिस्तान में बसाने का ख़्वाब ही हो सकता था और जब गूहरी महल की तामीर की गई होगी...तब इसकी बनावट, इसकी नक्क़ाशी और इसकी ख़ूबसूरती को देखकर ख़ुद भी इस पर मोहित हुए बिना न रह सका होगा...
हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है. गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है. ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका. हिसार का गूजरी महल 1354 में फ़िरोज़शाह तुग़लक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया. गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है. इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था. ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फ़िरोज़शाह तुग़लक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है.
गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक ने क़िला बनवाया. यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया. क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं. दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फ़िरोज़शाह तुग़लक का महल बताई जाती है. इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है. फ़िरोज़शाह तुग़लक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है. अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था. गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी.
सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है. हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते. यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है. फ़िरोज़शाह तुग़लक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फ़िरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे. शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे. उस वक्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे. दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था. उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी. चारों तरफ़ घना जंगल था. गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था. आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी. इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी. डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे. डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था.
एक दिन शहज़ादा फ़िरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा. उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा तो उस पर मोहित हो गया. गूजर कन्या भी शहज़ादा फ़िरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. अब तो फ़िरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया. फिरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंजरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती. फ़िरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा.
1309 में दयालपुल में जन्मा फ़िरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना. फ़िरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था. सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया. उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, किलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की. उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए. उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे.
दिल्ली का सम्राट बनते ही फ़िरोज़शाह तुग़लक ने महल हिसार इलांके में महल बनवाने की योजना बनाई. महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों. यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया. बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी. दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी. तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था.
किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई. दिल्ली के कोटला फिरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं. तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है.
क़ाबिले-गौर है कि हिसार को फ़िरोज़शाह तुग़लक के वक्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फिरोज़ा नामक क़िला बनवाया था. 'हिसार' फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'क़िला'. इससे पहले इस जगह को 'इसुयार' कहा जाता था. अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है. इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-
सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं...

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कुछ यादें...

नज़्म
कुछ यादें
उन हसीं लम्हों की
अमानत होती हैं
जब ज़मीन पर
चांदनी की चादर बिछ जाती है
फूल अपनी-अपनी भीनी-भीनी महक से
फ़िज़ा को रूमानी कर देते हैं
हर सिम्त मुहब्बत का मौसम
अंगड़ाइयां लेने लगता है
पलकें
सुरूर से बोझल हो जाती हैं
और
दिल चाहता है
ये वक़्त यहीं ठहर जाए
एक पल में
कई सदियां गुज़र जाएं...
-फ़िरदौस ख़ान
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लोहड़ी, जो रस्म ही रह गई...

फ़िरदौस ख़ान
तीज-त्यौहार हमारी तहज़ीब और रवायतों को क़ायम रखे हुए हैं. ये ख़ुशियों के ख़ज़ाने भी हैं. ये हमें ख़ुशी के मौक़े देते हैं. ख़ुश होने के बहाने देते हैं. ये लोक जीवन का एक अहम हिस्सा हैं. इनसे किसी भी देश और समाज की संस्कृति व सभ्यता का पता चलता है. मगर बदलते वक़्त के साथ तीज-त्यौहार भी पीछे छूट रहे हैं. कुछ दशकों पहले तक जो त्यौहार बहुत ही धूमधाम के साथ मनाए जाते थे, अब वे महज़ रस्म अदायगी तक ही सिमट कर रह गए हैं. इन्हीं में से एक त्यौहार है लोहड़ी.
लोहड़ी उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा और पंजाब का एक प्रसिद्ध त्यौहार है. लोहड़ी के की शाम को लोग सामूहिक रूप से आग जलाकर उसकी पूजा करते हैं. महिलाएं आग के चारों और चक्कर काट-काटकर लोकगीत गाती हैं. लोहड़ी का एक विशेष गीत है. जिसके बारे में कहा जाता है कि एक मुस्लिम फ़कीर था. उसने एक हिन्दू अनाथ लड़की को पाला था. फिर जब वो जवान हुई तो उस फ़क़ीर ने उस लड़की की शादी के लिए घूम-घूम के पैसे इकट्ठे किए और फिर धूमधाम से उसका विवाह किया. इस त्यौहार से जुड़ी और भी कई किवदंतियां हैं. कहा जाता है कि सम्राट अकबर के जमाने में लाहौर से उत्तर की ओर पंजाब के इलाकों में दुल्ला भट्टी नामक एक दस्यु या डाकू हुआ था, जो धनी ज़मींदारों को लूटकर ग़रीबों की मदद करता था.
जो भी हो, लेकिन इस गीत का नाता एक लड़की से ज़रूर है. यह गीत आज भी लोहड़ी के मौक़े पर खूब गया जाता है.
लोहड़ी का गीत
सुंदर मुंदरीए होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
दुल्ले धी ब्याही होए
सेर शक्कर पाई होए
कुड़ी दे लेखे लाई होए
घर घर पवे बधाई होए
कुड़ी दा लाल पटाका होए
कुड़ी दा शालू पाटा होए
शालू कौन समेटे होए
अल्ला भट्टी भेजे होए
चाचे चूरी कुट्टी होए
ज़िमींदारां लुट्टी होए
दुल्ले घोड़ दुड़ाए होए
ज़िमींदारां सदाए होए
विच्च पंचायत बिठाए होए
जिन जिन पोले लाई होए
सी इक पोला रह गया
सिपाही फड़ के ले गया
आखो मुंडेयो टाणा टाणा
मकई दा दाणा दाणा
फकीर दी झोली पाणा पाणा
असां थाणे नहीं जाणा जाणा
सिपाही बड्डी खाणा खाणा
अग्गे आप्पे रब्ब स्याणा स्याणा
यारो अग्ग सेक के जाणा जाणा
लोहड़ी दियां सबनां नूं बधाइयां...
यह गीत आज भी प्रासंगिक हो, जो मानवता का संदेश देता है.
एक अन्य किवदंती के मुताबिक़ क़रीब ढाई हज़ार साल पहले पूर्व पंजाब के एक छोटे से उत्तरी भाग पर एक लोहड़ी नाम के राजा-गण का राज्य था. उसके दो बेटे थे, जो वे हमेशा आपस में लड़ते और इसी तरह मारे गए. राजा बेटों के वियोग में दुखी रहने लगा. इसी हताशा में उसने अपने राज्य में कोई भी ख़ुशी न मनाए की घोषणा कर दी. प्रजा राजा से दुखी थी. राजा के अत्याचार दिनों-दिन बढ़ रहे थे. आखिर तंग आकर जनता ने राजा हो हटाने का फैसला कर लिया. राजा के बड़ी सेना होने के बावजूद जनता ने एक योजना के तहत राजा को पकड़ लिया और एक सूखे पेड़ से बांधकर उसे जला दिया. इस तरह अत्याचारी राजा मारा गया और जनता के दुखों का भी अंत हो गया. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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सुर्ख़ फूल पलाश के...


फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं.
पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है. एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं.

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है.  इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है.

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं.
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.

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किताबे-इश्क़ की पाक आयतें...


मेरे महबूब
मुझे आज भी याद हैं
वो लम्हे
जब तुमने कहा था-
तुम्हारी नज़्में
महज़ नज़्में नहीं हैं
ये तो किताबे-इश्क़ की
पाक आयतें हैं...
जिन्हें मैंने हिफ़्ज़ कर लिया है...
और
मैं सोचने लगी-
मेरे लिए तो
तुम्हारा हर लफ़्ज़ ही
कलामे-इलाही की मानिंद है
जिसे मैं कलमे की तरह
हमेशा पढ़ते रहना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान




शब्दार्थ हिफ़्ज़ - याद करना
*तस्वीर गूगल से साभार
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दीदार...

तारीख़ 8 जनवरी 2017... इस्लामी हिजरी 1437, 9 रबीउल आख़िर,
दिन इतवार... वक़्त इशराक़... जगह दिल्ली...

हमारी एक रूहानी नज़्म
दीदार...
मेरे मौला !
न तू मुझसे ग़ाफ़िल
न मैं तुझसे ग़ाफ़िल
न तू मुझसे जुदा
न मैं तुझसे जुदा
तू मुझ में है
और मैं तुझ में...
दरमियां हमारे
कोई पर्दा न रहा
मैंने
कायनात के हर ज़र्रे में
तेरा दीदार किया है...
-फ़िरदौस ख़ान


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रूह की तस्कीन

मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरान है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं...

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं...

तुम्हारी परस्तिश ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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इंतज़ार

इंतज़ार के लम्हे कितने अज़ाब हुआ करते हैं... एक-एक लम्हा सदियों सा गुज़रता है... लगता है कि वक़्त कहीं ठहर गया है... आंखें सिर्फ़ उन्हें ही देखना चाहती हैं, कान उनकी दिलकश आवाज़ सुनने को तरसते रहते हैं... हवा का शोख़ झोंका उनके लम्स का अहसास बनकर रूह की गहराइयों में उतर जाता है... और फिर सारा वजूद कांप उठता है...
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नजूमी...


कुछ अरसे पहले की बात है... हमें एक नजूमी मिला,  जिसकी बातों में सहर था... उसके बात करने का अंदाज़ बहुत दिलकश था... कुछ ऐसा कि कोई परेशान हाल शख़्स उससे बात करे, तो अपनी परेशानी भूल जाए... उसकी बातों के सहर से ख़ुद को जुदा करना मुश्किल था...
उसने हमसे बात की... कुछ कहा, कुछ सुना... यानी सुना कम और कहा ज़्यादा... क्योंकि वह सामने वाले को बोलने का मौक़ा ही नहीं देता था... और सुनने वाला भी बस उसे सुनता ही रह जाए...
उसके बात करने का अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि इंसान चांद की तमन्ना करे, तो वो उसे अहसास करा दे कि चांद ख़ुद उसके आंचल में आकर सिमट जाए...
चांद तो आसमान की अमानत है, भला वह ज़मीन पर कैसे आ सकता है... ये बात सुनने वाला भी जानता है और कहने वाला भी...
लेकिन चांद को अपने आंचल में समेट लेना का कुछ पल का अहसास इंसान को वो ख़ुशी दे जाता है, जिसे लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता... चांद को पाने के ये लम्हे और इन लम्हों के अहसास की शिद्दत रूह की गहराइयों में उतर जाती है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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रूह परदेस में

मेरे महबूब !
जिस्म देस में है
और
रूह परदेस में...
-फ़िरदौस ख़ान

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