वो नज़्म...


वो नज़्म
जो कभी
तुमने मुझ पर लिखी थी
एक प्यार भरे रिश्ते से
आज बरसों बाद भी
उस पर नज़र पड़ती है तो
यूं लगता है
जैसे
फिर से वही लम्हें लौट आए हैं
वही मुहब्बत का मौसम
वही चम्पई उजाले वाले दिन
जिसकी बसंती सुबहें
सूरज की बनफशी किरनों से
सजी होती थीं
जिसकी सजीली दोपहरें
चमकती सुनहरी तेज़ धूप से
सराबोर होती थीं
जिसकी सुरमई शामें
रूमानियत के जज़्बे से
लबरेज़ होती थीं
और
जिसकी मदहोश रातों पर
चांदनी अपना वजूद लुटाती थी
सच !
कितनी कशिश है
तुम्हारे चंद लफ़्जों में
जो आज भी
मेरी उंगली थामकर
मुझे मेरे माज़ी की ओर
ले चलते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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ख़त...

ख़त...
दूधिया वरक़ों पर लिखे
ज़ाफ़रानी हर्फ़
उसने
काग़ज़ पर नहीं
मेरी रूह पर टांक दिए थे...
-फ़िरदौस ख़ान
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शायद, यही ज़िन्दगी है...

ज़िन्दगी एक सहरा है...और ख़ुशियां सराब...इंसान ख़ुशियों को अपने दामन में समेट लेने के लिए क़दम जितने आगे बढ़ाता है...ख़ुशियां उतनी ही उससे दूर होती चली जाती हैं...शायद, यही ज़िन्दगी है...
-फ़िरदौस ख़ान
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मन्नतों के पीले धागे


बस्ती से दूर
किसी ख़ामोश मक़ाम पर
बने दूधिया मज़ारों के पास खड़े
दरख्त की शाख़ों पर बंधे
मन्नतों के पीले धागे
कितने बीते लम्हों की
याद दिला जाते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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एक दुआ उनके लिए...


एक दुआ उनके लिए...
इज्ज़्तो-शौहरत मिले, दौलत मिले
जिस तरफ़ जाओ, उधर उल्फ़त मिले
-फ़िरदौस ख़ान
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उसने कहा था...

नज़्म
वो ख़्वाब था
या हक़ीक़त
ज़हन में नहीं
बस इतना याद है
उसने कहा था-
मैं आऊंगा
मेरा इंतज़ार करना...
-फ़िरदौस ख़ान
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वो चाहता है...मैं कोई गीत लिखूं


ज़िन्दगी का मौसम कभी एक जैसा नहीं रहता...पल-पल बदलता रहता है..फ़र्क बस इतना है कि कुछ लोगों की ज़िन्दगी में बहार का मौसम देर तक ठहरता है और उनके दामन को खुशियों से सराबोर कर देता है...लेकिन बहुत-से ऐसे लोग भी होते हैं, जिनकी ज़िन्दगी में बहार कभी आती ही नहीं... या यूं कहिये कि उनकी ज़िन्दगी में खिज़ा का मौसम आता है और फिर हमेशा के लिए ही ठहर जाता है...अलबत्ता, खिज़ा का भी अपना ही लुत्फ़ होता है...हमने अपनी एक नज़्म में खिज़ा के मौसम की ख़ूबसूरती को पेश किया था...बहरहाल आज हम एक फ़रमाइश पर अपनी एक पुरानी नज़्म पोस्ट कर रहे हैं...इस वादे के साथ के जल्द ही एक ताज़ा नज़्म पोस्ट करेंगे...

नज़्म
वो चाहता है
मैं कोई गीत लिखूं
मुहब्बत के मौसम का...

लेकिन
उसको कैसे बताऊं
क़ातिबे-तक़दीर ने
मेरे मुक़द्दर में
लिख डाली है
उम्रभर की खिज़ा...
-फ़िरदौस ख़ान
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जब याद तुम्हारी आएगी...

इंतज़ार...किसी से मिलने की तड़प, जुदाई का दर्द, यादों की महक...कितना कुछ बसा है, इस एक लफ्ज़ में...इंतज़ार...जो मीठा भी है...और तल्ख़ भी...जिसके इंतज़ार में निगाहें राह में बिछी हों...और वो आ जाए तो इंतज़ार अहसास खुशनुमा हो जाता है...लेकिन जब वो न आए तो यही इंतज़ार उम्रभर का दर्द बन जाता है...इंतज़ार का एक-एक पल सदियों के बार (बोझ) की तरह महसूस होता है...हमने इंतज़ार के इन्हीं लम्हों को गीत में पिरोकर संजोया है...

जब याद तुम्हारी आएगी
फिर मुझको ख़ूब रुलाएगी
ग़मगीन लगेगी बादे-सबा
वीरानी-सी छा जाएगी

फिर अपने घर बुलवाने को
पैगाम तुम्हें मैं भेजूंगी
उन बेचैनी के लम्हों में
कैसे आस सहेजूंगी
फिर गमे-हिज्र के आलम में
हर पल मुश्किल से बीतेगा
लाखों कोशिश करने पर भी
यादों का सावन जीतेगा
राहों में ये पलकें बिछाके
चौखट पे जां टिक जाएगी
जब याद तुम्हारी आएगी
फिर मुझको ख़ूब रुलाएगी

नज़रों से ओझल होने पर
दर्शन किस विधि मैं पाऊंगी
उस रंजो-अलम की बेला में
दिल को कैसे समझाऊंगी
मेहंदी की डाल पे चिड़ियाँ
जब गीत ख़ुशी के गाएंगी
उन कसमो-वादों की बातें
रह-रहके मुझे सताएंगी

फिर नील गगन की चादर पे
संध्या की लाली छाएगी
जब याद तुम्हारी आएगी
फिर मुझको ख़ूब रुलाएगी
-फ़िरदौस ख़ान
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किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए...

इबादत...सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने या रोज़े रखने का ही नाम नहीं है...बल्कि इबादत का दायरा इससे भी कहीं ज़्यादा वसीह (फैला) है...किसी की आंख के आंसू अपने दामन में समेट लेना...किसी उदास चेहरे पर मुस्कराहट बनकर बिखर जाना...भी इबादत का ही एक हिस्सा है...




बक़ौल निदा फ़ाज़ली :
घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए...
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किसी को देखते रहना नमाज़ है तेरी...


रमज़ान का मुबारक महीना आ चुका है...दिन रोज़े में और रात ज़िक्रे-इलाही में गुज़र रही है...यानि फ़िज़ां इबादत की खुशबू से महक रही है... इन दिनों मेल और एसएमएस भी ऐसे ही मिल रहे हैं..
मसलन...
मुबारक हो आपको एक महीना रहमत का
चार हफ़्ते बरकत के
30 दिन मग़फ़िरत के
720 घंटे पाकीज़गी के
43200 मिनट हिदायत के
2592000 सेकेंड नूर के...

दूसरा संदेश
इबादत के बदले फ़िरदौस (स्वर्ग) मिले
यह मुझे मंज़ूर नहीं
बेलोस इबादत करता हूं
मैं कोई मज़दूर नहीं...

बेशक ख़ुदा की इबादत से बढ़कर कुछ नहीं...और आशिक़ (बंदा) अपने महबूब (ख़ुदा) से इबादत का सिला नहीं चाहता...यही तो है बन्दगी, इबादत और मुहब्बत है, जिसमें पाने की नहीं, फ़क़्त ख़ुद को फ़ना करने की हसरत होती है, ...अपने महबूब के लिए...

शायरों ने मोहब्बत को इबादत से जुदा नहीं माना है...
बक़ौल अल्लामा मुहम्मद इक़बाल साहब-
अज़ान अज़ल से तेरे इश्क़ का तराना बनी
नमाज़ उसके नज़ारे का इक बहाना बनी
अदा-ए-दीदे-सरापा नयाज़ है तेरी
किसी को देखते रहना नमाज़ है तेरी......
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बारिश में भीगती है कभी उसकी याद तो, इक आग-सी हवा में लगाती हैं बारिशें...


नगमें रफ़ाक़तों के सुनाती हैं बारिशें
अरमान ख़ूब दिल में जगाती हैं बारिशें

बारिश में भीगती है कभी उसकी याद तो
इक आग-सी हवा में लगाती हैं बारिशें

मिस्ले-धनक जुदाई के ल्म्हाते-ज़िंदगी
रंगीन मेरे ख़्वाब बनाती हैं बारिशें

ख़ामोश घर की छत की मुंडेरों पे बैठकर
परदेसियों को आस बंधाती हैं बारिशें

जैसे बगैर रात के होती नहीं सहर
यूं साथ बादलों का निभाती हैं बारिशें

सहरा में खिल उठे कई महके हुए चमन
बंजर ज़मीं में फूल खिलाती हैं बारिशें

'फ़िरदौस' अब क़रीब मौसम बहार का
आ जाओ कब से तुमको बुलाती हैं बारिशें
-फ़िरदौस ख़ान
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बस, एक घर ऐसा हो...


घर...कितना सुकून समाया है, इस एक लफ्ज़ में... घर महज़ ईंट-गारे से बनी चारदीवारी पर टिकी छत का नाम नहीं है... और न ही उस छत का नाम है जिसके नीचे कई लोग रहते हैं... क्योंकि ऐसी जगह मकान तो हो सकती है, लेकिन घर क़तई नहीं... हमने बरसों पहले एक घर का तसव्वुर किया था और फिर उसी तसव्वुर को अल्फ़ाज़ में पिरोकर सहेज लिया था... बरसों तक सहेजकर रखे गए उसी तसव्वुर को आज एक दुआ के साथ पोस्ट कर रहे हैं... इंसान अपने लिए जैसा घर चाहता है, उसे वैसा घर नसीब हो... आमीन

घर
एक घर ऐसा हो
जिसकी बुनियाद
खुलूस की ईंटों से बनी हो
जिसके आंगन में
बेला और मेहंदी महकती हों
जिसकी क्यारियों में
रफ़ाक़तों के फूल खिलते हों
जिसकी दीवारें
क़ुर्बतों की सफ़ेदी से पुती हों
जिसकी छत पर
दुआएं
चांद-सितारे बनकर चमकती हों
जिसके दालान में
हसरतें अंगड़ाइयां लेती हों
जिसके दरवाज़ों पर
उम्र की हसीन रुतें
दस्तक देती हों
जिसकी खिड़कियों में
बच्चों-सी मासूम ख़ुशियां
मुस्कराती हों
और
जिसकी मुंडेरों पर
अरमानों के परिन्दे चहकते हों
बस, एक घर ऐसा हो
-फ़िरदौस ख़ान

Courtesy :  Image Mikki Senkarik 


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मानिंद मेरे उनका भी घरबार नहीं है


हमको तुम्हारी बात से इंकार नहीं है
तुमको हमारी हां में भी इक़रार नहीं है

रातों को भी जंगल में भटकते सदा जुगनू
मानिंद मेरे उनका भी घरबार नहीं है

मजबूरियों ने बेड़ियां डाली हैं बरगना
तुम जैसा मेरा मोनिसो-गमख्वार नहीं है

जो काम ज़िंदगी के उसूलों को ज़रर दे
एक बार नहीं, उससे तो सौ बार नहीं है

वह क़त्ल तो करते हैं ख़ुदा जाने किस तरह
हाथों में जिनके ख़ंजरो-तलवार नहीं है

'फ़िरदौस' तेरी कितनी अजब कश्ती-ए-हयात
चल तो रही है, मगर कोई पतवार नहीं है
-फ़िरदौस ख़ान
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