तुमको जब भी क़रीब पाती हूं...


मुहब्बत का रिश्ता जिस्म से नहीं होता...बल्कि यह तो वो जज़्बा है जो रूह की गहराइयों में उतर जाता है...इसलिए जिस्म का होना या न होना लाज़िमी नहीं है...बहुत ख़ुशनसीब हैं वो लोग जिनकी ज़िन्दगी के दामन में यादों के चंद फूल तो होते हैं...वरना इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं...जो जिस शख़्स से मुहब्बत करते हैं और किसी वजह से अपने जज़्बात का इज़हार भी नहीं कर पाए...या अपने महबूब से कभी मुलाक़ात भी नहीं कर पाए...इसके बावजूद उससे इस दर्जा मुहब्बत करते हैं कि उसकी याद में ख़ुद को भी भूल बैठे हैं...

तुमको जब भी क़रीब पाती हूं
दर्दो-ग़म सारे भूल जाती हूं
निज़्द जाकर तेरे ख़्यालों के
मैं ख़ुदा को भी भूल जाती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ
निज़्द : नज़दीक

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1 Response to "तुमको जब भी क़रीब पाती हूं..."

  1. sushma 'आहुति' says:
    13 अगस्त 2013 को 9:46 am

    बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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