महबूब की परस्तिश...


बुज़ुर्गों से सुना है कि शायरों की बख़्शीश नहीं होती...वजह, वो अपने महबूब को ख़ुदा बना देते हैं...और इस्लाम में अल्लाह के बराबर किसी को रखना... शिर्क यानी ऐसा गुनाह माना जाता है, जिसकी मुआफ़ी तक नहीं है...कहने का मतलब यह है कि शायर जन्नत के हक़दार नहीं होते... उन्हें दोज़ख़ (जहन्नुम) में फेंका जाएगा... अगर वाक़ई ऐसा है तो मुझे दोज़ख़ भी क़ुबूल है...आख़िर वो भी तो उसी अल्लाह की तामीर की हुई है... जब हम अपने महबूब से इतनी मुहब्बत करते हैं कि उसके सिवा किसी और का तसव्वुर करना भी कुफ़्र महसूस होता है... उसके हर सितम को उसकी अदा मानकर दिल से लगाते हैं... फिर जिस ख़ुदा की हम उम्रभर इबादत करते हैं तो उसकी दोज़ख़ को ख़ुशी से क़ुबूल क्यूं नहीं कर सकते...?
हमारी एक नज़्म पर बाज़ अफ़राद (कुछ लोगों ) ने कहा था कि अपनी नज़्म में 'परस्तिश' लफ्ज़ हटा दो, वरना तुम्हें भारी गुनाह होगा...
आज अपनी पसंद की वही नज़्म पोस्ट कर रही हूं...

नज़्म
मेरे महबूब !
उम्र की
तपती दोपहरी में
घने दरख़्त की
छांव हो तुम
सुलगती हुई
शब की तन्हाई में
दूधिया चांदनी की
ठंडक हो तुम
ज़िन्दगी के
बंजर सहरा में
आबे-ज़मज़म का
बहता दरिया हो तुम
मैं
सदियों की
प्यासी धरती हूं
बरसता-भीगता
सावन हो तुम
मुझ जोगन के
मन-मंदिर में बसी
मूरत हो तुम
मेरे महबूब
मेरे ताबिन्दा ख़्यालों में
कभी देखो
सरापा अपना
मैंने
दुनिया से छुपकर
बरसों
तुम्हारी परस्तिश की है...
-फ़िरदौस ख़ान
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21 Response to "महबूब की परस्तिश..."

  1. seema gupta says:
    18 अक्तूबर 2008 को 10:26 am

    सदियों की
    प्यासी धरती हूं
    बरसता-भीगता
    सावन हो तुम
    मुझ जोगन के
    मन-मंदिर में बसी
    मूरत हो तुम
    "apne asstitv ka sjeev chitran, kya khun, sunder shabd kum hai..."

    Regards

  2. नीरज गोस्वामी says:
    18 अक्तूबर 2008 को 10:53 am

    इतनी खूबसूरत नज़्म लिखने के बाद अगर दोजख की आग में जलना पड़े तो भी कुबूल होगा...शायर अपने महबूब से मोहब्बत करते हैं और ये परिस्तिश इश्क की है किसी रूप की नहीं...इश्क चाहे रब से हो या किसी और से क्या फर्क पड़ता है? ये एक एहसास है बल्कि बेहद खूबसूरत एहसास जो इंसान को इंसानियत सिखाता है इसे कोई कैसे ग़लत कह सकता है?
    बहुत बहुत शुक्रिया आप का इस नज़्म के लिए.
    नीरज

  3. डॉ.सुभाष भदौरिया. says:
    18 अक्तूबर 2008 को 11:15 am

    उर्दू के ही किसी शायर का एक शेर याद आगया-

    जहाँ हजारों वरस की हूरें हो,
    ऐसी जन्नत को ले के क्या करे कोई.
    फ़िरदौसजी सुना है हिन्दुओं के धर्मग्रंथों में इस बात का आश्वासन दिया गया है कि जो पुरुष नेक काम करेंगे उन्हें स्वर्ग में अप्सरायें मिलेंगी.पर स्त्रियों के लिए कोई व्यवस्था का मुझे पता नहीं हैं.
    आप इस्लाम धर्म की ज्ञाता हैं उस पर रोशनी डालें कि नेक काम करने वाले मर्दों को हूर औरतों के लिए क्या इंतज़ाम हैं.
    वैसे ग़ालबि का मश्हूर शेर याद आ गया,

    हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
    दिल के बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है.
    हमारा धर्मग्रंथो का अध्ययन न के बराबर है.
    सो कुछ भी नहीं कह सकते.
    वैसे हमारी तो ब्लॉग जगत के छटे हुए पापियों में गणना होती हैं सो स्वर्ग मिलने से रहा. हमतो नर्क में मज़े करेंगे.
    अगर हिंदू के स्वर्ग और मुस्लमानों के दोज़ख के बीच आवागमन की व्यवस्था हुई तो हम आपके दोज़ख में आपकी मिज़ाज पुर्सी के लिए आना चाहेंगे.
    आप भी किसी रोज़ हमारी नर्क में तशरीफ़ ले आना. वैसे ग़ालिब चचा ने तो फ़र्माया था आमीन.

  4. मीत says:
    18 अक्तूबर 2008 को 12:16 pm

    मेरे ताबिन्दा ख्यालों में
    कभी देखो
    सरापा अपना
    मैंने
    दुनिया से छुपकर
    बरसों
    तुम्हारी परस्तिश की है...

    बहुत ख़ूब.

  5. रंजना [रंजू भाटिया] says:
    18 अक्तूबर 2008 को 12:32 pm

    मुझ जोगन के
    मन-मंदिर में बसी
    मूरत हो तुम

    बेहद खूबसूरत लिखी है यह ...

  6. फ़िरदौस ख़ान says:
    18 अक्तूबर 2008 को 12:44 pm

    सुभाष जी,

    जब इस दुनिया में ही कुछ न मिला तो उस दुनिया की उम्मीद कौन करे... मैं रोज़े-नमाज़ की पाबंद ज़रूर हूं, लेकिन जन्नत और दोज़क पर मुझे यक़ीन नहीं...(हालांकि मेरी यह सोच इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ है ) मैं मानती हूं...सब कुछ इसी दुनिया में है...ज़िन्दगी में अगर हमें वो खुशियां मिल जाएं, जो हम चाहते हैं तो यह दुनिया ही जन्नत है...अगर सारी उम्र दुख और परेशानियां ही मिलें तो यही ज़िन्दगी दोज़क बन जाती है...यह नज़्म भी काल्पनिक ही है...हक़ीक़त में ऐसा कोई इंसान नहीं मिलता, जिसके लिए ऐसी नज़्म लिखी जाए...अगर लिखी भी जाए तो...पछताना ही पड़ता है...क्योंकि इन जज़्बात की भला कौन क़द्र करता है... ? वैसे भी हर धर्म में हर सुख-सुविधा मर्दों के लिए ही है...इससे यह भी साबित होता है कि अल्लाह या ईश्वर (जो भी कहें) मर्द ही है...

  7. Ek ziddi dhun says:
    18 अक्तूबर 2008 को 7:03 pm

    `parastish kee yan tak ki ay boot tujhe nazar mein sabhu kee khuda kar chale`

  8. Rewa Smriti says:
    18 अक्तूबर 2008 को 8:59 pm

    Bahut sunder!


    rgds.
    Rewa

  9. Rewa Smriti says:
    18 अक्तूबर 2008 को 9:01 pm

    Aapke blog ka link main Roushan ke blog per dekhi aur wahan se main pahli baar yahan aai hun. Aapki poem achhi lagi.

    Shukriya!

    www.rewa.wordpress.com

  10. शायदा says:
    18 अक्तूबर 2008 को 9:11 pm

    फि़रदौस गुनाह है या नहीं ये तो बाद में पता चलेगा, परस्तिश का सबसे बडा़ नुकसान तो यही नज़र आ रहा है कि है कि महबूब का दिमाग़ ख़राब हो जाता है। वो सचमुच देवता की तरह सोचने लगता है और ये तो पता ही है न कि देवता के भक्‍तों की संख्‍या का कोई ठिकाना नहीं...

    खै़र इस बात को परे हटाकर बात करूं तो कहना चाहिए बहुत ख़ूब।

  11. alex says:
    20 अक्तूबर 2008 को 1:38 pm

    वैसे बशीर बद्र साहब ने कुछ कहा है ज़रा उस पर भी गौर फरमा लें
    सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा
    इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा
    मोहतरमा बुरा ना माने तो इतना अर्ज़ करने की गुस्ताखी करना चाहता हूँ की वो महबूब भी क्या महबूब जो इशारों को ना समझ पाया हो और उससे अपनी मुहब्बत को बयाँ करने के हालत हो जाएँ. महबूब तो ख़ुद ही इससे भी ज्यादा तड़प और कशिश महसूस कर रहा होगा. वैसे इस नज़्म में अपनी मुहब्बत को बड़ी ही खूबसूरती से लफ्जों में पिरोया गया है.

  12. फ़िरदौस ख़ान says:
    20 अक्तूबर 2008 को 2:04 pm

    alex साहब, क्या हम आपका नाम जान सकते हैं...?

  13. मौसम says:
    20 अक्तूबर 2008 को 3:04 pm

    मेरे ताबिन्दा ख्यालों में
    कभी देखो
    सरापा अपना
    मैंने
    दुनिया से छुपकर
    बरसों
    तुम्हारी परस्तिश की है...

    सुब्हान अल्लाह...
    आपने महबूब को ख़ुदा बना रखा है...कितना ख़ुशनसीब होगा वो जिसके लिए ऐसी नज़्म लिखी जाए...हमें तो उससे रश्क हो रहा है...

  14. alex says:
    20 अक्तूबर 2008 को 5:00 pm

    नाम से हम किसी शख्स को तो जान सकते हैं मगर उसकी शख्सियत को नहीं
    वैसे भी नाम में क्या रखा है गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो गुलाब गुलाब रहेगा.
    अगर आप चाहें तो alexsmart09@gmail.com पर मेल कर सकती हैं.

  15. dr. ashok priyaranjan says:
    26 अक्तूबर 2008 को 1:21 am

    िफरदौस जी,
    प्रेम की कोमल भावना की बहुत प्रखर अिभव्यिकत् है आपकी नज्म ।

  16. IRFAN says:
    3 दिसंबर 2009 को 6:29 pm

    wah .shayar apne dil ki baat apni shayari mein kehta hai.
    liked the most-'sulagti shab ki tanhaaee mein doodhiya chandni ki thandak ho tum...kya upmaayen hain!!

  17. IRFAN says:
    3 दिसंबर 2009 को 6:30 pm

    wah .shayar apne dil ki baat apni shayari mein kehta hai.
    I liked the most-'sulagti shab ki tanhaaee mein doodhiya chandni ki thandak ho tum...kya upmaayen hain!!

  18. Ishwar says:
    12 दिसंबर 2009 को 8:47 pm

    Firdaus Jee, Hindi ka Patrakar hu, koi Shayar nahi hun. "Par PYAR ka izahar aur bekhauf kar diya, Jara bhi dar nahi laga jalim jamane ka ." Likhane se pahale Aapane jo Pyar-Vedana jheli Hogi, usaka andaz sahaz lagaya ja sakata hai. Yaad rakhana Naam unhi ka hota hai, jo jamane se Haat kar chalate hai. Jin logo mai Himmat nahi hoti voh ese Bagawat kahenge. BAHUT KHUB DIL SE LIKHA HAI....DAAD dete hain.

  19. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    2 मार्च 2010 को 9:32 pm

    मोहतरमा फ़िरदौस साहिबा, आदाब

    मेरे महबूब...उम्र की तपती दोपहरी में.....
    घने दरख़्त की छांव हो तुम...
    आपकी ये नज़्म में पेश किये गये चंद अल्फ़ाज़ हो सकता है..
    मज़हब के जानकारों के नज़दीक उस हद तक जा रहे हों,
    जहां हमारे ख्यालों को परवाज़ की इजाज़त नहीं होती...
    लेकिन इससे नज़्म की खूबसूरती पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता......
    आपकी नज़्म...आपके एहसासात की तर्जुमानी है.
    ये कोई मज़हबी मोजू भी नहीं है..
    जिसको लेकर किसी तरह की बहस छेड़ी जाये.
    ये शायरी है..इसे शायरी की तरह ही लिया जाना मुनासिब होगा.
    नज़्म को लेकर ऐसे सवाल खड़े करने वाले महबूब के लिये शायरी में
    ज़रा चंद मिस्ल पर गौर फ़रमायें
    -खुदा भी आसमां से जब ज़मीं पर देखता होगा
    मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता होगा???

    - किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
    परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है...???

    -ए खुदा हर फ़ैसला तेरा मुझे मंज़ूर है....इसमें एक बंद है-
    हर दुआ मेरी किसी दीवार से टकरा गई......
    बेअसर होकर मेरी फ़रियाद वापस आ गई
    ...इस ज़मीं से आसमां शायद बहुत ही दूर है..
    यानि ये शायर का अपना ख्याल है.....

    वैसे मेरा एक शेर है...जिसमें बात कुछ यूं भी कही गई है-
    मांगता रहता हूं इक बुत को खुदा से अकसर
    इश्क़ ने कैसा मुसलमान बना रखा है....

    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  20. महफूज़ अली says:
    29 अप्रैल 2010 को 1:21 pm

    बिलकुल सही कहा कि जिस अल्लाह की हम उम्र भर इबादत करते हैं....तो उसकी दोज़ख को भी क्यूँ नहिजं कुबूल कर सकते हैं.....? अच्छा हुआ पस्तिश लफ्ज़ नहीं हटाया.... यही लफ्ज़ इस नज़्म को मुकम्मल बनता है.... बहुत अच्छी लगी यह नज़्म...

  21. Fauziya Reyaz says:
    7 मई 2010 को 6:47 pm

    bahut khoobsurat nazm....very romantic ya keh sakte hain sufi style mein likhi gayi nazm...waah

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