तुम्हारी मुहब्बत के फूल...


मेरे महबूब...
उम्र की रहगुज़र में 
हर क़दम पर मिले 
तुम्हारी मुहब्बत के फूल...
अहसास की शिद्दत से दहकते 
जैसे सुर्ख़ गुलाब के फूल...

उम्र की तपती दोपहरी में 
घनी ठंडी छांव से 
जैसे पीले अमलतास के फूल...

आंखों में इन्द्रधनुषी सपने संजोये
गोरी हथेलियों पर सजे 
जैसे ख़ुशरंग मेहंदी के फूल...  

दूधिया चांदनी रात में 
ख़्वाहिशों के बिस्तर पर बिछे 
जैसे महकते बेला के फूल...

मेरे महबूब 
मुझे हर क़दम पर मिले 
तुम्हारी मुहब्बत के फूल...
-फ़िरदौस ख़ान  

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आज प्रोमिस डे है


आज प्रोमिस डे है...यानी वादों का दिन... एक-दूजे से वादा करने का दिन...
लेकिन हम मानते हैं कि सबके अपने-अपने प्रोमिस डे हुआ करते हैं... जो किसी भी माह के किसी भी दिन, किसी भी तारीख़ को हो सकते हैं... बहरहाल, इसी बहाने कुछ गुज़श्ता लम्हे सामने आकर खड़े हो गए...
बात कई बरस पुरानी है... वो अपनी अम्मी के साथ खड़े थे... हम भी वहां थे... न जाने क्यों मन बहुत उदास था, इतना उदास कि बयान से बाहर... बाज़ दफ़ा ऐसा होता है कि मन बहुत उदास होता है, लेकिन हमें उदासी की वजह ख़ुद मालूम नहीं होती... शायद हम इस बारे में सोचते ही नहीं हैं कि हम उदास क्यों है... इसी तरह कई मर्तबा दिल बहुत ख़ुश होता है... इतना ख़ुश कि हवाओं में उड़ने का दिल चाहता है...
ख़ैर, उनकी नज़र हम पर पड़ी... और वो हमारे क़रीब आ गए... उन्होंने हमसे ’कुछ’ कहा... कुछ ऐसा कि हम उन अल्फ़ाज़ को कभी भूल ही नहीं सकते... उनका एक-एक लफ़्ज़ हमारी रूह पर लिखा गया... मुहब्बत की शिद्दत के रंग इतने गहरे थे कि हमारी रूह ही नहीं, हमारा तन-मन भी उन रंगों में रंग गया...
वो शायर नहीं हैं, लेखक नहीं हैं, कोई फ़नकार भी नहीं हैं... जिस पेशे से वो ताल्लुक़ रखते हैं, उसके मद्देनज़र हम सोच भी नहीं सकते थे कि वो मुहब्बत के जज़्बे से सराबोर रूहानी अल्फ़ाज़ का इस तरह से इस्तेमाल भी कर सकते हैं... किसी शायर ने भी शायद ही अपनी महबूबा से इन अल्फ़ाज़ में अपनी मुहब्बत का इक़रार किया होगा... उससे कोई वादा किया होगा...
वाक़ई, मुहब्बत इंसान को किस बुलंदी पर पहुंचा देती है... शायद इसीलिए, मुहब्बत में एक बादशाह तक अपनी महबूबा की ग़ुलामी दिल से क़ुबूल कर लेता है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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टेडी बियर

ज़िन्दगी में ऐसे मुक़ाम भी आया करते हैं, जब इंसान बहुत अकेला होता है... इतना अकेला कि उसे दूर-दूर तक कोई ऐसा दिखाई नहीं देता, जिससे पल दो पल वो अपने दिल की बात कर सके, जिसे बता सके कि वो कितना अकेला है... उसके पास कोई ऐसा नहीं होता, जिसे वो अपना कह सके... ऐसी हालत में कई बेजान चीज़ें अकेलेपन का सहारा बन जाया करती हैं, भले ही वह टेडी बियर जैसा कोई खिलौना ही क्यों न हो...

बहुत साल पहले की बात है. हमारे छोटे भाई ने हमारी सालगिरह पर तोहफ़े में हमें एक टेडी बियर दिया... हमें वह बहुत अच्छा लगा... हालत ये थी कि हम उसे बैग में रखते... यानी हम जिस शहर भी जाते, वह टेडी बियर हमारे साथ जाता...

जब घर से दूर होते, अकेले होते, उदास होते, तो वह टेडी बियर हमारा साथी होता... अम्मी ने कहा कि ये क्या बचपना है... हमने उसे अपनी अलमारी में रख दिया... जब मालूम हुआ कि आज टेडी डे है, तो न जाने क्यों उस टेडी बियर की बहुत याद आ रही है... वह बियर हमसे दूर है... इंशा अल्लाह इस बार उसे साथ लेकर आएंगे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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