काश ! उनसे एक मुलाक़ात हो जाए...

कई बरस पहले की बात है... हमारा अमरोहा जाना हुआ... वहां एक ख़ातून से मुलाक़ात हुई, जो ख़ानाबदोश ज़िन्दगी बसर करती हैं... उनका अपना न तो कोई ठिकाना है और न ही कोई मोबाइल नंबर, जिसके ज़रिये उनसे राब्ता किया जा सके... वे हमारे रिश्तेदार के पड़ौस में ही एक घर में ठहरी हुई थीं... वे बेहद ज़हीन थीं... उनकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं थी, पचपन साल के आसपास रही होगी...  उन्होंने इतनी ही बताई थी... उनसे गुफ़्तगू शुरू हुई, तो ज़िक्रे-इलाही तक पहुंच गई... हम उनसे मुतासिर हुए बिना नहीं रह सके... हमने उनसे कहा कि हम आपसे फिर मिलना चाहते हैं... उन्होंने कहा कि वे रात में हमारे पास आएंगी...
दिसंबर का महीना था... उस दिन ठंड भी ख़ूब थी... हम उनका इंतज़ार करते रहे... आधी रात गुज़र गई, लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी... हमारी मामी जान और मामूज़ाद बहन भी जाग रही थीं... रात के तक़रीबन दो बजे उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी... मामी जान ने दरवाज़ा खोला... आते ही उन्होंने कहा कि तुमसे मिलने का वादा किया था, तो आना ही था...
उनसे बहुत सी बातें हुईं... उन्होंने हमें दो बातें बताईं और कहा कि वे हमारी अम्मी जान से मिलना चाहती हैं... वे उन्हें हमारे बारे में कुछ बताना चाहती हैं... फ़ोन पर बात करने को उन्होंने मना कर दिया और कहा कि रूबरू होने पर ही वे बात करेंगी... ख़ैर...

हमने उनसे एक ऐसा सवाल किया, जो बरसों से हमारे ज़ेहन में था, लेकिन अब तक उसका जवाब हमें नहीं मिला था... सवाल सुनकर वे मुस्कराईं और उन्होंने एक लफ़्ज़ में जवाब दे दिया... जवाब सुनकर दिल को जो तस्कीन हुई, बेचैन रूह को जो क़रार मिला, वह बयान से बाहर है...
जिस सवाल का जवाब बड़े-बड़े आलिम नहीं दे पाए, उन्होंने इतनी आसानी से दे दिया... जवाब भी ऐसा लाजवाब कि फिर किसी सवाल की गुंजाइश ही बाक़ी नहीं रही...

उनसे मुलाक़ात के लम्हे हमारी ज़िन्दगी की किताब के वो वर्क़ हैं, जिन्हें हम बार-बार पढ़ना चाहते हैं... कई बरस बीत गए, लेकिन उनसे मुलाक़ात नहीं हो पाई... काश ! एक बार ही सही, उनसे एक मुलाक़ात और हो जाए... काश ! वो कहीं से आकर हमारे सामने खड़ी हो जाएं... काश ! ऐसा हो... आमीन...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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माहे-जून...


 आंधियों का मौसम शुरू हो चुका है... हमें आंधियां बहुत पसंद हैं... हमें आंधियों से निस्बत है... ये इस बात की अलामत हैं कि हमारा पसंदीदा माह यानी माहे-जून आने वाला है... माहे-जून में गर्मी अपने शबाब पर हुआ करती है... आलम यह कि दिन के पहले पहर से ही लू चलने लगती है... गरम हवाओं की वजह से सड़कें भी सुनसान हो जाती हैं... धूल भरी आंधियां भी ऐसे चलती हैं, मानो सबकुछ उड़ा कर ले जाना चाहती हैं... दहकती दोपहरें भी अलसाई-सी लगती हैं... बचपन में इस मौसम में दिल नहीं लगता था... दादी जान कहा करती थीं कि ये हवाएं मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं... इसलिए मन उड़ा-उड़ा रहता है... और कहीं भी मन नहीं लगता... तब से दादी जान की बात मान ली कि इस मौसम में ऐसा ही होता है... फिर भी हमें जून बहुत अच्छा लगता है... इस मौसम से मुहब्बत हो गई...  दहकती दोपहरें, गरम हवाएं, धूल भरी आंधियां... और किसी की राह तकती वीरान सड़क... वाक़ई, सबकुछ बहुत अच्छा लगता है... बहुत ही अच्छा... जैसे इस मौसम से जनमों-जनमों का नाता हो... एक ख़ास बात यह है कि जून की शुरुआत ही हमारी सालगिरह यानी एक जून से होती है... और फिर उनकी सालगिरह भी तो इसी माह में है, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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