ग़ज़ल


ज़िन्दगी में जीने का बस यही सहारा है
बन्दगी तुम्हारी है, ज़िक्र भी तुम्हारा है

घर में अर्शे-आज़म से, रहमतें उतर आईं 
सरवरे-दो आलम को, मैंने जब पुकारा है

मन्नतों के धागों को बांध के महब्बत से
औलिया की चौखट पर हाथ भी पसारा है

ग़म नहीं, ख़ज़ां भी हो, या बहार का मौसम 
साथ हमसफ़र है तो, ख़ुल्द का नज़ारा है

मैं ज़मीं प्यासी, तुम भीगता हुआ सावन 
ज़िन्दगी के गुलशन को तुमने ही निखारा है

तुम फ़िरौन हो तो क्या, ज़ालिमों ये मत भूलो
जो ख़ुदा तुम्हारा है, वह  ख़ुदा हमारा है

शुक्रे-ख़ुदा में फ़िरदौस अब, सर को रख के सजदे में 
हर घड़ी ये कहती हैं, ख़ूब ही संवारा है 
-फ़िरदौस ख़ान
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उम्मीद


मेरे महबूब! 
ज़ुल्म-ओ-सितम के 
इस दौर में 
उम्मीद की रौशनी हो तुम... 
-फ़िरदौस ख़ान
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यादें


मेरे महबूब! 
ये बूंदें हैं या तुम्हारी यादें
जो ज़िन्दगी को महका रही हैं... 
-फ़िरदौस ख़ान
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रौशनी


मेरे महबूब! 
गहरे स्याह अंधेरे में
जगमगाती रौशनी हो तुम... 
-फ़िरदौस ख़ान
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क़ुर्ब




मेरे महबूब! 
तुम्हारा क़ुर्ब
क़ुर्बे-इलाही है
तुम्हारे साये में
मेरी बेचैन रूह सुकून पाती है... 
-फ़िरदौस ख़ान

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शबे-ज़र्री


मेरे महबूब! 
शबे-ज़र्री मुबारक हो... 
मुहब्बत से सराबोर हर लम्हा मुबारक हो... 
मां की दुआओं के साये में गुज़रा वक़्त मुबारक हो... 
ख़ुदा करे, हम हमेशा यूं ही साथ रहें... आमीन
-फ़िरदौस ख़ान 
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