इतवार...


आज इतवार है... हमेशा की तरह आज भी तुम चर्च गए होंगे... फ़र्क़ बस इतना है कि आज हम तुम्हारे साथ नहीं हैं... आज ही क्या... न जाने कितने अरसे से हम एक साथ चर्च नहीं गए...
तुम्हें मालूम है... हर इतवार को वही बीता हुआ इतवार सामने आकर खड़ा हो जाता है... वही सर्दियों वाला इतवार... जब फ़िज़ा में ठंडक घुल चुकी थी... सुबहें और शामें कोहरे से ढकी हुई थीं... गुनगुनी धूप भी कितनी सुहानी लगती थी... ज़र्द पत्ते अपनी शाख़ों से जुदा होकर गिर रहे थे... चर्च के सामने वाली सड़क पर सूखे पत्तों का ढेर लग जाता था... चर्च की क्यारियों में कितने रंग-बिरंगे फूल अपनी शाख़ों पर इठलाते थे... माहौल में गुलाब की भीनी-भीनी महक होती थी...
तुम्हें याद है, जब ठंडी हवाएं चल रही थीं, तब तुमने अपना गर्म कोट उतार कर हमें पहना दिया था... बिना यह परवाह किए कि तुम्हें भी उस कोट की उतनी ही ज़रूरत थी... हमारे कोट लेने से मना करने पर तुमने मुस्कराते हुए कहा था- मर्दों को उतनी ठंड नहीं लगती... सच, उस कोट में हमने जो गर्मी महसूस की, उसमें तुम्हारी मुहब्बत की शिद्दत भी शामिल थी... कितने बरस बीत गए... जाड़ो के कई मौसम गुज़र गए... लेकिन उस कोट की गरमाहट हमारी रूह में अब तक बसी हुई है...
आज भी चर्च देखते हैं, तो तुम बहुत याद आते हो... और यह इतवार... भी उसी इतवार में जा बसा है, या यूं कहें कि वो इतवार अब हर इतवार में शामिल रहता है...
सुनो, हमें फिर से तुम्हारे साथ उसी इतवार को जीना है...

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सुर्ख़ फूल पलाश के...


फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं.
पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है. एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं.

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है.  इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है.

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं.
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.

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ज़िंदगी के रंग समेटे एक कविता संग्रह

फ़िरदौस ख़ान
कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को बहुत ज़रूरी माना जाता था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से आज़ाद हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का दौर शुरू हुआ. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. आज मुक्त छंद कविताओं की नदियां बह रही हैं. मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मन में हिलोरें लेने वाले जज़्बात, उसके ज़ेहन में उठने वाले ख़्याल और अनुभव प्रभावी हो गए और छंद लुप्त हो गए. मगर इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को इनसे बांधे रखती है. शौकत हुसैन मंसूरी की ऐसी ही कविताओं का एक संग्रह है-‘कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का’. इसे राजस्थान के उदयपुर के अंकुर प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.  इस कविता संग्रह में एक गीत और कुछ क्षणिकाएं भी हैं. 

बक़ौल शौकत हुसैन मंसूरी हृदय में यदि कोई तीक्ष्ण हूक उठती है.एक अनाम-सी व्यग्रता सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर छाई रहती है और कुछ कर गुज़रने की उत्कट भावना हमारी आत्मा को झिंझोड़ती रहती है. ऐसी परिस्थिति में, कितना ही दीर्घ समय का अंतराल हमारी रचनाशीलता में पसर गया हो, तब भी अवसर मिलते ही, हृदय में एकत्रित समस्त भावनाएं, विचार और संवेदनाएं अपनी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त होती ही हैं. सिर्फ़ ज्वलंत अग्नि पर जमी हुई राख को हटाने मात्र का अवसर चाहिए होता है. तदुपरांत प्रसव पीड़ा के पश्चात जो अभिव्यक्ति का जन्म होता है. वह सृजनात्मक एवं गहन अनुभूति का सुखद चरमोत्कर्ष होता है. यह काव्य संग्रह ऐसी ही प्रसव पीड़ा के पश्चात जन्मा हुआ अभिव्यक्ति का संग्रह है. 

उनकी कविताओं में ज़िंदगी के बहुत से रंग हैं. अपनी कविता ‘आत्महन्ता’ में जीवन के संघर्ष को बयां करते हुए वे कहते हैं-
विपत्तियां क्या हैं
रहती हैं आती-जातीं
सारा जीवन ही यूं
भरा होता है संघर्षों से...

बदलते वक़्त के साथ रिश्ते-नाते भी बदल रहे हैं. इन रिश्तों को कवि ने कुछ इस अंदाज़ में पेश किया है-
रिश्तों की अपनी-अपनी
होती है दुनिया
कुछ रिश्ते होते हैं दिल के
क़रीब और कुछ सिर्फ़
होते हैं निबाहने की ख़ातिर...
कविताओं में मौसम से रंग न हों, ऐसा भला कहीं होता है. दिलकश मौसम में ही कविताएं परवान चढ़ती हैं. कवि ने फागुन के ख़ुशनुमा रंग बिखेरते हुए कहा है-
खिल गए हैं फूल सरसों के
पड़ गया है दूध
गेहूं की बाली में
लगे बौराने आम
खट्टी-मीठी महक से बौरा गए वन-उपवन

कवि ने समाज में फैली बुराइयों पर भी कड़ा प्रहार किया है, वह चाहे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध हों, भ्रष्टाचार हो, सांप्रदायिकता का ज़हर हो, भीड़ द्वारा किसी को भी घेरकर उनका सरेआम बेरहमी से क़त्ल कर देना हो, रूढ़ियों में जकड़ी ज़िदगियां हों, या फिर दरकती मानवीय संवेदनाएं हों. सभी पर कवि ने चिंतन किया है. इतना ही नहीं, कवि ने  निराशा के इस घने अंधकार में भी आस का एक नन्हा दीया जलाकर रखा है. कवि का कहना है-
ज़िन्दगी में फैले अंधेरे को
मिटाने का आत्म विश्वास इंसानों को
स्वयं पैदा करना होता है     

बहरहाल, भावनाओं के अलावा काव्य सृजन के मामले में भी कविताएं उत्कृष्ट हैं. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीक़े से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण सूफ़ियाना है, जो इसे आकर्षक बनाता है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का
कवि : शौकत हुसैन मंसूरी
प्रकाशक : अंकुर प्रकाशन, उदयपुर (राजस्थान)
पेज : 112
मूल्य : 150 रुपये

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