किताब लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
किताब लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

साम्प्रदायिक सदभाव की अलख जगाती पुस्तक


मोहम्मद अफ़ज़ाल
प्रस्तुत पुस्तक ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में लेखिका फ़िरदौस ख़ान का उद्देश्य हिन्दुस्तान की उस तहज़ीब को प्रकाश में लाना है, जिसकी बुनियाद पर भारतीय समाज परवान चढ़ा. किसी भी देश की आत्मा को अगर समझना है, तो उसके लिए उस देश के समाज और उसकी प्रवृत्ति का अध्ययन अति आवश्यक है. जिस समाज का आधार प्रेम हो, वहां मानवता है. और अहिंसा मानवता का प्रतीक है. सम्राट अशोक के हाथ में जब तक तलवार रही, वह क्रूर और ज़ालिम कहलाया. जब उसने अहिंसा का दामन थामा, तो वह एक महान सम्राट अशोक बन गया. संसार में अगर कहीं कोई ऐसा समाज है, जहां मानवता, प्रेम और अहिंसा जिसके आचरण में विद्यमान है, वह हमारा प्रिय देश हिन्दुस्तान ही है. इसका वातावरण, जलवायु और इसकी मिट्टी जिसकी ख़ुशबू इतनी लुभावनी और मनभावन है कि जब उसकी ख़ुशबू वातावरण में रच-बसकर संसार में फैली तो इसकी ठंडक और महक को अरब तक महसूस किया गया और संसार के लिए देश आकर्षण आ केंद्र बन गया.

कोई व्यक्ति मानवता, प्रेम और अहिंसा का पाठ पढ़ने के लिए इस देश की ओर आकर्षित हुआ, तो कोई ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए हाथ में कांसा-ए- गदाई (भिक्षा पात्र) के साथ इसकी संस्कृति को नये आयाम देने के लिए यहां आया. क्योंकि वे जानते थे कि जिस सम्मान और प्रेम की उन्हें तलाश है, वह इसी पवित्र धरती पर उन्हें मिल सकता है. कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने तलवार के बल पर इसकी सभ्यता और संस्कृति को तबाह करने की कोशिश की, तो किसी ने छल-कपट और बल के द्वारा इस समाज की एकता की जड़ें हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन ऋषि-मुनियों और औलिया, पीर-फ़क़ीरों ने अपनी अमर वाणी द्वारा मानवता, प्रेम और अहिंसा के इस दीपक को कभी बुझने नहीं दिया. उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया कि किसी जलधारा, मज़हब और धर्मों के उदगम स्थान अलग-अलग हो सकते हैं. मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करके निरंतर आगे बढ़ना उनके जीवन का प्रतीक है, लेकिन संगम ही उसको अमरता प्रदान करता है.

 ’गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक के नाम से ही यह ज्ञात हो जाता है कि इसमें ऐसी महान हस्तियों का बखान है, जिन्होंने संसार के किसी अन्य भूमि के टुकड़े पर जन्म लिया हो, लेकिन इस देश की माटी, संस्कृति के आकर्षण, मोह, ज्ञान और प्रेरणा से अपने आपको अछूता न रख सके तथा उनके क़दम बरबस इस धरती की ओर खींच लाए. कुछ ऐसे महापुरुष भी इस पुस्तक के केंद्र में हैं, जिनका जन्म इस धरती पर मुस्लिम परिवार में हुआ, लेकिन उनकी लेखनी और जीवन शैली पर हिन्दू देवी-देवताओं का राज था. रसखान मुस्लिम होते हुए भी दूसरे जन्म की कामना करते हैं. वह भी इस शर्त के साथ कि जन्म चाहे किसी भी रूप में हो, लेकिन जन्म स्थल ब्रज ही हो. सम्राट अकबर की पत्नी ताजबीबी भगवान श्रीकृष्ण की भक्त थीं, जिसे सम्राट अकबर ने भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा चित्र भेंट किया, जिसकी क़ीमत चित्रकार को इतनी दी कि उसे जीवन में कोई और चित्र बनाने की आवश्यकता ही न पड़े. इसके अलावा संत लालदास, भक्त लतीफ़ शाह, पेमी, अब्दुल समद, संत वाजिंद, संत बाबा मलेक ऐसे नाम हैं, जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुस्तान की संस्कृति की सेवा की. इसमें कोई शक नहीं कि अगर उन्होंने यह कार्य किसी मुस्लिम देश में किया होता, तो उन्हें मौत की नींद सुला दिया जाता. मगर हमारी संस्कृति की महान उपलब्धि यही है कि हिन्दू परिवार में जन्म लेकर इस्लाम और मुस्लिम परिवार में जन्म लेकर हिन्दू संस्कृति का बखान किया गया है अर्थात अभिव्यक्ति की आज़ादी भी हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत पुस्तक में 55 महान हस्तियों का बखान किया है. उनमें से कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिन्होंने न तो इस धरती पर जन्म लिया और न ही वे कभी इस धरती पर आकर बसे, लेकिन उन्होंने भी अत्यंत कठिन मार्ग पर चलकर जनमानस की सेवा की. अर्थात जन्म,  उदगम स्थान और मार्ग कोई भी हो दानवता रूपी क्रूर राक्षस को इस धरती से मिटाना उनका उद्देश्य रहा. संसार में जहां कहीं भी प्रेम, मानवता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाता है, वहां भी भारतीय संस्कृति की ही आत्मा बसती है. लेखिका ने जिस सुंदर ढंग से 55 महान अनमोल मोतियों को पुस्तक रूपी अटूट माला में पिरो दिया, जिसका लाभ दिव्य दृष्टि रखने वाले पारखी पाठकजन अवश्य उठाएंगे.

लेखिका फ़िरदौस ख़ान का इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य मुस्लिम संत-फ़क़ीरों द्वारा जगाई गई प्रेम, अहिंसा और भाईचारे की अलख से जनमानस को अवगत कराना है. ये संत-फ़क़ीर बेशक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक और गंगा-जमुनी तहज़ीब के स्तंभ हैं. अफ़सोस की बात तो यह है कि इनका ज़िक्र अकसर लोगों की ज़ुबान पर आता तो है,  लेकिन वो इसकी आत्मा से दूर और इसके अर्थ से आज तक नावाक़िफ़ रहे हैं. इस तहज़ीब को परवान चढ़ाने के लिए सिर्फ़ हाथ से हाथ मिलाना काफ़ी नहीं, बल्कि साथ-साथ चलकर ऐसे मधुर संगम को प्राप्त करना है, जहां केवल प्रेम, अहिंसा और मानवता का वास हो.
(लेखक मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक हैं)


किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

प्रकाश स्तंभ जैसी किताब : इंद्रेश कुमार


हमारी किताब ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया गया है...  इसकी ‘प्रस्तावना’ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इंद्रेश कुमार ने लिखी है...इसी प्रस्तावना को यहां प्रकाशित कर रही हूं...

लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.

इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) हज, (4) रो्ज़ा और (5) ज़कात. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.

इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.

हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.

एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं

शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया

इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.

भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.

मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
(लेखक इंद्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)

किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) 
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

विश्व पुस्तक मेले में हमारी किताब...




विश्व पुस्तक मेले में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर हमारी किताब
यूं तो पुस्तक प्रेमियों को हमेशा ही विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतज़ार रहता है...लेकिन इस बार बात अलग थी...क्योंकि हमारी किताब भी विश्व पुस्तक मेले में प्रदर्शित होने वाली थी...वो दिन भी आया जब राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे पुस्तक मेले में हमारी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' भी छाई रही... इसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने शाया किया है. अपनी किताब को यहां देखकर बेहद ख़ुशी हुई...जैसा नाम से ही ज़ाहिर होता है...हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों और फ़क़ीरों  की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्‍तुत किया गया है...

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित 19वां विश्व पुस्तक मेला राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में 30 जनवरी को शुरू हुआ. सात फ़रवरी तक चले इस पुस्तक मेले का उदघाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने किया. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि विश्व पुस्तक मेला एक संवृद्ध विरासत है. इस पुस्तक मेले का मक़सद हज़ारों किताबों  को ज़्यादा से ज़्यादा  लोगों तक पहुंचाना है. अपने एक संदेश में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल  ने कहा कि किताबें मानव ज्ञान का भंडार हैं और यह महत्वपूर्ण है कि देश के पाठकों के लिए सभी क्षेत्र से जुड़ी पुस्तकें उपलब्ध हों.
देश-विदेश के तक़रीबन 1,200 प्रकाशकों ने पुस्तक मेले में अपनी किताबों की प्रदर्शनी लगाई. तक़रीबन  4,200 वर्गमीटर में फैले इस मेला क्षेत्र में 2,400 बुक स्टॉल लगाए गए.  इस साल पिछले साल से ज़्यादा स्टॉल लगे.  हालत यह रही कि हॉल के बाहर भी काफ़ी जगह प्रकाशकों को दी गई . मेले में तक़रीबन 90  फ़ीसदी अंग्रेजी की किताबें थीं.  अमेरिका और ब्रिटेन के बाद हिन्दुस्तान अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन का तीसरा सबसे बड़ा देश है. हिन्दुस्तान दुनिया के बड़े पुस्तक बाजारों में एक है और इसी वजह से दुनियाभर के प्रकाशकों ने हिन्दुस्तान का रुख़ किया है. साल 2006 के फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में दूसरी बार अथिति देश होना, साल 2009 के लंदन पुस्तक मेले का ‘मार्केट फोकस’ होना और 2009 के मास्को पुस्तक मेले में अथिति देश होना पुस्तक बाज़ार में हिन्दुस्तान के महत्व को रेखांकित करता है. अन्य भाषाओं का ज़िक्र करें तो यहां 18 से ज़्यादा भाषाओं में किताबें प्रकाशित होती हैं.  यहां विभिन्न भाषाओं के 12 हज़ार से ज़्यादा प्रकाशक हैं, जो हर साल तक़रीबन एक लाख किताबें प्रकाशित करते हैं. यहां सबसे ज़्यादा किताबें क्षेत्रीय भाषाओं में छपती हैं. इनमें हिंदी पहले स्थान पर है.

इस बार का मेला राष्ट्रकुल खेल को समर्पित किया गया था. इस पुस्तक मेले की विषय वस्तु ‘रीडिंग अवर कॉमनवेल्थ’ यानी ‘हमारे साझा वैभव का अध्ययन’ थी. राष्ट्रकुल खेल के नाम एक पूरा पवेलियन था, जिसमें खेल से जुड़ी दुनियाभर की किताबें थीं.  इसके लिए कैटलॉग भी बनाया गया था, ताकि बाद में भी उन किताबों के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की जा सके. देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू पर अलग से किताबें प्रदर्शित की गईं . इनमें नेहरू पर लिखी दुनियाभर की किताबों को शामिल किया गया. मेले में एक बाल पवेलियन भी था, जिसमें अनेक एनजीओ द्वारा बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियां शामिल थीं.

ग़ौरतलब है कि मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट द्वारा हर दूसरे साल विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है. यह एक स्वायत्त संगठन है और इसका काम किताबों को बढ़ावा देना है. इसके अलावाब भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन सह-संयोजक के तौर पर इस मेले में शामिल रहता है. यह भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तत्वावधान में काम करता है. यह देश के व्यापार और उद्योगों के विकास के लिए काम करता है. विश्व  पुस्तक मेले के आयोजन का मक़सद जनमानस में किताबों के लिए दिलचस्पी  पैदा करना है.

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा  द्विवार्षिक विश्व पुस्तक मेला पहली बार 1972 में दिल्ली के विंडसर पैलेस इलाक़े में लगा था. तक़रीबन 7780 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित इस मेले में 200 प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था. अगली बार यानी 1976 में लगे दूसरे विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशकों की तादाद बढ़कर 266 हो गई थी.  इस साल 42,839 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित 19वें विश्व पुस्तक मेले में 1234 प्रकाशकों ने शिरकत की. 2006 में आयोजित पुस्तक मेले में 10 लाख से ज़्यादा लोग आए थे, जबकि इस साल इनकी तादाद तक़रीबन 20 लाख तक पहुंच गई थी.

दुनियाभर के प्रकाशक सैकड़ों नई किताबें लेकर आए. प्रभात प्रकाशन के प्रमुख प्रभात कुमार ने बताया कि वे पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृषण आडवाणी की मेरा देश मेरा जीवन और फ़िरदौस ख़ान की किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत के सहित कई अच्छी किताबें लेकर आए, जिन्हें बहुत सराहा गया. राजकमल प्रकाशन की किताबें भी मेले में छाई रहीं. किताब घर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत का कहना है कि वे 35 नईं किताबें लेकर आए. इनमें साहित्यिक पुस्तकों के अलावा ज्ञान-विज्ञान से संबंधित किताबें भी शामिल थीं. ओशियन बुक्स के निदेशक डॉ. पीयूष कुमार भी हिंदी और अंग्रेजी की सौ से ज़्यादा नई किताबें लाए., जिनमें हिंदी की किताबें ज़्यादा थीं. रॉली बुक्स और डायमंड बुक्स ने भी कई नई किताबें प्रदर्शित कीं.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार कहते हैं- लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफलताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे. मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.




किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत 
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये


प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006


प्रभात प्रकाशन 
4/19, आसफ़  अली रोड, दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 23289555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan





  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS