जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते...


होंठों पे मुहब्बत के तराने नहीं आते
जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते

हल कोई जुदाई का निकालो मेरे हमदम
अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते

बादल तो गरजते हैं, मगर ये भी हक़ीक़त
आंगन में घटा बनके वो छाने नहीं आते

क़दमों में बहारें तो बहुत रहती हैं लेकिन
'फ़िरदौस' को ये रास ख़ज़ाने नहीं आते
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

5 Response to "जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते..."

  1. Dilbag Virk says:
    16 सितंबर 2015 को 8:02 pm

    आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 17-09-2015 को चर्चा मंच के अंक चर्चा - 2101
    में की जाएगी
    धन्यवाद

  2. Neetu Singhal says:
    16 सितंबर 2015 को 10:44 pm

    >> जो बीत गए वो जमाने नहीं आते..,
    आते हैं नए लोग पुराने नहीं आते
    लकड़ी के मकानों में चरागों को न रखना
    अब पड़ोसी भी आग बुझाने नहीं आते
    ------ ॥ अज्ञात ॥ -----

  3. संजय भास्‍कर says:
    17 सितंबर 2015 को 11:14 am

    अच्छी प्रस्तुति......सुन्दर

  4. राजेंद्र कुमार says:
    17 सितंबर 2015 को 1:01 pm

    आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (18.09.2015) को "सत्य वचन के प्रभाव "(चर्चा अंक-2102) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

  5. प्रतिभा सक्सेना says:
    18 सितंबर 2015 को 9:47 am

    वाह !

एक टिप्पणी भेजें