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मेरे महबूब...


आज उनकी सालगिरह है, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं... इस मुबारक मौक़े पर उन्हें समर्पित एक नज़्म ’मेरे महबूब’ पेश-ख़िदमत है...
मेरे महबूब !
तुम्हारा चेहरा
मेरा क़ुरआन है
जिसे मैं
अज़ल से अबद तक
पढ़ते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा ज़िक्र
मेरी नमाज़ है
जिसे मैं
रोज़े-हश्र तक
अदा करते रहना चाहती हूं…

तुम्हारा हर लफ़्ज़
मेरे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है
तुम्हारी हर बात पर
लब्बैक कहना चाहती हूं...

मेरे महबूब !
तुमसे मिलने की चाह में
दोज़ख़ से भी गुज़र हो तो
गुज़र जाना चाहती हूं…

तुम्हारी मुहब्बत ही
मेरी रूह की तस्कीन है
तुम्हारे इश्क़ में
फ़ना होना चाहती हूं…
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान


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रहमतों की बारिश

एक मुबारक तारीख़... एक सजदा... 
एक रूहानी तारीख़, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते...
1 फ़रवरी  2021 हिजरी 18 जुमादा अल आख़िर 1442
इस मुबारक मौक़े पर अपने प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित हमारा एक कलाम
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में पेश कर रहे हैं-
रहमतों की बारिश...
मेरे मौला !
रहमतों की बारिश कर
हमारे आक़ा
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर
जब तक
कायनात रौशन रहे
सूरज उगता रहे
दिन चढ़ता रहे
शाम ढलती रहे
और रात आती-जाती रहे
मेरे मौला !
सलाम नाज़िल फ़रमा
हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
और आले-नबी की रूहों पर
अज़ल से अबद तक...
-फ़िरदौस ख़ान
#रूहानी_कलाम
#तारीख़
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अक़ीदत के फूल...

अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित एक कलाम...
अक़ीदत के फूल...

मेरे प्यारे आक़ा
मेरे ख़ुदा के महबूब !
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
आपको लाखों सलाम

प्यारे आक़ा !
हर सुबह
चमेली के
महकते सफ़ेद फूल
चुनती हूं
और सोचती हूं-
ये फूल किस तरह
आपकी ख़िदमत में पेश करूं

मेरे आक़ा !
चाहती हूं
आप इन फूलों को क़ुबूल करें
क्योंकि
ये सिर्फ़ चमेली के
फूल नहीं है
ये मेरी अक़ीदत के फूल हैं
जो
आपके लिए ही खिले हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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दीदार...

तारीख़ 8 जनवरी 2017... इस्लामी हिजरी 1437, 9 रबीउल आख़िर,
दिन इतवार... वक़्त इशराक़... जगह दिल्ली...

हमारी एक रूहानी नज़्म
दीदार...
मेरे मौला !
न तू मुझसे ग़ाफ़िल
न मैं तुझसे ग़ाफ़िल
न तू मुझसे जुदा
न मैं तुझसे जुदा
तू मुझ में है
और मैं तुझ में...
दरमियां हमारे
कोई पर्दा न रहा
मैंने
कायनात के हर ज़र्रे में
तेरा दीदार किया है...
-फ़िरदौस ख़ान


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सजदा...


मेरे मौला
मेरा एक सजदा
तो ऐसा हो
जो तुझे पसंद आ जाए...
-फ़िरदौस ख़ान

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अल्लाह तू ही तू...


मेरे मौला
मुझे तेरी दोज़ख़ का ख़ौफ़ नहीं
और ना ही
तेरी जन्नत की कोई ख़्वाहिश है
मैं सिर्फ़ तेरी इबादत ही नहीं करती
तुझसे मुहब्बत भी करती हूं
मुझे फ़िरदौस नहीं, मालिके-फ़िरदौस चाहिए
क्यूंकि
मेरे लिए तू ही काफ़ी है
अल्लाह तू ही तू...
-फ़िरदौस ख़ान

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कलमा...


मेरे मौला !
मेरे मौला !
पहले भी ज़ुबां पर
उनका नाम रहता था...
मगर
अब भी शामो-सहर ज़ुबां पर
कलमे की तरह
उनका नाम ही रहता है...
वो इश्क़े-मजाज़ी था
और
ये इश्क़े-हक़ीक़ी है…
-फ़िरदौस ख़ान 
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