गरमी से बेहाल
प्यासी चिड़ियों के लिए
घने दरख्तों की शाख़ों पर
ठंडे पानी से भरे
मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...
किसी न ख़त्म होने वाले
सवाब की तरह... -फ़िरदौस ख़ान
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फ़िरदौस ख़ान
इस बलॊग में ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं
19 मई 2010 को 10:39 am बजे
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.
19 मई 2010 को 10:46 am बजे
सच कहा आपने ।
19 मई 2010 को 11:23 am बजे
संवेदनशील....सुन्दर अभिव्यक्ति
19 मई 2010 को 12:06 pm बजे
waah !
19 मई 2010 को 12:49 pm बजे
अनुपम....
कुंवर जी,
19 मई 2010 को 1:06 pm बजे
बहुत सुंदर विचार
19 मई 2010 को 2:28 pm बजे
बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति.
19 मई 2010 को 2:49 pm बजे
एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब
19 मई 2010 को 4:37 pm बजे
शानदार अभिव्यक्ति!
19 मई 2010 को 6:53 pm बजे
यक़ीनन ! बहुत ख़ूब !!
19 मई 2010 को 10:48 pm बजे
सच में, यह सवाब ही तो है।
20 मई 2010 को 5:01 pm बजे
अति उत्तम. आज इस तरह के लेखन की बहुत आवश्यकता है, जो अपनी परंपराओं और संस्कृति सर ओत-प्रोत हो.
21 मई 2010 को 11:44 am बजे
विलक्षण...वाह !!
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'शब्द-शिखर' पर- ब्लागिंग का 'जलजला'..जरा सोचिये !!
24 मई 2010 को 7:38 pm बजे
संवेदनशील....सुन्दर अभिव्यक्ति.....
26 मई 2010 को 10:16 pm बजे
अति उतम