रमज़ान और ग़रीबों का हक़
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रमज़ान आ रहा है... जो साहिबे-हैसियत हैं, रमज़ान में उनके घरों में लंबे-चौड़े
दस्तरख़्वान लगते हैं... इफ़्तार और सहरी में लज़ीज़ चीज़ें हुआ करती हैं, लेकिन जो
ग़र...
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16 सितंबर 2015 को 8:02 pm बजे
आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 17-09-2015 को चर्चा मंच के अंक चर्चा - 2101
में की जाएगी
धन्यवाद
16 सितंबर 2015 को 10:44 pm बजे
>> जो बीत गए वो जमाने नहीं आते..,
आते हैं नए लोग पुराने नहीं आते
लकड़ी के मकानों में चरागों को न रखना
अब पड़ोसी भी आग बुझाने नहीं आते
------ ॥ अज्ञात ॥ -----
17 सितंबर 2015 को 11:14 am बजे
अच्छी प्रस्तुति......सुन्दर
18 सितंबर 2015 को 9:47 am बजे
वाह !