चमकते ख़्वाब...


जब
ज़िन्दगी
किसी ख़मोश लम्हे की तरह
चुपके से
मेरे सिरहाने
आकर खड़ी हो जाती है
तब
मैं सोना चाहती हूं
अपनी पलकों की छांव में
किसी उजले दिन की तरह
चमकते ख़्वाबों को लिए हुए...
-फ़िरदौस ख़ान

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एक किताब जो आपकी ज़िंदगी बदल देगी


फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरती किसे नहीं भाती. हर इंसान ख़ूबसूरती से प्यार करता है, चाहे वह तन की हो या फिर मन की. वह ख़ूबसूरत चीज़ों को देखना चाहता है. हम फूलों को इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि वे बेहद ख़ूबसूरत होते हैं और हमें ख़ुशी देते हैं. इंसान ख़ुद को भी ख़ूबसूरत देखना चाहता है. इसलिए वह रंग-बिरंगी पोशाकें पहनता है, ज़ेवर से ख़ुद को सजाता-संवारता है और कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल कर अपना रंग-रूप निखारता है. लेकिन सिर्फ़ ख़ूबसूरती ही काफ़ी नहीं होती, इंसान के विचार, उसके काम और उसका मन ख़ूबसूरत होना लाज़िमी है. ये गुण इंसान को अपने परिवार से मिलते हैं. पहले के दौर में जहां इंसान में सिर्फ़ अच्छे गुण होना ही काफ़ी माना जाता था, वहीं आज के दौर में इंसान का जिस्मानी रूप से ख़ूबसूरत होना भी मायने रखने लगा है. ख़ूबसूरती आत्मविश्वास का पर्याय बनती जा रही है.  इंटरव्यू पर जाने से पहले लोग दिमाग़ी कसरत की बजाय अपने कपड़ों और मेकअप पर ज़्यादा तवज्जो देने लगे हैं. बदलते परिवेश के मद्देनज़र अब जगह-जगह ख़ूबसूरत बनाने के सेंटर भी खुलने लगे हैं. कोई क़द बढ़ाने का दावा करता है, तो कोई गोरा बनाने का. इंसान को सुडौल बनाने के लिए भी सेंटर खुले हुए हैं. बाज़ार में सौंदर्य से संबंधित कई किताबों की भी भरमार है.

हाल में डायमंड बुक्स ने नमिता जैन की एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है आख़िरी 5 किलो कैसे घटाएं. इस किताब में वज़न घटाने के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है. नमिता जैन जीवनशैली और वज़न नियंत्रण विशेषज्ञ हैं. इससे पहले उनकी चार सप्ताह में वज़न कैसे घटाएं और टीन फिटनेस गाइड नामक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. इस किताब में वह उन आख़िरी पांच किलो वज़न के बारे में बात कर रही हैं, जो अमूमन वज़न घटाने की प्रक्रिया के आख़िर में अटक कर रह जाता है. उन्होंने वज़न घटाने के लिए एक संपूर्ण पहल अपनाने पर ज़ोर दिया है, जिसमें डाइट और व्यायाम के साथ मानसिक सेहत भी शामिल है. दरअसल, डायटिंग करने वाले को एक खिलाड़ी की तरह होना चाहिए. जीतने के लिए शुरू ही नहीं, आख़िर भी अच्छा होना चाहिए. लेकिन होता इसका बिल्कुल उल्टा है, क्योंकि वज़न कम करने के लिए एक लक्ष्य की ज़रूरत होती है और आप अपने लक्ष्य के जितना क़रीब आते हैं, उसे पाना उतना ही मुश्किल होता है. बहुत-सी ऐसी किताबें हैं, जो आपको लक्ष्य शुरू करने के लिए प्रेरित करती तो हैं, पर आख़िर तक पहुंचा नहीं पातीं. इसके विपरीत बहुत-सी किताबें वज़न घटाने में बहुत मददगार साबित होती हैं. नमिता कहती हैं, जब भी वज़न घटाना हो तो सोच-समझकर संतुलित आहार लेना बहुत ज़रूरी हो जाता है. बेशक यह धीमी प्रक्रिया आपके धैर्य की परीक्षा लेती है, पर आख़िर में जीतते आप ही हैं.
उन्होंने किताब में उन लोगों के बारे में भी ज़िक्र किया है, जो ग़लत और हानिकारक तरीक़ों से वज़न घटाने के उपाय तलाशते हैं जैसे भूखे रहना या फिर व्यायाम की अति कर देना. अमूमन इन तरीक़ों को अपनाकर फ़ौरी तौर पर फ़ायदा तो पा लेते हैं, लेकिन वे जान नहीं पाते कि ये सब उनके लिए कितना नुक़सानदेह हो सकता है. आजकल हेल्थ फार्म का चलन बढ़ गया है और यहां जाकर लोग अपने वज़न को नियंत्रित करने में लगे हुए होते हैं, जबकि यह तभी तक आपके लिए फ़ायदेमंद हो सकता है, जब तक आप घर आकर भी उसी अनुशासित जीवनशैली को अपनाते हैं, जबकि ऐसा संभव नहीं हो पाता. उन्होंने संतुलित आहार लेने पर ज़ोर दिया है. वह कहती हैं, केवल भोजन की कैलोरी न गिनें, उस भोजन पर भी ध्यान दें, जिससे कैलोरी मिलती है. फिटनेस लक्ष्य के प्रति इन कुछ आख़िरी क़दमों में आपको एक ऐसा संपूर्ण भोजन चाहिए, जो आपको पूरी तरह से ऊर्जा और तंदुरुस्ती का तोहफ़ा दे सके. मिनिरल्स, प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ, फल-सब्ज़ियां, वसा और चीनी के मेल से आपका आहार संतुलित हो सकता है. किताब में विभिन्न कैलोरी की ज़रूरत के मुताबिक़ मेन्यू भी दिया गया है, ताकि हर व्यक्ति अपनी ज़रूरत के हिसाब से डाइट ले सके. आख़िरी पांच किलो वज़न घटाने की प्रक्रिया में सब चीज़ें बहुत महत्व रखती हैं, जो कुछ भी खाएं, उस पर नज़र रखनी होगी. कहीं ऐसा न हो कि आप भी यही कहती सुनाई दें कि मैं तो कुछ खाती ही नहीं, पता नहीं वज़न कैसे बढ़ गया. इसलिए यह ज़रूरी है कि हमें जब भूख लगती है तो हम सबसे पहले अपने आसपास या रसोई की अलमारियों में रखी चीज़ों को ही खाते हैं. अगर वहां सेहतमंद खाद्य पदार्थ रखे होंगे तो निश्चित रूप से आप वही खाएंगे, इसलिए जब भी रसोई का सामान ख़रीदने जाएं, तो जंक फूड ख़रीदने से बचें और ऐसी चीज़ें लें, जो वज़न घटाने में मदद करें और साथ ही पोषण संबंधी कमियों को भी पूरा कर सकें. तेल रहित व्यंजन विधियां देने के बाद किताब में व्यायाम और फिटनेस दिनचर्या पर चर्चा की बारी आती है.
हर व्यक्ति को अपने कार्य, जीवनशैली और ज़रूरत के मुताबिक़ वर्कआउट प्लान बनाना चाहिए. यह ज़रूरी नहीं कि आपके पास जिम के महंगे उपकरण ही हों. अगर जिम जाने की सुविधा या वक़्त न हो तो सैर भी कर सकते हैं. यह आसान और सुरक्षित होने के साथ-साथ किफ़ायती भी है. इसके बाद वह योगासनों की चर्चा करती हैं. उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी जीवनशैली में किसी न किसी रूप में व्यायाम को शामिल करना चाहिए. अगर व्यायाम से बोरियत हो तो कोई दूसरा तरीक़ा खोजें.
किताब के 39 अध्याय हैं और हर अध्याय के आख़िर में टिप्स दिए गए हैं, जो बेहद महत्वपूर्ण हैं. इसी तरह एक अध्याय के आख़िर में वह कहती हैं कि जहां भी जाएं, पानी की बोतल साथ रखें. व्यायाम या स़फर के दौरान थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें. हर खाने के साथ पानी पीने की आदत डालें. पानी पीने के लिए प्यास लगने का इंतज़ार न करें. अगर ऐसा करते हैं तो इसका मतलब है कि आपमें पानी की कमी हो रही है. दरअसल, पानी पीने से भूख मिटती है और नई ऊर्जा मिलती है. दोनों ही वज़न घटाने के बेहतरीन नुस्खें हैं. ताज़े फल और सब्ज़ियां खाएं. भूख लगने पर ही खाएं और पेट भरते ही खाना बंद कर दें. लिफ्ट की बजाय घर और कार्यालय में सीढ़ियों का इस्तेमाल करें. चलते-फिरते रहें. लगातार बैठे रहने से हाथों-पैरों में जकड़न आती है. चलने-फिरने से रक्त संचार बना रहता है. सुबह जल्दी उठकर सैर पर जाएं. सुबह की धूप से मिलने वाले विटामिन डी से हड्डियों मज़बूत होंगी. थो़डा संगीत सुनें और घर का कामकाज भी करें.

किताब के चौथे हिस्से में माइंड पावर की बात की गई है. जब मन पर नियंत्रण होता है, तो शरीर भी उसी के हिसाब से चलता है. आपको भी अपने मन को ताक़तवर बनाना है, ताकि वह लक्ष्य तक जाने में मददगार हो सके. आख़िर में वह पाठकों से अनुरोध करती हैं कि जब वे अपने वज़न घटाने के लक्ष्य की ओर कुछ क़दम बढ़ाएं तो ख़ुद को दुलारना न भूलें. अपनी पीठ थपथपाएं, क्योंकि वज़न घटाना कोई मज़ाक़ नहीं है. आपने कड़ी मेहनत और लगन से यह लक्ष्य पाया है. तनाव से दूर रहें और आख़िरी पांच किलो घटाने की यह लड़ाई जीत लें. आख़िरी पांच किलो को अलविदा कहें और एक सेहतमंद ज़िंदगी से हाथ मिलाएं.

बेशक, यह किताब आपको वज़न घटाने के लिए प्रेरित करते हुए आपके लक्ष्य तक पहुंचने में आपकी मदद करती है, लेकिन यह क़तई न भूलें कि इस राह पर चलना तो आप ही को है. इसलिए अपने मन को मज़बूत करें, और चल पड़ें अपने लक्ष्य की ओर. इंसान चाहे तो वह अपनी लगन और मेहनत के बूते हर उस लक्ष्य को हासिल कर सकता है, जिसे वह पाना चाहता है. बहरहाल, यह किताब उन पाठकों के लिए बेहद फ़ायदेमंद है, जो अपनी फिटनेस को लेकर फ़िक्रमंद रहते हैं. इस किताब में उनके कई ऐसे सवालों के जवाब मिल जाएंगे, जो वे जानना चाहते हैं. फिटनेस के लिहाज़ से यह किताब संग्रहणीय है और पाठकों को पसंद आएगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : आख़िरी 5 किलो कैसे घटाएं
लेखिका : नमिता जैन
प्रकाशक : डायमंड बुक्स
क़ीमत : 125 रुपये

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ख़ुरासान की रोचक लोक कथाएं...


फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर के देशों की अपनी संस्कृति और सभ्यता है. लोक कथाएं भी इसी संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक हैं. लोक कथाओं से किसी देश, किसी समाज की संस्कृति और उनकी सभ्यता का पता चलता है. बचपन में सभी ने अपनी नानी या दादी से लोक कथाएं सुनी होंगी. लोक कथाओं में ज़िंदगी के अनुभवों का निचो़ड़ होता है. ये लोक कथाएं सीख देती हैं. लोक कथाएं कैसे और कब वजूद में आईं, यह बताना तो बेहद मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि इनका इतिहास बहुत पुराना है. लोक कथाएं विभिन्न देशों में सांस्कृतिक घनिष्ठता को बढ़ाती हैं. भारत और ईरान में साहित्यिक आदान-प्रदान का दौर जारी है. लोकभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित नासिरा शर्मा की किताब क़िस्सा जाम का, ईरान के ख़ुरासान की लोक कथाओं पर आधारित है. इसमें लेखिका ने ईरान के कवि मोहसिन मोहन दोस्त की लोक कथाओं का हिंदी अनुवाद पेश किया है. अनुवाद का काम कोई आसान नहीं होता. इसमें इस बात का ख़ास ख्याल रखना होता है कि मूल तहरीर का भाव क़ायम रहे. नासिरा शर्मा ख़ुद कहती हैं कि ये सारे क़िस्से ख़ुरासानी बोली में थे. फ़ारसी जानने के बावजूद उनके इशारों और मुहावरों को समझना आसान नहीं था, क्योंकि ये चीज़ें शब्दकोष में नहीं मिलतीं. उन्हें केवल कोई ईरानी ही बता सकता है. लेकिन कोशिश यही की गई कि ये क़िस्से ज्यों के त्यों पाठकों तक पहुंचाएं जाएं, ताकि उनका अर्थ वही रहेख जो क़िस्सागो कहना चाहता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के फ़ारसी भाषा तथा साहित्य विभाग के अध्यक्ष सैय्यद अमीर आबिदी कहते हैं कि ख़ुरासान एक चौराहे की तरह है, जहां ईरान की सभ्यता तथा संस्कृति संगठित हुई और जहां से अन्य क्षेत्रों में फैली. तूस, निशापुर और मशहद के केंद्र सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक रहे और जहां पर उमर, ख़य्याम और फ़िरदौसी जैसे चिराग़ अब भी जीवित हैं. ख़ुरासान की ये लोक कथाएं निशापुर और दमगान से निकले हुए फीरोजों की तरह भव्य और सारगर्भित हैं. इस किताब में तीन तरह के क़िस्से शामिल हैं. पहले में दर्शन का चिंतन है, दूसरे में बादशाहों के ज़रिये दुनियावी बर्ताव का ज्ञान है और तीसरे में परियों और हब्शियों के क़िस्से हैं, जो बताते हैं कि ख़ुदा ने इंसान को जो ताक़त बख्शी है, वह किसी और प्राणी के पास नहीं है. इसी ताक़त की बदौलत इंसान मुश्किल से मुश्किल हालात का सामना करते हुए अपनी जीत का परचम लहराता रहा है. इस किताब में अनेक रोचक लोक कथाएं हैं, जो पाठकों को आख़िर तक बांधे रखने में सक्षम हैं. बानगी देखिए-

एक रोज़ एक व्यापारी मछलियों से भरा टब लेकर घर पहुंचा. उसकी बला सी सुंदर पत्नी ने मछलियों को देखकर अपने चेहरे को नक़ाब से छुपा लिया, ताकि टब की मछलियां उसे न देख सकें. इस तरह मुंह छुपाये रही, ताकि उसका पति उसे सती सावित्री जैसी समझे.
जब भी व्यापारी घर में रहता कभी भी वह अपना मुंह हौज़ में न धोती और कहती-नर मछलियां कहीं मेरे पाप का कारण न बन जाएं. इस लाज से भरे अपने स्वभाव के कारण वह व्यापारी के सामने कभी हौज़ के समीप न जाती. एक दिन व्यापारी अपनी स्त्री के साथ बैठा हुआ था. एक नौकर भी वहीं खड़ा था. व्यापारी की स्त्री ने पहले की ही तरह नर मछलियों की बातें कीं और ब़डी अदा से शर्माई. यह सब देखकर वह नौकर हंस प़डा.
व्यापारी ने पूछा-क्यों हंसे तुम?
कुछ नहीं, यूं ही हंस दिया.

बिना कारण कैसी हंसी? सुनकर नौकर कुछा नहीं बोला, ख़ामोश ख़डा रहा. यह देखकर व्यापारी चिढ़ गया. उसका क्रोध देखकर नौकर डर गया और बोला-आपकी सुंदर स्त्री आपके ही घर के तहख़ाने में चालीस जवानों को बंद किए है. जब आप शिकार को चले जाते हैं तो वह उनके साथ रंगरेलियां मनाती है. यह सुनते ही व्यापारी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और वह बोला-मैं सच्चाई जानकर ही दम लूंगा. कल शिकार पर जा रहा हूं, परंतु लौटकर तुम्हारे ही घर आऊंगा. फिर सोचूंगा कि मुझे क्या करना है. दूसरे दिन व्यापारी दोबारा शिकार को चला गया और लौटकर उसी नौकर के घर पहुंचा और बोला-मुझे गधे पर रखे ख़ुरजीन (थैला) में छुपाकर वह जगह दिखाओ, जहां मेरी स्त्री चालीस जवानों के साथ गुलछर्रे उड़ाती है. इस काम के बदले में मैं तुमको सौ मन ज़ा़फ़रान दूंगा. नौकर सुनते ही राज़ी हो गया.  नौकर ने दरवेश का सा भेस बदला और ख़ुरजीन में व्यापारी को बिठाकर चल पड़ा. गली में घुसते ही दूर से ही गाने बजाने की आवाज़ें सुनाई पड़ने लगीं. नौकर आगे बढ़ता गया और व्यापारी के पीछे जाकर दरवाज़ा खटखटाया और गाने लगा-
आओ देखो, स्त्रियों के जाल व फ़रेब
बिया बेनीगर इन मकरे ज़नान
हाला हाज़िर कुन सदमन ज़ा़फ़रान
अब तो दो मुझे सौ मन ज़ा़फ़रान

बार-बार वह गाता जा रहा जब तक दरवाज़ा खुल न गया. व्यापारी ने देखा सामने मह़िफल जमी थी.  गवैये बैठे गाना गा रहे थे, साज़ बजा रहे थे. चालीस जवान प्यालों में शराब पी रहे थे और व्यापारी की स्त्री मस्त-मस्त मदहोश-सी कभी इस युवक की गोद में, कभी उस युवक की गोद में जाती और दरवेश से कहती-वहीं पंक्तियां बार-बार गाओ-
आओ देखो, स्त्रियों के जाल व फ़रेब
अब तो दो मुझे सौ मन ज़ा़फरान
सुबह होने से पहले यह महफ़िल ख़त्म हुई. दरवेश व व्यापारी दोनों एक साथ लौटे. व्यापारी की स्त्री ने उन चालीस जवानों को एक-एक करके तह़खाने में भेजा और दरवाज़ा बंद करके मस्त, नशे में चूर, झूमती-सी बेख़बर सो गई. व्यापारी थैले से बाहर निकला और नौकर को हुक्म दिया कि जब तक मैं सोकर न उठूं, इसको संदूक़ में बंद करके एक किनारे रख दो. सुबह जब स्त्री की आंख खुली तो वह सबकुछ समझ गई. उसको संदूक़ से निकालकर व्यापारी के हुक्म से घो़डे की दुम से बांधकर जंगल की ओर भेज दिया गया. व्यापारी ने उन चालीस जवानों को आज़ाद किया और तह़खाने से ऊपर बुलाकर पूछा-असली माजरा क्या था?

वे बोले- संध्या के समय जब हम इधर से गुज़रे तो छत पर खड़ी आपकी स्त्री को देखते ही हम उसके रूप-लावण्य की चमक से बेहोश हो जाते. जब होश आता तो अपने को तह़खाने में पाते. जब आप शिकार पर चले जाते तो हमारे बंध खोले जाते और हम रंगरेलियां मनाते.

किताब में प्रस्तुत लोक कथाएं पाठक को ईरान की संस्कृति और सभ्यता से परिचित कराती हैं. नासिरा शर्मा की यह कोशिश सराहनीय है. इससे हिंदुस्तान के लोगों को ईरानी सभ्यता को जानने का मौक़ा मिलेगा. दरअसल, इस तरह की कोशिशें विभिन्न देशों के बीच रिश्तों को और बेहतर बनाने का काम करती हैं. आज के दौर में ऐसे कार्यों की बेहद ज़रूरत है. साहित्य देश की सरहदों को नहीं मानता. वह तो उन हवाओं की तरह है, जो जहां से गुज़रती हैं, माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं.

किताब रोचक है, लेकिन कई जगह भाषा की अशुद्धियां हैं. उर्दू शब्दों को ग़लत तरीक़े से लिखा गया है. हिंदी में उर्दू के शब्द लिखते वक़्त अकसर नुक्ता ग़लत लगा दिया जाता है, जिससे उर्दू जानने वालों को वे शब्द काफ़ी अखरते हैं. बेहतर हो नु़क्ता लगाया ही न जाए. बहरहाल, किताब रोचकता से सराबोर है, जिसे पाठक पढ़ना पसंद करेंगे.

समीक्ष्य कृति : क़िस्सा जाम का  
लेखिका : नासिरा शर्मा
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन      
क़ीमत : 225 रुपये
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न मुंह छुपा के जिओ...


लोग दो तरह के हुआ करते हैं... पहली तरह के लिए लोग परबत की तरह मज़बूत होते हैं... वो बड़ी से बड़ी मुसीबत का मुक़ाबला दिलेरी के साथ करते हैं...
दूसरी तरह के लोग बहुत कमज़ोर होते हैं... वो ज़रा ज़रा सी बात पर मुंह छुपा के बैठ जाते हैं...
ऐसे लोगों के लिए सिर्फ़ यही कहना चाहेंगे कि मुंह छुपाना बुज़दिली है...
बक़ौल साहिर लुधियानवी-
ना मुंह छुपा के जिओ, और ना सर झुका के जिओ
ग़मों का दौर भी आए, तो मुस्कुरा के जिओ
घटा में छुप के सितारें, फ़ना नहीं होते
अंधेरी रात के दिल में, दिये जला के जिओ
न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो
हर एक पल की ख़ुशी को गले लगा के जिओ
ये ज़िन्दगी किसी मंज़िल पे रुक नहीं सकती
हर एक मक़ाम से आगे क़दम बढ़ा के जिओ...
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अल्लाह अल्लाह वाली अप्पी...



मासूम बच्चे फ़रिश्ता सिफ़्त हुआ करते हैं... कई बार बच्चे ऐसी बातें कह जाते हैं, जिसकी तरफ़ कभी हमारा ख़्याल ही नहीं जाता... हमारी बिटिया (भतीजी) फ़लक हमें 'अल्लाह अल्लाह वाली अप्पी' कहती है... हमारी छोटी बहन यानी अपनी छोटी फूफी को छोटी अप्पी कहकर बुलाती है... अपनी मां को अम्मी कहती है... और अपनी दादी जान यानी हमारी अम्मी को 'अल्लाह अल्लाह वाली अम्मी' कहती है...
एक रोज़ हमने अपनी भाभी से पूछा कि फ़लक हमें 'अल्लाह अल्लाह वाली अप्पी' और अम्मी को 'अल्लाह अल्लाह वाली' अम्मी क्यों कहती है... उन्होंने बताया कि वो हम दोनों को इबादत करते हुए देखती है, इसलिए ऐसा कहती है... जब उसने थोड़ा-थोड़ा बोलना सीखा, तो अकसर कहती- अप्पी और अम्मी दोनों-दोनों अल्लाह अल्लाह कल लई (कर रही) हैं... फ़ोन पर बात होती है, तो सबसे पहले अपनी तोतली ज़ुबान में पूछती है- अप्पी ! अल्लाह अल्लाह कल ली ?
अपनी बिटिया का दिया ये लक़ब 'अल्लाह अल्लाह वाली अप्पी' हमें बहुत अज़ीज़ है... अल्लाह हमें अल्लाह वाली ही बनाए, आमीन
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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फूल और नारियल...


फ़िरदौस ख़ान
औरंगज़ेब रोड का नाम बदलने की ख़बर पर बरसों पुराना एक वाक़िया याद आ गया...  बात उस वक़्त की है, जब हम बारहवीं क्लास में थे... स्कूल में आने के बाद हमें पता कि आज म्यूज़िक टीचर की सालगिरह है... हम बाहर जाकर कुछ ख़रीद नहीं सकते थे, इसलिए हम माली के पास गए और उससे कहा कि आज हमारे टीचर की सालगिरह है, क्या हमें कुछ फूल मिल सकते हैं... उसने हमें फूल लेने की इजाज़त दे दी... हमने फूल लिए और अपने टीचर को सालगिरह की मुबारकबाद थी... टीचर ने फूल हारमोनियम पर रख दिए और कहने लगे कि आज तुम सबको एक ग़ज़ल सुनाता हूं... वो ग़ज़ल गाने लगे... साथ में हमारी सहेलियां भी थीं... उनके ग़ज़ल पूरी करते ही हमारी एक सखी ने हमारे दिए फूल उठाए और टीचर को देते हुए मुबारकबाद देने लगी... वो सखी की इस हरकत पर मुस्करा दिए और कहने लगे कि आज तुम्हें हरिद्वार का एक क़िस्सा सुनाता हूं...
हुआ यूं कि म्यूज़िक टीचर स्नान के लिए हरिद्वार गए थे... वहां उन्होंने फूल, नारियल और अन्य सामग्री नदी में प्रवाहित की... जहां वो खड़े से उससे कुछ दूरी पर एक व्यक्ति स्नान कर रहा था... जैसे ही नारियल उस तक पहुंचा, उसने झट से नारियल उठा लिया और कुछ मंत्र पढ़ते हुए उसे फिर से नदी में प्रवाहित कर दिया... वो ये सब देख रहे थे...
 कहानी ख़त्म होते ही सबके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कराहट आ गई... हमारी सखी ने टीचर से माफ़ी मांगी...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

तस्वीर गूगल से साभार
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फ़िल्मी गीतों में महकी साहित्य की ख़ुशबू...


पिछले दिनों फ़िल्मी गीतकार स्वर्गीय शैलेन्द्र जी के मित्र अनिल सराफ़ के छोटे भाई नलिन सराफ़ ने अपनी एक किताब भेजी थी... हमने इस किताब की समीक्षा की... इसे बहुत सराहा गया... काफ़ी लोगों के मेल और फ़ोन आए... पेश है समीक्षा... 

फ़िल्मी गीतों में महकी साहित्य की ख़ुशबू...
फ़िरदौस ख़ान
गीतकार शैलेंद्र ने फ़िल्मों में भी साहित्य की महक को बरक़रार रखा, इसलिए काव्य प्रेमियों ने उन्हें गीतों का राजकुमार कहा है. शैलेंद्र मन से कवि ही थे, तभी तो उनके फ़िल्मी गीतों में भी काव्य की पावन गंगा बहती है. उनसे प्रभावित होकर उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु ने उन्हें कविराज का ख़िताब दिया था. मुंबई के शैलेंद्र प्रशंसक परिवार ने उनकी याद में एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है मौसम सुहाना और ये मौसम हसीं. इस किताब में शैलेंद्र के गीतों, कविताओं और उनसे जुड़े संस्मरणसंग्रहीत हैं. संकलनकर्ता नलिन सराफ़ का कहना है कि मेरे बड़े भाई श्री अनिल जी, जो शैलेंद्र जी के अभिन्न मित्र रहे हैं, चाहते हैं कि उनकी रचनाएं और अनछुए जीवन के प्रसंग लोगों के सामने आएं. इसी विचार ने धीरे-धीरे मूर्तरूप लिया और नतीजतन यह पुस्तक आपके सामने है. शैलेंद्र की कई फ़िल्मी रचनाएं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं, कई फ़िल्मी गीत जो रिकॉर्ड तो हुए, लेकिन परदे तक नहीं पहुंचे, कुछ अनूठे जीवन प्रसंग, लोगों के अपने अनुभव, उनके कई दुर्लभ चित्र और हस्तलिखित पत्र आदि को इस किताब में शामिल किया गया है.

नलिन सराफ़ कहते हैं, शैलेंद्र का असली नाम शंकर दस राव है, लेकिन साहित्य में शंकर शैलेंद्र और फ़िल्मों में वह शैलेंद्र नाम से जाने जाते हैं. बिहार के एक खेतीहर मज़दूर का वंशज, मिलेट्री हॉस्पिटल के मामूली फौजी क्लर्क का पुत्र जिसका जन्म एक निर्धन दलित परिवार में हुआ और बचपन अत्यंत तकली़फ़ों में गुज़रा. वह अपनी प्रतिभा, कुशाग्र बुद्धि और लगन के कारण ही शंकर दास राव से प्रसिद्ध कवि-गीतकार शैलेंद्र की मंज़िल तक पहुंच पाया. मेरा उनसे काव्यात्मक परिचय 1954 में फ़िल्म बूट पालिश से हुआ, जिसका गीत नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? मेरे अंतर्मन को छू गया. कालांतर में उन्होंने बताया कि यह गीत उन्हें अपने बच्चे की बंद मुट्ठियों को देखकर उपजा था. वह कर्मयोगी थे. वह भाग्य पर आंख मूंदकर विश्वास करने वालों में से नहीं थे. इसलिए इस गीत में उन्होंने यह बात ज़ाहिर की-मुट्ठी में है तक़दीर हमारी, हमने क़िस्मत को वश में किया है. वैसे वह जीवन की किसी भी घटना को अपने गीतों में सहज पिरो देते थे. उनकी प्रारंभिक ग़ैर फ़िल्मी रचनाएं रोज़मर्रा की ज़िंदगी, मध्यमवर्गीय समस्याओं, मज़दूरों का मानसिक द्वंद्व लिए होती थीं. वे मूलत: मज़दूर हृदय इंसान थे, अत: उनकी रचनाओं में इसकी झलक सा़फ़ नज़र आती है. वह अपनी लेखनी के बल पर क्रांति लाने के पक्षधर थे. प्रसिद्ध गायक तलत महमूद के कहने पर उन्होंने एक ख़ूबसूरत गीत लिखा था-
है सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है ख़ुशी, आंसू भी छलकते आते हैं…

वह लोक नाट्य मंच यानी इप्टा से शुरू से जु़डे थे. उसके हर कार्यक्रम में पूरे जोश से सक्रिय रहते और अपने गीत सुनाया करते थे. ऐसे ही एक कार्यक्रम में पृथ्वीराज कपूर ने उनका गीत- जलता है पंजाब सुना और बेहद प्रभावित हुए. उन्होंने राजकपूर से इसकी चर्चा की, जो स्वयं के बैनर तले फ़िल्म निर्माण शुरू कर चुके थे. राजकपूर ने ऐसे की एक कार्यक्रम में उनका गीत-मोरी बगिया में आग लगाय गयो गोरा परदेशी सुना और मोहित हो उठे. उन्होंने शैलेंद्र से फ़िल्मों के लिए लिखने को कहा, लेकिन उनके प्रस्ताव को शैलेंद्र ने बड़ी नम्रता और दृढ़ता से यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि मैं फ़िल्मों के लिए नहीं लिखता. मगर आगे जाकर पारिवारिक मजबूरियों की वजह से उन्होंने राजकपूर से मुलाक़ात की और इस तरह वह आरके बैनर के स्थायी गीतकार बन गए, साथ ही शंकर-जयकिशन के भी. इसके अलावा उन्होंने प्राय: सभी प्रमुख संगीतकारों के साथ काम किया. उन्होंने नए संगीतकारों के लिए भी लिखा. राजकपूर की फ़िल्मों की कथावस्तु और उनके विचार शैलेंद्र के विचारों से मेल खाते थे. वह अपनी फ़िल्म में अधिक से अधिक गीत शैलेंद्र के ही रखना चाहते थे. इसका प्रमुख कारण उनकी सरल एवं गेय शब्दावली तो था ही, साथ ही उनके गीत पूरे दृश्य को आत्मसात कर कहानी का हिस्सा बन जाते थे और उसके प्रवाह को आगे बढ़ाने में सहायक होते थे. राजकपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर के शीर्ष गीत के मुखड़े की प्रेरणा उन्हें श्रीमदभगवद गीता से मिली. यह गीत-जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां, राजकपूर के लिए लिखा गया आख़िरी गीत था, वह भी सिर्फ़ मुखड़ा ही लिख पाए, जिसे बाद में उनके बेटे शैली ने पूरा किया.

एक बार उनसे पूछा गया कि कभी आपने अपनी आत्मकथा को काव्य रूप में ढाला या ढालने की सोची? जवाब में उन्होंने श्री 420 के गीत-दिल का हाल सुने दिलवाला की इन पंक्तियों का ज़िक्र किया-
छोटे से घर में ग़रीब का बेटा
मैं भी हूं मां के नसीब का बेटा
रंजो-ग़म बचपन के साथी
आंधियों में जली जीवन की बाती
भूख ने बड़े प्यार से पाला
ख़ुश हूं, मगर आबाद नहीं मैं
मंज़िल मेरे पास खड़ी है
पांव में लेकिन बेड़ी पड़ी है
टांग अड़ाता है दौलत वाला…

शैलेंद्र बंगाली भाषा और बंगाल के लोक संगीत के बड़े प्रशंसक थे. यही वजह थी कि सलिल चौधरी ने जब अपना हिंदी फ़िल्मी सफ़र बिमल राय की फ़िल्म दो बीघा ज़मीन से शुरू किया तो उनकी पहली पसंद शैलेंद्र थे. उन्होंने अपने यादगार गीत-संगीत की रचना से उस फ़िल्म को अमर बना दिया. इसके बाद सलिल चौधरी ने अधिकांश फ़िल्में उन्हीं के साथ कीं. एसडी बर्मन के साथ भी उन्होंने कई फ़िल्में के गीत लिखे. उन्होंने 1955 की फ़िल्म मुनीमजी का शिव विवाह और मद भरे नैन के गीतों से लेकर 1967 की ज्वैलथीफ तक में अनेक मधुर गीत लिखे. बर्मन दा के साथ गाइड के गीतों ने तो फ़िल्म को अमरत्व तक पहुंचा दिया. गाइड से शैलेंद्र के जुड़ाव की एक रोचक गाथा है. एक रात बर्मन दा के विशेष आग्रह पर शैलेंद्र उनसे मिलने होटल सन एंड सेंड में गए, जहां वह देवानंद और विजय आनंद के साथ बैठे हुए थे. दादा ने बताया कि गोल्डी (विजय आनंद) गाइड के गीत शैलेंद्र से लिखवाना चाहते हैं. शैलेंद्र पहले भी विजय आनंद की फ़िल्म बाज़ार के लिए गीत लिख चुके थे. शैलेंद्र थोड़ा सकपकाए, क्योंकि गाइड के लिए वह दूसरे गीतकार को अनुबंधित कर चुके थे और दो गाने रिकॉर्ड भी हो चुके थे. लेकिन विजय आनंद ने ज़ोर देकर कहा कि गाइड के कथानक के साथ सिर्फ़ आप ही के गीत आत्मसात हो सकते हैं. शैलेंद्र ने इस आत्मीय दबाव पर सोचकर कहा कि पहले आप उस गीतकार को उसका पूरा पारिश्रमिक देकर मुक्त कर दीजिए. भले ही उससे आपको और नहीं लिखवाना है. अपने पारिश्रमिक के रूप में उन्होंने एक भारी रक़म की मांग रख दी, जो इस गीतकार की रक़म और उस व़क्त की प्रचलित रक़म से कई गुना ज़्यादा थी. विजय आनंद ने उसे फ़ौरन मंज़ूर करते हुए उन्हें अनुबंधित कर लिया. उसी वक़्त उन्होंने एक गीत का यह मुखड़ा लिखकर उन्हें दे दिया-
दिन ढल जाए, हाय रात न जाए
तू तो न आई, तेरी याद सताए…

इस फ़िल्म के सभी गीत बहुत लोकप्रिय हुए. इस बारे में देवानंद का कहना है, गाइड के गीत इसकी सबसे बड़ी ताक़त थे. मैं हमेशा मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी और नीरज से मुतासिर रहा, पर उसके गीतों में शैलेंद्र ने जैसे अपनी आत्मा उंडेल दी थी. बक़ौल लता मंगेशकर, उनके दिल में सदा एक आग धधकती रहती, जो इस अन्यायी समाज-व्यवस्था को फूंक देना चाहती थी. फ़िल्मी गीतों की हज़ार-हज़ार बंदिशों में रहकर भी वह दर्द और वह आग उनके गीतों में स्पष्ट दिखाई देती थी. बाबू जगजीवनराम ने कहा था कि संत रविदास के बाद शैलेंद्र हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय हरिजन कवि हैं. शायर और फ़िल्मी गीतकार हसरत जयपुरी के मुताबिक़, शैलेंद्र जैसा हिंदी फ़िल्म गीतकार आज तक न कोई हुआ है और न कोई होगा.

30 अगस्त, 1923 को जन्मे शैलेंद्र ने 14 दिसंबर, 1966 को आख़िरी सांस ली. उनकी पत्नी शकुंतला शैलेंद्र कहती हैं, मन की अंधियारी सतहों पर एकाएक यादों के सौ-सौ मोती झिलमिलाने लगते हैं. बिछोह पर बना कुहासा धीमे-धीमे छंटने लगता है और हंसता-मुस्कराता अतीत मुझे अपने आप में समेट लेता है. स्वर्गीय पति की यादों के मेले जैसे इर्द-गिर्द जु़डने लगते हैं और अनगिनत फूलों की महक मेरी सांसों में समा उठती है. फिर मादक रस में डूबी हुई उनकी गुनगुनाहट पल-प्रतिपल मन प्राणों को दुलारने लगती है-मैं तो तुम्हारे पास हूं शकुन. भले ही दुनिया के लिए मर गया हूं, पर तुम्हारे लिए तो हमेशा जीवित रहूंगा. राजकपूर शैलेंद्र की मौत से बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने कहा था, कमबख्त शायर था न. जाने के लिए भी उसने क्या दिन चुना? मेरा जन्मदिन.

शैलेंद्र कबीर, सूरदास, तुलसीदास आदि की तरह सरल और सीधी बात काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने वाले गीतकार थे. उन्होंने आम आदमी की बोली में उनके दिल दिल की बात सामने रख दी. यही वजह है कि उनके गीत सीधे दिल में उतर जाते हैं. भले ही हिंदी साहित्य ने उनकी उपेक्षा की, लेकिन भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग ने 1985 में प्रकाशित देशभक्ति की कविताएं संकलन में भारतेंदु हरिश्चंद्र, हरिओम, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत जैसे महान कवियों की रचनाओं के साथ शैलेंद्र की भी एक कविता प्रकाशित कर उन्हें सम्मानित किया.
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग, तो उतार ला ज़मीन पर…
बहरहाल, पाठकों ख़ासकर शैलेंद्र के प्रशंसकों के लिए यह एक बेहतरीन किताब है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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मेवात के जोह़ड और गंवई दस्तूर


फ़िरदौस ख़ान
भारत एक कृषि प्रधान देश है. इसलिए प्राचीनकाल से ही यहां तालाबों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. तालाब उपयोगी होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग भी रहे हैं. भारत में जल देवता को पूज्य मानते हुए तालाबों की पूजा-अर्चना की जाती रही है. आज भी गांव-देहात में मंगल कार्यों के मौक़ों पर महिलाएं इकट्ठी होकर तालाबों को पूजती हैं. पुराने ज़माने में जहां लोग प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करते हुए उनका संरक्षण भी किया करते थे, वहीं आज के दौर में इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग करके विनाशकारी माहौल पैदा किया जा रहा है. प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन की वजह से ही आज जल, जंगल और ज़मीन पर ख़तरे के बादल छाये हुए हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्राकृतिक संसाधनों की उपयोगिता को जानते और समझते थे, तभी उन्होंने कहा था कि क़ुदरत सभी की ज़रूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन एक व्यक्ति का भी लालच पूरा नहीं कर सकती. लेकिन आज व्यक्ति के लालच की वजह से कहीं सूखे, तो कहीं बाढ़ के हालात बन गए हैं.
           
राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेवात का जोहड़ में मेवात के जोह़डों पर रौशनी डाली गई है. इसके साथ ही मेवात में आज़ादी के आंदोलन और विभाजन, मेवात को लेकर महात्मा गांधी के सपने, मेवात में रचनात्मकता को चुनौतियों और मेवात के इतिहास के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है.
हरियाणा के फिरोजपुर झिरका, नूंह, पलवल, सोता, फ़रीदाबाद, गुड़गांव, राजस्थान के रामगढ़, किशनगढ़, खैरपल, तिजारा, कुम्हेर, डीग, पहा़डी और उत्तर प्रदेश के आगरा और मथुरा के यमुना तट के हिस्से को मेवात इलाक़ा कहा जाता है. बक़ौल लेखक राजेन्द्र सिंह, महात्मा गांधी का मेवात में जोहड़ पुस्तक महात्मा गांधी द्वारा अपने जीते जी मेवात के लिए किए गए समर्पण की दास्तान है. महात्मा गांधी ने मेवात को बचाने-बसाने के लिए 19 दिसंबर, 1947 को सोहना (हरियाणा) और नोगांवा (राजस्थान) के बीच घासेडा गांव में जाकर राजस्थान के अलवर-भरतपुर से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़-मथुरा-आगरा बाग़पत से आए और हरियाणा के मेवों की सभा में जाकर उन्हें यहीं बसे रहने को कहा. जब ये लोग अच्छे से अपनी जगह बसे रहे तो पाकिस्तान गए बहुत से मेव वापस आकर मेवात में बसे. उन्होंने अपनी पुरानी धरती मेवात में वापस जाने की मांग की. बापू के विश्वास से उजड़ता मेवात बच गया. जो उजड़े थे, वे वापस आकर बस गए. यह मेवों का मेवात बन गया. भारत की राजधानी ख़ासकर राष्ट्रपति भवन मेवों के गांव उजाड़ कर अंग्रेजों ने बनाया था. जिन्हें आज मेव कहते हैं, वे मीणा, राजपूत, गुर्जर, अहीर, त्यागी, जाट थे, जो धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गए थे. ये अरावली पहाड़ियों की कंदराओं, चोटियों पर छुपकर रहना पसंद करते थे. पहाड़ियों में अपने घर बनाकर रहते थे. झोपड़ी को चारों तरफ़ से घेरकर पेड़ों के झुरमुट में रहना इन्हें पसंद था. इनका जीवन जंगल, जंगली जानवरों के शिकार पर चलता था. इसलिए अरावली पर्वत मालाओं में इनके लिए अनुकूल थीं. मेवाती में इसे काला पहाड़ कहते हैं. इस पहाड़ी क्षेत्र के बहुत से गांव जोहड़ से पानीदार बने हुए थे. जोहड़ ही इनका सबकुछ है.

हमारे पूर्वज जानते थे कि तालाबों से जंगल और ज़मीन का पोषण होता है. भूमि के कटाव एवं नदियों के तल में मिट्टी के जमाव को रोकने में भी तालाब मददगार होते हैं. इसलिए वे वर्षा के जल को उसी स्थान पर रोक लेते थे. उनकी जल के प्रति एक विशेष प्रकार की चेतना और उपयोग करने की समझ थी. इस चेतना के कारण ही गांव के संगठन की सूझबूझ से गांव के सारे पानी को विधिवत उपयोग में लेने के लिए तालाब नाए जाते थे. इन तालाबों से अकाल के समय भी पानी मिल जाता था. इनके निर्माण, रखरखाव, मरम्मत आदि के कामों से गांव के संगठन को मज़बूत बनाने में मदद मिलती थी. मेवात आज भी तालाबों को खरा मानता है. उन्हें बनाता-संभालता है. उनके घरेलू सभी काम तालाब से पूरे होते हैं, और सभी ग्रामवासी मिलकर मेहनत करके जोहड़ बनाते थे.

तालाबों के रखरखाव के लिए गांव के लोग सर्वसम्मति से कुछ नियम भी बनाते थे, जिसे गंवई दस्तूर कहा जाता था. ये दस्तूर गंवई बही में भी लिखे जाते थे या मौखिक परंपरा के ज़रिये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते जाते थे. गांव में आने वाले बाहरी व्यक्ति को भी इन गंवई दस्तूर का पालन करना प़डता था. अलवर ज़िले के गांवों के गंवई दस्तूर के मुताबिक़, तालाब की आगोर में कोई जूता लेकर प्रवेश नहीं करता था. शौचादि के हाथ अलग से पानी लेकर आगोर के बाहर ही धोये जाते थे. आगोर में किसी गांव सभा की अनुमति के बिना मिट्टी खोदना मना होता था. हर साल जेष्ठ माह में पूरा गांव ही मिलका आगोर से मिट्टी निकालता था. आगोर से ही नहीं, बल्कि तालाब के जलग्रहण क्षेत्र तक में शौचादि के लिए जाना मना था. किसी प्रकार गंदगी फैलाने वाले को तालाब की स़फाई करके प्रायश्चित करने का सुझाव दिया जाता था. प्रायश्चित के लिए तालाब की पाल पर पे़ड लगाने तथा उसके ब़डा होने तक उसकी देखभाल करने की परंपरा थी. तालाब के जलग्रहण क्षेत्र से मिट्टी कटकर नहीं आए और तालाब में जमा नहीं हो, इसकी व्यवस्था तालाब बनाते समय ही कर दी जाती थी. इससे लंबे समय तक तालाब उथले नहीं हो पाते थे. जब तालाब की मरम्मत करने की ज़रूरत होती थी, पूरा गांव मिल-बैठकर, तय करके इस काम को करता था. तालाब से निकलने वाली मिट्टी खेतों में डालने या कुम्हारों के काम आती थी. तालाब को गांव की सार्वजनिक संपत्ति माना जाता था. गांव के लोग जब किसी दूसरे गांव को जाते थे, तो सबसे पहले वह तालाब को अपने गांव की संपत्ति में गिनाया करते थे. गांव का जैसा तालाब होता था, वैसा ही उस गांव को माना जाता था. गांव का तालाब अच्छा है तो उस गांव को समृद्ध, संगठित, शक्तिशाली माना जाता था. यह भी कि वह गांव अपने महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम है, यह मान लिया जाता था. यह परंपरा 1860 तक चली. इसके बाद अंग्रेजों ने इन परंपराओं को ख़त्म करने के लिए कई योजनाएं बनाईं. अंग्रेजों की नीतियों ने रंग दिखाना शुरू किया और ग्राम समाज के टूट जाने के कारण तालाबों का निर्माण, रखरखाव और मरम्मत बंद हो गई. तालाबों के साथ-साथ गांव के संगठन भी बिखरने लगे. इसके बावजूद आज भी मेवात का सामुदायिक संगठन देश के दूसरे हिस्सों से इस मामले में काफ़ी अच्छा है.
बड़े बांध बनाने पर भारत सरकार 2008 तक अरबों-खरबों रुपये ख़र्च कर चुकी है. इन योजनाओं से दो करोड़ हैक्टेयर ज़मीन सिंचित होने का सरकारी दावा किया गया था, लेकिन हक़ीक़त में आज कितनी ज़मीन की सिंचाई ये योजनाएं कर रही हैं, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. देश में तालाबों की उपेक्षा करने की भूल आज भी की जा रही है. 1950 में देश के कुल सिंचित क्षेत्र की 17 फ़ीसद सिंचाई तालाबों से की जाती थी. तालाबों में पाए गए शिलालेख इसका प्रमाण हैं. पिछले बरसों के भयंकर अकाल ने एक फिर तालाबों की याद दिलाई है. इसलिए गत वर्षों में छोटे-बड़े दस हज़ार से ज़्यादा तालाब, जोहड़, बांध बनाए गए या उनकी मरम्मत कराई गई है. इन पर तक़रीबन 15 करोड़ रुपये ख़र्च हुए. मिसाल के तौर पर गोपालपुर गांव को ही लें, जहां 1986 में सिंचाई और पीने के पानी वाले कुएं सूख गए थे. ज़मीन में कुछ पैदा ही नहीं हो रहा था. तभी इस गांव के तालाबों के निर्माण का काम शुरू किया गया और 1987 के जून तक तीन बड़े तालाब बनाए गए. गांव वाले इन्हें बांध कहते हैं. इनके निर्माण कार्य में दस हज़ार रुपये की क़ीमत का गेहूं दिया गया. जुलाई 1987 में इस इलाक़े में कुल 13 सेंटीमीटर वर्षा हुई. यह सारी वर्षा एक साथ ही 48 घंटे के अंदर हो चुकी थी. इनके पानी से ज़मीन पुन: सजल हुई और गांव के आसपास के 20 कुओं का जलस्तर बढ़कर ऊपर आ गया. वर्षा का पानी अपने साथ जंगल और पहाड़ियों से पत्ते आदि बहाकर ले आया था, जो तालाबों की तली में बैठ गया. बड़े तालाब खेतों की ज़मीन पर बने हुए थे. इसलिए नवंबर तक तालाबों का पानी तो नीचे की ज़मीन की सिंचाई करने के काम में ले लिया गया और तालाब के पेटे में गेहूं की फ़सल बो दी गई. एक फ़सल में केवल इन तालाबों की ज़मीन से ही तीन सौ क्विंटल अनाज पैदा हुआ, जिसकी क़ीमत तक़रीबन पौन लाख होती है. इसके अलावा तालाब में पूरे साल पानी भरा रहा. इसे पशुओं के पीने के काम में लिया गया और तालाब के चारों तरफ़ उगी घास पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल की गई. इसके साथ ही वातावरण भी हराभरा रहा.

हमारे देश में ऐसी अनगिनत मिसालें मिल जाएंगी, जब लोगों ने ख़ुद पहल करते इस तरह के बेहतरीन कामों को अंजाम दिया है. बहरहाल, यह किताब मेवात के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मुहैया कराती है. चूंकि किताब के लेखक राजेन्द्र सिंह अपने विद्यार्थी जीवन से ही संपूर्ण क्रांति आंदोलन से जुड़े रहे हैं और आजकल गंगा नदी की अविरलता और निर्मलता के लिए संघर्षरत हैं. उन्होंने जल संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है. फ़िलहाल वह भारत सरकार के नदी जोड़ योजना के पर्यावरण विशेषज्ञ समिति एवं योजना आयोग के अंतर मंत्रालय समूह और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य हैं. इस किताब में उनके कार्यों की झलक भी साफ़ दिखाई पड़ती है. यह कहना ग़लत न होगा कि यह किताब जल संरक्षण के प्रति पाठकों को जागरूक करती नज़र आती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : मेवात का जोहड़
लेखक : राजेन्द्र सिंह
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
क़ीमत : 400 रुपये 

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परस्तिश


हमारी एक दोस्त ने हमसे पूछा- क्या तुम्हारी उनसे लड़ाई होती है.
हमने कहा- नहीं, कभी नहीं होती.
वो हैरान होकर बोली- ऐसा कैसे हो सकता है कि आप दोनों कभी लड़ते ही नहीं. ये तो नामुमकिन है. जहां मुहब्बत होती है, वहां गिले-शिकवे भी होते हैं और लड़ाइयां भी होती हैं.
हमने कहा- तुम सही कहती हो, जहां मुहब्बत होती है, वहां गिले-शिकवे भी होते हैं और लड़ाई-झगड़े भी ख़ूब हुआ करते हैं... लेकिन जहां मुहब्बत में परस्तिश हो, वहां कैसे गिले-शिकवे और कैसे लड़ाई-झगड़े...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

तस्वीर गूगल से साभार
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गर्व किस बात का


फ़ेसबुक पर अकसर ऐसी पोस्टें देखीं जाती हैं, जिनमें लिखा होता है-
"मुझे फ़लां मज़हब का होने पर गर्व है, मुझे फ़लां ज़ात का होने पर गर्व है" (ऐसी पोस्टें लिखने वालों में मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम दोनों ही शामिल हैं)

क्या ये सच में गर्व करने की बात है...? क्या मज़हब और ज़ात ही गर्व करने लायक़ हैं?
हम किस मज़हब को मानने वाले या किस ज़ात वाले ख़ानदान में जन्म लेते हैं, ये हमारे हाथ में नहीं है...
हम अपनी मिसाल देते हैं, हम इस्लाम को मानने वाले ऐसे ख़ानदान में पैदा हुए, जहां हमारे पापा पठान हैं और अम्मी शेख़ सिद्दीक़ी...
आज हम कहें कि हमें मुसलमान होने पर गर्व है, अपने ख़ान होने पर गर्व है...
फ़र्ज़ करें, अगर हम किसी ग़ैर मुस्लिम और समाज के सबसे निचली ज़ात वाले ख़ानदान में पैदा होते, तो क्या हमें अपने मज़हब और ज़ात पर शर्मसार होना चाहिए था... नहीं न... ?
फिर क्यों हम ऐसी बातों को बढ़ावा देते हैं, जो समाज में मुख़्तलिफ़ तबक़ों के बाच दूरियां पैदा करती हैं...
याद रखें हम सबका ताल्लुक़ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम है, जो जन्नत में रहा करते थे... इसलिए ख़ुद को आला और दूसरे को कमतर समझना अच्छी बात नहीं है...

तस्वीर गूगल से साभार
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