एक तसव्वुर... एक अहसास...


  • कितना खु़शनुमा अहसास है... मेरी रूह जिस्म की क़ैद से आज़ाद हो चुकी है... अब न कोई बंधन है और न ही कोई दुख-तकलीफ़... सबकुछ कितना भला लग रहा है... मैं समंदर पर दौड़ सकती हूं... ज़मीन की तह में उतर सकती हूं और आसमान की बुलंदियों को छू सकती हूं... पर मैं तन्हा हूं... तन्हा... तन्हा तो मैं पहले भी थी... वो भीड़ की तन्हाई थी और ये अकेले होने की तन्हाई है... पर मैं ख़ुश हूं... 
  • इंसान ज़िंदगी में बहुत थोड़ा चाहता है... लेकिन उसे बहुत थोड़ा नहीं मिलता, जो वह चाहता है... फिर वह बहुत ज़्यादा चाहने लगता है और उसे बहुत ज़्यादा मिल भी जाता है... लेकिन बहुत थोड़े की कमी उसे ज़िंदगी भर खलती है...
  • मुसीबत के वक़्त तो ख़ुदा भी साथ छोड़ देता है... फिर इंसानों से कोई क्या शिकवा-शिकायत करे... 
  • जिस शख़्स की सारी ज़िन्दगी क़ुदरती आज़माइश में ही बीत जाए... अपनी ज़िन्दगी के अज़ाब होने पर वह भला किससे शिकवा-शिकायत करे...
  • हर इंसान की अपनी-अपनी मजबूरियां हुआ करती हैं... इंसान को उम्रभर इन्हीं मजबूरियों के साथ रहना होता है... यही तो ज़िंदगी है... 
  • ज़िन्दगी भी अजीब शय है... अकसर खु़शियों की तमन्ना में ही बीत जाती है... 
  • ज़िन्दगी में जिसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हुआ करती है, वही सबसे ज़्यादा दूर होता है...
  • ख़ुशियां सबको रास नहीं आया करतीं... 
  • सबसे आसान होता है, बिन बताए किसी की ज़िन्दगी से यूं चले जाना...
  • जो अपने होते हैं, वो छोड़ कर कभी नहीं जाया करते...
  • अपने ही सबसे ज़्यादा तकलीफ़ पहुंचाते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि हम कितने टूटे हुए हैं और उनकी एक ही चोट से ज़र्रा ज़रा होकर बिखर जाएंगे...
  • उम्र अकसर अच्छे वक़्तों की तमन्ना में ही बीत जाया करती है... 
(हमारी एक कहानी से)


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लाहासिल ख़्वाहिशात...


रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी है... लड़की अब भी जाग रही है... नींद उसकी आंखों से कोसो दूर है... माहौल में चम्पा के फूलों की महक है... हवा के झोंको से हिलती चमेली की टहनियां अपनी मौजूदगी का अहसास करा रही हैं... आसमान में आधा चांद चमक रहा है... या यूं कहें कि अधूरा चांद, जो रफ़्ता-रफ़्ता एक सिम्त से दूसरी सिम्त सरक रहा है... वो सोचती है, चांद तो कुछ रोज़ बाद मुकम्मल हो जाएगा, लेकिन ज़िन्दगी का क्या, उसकी हसरतों का क्या, जो आज तक नामुकम्मल हैं... और उसकी लाहासिल ख़्वाहिशात...
(हमारी एक कहानी से)


तस्वीर : गूगल से साभार


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किसानों में लोकप्रिय शरद कृषि


फ़िरदौस ख़ान
भारत एक कृषि प्रधान देश है. सिंधु घाटी सभ्यता के दौर से ही यहां कृषि की जाती है. कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि से जुड़ा हुआ है. गांव-देहात का वजूद ही खेती पर क़ायम है. कृषि आधरित उद्योगों में करोड़ों लोग लगे हैं. कृषि का भारतीय संस्कृति पर भी गहरा असर है. बहुत से तीज-त्यौहार कृषि और ऋतुओं से जुड़े हैं. दीपों के पावन पर्व दीपावली को ही लीजिए. पांच दिनों तक चलने वाला यह उत्सव धार्मिक आस्थाओं के साथ-साथ कृषि व्यवस्था और ऋतु चक्र से भी गहरा संबंध रखता है. गोवर्धन पूजा गोवंश के महत्व पर केंद्रित है. प्राचीन भारत में जीवन कृषि और पशु पालन पर ही आधारित था. गोवर्धन की पूजा गोवंश के संरक्षक के रूप में की जाती है. आज भी बैल कृषि कार्य में बेहद उपयोगी हैं. हालांकि नई तकनीकी आने के बाद बैलों की जगह ट्रेक्टर ने ली है, मगर आज भी बहुत से किसान बैलों के ज़रिये खेती कर रहे हैं. कृषि कार्य के मुख्य साधन के रूप में बैल की पूजा की जाती है. गाय को माता मानकर उसकी पूजा करते हैं. यज्ञों-अनुष्ठानों में आहुति देने के लिए गाय के घी का ही इस्तेमाल किया जाता है. अन्नकूट का संबंध वर्षा काल में पैदा होने वाली फ़सलों से है. जब ज्वार और बाजरे की फ़सल पक जाती है, तब इन्हें पकाकर सबसे पहले अन्नपति परमपुरुष नारायण को भोग लगाया जाता है. दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला पोंगल भी कृषि आधारित पर्व है. चावल, गुड़ और दूध का मीठा पकवान बनाकर सूर्य देव को समर्पित किया जाता है. लोग प्रकृति के प्रति आभार जताते हुए ख़ुशहाली की कामना करते हैं.

कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के निर्धारण में भी अहम योगदान है. अंगूर, केला, मटर और पपीता के उत्पादन के क्षेत्र में विश्व में भारत का पहला स्थान है. साल 2013-14 में कृषि क्षेत्र की बढ़ोतरी दर 4.7 फ़ीसद रही. इस दौरान 264.4 मिलियन टन खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन रहा, जबकि  32.4 मिलियन टन तिलहन का रिकॉर्ड उत्पादन, 19.6 मिलियन टन दलहन का रिकॉर्ड उत्पादन, मूंगफली का सबसे ज़्यादा 73.17 फ़ीसद उत्पादन हुआ.  खाद्यान्न के तहत क्षेत्र 4.47 फ़ीसद से बढ़कर 126.2 मिलियन हेक्टर हो गया. तिलहन का क्षेत्र 6.42 फ़ीसद से बढ़कर 28.2 मिलियन हेक्टर हो गया. पहली जून 2014 को केन्द्रीय पूल में खाद्यान्न का भंडारण 69.84 मिलियन टन था.  साल 2013 में खाद्यान्न की उपलब्धता 15 फ़ीसद बढ़कर 229.1 मिलियन टन और प्रति व्यक्ति कुल खाद्यान्न की उपलब्धता बढ़कर 186.4 किलोग्राम हो गई. साल 2013-14 में कृषि निर्यात में 5.1 फ़ीसद की बढ़ोतरी हुई. समुद्री उत्पादों के निर्यात में 45 फ़ीसद वृद्धि दर रही. दूध उत्पादन 132.43 मिलियन टन की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा.  कुल सकल घरेलू उत्पाद में पशुधन क्षेत्र की 4.1 फ़ीसद भागीदारी रही. भारत में दूध उत्पादन की सालाना वृद्धि दर 4.04 फ़ीसद है, जबकि विश्व में यह औसत 2.2 फ़ीसद है. कृषि क्षेत्र के लिए ऋण 7,00,000 करोड़ रुपये के लक्ष्य से ज़्यादा रहा. सकल घरेलू उत्पाद में कृषि और इसके सहयोगी क्षेत्रों की हिस्सेदारी 13.9 फ़ीसद घटी. किसानों की संख्या घटी. साल 2001 में 12.73 करोड़ किसान थे, जिनकी संख्या घटकर 2011 में 11.87 करोड़ रह गई.

देश में कृषि की व्यापकता को देखते हुए कृषि आधारित पत्र-पत्रिका की ज़रूरत महसूस हुई. पहला कृषि पत्र ’कृषि सुधार’ 1914 में शुरू हुआ. फिर 1946 में ’खेती’ और 1950 में ’कुरुक्षेत्र’ का प्रकाशन शुरू किया गया. इसके बाद कृषि पर आधारित न जाने कितनी पत्र-पत्रिकाएं आईं. इन सबके बीच ’शरद कृषि’ ने अपनी एक विशेष पहचान बनाई.  ग़ौरतलब है कि श्री शरद पवार जी ने 23 जुलाई 2001 को सेंटर फ़ोर इंटरनेशनल ट्रेड एंड एग्रीकल्चर एंड एग्रो बेस्ड इंडस्ट्रीज़ (सिटा) का ऐलान किया. इसके तहत जनवरी 2005 से शरद कृषि के मराठी और हिन्दी संस्करण शुरू किए गए.  फिर जून में शरद कृषि का कन्नड़ संस्करण भी शुरू हो गया. उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार डॊ. महेंद्र मधुप को शरद कृषि के हिन्दी संस्करण के संपादक का दायित्व सौंपा. श्री मधुप जी के संपादन में शरद कृषि लोकप्रिय होने लगी. मधुप जी को 2005 के लिए दिसंबर 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील ने राष्ट्रपति भवन में प्रतिष्ठित ’आत्माराम पुरस्कार’ से सम्मानित किया.  इसके बाद 2007 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने उन्हें हिन्दी हिन्दी संस्करण के संपादक के तौर पर उल्लेखनीय कार्यों के लिए कृषि पत्रकारिता के सर्वोच्च सम्मान ’चौधरी चरणसिंह पुरस्कार’ से नवाज़ा.  डॉ. मधुप अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं.

शरद कृषि की ख़ासियत रही है कि इसने कृषि जगत के तक़रीबन सभी पहलुओं को छुआ है. मामला खेतीबाड़ी की समस्याओं से जुड़ा हो, फ़सलों की बिजाई से वाबस्ता हो, उन्नत बीजों से संबंधित हो, कृषि के तरीक़ों से जुड़ा हो या कृषि जगत के किसी और पहलू से. पत्रिका ने सभी विषयों को गंभीरता से पेश किया है. पत्रिका में सरकार की विभिन्न नीतियों, योजनाओं, कृषि ऋण, कृषि उत्पादों के बाज़ार मूल्य, पशुपालन, मत्स्य पालन, बाग़वानी, ऋण एवं उधार, रेशम उत्पादन इत्यादि के बारे में भी विस्तृत जानकारी दी जाती रही है, ताकि किसान इससे लाभ उठा सकें. इस पत्रिका की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसने न सिर्फ़ खेतीबाड़ी से जुड़ी समस्याओं को उठाया, बल्कि उनका समाधान तलाशने की भी कोशिश की है. कृषि क्षेत्र में नित-नई खोजों की जानकारी भी इसमें मिलती है. उन जागरूक किसानों के कार्यों को भी इसमें जगह दी जाती हैं, जिन्होंने अपनी लगन और मेहनत से कृषि के क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धि हासिल की है.

कृषि आधारित सारगर्भित लेख, पठनीय और संग्रहणीय सामग्री इसे अविस्मरणीय बनाते हैं. पत्रिका का आवरण आकर्षक होता है और इसका मुद्रण और छपाई भी उत्तम है, जो पाठक को बरबस ही अपनी ओर खींचती है. यह पत्रिका अपने नाम को सार्थक करते हुए कृषि पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी महती भूमिका निभा रही है, जो वाक़ई क़ाबिले-तारीफ़ है.

यह जानकर बेहद ख़ुशी हुई कि शरद कृषि इस नवंबर माह में अपने दस साल पूरे कर रही है. हमारा इस प्रतिष्ठित पत्रिका से बहुत पुराना रिश्ता है. यह कहना ग़लत न होगा कि हमारा इस पत्रिका से दोहरा रिश्ता है. पहला रिश्ता एक पाठक के रूप में है और दूसरा लेखक के तौर पर. पिछ्ले काफ़ी वक़्त से हम यह पत्रिका पढ़ रहे हैं और इसके लिए लिख भी रहे हैं, तो हुआ न दोहरा रिश्ता. ’शरद कृषि’ अपने प्रकाशन के सौ साल भी पूरे करे, ऐसी कामना है.


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मुहब्बत... एक नाम...


  • एक नाम, जिसे गुनगुनाते हुए उम्र बीत जाए... वो नाम हुआ करता है, जिससे बेपनाह मुहब्बत होती है... कोई एक नाम हुआ करता है... जो दिल के बहुत क़रीब होता है... या यूं कहें कि दिल में बसा होता है... हथेली की लकीरों में छुपा होता है... ऐसा ही एक नाम हुआ करता है... 
  • कोई एक नाम हुआ करता है... जो दिल के बहुत क़रीब होता है... या यूं कहें कि दिल में बसा होता है... हथेली की लकीरों में छुपा होता है... ऐसा ही एक नाम हुआ करता है... 
  • मुहब्बत... खिली धूप और ठंडी हवा के झोंके की तरह हुआ करती है... दिल के दरवाज़े और खिड़कियां खुली हों, तो वह दाख़िल हो जाती है... 
  • ये क्या कम है कि जिस पर दुनिया जान निसार करती है... उसकी जान आप में बसती है... 
  • जो चीज़ें हम याद रखना चाहते हैं, वो अकसर भूल जाते हैं... और जो बातें भूलना चाहते हैं, वो हमेशा याद रहा करती हैं...
  •  राहे-इश्क़ की कोई मंज़िल नहीं हुआ करती...
  • फ़र्क़ बस इतना है लोग उसकी बुलंदी देखते हैं और हम उसका दिल...
  • अकसर सोचती हूं, वो उदास और तकलीफ़देह रातें उसने कैसे गुज़ारी होंगी...
  • वो मेरा मुहाफ़िज़ है... उसके साये में मेरी रूह सुकून पाती है...
  • उसका नाम मुहब्बत है...
  • कुछ दोस्तियां ऐसी भी हुआ करती हैं... 
  • कुछ नाम हमें सिर्फ़ इसलिए अच्छे नहीं लगते कि वो नाम ख़ूबसूरत है या उस नाम के मानी बहुत अच्छे हैं... बल्कि वो नाम इसलिए हमें अच्छे लगते हैं, क्योंकि वो नाम जिन लोगों के हैं, वो लोग बहुत प्यारे हैं और हमें उनसे मुहब्बत है, उंसियत है...
  • नफ़रत की इंतेहा हो सकती है, लेकिन मुहब्बत की कोई इंतेहा नहीं हुआ करती... 
(हमारी डायरी से)
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      अकेलापन...


      अगर इंसान अपने लिए कोई ख़ुशी तलाश ले, तो ज़िंदगी कुछ आसान हो जाती है... हमारी एक दोस्त ने घर को संवारने में ही अपनी खु़शी तलाश ली है... दिन में पांच से सात घंटे वह घर की झाड़-पोंछ और उसे संवारने में ही लगा देती है... पहले हमें यह सब बहुत अजीब लगता था... लेकिन जब उसके साथ रहे, तो जान गए कि यह सब उसके लिए कितना ज़रूरी है... अकेलेपन का अहसास वाक़ई बहुत तकलीफ़देह होता है...

      तस्वीर : गूगल से साभार

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      कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित एक पत्रिका


      फ़िरदौस ख़ान
      कला, साहित्य और संस्कृति किसी भी देश और समाज की पहचान हुआ करती हैं. इसके बिना कोई भी समाज अपने वजूद का तसव्वुर तक नहीं कर सकता. भले ही आज बाज़ार का दौर है. हर चीज़ पर बाज़ार का असर दिखता है, वो चाहे अख़बार हों या पत्रिकाएं. लेकिन ये ख़ुशनुमा बात है कि बाज़ारवाद के माहौल में भी  कला, साहित्य और संस्कृति में रची-बसी पत्रिकाएं शाया हो रही हैं. कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित ऐसी ही एक पत्रिका है ’मानव संस्कृति’, जो तहज़ीब की सरज़मीं लखनऊ से शाया हो रही है. पिछले साल दिसंबर में शुरू हुई इस पत्रिका के दो अंक शाया हो चुके हैं और तीसरा अंक ‘सृजन शक्ति विशेषांक’ आने वाला है, जो भारतीय महिला कलाकारों पर केंद्रित है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इस पत्रिका के प्रकाशन से कलाकार दम्पति का जुड़ाव है. शीला शर्मा फ़ुट आर्टिस्ट हैं और सुधीर शर्मा मूर्तिकार, चित्रकार व कला समीक्षक हैं. शीला शर्मा प्रकाशक होने के साथ-साथ पत्रिका की संपादक भी हैं.

      पत्रिका के वजूद में आने की दास्तां बयां करते हुए राजीव शर्मा जी कहते हैं, काफ़ी समय से हम सभी हिन्दी भाषा में दृश्यकलाओं पर एक ऐसी पत्रिका की ज़रूरत महसूस कर रहे थे, जिसमें समकालीन और परंपरागत, दोनों ही कलारूपों का समुचित समावेश हो. साथ ही साथ रंगमंच, संगीत, नृत्य और साहित्य भी उस पत्रिका का ज़रूरी हिस्से के रूप में स्थापित दिखे. आज के दौर में ऐसी पत्रिका के तमाम फ़ायदे हैं. इसमें जहां एक ओर सभी समकालीन कला विधाओं को एक स्थान पर प्राप्त होने की सहूलियत पाठकों को मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर अलग-अलग विधाओं से जुड़े रचनाकारों के लिए दूसरी विधाओं के रचनाकारों के परिचय को गाढ़ा करने का आधार भी बन सकती है. बात यहीं पर ख़त्म नहीं हो जाती. यह एक ऐसी शुरुआत भी बन सकती है, जिसमें अपने फ़न के उस्ताद और शागिर्द दोनों ही, निःसंकोच बराबर आ जा सकें. यदि दूसरी विधाओं में उनकी यह आवाजाही एक-दूसरे के सृजन को समझने, परखने और उस पर निःसंकोच अपने सकारात्मक विचार व्यक्त करने का कारक बनती है, तो सृजनात्मक मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में यह कार्य महत्वपूर्ण माना जा सकता है. इस कार्यों का मूल उद्देश्य सृजनशीलता से भी है. अंततः यह कलाओं की अंतर्सम्बधता को ही प्रकट करेगा. इन विचारों के क्रम में ही इस पत्रिका ‘मानव संस्कृति’ का ख़ाका तैयार किया गया है.
      ‘मानव संस्कृति’ पत्रिका को कुछ मामूली लोगों के द्वारा किया जा रहा एक मामूली-सा प्रयास भर माना जाना चाहिए. हमारा उद्देश्य सरल है, सीधा है. कला साहित्य और अन्य सांस्कृतिक विधाओं के जानकारों और इन विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों को एक मंच पर लाना. उन्हें कला विषयक ज़रूरी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना तथा निरंतर सभी की राय शामिल करते हुए पत्रिका में अपेक्षित सुधार करना और अंततः पाठकों का दिल जीतना. दरअसल, हमारे लिए भी यह सीखने की प्रक्रिया से जुड़ा कार्य है. हम सभी को मिलकर एकसाथ कार्य करना है, एक साथ सीखना है. यह पत्रिका लोगों का दिल जीतने की कोशिश होगी, यही एकमात्रा हमारी मंशा है.
      ‘मानव संस्कृति’ पत्रिका कला, साहित्य और संस्कृति की धरोहर बने इस विचार एवं संकल्प के साथ इस पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया जा रहा है. हमारा प्रयास है कि अपने प्रारंभ से ही पत्रिका कला के उन सभी रूपों को एकजुट कर एक साथ उनकी प्रस्तुति संभव कर सके, जिससे कि उनकी अंतर्सम्बधता प्रकट हो, उनके विचार साझा हों और उनके बीच सृजनात्मक आवा-जाही सुनिश्चित हो. इस प्रवेशांक के ज़रिये इस रिश्ते का आग़ाज़ किया जा रहा है.

      फ़ुट आर्टिस्ट शीला शर्मा 
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      जंगली फूल...


      -फ़िरदौस ख़ान
      एक जंगली फूल था. महकता गुलाब का गुलाबी फूल. जंगल उसका घर था. जंगली हवाएं उसे झूला झुलाती थीं. ओस के क़तरे उसे भिगोते थे. सूरज की सुनहरी किरने उसे संवारती थीं. जो भी उसे एक बार देखता, बस देखता रह जाता. राहगीर रुक-रुक कर उसे देखते, उसकी तारीफ़ करते और आगे बढ़ जाते. उसे अपनी क़िस्मत पर नाज़ था.
      उस फूल के दिल में बहुत से अरमान थे. वो सुर्ख़ हो जाना चाहता था. वो सोचा करता था, जिस रोज़ उसे किसी की मुहब्बत मिल जाएगी, उसकी मुहब्बत में रंग कर वो सुर्ख़ हो जाएगा. लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था. वक़्त बदला. एक रोज़ एक मुसाफ़िर ने उसे तोड़ लिया. फूल का नया सफ़र शुरू हुआ. मुसाफ़िर ने उसे अपने कमरे के एक छोटे से गुलदान में सजा दिया. वो गुलदान में पानी डालना भूल गया या उसने जानबूझ कर ऐसा किया, ये तो मुसाफ़िर ही बेहतर जाने. मुसाफ़िर रोज़ सुबह चला जाता और जब रात ख़त्म होने लगती तब आता. एक दिन मुसाफ़िर परदेस चला गया है. बंद कमरे में फूल क़ैद होकर रह गया. कमरे में कोई खिड़की नहीं थी, बस एक छोटा-सा रौशनदान था, जिसमें से हल्की रौशनी आती थी. इसी से पता चलता था कि कब दिन उगा और कब रात घिर आई. फूल दिन रात तन्हा और उदास रहता. उसका दम घुटने लगा था. उसे न पानी मिलता था, न हवा और न ही भरपूर रौशनी. दिनोदिन वो मुरझाने लगा. उसे दिन रात ज़ारो-क़तार रोता रहता. उसकी सिसकियां कमरे की दीवारों से टकराकर रह जातीं.
      एक रोज़ उसे किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी. शायद किसी ने उसकी आवाज़ सुन ली थी. फूल को लगा कि वो इस क़ैद से निजात पा सकता है. उसकी आंखों में उम्मीद की एक किरन चमकी. बाहर कोई राहगीर था. फूल ने उसे पुकारा. राहगीर रुक गया. वो देखने लगा कि आवाज़ कहां से आ रही है. घर को बंद पाकर राहगीर ने रौशनदान से झांका, उसे फूल दिखाई दिया. फूल ने उसे अपनी आपबीती सुनाई. राहगीर ने उससे कहा कि वो मजबूर है. वो उसे इस अपने साथ नहीं ले जा सकता है. हां, इतना ज़रूर कर सकता है कि वो ऊपर से ही गुलदान में थोड़ा-सा पानी डाल दे. और उसे जब भी वक़्त मिलेगा वो गुलदान में पानी डाल दिया करेगा, ताकि फूल को पानी मिल सके और वो ज़िन्दा रह सके. राहगीर को फूल से मुहब्बत हो गई थी. लेकिन ये भी सच है कि मजबूरियां मुहब्बत को पनपने नहीं देतीं.
      राहगीर पानी लेने चला गया. फूल सोचने लगा. उसे सिर्फ़ पानी ही तो नहीं चाहिए. ज़िन्दा रहने के लिए हवा और रौशनी की भी ज़रूरत हुआ करती है. ऐसी ज़िन्दगी का क्या हासिल, जिसमें न उसका प्यारा जंगल हो, न जंगली हवाएं हों, न ओस के क़तरे हों, न सूरज की सुनहरी किरने हों. उसकी सारी उम्मीदें दम तोड़ चुकी थीं.
      उसने अब अपनी ज़िन्दगी से समझौता कर लिया था. वो चाहता था कि वो पंखुड़ी-पंखुड़ी होकर बिखरने की बजाय एक बार ही बिखर जाए, फ़ना हो जाए. लेकिन एक बार वो अपने उस मसीहा से मिलना चाहता था, जिसने कम से कम एक लम्हे के लिए ही सही उसकी आंखों में उम्मीद की चमक पैदा की, उसके दिल में फिर से जी लेने की ख़्वाहिश को जगाया तो सही.
      अब वो अपने प्यारे राहगीर के लिए दुआएं कर रहा था.

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      मेरी ख़ुशी...


      मुझसे बिछड़ते वक़्त
      उसने कहा-
      ख़ुश रहो...

      मैं सोचती रही
      क्या वो नहीं जानता था
      कि मेरी ख़ुशी तो उसके साथ है...
      -फ़िरदौस ख़ान


      तस्वीर : गूगल से साभार

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      रिश्तेदार...


      दुनिया में अहमियत सिर्फ़ ख़ूनी और काग़ज़ी रिश्तों की ही हुआ करती है, भले ही वो कितने ख़राब और तकलीफ़ देने वाले ही क्यों न हों...
      एक अमीर शख़्स था... उसकी बीवी थी, बेटी थी... अमीर शख़्स की ज़िन्दगी में एक बुरा दौर आया, बहुत ही बुरा दौर... उस वक़्त उसकी बीवी और उसकी बेटी उसके पास नहीं थी... तब उसकी दोस्त उसके साथ थी... बरसों तक उस दोस्त ने उसकी ख़िदमत की, उसका साथ दिया...
      जब अमीर शख़्स का आख़िरी वक़्त आया, तो जायदाद के लिए उसकी बीवी, बेटी और दामाद उसके पास आ गए... घर में डेरा डाल लिया... अमीर शख़्स मर गया... उसकी बीवी, बेटी और दामाद ने उस दोस्त को घर से निकाल दिया... वो कहने लगी कि मैंने अपनी ज़िन्दगी के बहुत साल अमीर शख़्स की देखभाल करते हुए, उसके साथ बिताए. अब इस उम्र में कहां जाऊंगी... मुझ पर रहम करो, मेरे सर से छत तो मत छीनो... इस पर अमीर शख़्स की बेटी ने कहा- जायदाद पर रिश्तेदारों का हक़ होता है, दोस्त का नहीं...

      कितना सच कहा उस अमीर शख़्स की बेटी ने... वाक़ई इंसान की हर चीज़ पर उसके रिश्तेदारों का ही हक़ हुआ करता है... दोस्त तो सिर्फ़ दोस्त ही हुआ करते हैं... वैसे भी इंसान कमाता किसके लिए है, रिश्तेदारों के लिए ही न... अपनी बीवी के लिए, अपने बच्चों के लिए, अपने घर-परिवार के लिए... दोस्त तो टाइम पास ही होते हैं, शायद...

      तस्वीर : गूगल से साभार
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      महाभारत के पात्र आसपास बिखरे हैं


      फ़िरदौस ख़ान
      भारतीय समाज में प्राचीन काल से लेकर आज तक सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है. उस वक़्त भी ताक़तवर व्यक्ति अपने फ़ायदे के लिए कमज़ोर व्यक्ति का इस्तेमाल करता था, और आज भी ऐसा ही हो रहा है. उस दौर में भी लोग सत्ता के लिए अपनों के ख़ून के प्यासे हो जाते थे और साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने में कोई गुरेज़ नहीं करते थे, उसी तरह मौजूदा दौर में भी नेतागण येन-केन-प्रकारेण कुर्सी हासिल कर लेना चाहते हैं. हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब सतगुरु हमसों यों कहियो में महाभारत के पात्रों के बहाने वर्तमान परिस्थितियों को बयां किया गया है.

      किताब की लेखिका डॉ. पुष्पम कहती हैं, जीवन एक रणक्षेत्र की तरह है, जिसमें सतत संघर्ष की स्थिति बनी रहती है. यह संघर्ष व्यक्तिगत, जातिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो सकता है. जीवन से जु़डा एक रोचक तथ्य यह भी है कि शांति और अहिंसा जैसी धारणाओं को आदर्श तो माना जाता है, सार्वभौमिक सौहार्द्र या वसुधैव कुटुंबकम जैसी कल्पना भी अच्छी लगती है, लेकिन यह परस्पर सद्‌भाव के बिना संभव नहीं होती है. आदर्श और यथार्थ, स्वप्न और वास्तविकता के बीच खींचतान चलती रहती है. हर व्यक्ति आवश्यक या अनावश्यक रूप से किसी न किसी स्तर पर अपने स्वार्थ-साधन में लगा रहता है. जिस क्षण उसकी स्वार्थ पूर्ति में व्यवधान पड़ता है, वह लड़ने की मुद्रा में खड़ा हो जाता है. तब शांति एवं सद्‌भाव के उपदेश कोरे शब्दों के जाल प्रतीत होने लगते हैं. ग्रंथ के रूप में महाभारत को घर में रखने की मनाही थी, बल्कि अभी भी है. कहा जाता है कि यह जिस घर में रहता है, वहां महाभारत छिड़ जाता है. लेकिन इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आम आदमी इस इतिहास के मर्म को समझ ले तो घर-घर में होने वाले छोटे-बड़े झगड़े संभवत: नहीं होंगे.

      हज़ारों वर्ष पूर्व के ऐतिहासिक पात्रों और वर्तमान युग में चलते-फिरते मनुष्यों की प्रवृत्तियों एवं मनोवृत्तियों में जो आश्चर्यजनक साम्य है, वह विशेष रूप से आकर्षित करता है. इतने लंबे अंतराल के बाद भी युगों के मानवों की मानसिकता में विद्यमान समानता महाभारत के उन पौराणिक पात्रों के व्यक्तित्व का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने के लिए प्रेरित करती है. यदि मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो महाभारत के पात्र गांवों, नगरों, गलियों में, स़डकों पर जहां-तहां दिख जाएंगे. उनमें धृतराष्ट्र, दुर्योधन और शकुनि बहुसंख्यक मालूम पड़ते हैं. शायद धर्म ने अपने पुत्र को पुन: मानव-देह धारण करने के कष्ट से मुक्त कर दिया है. इसलिए युधिष्ठिर कहीं नज़र नहीं आते हैं. इक्के-दुक्के अर्जुन गीता के उपदेशों की सार्थकता ढूंढते इधर-उधर भटकते हुए भले ही मिल जाएं. भीम अपनी संवेदनाओं और पराक्रम को समेटे कहीं एकांतवास में हैं. और नकुल-सहदेव अपने-अपने विशेष गुणों से लैस वर्तमान परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में लगे हुए हैं. गांधारी आज भी आंखों पर पट्टी बांधे किसी न किसी के सहारे चलने का प्रयास कर रही है. कुंती अपनी परिस्थितियों से जूझती हुई आगे बढ़ने के रास्ते तलाश रही है. द्रौपदी को निर्वस्त्र हो जाने का भय आज भी बना हुआ है. लेकिन अबला द्रौपदी धीरे-धीरे रूपांतरित होती हुई सबला बनती जा रही है. उसे रूपांतरण की प्रक्रिया में अनेक विषमताओं का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन उसने अपने अंदर सकारात्मक परिवर्तन लाने का जो दॄढ संकल्प कर लिया है, उससे उसे विमुख करना आसान नहीं है. महाभारत की द्रौपदी की मानसिकता अपमान का बदला लेने तक ही सीमित थी, लेकिन वर्तमान युग की द्रौपदी व्यक्तिगत स्तर पर ही जीवनरूपी युद्ध क्षेत्र को जीतकर स्वयं को सम्मानजनक स्थान पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रही है. द्रौपदी को अपमानित करने वाला आज का दुर्याधन पहले से कहीं अधिक पतित हो चुका है. बदले की आग में जलता हुआ दिग्भ्रमित अश्वत्थामा आज भी दुर्याधन की ही छत्र-छाया में पल रहा है. भीष्म एवं आचार्य द्रोण के महत्व को कौरवों ने अपनी स्वार्थपूर्ति तक ही सीमित कर रखा था. भारतीय संस्कृति को गरिमा प्रदान करने वाली उन दोनों विभूतियों को वर्तमान परिस्थिति में तो पूरी तरह अप्रासंगिक बना दिया गया है. विदुर रूपी धर्म के लिए प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्र और दंभी दुर्योधन की हठता को पुन: झेलना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने पूरी तरह पृथ्वी का त्याग कर दिया है और अपनी नीतियों के साथ प्रयाण कर गए हैं. इसलिए निकट भविष्य में उस रूप में धर्म के पुन: दृष्टिगोचर होने की संभावना दिखाई नहीं देती है. और कृष्ण? शायद वह पृथ्वी से धर्म के पूर्णत: विलुप्त होने तक क्षीर सागर में शेष-शय्या पर अगले अवतरण की प्रतीक्षा में योगनिद्रा के आनंद में निमग्न हैं. इधर, इंद्र से पराजित होकर पातालवासी हुए दिति और दनु के पुत्रों ने पृथ्वी पर पुन : अपनी पताका फहरा ली है. और अपनी विवशताओं की सलीब पर लटका हुआ सामान्य मानव पुनर्जीवन प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षारत है. इस प्रकार विधाता द्वारा रचे गए सभी पात्र अपनी-अपनी भूमिकाओं में व्यस्त हैं. दरअसल, भारतीय संस्कृति की विरासत के रूप में महाभारत एक बहुरूपदर्शी की भांति है, जिसके हर कोण से एक नई आकृति दिखाई देती है.

      प्राचीन काल से ही भारत में महिलाओं की स्थिति दयनीय रही है. किताब में प्राचीन काल की अनेक मिसालें देकर यह बताया गया है कि किस तरह उस वक़्त की महिलाएं भी बेबस और लाचार थीं. बानगी देखिए, एक दो अपवादों को छोड़कर प्राचीन काल से ही भारतीय समाज पितृ-सत्तात्मक रहा है और उसकी संरचना में भी कोई परिवर्तन नहीं आया है. पितृ-सत्तात्मक समाज के परिवारों में सभी पुरुष मूलत: अपने पिता के परिवार से जु़डे हुए होते हैं. पीढ़ी के अनुसार ये विभिन्न श्रेणियों (पितामह, पिता, पुत्र, पौत्र इत्यादि) में आजीवन उस परिवार का सदस्य रहते हैं, जिसमें उनका जन्म होता है. इस प्रकार सभी पुरुषों को एक ही समूह का सदस्य माना जा सकता है. लेकिन उस परिवार की स्त्रियों के दो समूह होते हैं, एक समूह उन स्त्रियों का होता है, जिनका जन्म उस परिवार में हुआ है और दूसरे समूह की स्त्रियां वे हैं, जो विवाह के उपरांत उस परिवार में लाई जाती हैं. ठीक इसी प्रकार जिन स्त्रियों का जन्म एक परिवार में होता है, वे वैवाहिक रीतियों द्वारा दूसरे परिवार में चली जाती हैं. जिस प्रकार पुरुषों के लिए कुछ नियम होते हैं और उनसे विशेष आचरण की अपेक्षा रखी जाती है, उसी प्रकार दोनों समूहों की स्त्रियों के लिए भी भिन्न-भिन्न नियम निर्धारित किए गए हैं और उनसे तदनुरूप आचरण अपेक्षित होते हैं.

      प्राचीन समय में सामान्यत: राजकन्याओं का विवाह किसी विशेष कुल या वंश में करने का कोई न कोई विशेष कारण होता था, जैसे कभी प्रगा़ढ मैत्री के कारण, कभी राजनीतिक संबंध बनाने के लिए या कभी किसी अन्य कारण से. राजा दशरथ ने अपनी कन्या शांता का विवाह अपने मित्र लोमपाद से कर दिया था. राजा शर्याति ने च्यवन ऋृषि को प्रसन्न करने के लिए उनसे अपनी पुत्री सुकन्या को ब्याह दिया. ययाति की पुत्री माधवी का उपाख्यान मन को क्षुब्ध कर देता है. एक बार गालव ऋषि ने ययाति से इतने घो़डे मांगे जितने उसके पास नहीं थे. इसलिए उसने क्षतिपूर्ति के रूप में ऋषि को अपनी कन्या को ही दान में दे दिया. यह कथा स्त्रियों के प्रति संवेदनहीनता के कटुतम उदाहरणों में से एक है. काशीराज की तीन राजकुमारियों में अम्बा सबसे ब़डी थी और उसने मन ही मन शाल्व को अपना पति मान लिया था, लेकिन भीष्म ने अपने सौतेले भाई विचित्रवीर्य के लिए स्वयंवर से ही उन तीनों का हरण कर लिया था. दो छोटी बहनों का विवाह तो विचित्रवीर्य से हो गया, लेकिन अम्बा का भविष्य अधर में लटक गया. अंधे धृतराष्ट्र से गांधारी का विवाह निश्चित किया गया, तो गांधारी इस संबंध को अस्वीकार तो नहीं कर पाई, अपने भावी पति के प्रति सहानुभूति में जीवन भर के लिए उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली. पांडु से माद्री के विवाह के लिए मद्र नरेश ने भीष्म से अपार धन प्राप्त किया था. मद्र देश में पुत्री के बदले धन लेने की प्रथा थी. राजा द्रुपद अपनी पुत्री का विवाह ऐसे दक्ष धनुर्धर से करना चाहते थे, जो द्रोण से उनके अपमान का बदला ले सके.

      ये सभी दृष्टांत इस तऱफ इशारा करते हैं कि प्राचीन काल में स्त्रियों को किस प्रकार जीवन के अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में निर्णय लेने का अधिकार नहीं था, उसी प्रकार वे विवाह संबंधी निर्णय लेने के अधिकार से भी वंचित थीं. पत्नी पर पति का पूरा अधिकार होता था. स्त्रियों का पतिव्रता होना उनका विशेष गुण माना जाता था. एक रोचक तथ्य पातिव्रत्य से जु़डा हुआ है. पति के आदेश पर पत्नी नियोग विधि से संतान उत्पन्न कर सकती थी. अन्य पुरुष के संसर्ग में आने पर भी उस स्त्री का सतीत्व भंग नहीं होता. पति के जीवित नहीं रहने पर उसकी मां या यानी सास भी ऐसी आज्ञा दे सकती थी. महाभारत की सत्यवती इसी श्रेणी की सास थी.

      इतना ही नहीं, उस व़क्त महिलओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था. इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में उनकी पहचान स़िर्फ अपने परिवार के पुरुषों के संबंधों पर आधारित थी, मसलन किसी की बेटी, किसी की बहन और किसी की पुत्री. इसके अलावा उनका अपना कोई वजूद नहीं था. यह किताब महाभारत के विभिन्न पात्रों के चरित्र को बहुत ही अच्छे तरीक़े से पेश करती है. इस किताब को एक बार हाथ में लेने पर, इसे पूरा पढ़े बिना रखना मुश्किल है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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