मुहब्बत की महक


मेरे महबूब !
इन हवाओं में
मुहब्बत की महक है
लगता है
तुम्हें छूकर आई हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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उर्स


उर्स... औलियाओं की बरसी पर जो जश्न मनाया जाता है, उसे उर्स कहा जाता है... औलिया ख़ुदा को चाहने वाले हैं... ख़ुदा ही उनका महबूब है... उनकी मौत को विसाल कहा जाता है... विसाल का मतलब महबूब से मिलन होता है... उर्स उनके विसाल की सालगिरह के तौर पर मनाया जाता है...
उर्स के मौक़े पर दरगाहों को सजाया जाता है... चिराग़ रौशन किए जाते हैं, चादरें चढ़ाई जाती हैं... फूल चढ़ाए जाते हैं... क़व्वालियां होती हैं, खाने पकते हैं और तबर्रुक बांटा जाता है... दूर-दूर से ज़ायरीन ज़ियारत के लिए आते हैं...
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रिश्तों की वो गरमाहट चली गई...


फ़िरदौस ख़ान
ज़िंदगी की जद्दोजहद ने इंसान को जितना मसरूफ़ बना दिया है, उतना ही उसे अकेला भी कर दिया है. हालांकि आधुनिक संचार के साधनों ने दुनिया को एक दायरे में समेट दिया है. मोबाइल, इंटरनेट के ज़रिये सात समंदर पार किसी भी पल किसी से भी बात की जा सकती है. इसके बावजूद इंसान बहुत अकेला दिखाई देता है. बहुत ही अकेला, क्योंकि आज के दौर में 'अपनापन' जैसे जज़्बे कहीं पीछे छूट गए हैं. अब रिश्तों में वह गरमाहट नहीं रही, जो पहले कभी हुआ करती थी. पहले लोग संयुक्त परिवार में रहा करते थे. पुरुष बाहर कमाने जाया करते थे और महिलाएं मिल जुलकर घर-परिवार का कामकाज किया करती थीं. परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के लिए आदर-सम्मान और अपनापन हुआ करता था. लेकिन अब संयुक्त परिवार टूटकर एकल हो रहे हैं. महिलाएं भी कमाने के लिए घर से बाहर जा रही हैं. उनके पास बच्चों के लिए ज़्यादा वक़्त नहीं है. बच्चों का भी ज़्यादा वक़्त घर से बाहर ही बीतता है. सुबह स्कूल जाना, होम वर्क करना, फिर ट्यूशन के लिए जाना और उसके बाद खेलने जाना. जो वक़्त मिलता है, उसमें भी बच्चे मोबाइल या फिर कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं. ऐसे में न माता-पिता के पास बच्चों के लिए वक़्त है और न ही बच्चों के पास अपने बड़ों के लिए है.

ज़िंदगी की आपाधापी में रिश्ते कहीं खो गए हैं. शायद, इसीलिए, अब लोग परछाइयों यानी वर्चुअल दुनिया में रिश्ते तलाशने लगे हैं. लेकिन अफ़सोस यहां भी वे रिश्तों के नाम पर ठगे जा रहे हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट पर ज़्यादातर प्रोफ़ाइल फ़ेक होते हैं, या फिर उनमें ग़लत जानकारी दी गई होती है. झूठ की बुनियाद पर बनाए गए रिश्तों की उम्र बस उस वक़्त तक ही होती है, जब तक झूठ पर पर्दा पड़ा रहता है. लेकिन जैसे ही सच सामने आता है, वह रिश्ता भी दम तोड़ देता है.  अगर किसी इंसान को कोई अच्छा लगता है और वह उससे उम्रभर का रिश्ता रखना चाहता है, तो उसे सामने वाले व्यक्ति से झूठ नहीं बोलना चाहिए. जिस दिन उसका झूठ सामने आ जाएगा. उस वक़्त उसका रिश्ता तो टूट ही जाएगा, साथ ही वह हमेशा के लिए नज़रों से भी गिर जाएगा. कहते हैं- इंसान पहाड़ से गिरकर तो उठ सकता है, लेकिन नज़रों से गिरकर कभी नहीं उठ सकता. ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ अपराधी प्रवृति के लोग ख़ुद को अति सभ्य व्यक्ति बताते हुए महिलाओं से दोस्ती गांठते हैं, फिर प्यार के दावे करते हैं. बाद में पता चलता है कि वे शादीशुदा हैं और कई बच्चों के बाप हैं. दरअसल, ऐसे बाप टाईप लोग हीन भावना का शिकार होते हैं. अपराधी प्रवृति के कारण उनकी न घर में इज्ज़त होती है और न ही बाहर. उनकी हालत धोबी के कुत्ते जैसी होकर रह जाती है यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का. ऐसे में वे सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपना अच्छा-सा प्रोफ़ाइल बनाकर ख़ुद को महान साबित करने की कोशिश करते हैं. वे ख़ुद को अति बुद्धिमान, अमीर और न जाने क्या-क्या बताते हैं, जबकि हक़ीक़त में उनकी कोई औक़ात नहीं होती. ऐसे लोगों की सबसे बड़ी 'उपलब्धि' यही होती है कि ये अपने मित्रों की सूची में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को शामिल करते हैं. कोई महिला अपने स्टेट्स में कुछ भी लिख दे, फ़ौरन उसे 'लाइक' करेंगे, कमेंट्स करेंगे और उसे चने के झाड़ पर चढ़ा देंगे.  ऐसे लोग समय-समय पर महिलाएं बदलते रहते हैं, यानी आज इसकी प्रशंसा की जा रही है, तो कल किसी और की. लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती.

वक़्त दर वक़्त ऐसे मामले सामने आते रहते हैं. ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ऑनलाइन रोमांस के चक्कर में तक़रीबन दो लाख लोग धोखा खा चुके हैं. धोखा देने वाले लोग अपनी असली पहचान छुपाकर रखते थे और आकर्षक मॉडल और सेना अधिकारी की तस्वीर अपनी प्रोफ़ाइल पर लगाकर लोगों को आकर्षित किया करते थे. ऐसे में सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का उनके प्रति जुड़ाव रखना स्वाभाविक ही था, लेकिन जब उन्होंने झूठे प्रोफ़ाइल वाले लोगों से मिलने की कोशिश की, तो उन्हें सारी असलियत पता चल गई. कई लोग अपनी तस्वीर तो असली लगाते हैं, लेकिन बाक़ी जानकारी झूठी देते हैं. झूठी प्रोफ़ाइल बनाने वाले या अपनी प्रोफ़ाइल में झूठी जानकारी देने वाले लोग महिलाओं को फांसकर उनसे विवाह तक कर लेते हैं. सच सामने आने पर उससे जुड़ी महिलाओं की ज़िन्दगी बर्बाद होती है. एक तरफ़ तो उसकी अपनी पत्नी की और दूसरी उस महिला की जिससे उसने दूसरी शादी की है.

एक ख़बर के मुताबि़क़,  अमेरिका में एक महिला ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर अपने पति की दूसरी पत्नी को खोज निकाला. फेसबुक पर बैठी इस महिला ने साइड में आने वाले पॉपअप ‘पीपुल यू मे नो’ में एक महिला को दोस्त बनाया. उसकी फेसबुक पर गई, तो देखा कि उसके पति की वेडिंग केक काटते हुए फोटो थी. समझ में नहीं आया कि उसका पति किसी और के घर में वेडिंग केक क्यों काट रहा है? उसने अपने पति की मां को बुलाया, पति को बुलाया. दोनों से पूछा, माजरा क्या है? पति ने पहली पत्नी को समझाया कि ज़्यादा शोर न मचाये, हम इस मामले को सुलझा लेंगे. मगर इतने बड़े धोखे से आहत महिला ने घर वालों को इसकी जानकारी दी. उसने अधिकारियों से इस मामले की शिकायत की. अदालत में पेश दस्तावेज़ के मुताबिक़  दोनों अभी भी पति-पत्नी हैं. उन्होंने तलाक़ के लिए भी आवेदन नहीं किया.  पियर्स काउंटी के एक अधिकारी के मुताबिक़, एलन ओनील नाम के इस व्यक्ति ने 2001 में एलन फल्क के अपने पुराने नाम से शादी की. फिर 2009 में पति ओनील ने नाम बदलकर एलन करवा लिया था और किसी दूसरी महिला से शादी कर ली थी. उसने  पहली पत्नी को तलाक़ नहीं दिया था.

दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से रिश्ते तेज़ी से टूट रहे हैं. अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रीमोनियल लॉयर्स के एक सर्वे में यह बात सामने आई है. सर्वे के मुताबिक़ तलाक़ दिलाने वाले क़रीब 80 फ़ीसद वकीलों ने माना कि उन्होंने तलाक़ के लिए सोशल नेटवर्किंग पर की गई बेवफ़ाई वाली टिप्पणियों को अदालत में बतौर सबूत पेश किया है. तलाक़ के सबसे ज़्यादा मामले फेसबुक से जुड़े हैं. 66 फ़ीसद मामले फेसबुक से, 15 फ़ीसद माईस्पेस से, पांच फ़ीसद ट्विटर और 14 फ़ीसद मामले बाक़ी दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़े हैं. इन डिजिटल फुटप्रिंट्स को अदालत में तलाक़ के एविडेंस के रूप में पेश किया गया.  अभिनेत्री इवा लांगोरिया ने बास्केट बाल  खिलाड़ी अपने पति टोनी पार्कर का तलाक़ दे दिया. इवा का आरोप है कि फेसबुक पर उसके पति टोनी और एक महिला की नज़दीकी ज़ाहिर हो रही थी. ब्रिटेन में भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से तलाक़ के मामले तेज़ी से बढ़े हैं. अपने साथी को धोखा देकर ऑनलाइन बात करते हुए पकड़े जाने की वजह से तलाक़ के मामलों में इज़ाफ़ा हुआ है. ब्रिटिश न्यूज पेपर 'द सन' के मुताबिक़  पिछले एक साल में फेसबुक पर की गईं आपत्तिजनक टिप्पणियां तलाक़ की सबसे बड़ी वजह बनीं. रिश्ते ख़राब होने और टूटने के बाद लोग अपने साथी के संदेश और तस्वीरों को तलाक़ की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल कर रहे हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट की वजह से खु़दकशी के मामले भी सामने आए हैं. एक चर्चित मामला है जमशेदपुर की 22 वर्षीय आदिवासी छात्रा मालिनी मुर्मू का, जिसने अपने प्रेमी के रवैये से आहत होकर ख़ुदकुशी कर ली थी. उसका बेंगलूर में ही रहने वाले उसके ब्वायफ्रेंड से कथित तौर पर कुछ मनमुटाव और कहासुनी हुई थी. इसके बाद लड़के ने फेसबुक में अपने वॉल पर एक संदेश में लिखा था- 'मैं आज बहुत आराम महसूस कर रहा हूं. मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को छोड़ दिया है. अब मैं स्वतंत्र महसूस कर रहा हूं. स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं.'  मामले की जांच कर रहे अधिकारियों के मुताबिक़ सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर मालिनी के ब्वॉयफ्रैंड ने उससे संबंध तोड़ लिए थे. इससे उसे गहरा आघात लगा और उसने क्लास में भी जाना छोड़ दिया. क्लास में उसे नहीं पाकर जब उसके दोस्त हॉस्टल के कमरा नंबर 421 में गए, तो उसने दरवाज़ा नहीं खोला. गार्ड्स को बुलाकर दरवाज़ा तुड़वाया गया. कमरे के भीतर मालिनी का शव पंखे से झूलता मिला. मालिनी ज़िन्दगी में एक बड़ा मुक़ाम हासिल करना चाहती थी. उसने साकची के राजेंद्र विद्यालय से दसवीं की पढ़ाई की थी. इसके बाद उसने उड़ीसा के आईटीई से बारहवीं पास की. वह आईआईएम बेंगलुरू में एमबीए प्रथम वर्ष की छात्रा थी. लैपटॉप में छोड़े अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है- ‘उसने मुझे छोड़ दिया, इसलिए आत्महत्या कर रही हूं.’ माना ज़िन्दगी में प्रेम की भी अपनी अहमियत है. मगर प्रेम ही तो सबकुछ नहीं है. ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...और उससे भी ख़ूबसूरत होते हैं हमारे इंद्रधनुषी सपने .हमें अपनी भावनाएं ऐसे व्यक्ति से नहीं जोड़नी चाहिए, जो इस क़ाबिल ही न हो. जिस तरह पूजा के फूलों को कूड़ेदान में नहीं फेंका जा सकता, उसी तरह अपने प्रेम और इससे जुडी कोमल भावनाओं को किसी दुष्ट प्रवृति के व्यक्ति पर न्योछावर नहीं किया जा सकता.

दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जहां कुछ फ़ायदें हैं, वहीं नुक़सान भी हैं. इसलिए सोच-समझ कर ही इनका इस्तेमाल करें. अपने आसपास के लोगों को वक़्त दें, उनके साथ रिश्ते निभाएं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स के आभासी मित्रों से परस्पर दूरी बनाकर रखें.  कहीं ऐसा न हो कि आभासी फ़र्ज़ी दोस्तों के चक्कर में आप अपने उन दोस्तों को खो बैठें, जो आपके सच्चे हितैषी हैं.

वाल्ट व्हिटमेन के शब्दों में " ओ राही! अगर तुझे मुझसे बात करने की इच्छा हुई, तो मैं भी तुझसे क्यों न बात करूं...
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कुछ लोग


कुछ लोग घर में साथ रहते हैं, कुछ फ़ोन पर साथ रहते हैं, कुछ फ़ेसबुक पर साथ रहते हैं और कुछ वट्सअप पर घंटों साथ रहते हैं... लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हुआ करते हैं, जो घर में साथ नहीं रहते, फ़ोन, फ़ेसबुक या वट्सअप पर भी घंटों साथ नहीं रहते... लेकिन वो लोग एक-दूसरे के दिलों में हमेशा बसते हैं... दुआओं में हमेशा रहते हैं, उनके नाम के बिना कोई दुआ मुकम्मल नहीं हुआ करती... 
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फूल और तालाब


फ़िरदौस ख़ान
पानी से भरा एक तालाब था. उसमें एक मेंढक रहता था. तालाब में एक कमल का फूल भी था. तीनों की ज़िन्दगी बहुत अच्छी तरह से गुज़र रही थी. तीनों बहुत ख़ुश थे. मौसम ने करवट ली और सूखा पड़ गया. दूर-दूर तलक बादल का एक टुकड़ा भी नज़र नहीं आता था. ऊपर से शिद्दत की गर्मी पड़ रही थी. तालाब सूखने लगा. मेंढक पानी की तलाश में दूसरी जगह चला गया. तालाब उदास हो गया. उसका साथी बिछड़ गया था, लेकिन वो कर भी क्या सकता था. जाने वाले को कोई रोक सका है भला. तालाब दिनोदिन सूख रहा था. जैसे-जैसे तालाब का पानी कम होने लगा, वैसे-वैसे कमल का फूल भी मुरझाने लगा. तालाब ने उससे कहा कि वह भी यहां से कहीं और चला जाए, वरना एक दिन सूख जाएगा. फूल ने जाने से इंकार कर दिया और कहा- हम साथी हैं, हर हाल में साथ रहेंगे. मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा, जो तुम्हारा हाल होगा, वही मेरा हाल होगा.
एक दिन तालाब सूख गया और उसके साथ-साथ फूल भी सूख गया.
कभी किसी से मुहब्बत करो, तो कमल के फूल की तरह करना. जो तालाब के सूखने के साथ ख़ुद भी सूख जाता है.
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पानी और मछली


फ़िरदौस ख़ान
एक मछली थी. पानी के एक ज़ार में रहती थी. अकसर वो पानी से कहती-तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो. मुझे तुमसे बेपनाह मुहब्बत है. तुम्हारे बिना मैं ज़िन्दगी का तसव्वुर भी नहीं कर सकती. पानी को मछली की बातें सुनकर बहुत ख़ुशी मिलती. वो ख़ुद पर और मछली पर नाज़ करने लगा. गरमी का मौसम शुरू हुआ और गरमी की शिद्दत से ज़ार का पानी सूखने लगा. और एक दिन ज़ार का पानी बहुत कम रह गया. फिर क्या था. मछली छलांग लगाकर दूसरे ज़ार में चली गई, दूसरे पानी के पास.
पहले ज़ार का सूखता पानी उसे देखता रहा. मछली बहुत ख़ुश थी. पानी का वजूद पल-पल ख़त्म हो रहा था, लेकिन वो हर लम्हा मछली को दुआएं दे रहा था. यही तो मुहब्बत है. ख़ुद को मिटाकर भी अपने महबूब के लिए ख़ुशी चाहना.
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जहां क़दम ले चलें


बहुत दिनों से कहीं जाना चाहते हैं... लेकिन कहां, यह मालूम नहीं है... पर इतना ज़रूर है कि कहीं जाना है... किसी पहाड़ पर... क़ुदरत के बेहद क़रीब... जहां कल-कल करती बहती नदी हो... देर तक नदी के पानी में पैर लटका कर बैठे रहें... जहां झर-झर झरते झरने हों... जिसे देर तक निहारते रहें... किसी पहाड़ी सड़क पर दूर तक पैदल चलते रहें किसी अनजान राह पर... या फिर किसी ऐसी जगह जाएं, जहां दूर-दूर तक रेत ही रेत हो... रेतीले टीले हों... मरूस्थल में उगने वाले दरख़्त हों... गरम रेत में जब चलते-चलते थक जाएं, तो किसी घने दरख़्त की छाया में बैठ जाएं... या फिर समंदर के किनारे... जहां लहरों पर अठखेलियां करती सूरज की सुनहरी किरनें हो... कंकरीट की इन बस्तियों से दूर, बहुत दूर... जहां क़ुदरती नज़ारें हो...
बस, जाना है... कहीं भी... जहां क़दम ले चलें...
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ज़ख़्म


कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है... लेकिन कुछ ज़ख़्म ऐसे हुआ करते हैं, जो कभी नहीं भरते...  बस इंसान को उन ज़ख़्मों का दर्द बर्दाश्त करने की आदत पड़ जाती है... वो अपनी तकलीफ़ को अपनी बनावटी मुस्कराहट के पीछे छुपाना सीख लेता है...
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फ़ितरत


इंसान की फ़ितरत कभी नहीं बदलती. वो जैसा होता है, वैसा ही रहता है.
एक शहज़ादी थी. उसे एक ऐसे लड़के से मुहब्बत हो गई, जो फटे-पुराने कपड़े पहने यहां-वहां घूमता रहता था. किसी ने कुछ खाने को दे दिया, तो खा लिया. शहज़ादी अकसर उसे देखती. उसे लड़के से हमदर्दी हो गई, जो बाद में मुहब्बत बन गई. शहज़ादी ने उस लड़के से शादी कर ली. उसे पहनने के लिए एक से एक अच्छे कपड़े दिए. खाने के लिए एक से बढ़कर एक पकवान दिए.
लेकिन शादी के बाद से लड़का दुबला होने लगा. शहज़ादी बहुत परेशान हो गई. उसने बड़े-बड़े हकीमों को उसे दिखाया, लेकिन लड़के की कमज़ोरी दिनोदिन बढ़ती चली जा रही थी. एक रोज़ वज़ीर ने शहज़ादी से कहा कि मैं लड़के का इलाज कर सकता हूं, लेकिन मैं जैसा कहूंगा, वैसा ही करना होगा. शहज़ादी मान गई. महल में जगह-जगह उस तरह का खाना रख दिया गया, जैसा वो शादी से पहले खाता था. कुछ ही दिनों में लड़का फिर से तंदुरुस्त हो गया.
शहज़ादी ने वज़ीर से इसकी वजह पूछी, तो उसने कहा कि इंसान की फ़ितरत कभी नहीं बदलती. इसे दिनभर रूखा-सूखा खाने की आदत थी और आप इसे भरपेट लज़ीज़ पकवान खिलाती थीं.
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उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे


डॉ. फ़िरदौस ख़ान
कैफ़ियात मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी के सात काव्य संग्रहों का संकलन है, जिसमें इनकार, आख़िर-ए-शब, मसनवी, आवारा सजदे, इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा, इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा: दूसरा इजलास और मुतफ़र्रिक़ात शामिल हैं. 19 जनवरी 1909 को उत्तर प्रदेश के आज़मढ़ ज़िले के गांव मिज्वां में जन्मे कैफ़ी आज़मी का असली नाम अख़्तर हुसैन रिज़वी था. उन्होंने फ़िल्मों में भी गीत लिखे, जिन्हें सुनकर आज भी लोग झूम उठते हैं. उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. 1970 में उन्हें फ़िल्म सात हिन्दुस्तानी के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार दिया गया. इसके बाद 1975 में उन्हें आवारा सजदे के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. इसी साल उन्हें फ़िल्म गरम हवा के लिए फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला. 10 मई 2002 को मुम्बई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. उनकी मौत के क़रीब एक दशक बाद यह संकलन प्रकाशित हुआ है. इस बारे में शबाना आज़मी कहती हैं- “कैफ़ियात कैफ़ी साहब की कुल्लियात (समग्र) है. इसे उनकी ज़िन्दगी में प्रकाशित होना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं हो सका. मुझे इसका ग़म है.”

अपने बारे में कैफ़ी आज़मी कहते थे- “अपने बारे में यक़ीन के साथ सिर्फ़ इतना कह सकता हूं कि मैं महकूम (ग़ुलाम) हिन्दुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद हिन्दुस्तान में बूढ़ा हुआ और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में मरूंगा. यह किसी मज्ज़ूब की बड़ या दीवाने का सपना नहीं है. समाजवाद के लिए सारे संसार में और ख़ुद मेरे अपने देश में एक मुद्दत से जो अज़ीम जद्दोजहद हो रही है, उससे हमेशा जो मेरा और मेरी शायरी का ताल्लुक़ रहा है, इस यक़ीन ने उसी की कोख से जन्म लिया है.”

कैफ़ी आज़मी की चार बहनों की टीबी से मौत हो गई थी. इसलिए उनके वालिद सोचते थे कि उन्होंने अपने बेटों को अंग्रेज़ी तालीम दी है, इसलिए यह सब हो रहा है. उन्होंने फ़ैसला किया कि वह कैफ़ी को मौलवी बनाएंगे और इसके लिए उन्हें लखनऊ में सुल्तानुल मदारिस में दाख़िल करा दिया गया. यहां कैफ़ी ने छात्रों के साथ मिलकर एक कमेटी बनाई और अपनी मांगें पूरी कराने के लिए मुहिम शुरू कर दी. उन्होंने बैठकें कीं, हड़तालें कीं और आख़िर में अपनी मांगें मनवा कर ही दम लिया. इसी दौरान उन्होंने प्राइवेट इम्तिहान देकर कई डिग्रियां हासिल कर लीं, जिनमें लखनऊ यूनिवर्सिटी से दबीर माहिर (फ़ारसी), दबीर कामिल (फ़ारसी), आलिम (अरबी) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से आला क़ाबिल (उर्दू), मुंशी (फ़ारसी) और मुंशी कामिल (फ़ारसी) शामिल हैं. बक़ौल अफ़साना निगार आयशा सिद्दीक़ी- “कैफ़ी साहब को उनके बुज़ुर्गों ने एक दीनी मदरसे में इसलिए दा़ख़िल किया था कि वहां यह फ़ातिहा पढ़ना सीख जाएंगे. कैफ़ी साहब इस मदरसे में मज़हब पर फ़ातिहा पढ़कर निकल आए. कैफ़ी साहब ने ग्यारह साल की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल लिखी थी. बेगम अख़्तर ने इसे अपनी आवाज़ दी और यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान में मशहूर हो गई-
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े...”

किताब के शुरू में शबाना आज़मी भी अपने पिता की ज़िन्दगी के कई प्रसंगों को बयां करती हैं. वह लिखती हैं- “कैफ़ी साहब की ज़िन्दगी एक ऐसे इंसान, एक ऐसे शायर की कहानी है, जिसने ज़िन्दगी को पूरी तरह भरपूर जी कर देखा है और चौरासी बरस की उम्र में भी उनके हौसलों में कोई थकान नहीं दिखाई दी. 8 फ़रवरी 1973 को उन पर फ़ालिज का असर हुआ था. हम सबको लगा कि शायद आइन्दा वह कुछ न कर सकें. पांच दिनों बाद उन्हें होश आया. वह मुश्किल से बोल सकते थे. उसी हालत में उन्होंने शमा ज़ैदी को एक नज़्म लिखवाई- धमाका. उस धमाके के बारे में जो उन्होंने पांच दिन पहले अपने दिमाग़ में महसूस किया था और उसी महीने में अस्पताल से निकलने से पहले ही उन्होंने अपनी एक नज़्म ज़िन्दगी लिख डाली. मैं समझती हूं, ज़िन्दगी उनकी बेहतरीन नज़्मों में से एक है-
आज अंधेरा मेरी नस-नस में उतर जाएगा
आंखें बुझ जाएंगी, बुझ जाएंगे अहसास-ओ-शऊर
और ये सदियों से जलता सा, सुलगता-सा वजूद
इससे पहले कि मेरी बेटी के वो फूल से हाथ
गर्म रुख़सार को ठंडक बख़्शे
इससे पहले कि मेरे बेटे का मज़बूत बदन
जान-ए- मफ़्लूज में शक्ति भर दे
इससे पहले कि मेरी बीवी के होंठ
मेरे होंठों की तपिश पी जाएं
राख हो जाएगा जलते-जलते
और फिर राख बिखर जाएगी...

यह नज़्म निराशा और नाउम्मीदी पर नहीं, उस आशा और उम्मीद पर ख़त्म होती है कि एक दिन ज़िन्दगी मौत से डरना छोड़ देगी. दरअसल उनकी बात सिर्फ़ एक इंसान के दिल की बात नहीं, दुनिया के सारे इंसानों के दिलों की बात हो जाती है और महसूस करते हैं कि उनकी शायरी में सिर्फ़ उनका नहीं, हमारा आपका सबका दिल धड़क रहा है.”

कैफ़ी आज़मी अपनी बेटी शबाना से बहुत मुहब्बत करते थे. 18 सितम्बर 1974 को लिखी उनकी नज़्म ‘एक दुआ’ में उनकी यही मुहब्बत झलकती है-
अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझे
बस इक दुआ कि खु़दा तुझको कामयाब करे
वह टांक दे तेरे आंचल में चांद और तारे
तू अपने वास्ते जिसको भी इंतिख़ाब करे...

उन्होंने अपनी पत्नी शौकत आज़मी को सम्बोधित करते हुए एक नज़्म इंतिसाब (समर्पण) लिखी, जिसमें वह कहते हैं-
ऐसा झोंका भी इक आया था कि दिल बुझने लगा
तूने उस हाल में भी मुझको संभाले रक्खा
कुछ अंधेरे जो मिरे दम से मिले थे तुझको
आफ़रीं तुझको कि नाम उनका उजाले रक्खा
मेरे ये सजदे जो आवारा भी, बदनाम भी हैं
अपनी चौखट पे सजा ले जो तेरे काम के हों...

कैफ़ी को अपनी एक नज़्म बोसा के लिए अपने साथियों की आलोचना का शिकार होना पड़ा था. हुआ यूं कि टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन के मज़दूरों की हड़ताल के दौरान कैफी ने एक रूमानी नज़्म लिखी. मज़दूरों की ह़डताल नाकाम रही और उन्होंने इसके लिए उनकी नज़्म को ज़िम्मेदार ठहराया-
जब भी चूम लेता हूं इन हसीन आंखों को
सौ चिराग़ अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं
फूल क्या, शिगू़फ़े क्या, चांद क्या, सितारे क्या
सब रक़ीब क़दमों पर सर झुकाने लगते हैं
लम्हे भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है
लम्हे भर को सब पत्थर मुस्कराने लगते हैं...

उनकी नज़्म अंदेशे भी लोकप्रिय नज़्मों में शुमार की जाती है. इसमें प्रेमिका की मनोस्थिति का शानदार तरीक़े से चित्रण किया गया है. नज़्म का एक-एक लफ़्ज़ दर्द को अपने में समेटे नज़र आता है-
दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क आंखों ने पिए और न बहाए होंगे
बंद कमरे में जो ख़त मेरे जलाए होंगे
इक-इक हर्फ़ ज़मीं पे उभर आया होगा
उसने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी
मिट के इक ऩक्श ने सौ शक्ल दिखाई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तऱफ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा...

वे तरक़्क़ी पसंद इंसान थे. उन्होंने हमेशा अपनी बीवी और बेटी को भी यही सिखाया कि उनमें आत्मविश्वास हो और वे अपने पैरों पर खड़ी हों, अपने सपनों को साकार करें. यह सोच उनके कलाम में भी झलकती है-
जिसमें जलता हूं उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िन्दगी जेहद में है, सब्र के क़ाबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आंसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नकहत, ख़म-ए-गेसू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फलना-फूलना है तुझे...

वे गंगा-जमुनी तहज़ीब के पक्षधर थे. बाबरी मस्जिद की शहादत पर उन्होंने नज़्म दूसरा बनबास लिखी. इस नज़्म में सांप्रदायिकता पर कड़ा प्रहार किया गया है. कैफ़ी आज़मी लिखते हैं-
राम बनबास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया, जो नगर में आए
रक़्स-ए-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को स्रीराम ने सोचा होगा
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो घर में आए
पांव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहां खू़न के गहरे धब्बे
पांव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे
राजधानी की फ़िज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनबास मुझे...

कैफ़ियात एक बेहतरीन किताब है. इसकी ख़ास बात यह भी है कि इसमें फ़ारसी के शब्दों का हिन्दी अनुवाद दिया गया है, ताकि ग़ैर उर्दू भाषी पाठकों को इसे समझने में मुश्किल पेश न आए. कैफ़ी साहब का कलाम ख़ालिस उर्दू में है, इसलिए इससे उन लोगों को भी फ़ायदा होगा, जो उर्दू शायरी पसंद करते हैं, लेकिन फ़ारसी लिपि पढ़ नहीं सकते हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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