चले आओ...



मेरे महबबू !
तुम चले आओ
इससे पहले
कि सांस रुकने लगे
दिल की धड़कन
ठहरने लगे
पलकें बोझल होने लगें
आंखों के आगे
अंधेरा-सा छाने लगे
रगों में बहता ख़ून
जमने लगे
और
जिस्म सर्द पड़ने लगे

मेरे हमनशीं
बस एक बार
तुम चले आओ...
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर : गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

HOT

-फ़िरदौस ख़ान
एक बाअख़्लाक माशरे (सभ्य समाज) में जो चीज़ें वाहियात मानी जाती हैं... आज वही फ़ैशन बन रही हैं... एक लफ़्ज़ है HOT... आज इसका इस्तेमाल तारीफ़ के लिए ख़ूब किया जाता है... लानत है ऐसी तारीफ़ पर...
फ़ेसबुक पर HOT पेज ख़ूब पसंद किए जाते हैं... हैरत तो इस बात की होती है कि ख़ुद को मज़हबी बताने वाले लोग जहां कवर पेज पर मज़हबी तस्वीर लगाते हैं,  स्टेटस में मज़हबी बातें लिखते हैं, लेकिन पसंद उनकी भी यही HOT पेज होते हैं... :(

भाइयो!  HOT तो जहन्नुम भी है... जाना चाहोगे... नहीं न...
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

क़ब्र...


मैं
ज़िन्दगी को
जीना चाहती थी
अपने लिए
एक घर चाहती थी
एक ऐसा घर
जिसकी बुनियाद
ख़ुलूस की ईंटों से बनी हो
जिसके आंगन में
बेला और मेहंदी महकती हों
जिसकी क्यारियों में
रफ़ाक़तों के फूल खिलते हों
जिसकी दीवारें
कुर्बतों की सफ़ेदी से पुती हों
जिसकी छत पर
दुआएं
चांद-सितारे बनकर चमकती हों
जिसके दालान में
हसरतें अंगड़ाइयां लेती हों
जिसके दरवाज़ों पर
उम्र की हसीन रुतें
दस्तक देती हों
जिसकी खिड़कियों में
बच्चों-सी मासूम ख़ुशियां
मुस्कराती हों
और
जिसकी मुंडेरों पर
अरमानों के परिन्दे चहकते हों...

मगर
ऐसा हो न सका
आलम ये है
कि मुझे ख़्वाब में भी
घर नहीं दिखता
अब
मेरे तसव्वुर में
बस एक क़ब्र ही रहा करती है
एक ऐसी क़ब्र
जो किसी वीरान क़ब्रिस्तान में
एक घने दरख़्त के साये तले है
मैं सोचती हूं
उस वीरान क़ब्र के बारे में
जिसमें मैं सुकून से सो सकूं...
-फ़िरदौस ख़ान

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

वो वर्क़...



मेरे महबूब 
ज़िन्दगी की
किताब का
हर वो वर्क़ 
आंसुओं से भीगा मिला
जहां तुम्हारा नाम लिखा था...
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

वक़्त...


-फ़िरदौस ख़ान
हर चीज़ की अहमियत वक़्त पर ही हुआ करती है... वक़्त निकल जाने पर आबे-हयात भी आबे-हयात नहीं रह जाता... उस दूध की क्या अहमियत, जो बच्चे के भूख से बिलख-बिलख कर मर जाने के बाद मिले... उस दवा की क्या अहमियत, जो मरीज़ की मौत के बाद मिले... उस इंसाफ़ की क्या अहमियत जो, किसी को सूली पर चढ़ा दिए जाने के बाद मिले... उस पछतावे की क्या अहमियत, जो किसी की ज़िन्दगी तबाह और बर्बाद करने के बाद हो...
क़ुदरत ने हर चीज़ का वक़्त मुक़र्रर किया है... सूरज निकलने का अपना वक़्त है... रात आने का अपना वक़्त है... मौसम भी अपने-अपने वक़्त पर आया करते हैं... लेकिन अज़ाब से निजात का कोई वक़्त नहीं है... सारी उम्र अज़ाब में ही गुज़र गई...

(हमारी एक कहानी से)

तस्वीर : गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

सुकून...


इंसान ज़िंदगी में बहुत कुछ चाहता है, जैसे दौलत, इज़्ज़त और शौहरत, लेकिन इन सबके बीच वह सुकून को भूल जाता है. जब वह दुनिया का हर सुख भोग लेता है, तब उसे सुकून की तलाश होती है. और इसी सुकून को पाने के लिए वह न जाने कहां-कहां भटकता है. मगर सुकून बाहर कहीं भी नहीं मिलता, क्योंकि इसे इंसान को अपने भीतर ही खोजना पड़ता है. दरअसल, सुकून इंसान को उसके नेक कर्मों की बदौलत ही मिलता है...

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

मंज़िल की चाह में...


इंसान के भटकने का सफ़र शायद कभी ख़त्म नहीं हुआ करता... बरसों पहले इसी भटकाव पर एक नज़्म लिखी थी... 

नज़्म
मंज़िल की चाह में...

मैं
एक मुसाफ़िर थी
तपते रेगिस्तान की
बरहना सर पर
सूरज की दहकती धूप
पांव तले
सुलगते रेत के ज़र्रे
होठों पर
बरसों की प्यास
आंखों में अनदेखे सपने
दिल में अनछुआ अहसास...

मैं चली जा रही थी
ख़ुद से बेज़ार-सी
एक ऐसी मंज़िल की चाह में
जहां
मुहब्बत क़याम करती हो
अहसास का समंदर
हिलोरें लेता हो
बरसों की तिश्नगी को
बुझाने वाला
सावन बरसता हो...

तभी
तुम मुझे मिले
एक घने दरख़्त की तरह
मेरे बरहना सर को
तुम्हारे साये का
आंचल मिला
ज़ख़्मी पांव को
मुहब्बत की मेहंदी मिली...

मुझे लगा
जिसकी तलाश में
भटकती रही थी
दर-ब-दर
अब वही मंज़िल
मुझे अपनी आग़ोश में
समेटने के लिए
दोनों बांहें पसारे खड़ी है

दिल ख़ुशी से
झूम उठा
मैं ख़ुद को
संभाल नहीं पाई
और आगे बढ़ गई

तभी
मेरी रूह ने
मुझे बेदार किया
मैंने पाया
तुम वो नहीं थे
जिसके साये में
मैं ताउम्र बिता सकूं
क्यूंकि
तुम तो एक सराब थे
सराब !
हां, एक सराब
और
फिर शुरू हुआ सफ़र
भटकने का
उस मंज़िल की चाह में...
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर : गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

ज़रूरत...


फ़िरदौस ख़ान
एक मासूम बच्चा भूख से बिलख रहा है. लोग देख रहे हैं. कुछ लोगों को उस पर तरस आता है. कोई उसे पुचकारता है. कोई उसे गोद में लेकर प्यार  करता है. कोई उसे झुलाता है. लेकिन बच्चा चुप नहीं होता और मुसलसल ज़ारो-क़तार रोये जा रहा है. कोई ये समझने की कोशिश नहीं करता कि बच्चा क्यों रो रहा है. किसी को इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं कि बच्चा भूखा है और उसे दूध की ज़रूरत है. कोई उसे दूध पिलाने के बारे में नहीं सोचता.
ज़िन्दगी में भी अकसर ऐसा ही होता है, हमें जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वही नहीं मिलती. और उसके बग़ैर बाक़ी सब चीज़ें बेमानी होकर रह जाती हैं...
...

  • रोज़ा रखने से दूसरों की भूख-प्यास का अहसास होता है... रोज़े से पता चलता है कि भूख और प्यास क्या होती है... भूखा और प्यासा शख़्स ही भूख और प्यास की शिद्दत को महसूस कर सकता है... लेकिन, ज़िन्दगी में भूख-प्यास के अलावा भी बहुत सी ’महरूमियां’ हैं, उन्हें समझने के लिए क्या किया जाता है...? या क्या किया जाना चाहिए... ?
  • जिनके पास मिट्टी के घर तक नहीं, उनका दिल बहिश्त के महलों की बातों से भी नहीं बहल पाता...
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

आंच न आए नाम पे तेरे...


-फ़िरदौस ख़ान
आकर्षण और मुहब्बत में बहुत फ़र्क़ हुआ करता है... आकर्षण उस ओस के क़तरे की तरह है, जो ज़रा-सी धूप की तपिश से फ़ना हो जाता है, जबकि मुहब्बत यही तपिश पाकर दहकने लगते है... इसी तरह हवस और मुहब्बत में भी ज़मीन और आसमान का फ़र्क़ है... हवस ज़िन्दगी तबाह करती है, जबकि मुहब्बत ज़िन्दगी को रौशन किया करती है...

अमूमन लोग आकर्षण को मुहब्बत समझकर हवस के रास्ते पर चल पड़ते हैं, जिसका नतीजा सिर्फ़ तबाही और बर्बादी ही हुआ करता है... बानगी देखें-

महिला पुलिस थाने पहुंच जाती है और इल्ज़ाम लगाती है कि उसके प्रेमी ने उसे प्रेमजाल में फंसाकर उसकी ज़िन्दगी तबाह कर दी. उसके प्रेमी ने शादी का वादा करके उससे ताल्लुक़ात बनाए और अब उसका दिल भर गया, तो शादी से मुकर रहा है. उसका प्रेमी पहले से शादीशुदा है, उसका अपना परिवार है, बच्चे हैं. इस मामले में महिला ही नहीं, बल्कि उसके प्रेमी का भी सुख-चैन छिन गया. ग़लती दोनों की है. अगर प्रेमी ने महिला को पहले ही अपने परिवार के बारे में सबकुछ बता दिया था, तो महिला की ग़लती ज़्यादा है, क्योंकि इस तरह के मामलों में सबसे ज़्यादा नुक़सान महिलाओं का ही होता है.  

तस्वीर का दूसरा रुख़ भी देखें. किसी होटल में लड़की की लाश पड़ी है. लड़की ने ख़ुदकशी की है या उसका क़त्ल किया गया है. दोनों ही मामलों में लड़की की ज़िन्दगी ख़त्म हो गई. लड़की को किसी से प्रेम हुआ. दोनों ने क़समें-वादे किए. लड़की प्रेमी से मिलने होटल पहुंच गई. लड़के ने उससे ताल्लुक़ात बनाए और जब दिल भर गया, तो उसे अपने दोस्तों के हवाले करके चला गया. बाद में लड़की ने ख़ुदकशी कर ली या फिर वहशी दरिन्दों ने उसका क़त्ल कर दिया. इस मामले में क़ुसूरवार दोनों ही हैं, लेकिन ग़लती लड़की की ज़्यादा है, क्योंकि इस तरह के मामलों में सबसे ज़्यादा नुक़सान लड़कियों का ही होता है.  

इन दोनों ही मामलों में मुहब्बत कहीं नज़र नहीं आती... अगर मुहब्बत होती, तो न महिला प्रेमी के ख़िलाफ़ पुलिस थाने पहुंचती और न ही लड़का अपनी प्रेमिका को अपने दोस्तों के हवाले करता...

मुहब्बत तो सिर्फ़ देना ही जानती है... हम तो ये मानते हैं... बाक़ी सबके अपने-अपने ख़्याल हैं...
फ़िल्मी गीतकार इंदीवर साहब ने भी क्या ख़ूब कहा है-
आंच न आए नाम पे तेरे
ख़ाक भले ही जीवन हो
अपने जहां में आग लग लें
तेरा जहां जो रौशन हो
तेरे लिए दिल तोड़ लें हम
घर क्या जग भी छोड़ दें हम...

तस्वीर : गूगल से साभार

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

हव्वा की बेटी...


एक लड़की जो जीना चाहती थी... अरमानों के पंखों के साथ आसमान में उड़ना चाहती थी, लेकिन हवस के भूखे एक वहशी दरिन्दे ने उसकी जान ले ली. एक चहकती-मुस्कराती लड़की अब क़ब्र में सो रही होगी... उसकी रूह कितनी बेचैन होगी... सोचकर ही रूह कांप जाती है... लगता है उस क़ब्र में रेहाना जब्बारी नहीं हम ख़ुद दफ़न हैं...
रेहाना ! हमें माफ़ करना... हम तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ ही कर सकते हैं...
रेहाना जब्बारी को समर्पित एक नज़्म
हव्वा की बेटी...

मैं भी
तुम्हारी ही तरह
हव्वा की बेटी हूं
मैं भी जीना चाहती थी
ज़िन्दगी के हर पल को
मेरे भी सतरंगी ख़्वाब थे
मेरे सीने में भी
मुहब्बत भरा
एक दिल धड़कता था
मेरी आंखों में भी
एक चेहरा दमकता था
मेरे होठों पर भी
एक नाम मुस्कराता था
जो मेरी हथेलियों पर
हिना सा महकता था
और
कलाइयों में
चूड़ियां बनकर खनकता था
लेकिन
वक़्त की आंधी
कुछ ऐसे चली
मेरे ख़्वाब
ज़र्रा-ज़र्रा होकर बिखर गए
मेरे अहसास मर गए
मेरा वजूद ख़ाक हो गया

फ़र्क़ बस ये है
तुम ज़मीन के नीचे
दफ़न हो
और मैं ज़मीन के ऊपर...
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर : गूगल से साभार
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS