मेहंदी


एक उम्र होती है, जब कोई अच्छा लगने लगता है... और लड़कियां मेहंदी से हथेली पर उसका नाम लिख लिया करती हैं... और फिर चुपके-चुपके उस नाम को निहारा करती हैं... दिन भर उनका सारा ध्यान अपनी हथेली पर ही रहता है कि कहीं कोई उनके महबूब का नाम न पढ़ ले... बरसों पहले हमने एक ग़ज़ल लिखी थी... उसका एक शेअर अर्ज़ है-
हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के
जब हथेली पे तेरा नाम लिखा होता है...
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

दो तबक़े


दुनिया में दो ही तबक़े हुआ करते हैं... एक ताक़तवर और दूसरा कमज़ोर... हमेशा ताक़तवर सही (?) होता है और कमज़ोर ग़लत... यह बात बहुत जगह लागू होती है... जब इंसान जंगली था और जंगलों में रहता था, तब भी ऐसा होता था... और आज भी कमोबेश यही हो रहा है... यानी इंसान का रहन-सहन और खान-पान बदला है, लेकिन उसकी सोच आज भी वही है...
इसे कई संदर्भों में देखा जा सकता है...
-महिलाओं का शोषण (अत्याचार)
-दलितों का शोषण
-मज़दूरों का शोषण
-ज़मींदारों द्वारा ग़रीब किसानों का शोषण...
बहरहाल, ताक़तवरों द्वारा कमज़ोरों के शोषण की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है...

इसीलिए हम हमेशा एक बात कहते हैं- कुछ लोग हमेशा सही (?) होते हैं...
(हमारी डायरी से)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...


कुछ चीज़ें दिल के बहुत क़रीब होती हैं, जैसे कोई नज़्म, जिसे हमेशा सुनना अच्छा लगता है... कफ़ील आज़ार साहब की ऐसी ही एक नज़्म है
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी... कॊलेज के दिनों में भी यह नज़्म बहुत अच्छी लगती थी... और आज भी उतनी ही पसंद है... कुछ चीज़ें कभी नहीं बदला करतीं...
नज़्म
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे के तुम इतनी परेशां क्यूं हो
उंगलियां उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
एक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएंगे
कांपते हाथों पे भी फ़िकरे कसे जाएंगे

लोग ज़ालिम हैं हर एक बात का ताना देंगे
बातों बातों में मेरा ज़िक्र भी ले आएंगे
उनकी बातों का ज़रा-सा भी असर मत लेना
वरना चेहरे के तासुर से समझ जाएंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात ना करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...
वाक़ई, इस नज़्म का कोई जवाब नहीं... एक-एक लफ़्ज़ दिल की गहराई में उतरता चला जाता है... और इंसान इसके जादू में खो जाता है... ख़ुदा कफ़ील आज़र साहब को जन्नतुल-फ़िरदौस में जगह दे, जो हमारे लिए इतने प्यारा कलाम लिखकर छोड़ गए...

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

लड़कियां...

हम लड़कियां बिलकुल ऐसी ही होती है... ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में भी हंसती और खिलखिलाती रहती हैं...

परवीन शाकिर के शब्दों में-
चिड़िया पूरी भीग चुकी है
और दरख्त भी पत्ता-पत्ता टपक रहा है
घोंसला कब का बिखर चुका है
चिड़िया फिर भी चहक रही है
अंग-अंग से बोल रही है
इस मौसम में भीगते रहना कितना अच्छा लगता है... 
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

मुहब्बत...

जो अच्छा लगता है, उसकी हर बात अच्छी लगती है... शायद यही मुहब्बत है... 

बक़ौल परवीन शाकिर- 
मैं ऐसे शख्स की मासूमियत पर क्या लिखूं 
जो मुझको अपनी ख़ताओं में भी भला ही लगा 
जो ख़्वाब देने पर क़ादिर था, मेरी नज़रों में 
अज़ाब देते हुए भी मुझे ख़ुदा ही लगा...
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

बचपन...


बचपन... सच में कितना प्यारा होता है... ज़िंदगी की जद्दोजहद से बेफ़िक्र... जिसकी भूली-बिसरी यादें... उम्र का सरमाया बन जाया करती हैं... अपने बड़ों से सुनी अपने बचपन की बातें सुनना कितना भला लगता है... काश ! बचपन फिर से लौट सकता... अगर ऐसा होता, तो शायद हर इंसान हमेशा अपने बचपन में ही जीना चाहता... बिलकुल हमारी तरह...
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

मुहब्बत


ज़िंदगी में इंसान को वही मिलता है, जिसके वो क़ाबिल होता है... मुहब्बत का नूर भी हर किसी को नसीब नहीं होता... हमारे Sir कहते हैं कि जो शख़्स किसी इंसान से मुहब्बत नहीं कर सकता, वो ख़ुदा से भी मुहब्बत नहीं कर सकता...
हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला, जो उसका एक घूंट भी पीता... आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...
बक़ौल निदा फ़ाज़ली-
हर एक शय हैं मोहब्बत के नूर से रौशन
ये रौशनी जो ना हो, ज़िन्दगी अधूरी हैं...
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

वक़्त...

वक़्त से बड़ा कोई मरहम नहीं... और वक़्त से बड़ा कोई ज़ालिम भी नहीं है... क्योंकि परेशानी का वक़्त कटता नहीं और हसीन लम्हे बहुत जल्दी बीत जाया करते हैं... मुहब्बतें और रफ़ाक़तें भी गुज़रते वक़्त के साथ-साथ माज़ी का भूला-बिसरा क़िस्सा और यादें बनकर ही रह जाती हैं...
एक शायर ने कहा है-
हम अपनी कहानी किससे कहें, खु़द हमको झूठी लगती है
वो कौन था, जिसको चाहा था, ऐ उम्रे-गुरेज़ां भूल गए...
 
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

ज़िन्दगी ख़ाक न थी, ख़ाक उड़ाते गुज़री

कुछ चीज़ें दिल को छू जाती हैं... जैसे पाकिस्तान के ’हम’ टीवी चैनल पर प्रसारित हुए नाटक ’ज़िन्दगी गुलज़ार है’ का ये टाइटल सॊन्ग...

ज़िन्दगी ख़ाक न थी, ख़ाक उड़ाते गुज़री
तुझसे क्या कहते, तेरे पास जो आते गुज़री

दिन जो गुज़रा तो, किसी याद की रौ में गुज़रा
शाम आई तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़री

अच्छे वक़्तों की तमन्ना में रही उम्र-ए-रवां
वक़्त ऐसा था के बस नाज़ उठाते गुज़री

ज़िन्दगी जिसके मुक़द्दर में हों ख़ुशियां तेरी
उसको आता है निभाना सो निभाते गुज़री

ज़िन्दगी नाम उधर है किसी सरशारी का
और उधर दूर से एक आस लगाते गुज़री

रात क्या आई के तन्हाई की सरगोशी में
हू का आलम था, मगर सुनते-सुनते गुज़री

बारहा चौंक सी जाती है मुसाफ़त दिल की
किसकी आवाज़ थी ये, किसको बुलाते गुज़री

मशहूर शायर नसीर तुराबी साहब के इस कलाम को हदीक़ा किआनी ने अपनी आवाज़ दी है... ’हम’ टीवी चैनल पर ’ज़िन्दगी गुलज़ार है’ 30 नवंबर 2012 को शुरू हुआ था, जो 24 मई 2013 तक प्रसारित हुआ... फ़िलहाल यह नाटक ’ज़िन्दगी’ चैनल पर पर प्रसारित हो रहा है...

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

वजूद...

बरसों से
जिन्नात की ज़द में है
मेरा वजूद
कोई तो हो
जो मुझे आज़ाद कराए...
-फ़िरदौस ख़ान

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS