नाम अपना आइना रख लूंगी मैं...


ज़िन्दगी को ज़िन्दगी समझूंगी मैं
आप कहते हैं तो फिर जी लूंगी मैं

जब सर तस्लीम खुम कर दिया
ना नहीं, हां बोलूंगी मैं

गर नहीं है आपको जूड़ा पसंद
इन घटाओं को खुला रखूंगी मैं

आप अगर यूं ही मुझे तकते रहे
नाम अपना आइना रख लूंगी मैं

लब हिलने की ज़रूरत ही नहीं रही
आपके चहरे से सब पढ़ लूंगी मैं

मैंने जो चाहा हासिल तो किया
और क्या 'फ़िरदौस' अब चाहूंगी मैं
-फ़िरदौस ख़ान
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तू मेरे गोकुल का कान्हा...

तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

राधा कुंज भवन में जैसे
सीता खड़ी हुई उपवन में
खड़ी हुई थी सदियों से मैं
थाल सजाकर मन-आंगन में
जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

तड़प रही थी मन की मीरा
महा मिलन के जल की प्यासी
प्रीतम तुम ही मेरे काबा
मेरी मथुरा, मेरी काशी
छुआ तुम्हारा हाथ, हथेली कल्प वृक्ष का पात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

रोम-रोम में होंठ तुम्हारे
टांक गए अनबूझ कहानी
तू मेरे गोकुल का कान्हा
मैं हूं तेरी राधा रानी
देह हुई वृंदावन, मन में सपनों की बरसात हो गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई

सोने जैसे दिवस हो गए
लगती हैं चांदी-सी रातें
सपने सूरज जैसे चमके
चन्दन वन-सी महकी रातें
मरना अब आसान, ज़िन्दगी प्यारी-सी सौगात ही गई
होंठ हिले तक नहीं, लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई
-फ़िरदौस ख़ान
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चाहत का गुलाल

फागुन की मादक बेला में
सुर्ख़ पलाश दहकता है...
और
ज़िन्दगी के रुख्सारों पर
चाहत का गुलाल
महकता है...
-फ़िरदौस ख़ान
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इंतज़ार

मेरे महबूब
तुम्हारे इंतज़ार ने
उम्र के उस मोड़ पर
ला खड़ा किया है
जहां से
शुरू होने वाला
एक सफ़र
सांसों के टूटने पर
ख़त्म हो जाता है
लेकिन-
फिर यहीं से
शुरू होता है
एक दूसरा सफ़र
जो हश्र के मैदान में
जाकर ही मुकम्मल होता है...
इश्क़ के इस सफ़र में
मुझे ही तय करना है
फ़ासलों को
ज़िन्दगी में भी
और
ज़िन्दगी के बाद भी
तुम्हारे लिए...
-फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ का घूंट

एक कप कॉफ़ी...
जिसका एक घूंट
उसने पिया
और एक मैंने
लगा-
कॉफ़ी नहीं
इश्क़ का घूंट
पी लिया है मैंने...
-फ़िरदौस ख़ान
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नए साल की दिली मुबारकबाद


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ख़त...

ख़त...
दूधिया वरक़ों पर लिखे
ज़ाफ़रानी हर्फ़
उसने
काग़ज़ पर नहीं
मेरी रूह पर टांक दिए थे...
-फ़िरदौस ख़ान
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शायद, यही ज़िन्दगी है...

ज़िन्दगी एक सहरा है...और ख़ुशियां सराब...इंसान ख़ुशियों को अपने दामन में समेट लेने के लिए क़दम जितने आगे बढ़ाता है...ख़ुशियां उतनी ही उससे दूर होती चली जाती हैं...शायद, यही ज़िन्दगी है...
-फ़िरदौस ख़ान
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उसने कहा था...

नज़्म
वो ख़्वाब था
या हक़ीक़त
ज़हन में नहीं
बस इतना याद है
उसने कहा था-
मैं आऊंगा
मेरा इंतज़ार करना...
-फ़िरदौस ख़ान
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वो चाहता है...मैं कोई गीत लिखूं


ज़िन्दगी का मौसम कभी एक जैसा नहीं रहता...पल-पल बदलता रहता है..फ़र्क बस इतना है कि कुछ लोगों की ज़िन्दगी में बहार का मौसम देर तक ठहरता है और उनके दामन को खुशियों से सराबोर कर देता है...लेकिन बहुत-से ऐसे लोग भी होते हैं, जिनकी ज़िन्दगी में बहार कभी आती ही नहीं... या यूं कहिये कि उनकी ज़िन्दगी में खिज़ा का मौसम आता है और फिर हमेशा के लिए ही ठहर जाता है...अलबत्ता, खिज़ा का भी अपना ही लुत्फ़ होता है...हमने अपनी एक नज़्म में खिज़ा के मौसम की ख़ूबसूरती को पेश किया था...बहरहाल आज हम एक फ़रमाइश पर अपनी एक पुरानी नज़्म पोस्ट कर रहे हैं...इस वादे के साथ के जल्द ही एक ताज़ा नज़्म पोस्ट करेंगे...

नज़्म
वो चाहता है
मैं कोई गीत लिखूं
मुहब्बत के मौसम का...

लेकिन
उसको कैसे बताऊं
क़ातिबे-तक़दीर ने
मेरे मुक़द्दर में
लिख डाली है
उम्रभर की खिज़ा...
-फ़िरदौस ख़ान
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