अम्मी


अम्मी 
ज़िन्दगी की तपती धूप में 
घने दरख़्त की मानिन्द थीं
जिनके साये में 
हमारी रूह सुकून पाती थी...

अब अम्मी नहीं हैं
उम्र का तवील सफ़र है
राह में दुश्वारियों के ख़ार हैं 
पाँव ज़ख़्मी हैं 
और चलना मुहाल है... 

काश !
माँयें कभी नहीं मरतीं
वो हमेशा ज़िन्दा रहतीं 
अपने बच्चों के लिए...
-डॉ फ़िरदौस ख़ान 
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