ज़िन्दगी


कहते हैं कि ज़िन्दगी कभी किसी के लिए नहीं रुकती... लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है, ज़ाहिरी तौर पर भले ही ज़िन्दगी मुतासिर दिखाई न दे, लेकिन हक़ीक़ी तौर पर ज़िन्दगी, ज़िन्दगी कहां रह जाती है... घर के बाहर त्यौहार की रौनक़ें हैं, लेकिन घर के अंदर वही उदासियों का डेरा है...
क्या ऐसे भी कोई त्यौहार मनाता है.

Painting by Iman Maleki

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