वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा


वक़्त गुज़रा तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़रा
तुझको भूलें न कभी याद दिलाते गुज़रा

ज़िन्दगी ख़्वाब नहीं, ख़्वाब का धोखा है फ़क़्त
नाम उसका ही हक़ीक़त था, बताते गुज़रा

चांदनी रोती रही, नींद न शब को आई
चांद तन्हाई का पैग़ाम सुनाते गुज़रा

वक़्त मौसम की तरह है, न भरोसा करना
कब वो ठहरा है कहीं, मिलते-मिलाते गुज़रा

ज़िन्दगी ख़ार सही, ख़ार की ज़द में रहते
ज़ख़्म ऐसा था के बस आस मिटाते गुज़रा

बारहा रोक ही लेती है रफ़ाक़त उसकी
इक मुसाफ़िर कहां ’फ़िरदौस’ से आते गुज़रा
-फ़िरदौस ख़ान

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