बेर के दरख़्त के अनोखे राज़
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*डॉ. फ़िरदौस ख़ान *
बेर का दरख़्त सिर्फ़ फल का एक दरख़्त ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से राज़
पोशीदा हैं. क़ुरआन करीम और मुख़का दरख़्त सिर्फ़ फल का दरख़्त ही नहीं है...
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23 अगस्त 2010 को 1:40 pm बजे
वक्त ऐसे ही गुजर जाता है
कब कैसे पता भी नही चलता
बस खाली पन्ने हाथे मे
रह जाते हैं बेनूर से
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
23 अगस्त 2010 को 2:00 pm बजे
उम्र के क़ाग़ज़ पर...
इश्क़ की नज़्म...
वक़्त का
मौसम दर मौसम
ज़िन्दगी की तरह गुज़रना...
वाह...बहुत ख़ूब....मुबारकबाद...
लेकिन
ये अल्फ़ाज़ कुछ कम नहीं है?
23 अगस्त 2010 को 2:18 pm बजे
चंद लाइनों में कह दी पूरी किताब की बातें. बहुत सुन्दर भाव और शब्द.
23 अगस्त 2010 को 4:32 pm बजे
behad khoobsoorat nazm !
अच्छी रचना!!!!!!!!!!!!! क्या अंदाज़ है बहुत खूब
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकानाएं !
समय हो तो अवश्य पढ़ें यानी जब तक जियेंगे यहीं रहेंगे !
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html
23 अगस्त 2010 को 4:51 pm बजे
बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....आभार
25 अगस्त 2010 को 9:19 am बजे
रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया लिखा है आपने! शानदार पोस्ट!
25 अगस्त 2010 को 5:13 pm बजे
so good...
26 अगस्त 2010 को 10:43 pm बजे
Wah
adabhut
27 अगस्त 2010 को 4:52 pm बजे
Very Short But Very Deep
31 अगस्त 2010 को 11:24 pm बजे
बहुत खूब ...
इश्क की नज़्म भी
होती है तभी पूरी
जब उम्र का कागज
हो जाता है खत्म ..