नज़्म


किताबें
तस्वीरें और ख़त
यादों का ज़ख़ीरा ही तो हैं
जिस पर
हमेशा के लिए
बस जाने को
ये दिल चाहता है...
-फ़िरदौस ख़ान

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करवा चौथ और रोज़ा


हिन्दू मज़हब की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि इस मज़हब में बहुत से त्यौहार होते हैं और सभी हर्ष और उल्लास से लबरेज़ हैं. सभी त्यौहार अपने ही मौसम में आते हैं. रंगों का पर्व होली गर्मियों की शुरुआत में आता है, तो चिराग़ों का त्यौहार  दिवाली सर्दियों के शुरू में. इसी तरह मकर संक्रांति और तीज का भी अपना ही मौसम है. कड़कड़ाती ठंड और रिमझिम बारिश का रूमानी मौसम. 
फ़िलहाल करवा चौथ की रौनक़ है. सुहागिनें अपने सुहाग, तो कुंवारी लड़कियां अपने भावी जीवनसाथी के लिए व्रत रख रही हैं. बहुत से मर्द भी करवाचौथ का व्रत रखते हैं. उनका मानना है कि जब उनकी जीवनसंगिनी उनके लिए व्रत रखती हैं, तो वो भी क्यों न उनके लिए व्रत रखें. इसी को तो मुहब्बत कहते हैं.
बहरहाल, करवा चौथ का व्रत रखना आस्था का मामला है. और आस्था, तर्क-वितर्क से परे हुआ करती है. इसलिए जो इस त्यौहार को मानते हैं, उन्हें हमारी तरफ़ से दिली मुबारकबाद. वैसे, आज हमारा भी रोज़ा है, लेकिन करवा चौथ वाला नहीं. नफ़ली रोज़ा 🙂
#करवाचौथ
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समन के साये...


मेरे महबूब !
इसी तपती हुई धूप में
चलकर
आ सकते हो,
तो आ जाओ,
क्योंकि
मेरे घर की राह में
समन के घने साये नहीं मिलते...
फ़िरदौस ख़ान

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ख़ुरासान की रोचक लोक कथाएं...


फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर के देशों की अपनी संस्कृति और सभ्यता है. लोक कथाएं भी इसी संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक हैं. लोक कथाओं से किसी देश, किसी समाज की संस्कृति और उनकी सभ्यता का पता चलता है. बचपन में सभी ने अपनी नानी या दादी से लोक कथाएं सुनी होंगी. लोक कथाओं में ज़िंदगी के अनुभवों का निचो़ड़ होता है. ये लोक कथाएं सीख देती हैं. लोक कथाएं कैसे और कब वजूद में आईं, यह बताना तो बेहद मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि इनका इतिहास बहुत पुराना है. लोक कथाएं विभिन्न देशों में सांस्कृतिक घनिष्ठता को बढ़ाती हैं. भारत और ईरान में साहित्यिक आदान-प्रदान का दौर जारी है. लोकभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित नासिरा शर्मा की किताब क़िस्सा जाम का, ईरान के ख़ुरासान की लोक कथाओं पर आधारित है. इसमें लेखिका ने ईरान के कवि मोहसिन मोहन दोस्त की लोक कथाओं का हिंदी अनुवाद पेश किया है. अनुवाद का काम कोई आसान नहीं होता. इसमें इस बात का ख़ास ख्याल रखना होता है कि मूल तहरीर का भाव क़ायम रहे. नासिरा शर्मा ख़ुद कहती हैं कि ये सारे क़िस्से ख़ुरासानी बोली में थे. फ़ारसी जानने के बावजूद उनके इशारों और मुहावरों को समझना आसान नहीं था, क्योंकि ये चीज़ें शब्दकोष में नहीं मिलतीं. उन्हें केवल कोई ईरानी ही बता सकता है. लेकिन कोशिश यही की गई कि ये क़िस्से ज्यों के त्यों पाठकों तक पहुंचाएं जाएं, ताकि उनका अर्थ वही रहेख जो क़िस्सागो कहना चाहता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के फ़ारसी भाषा तथा साहित्य विभाग के अध्यक्ष सैय्यद अमीर आबिदी कहते हैं कि ख़ुरासान एक चौराहे की तरह है, जहां ईरान की सभ्यता तथा संस्कृति संगठित हुई और जहां से अन्य क्षेत्रों में फैली. तूस, निशापुर और मशहद के केंद्र सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक रहे और जहां पर उमर, ख़य्याम और फ़िरदौसी जैसे चिराग़ अब भी जीवित हैं. ख़ुरासान की ये लोक कथाएं निशापुर और दमगान से निकले हुए फीरोजों की तरह भव्य और सारगर्भित हैं. इस किताब में तीन तरह के क़िस्से शामिल हैं. पहले में दर्शन का चिंतन है, दूसरे में बादशाहों के ज़रिये दुनियावी बर्ताव का ज्ञान है और तीसरे में परियों और हब्शियों के क़िस्से हैं, जो बताते हैं कि ख़ुदा ने इंसान को जो ताक़त बख्शी है, वह किसी और प्राणी के पास नहीं है. इसी ताक़त की बदौलत इंसान मुश्किल से मुश्किल हालात का सामना करते हुए अपनी जीत का परचम लहराता रहा है. इस किताब में अनेक रोचक लोक कथाएं हैं, जो पाठकों को आख़िर तक बांधे रखने में सक्षम हैं. बानगी देखिए-

एक रोज़ एक व्यापारी मछलियों से भरा टब लेकर घर पहुंचा. उसकी बला सी सुंदर पत्नी ने मछलियों को देखकर अपने चेहरे को नक़ाब से छुपा लिया, ताकि टब की मछलियां उसे न देख सकें. इस तरह मुंह छुपाये रही, ताकि उसका पति उसे सती सावित्री जैसी समझे.
जब भी व्यापारी घर में रहता कभी भी वह अपना मुंह हौज़ में न धोती और कहती-नर मछलियां कहीं मेरे पाप का कारण न बन जाएं. इस लाज से भरे अपने स्वभाव के कारण वह व्यापारी के सामने कभी हौज़ के समीप न जाती. एक दिन व्यापारी अपनी स्त्री के साथ बैठा हुआ था. एक नौकर भी वहीं खड़ा था. व्यापारी की स्त्री ने पहले की ही तरह नर मछलियों की बातें कीं और ब़डी अदा से शर्माई. यह सब देखकर वह नौकर हंस प़डा.
व्यापारी ने पूछा-क्यों हंसे तुम?
कुछ नहीं, यूं ही हंस दिया.

बिना कारण कैसी हंसी? सुनकर नौकर कुछा नहीं बोला, ख़ामोश ख़डा रहा. यह देखकर व्यापारी चिढ़ गया. उसका क्रोध देखकर नौकर डर गया और बोला-आपकी सुंदर स्त्री आपके ही घर के तहख़ाने में चालीस जवानों को बंद किए है. जब आप शिकार को चले जाते हैं तो वह उनके साथ रंगरेलियां मनाती है. यह सुनते ही व्यापारी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और वह बोला-मैं सच्चाई जानकर ही दम लूंगा. कल शिकार पर जा रहा हूं, परंतु लौटकर तुम्हारे ही घर आऊंगा. फिर सोचूंगा कि मुझे क्या करना है. दूसरे दिन व्यापारी दोबारा शिकार को चला गया और लौटकर उसी नौकर के घर पहुंचा और बोला-मुझे गधे पर रखे ख़ुरजीन (थैला) में छुपाकर वह जगह दिखाओ, जहां मेरी स्त्री चालीस जवानों के साथ गुलछर्रे उड़ाती है. इस काम के बदले में मैं तुमको सौ मन ज़ा़फ़रान दूंगा. नौकर सुनते ही राज़ी हो गया.  नौकर ने दरवेश का सा भेस बदला और ख़ुरजीन में व्यापारी को बिठाकर चल पड़ा. गली में घुसते ही दूर से ही गाने बजाने की आवाज़ें सुनाई पड़ने लगीं. नौकर आगे बढ़ता गया और व्यापारी के पीछे जाकर दरवाज़ा खटखटाया और गाने लगा-
आओ देखो, स्त्रियों के जाल व फ़रेब
बिया बेनीगर इन मकरे ज़नान
हाला हाज़िर कुन सदमन ज़ा़फ़रान
अब तो दो मुझे सौ मन ज़ा़फ़रान

बार-बार वह गाता जा रहा जब तक दरवाज़ा खुल न गया. व्यापारी ने देखा सामने मह़िफल जमी थी.  गवैये बैठे गाना गा रहे थे, साज़ बजा रहे थे. चालीस जवान प्यालों में शराब पी रहे थे और व्यापारी की स्त्री मस्त-मस्त मदहोश-सी कभी इस युवक की गोद में, कभी उस युवक की गोद में जाती और दरवेश से कहती-वहीं पंक्तियां बार-बार गाओ-
आओ देखो, स्त्रियों के जाल व फ़रेब
अब तो दो मुझे सौ मन ज़ा़फरान
सुबह होने से पहले यह महफ़िल ख़त्म हुई. दरवेश व व्यापारी दोनों एक साथ लौटे. व्यापारी की स्त्री ने उन चालीस जवानों को एक-एक करके तह़खाने में भेजा और दरवाज़ा बंद करके मस्त, नशे में चूर, झूमती-सी बेख़बर सो गई. व्यापारी थैले से बाहर निकला और नौकर को हुक्म दिया कि जब तक मैं सोकर न उठूं, इसको संदूक़ में बंद करके एक किनारे रख दो. सुबह जब स्त्री की आंख खुली तो वह सबकुछ समझ गई. उसको संदूक़ से निकालकर व्यापारी के हुक्म से घो़डे की दुम से बांधकर जंगल की ओर भेज दिया गया. व्यापारी ने उन चालीस जवानों को आज़ाद किया और तह़खाने से ऊपर बुलाकर पूछा-असली माजरा क्या था?

वे बोले- संध्या के समय जब हम इधर से गुज़रे तो छत पर खड़ी आपकी स्त्री को देखते ही हम उसके रूप-लावण्य की चमक से बेहोश हो जाते. जब होश आता तो अपने को तह़खाने में पाते. जब आप शिकार पर चले जाते तो हमारे बंध खोले जाते और हम रंगरेलियां मनाते.

किताब में प्रस्तुत लोक कथाएं पाठक को ईरान की संस्कृति और सभ्यता से परिचित कराती हैं. नासिरा शर्मा की यह कोशिश सराहनीय है. इससे हिंदुस्तान के लोगों को ईरानी सभ्यता को जानने का मौक़ा मिलेगा. दरअसल, इस तरह की कोशिशें विभिन्न देशों के बीच रिश्तों को और बेहतर बनाने का काम करती हैं. आज के दौर में ऐसे कार्यों की बेहद ज़रूरत है. साहित्य देश की सरहदों को नहीं मानता. वह तो उन हवाओं की तरह है, जो जहां से गुज़रती हैं, माहौल को ख़ुशनुमा बना देती हैं.

किताब रोचक है, लेकिन कई जगह भाषा की अशुद्धियां हैं. उर्दू शब्दों को ग़लत तरीक़े से लिखा गया है. हिंदी में उर्दू के शब्द लिखते वक़्त अकसर नुक्ता ग़लत लगा दिया जाता है, जिससे उर्दू जानने वालों को वे शब्द काफ़ी अखरते हैं. बेहतर हो नु़क्ता लगाया ही न जाए. बहरहाल, किताब रोचकता से सराबोर है, जिसे पाठक पढ़ना पसंद करेंगे. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : क़िस्सा जाम का    
लेखिका : नासिरा शर्मा
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन        
क़ीमत : 225 रुपये

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यश चोपड़ा : ख़ूबसूरत लम्हों का सफ़र

फ़िरदौस ख़ान
यश चोपड़ा हिंदी सिनेमा के ऐसे फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, पटकथा लेखक थे, जिन्होंने अपने पचास साल के करियर में हिंदी सिनेमा को कई यादगार फ़िल्में दीं. उन्होंने तीन पीढ़ियों के साथ निर्देशन का ख़ूबसूरत सफ़र तय किया. उनकी फ़िल्में मुहब्बत और ख़ूबसूरती से लबरेज़ होती थीं. इसलिए उन्हें रोमांस का बादशाह भी कहा गया. हालांकि उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर भी फ़िल्में बनाईं और दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ ही समाज को नई दिशा देने की कोशिश की.
यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर, 1932 को पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था. उनके परिवार के सदस्य चाहते थे कि वह इंजीनियर बनें, लेकिन उनकी दिलचस्पी फ़िल्मों में थी. उन्होंने सहायक निर्देशक के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की. उन्होंने आई एस जौहर और अपने ब़डे भाई बीआर चोपड़ा के साथ काम किया. बतौर सहायक निर्देशक उनकी फ़िल्मों में एक ही रास्ता, नया दौर और साधना शामिल है. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से निर्देशन करने का फ़ैसला किया. बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म धूल का फूल थी. यह 1959 की सबसे कामयाब फ़िल्म रही. अपने विषय की वजह से यह फ़िल्म चर्चाओं में भी ख़ूब रही. नायक नायिका के विवाह पूर्व मिलन में कहीं कोई ज़बरदस्ती नहीं है. नायक बदनीयत नहीं है. नायिका भी सहज ही इसे स्वीकार करती है. इस संबंध में अकेला नायक ही क़ुसूरवार नहीं है, बल्कि नायिका भी उतनी ही ज़िम्मेदार है. मगर दोनों में से कोई भी अपनी भूल की सज़ा भुगतने को तैयार नहीं है. दोनों के किए की सज़ा उनकी संतान को भुगतनी पड़ती है. फ़िल्मकार यहां सवाल उठाता है कि नाजायज़ कौन है, माता-पिता या संतान? इसी तरह फ़िल्म त्रिशूल में अमिताभ बच्चन अपने नाजायज़ पिता के ख़िलाफ़ जंग लड़ता है. फिर उन्होंने 1961 में फ़िल्म धर्म पुत्र का निर्देशन किया. सामाजिक मुद्दे पर बनी इस फ़िल्म को भी बेहद कामयाबी मिली. इसके बाद 1965 में उन्होंने फ़िल्म वक़्त का निर्देशन किया. यह अपने समय की सबसे महंगी और भव्य फ़िल्म थी, जिसमें कई पुराने और नए सितारों को एक साथ पेश किया गया था. इस फ़िल्म के ज़रिये भव्य सेट, आकर्षक आउटडोर, आंखों को लुभाने वाले इंद्रधनुषी शो़ख रंग, चमचमाते रेशमी लिबास, शानदार बंगले और उनमें सजा महंगी सामान, फव्वारे, बड़ी-बड़ी गाड़ियां, दिल लुभाता गीत-संगीत यश चोप़डा के सिनेमा की पहचान बन गया. उन्होंने इस फ़िल्म के ज़रिये मल्टीस्टारर ट्रेंड लाकर हिंदी सिनेमा को एक नई दिशा दी. उनकी बनाई मल्टीस्टारर फ़िल्म दीवार, त्रिशूल, चांदनी, पंरपरा, डर और दिल तो पागल है, ने कामयाबी की नई इबारत लिखी.

उन्होंने 1973 में यशराज फ़िल्मस की स्थापना की थी. उनके निर्देशन में बनी फ़िल्मों में धूल का फूल, धर्मपुत्र, वक़्त, आदमी और इंसान, इत्तेफ़ाक़, दाग़, जोशीला, दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर,  सिलसिला, मशाल, फ़ासले, विजय, चांदनी, लम्हे, परंपरा, डर, दिल तो पागल है, वीर ज़ारा और जब तक है जान शामिल हैं. फ़िल्म जब तक है जान उनकी मौत के बाद 12 नवंबर को प्रदर्शित हुई.
उन्होंने कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया, जिनमें दाग़, कभी-कभी, दूसरा आदमी, त्रिशूल, नूरी, काला पत्थर, ना़ख़ुदा, सवाल, मशाल, फ़ासले, विजय, चांदनी, लम्हे, डर, आईना, ये दिल्लगी, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, मुहब्बतें, मुझसे दोस्ती करोगे, मेरे यार की शादी है, साथिया, हम तुम, वीर ज़ारा, बंटी और बब्ली, सलाम नमस्ते, नील एन निक्की, फ़ना, धूम 2, क़ाबुल एक्सप्रैस, ता रा रम रम, झूम बराबर झूम, चक दे इंडिया, लागा चुनरी में दाग़, आजा नच ले, टशन, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक, बचना ऐ हसीनो, रोड साइड रोमियो, रब ने बना दी जो़डी, न्यू यॉर्क, दिल बोले हडिप्पा, रॉकेट सिंह : सेल्समैन ऑफ द ईयर, बैंड बाजा बारात, मुझसे फ्रेंडशिप करोगे, मेरे ब्रदर की शादी, लेडीज़ वर्सिस रॉकी बहल, इश्क़ज़ादे और एक था टाइगर शामिल हैं.

उनकी फ़िल्में रूमानी होती हैं. यश चोप़डा के प्रेम संबंध तर्क की सीमाओं से बाहर खड़े हैं. उनका कौशल यह है कि वह इस अतार्किकता को ग्राह्य बना देते थे. वह समाज में हाशिये पर पड़े रिश्तों को गहन मानवीय संवेदना और जिजीविषा की अप्रतिम ऊर्जा से संचारित कर देते थे. वह अपनी पहली फ़िल्म धूल का फूल से लेकर वीर ज़ारा तक अनाम रिश्तों की मादकता से अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते रहे. यश चोपड़ा संपूर्ण मानवीय चेतना के मुक़ाबले प्रेम की अनन्ता को अपने समूचे सिनेमा में स्थापित करते थे. उन्होंने अपने लंबे निर्देशकीय रचनाकाल में विभिन्न भाव भूमिकाओं पर आधारित कथानकों पर फ़िल्में बनाईं, तब भी वह मूल रूप से मानवीय रिश्तों की उलझनों और उनके बीच गुंथी संवेदनाओं को उकेरने वाले रहे.

हिंदी सिनेमा में यश चोपड़ा को कई महत्वपूर्ण बदलावों के लिए भी याद किया जाएगा, मसलन उन्होंने
फ़िल्म़ि कभी-कभी के ज़रिये अमिताभ बच्चन को एंग्री यंगमैन से शायर बना दिया. अमिताभ बच्चन के करियर को स्थापित करने में शायद सबसे ज़्यादा योगदान यशराज बैनर का ही है. 1975 में अमिताभ बच्चन को फ़िल्म दीवार में एंग्री यंग मैन के रूप में दिखाया गया, तो 1976 में फ़िल्म कभी-कभी में यश चोपड़ा ने अमिताभ को शायर के रूप में दिखाकर दर्शकों को अमिताभ का नया रूप दिखाया. 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म त्रिशूल और 1981 में प्रदर्शित फ़िल्म सिलसिला में अमिताभ बच्चन का शानदार अभिनय देखने को मिला. शाहरुख़ ख़ान को बॉलीवुड का किंग बनाने वाले यश चोपड़ा ही थे. उन्होंने शाहरुख़ ख़ान को प्रेमी के किरदार देकर हिंदी सिनेमा में रोमांस को नए सिरे से परिभाषित किया और रोमांटिक फ़िल्मों का नया दौर शुरू किया. शाहरुख़ ख़ान दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है, मोहब्बतें, वीर ज़ारा, चक दे इंडिया, रब ने बना दी जोड़ी और फ़िल्म जब तक है जान तक यश चोपड़ा के साथ जुड़े रहे. हिंदी सिनेमा की बिना इंटरवल, बिना गाने की पहली फ़िल्म इत्तेफ़ाक़ 1969 में प्रदर्शित हुई. उनकी इस फ़िल्म में नंदा ने एक बेवफ़ा पत्नी का किरदार निभाया.

यश चोपड़ा हिंदी सिनेमा की मूलधारा के निर्देशक थे. उन्होंने अपनी फ़िल्मों के किरदारों के साथ ही उनके गीत-संगीत और लोकेशन भी ख़ासा ध्यान दिया. उन्होंने अपनी फ़िल्मों में ख़ूबसूरत दृश्य दिखाने के लिए विदेशों में शूटिंग की. 1997 में प्रदर्शित फ़िल्म दिल तो पागल है हिंदी सिनेमा की पहली फ़िल्म है, जिसकी शूटिंग जर्मनी में की गई थी. दर्शकों को लुभाने के लिए वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. यश चोपड़ा को अपनी नायिकाओं के लिए चांदनी नाम बहुत प्रिय था. इसलिए उन्होंने फ़िल्म दाग़ में राखी, सिलसिला में रेखा और फ़ासले में फ़रहा, चांदनी में रेखा को यह नाम दिया.

उन्होंने हमेशा अपने वक़्त के लोकप्रिय अभिनेता अभिनेत्रियों के साथ फ़िल्में बनाईं. उनके पसंदीदा नायकों में अशोक कुमार, दिलीप कुमार, देव आनंद, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, राजकुमार, शशि कपूर, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, अनिल कपूर, शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान और सैफ़ अली ख़ान रहे, तो नायिकाओं में सायरा बाना, माला सिन्हा, नंदा, साधना, शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी, राखी, परवीन बॉबी, रेखा, जया भादु़डी, श्रीदेवी, जूही चावला, माधुरी दीक्षित, करिश्मा कपूर, प्रीति जिंटा और रानी मुखर्जी के नाम लिए जा सकते हैं.

उन्होंने अपनी फ़िल्मों की नायिकाओं को बेहद ख़ूबसूरती और सादगी के साथ पेश किया. उन्होंने फ़िल्म वक़्त में साधना, सिलसिला में रेखा, चांदनी, लम्हे में श्रीदेवी और फ़िल्म मोहब्बतें में ऐश्वर्या राय को सफ़ेद शिफॉन की साड़ी में दिखाया. सफ़ेद साड़ी में लिपटी उनकी नायिका ज़मीन पर उतरी किसी आसमानी हूर की तरह दर्शकों पर अपनी ख़ूबसूरती का जादुई असर छोड़  जाती है. उन्होंने अपनी फ़िल्मों में कहीं भी अश्लीलता का सहारा नहीं लिया. इत्तेफ़ाक़ में उन्होंने नंदा को पूरी फ़िल्म में एक ही साड़ी में दिखाने के बावजूद जिस मादकता के साथ प्रस्तुत किया, वैसा दैहिक आकर्षण नंदा की किसी और फ़िल्म में देखने को नहीं मिला.

यश चोपड़ा को कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया. उन्हें फ़िल्म वक़्त (1965), इत्तेफ़ाक़ (1969), दाग़ (1973), दीवार (1975) के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के तौर पर फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड दिया गया, जबकि फ़िल्म लम्हे (1991), दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995), दिल तो पागल है (1997) और वीर ज़ारा (2004)के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला. इसके अलावा उन्हें फ़िल्म चांदनी, डर, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है और वीर ज़ारा के लिए सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय और मनोरंजक फ़िल्म के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले. इसी तरह 2006, 2007 और 2008 में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पावर अवॉर्ड दिया गया. भारत सरकार ने उन्हें 2001 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2005 में भारतीय सिनेमा के प्रति उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया.

पिछले दिनों जब वह फ़िल्म जब तक है जान की शूटिंग में व्यस्त थे, तब उनकी तबीयत ख़राब हो गई थी. इस वजह से उन्होंने फ़िल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग रोक दी थी. इसके साथ ही उन्होंने फ़िल्म निर्माण से संन्यास लेने का ऐलान भी कर दिया था.
उन्हें इलाज के लिए मुंबई के लीलावती अस्पताल में दाख़िल कराया गया, जहां 21 अक्टूबर को डेंगू से उनकी मौत हो गई.

यशराज फ़िल्म्स की ज़िम्मेदारी उनके बेटे आदित्य चोपड़ा संभाले हुए हैं. वह भी अपने पिता की तरह बेहद प्रतिभाशाली हैं, लेकिन यश चोपड़ा की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकेगा, यह भी हक़ीक़त है.


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यश चोपड़ा : ख़ूबसूरत लम्हों का सफ़र


फ़िरदौस ख़ान
यश चोपड़ा हिंदी सिनेमा के ऐसे फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, पटकथा लेखक थे, जिन्होंने अपने पचास साल के करियर में हिंदी सिनेमा को कई यादगार फ़िल्में दीं. उन्होंने तीन पीढ़ियों के साथ निर्देशन का ख़ूबसूरत सफ़र तय किया. उनकी फ़िल्में मुहब्बत और ख़ूबसूरती से लबरेज़ होती थीं. इसलिए उन्हें रोमांस का बादशाह भी कहा गया. हालांकि उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर भी फ़िल्में बनाईं और दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ ही समाज को नई दिशा देने की कोशिश की.

 यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर, 1932 को पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था. उनके परिवार के सदस्य चाहते थे कि वह इंजीनियर बनें, लेकिन उनकी दिलचस्पी फ़िल्मों में थी. उन्होंने सहायक निर्देशक के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की. उन्होंने आई एस जौहर और अपने ब़डे भाई बीआर चोपड़ा के साथ काम किया. बतौर सहायक निर्देशक उनकी फ़िल्मों में एक ही रास्ता, नया दौर और साधना शामिल है. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से निर्देशन करने का फ़ैसला किया. बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म धूल का फूल थी. यह 1959 की सबसे कामयाब फ़िल्म रही. अपने विषय की वजह से यह फ़िल्म चर्चाओं में भी ख़ूब रही. नायक नायिका के विवाह पूर्व मिलन में कहीं कोई ज़बरदस्ती नहीं है. नायक बदनीयत नहीं है. नायिका भी सहज ही इसे स्वीकार करती है. इस संबंध में अकेला नायक ही क़ुसूरवार नहीं है, बल्कि नायिका भी उतनी ही ज़िम्मेदार है. मगर दोनों में से कोई भी अपनी भूल की सज़ा भुगतने को तैयार नहीं है. दोनों के किए की सज़ा उनकी संतान को भुगतनी पड़ती है. फ़िल्मकार यहां सवाल उठाता है कि नाजायज़ कौन है, माता-पिता या संतान? इसी तरह फ़िल्म त्रिशूल में अमिताभ बच्चन अपने नाजायज़ पिता के ख़िलाफ़ जंग लड़ता है. फिर उन्होंने 1961 में फ़िल्म धर्म पुत्र का निर्देशन किया. सामाजिक मुद्दे पर बनी इस फ़िल्म को भी बेहद कामयाबी मिली. इसके बाद 1965 में उन्होंने फ़िल्म वक़्त का निर्देशन किया. यह अपने समय की सबसे महंगी और भव्य फ़िल्म थी, जिसमें कई पुराने और नए सितारों को एक साथ पेश किया गया था. इस फ़िल्म के ज़रिये भव्य सेट, आकर्षक आउटडोर, आंखों को लुभाने वाले इंद्रधनुषी शो़ख रंग, चमचमाते रेशमी लिबास, शानदार बंगले और उनमें सजा महंगी सामान, फव्वारे, बड़ी-बड़ी गाड़ियां, दिल लुभाता गीत-संगीत यश चोप़डा के सिनेमा की पहचान बन गया. उन्होंने इस फ़िल्म के ज़रिये मल्टीस्टारर ट्रेंड लाकर हिंदी सिनेमा को एक नई दिशा दी. उनकी बनाई मल्टीस्टारर फ़िल्म दीवार, त्रिशूल, चांदनी, पंरपरा, डर और दिल तो पागल है, ने कामयाबी की नई इबारत लिखी.

उन्होंने 1973 में यशराज फ़िल्मस की स्थापना की थी. उनके निर्देशन में बनी फ़िल्मों में धूल का फूल, धर्मपुत्र, वक़्त, आदमी और इंसान, इत्तेफ़ाक़, दाग़, जोशीला, दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर,  सिलसिला, मशाल, फ़ासले, विजय, चांदनी, लम्हे, परंपरा, डर, दिल तो पागल है, वीर ज़ारा और जब तक है जान शामिल हैं. फ़िल्म जब तक है जान उनकी मौत के बाद 12 नवंबर को प्रदर्शित हुई. उन्होंने कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया, जिनमें दाग़, कभी-कभी, दूसरा आदमी, त्रिशूल, नूरी, काला पत्थर, ना़ख़ुदा, सवाल, मशाल, फ़ासले, विजय, चांदनी, लम्हे, डर, आईना, ये दिल्लगी, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, मुहब्बतें, मुझसे दोस्ती करोगे, मेरे यार की शादी है, साथिया, हम तुम, वीर ज़ारा, बंटी और बब्ली, सलाम नमस्ते, नील एन निक्की, फ़ना, धूम 2, क़ाबुल एक्सप्रैस, ता रा रम रम, झूम बराबर झूम, चक दे इंडिया, लागा चुनरी में दाग़, आजा नच ले, टशन, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक, बचना ऐ हसीनो, रोड साइड रोमियो, रब ने बना दी जो़डी, न्यू यॉर्क, दिल बोले हडिप्पा, रॉकेट सिंह : सेल्समैन ऑफ द ईयर, बैंड बाजा बारात, मुझसे फ्रेंडशिप करोगे, मेरे ब्रदर की शादी, लेडीज़ वर्सिस रॉकी बहल, इश्क़ज़ादे और एक था टाइगर शामिल हैं.


उनकी ़िफल्में रूमानी होती हैं. यश चोप़डा के प्रेम संबंध तर्क की सीमाओं से बाहर खड़े हैं. उनका कौशल यह है कि वह इस अतार्किकता को ग्राह्य बना देते थे. वह समाज में हाशिये पर पड़े रिश्तों को गहन मानवीय संवेदना और जिजीविषा की अप्रतिम ऊर्जा से संचारित कर देते थे. वह अपनी पहली फ़िल्म धूल का फूल से लेकर वीर ज़ारा तक अनाम रिश्तों की मादकता से अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते रहे. यश चोपड़ा संपूर्ण मानवीय चेतना के मुक़ाबले प्रेम की अनन्ता को अपने समूचे सिनेमा में स्थापित करते थे. उन्होंने अपने लंबे निर्देशकीय रचनाकाल में विभिन्न भाव भूमिकाओं पर आधारित कथानकों पर फ़िल्में बनाईं, तब भी वह मूल रूप से मानवीय रिश्तों की उलझनों और उनके बीच गुंथी संवेदनाओं को उकेरने वाले रहे.

हिंदी सिनेमा में यश चोपड़ा को कई महत्वपूर्ण बदलावों के लिए भी याद किया जाएगा, मसलन उन्होंने
फ़िल्म़ि कभी-कभी के ज़रिये अमिताभ बच्चन को एंग्री यंगमैन से शायर बना दिया. अमिताभ बच्चन के करियर को स्थापित करने में शायद सबसे ज़्यादा योगदान यशराज बैनर का ही है. 1975 में अमिताभ बच्चन को फ़िल्म दीवार में एंग्री यंग मैन के रूप में दिखाया गया, तो 1976 में फ़िल्म कभी-कभी में यश चोपड़ा ने अमिताभ को शायर के रूप में दिखाकर दर्शकों को अमिताभ का नया रूप दिखाया. 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म त्रिशूल और 1981 में प्रदर्शित फ़िल्म सिलसिला में अमिताभ बच्चन का शानदार अभिनय देखने को मिला. शाहरुख़ ख़ान को बॉलीवुड का किंग बनाने वाले यश चोपड़ा ही थे. उन्होंने शाहरुख़ ख़ान को प्रेमी के किरदार देकर हिंदी सिनेमा में रोमांस को नए सिरे से परिभाषित किया और रोमांटिक फ़िल्मों का नया दौर शुरू किया. शाहरुख़ ख़ान दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है, मोहब्बतें, वीर ज़ारा, चक दे इंडिया, रब ने बना दी जोड़ी और फ़िल्म जब तक है जान तक यश चोपड़ा के साथ जुड़े रहे. हिंदी सिनेमा की बिना इंटरवल, बिना गाने की पहली फ़िल्म इत्तेफ़ाक़ 1969 में प्रदर्शित हुई. उनकी इस फ़िल्म में नंदा ने एक बेवफ़ा पत्नी का किरदार निभाया.

यश चोपड़ा हिंदी सिनेमा की मूलधारा के निर्देशक थे. उन्होंने अपनी फ़िल्मों के किरदारों के साथ ही उनके गीत-संगीत और लोकेशन भी ख़ासा ध्यान दिया. उन्होंने अपनी फ़िल्मों में ख़ूबसूरत दृश्य दिखाने के लिए विदेशों में शूटिंग की. 1997 में प्रदर्शित फ़िल्म दिल तो पागल है हिंदी सिनेमा की पहली फ़िल्म है, जिसकी शूटिंग जर्मनी में की गई थी. दर्शकों को लुभाने के लिए वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. यश चोपड़ा को अपनी नायिकाओं के लिए चांदनी नाम बहुत प्रिय था. इसलिए उन्होंने फ़िल्म दाग़ में राखी, सिलसिला में रेखा और फ़ासले में फ़रहा, चांदनी में रेखा को यह नाम दिया.

उन्होंने हमेशा अपने वक़्त के लोकप्रिय अभिनेता अभिनेत्रियों के साथ फ़िल्में बनाईं. उनके पसंदीदा नायकों में अशोक कुमार, दिलीप कुमार, देव आनंद, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, राजकुमार, शशि कपूर, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, अनिल कपूर, शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान और सैफ़ अली ख़ान रहे, तो नायिकाओं में सायरा बाना, माला सिन्हा, नंदा, साधना, शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी, राखी, परवीन बॉबी, रेखा, जया भादु़डी, श्रीदेवी, जूही चावला, माधुरी दीक्षित, करिश्मा कपूर, प्रीति जिंटा और रानी मुखर्जी के नाम लिए जा सकते हैं.

उन्होंने अपनी फ़िल्मों की नायिकाओं को बेहद ख़ूबसूरती और सादगी के साथ पेश किया. उन्होंने फ़िल्म वक़्त में साधना, सिलसिला में रेखा, चांदनी, लम्हे में श्रीदेवी और फ़िल्म मोहब्बतें में ऐश्वर्या राय को सफ़ेद शिफॉन की साड़ी में दिखाया. सफ़ेद साड़ी में लिपटी उनकी नायिका ज़मीन पर उतरी किसी आसमानी हूर की तरह दर्शकों पर अपनी ख़ूबसूरती का जादुई असर छोड़  जाती है. उन्होंने अपनी फ़िल्मों में कहीं भी अश्लीलता का सहारा नहीं लिया. इत्तेफ़ाक़ में उन्होंने नंदा को पूरी फ़िल्म में एक ही साड़ी में दिखाने के बावजूद जिस मादकता के साथ प्रस्तुत किया, वैसा दैहिक आकर्षण नंदा की किसी और फ़िल्म में देखने को नहीं मिला.

यश चोपड़ा को कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया. उन्हें फ़िल्म वक़्त (1965), इत्तेफ़ाक़ (1969), दाग़ (1973), दीवार (1975) के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के तौर पर फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड दिया गया, जबकि फ़िल्म लम्हे (1991), दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995), दिल तो पागल है (1997) और वीर ज़ारा (2004)के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला. इसके अलावा उन्हें फ़िल्म चांदनी, डर, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, दिल तो पागल है और वीर ज़ारा के लिए सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय और मनोरंजक फ़िल्म के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले. इसी तरह 2006, 2007 और 2008 में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर पावर अवॉर्ड दिया गया. भारत सरकार ने उन्हें 2001 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2005 में भारतीय सिनेमा के प्रति उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया.

पिछले दिनों जब वह फ़िल्म जब तक है जान की शूटिंग में व्यस्त थे, तब उनकी तबीयत ख़राब हो गई थी. इस वजह से उन्होंने फ़िल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग रोक दी थी. इसके साथ ही उन्होंने फ़िल्म निर्माण से संन्यास लेने का ऐलान भी कर दिया था. उन्हें इलाज के लिए मुंबई के लीलावती अस्पताल में दाख़िल कराया गया, जहां 21 अक्टूबर को डेंगू से उनकी मौत हो गई.

यशराज फ़िल्म्स की ज़िम्मेदारी उनके बेटे आदित्य चोपड़ा संभाले हुए हैं. वह भी अपने पिता की तरह बेहद प्रतिभाशाली हैं, लेकिन यश चोपड़ा की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकेगा, यह भी हक़ीक़त है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई...


फ़िरदौस ख़ान
हिन्दुस्तान में अनेक भक्त कवि हुए हैं, जिन्होंने भक्ति-रस में सराबोर होकर अपनी रचनाओं से भक्ति की गंगा प्रवाहित की. इन्हीं में से एक हैं मीरा. मीरा कृष्ण की दीवानी थीं. वे कृष्ण को दिल ही दिल में अपना पति मानती थीं, क्योंकि बचपन में उनकी मां ने कृष्ण की मूर्ति की तरफ़ इशारा करते हुए उनसे कहा था, यह है तेरा वर. हालांकि उनकी मां ने बाल हठ को देखते हुए बेटी की जिज्ञासा शांत करने के मक़सद से ऐसा कहा था, लेकिन तभी से मीरा के बाल मन ने कृष्ण को अपना पति मान लिया और वे उम्र भर कृष्ण के प्रेम में आकंठ डूबी रहीं. वे भक्ति-काल की अद्‌भुत कवियित्री थीं. उनके पद जनमानस में बेहद प्रिय हैं. कृष्ण भक्त मीरा की पदावली बड़े भक्ति-भाव से गाते हैं. उन्होंने अनेक कष्ट सहे, लेकिन फिर भी कृष्ण के गुन गाती रहीं.

हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब मीरा में कृष्ण दीवानी मीरा की संक्षिप्त जीवनी के साथ उनकी प्रसिद्ध रचनाओं को शामिल किया गया है. किताब का संपादन किया है सुदर्शन चोपड़ा ने. किताब की ख़ास बात यह है कि इसमें मीरा की जीवनी अंधविश्वास पर आधारित न होकर तथ्यों के साथ आगे ब़ढती है. जैसे किताब में बताया गया है कि मीरा सागर की अथाह गहराई में समा गई थीं. ग़ौरतलब है कि तक़रीबन बारह साल की उम्र में उनका विवाह चित्तौ़ड़ के नरेश राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ था. मीरा विवाह नहीं करना चाहती थीं. उन्होंने अपने मुंहबोले भाई जयमल से भी विनती की कि वे उनके परिजनों को समझाएं कि मीरा विवाह नहीं करना चाहती हैं. जयमल ने मीरा की बात परिवार के दूसरे सदस्यों तक पहुंचाई, लेकिन किसी ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया. मीरा का विवाह कर दिया गया. ससुराल पहुंचने पर मीरा ने भोजराज को अपना पति मानने से इंकार कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी सास से भी कह दिया कि वे अपने कृष्ण कन्हैया के सिवा किसी अन्य देवी-देवता को नहीं मानतीं.
सीस नवै मम श्री गिरिधारिसिंह
आन न मानत, नाथ वही है
मीरा से नाराज़ होकर उनके ससुराल वालों ने उन्हें एकांतवास दिया, लेकिन मीरा को लगा कि उन्हें दंड नहीं, बल्कि वरदान मिल गया है. वे पति के संग की भावी पी़डा से छुटकारा पा गईं और अपने सांवरिया के संग एकांतवास का सुख मिल गया. व़क्त बीतता रहा. मीरा की वाणी में छंदों के बंध खुल-खुलकर बिखरने लगे. उनके सुरीले कंठ से निकलने वाले मधुर गीतों से कक्ष गूंज उठा. वह अपने सांवरे के समक्ष झूम-झूमकर नाचतीं और घर-परिवार सब भूल जातीं. बस एक वे थीं और एक था उसका सांवरिया. कृष्ण के सिवा दूसरा कोई भी उनका नहीं रह गया था. रह-रहकर उनके मुख से यह गीत फूट प़डता.
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई

भोजराज की मौत के बाद उसके शव के साथ मीरा पर सती होने के लिए दबाव डाला गया, लेकिन उन्होंने सती होने से साफ़ मना कर दिया. मीरा का कहना था-
मीरा के रंग लाग्यौ हो नाम हरि
और रंग अंटकि परी
गिरधर गास्यां सती न होस्यां
मन मोह्यो धननामी
हालांकि सास ने ख़ूब ताने मारे, ननद ने उलाहना दिया, लेकिन ससुर चुप रहे, हालांकि देवर रत्नसिंह ने मीरा का साथ दिया. जैसे-जैसे वक़्त बीतने लगा, मीरा के प्रति घरवालों की कु़ढ़न भी ब़ढती गई. कई बार मीरा की हत्या करने की कोशिश भी की गई. कभी पिटारी में सांप भेजा गया, तो कभी विष का प्याला भेजा गया, लेकिन कोई भी अंतत: मीरा का कुछ नहीं बिगा़ड़ पाया. वे साधु-संतों को एकत्र करतीं और हरि भजन गातीं-
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे
मैं तो अपने नारायण की
आपहिं हो गई दासी रे
लोग कहें मीरा भई बावरी
सासु कहे कुल नासी रे
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे
विष का प्याला राणा जी भेज्या
पीवत मीरा हांसी रे
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
सहज मिले अविनासी रे
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे

अपने ख़िलाफ़ होने वाली साज़िशों से तंग आकर आख़िरकार मीरा ने चित्तौ़ड़ छोड़ने का फ़ैसला कर लिया. अपनी बचपन की सखी ललिता के साथ पहले वे मेड़ता गईं, लेकिन वहां ज़्यादा दिन नहीं रह सकीं. ताऊ वीरमदेव और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उन्हें अजमेर जाना प़डा. यहां भी वह एक साल ही रह पाईं. इसके बाद उन्होंने वृंदावन की राह पकड़ी. यहां वे प्रसिद्ध विद्वान और कृष्ण भक्त जीव गोस्वामी से मिलने गईं, लेकिन उन्होंने यह कहकर मीरा से मिलने से इंकार कर दिया कि उन्होंने स्त्री-मुख नहीं देखने की प्रतिज्ञा कर रखी है. इस पर मीरा ने संदेशवाहक से स्पष्ट कहा, जाकर कह दो गुस्सांईंजी से कि वृंदावन में तो मैं सबको सखी रूप में ही जानती हूं. यहां एक ही पुरुष है और वह है गिरिधर गोपाल. पर यह आज पता चला कि गिरिधर गोपाल का एक और पट्टीदार भी है यहां.

संदेश सुनकर गुस्सांईंजी बेहद शर्मसार हुए और ख़ुद बाहर आकर उन्होंने मीरा का स्वागत किया. वृंदावन में कुछ दिन रहने के बाद वे ललिता को लेकर द्वारिका चली गईं और समुद्र तट पर बने रणछोड़जी के प्रसिद्ध मंदिर में रहने लगीं. यहां आकर उन्हें लगा कि बस यही द्वार है प्रिय के उस कक्ष का, जो उनका वास्तविक गंतव्य है. लगा कि बस यही अंतिम पड़ाव है मेरी लंबी भटकन भरी यात्रा का. मीरा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलने लगी. अकबर बादशाह भी सुर सम्राट तानसेन के साथ उनसे मिलने आए. मीरा की प्रसिद्धि की ख़बर पाकर राणा ने उन्हें वापस बुलाने के लिए राज पुरोहित के नेतृत्व में ब्राह्मणों का एक दल द्वारिका भेजा, लेकिन मीरा ने वापस जाने से इंकार कर दिया. इस पर ब्राह्मणों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. ललिता ने मीरा को समझाया कि अगर किसी की जान चली गई, तो उनके सिर पर पाप चढ़ेगा. मगर मीरा किसी भी हालत में वापस जाने को तैयार नहीं थीं. वे मंदिर के पश्चिमी प्रांगण के अंतिम छोर पर पहुंचीं और समुद्र में छलांग लगा दी. इसके बाद ललिता भी सागर में समा गई.

क़ाबिले-ग़ौर है कि मीरा की मौत के बारे में जितने भी साक्ष्य मिलते हैं, उन सबमें यही कहा गया है कि वे द्वारिका के रणछोड़जी के मंदिर की मूर्ति में सशरीर समा गई थीं. लोकगीतों का साक्ष्य है-
जाय द्वारिका घर-घर ढूंढी मंदिर सूं न टली 

दरअसल, मीरा के युग के ही चैतन्य महाप्रभु का अंत भी जल में डूबकर ही हुआ था. उनका शव संयोग से एक मछुआरे के जाल में उलझ गया, हालांकि उसमें विकृति आ गई थी, लेकिन शिष्यों ने उसे पहचान लिया. अगर उनका शव न मिलता, तो उनके भी सशरीर परलोक-गमन की कथा बन जाती. यह हक़ीक़त है कि मीरा का शव नहीं मिला, इसलिए श्रद्धावान भक्त-हृदयों ने यह बात कहकर संतोष कर लिया कि वे रणछोड़जी में समा गई हैं.

बहरहाल, किताब की भाषा सरल है. इसका आवरण भी आकर्षक है. दरअसल, हिन्द पॉकेट बुक्स ने भक्त कवियों की एक पूरी श्रृंखला प्रकाशित की है. यह किताब उसी श्रृंखला का एक हिस्सा है. इस तरह श्रृंखला प्रकाशित करने से पाठकों को भक्त कवियों से संबंधित किताबें एक जगह मिल जाती हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : मीरा
संपादन : सुदर्शन चोपड़ा
प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स
क़ीमत : 95 रुपये

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शिक्षक दिवस


ज़िंदगी में प्राइमरी स्कूल और कॊलेज का दौर ही ऐसा होता है, जो सबसे ज़्यादा याद आता है... प्राइमरी स्कूल में पढ़ते वक़्त की गई शरारतें कभी नहीं भुलाई जा सकती हैं... स्कूल के बाद भरी दोपहरी में सहेलियों के साथ खेलना... मम्मी के साथ बैठकर होमवर्क करना... फिर शाम को पापा के घर आने का इंतज़ार करना और पापा के आते ही उन्हें बाहर ले जाकर चीज़ लाना... चीज़ लाने का मक़सद सिर्फ़ पापा के साथ बाहर घूमकर आना ही हुआ करता था...
आज शिक्षक दिवस है... हमारी पहली गुरु मम्मी हैं और दूसरे पापा... इसके बाद बारी आती है हमारे स्कूल और कॊलेज के गुरुजनों की... सभी गुरुजनों को हार्दिक शुभकामनाएं... ये सब आपकी दुआओं का ही फल है कि आज हम कुछ लिख पा रहे हैं...

शिक्षक दिवस पर हम अपने उन सभी उस्तादों के मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहेंगे, जिन्होंने हमें तालीम दी है... ख़ासकर रूहानी इल्म और मौसिक़ी के उस्ताद के... जवाज़, ये है कि ये दोनों ही उस्ताद ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से, अपनी ख़ुशी से हमें तालीम दी है, बिना मेहनताने के...
आज अल सुबह हमने अपने उस्ताद को मुबारकबाद दी और आदतन उन्होंने बेशुमार दुआओं की बारिश कर दी... वाक़ई, दुआओं की बारिश में भीगना बहुत सुकून देता है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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हिंद स्वराज का सफ़रनामा


फ़िरदौस ख़ान
हिंदुत्व की विचारधारा से ओत-प्रोत किताब हिंद स्वराज की अनंत यात्रा में लेखक अजय कुमार उपाध्याय ने हिंद स्वराज की रोशनी में महात्मा गांधी के जीवन की विराट यात्रा का संक्षिप्त विवरण दिया है, जो साधारण व्यक्ति को भी महान कार्य करने के लिए प्रेरित करता है और वह अपने आराध्य के प्रति उसी प्रकार लीन हो सकता है, जिस प्रकार महात्मा गांधी ने अंतिम क्षणों में अपने आराध्य का नाम लिया. बक़ौल लेखक, वास्तव में गांधी जी ने तो अपने जीवन भर की तैयारी को ही बोला था, जिसके संबंध में तुलसीदास जी ने भी लिखा है-जनम-जनम मुनि जतन कराहीं, अंत राम कहि आवत नाहीं. इस तरह महात्मा गांधी ने सत्य की खोज में ही अपने मोक्ष का मार्ग ढूंढ लिया था. सत्य रूप में हिंद स्वराज के आलोक में इनके जीवन की यात्रा से निकले वचन, संदेश बनकर सारी मानवता के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुए हैं. वास्तव में इनकी यात्रा की सार्थकता जब तक पूरी नहीं होती, जब तक मुनष्यत्व की खोज पूर्ण नहीं होती. इस तरह मानवता की अनंत यात्रा में हिंद स्वराज एक प्रकाश की तरह सभी को मार्ग दिखाता रहेगा. यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना सौ वर्ष पूर्व था और आने वाली सदियों के लिए भी उतना ही प्रेरणादायी रहेगा.

किताब के अध्याय राष्ट्रीय पुनर्जागरण एवं नवचेतना, हिंद स्वराज की पृष्ठभूमि, कांग्रेस की प्रारंभिक यात्रा, बंग-भंग और राष्ट्रीय राजनीति, राष्ट्र की अवधारणा और हम, सभ्यता का सार्थक पक्ष, शिक्षा, सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रयास, सविनय अवज्ञा आंदोलन, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन, ऐतिहासिक वार्ता, भारत में सामाजिक क्रांति, द्वितीय विश्व युद्ध और नेहरू, स्वराज्य क्यों और कैसे, पार्लियामेंटरी स्वराज्य और विभाजन, सामाजिक सरोकार गांधी और संघ आदि में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है. मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को उनकी दयनीय दशा से उबारने के लिए संघर्षरत थे. उन्होंने 9 अक्टूबर, 1909 को लार्ड एमपीथील के नाम पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने हिंद स्वराज की आधारशिला रखी. उन्होंने लिखा कि शासकों का कर्तव्य है कि वे जन आकांक्षाओं के अनुरूप शासन करें. अगर वे अपने प्राथमिक कर्तव्यों को पूरा करने में असफल होते हैं, तो जनता को इस बात का अधिकार है कि वे उसे पहचाने व सहयोग करने से इंकार कर दे. महात्मा गांधी का अंत:करण पिछले पचास वर्षों से गूंज रहे स्वराज्य के उन उद्घोषों के प्रति जागृत था, जिसमें 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम किसी न किसी रूप में अपनी आवाज़ लिए गूंज रह था, जो महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के और पंजाब में रामसिंह कूका के नेतृत्व में देशभक्ति का भाव भर रहा था. इसी बीच 1885 में मुंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन का गठन हुआ, जिसके दादाभाई नौरोजी उपसभापति चुने गए. एओ ह्यूम ने 27 दिसंबर, 1885 को कांग्रेस की स्थापना की. कांग्रेस के संबंध में गांधी जी लिखते हैं-देखिए, कांग्रेस ने अलग-अलग जगहों पर हिंदुस्तानियों को इकट्ठा करके उनमें हम एक राष्ट्र हैं, ऐसा जोश पैदा किया. कांग्रेस पर सरकार की क़डी नज़र रहती थी. महसूल का हक़ प्रजा को होना चाहिए, ऐसी मांग कांग्रेस ने हमेशा की है. जैसा कनाडा में है, वैसा स्वराज्य हमें चाहिए, उससे बढ़कर इसका कोई स्वराज्य है या नहीं, यह सवाल अलग है. मुझे दिखाना तो इतना ही है कि कांग्रेस ने हिंद को स्वराज्य का रस चखाया है. इसका यश कोई और लेना चाहे तो वह ठीक न होगा, और हम भी ऐसा मानें तो बेक़दर ठहरेंगे. इतना ही नहीं, बल्कि जो मक़सद हम हासिल करना चाहते हैं, उसमें मुसीबतें पैदा होंगी.

किस तरह हिंदुत्व को खत्म करने और ईसाइयत को ब़ढावा देने के लिए लार्ड मैकाले ने शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन किए, उसे भी लेखक ने पेश किया है. मैकाले ने अंग्रेजी भाषा द्वारा अपने ईसाईयत के लक्ष्य को घोषित किया था-थो़डी सी पाश्चात्य शिक्षा से ही बंगाल में मूर्ति पूजने वाला कोई नहीं रह जाएगा. तभी तो अलैक्जेंडर डफ भारत में धर्म प्रचार के लिए आया, लेकिन सबसे अधिक प्रचार उसने अंग्रेजी का किया था. चर्चों की एक सभा में 1835 में डफ ने घोषणा की थी, जिस-जिस दिशा में पाश्चात्य शिक्षा प्रगति करेगी, उस-उस दिशा में हिंदुत्व के अंग टूटते जाएंगे और अंत में जाकर ऐसा होगा कि हिंदुत्व का कोई भी अंग साबुत नहीं रहेगा. उन्हीं लार्ड शाफ्ट ने कहा था-जो भी हिंदू ईसाई परमात्मा का ध्यान करेगा, वह ब्रह्मा और विष्णु को स्वयंमेव भूल जाएगा. लार्ड विलियम बैंटिक ने 1835 में लार्ड मैकाले की योजना की घोषणा करते हुए ऐलान किया कि भारतवर्ष में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होगी.

चूंकि लेखक दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक हैं, इसलिए संघ की विचारधारा इस पुस्तक के हर अध्याय में प्रकट होती है. पुस्तक की प्रस्तावना संघ के सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ने लिखी है. वह लिखते हैं-हिंद स्वराज ने पाश्चात्य सभ्यता की बुनियाद में उस समय जिन खामियों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया था, वे खामियां ही पूरे पश्चिमी जगत को आज सामाजिक-आर्थिक स्तर पर संकटग्रस्त किए हुए हैं. इसलिए पश्चिम के विद्वान हिंद स्वराज की प्रासंगिकता को स्वीकारते हैं, क्योंकि हिंद स्वराज ने मानवीय पक्ष को सभ्यता का केंद्र मानते हैं. लेखक ने किताब की भूमिका में उन लोगों का आभार व्यक्त किया है, जिन्होंने इस किताब में अपना योगदान दिया है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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सूरदास का कृष्ण प्रेम


फ़िरदौस ख़ान
भक्त कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है. श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि सूरदास हिंदी साहित्य के सूरज माने जाते हैं, जिनकी भक्ति के लबरेज़ रचनाओं से हिंदी साहित्य जगमगा उठा है. हाल में राजकमल प्रकाशन ने सूर संचयिता नामक एक किताब प्रकाशित की है, जिसमें महान कवि सूरदास के जीवनकाल पर रोशनी डालने के साथ ही उनकी चुनिंदा रचनाओं को भी शामिल किया गया है. किताब के संपादक हैं मैनेजर पाण्डेय, जिनकी इससे पहले भी सूरदास पर आधारित किताब भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य प्रकाशित हो चुकी है. सूरदास के जन्म स्थान और जन्म तिथि को लेकर अनेक मतभेद हैं. उनकी जन्मभूमि के तौर पर अब गोपाचल (ग्वालियर), मथुरा प्रांत में कोई गांव, रुनकता (आगरा), सीही (दिल्ली) और साही (आगरा) का ज़िक्र आता है. साहित्य लहरी के एक पद में उनका निवास स्थान गोपाचल बताया गया है. इसी तरह अनेक आलोचकों ने उनके जन्म और मृत्यु के समय को लेकर साहित्य लहरी के मुनि पुनि रसन के रस लेख वाले पद को स्वीकार किया है, लेकिन इस पद के इतने विरोधी अर्थ दिए गए हैं कि उनके आधार पर सूरदास की जन्म तिथि का पता लगाना मुश्किल हो जाता है. वार्ता साहित्य और सांप्रदायिक मान्यता के आधार पर यही कहा जाता है कि सूरदास वल्लभाचार्य से उम्र में दस दिन छोटे थे. वल्लाभाचार्य का जन्म संवत 1535 विक्रम की वैशाख शुक्ल 5 मंगलवार को माना जा सकता है. इसलिए डॉ. ब्रजेश्‍वर वर्मा ने उनका जन्म संवत 1535 के आसपास माना है. सूरसागर के पदों में सूरदास के सूर, सूरदास, सूरज, सूरजदास और सूर श्याम, ये पांच नाम मिलते हैं. कहीं-कहीं सुरसुजान, सूरसरस, सूरजश्याम और सूरजश्यामसुजान भी मिल जाते हैं. इनमें से सुजान, सरस आदि विशेषण ही हैं. इसलिए उनके सूर या सूरज के साथ संयुक्त होने से स्वतंत्र नाम नहीं बन सकते.

क़ाबिले-ग़ौर यह है कि क्या सूर, सूरदास, सूरज, सूरजदास और सूरश्याम ये पांचों नाम एक ही व्यक्ति के हैं या अलग-अलग पांच व्यक्तियों के नाम हैं. डॉ. ब्रजेश्‍वर शर्मा ने सूरज, सूरजदास आदि नामों को सूरदास के मूल नाम का परिवर्तित रूप न मानकर किसी दूसरे व्यक्ति का ही नाम माना है. उनके मुताबिक़, सूरदास ने विकल्प से सूरज या सूरजदास का व्यवहार नहीं किया, वरना किसी सूरजदास नामक कवि ने सूरदास के पदों में अपनी छाप लगा दी और कुछ स्वरचित पद सूरसागर में शामिल कर दिए. वह सूरदास को सूरदास ही मानते हैं. सूर निर्णय के लेखकों के मुताबिक़, सूरदास का नाम सूरज था. सूरज का लघु रूप सूर है, फिर वैष्णवता के कारण सूरजदास, सूरदास या सूरश्याम नाम पड़ गए. इसलिए सूर, सूरदास, सूरजदास और सूरश्याम, ये सभी नाम सूरदास के ही हैं. सूरदास की जाति और वंश को लेकर भी संशय बरक़रार है. दरअसल, भारत में व्यक्ति का कम और जाति का अधिक महत्व है. यहां उन भक्तों को भी जाति निर्णय के प्रपंच से गुज़रना पड़ता है, जो ख़ुद जाति भेद के विरोधी थे. भक्तों की एक ही जाति है. उनका एक ही परिचय है कि वे भक्त हैं और भगवान ही उनके सर्वस्व हैं. सूर की कविता में संप्रदाय और जाति का आग्रह नहीं है. वहां तो एक भावनात्मक धरातल पर समान अनुभूति में निमग्न संपूर्ण समाज या पूर्ण व्यक्ति है. चौरासी वैष्णव की वार्ता में ज़्यादातर भक्तों की जाति का ज़िक्र है, लेकिन सूरदास जैसे संप्रदाय के मशहूर भक्त की जाति का कोई संकेत ही नहीं है. सूरदास के पदों में भी जाति संबंधी कोई बात नहीं कही गई है, इसकी वजह से उनकी जाति या वंश का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. हालांकि आलोचकों ने अपने-अपने विचारों के मुताबिक़ उनकी जाति बताई है. ग़ौरतलब है कि सूरदास नेत्रहीन थे. वह जन्मांध थे या बाद में नेत्रहीन हुए, इस पर भी मतभेद हैं. आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने सूर संदर्भ में लिखा है कि यह कहने का साहस नहीं होता है कि सूरदास ने बिना अपनी आंखों से देखे केवल कल्पना से ये सब लिखा है, लेकिन महाकवि सूरदास में उन्होंने सूरदास को जन्मांध सिद्ध किया है, जबकि चंद्रबली पांडेय के मुताबिक़, सूरदास जन्मांध नहीं थे. हां, धीरे-धीरे अंधे ज़रूर हो गए. चौरासी वैष्णवन की वार्ता में सूरदास की जीवनी मथुरा और आगरा के मध्यवर्ती यमुना के किनारे गऊघाट नामक स्थान पर उनके निवास से शुरू होती है, जहां वल्लभाचार्य से उनकी मुलाक़ात होती है. वल्लभाचार्य ने उन्हें दीक्षा दी और श्रीमदभागवत के दशम स्कंध की लीला की ललित झांकी भी दिखाई. इसके बाद सूरदास एकतारे पर हरि लीला का गायन करने लगे. उनकी बादशाह अकबर और गोस्वामी तुलसीदास से मुलाक़ात के व़क्त और जगह को लेकर भी विद्वानों में मतभेद हैं. इसी तरह उनकी मौत के व़क्त को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं. सूरदास के जन्मकाल की तरह ही उनका देहावसान-काल भी विवादग्रस्त है. अब तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनका देहावसान काल संवत 1640 विक्रम ही विश्वसनीय जान पड़ता है. पारसौली में उस वक़्त सूरदास को वल्लभाचार्य, श्रीनाथ जी और गोसाई विट्ठलनाथ ने श्रीनाथ जी की आरती करते समय सूरदास को मौजूद न पाकर जान लिया कि सूरदास का आख़िरी वक़्त क़रीब आ गया है. उन्होंने अपने सेवकों से कहा कि पुष्टिमार्ग का जहाज़ जा रहा है, जिसे जो लेना हो ले ले. आरती के बाद गोसाई जी रामदास, कुंभनदास, गोविंदस्वामी और चतुर्भुजदास के साथ सूरदास के नज़दीक पहुंचे और अचेत पड़े सूरदास को चैतन्य होते हुए देखा. सूरदास ने गोसाई जी का साक्षात भगवान के रूप में अभिनंदन किया और उनकी भक्तवत्सलता की प्रशंसा की. चतुर्भुजदास ने उस व़क्त शंका की कि सूरदास ने भगवद्यश तो बहुत गाया, लेकिन वल्लभाचार्य का यशगान क्यों नहीं किया. इस पर सूरदास ने बताया कि उनके लिए आचार्य जी और भगवान में कोई फ़र्क़ नहीं है, क्योंकि जो भगवद्यश है, वही आचार्य जी का भी यश है. उन्होंने गुरु के प्रति अपनी आस्था भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो वाला पद गाकर ज़ाहिर की. इसी पद में सूरदास ने अपने को द्विविध आन्धरो भी बताया. इसके बाद सूरदास ने शरीर त्याग दिया. सूरदास ने अनेक ग्रंथों की रचना की. काशी नागरीप्रचारिणी सभा के खोज विवरण की रिपोर्ट के मुताबिक़, सूरदास के नाम से 25 ग्रंथों की सूची उपलब्ध है. इनमें सूरसारावली, सूर लहरी, सूरसागर, भगवत भाषा, दशम स्कंध भाषा, सूरसागर सार, सूर रामायण, मानलीला, राधा रसकेलि कौतूहल, गोवर्धनलीला (रास लीला), दानलीला, भंवर लीला, नाग लीला, व्याहलीला, प्राणप्यारी, दृष्टिकूट के पद, सूरशतक, सूरसाठी, सूरपचीसी, सेवाफल, सूरदास के विनय आदि के स्फुट पद, हरिवंश टीका (संस्कृत), एकादशी माहात्म्य, नल दमयंती और राम जन्म शामिल हैं. भक्त सूरदास की रचनाएं कृष्ण प्रेम से लबरेज़ हैं. उन्होंने अपनी रचनाओं में कृष्ण लीला का इतना मनोहारी वर्णन किया है कि पढ़ने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है.
खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी
कटि कछनी पीतांबर बांधे, हाथ लए भौंरा, चक, डोरी
मोर मुकुट, कुंडल स्रवननि बर दसन-दमक दामिनि-छवि छोरी 
गए स्याम रवि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी
औचक ही देखी तहं राधा, नैन बिसाल भाल दिए रोरी
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी
सूर स्याम देखती हीं रीझै, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी

किसी भी रचनाकार की रचनाओं में जीवन के यथार्थ और अनुभवों की अभिव्यक्ति होती है. हालांकि उन्हें भक्त कवि माना जाता है, लेकिन कृष्ण की भक्ति के अलावा उनकी रचनाओं में जीवन के विभिन्न रंगों को देखा जा सकता है. एक किसान के तौर पर वह अपने पद में खेतीबा़डी का ज़िक्र करते हैं-
प्रभु जू यौं कीन्हीं हम खेती
बंजर भूमि गाउं हर जोते, अरू जेती की तेती
काम क्रोध दोउ बैल बली मिलि, रज तामस सब कीन्हौं
अति कुबुद्धि मन हांकनहारे, माया जूआ दीन्हौं
इंद्रिय मूल किसान, महातृन अग्रज बीज बई
जन्म जन्म को विषय वासना, उपजत लाता नई
कीजै कृपादृष्टि की बरषा, जन की जाति लुनाई
सूरदास के प्रभु सो करियै, होई न कान कटाई

उन्होंने अपने पदों में किसानों की ग़रीबी, कर्मचारियों के अनाचार और सामंतों की लूट का भी ज़िक्र किया है.
अधिकारी जम लेखा मांगै, तातैं हौं आधीनौ
घर मैं गथ नहिं भजन तिहारो, जौन दिय मैं छूटौं
धर्म जमानत मिल्यों न चाहै, तातैं ठाकुर लूटौ
अहंकार पटवारी कपटी, झूठी लिखत बही
लागै धरम, बतावै अधरम, बाक़ी सबै रही
सोई करौ जु बसतै रहियै, अपनौ धरियै नाउं
अपने नाम की बैरख बांधौ, सुबस बसौं इहिं गाउं

उनकी रचनाओं में उर्दू फ़ारसी के शब्द भी ख़ूब मिलते हैं.
मोहरिल पांच साथ करि दीने, तिनकी बड़ी विपरीति
जिम्मैं उनके, मांगैं मोतैं, यह तौ बड़ी अनीति
पांच पचीस साथ अगवानी, सब मिलि काज बिगारे
सुनी तगीरी, बिसरि गई सुधि, मो तजि कीनौं है साफ़
सूरदास की यहै बीनती दस्तक कीजै माफ़

बहरहाल, यह किताब सूरदास के जीवनकाल और उनके जीवनकाल से संबंधित विवादों को बयान करती है. इसके साथ ही सूरदास के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी मुहैया कराती है. पाठकों को, ख़ासकर हिंदी साहित्य के छात्रों के लिए यह किताब बेहद उपयोगी कही जा सकती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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