दहकते पलाश का मौसम...


हर मौसम की अपनी ख़ूबसूरती हुआ करती है... इस मौसम की रौनक़ पलाश के सुर्ख़ फूल है... इस दिल फ़रेब मौसम पर एक नज़्म पेश है...
नज़्म
मेरे महबूब !
ये दहकते पलाश का मौसम है
क्यारियों में
सुर्ख़ गुलाब महक रहे हैं
बर्फ़ीले पहाड़ों के लम्स से
बहकी सर्द हवायें
मुहब्बत के गीत गाती हैं
बनफ़शी सुबहें
कोहरे की चादर लपेटे हैं
अलसाई दोपहरें
गुनगुनी धूप सी खिली हैं
और
गुलाबी शामें
तुम्हारे मुहब्बत से भीगे पैग़ाम लाती हैं
लेकिन
तुम न जाने कब आओगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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हश्र


हमारी नज़्म ’हश्र’ उन ’अमन पसंदों’ के नाम, जिन्होंने दुनिया को दोज़ख़ बनाकर रख दिया है...
अमन पसंदो !
तुम अपने मज़हब के नाम पर
क़त्ल करते हो मर्दों को
बरहना करते हो औरतों को
और
मौत के हवाले कर देते हो
मासूम बच्चों को
क्योंकि
तुम मानते हो
ऐसा करके तुम्हें जन्नत मिल जाएगी
जन्नती शराब मिल जाएगी
हूरें मिल जाएंगी...

लेकिन-
क़यामत के दिन
मैदाने-हश्र में
जब तुम्हें आमाल नामे सौंपे जाएंगे
तुम्हारे हर छोटे-बड़े आमाल
तुम्हें दिखाए जाएंगे
तुम्हारे आमाल में शामिल होंगी
उन मर्दों की चीख़ें
जिन्हें तुमने क़त्ल किया
उन औरतें की बददुआएं
जिन्हें तुमने बरहना किया
और
उन मासूमों की आहें
जिन्हें तुमने मौत की नींद सुला दिया...

कभी सोचा है
उस वक़्त
तुम्हारा क्या हश्र होगा...
-फ़िरदौस ख़ान

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प्रिया राजवंश : परी कथा सी ज़िंदगी

फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरत और मिलनसार प्रिया राजवंश की ज़िंदगी की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है. पहाड़ों की ख़ूबसूरती के बीच पली-बढ़ी एक लड़की कैसे लंदन पहुंचती है और फिर वापस हिंदुस्तान आकर फ़िल्मों में नायिका बन जाती है. एक ऐसी नायिका जिसने फ़िल्में तो बहुत कम कीं, इतनी कम कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है, लेकिन अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ और दिलकश आवाज़ से उसने सबका दिल जीत लिया.

प्रिया राजवंश का जन्म 1937 में नैसर्गिक सौंदर्य के शहर शिमला में हुआ था. उनका बचपन का नाम वीरा था. उनके पिता सुंदर सिंह वन विभाग में कंजरवेटर थे. प्रिया राजवंश ने शिमला में ही पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने कई अंग्रेज़ी नाटकों में हिस्सा लिया. जब उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से ब्रिटेन गए, तो प्रिया राजवंश ने लंदन की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाख़िला ले लिया. सौभाग्य से उन्हें फ़िल्मों में भी काम करने का मौक़ा मिल गया. हुआ यूं कि लंदन के एक फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींची. चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर यह तस्वीर देखी तो वह प्रिया राजवंश की ख़ूबसूरती के क़ायल हो गए. उन दिनों चेतन आनंद को अपनी फ़िल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी. 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने देश पर हमला कर दिया था. हिंदुस्तानी फ़ौज को भारी नुक़सान हुआ था और फ़ौज को पीछे हटना पड़ा. इस थीम पर चेतन आनंद हक़ीक़त नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने प्रिया राजवंश से संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के लिए चुन लिया गया. 1964 में बनी इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान प्रिया राजवंश ने चेतन आनंद की हर स्तर पर मदद की. संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन, निर्देशन, अभिनय और संपादन तक में उनका दख़ल रहा. चेतन आनंद उन दिनों अपनी पत्नी उमा से अलग हो चुके थे. इसी दौरान प्रिया राजवंश और चेतन आनंद एक दूसरे के क़रीब आ गए और फिर ज़िंदगी भर साथ रहे. प्रिया राजवंश उम्र में चेतन आनंद से तक़रीबन 22 साल छोटी थीं, लेकिन उम्र का फ़ासला उनके बीच कभी नहीं आया.

प्रिया राजवंश ने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया. फ़िल्म हक़ीक़त के बाद 1970 में उनकी फ़िल्म हीर रांझा आई. 1973 में हिंदुस्तान की क़सम और हंसते ज़ख्म, 1977 में साहेब बहादुर, 1981 में क़ुदरत और 1985 में हाथों की लकीरें आई. प्रिया राजवंश ने सिर्फ़ चेतन आनंद की फ़िल्मों में ही काम किया और चेतन ने भी हक़ीक़त के बाद प्रिया राजवंश को ही अपनी हर फ़िल्म में नायिका बनाया. उन्हें फ़िल्मों के बहुत से प्रस्ताव मिलते थे, लेकिन वह इंकार कर देती थीं. उनकी खुशी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ चेतन आनंद के साथ थी. हालांकि दोनों ने विवाह नहीं किया था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में उन्हें पति-पत्नी ही माना जाता था. चेतन आनंद के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में वह बहुत सुखी थीं. कहा जाता है कि हीर रांझा प्रिया राजवंश को केंद्र में रखकर ही बनाई गई थी. इस फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि इसके सारे संवाद पद्य यानी काव्य रूप में हैं, जिन्हें कैफ़ी आज़मी ने लिखा था. इसे काव्य फ़िल्म कहना ग़लत न होगा. इसके गीत भी कैफ़ी आज़मी ने ही लिखे थे. प्रिया राजवंश पर फ़िल्माया गया गीत-मिलो न तुम तो, हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है…बहुत मशहूर हुआ. इसी तरह फ़िल्म हंसते जख्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा और मदन मोहन के संगीत से सजा गीत-बेताब दिल की तमन्ना यही है…आज भी लोग गुनगुना उठते हैं.

अंग्रेज़ी के लेखक आरके नारायण के उपन्यास गाइड पर आधारित फ़िल्म गाइड बनाने के वक़्त पहला विवाद नायिका को लेकर ही हुआ था. देव आनंद माला सिन्हा को नायिका रोज़ी की भूमिका के लिए लेना चाहते थे, लेकिन चेतन की पसंद प्रिया राजवंश थीं. विजय आनंद का मानना था कि रोज़ी की भूमिका वहीदा रहमान से बेहतर कोई और अभिनेत्री नहीं निभा सकती, लेकिन वहीदा रहमान राज खोसला के साथ काम नहीं करती थीं. दरअसल, हुआ यह था कि देव आनंद गाइड के निर्देशन के लिए पहले ही राज खोसला से बात कर चुके थे. अब उन्हें राज खोसला और वहीदा रहमान में से किसी एक को चुनना था. चेतन आनंद और विजय आनंद ने वहीदा का समर्थन किया और फिर चेतन आनंद की सलाह पर निर्देशन की ज़िम्मेदारी विजय आनंद को सौंप दी गई. वहीदा रहमान ने कमाल का अभिनय किया और फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुई.

प्रिया राजवंश की ज़िंदगी में अकेलापन और परेशानियां उस वक़्त आईं, जब 6 फ़रवरी, 1997 को चेतन आनंद का देहांत हो गया. प्रिया राजवंश अकेली रह गईं. वह जिस बंगले में रहती थीं, उसकी क़ीमत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. चेतन के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद प्रिया राजवंश को इस बंगले से निकाल देना चाहते थे, लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी के साथ मिलकर 27 मार्च, 2000 को प्रिया राजवंश का बेहरहमी से क़त्ल कर दिया. मुंबई की एक अदालत ने प्रिया राजवंश हत्याकांड में 31 जुलाई, 2002 को केतन आनंद और विवेक आनंद तथा उनके सहयोगियों नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.

कुछ अरसा पहले चेतन आनंद की ज़िंदगी पर आधारित उनकी पत्नी उमा और बेटे केतन आनंद की एक किताब आई थी. इस किताब में ज़िंदगीभर चेतन आनंद के साथ रहने वाली प्रिया राजवंश का ज़िक्र नहीं के बराबर है. दरअसल, चेतन आनंद ने अपने लिए अलग एक बंगला बनवाया था, जिसमें वह प्रिया राजवंश के साथ रहा करते थे. यही बंगला बाद में प्रिया राजवंश की मौत की वजह बना यानी एक बंगले के लालच ने प्रिया राजवंश से उनकी ज़िंदगी छीन ली. वह अपने घर में मृत पाई गई थीं. उनके हत्यारों को तो अदालत ने सज़ा दे दी, लेकिन उनके प्रशंसक शायद ही उनके क़ातिलों को कभी मा़फ़ कर पाएं. अपनी फ़िल्मों की बदौलत वह हमेशा हमारे बीच रहेंगी, मुस्कराती और चहकती हुई. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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दोस्ती...रफ़ाक़त...एक अनछुआ अहसास है...


दोस्ती...रफ़ाक़त...एक अनछुआ अहसास है...रफ़ाक़त का यह जज़्बा, हवा के उस झोंके की मानिंद नहीं, जो खुली, महकी ज़ुल्फ़ों से एक पल के लिए अठखेलियां करता गुज़र जाए...किसी अनजान दिशा में...बल्कि यह तो वो दायिमी अहसास है जो रूह की गहराई में उतर जाता है...हमेशा के लिए...फिर यही अहसास आंखों में समाकर मुसर्रत और होंठों पर आकर दुआ बन जाता है...दोस्ती को किसी दायरे में क़ैद नहीं किया जा सकता...यह अहसास ओस की कोई बूंद नहीं जो ज़रा-सी गर्मी से फ़ना हो जाए...यह तो वो अहसास है जो नीले आसमान की तरह वसीह और समन्दर की मानिंद गहरा है...
फ्रांसिस बेकन ने बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में दोस्ती के इस जज़्बे को बयान किया है... वे कहते हैं...
A man cannot speak to his son but as a father; to his wife but as a husband; to his enemy but upon terms: whereas a friend may speak as the case requires, and not as it sorteth with the person. But to enumerate these things were endless; I have given the rule, where a man cannot fitly play his own part; if he have not a friend, he may quit the stage.
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ख़ुशी


फ़िरदौस ख़ान
कभी-कभार इंसान बहुत ख़ुश होता है... इतना ख़ुश कि उसे लगता है, सारी कायनात ख़ुशी से झूम रही है... वो अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करना चाहता है, सबको बता देना चाहता है कि आज वो बहुत ख़ुश है... उसे वो ख़ुशी मिली है, जिसका वो तसव्वुर भी नहीं कर सकता था... उसे वो ख़ुशी मिली है, जिसे पाना उसके लिए नामुमकिन था... लेकिन ख़ुदा के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है... ख़ुदा इंसान के लिए नामुमकिन को भी मुमकिन कर देता है... ऐसे में दिल चाहता है कि जी भर कर अपने ख़ुदा का शुक्र अदा करें, और सजदे में ही पड़े रहें...
बस, एक ऐसी ख़ुशी ज़िन्दगी को मुकम्मल कर दिया करती है...

अगर देखी जहां में तो नबूवत आपकी देखी
करम देखा, अमल देखा, मिसाले-ज़िन्दगी देखी
न हो मायूस पंछी, इक ज़ियारत यूं भी होती है
उसी को देख जिसने मदीने की गली देखी...

(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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ऋतु बसंत की मादक बेला, तुझ बिन सूनी ओ हरजाई



आज बसंत पंचमी है... इस मौसम से बहुत-सी यादें वाबस्ता हैं... जैसे आज के दिन पीले कपड़े पहनना...कवि सम्मलेन आयोजित करना...और सभी से ग़ुज़ारिश करना कि वे पीले कपड़े पहनकर आएं... सभी साथी कई रोज़ पहले से ही बसंत पंचमी के लिए पीले कपड़े ख़रीदने और सिलवाने शुरू कर देते थे... हमारा एक ग्रुप हुआ करता था... सभी पत्रकार थे... उनमें कुछ कवि और कुछ साहित्य प्रेमी थे... सब दूर-दूर शहरों में जा बसे हैं...
बहरहाल, आप सभी को बसंत पंचमी की तहे-दिल से मुबारकबाद...

गीत
ऋतु बसंत की मादक बेला
तुझ बिन सूनी ओ हरजाई
मन का दर्पण बिखरा-बिखरा
जैसे अम्बर की तन्हाई...

कंगन, पायल, झूमर, झांझर
सांझ सुहानी, नदी किनारा
आकुल, आतुर, विरह-व्यथित मन
पंथ प्रिय का देख के हारा
कल की यादें बांह में ले के
मुझको सता रही अमराई...

क्षण, रैना, दिन सब ही बीते
बीत गईं कितनी सदियां
नयन मिलन की आस लिए हैं
ले भूली-बिसरी सुधियां
अंग-अंग जल उठे विरह में
ऐसी मंद चली पुरवाई...
-फ़िरदौस ख़ान

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कुछ चेहरे

कुछ चेहरे ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें देखकर इंसान ख़ुद को भूल जाता है... हवासों पर बेख़ुदी तारी हो जाती है... दिल सजदे में झुक जाता है... शायद यही लम्हे हुआ करते हैं, जब बंदा अपने ख़ुदा के और भी क़रीब हो जाता है...
इंदीवर साहब ने क्या ख़ूब लिखा है-
अपना रूप दिखाने को तेरे रूप मे खुद ईश्वर होगा...
तुझे देख कर जग वाले पर यक़ीन नहीं क्यूं कर होगा
जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा...
(Firdaus Diary)
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तेरी एक भी सांस किसी और सांस में समाई तो...

कुछ अरसा पहले पंजाबी की एक नज़्म पढ़ी थी... जिसका एक-एक लफ़्ज़ दिल की गहराइयों में उतर गया... पेश है नज़्म का हिन्दी अनुवाद :

तेरी एक भी बूंद
कहीं और बरसी तो
मेरा बसंत
पतझड़ में बदल जाएगा...

तेरी एक भी किरन
किसी और आंख में चमकी तो
मेरी दुनिया
अंधी हो जाएगी...


तेरी एक भी सांस
किसी और सांस में समाई तो
मेरी ज़िन्दगी
तबाह हो जाएगी...

इस नज़्म में लड़की अपने महबूब से सवाल करती है. उसका महबूब उसे क्या जवाब देता है, यह तो हम नहीं जानते... लेकिन इतना ज़रूर है कि हर मुहब्बत करने वाली लड़की का अपने महबूब से शायद यही सवाल होता होगा... और न जाने कितनी ही लड़कियों को अपने महबूब से वो हक हासिल नहीं हो पाता होगा, जिसकी वो तलबगार हैं... और फिर उनकी ज़िन्दगी में बहार का मौसम शबाब पर आने से पहले ही पतझड़ मे बदल जाता है. मुहब्बत के जज़्बे से सराबोर उनकी दुनिया जुदाई के रंज से स्याह हो जाती है और उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए तबाह हो जाती है...और यही दर्द लफ़्जों का रूप धारण करके गीत, नज़्म या ग़ज़ल बन जाता है..
कास्पियन सागर के पास काकेशिया के पर्वतों की उंचाइयों पर बसे दाग़िस्तान के पहाड़ी गांव में जन्मे मशहूर लोक-कवि रसूल हमज़ातोव भी कहते हैं गीतों का जन्म दिल में होता है. फिर दिल उन्हें ज़बान तक पहुंचाता है. उसके बाद ज़बान उन्हें सब लोगों के दिल तक पहुंचा देती है और सारे लोगों के दिल वो गीत आने वाली सदियों को सौंप देते हैं.

-फ़िरदौस ख़ान
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दुआएं...


दुआएं...
मायूसियों के अंधेरे में
उम्मीद की किरनें हैं...
मुश्किलों की धूप में
घने दरख़्त का साया हैं...
दुआएं...
जो हमेशा साथ रहती हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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दलित गणतंत्र एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़

फ़िरदौस ख़ान 
मीडिया स्टडीज़ ग्रुप द्वारा प्रकाशित पुस्तक दलित गणतंत्र लेखों का संग्रह है. इसके तमाम लेख दलित समाज से जुड़े कई ज्वलंत मुद्दों पर रौशनी डालते हैं. मीडिया स्टडीज़ ग्रुप के चेयरमैन अनिल चमड़िया ने अपने लेख वर्चस्व के ढांचे की पहचान में पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद की विचारधारा को समझाने का प्रयास किया है. लेखक का कहना है कि ब्राह्मणवाद एक जाति नहीं है. यह एक विचार है और उस पर आधारित एक व्यवस्था है. जैसे ही हम कहते हैं कि वह एक व्यवस्था है, तो व्यवस्था का अर्थ यह होता है कि उसके हर हिस्से को उसी विचारधारा के आधार पर निर्मित किया गया है. लेकिन आमतौर पर यह देखा जाता है और ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण के पर्याय के रूप में पेश किया जाता है और ब्राह्मणवाद के पूरे ढांचे को मज़बूत करने की कोशिश होती है. ब्राह्मणवाद के विरोध का मतलब ब्राह्मणवाद नहीं हो सकता. जाति विरोधी आंदोलन यदि जाति की पहचान को स्थापित करने की लड़ाई में बदल जाते हैं, तो वह ब्राह्मणवाद के ही हित में होते हैं. वह अपने दूसरे लेख भारतीय मीडिया में दलित आदिवासी प्रतिनिधित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हैं. दलित चिंतक डॊ. आनंद तेलतुम्डे ने अपने लेख अम्बेडकर सिर्फ़ एक राष्ट्रवादी थे, में बताया है कि किस तरह संघ परिवार ने डॊ. अम्बेडकर के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया. संघ परिवार का यह चिरपरिचित हथकंडा रहा है कि डॊ. अम्बेडकर को एक महान राष्ट्रवादी के तौर पर प्रस्तुत किया जाए. दरअसल, यह उनके बदले हुए रुख़ का परिचायक है. कुछ समय पहले तक छद्म बुद्धिजीवियों के ज़रिये उनकी तरफ़ से यह दुष्प्रचार चलाया जा रहा था कि डॊ. अम्बेडकर ब्रिटिश साम्राज्य के दलाल रहे हैं और भारत की आज़ादी के संघर्ष का उन्होंने लगातार विरोध किया. डॊ. अम्बेडकर को बदनाम करने की उनकी यह मुहिम ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकी, क्योंकि तब तक वह दलितों के नायक बन चुके थे. डॊ. भीमराव अम्बेडकर के लेख क्या हिंदू धर्म बंधुत्व को मान्यता प्रदान करता है, में हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था और छुआछूत पर प्रकाश डाला गया है. डॊ. भीमराव अम्बेडकर के अनुसार जाति व्यवस्था की क्रमिक बनावट एक विशेष तरह की सामाजिक मानसिकता बनने और बनाने के लिए ज़िम्मेदार है, जिस पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए. प्रथम, इसके कारण विभिन्न जातियों के बीच एक-दूसरे के लिए द्वेष और घृणा की भावना पनपती है. इस द्वेष तथा घृणा की भावना ने न केवल कहावतों में ही स्थान प्राप्त नहीं किया, बल्कि उसे हिंदू साहित्य में भी स्थान मिला है. केवी रमन्ना अपने लेख ऐसे बनती गई जातियां, में जातियों के निर्माण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं. उनके अनुसार पुरुष-सूक्त से ही वर्णाक्रम एक पुरातन अतीत की तरह जाना जाता है. मैत्रीय संहिता, शतपथ ब्राह्मण, कौस्तुभ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण और बादरायण उपनिषदों से लेकर महाभारत के शांति-पर्व तक चार स्तरीय वर्ग-वर्ण विभाजन ईश्वरीय द्वारा निर्मित बताए गए हैं. यहां तक कि चारों वर्णों के देवताओं तक का निर्धारण कर दिया गया. ब्राह्मणों के लिए अग्नि और बृहस्पति, क्षत्रियों के लिए वरुण, सोम और यम, वैश्यों के लिए देवता वसु, रुद्र, विश्वदेव और मरुत तथा शूद्रों के लिए पूषान देवता का निर्धारण किया गया था. मनुष्य की आर्थिक-सामाजिक स्थिति का निर्धारण स्वर्ग में हो जाता है. चंद्रभान प्रसाद अपने लेख में मेरिट की हिस्ट्री के बारे में जानकारी देते हैं कि किस तरह थर्ड डिविज़न की मांग करते हुए ब्राह्मण समाज का तर्क था कि ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली भारत के लिए एकदम नई है, इसलिए इसे अपनाने और समझने में कुछ वक़्त लगेगा. दरअसल, जब ब्रिटिश शासन ने भारत में मॊडर्न एजुकेशन की शुरुआत की, तो सिर्फ़ फ़स्ट और सैकेंड दो डिविज़न होती थीं. तब न्यूनतम अंक 40 प्रतिशत होते थे. तब न तो थर्ड डिविज़न थी और न ही 33 प्रतिशत की सुविधा. मधु लिमये अपने लेख आरक्षण विरोधी दंगे कौन उकसा रहा है, में कहते हैं कि आरक्षण-विरोधियों के प्रवक्ता नाटकबाज़ी कर रहे हैं कि उन्हें व्यवस्था के ख़िलाफ़ अपना आंदोलन चलाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. यह बिल्कुल झूठ है. वास्तव में सारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था न केवल आरक्षण-विरोधी युवकों का समर्थन कर रही है, बल्कि उन्हें उकसा भी रही है. इसमें समाचार-पत्रों की भूमिका अग्रणी है, जिन पर धनी वर्गों का नियंत्रण है और जिन्हें चलाने वाले उच्च जातियों के प्रतिनिधि हैं. किताब में आरक्षण के इतिहास पर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है. इसके साथ ही कृश्न चंदर की कहानी कालू भंगी और डॊ. सपना चमड़िया की कविता रैदास का आत्मविश्वास भी इसे ख़ास बनाती है.

समीक्ष्य कृति : दलित गणतंत्र
प्रकाशक : मीडिया स्टडीज़ ग्रुप
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