इस्तख़ारा...


बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

बाज़ दफ़ा ऐसा होता है कि हमारे पास सवाल कई होते हैं, लेकिन जवाब एक भी नहीं... ऐसा भी होता है कि किसी एक सवाल के कई जवाब होते हैं, लेकिन हम समझ नहीं पाते कि हम क्या करें... ? ऐसे में इस्तिख़ारा रहनुमाई करता है... आप अपने मसलों से मुताल्लिक़ सवालों के जवाब के लिए इस्तिख़ारे का सहारा ले सकते हैं...
काफ़ी अरसे पहले हमने इस्तिख़ारा करना सीखा था... इस्तिख़ारा करने के कई तरीक़े हैं... लेकिन जो लोग इस्तिख़ारा करना नहीं जानते, उनके लिए मसला पैदा हो जाता है... अच्छी बात यह है कि कई वेबसाइट्स ऐसी हैं, जो इस्तिख़ारे की मुफ़्त सहूलियत मुहैया करा रही हैं... लेकिन उनके बारे में ज़्यादा लोगों को जानकारी नहीं है...
हम चाहते हैं कि ऐसी जानकारी लोगों तक पहुंचाएं, जिनसे उनका कुछ भला हो सके... इसी बात को मद्देनज़र रखते हुए यह पोस्ट लिख रहे हैं...

आपसे ग़ुज़ारिश है कि इस जानकारी को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाएं...
जज़ाक अल्लाह...

इस्तिख़ारा
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प्रकाश स्तंभ जैसी किताब : इंद्रेश कुमार


हमारी किताब ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया गया है...  इसकी ‘प्रस्तावना’ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इंद्रेश कुमार ने लिखी है...इसी प्रस्तावना को यहां प्रकाशित कर रही हूं...

लेखनी विचारों को स्थायित्व प्रदान करती है. इस मार्ग से ज्ञान जन साधारण के मन में घर कर लेता है. अच्छा और बुरा दोनों समान रूप से समाज व मनुष्य के सामने आता रहता है और उसके जीवन में घटता भी रहता है. दोनों में से ही सीखने को मिलता है, आगे बढ़ने का अवसर मिलता है. परंतु निर्भर करता है सीखने वाले के दृष्टिकोण पर ‘आधा गिलास ख़ाली कि आधा गिलास भरा’, ‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई’. अच्छे में से तो अच्छा सीखने को मिलता ही है, परंतु बुरे में से भी अच्छा सीखना बहुत कठिन है. प्रस्तुत पुस्तक ‘गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ जब समाज में जाति, पंथ, दल, भाषा के नाम पर द्वेष फैल रहा हो, सभ्यताओं के नाम पर टकराव बढ रहा हो, संसाधनों पर क़ब्ज़े की ख़ूनी स्पर्धा हो, ऐसे समय पर प्रकाश स्तंभ के रूप में समाधान का मार्ग दिखाने का अच्छा प्रयास है.

इस्लाम में पांच दीनी फ़र्ज़ बताए गए हैं-(1) तौहीद, (2) नमाज़, (3) हज, (4) रो्ज़ा और (5) ज़कात. परंतु इसी के साथ-साथ एक और भी अत्यंत सुंदर नसीहत दी गई है ‘हुब्बुल वतनी निफसुल ईमान’ अर्थात् वतन (राष्ट्र) से प्यार करना, उसकी रक्षा करना एवं उसके विकास और भाईचारे के लिए काम करना, यह उसका फर्ज़ है. इस संदेश के अनुसार मुसलमान को दोनों यानि मज़हबी एवं वतनी फ़र्ज़ में खरा उतरना चाहिए. हज के लिए मक्का शरीफ़ जाएंगे, परंतु ज़िंदाबाद सऊदी अरब, ईरान, सूडान की नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की बोलेंगे. सर झुकेगा हिंदुस्तान पर, कटेगा भी हिंदुस्तान के लिए.

इसी प्रकार से इस्लाम में अन्य अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं जैसे ‘लकुम दीनुकुम बलियदीन’ अर्थात् तेरा दीन तेरा, मेरा दीन मेरा, एक-दूसरे के दीन में दख़ल नहीं देंगे, एक-दूसरे के दीन की इज़्ज़त करेंगे. सर्वपंथ समभाव यानी समन्वय यानी आपसी बंधुत्व का बहुत ही ख़ूबसूरत मार्ग है. इसीलिए ऊपरवाले को ‘रब-उल-आलमीन’ कहा गया है न कि ‘रब-उल-मुसलमीन’. उसका सांझा नाम ‘ऊपरवाला’ है. संपूर्ण विश्व के सभी पंथों के लोग हाथ व नज़र ऊपर उठाकर प्रार्थना (दुआ) करते हैं. ‘ऊपरवाले’ को अपनी-अपनी मातृभाषा में पुकारना यानी याद करना. वह तो अंतर्यामी है. वह तो सभी भाषाएं एवं बोलियां जानता है. वह तो गूंगे की, पत्थर की, कीट-पतंग की भी सुनता है, जो कि आदमी (मनुष्य) नहीं जानता है. अंग्रेज़ी-लेटिन में उसे God, अरबी में अल्लाह, तुर्की में तारक, फ़ारसी में ख़ुदा, उर्दू में रब, गुरुमुखी में वाहे गुरु, हिंदी-संस्कृत-असमिया-मणिपुरी-कश्मीरी-तमिल-गुजराती-बंगला-मराठी-नेपाली-भोजपुरी-अवधी आदि में भी पुकारते हैं भगवान, ईश्वर, परमात्मा, प्रभु आदि. ऊपरवाला एक है, नाम अनेक हैं. गंतव्य व मंतव्य एक है, मार्ग व पंथ अनेक हैं. भारतीय संस्कृति का यही पावन संदेश है. अरबी भाषा में ‘अल्लाह-हु-अकबर’ को अंग्रेज़ी में God is Great, हिन्दी में ‘भगवान (ईश्वर) महान है’ कहेंगे. इसी प्रकार से संस्कृत के ‘वंदे मातरम्’ को अंग्रेज़ी में Salute to Motherland और उर्दू में मादरे-वतन ज़िंदाबाद कहेंगे. इसी प्रकार से अरबी में ‘ला इलाह इल्लल्लाह’ को संस्कृत में ‘खल्विंदम इदम सर्व ब्रह्म’ एवं हिंदी में कहेंगे प्रभु सर्वशक्तिमान है, सर्वज्ञ है और वह एक ही है, उर्दू में कहेंगे कि ख़ुदा ही सब कुछ है, ख़ुदा से ही सब कुछ है.

हज़रत मुहम्मद साहब ने बुलंद आवाज़ में कहा है कि मेरे से पूर्व ख़ुदा ने एक लाख 24 हज़ार पैग़म्बर भेजे हैं. वे अलग-अलग समय पर, अलग-अलग प्रकार के हालात में, अलग-अलग धरती (देश) पर आए हैं. उनकी उम्मतें भी हैं, किताबें भी हैं. अनेक उम्मतें आज भी हैं. इस हदीस की रौशनी में एक प्रश्न खड़ा होता है कि वे कौन हैं? कु़रान शरीफ़ में 25 पैग़म्बरों का वर्णन मिलता है, जिसमें से दो पैग़म्बर ‘आदम और नूह’ भारत आए हैं, जिन्हें पहला एवं जल महाप्रलय वाला मनु कहा व माना जाता है. मुसलमान उम्मत तो पैग़म्बर साहब की हैं, परंतु प्रत्येक पैग़म्बर का सम्मान करना सच्चे मुसलमान का फ़र्ज़ बनता है. इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब मानवता (धर्म) नष्ट होती है, दुष्टों के अत्याचार बढते हैं, तब मैं समय-समय पर धर्म (सज्जनता) की स्थापना हेतु आता हूं.

एक बात स्वयं रसूल साहब कहते हैं कि मुझे पूर्व से यानी हिमालय से यानी हिंदुस्तान से ठंडी हवाएं आती हैं, यानी सुकून (शांति) मिलता है. भारत में भारतीय संस्कृति व इस्लाम के जीवन मूल्यों को अपनी ज़िंदगी में उतारकर कट्टरता एवं विदेशी बादशाहों से जूझने वाले संतों व फ़क़ीरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो मानवता एवं राष्ट्रीयता का पावन संदेश देते रहे हैं. बहुत दिनों से इच्छा थी कि ऐसे श्रेष्ठ भारतीय मुस्लिम विद्वानों की वाणी एवं जीवन समाज के सामने आए, ताकि आतंक, मज़हबी कट्टरता, नफ़रत, अपराध, अनपढ़ता आदि बुराइयों एवं कमियों से मुस्लिम समाज बाहर निकलकर सच्ची राष्ट्रीयता के मार्ग पर तेज़ गति व दृढ़ता से आगे बढ़ सके. कहते हैं ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’. इन संतों व फ़क़ीरों ने तो राम व कृष्ण को केंद्र मान सच्ची इंसानियत की राह दिखाई है. किसी शायर ने कहा है-
मुश्किलें हैं, मुश्किलों से घबराना क्या
दीवारों में ही तो दरवाज़े निकाले जाते हैं

शेख़ नज़ीर ने तो दरगाह और मंदिर के बीच खड़े होकर कहा-
जब आंखों में हो ख़ुदाई, तो पत्थर भी ख़ुदा नज़र आया
जब आंखें ही पथराईं, तो ख़ुदा भी पत्थर नज़र आया

इस नेक, ख़ुशबू एवं ख़ूबसूरती भरे काम को पूर्ण करने के लिए मेरे सामने थी मेरी छोटी बहन एवं बेटी सरीखी फ़िरदौस ख़ान. जब मैंने अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उसने कहा कि भैया यह तो ऊपरवाले ने आपके द्वारा नेक बनो और नेक करो का हुकुम दिया है, मैं इस कार्य को अवश्य संपन्न करूंगी. ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ पुस्तक में ऐसे ही 55 संतों व फ़क़ीरों की वाणी एवं जीवन प्रकाशित किया गया है. लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफ़लताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे.

भारत के ऋषि, मुनियों अर्थात् वैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने वैश्विक स्तर पर बंधुत्व बना रहे इसके लिए हंजारों, लाखों वर्ष पूर्व एक सिध्दांत यानि सूत्र दिया गया था ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ यानि World is one family यानी ‘विश्व एक परिवार है’. परिवार का भाव एवं व्यवहार ही अधिकतम समस्याओं के समाधान का उपाय है. भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक पंथ (मत) जन्मते रहे और आज भी जन्म रहे हैं. इन सब पंथों के मानने वालों का एक-दूसरे पंथ में आवागमन कभी भी टकराव एवं देश के प्रति, पूर्वजों के प्रति अश्रध्दा का विषय नहीं बना. जब इस्लाम जो कि भारत के बाहर से आया और धीरे-धीरे भारी संख्या में भारतीय समाज अलग-अलग कारणों से इस्लाम में आ गया, तो कुछ बादशाहों एवं कट्टरपंथियों द्वारा इस आड़ में अरबी साम्राज्य के विस्तार को भारत में स्थापित करने के प्रयत्न भी किए जाने लगे, जबकि सत्य यह है कि 99 प्रतिशत मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू ही हैं. उन्होंने मज़हब बदला है न कि देश एवं पूर्वज और न ही उनसे विरासत में मिली संस्कृति (तहज़ीब) बदली है. इसलिए भारत के प्राय: सभी मुस्लिम एवं हिंदुओं के पुरखे सांझे हैं यानी समान पूर्वजों की संतति है. इसी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को भारत में एक और नया नाम मिला ‘गंगा जमुनी तहज़ीब’. गंगा और यमुना दोनों नदियां भारतीय एवं भारतीयता का प्रतीक हैं, इनका मिलन पवित्र संगम कहलाता है, जहां नफ़रत, द्वेष, कट्टरता, हिंसा, विदेशियत नष्ट हो जाती है. मन एवं बुध्दि को शांति, बंधुत्व, शील, ममता, पवित्रता से ओत-प्रोत करती है. आज हिंदुस्तान के अधिकांश लोग इसी जीवन को जी ना चाहते हैं. ख़ुशहाल एवं शक्तिशाली हिंदुस्तान बनाना व देखना चाहते हैं.

मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.
(लेखक इंद्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक हैं. साथ ही हिमालय परिवार, राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन, भारत तिब्बत सहयोग मंच, समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा मंच आदि के मार्गदर्शक एवं संयोजक हैं)

किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये

प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) 
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006

प्रभात प्रकाशन
 4/19, आसफ़ अली रोड
दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 2328 9555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan
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वैजयंती माला : अभिनय और नृत्य का संगम


फ़िरदौस ख़ान
दक्षिण भारत की कई अभिनेत्रियों ने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय की अपिट छाप छो़डी है. उनके सौंदर्य, नृत्य कौशल और अभिनय ने हिंदी सिनेमा के दर्शकों का मन मोह लिया और वे यहां भी उतनी ही कामयाब हुईं, जितनी दक्षिण भारतीय फिल्मों में. इन अभिनेत्रियों की लंबी फेहरिस्त है, जिनमें से एक नाम है वैजयंती माला का. वैजयंती माला में वह सब था, जो उन्हें हिंदी सिनेमा में बुलंदियों तक पहुंचा सकता था. बेहतरीन अभिनेत्री होने के साथ-साथ वह भरतनाट्यम की भी अच्छी नृत्यांगना रही हैं. फिल्म आम्रपाली में उनके नृत्य को शायद ही कोई भुला पाए. उनका अंदाज़ निराला रहा है. उन्होंने शास्त्रीय नृत्य के साथ वेस्टर्न डांस को मिलाकर नई नृत्य कला पेश की, जिसे दूसरी अभिनेत्रियों ने भी अपनाया.

वैजयंती माला का जन्म 13 अगस्त, 1936 को दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में एक आयंगर परिवार में हुआ था. उनकी मां वसुंधरा देवी तमिल फ़िल्मों की एक प्रसिद्ध नायिका रही हैं. वैजयंती माला का बचपन धार्मिक माहौल में बीता. उनकी परवरिश उनकी नानी यदुगिरी देवी ने की. उन्हें अपने पिता एमडी रमन से बेहद लगाव रहा. क़रीब पांच साल की उम्र में वैजयंती माला को यूरोप जाने का मौक़ा मिला. मैसूर के महाराज के सांस्कृतिक दल में उनकी मां, पिता और नानी साथ गईं. यह 1940 का वाक़िया है. वेटिकन सिटी में वैजयंती माला को पोप के सामने नृत्य करने का मौक़ा मिला. उन्होंने अपने नृत्य प्रदर्शन से सबका मन मोह लिया. पोप ने एक बॉक्स में चांदी का मेडल देकर बच्ची की हौसला अ़फजाई की. इस दल ने पोप के सामने भी प्रदर्शन किया. वैजयंती माला ने गुरु अरियाकुडी रामानुज आयंगर और वझूवूर रमिआह पिल्लै से भरतनाट्यम सीखा, जबकि कर्नाटक संगीत की शिक्षा मनक्कल शिवराजा अय्यर से ग्रहण की.

तेरह साल की उम्र से ही उन्होंने स्टेज शो करने शुरू कर दिए थे. पहले स्टेज शो के दौरान उनके साथ एक ब़डा हादसा हो गया था, इसके बावजूद उन्होंने शानदार नृत्य प्रदर्शन करके यह साबित कर दिया कि वह हालात का मुक़ाबला करना जानती हैं. हुआ यूं कि 13 अप्रैल, 1949 को तमिल नववर्ष के दिन उनके नृत्य का कार्यक्रम था. इसके लिए एक ब़डा घर लिया गया और वहां एक स्टेज बनाया गया. स्टेज का जायज़ा लेते व़क्त वैजयंती माला का पैर वहां पड़े बिजली के नंगे तार से छू गया, जिससे वह झुलस गईं. लेकिन साहसी वैजयंती माला ने जख्मी पैर और दर्द की परवाह किए बिना नृत्य प्रदर्शन किया और उनके चेहरे पर उनकी तकली़फ ज़रा भी नहीं झलकी. अगले दिन के अ़खबारों में उनके नृत्य कौशल और साहस की सराहना करती हुई खबरें और तस्वीरें प्रकाशित हुईं. एक अ़खबार ने लिखा-वरूगिरल वैजयंती यानी यही है वैजयंती. उनके नृत्य के एक के बाद एक कार्यक्रमों का आयोजन होने लगा. उन्हीं दिनों चेन्नई के गोखले हॉल में आयोजित नृत्य समारोह में एवीएम प्रोडक्शन के मालिक एवी ययप्पा चेटियार और एमवी रमन भी मौजूद थे. कार्यक्रम के बाद ययप्पा चेटियार ने उन्हें अपनी तमिल फिल्म वजकई में काम करने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दरअसल, निर्देशक एमवी रमन को अपनी फिल्म वजकई के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी. फ़िल्म हिट रही. इसे तेलगू में जिवीथम और हिंदी में बहार नाम से बनाया गया. मीडिया ने उन्हें वैजयंती द डांसिंग स्टार नाम दिया. इस दौरान उन्होंने कई क्षेत्रीय फिल्मों में काम किया, लेकिन पहली फिल्म जैसी कामयाबी नहीं मिली. इस दौरान वह नृत्य प्रदर्शन भी करती रहीं.

अचानक एक दिन उन्हें फिल्म नागिन का प्रस्ताव मिला. इसके लिए वह मुंबई आ गईं. उन्होंने सांपों के साथ काम करके सबको चौंका दिया, लेकिन फिल्म को प्रदर्शन के फौरन बाद कामयाबी नहीं मिली. कुछ व़क्त बाद इसी फिल्म को देखने के लिए दर्शक सिनेमाघरों में उम़डने लगे. 1954 में बनी फ़िल्म नागिन उनकी पहली हिट फ़िल्म थी. जिस व़क्त वैजयंती माला हिंदी सिनेमा में आईं, उस व़क्त सुरैया, मधुबाला, नरगिस और मीना कुमारी आदि अभिनेत्रियां सिने पटल पर छाई हुई थीं. वैजयंती माला को इनके बीच ही अपनी अलग पहचान बनानी थी, जो बेहद ही चुनौतीपूर्ण काम था. उन्होंने अपने अभिनय और नृत्य कला के बूते यह साबित कर दिया कि वह भी किसी से कम नहीं हैं. 1955 में बनी फिल्म देवदास में उन्होंने चंद्रमुखी के किरदार को कालजयी बना दिया. 1956 में आई उनकी फिल्म नया दौर में भी उन्होंने शानदार अभिनय किया. इस फिल्म को कई अवॉर्ड मिले. दिलीप कुमार के साथ उनकी जो़डी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. नया दौर हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में शुमार की जाती है.
उनकी 1956 में न्यू डेल्ही, 1957 में कठपुतली, आशा और साधना, 1958 में मधुमति, 1959 में पैग़ाम, 1961 में गंगा-जमुना, 1964 में संगम और लीडर, 1966 में आम्रपाली और सूरज, 1967 में ज्वैलीथी़फ, 1968 में संघर्ष और 1969 में प्रिंस आई. उन्होंने बंगाली फिल्मों में भी काम किया. उनकी एक ब़डी खासियत यह भी थी कि उनके डायलॉग डब नहीं करने प़डते थे.वह पहली ऐसी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने डायलॉग खुद बोलने के लिए हिंदी सीखी. उन्हें 1956 में फ़िल्म देवदास के लिए पहली बार सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का फ़िल्म़फेयर पुरस्कार मिला. इसके बाद 1958 में फ़िल्म मधुमती के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फ़िल्म़फेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया. फिर 1961 में फ़िल्म गंगा-जमुना और 1964 में फ़िल्म संगम के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्म़फेयर अवॉर्ड मिला. इसके अलावा 1996 में उन्हें फ़िल्म़फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देकर सम्मानित किया गया.

अपने करियर की बुलंदी पर ही उन्होंने विवाह करने का ऐलान कर दिया. उन्होंने डॉ. चमन लाल बाली को अपने जीवन साथी के रूप में चुना. डॉ. बाली राजकपूर के फैमिली डॉक्टर थे. तमिल फिल्म नीलाबू की शूटिंग के दौरान वैजयंती माला डल झील में डूबते-डूबते बचीं थीं. इलाज के लिए उन्हें डॉ. बाली के पास लाया गया. डॉ. बाली ने उनकी अच्छी देखभाल की. इसी दौरान उनका झुकाव डॉ. बाली के प्रति ब़ढता गया और वह उनसे प्रेम करने लगीं. डॉ. बाली रावलपिंडी के थे और वैजयंती शुद्ध दक्षिण भारतीय आयंगर परिवार से थीं. इसलिए उनके परिवार वाले रिश्ते के लिए राज़ी नहीं थे, लेकिन उनकी नानी के द़खल के बाद 10 मार्च, 1968 को उनका विवाह आयंगर विवाह पद्धति से संपन्न हुआ. वह एक बेटे की मां बनीं. उनकी ज़िंदगी में खुशियों का यह दौर उस व़क्त थम गया, जब उनके पति की तबीयत खराब रहने लगी. उनकी एक बार सर्जरी हो चुकी थी. एक रात उनकी तबीयत इतनी ज़्यादा बिग़डी कि फिर कभी वह स्वस्थ नहीं हो पाए. ऐसा व़क्त भी आया, जब डॉ. बाली के परिवार ने वैजयंती माला और उनके पुत्र को जायदाद से बेद़खल कर दिया. वैजयंती माला ने चार साल तक मुक़दमा लड़ा और जीत हासिल की. अब वह फिर से अपने करियर की शुरुआत करना चाहती थीं. 1989 के चुनाव के दौरान राजीव गांधी ने उन्हें अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने क़ुबूल कर लिया. उन्होंने चुनाव ल़डा और 1.5 लाख वोटों से जीत दर्ज की. इसके बाद वह दो बार राज्यसभा से सांसद रहीं. 1995 में अन्नामलाई विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से नवाज़ा. वह खुद को अभिनेत्री से ज़्यादा नृत्यांगना मानती हैं. वह नाट्यालय अकादमी की आजीवन अध्यक्ष हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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नामवर सिंह की कविताई विशेषताएं


फ़िरदौस ख़ान
नामवर सिंह हिंदी के प्रसिद्ध कवि और प्रमुख समकालीन आलोचक हैं. 26 जुलाई, 1926 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के गांव जीयनपुर में जन्मे नामवर सिंह ने साहित्यिक जीवन की शुरुआत काव्य लेखन से की थी. उन्होंने पहली कविता 1938 में लिखी. पहले वह ब्रजभाषा में कवित्त और सवैया लिखते थे. 1941 में अध्ययन के लिए वह बनारस आए और यहां उनकी मुलाक़ात त्रिलोचन शास्त्री से हुई. त्रिलोचन ने उन्हें खड़ी बोली में लिखने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने दो बार अपनी कविताओं की किताब प्रकाशित कराने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. इसके बाद वह गद्य लेखन करने लगे. 1951 में उनका निबंध संग्रह बक़लम ख़ुद प्रकाशित हुआ. इसका पुस्तक परिचय त्रिलोचन शास्त्री ने कुछ यूं लिखा, बक़लम ख़ुद में 17 व्यक्ति व्यंजक निबंध हैं. व्यंजना तो इस प्रकार की है कि पुस्तक की बजाय यह ज़िंदादिल आदमी ही लगेगी. बक़लम ख़ुद जनता की जय का उद्घोष, संघर्ष की प्रेरणा और अभियान की आकांक्षा है. निरुद्देश्य मज़ाक़ नहीं, यह सोद्देश्य संजीदगी है, जो सत्य को सुपाच्य रूप देती है. नामवर सिंह की कृतियों में क़लम ख़ुद, हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग, पृथ्वीराज रासो की भाषा, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, छायावाद और इतिहास और आलोचना शामिल हैं. उन्हें उत्कृष्ट रचनाओं के लिए हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान भी मिला.

हाल में राजकमल प्रकाशन ने नामवर सिंह की प्रारंभिक रचनाओं की एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है प्रारम्भिक रचनाएं नामवर सिंह. इसके पहले खंड में कविताएं, दूसरे में विविध विधाओं की गद्य रचनाएं और तीसरे में बक़लम ख़ुद के निबंधों को शामिल किया गया है. उनकी कविताओं में भाव भी है, ग़ज़ब का प्रवाह भी. देखिए-

नभ के नीले सूनेपन में
हैं टूट रहे बरसे बादर
जाने क्यों टूट रहा है तन
बन में चिड़ियों के चलने से
हैं टूट रहे पत्ते चरमर
जाने क्यों टूट रहा है मन
घर के बरतन की खन-खन में
हैं टूट रहे दुपहर के स्वर
जाने कैसा लगता जीवन

नामवर सिंह सबसे पहले कवि हैं. शुरुआती साहित्य जीवन में उन्होंने कविताएं ही ज़्यादा रचीं, लेकिन बहुत कम कविताएं ही प्रकाशित हो पाईं. ख़ास बात यह है कि उनकी छंद पर अच्छी पक़ड थी. उनकी कविता नहीं बीतती सांझ की कुछ पंक्तियां देखिए-

दिन बीता, पर नहीं बीतती, नहीं बीतती सांझ
नहीं बीतती, नहीं बीतती, नहीं बीतती सांझ
ढलता-ढलता दिन दृग की कोरों से ढुलक न पाए
मुक्त कुंतले! व्योम मौन मुझ पर तुम-सा ही छाया
मन में निशि है किंतु नयन से नहीं बीतती सांझ

उन्हें प्रकृति से भी बेहद प्रेम है, इसलिए उनकी रचनाओं में प्रकृति के कई मनोहारी रूप देखने को मिलते हैं. उनकी कविता हरित फौवारों सरीखे धान को लीजिए, जो उन्होंने धान के खेत को देखकर रची.

हरित फौवारों सरीखे धान
हाशिये-सी विंध्य-मालाएं
नम्र कंधों पर झुकीं तुम प्राण
सप्तवर्णी कैश फैलाए
जोत का जल पोंछती-सी छांह
धूप में रह-रहकर उभर आए
स्वप्न के चिथ़डे नयन-तल आह
इस तरह क्यों पोंछते जाएं?

उनकी कविताओं में एक अलग तरह का आकर्षण है. पाठकों को वे इसलिए भी पसंद आती हैं, क्योंकि इनमें कहीं न कहीं उनकी ख़ुद की अनुभूतियों की झलक होती है. किताब के संपादक भारत यायावर भूमिका में लिखते हैं कि नामवर सिंह की भाषा में सफ़ाई और निखार होते हुए भी जहां-तहां छायावादी झलक है. क्लिष्ट-कल्पनाओं को भी उनकी कविताओं में देखा जा सकता है. त्रिलोचन शास्त्री ने जिस भाषा-शैली और अनोखे अंदाज़ में नामवर सिंह की रचनाओं की कविताई विशेषताओं को रेखांकित किया है, वह अपूर्व है, बेमिसाल है. काव्य की तरह गद्य लेखन में भी नामवर सिंह अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं. उनकी प्रारंभिक रचनाओं में कहानी की कहानी भी है, जिसमें उन्होंने खरपत्तू नामक चरित्र का प्रभावी शब्द चरित्र पेश किया है. इसी तरह दार्जिलिंग की एक झलक में उन्होंने काव्यात्मक भाषा का इस्तेमाल किया है. दरअसल, नामवर सिंह की प्रारंभिक रचनाओं का अपना अलग ही महत्व है. उनकी रचनाओं में कच्चापन नहीं मिलता. इसका कारण यह है कि विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने सघन साहित्य-साधना की थी. उनकी स्मरणशक्ति लाजवाब थी. बौद्धिक ओजस्विता से वह भरे हुए थे. इसीलिए बहुत कम उम्र में ही वह एक बौद्घिक ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं. बहरहाल, यह किताब नामवर जी के कृतित्व को पेश करती है. हिंदी साहित्य के शोधार्थियों के लिए यह बेहद उपयोगी किताब है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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संगीत...


संगीत प्रकृति के कण-कण में बसा है... चिड़ियों की चहचहाहट, नदियों का कल-कल करता जल, झरनों की झर-झर, हवा की सांय-सांय और रिमझिम बूंदों की टिप-टिप... सभी में संगीत मौजूद है... हिन्दुस्तानी संस्कृति और संगीत का चोली-दामन का साथ है... घर में कोई मंगल कार्य हो या कोई त्योहार, कोई भी गीत-संगीत के बिना मुकम्मल ही नहीं होता...

यह हमारी ख़ुश नसीबी है कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत ग्रहण करने का मौक़ा मिला... कई साल हमने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना की है... संगीत की देवी सरस्वती की वन्दना से सुर साधना का सफ़र शुरू हुआ और इस दौरान कई संगीत के कार्यक्रमों में जाने का मौक़ा मिला... कई सम्मान भी मिले..., लेकिन सबसे बड़ा सम्मान यही था कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को क़रीब से जानने, समझने और सीखने का मौक़ा मिला...

हिन्दुस्तान में आज भी पारंपरिक कलाओं में गुरु-शिष्य की परंपरा क़ायम है... हमें भी एक ऐसे गुरु मिले, जिस पर किसी भी शिष्य को नाज़ होगा...
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
हमारे गुरु का संगीत के लिए कितना समर्पण भाव है,  इसके बारे में अगली पोस्ट में लिखेंगे...
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बहार


  • बहार आई है... पतझड़ में वीरान हुए दरख़्तों पर सब्ज़ पत्ते मुस्करा रहे हैं... क्यारियों में रंग-बिरंगे फूल खिले हैं... सच ! कितना प्यारा मौसम है... दिल चाहता है कि कहीं दूर चलें, बहुत दूर... क़ुदरत के बहुत क़रीब... किसी पहाड़ पर... 
  • काली घटाओं से न जाने कौन-सा रिश्ता... जब भी छाई हैं... उम्र के बंजर सहरा में बहार आई है...  
  • फूल पलाश के... कितनी ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हैं पलाश के दहकते फूलों से... पलाश के सुर्ख़ फूलों को अपने कमरे में मेज़ पर या फिर खिड़की के पास रखकर उन्हें देर तक निहारना और यह सोचना कि काश इस बार भी वो हमारे लिए फलाश के दहकते फूल लाते... काश... ! 
  • सफ़ेद फूल... सफ़ेद फूलों में तो हमारी रूह बसती है...
  • सुबह-सवेरे उगता सूरत देखना कितना भला लगता है...
  • कुछ चीज़ें, कुछ चेहरे ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें देखकर दिल पुरसुकून हो जाता है, आंखें को ठंडक पहंचती है... तुमको देखा तो ये ख़्याल आया, ज़िन्दगी धूप तुम घना साया
  • उनका पैग़ाम आया, उनसे मुलाक़ात हुई... वाक़ई आसमान से रहमत बरसी और फ़िज़ा में मुहब्बत घुल गई... हवायें रक्स करने लगीं...

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घर की दीवारें चमचमाती...


आज हम चाहते हैं कि घर की दीवारें चमचमाती रहें, उन पर ज़रा-सा भी कोई दाग़-धब्बा तक न लगे... अगर कोई बच्चा दीवार पर पेंसिल से आड़ी-तिरछी लकीरें खींच दे, तो बुरा लगता है... लेकिन हम अपने बचपन के दिन भूल जाया करते हैं, जब चाक और पेंसिल से घर की दीवारों पर कितनी ही आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर घर, पहाड़, नदियां, पेड़, बेल-बूटे और न जाने क्या-क्या बनाया करते थे...
आज अपने पसंदीदा पेंटर ईमान मलेकी की पेंटिंग्स देखकर बचपन याद आ गया... सच ! बचपन कितना प्यारा हुआ करता है...

Painting by Iman Maleki

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भुट्टे...

भुट्टे...
दहकते कोयलों पर भुने
गरमा-गरम भुट्टे
आज भी उतना ही लुभाते हैं
जितना बचपन में भाते थे...
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डायरी


  • हमें डायरी लिखने की आदत है... स्कूल के वक़्त से ही डायरी लिख रहे हैं... कुछ साल पहले अंतर्जाल पर भी बलॊग लिखना शुरू किया... शुरुआत हिंदी से की थी... बाद में उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में भी बलॊग लिखने लगे... डायरी लिखना ही नहीं, पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता है... अकसर अपनी पुरानी डायरियां पढ़ने बैठ जाते हैं... दरअसल, डायरी ज़िंदगी की एक किताब ही हुआ करती है, जिसके औराक़ (पन्नों) पर हमारी यादें दर्ज होती हैं... वो यादें, जो हमारे माज़ी का अहम हिस्सा हैं...
  • डायरी लिखनी चाहिए... डायरी में लिखी गईं ख़ूबसूरत बातें ताज़ा फूलों की तरह होती हैं... जो ख़ुशी देती हैं... हम बरसों से डायरी लिख रहे हैं...
  • लिखने से पहले लफ़्ज़ों को जीना पड़ता है... तभी तो उनमें इतना असर पैदा होता है कि वो सीधे दिल में उतर जाते हैं... रूह की गहराई में समा जाते हैं... 
  • लॊर्ड बायरन की रूमानी कविताएं... कुछ ख़त, एक तस्वीर और बहुत-सी ख़ुशनुमा यादें... माज़ी के संदूक़ में यही सब तो हुआ करता है... 
  • अल्फ़ाज़ वही हैं, जज़्बात वही हैं...बस उन्हें महसूस करने और बयां करने का सबका तरीक़ा जुदा हुआ करता है... 
  • कामयाबी और नाकामी के जवाज़ ज़्यादा मुख़्तलिफ़ नहीं हुआ करते... इंसान कामयाब हो जाए, तो जवाज़ उम्दा हो जाते हैं, लेकिन बंदा नाकाम हो जाए, तो वही जवाज़ तोहमत बन जाया करते हैं... कामयाब लोगों की जीवनियां पढ़कर यही समझ में आया...
  • इंसान तब नहीं हारता, जब वो हार जाता है... बल्कि वो तब हारता है, जब वो हार मान लेता है... इसलिए हम फिर खड़े होंगे... लड़ेंगे और जीतेंगे...
  • बहुत से लोग लफ़्ज़ों के साथ खिलवाड़ करते हैं, कुछ लोग लफ़्ज़ों से खेलते हैं, लेकिन बहुत कम ही लोग लफ़्ज़ों को जीते है...  
  • बच्चे कितने सच्चे होते हैं... कभी इल्म की झूठी क़सम नहीं खाते... ये क़सम उनके लिए सबसे बड़ी हुआ करती है... बचपन की ख़ूबसूरत यादें... 
  • विश्वास और अंधविश्वास एक ही चीज़ के दो नाम हैं...हम तो ऐसा ही मानते हैं... 
  • पेट भरा हो, तो हर चीज़ अच्छी लगती है... इंसान भूखा हो, तो उसे खाने के सिवा कुछ नहीं सूझता...
  • वही लफ़्ज़ दिल को छू पाते हैं, जो अपने से लगते हैं... पराई चीज़ कितनी ही बेशक़ीमती और नायाब क्यों न हो, उससे उन्सियत नहीं हो पाती... इसी तरह बनावटी लफ़्ज़ भी दिल को नहीं छू पाते, उन्हें कितने ही क़रीने से क्यूं न सजाया जाए...
  • सबसे बड़ा सम्मान... पढ़ने वाले को हमारा लिखा एक भी लफ़्ज़ याद रह गया, तो वही हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है... एक लेखक को और क्या चाहिए...
  • कुछ ऐसा लिखना चाहते हैं, जिसे पढ़ते हुए उम्र बीत जाए, लेकिन तहरीर से नज़र हटाने को दिल न चाहे..
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मेहंदी


एक उम्र होती है, जब कोई अच्छा लगने लगता है... और लड़कियां मेहंदी से हथेली पर उसका नाम लिख लिया करती हैं... और फिर चुपके-चुपके उस नाम को निहारा करती हैं... दिन भर उनका सारा ध्यान अपनी हथेली पर ही रहता है कि कहीं कोई उनके महबूब का नाम न पढ़ ले... बरसों पहले हमने एक ग़ज़ल लिखी थी... उसका एक शेअर अर्ज़ है-
हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के
जब हथेली पे तेरा नाम लिखा होता है...
-फ़िरदौस ख़ान
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