अम्मी से हालात का मुक़ाबला करना सीखा
अम्मी जान कहा करती हैं कि इंसान को कभी बुज़दिल नहीं होना चाहिए. बचपन में बिजली चली जाती और अंधेरे में हमें दूसरे कमरे में जाने में ख़ौफ़ आता, तो अम्मी कहतीं कि अंधेरे में भी तो वही कमरा है, जो रौशनी में है. फिर ये ख़ौफ़ क्यों? एक बार अम्मी ने दुकान से कोई चीज़ लाने को कहा. हमने कहा कि भाई को साथ भेज दो. अम्मी ने कहा कि ख़ुद लाओ, सहारे मत तलाशो. कल अगर पढ़ाई के लिए अमेरिका जाना हुआ, तो क्या तब भी भाई को साथ लेकर जाओगी. अम्मी ने हमेशा हमें आत्मनिर्भर बनने का सबक़ पढ़ाया. आज हम जिस क़ाबिल हैं, अपनी अम्मी और अब्बू की वजह से ही हैं. (अब्बू के बारे में अगली पोस्ट में लिखेंगे)
हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, हमने हमेशा उनका मुक़ाबला किया है. एक छोटा सा वाकि़या याद आ रहा है. बहुत पुरानी बात है. तारीख़ भी याद है 25 सितम्बर 1999. उस वक़्त हम अमर उजाला में Correspondent थे. फ़ील्ड में गए हुए थे. वापस लौटते वक़्त एक्सीडेंट हो गया. बहुत चोट आई. हम ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे. बहुत ख़ून बह रहा है. हम दफ़्तर से तक़रीबन तीन सौ क़दम की दूरी पर थे. कुछ लोग मदद के लिए आगे आए. हमने कहा कि हम ठीक हैं. हम जैसे-तैसे दफ़्तर पहुंचे. दफ़्तर में उस वक़्त दो लोग मौजूद थे, कंप्यूटर ऑपरेटर संजय और दूसरा ऒफ़िस बॊय. दोनों हमें देखकर घबरा गए. बोले मैम क्या हुआ? हमने कहा कि बस मामूली सा एक्सीडेंट हुआ है. वे बोले- आपको अस्पताल ले चलते हैं. हमने संजय से कहा कि हम बोलते हैं, जल्दी से स्टोरी टाइप करो. हमने दुपट्टे को ज़ख़्म पर लपेटा और स्टोरी लिखवाने लगे. दर्द की वजह से बुरा हाल था, लेकिन उस वक़्त हमें अपनी तकलीफ़ से ज़्यादा इस बात की फ़िक्र थी कि स्टोरी जल्द से जल्द अख़बार के लिए भेज दी जाए, ताकि वह बाक़ी संस्करणों में भी छप सके. बहुत अहम ख़बर थी.
हम बोल रहे थे और संजय टाइप कर रहा था. उसने हमें स्टोरी पढ़वाई और फिर भेज दी.
इसके बाद वे दोनों हमें अस्पताल लेकर गए.
हमारे ब्यूरो चीफ़ अशोक वर्मा सर और बाक़ी पत्रकार साथी भी हमें देखने आए. ब्यूरो चीफ़ ने हमें शाबाशी दी और कहा कि अपनी ज़िम्मेदारी और काम के प्रति यही जज़्बा होना चाहिए.
करियर के दौरान ऐसा बहुत बार हुआ है कि तेज़ बुख़ार में भी हमने बीस-बीस घंटे काम किया है. अख़बार हो, रेडियो हो या फिर दूरदर्शन, ऐसा अकसर होता था कि तबीयत ख़राब होने के बावजूद हम काम करते. देश का एक मशहूर साप्ताहिक है, अकसर उस अख़बार के लेख ख़ुद अख़बारों की सुर्ख़ियां बनते हैं. उसके सम्पादक कहते थे कि हम अख़बार के लिए आख़िरी वक़्त तक जगह ख़ाली रखते हैं, क्योंकि हमें मालूम है कि तुम वक़्त पर लेख भेज दोगी.
वह इंसान ही क्या, जिसे अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास नहीं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
सर !
क्या आपको याद है?









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