ये इक़रार है मुहब्बत का


दिल चाहता है कि महबूब को अपना बना लें. ये इक़रार है मुहब्बत का यानी कलमा. 
दिल चाहता है कि महबूब से ख़ूब बातें करें. ये गुफ़्तगू है मुहब्बत की यानी नमाज़. 
दिल चाहता है कि महबूब की बातें सुनें. ये चाहत है मुहब्बत की यानी क़ुरआन की तिलावत.  
दिल चाहता है कि महबूब की याद में खाना-पीना छोड़ दें. ये शिद्दत है मुहब्बत की यानी रोज़ा.
दिल चाहता है कि महबूब के लिए माल ख़र्च करें. ये कैफ़ियत है मुहब्बत की यानी ज़कात-ख़ैरात .
दिल चाहता है कि महबूब के घर के चक्कर लगाएं. ये दीवानगी है मुहब्बत की यानी हज.
दिल चाहता है कि महबूब पर जान निसार कर दें. ये इन्तेहा है मुहब्बत की यानी जिहाद.  
फ़िरदौस ख़ान
        
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लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी : रवीश कुमार

सम्मानीय रवीश जी !
आप हमेशा से ही हमारे लिए आदर्श रहे हैं. हमें इस बात का हमेशा फ़ख़्र रहेगा कि हम उस दौर में हैं, जब आप हैं.पत्रकारिता भी आप पर नाज़ करती होगी. आपने साबित कर दिया कि इंसान के लिए ईमान सबसे क़ीमती चीज़ है. आपको याद होगा कि आपने हमारे बारे में एक तहरीर लिखी थी, जो दैनिक हिन्दुस्तान में 26 मई 2010 को शाया हुई थी. आज उस पर नज़र पड़ी, तो सोचा कि इसके लिए एक बार फिर से आपको शुक्रिया कहें. आपके ये शब्द 'लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी' हमारे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं हैं.इसके लिए हम हमेशा आपके तहेदिल से शुक्रगुज़ार रहेंगे.    
-फ़िरदौस ख़ान  


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इंतज़ार


हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम मिस्र के बाशिन्दों को काहिनों के ज़ुल्म से निजात दिलाने की मुहिम में जुटे हैं. वे मिस्र के बाशिन्दों को ख़ुशहाल ज़िन्दगी देने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. अपना घरबार छोड़कर मिस्र के गोशे-गोशे की ख़ाक छान रहे हैं.

और बानो ज़ुलैख़ा अपने यूसुफ़ के इंतज़ार में पलकें बिछाये बैठी हैं. उन्हें यक़ीन है कि कभी न कभी ये हिज्र का मौसम ज़रूर बीतेगा और उन्हें अपने यूसुफ़ का क़ुर्ब हासिल होगा.


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अल्लाह तुम्हें अर्श पे मारूफ़ करेगा


अल्लाह तुम्हें अर्श पे मारूफ़ करेगा 
करते रहो ज़मीन पे गुमनाम इबादत

करते नहीं ख़्याल ग़रीबो यतीम का 
हो जाएगी हर किस्म की नाकाम इबादत
-फ़िरदौस ख़ान 
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ख़त


मेरे महबूब !
मेरी ज़िन्दगी
वो गुमशुदा ख़त है
जिसका पता तुम हो...
-फ़िरदौस ख़ान 
 

Mere Mahboob !
Meri Zindagi 
Wo Gumshuda Khat Hai
Jiska Pataa TUM ho...
-Firdaus Khan


Photo Curtesy by Google
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रंग-बिरंगी कढ़ाई वाले रुमाल...


फ़िरदौस ख़ान
तुम्हें मालूम है न. कुछ काम हमें कितना सुकून देते हैं. जैसे सफ़ेद रुमालों पर रंग-बिरंगे रेशम से बेल-बूटे टांकना. स्कूल के दिनों में बहुत रुमालों पर एक से एक ख़ूबसूरत फूल काढ़े हैं. लाल, गुलाबी, पीले, नीले और कई शेड वाले गुलाब, चम्पा और न जाने कौन-कौन से फूल. कुछ फूलों के आकार पेंसिल से बनाए, तो कुछ दादी जान के फ़र्मों से. पहले फ़र्मों पर हल्की-सी रौशनाई लगाई, फिर उसे रुमाल के एक कोने पर छाप दिया. उसके बाद रुमाल को फ़्रेम पर कसकर रेशम से फूल काढ़े, पत्तियां हरे रंगों से, कलियां हल्के रंगों से और फूल गहरे रंगों से. एक रुमाल की कढ़ाई में कई-कई दिन लग जाते थे, क्योंकि सुबह स्कूल जाना. ढेर सारा होमवर्क करना. खेलना भी तो ज़रूरी होता था. रात में रुमाल याद आते थे. देर तक जागने पर दादी जान कहती थीं- सुबह कौन-सा इम्तिहान है. यह काम कल कर लेना. और न चाहते हुए भी हमें कढ़ाई छोड़नी पड़ती.

रेशम ख़रीदने के लिए पापा के साथ बाज़ार जाया करते थे. दुकान पर जब बहुत से प्यारे-प्यारे रंग देख कर समझ नहीं पाते थे कि कौन-से रंग का रेशम ख़रीदें और कौन-सा छोड़े. सभी तो एक से बढ़कर एक हुआ करते थे. तब पापा कहते- बबीता सभी ले लो. बचपन में पापा हमें बबीता ही कहा करते थे. वे बाद में फ़िरदौस कहने लगे, क्योंकि हमें लोग फ़िरदौस नाम से ही जानते हैं, जो हमारा असली नाम है. वैसे भी हमारे कई नाम रहे हैं. इस बारे में फिर कभी बात करेंगे. बहरहाल, हम ढेर सारे रेशम ख़रीदकर घर आते. हां, रास्ते में पापा हमें आईसक्रीम, छोले, समौसे और भी न जाने क्या-क्या खिलाते थे. पापा के साथ खायी सभी चीज़ें हम आज भी खाते हैं, पर वह मज़ा नहीं आता, जो पापा के साथ आया करता था.

पापा के साथ ख़रीदे गए रेशम आज भी एक डिब्बे में रखे हुए हैं. जब भी इन्हें देखते हैं, तो पापा बहुत याद आते हैं. हमने कितने ही रुमाल काढ़े, अपनी टीचर को दिए, अम्मी को दिए. अम्मी के पास कभी रुमाल टिके ही नहीं, क्योंकि जो भी रुमाल देखता मांग लेता. अम्मी कभी मना ही नहीं कर पाती थीं, लेकिन हमें हमेशा इस बात का अफ़सोस रहा कि हमने कभी तुम्हें रुमाल नहीं दिया, क्योंकि हमारी एक सहेली ने कहा था-रुमाल देने से रिश्ता टूट जाता है. यह बात कितनी सच है, हम नहीं जानते, लेकिन तुम्हारे मामले में कोई रिस्क लेना नहीम चाहते थे. देखो, हमने तुम्हें कोई रुमाल नहीं दिया. फिर भी तुम कितने दूर हो. मन के सबसे क़रीब होकर भी दूर, बहुत दूर.

अब हम एक रुमाल काढ़ना चाहते हैं, तुम्हारे लि, रंग-बिरंगे रेशम से. क्योंकि हम जान गए हैं कि रिश्ते तो क़िस्मत से बनते और बिखरते हैं. फिर क्यों हम तुम्हें उस रुमाल से महरूम रखें, जो तुम हमेशा से चाहते हो.

दैनिक अमृत विचार 



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मुहब्बत



जब इंसान को किसी से मुहब्बत हो जाया करती है, तो फिर उसका वजूद, उसका अपना नहीं रह जाता. दिल उसका होता है, लेकिन धड़कनें किसी और की. जिस्म अपना होता है, लेकिन रूह किसी और की, क्योंकि उसकी अपनी रूह तो अपने महबूब की चाह में भटकती फिरा करती है.

बक़ौल बुल्ले शाह-
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई
सद्दी मैनूं धीदो रांझा हीर न आखो कोई
रांझा मैं विच, मैं रांझे विच ग़ैर ख़िआल न कोई
मैं नाहीं ओह आप है अपणी आप करे दिलजोई
जो कुछ साडे अन्दर वस्से जात असाडी सोई
जिस दे नाल मैं न्योंह लगाया ओही जैसी होई
चिट्टी चादर लाह सुट कुडिये, पहन फ़कीरां दी लोई
चिट्टी चादर दाग लगेसी, लोई दाग न कोई
तख़्त हज़ारे लै चल बुल्ल्हिआ, स्याली मिले न ढोई
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई...

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हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता...


संगीत दिलो-दिमाग़ को बहुत सुकून देता है. अगर भक्ति संगीत की बात की जाए, तो यह रूह की गहराई तक में उतर जाता है. हमारी पसंद के बहुत से भक्ति गीत हैं, जिन्हें सुनते हुए हम उम्र बिता सकते हैं. ऐसा ही एक गीत है- मंगल भवन अमंगल हारी. साल 1975 में आई फ़िल्म 'गीत गाता चल' में इसे सचिन पर फ़िल्माया गया था.
इस गीत को जब भी सुनते हैं, एक अजीब-सा सुकून मिलता है. 

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदसरथ अचर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम-2
हो, होइहै वही जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढ़ाये साखा
हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपद काल परखिये चारी
हो, जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
हो, जाकी रही भावना जैसी
रघु मूरति देखी तिन तैसी
रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
हो, हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता
राम सिया राम सिया राम जय जय राम...
बहरहाल, हम यह गीत सुनते हैं...
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झाड़ू की सींकों का घर...


जी, हां ये बात बिल्कुल सच है. जो चीज़ हमारे लिए बेकार है, उससे किसी का आशियाना भी बन सकता है.    
बहुत साल पहले की बात है. अक्टूबर का ही महीना था. हमने देखा कि कई कबूतर आंगन में सुखाने के लिए रखी झाड़ू की सींकें निकाल रहे हैं. हर कबूतर बड़ी मशक़्क़त से एक सींक खींचता और उड़ जाता. हमने सोचा कि देखें कि आख़िर ये कबूतर झाड़ू की सीकें लेकर कहां जा रहे हैं. हमने देखा कि एक कबूतर सामने के घर के छज्जे पर रखे एक कनस्तर में सींकें इकट्ठी कर रहा है और दो कबूतर दाईं तरफ़ के घर की दीवार में बने रौशनदान में एक घोंसला बना रहे हैं. कबूतरों के उड़ने के बाद हमने झाड़ू को खोल कर उसकी सींकें बिखेर दीं, ताकि वे आसानी से अपने नन्हे घर के लिए सींकें ले जा सकें. अब हमने इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया. पुरानी छोटी झाड़ुओं को फेंकने की बजाय संभाल कर रख देते हैं. जब इस मौसम में कबूतर झाड़ू की सींके खींचने लगते हैं, तो हमें पता चल जाता है कि ये अपना घोंसला बनाने वाले हैं. गुज़श्ता दो दिनों में कबूतर हमारी दो झाड़ुओं की सींकें लेकर जा चुके हैं. 
हम चमेली व दीगर पौधों की सूखी टहनियों के छोटे-छोटे टुकड़े करके पानी के कूंडों के पास बिखेर देते हैं, ताकि पानी पीने के लिए आने वाले परिन्दों इन्हें लेकर जा सकें. 

आपसे ग़ुज़ारिश है कि अगर आपके आसपास भी परिन्दे हैं, तो आप भी अपनी पुरानी झाड़ुओं की सींकें कबूतरों के लिए रख दें, ताकि इनसे उनके नन्हे आशियाने बन सकें.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत इंसान


राहुल गांधी की ये तस्वीर ख़ूब वायरल हो रही है. इस तस्वीर को लेकर राहुल गांधी की उम्र, उनके चेहरे की झुर्रियों, उनकी सफ़ेद होती दाढ़ी और सफ़ेद बालों पर ख़ूब तंज़ किए जा रहे हैं.


ये बरहक़ है कि जो पैदा हुआ है वह उम्र के मुख़्तलिफ़ मरहलों से गुज़रता है. पहले वह बच्चा होता है, फिर वह अपनी जवानी को पहुंचता है और इसके बाद रफ़्ता-रफ़्ता ज़ईफ़ी की तरफ़ बढ़ता है. 
ख़ुशनसीब हैं वे लोग जो बूढ़े होते हैं, क्योंकि मौत के ज़ालिम पंजे किसी को पैदा होते ही अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं, तो किसी को बचपन में उनके अपनों से छीन लेते हैं. कितने ही लोग भरी जवानी में मौत की आग़ोश में समा जाते हैं. 

क्या बूढ़ा होना कोई गुनाह है? क्या चेहरे की झुर्रियां शर्म की बात है? क्या दाढ़ी सफ़ेद होना नदामत की बात है?
ख़ूबसूरत लोग हमेशा ख़ूबसूरत नहीं रहते, लेकिन अच्छे लोग हमेशा ख़ूबसूरत होते हैं. हमारे नज़दीक राहुल गांधी दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत इंसान हैं और हमेशा रहेंगे.
फ़िरदौस ख़ान  
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