इबादत


मेरे महबूब !
तुम फ़ज्र की ठंडक हो 
इशराक़ की सुर्ख़ी हो 
चाश्त की धूप हो
ज़ुहर की तपिश हो 
अस्र की महक हो 
मग़रिब की छांव हो 
इशा की दुआ हो
और
तहज्जुद की इबादत हो 
मेरे महबूब 
तुम ही तो मेरी इबादत का मरकज़ हो...
-फ़िरदौस ख़ान  
शब्दार्थ : फ़ज्र, इशराक़, चाश्त, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और तहज्जुद –मुख़तलिफ़ अवक़ात की नमाज़ों के नाम हैं.   
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और अल्लाह ने खाना भेज दिया...


साल 2005 का वाक़िया है. नवम्बर का महीना था. हम अपनी अम्मी के साथ उत्तर प्रदेश के एक गांव में गए हुए थे. गांव के एक बुज़ुर्ग के साथ हम घूमने निकले. उनके साथ कांग्रेस के एक नेता और उनके चाचा नवाब साहब भी थे. दोपहर हो गई. सबको बहुत भूख लगी थी. बुज़ुर्ग ने कहा कि बहुत भूख लग रही है. घर वापस लौटने में बहुत देर हो जाएगी और यहां दूर-दूर ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा, जहां जाकर कुछ खा-पी सकें. उनकी यह बात सुनकर हमारी अम्मी ने कहा- “मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.” इस पर वे बुज़ुर्ग तंज़िया मुस्कराने लगे. अभी चन्द घड़ियां ही गुज़री थीं कि साईकिल पर सफ़ेद लिबास में एक शख़्स आया. उसने सबको सलाम किया और उन बुज़ुर्ग के हाथ में एक थैली थमाकर चला गया. उन्होंने थैली खोली, तो उसमें गरमा-गरम समौसे थे. नवाब साहब ने बुज़ुर्ग से उस शख़्स के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि वे उसे नहीं जानते.
इस पर हमारी अम्मी ने बुज़ुर्ग से कहा- “क्या मैंने आपसे नहीं कहा था कि मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.”
-फ़िरदौस ख़ान
हमारी अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी
(शेख़ज़ादी का वाक़िया)
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया
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अब्र का साया


कई बरस पहले का वाक़िया है. एक रोज़ हमारी छोटी बहन ने अम्मी को फ़ोन किया कि आपसे मिलने का दिल कर रहा है. अम्मी ने उससे मिलने का वादा कर लिया. चुनांचे ज़ुहर की नमाज़ के बाद अम्मी और हम उससे मिलने के लिए घर से निकले. वह शायद जेठ का महीना था. शिद्दत की गर्मी थी. सूरज आग बरसा रहा था. अम्मी कहने लगीं कि काश ! बादल होते. हमने आसमान की तरफ़ रुख़ करके कहा कि आसमान में दूर-दूर तक बादल का कोई नामो निशान तक नहीं है. हमारी बात ख़त्म भी न होने पाई थी कि हमने ज़मीन पर साया देखा. वह साया इतना वसीह था कि अम्मी और हम उसके नीचे थे. यानी हम घर से दस क़दम भी आगे नहीं बढ़े थे कि हम दोनों अब्र के सायेबान में थे. हम यूं ही बातें करते-करते बहन के घर गए. वहां कुछ वक़्त रुके और फिर वापस घर आ गए. जब हम घर आ गए, तो अम्मी ने हमसे पूछा- ये बताओ कि क्या तुम धूप में गई थीं या अब्र के साये में. हमने ग़ौर किया कि वाक़ई हम अब्र के साये में ही गए थे और अब्र के साये में ही घर वापस आए थे. जैसे-जैसे हम आगे क़दम बढ़ा रहे थे, वैसे-वैसे ही अब्र का साया भी आगे बढ़ता जा रहा था.
ये अल्लाह का एक बहुत बड़ा मौजिज़ा था. ऐसे थीं हमारी अम्मी. अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे, आमीन   
(शेख़ज़ादी का वाक़िया) 
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया
 
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फूल, किताबें और एक तस्वीर...



हमारे कमरे में क़दम रखते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है...फ़र्श पर बिछी चांदनी पर...गहरे हरे रंग की ज़मीन पर हल्के बादामी रंग के बड़े-बड़े फूल बहुत ही ख़ूबसूरत लगते हैं...
कमरे में सफ़ेद और सुर्ख़ रंग के फूलों की बहार है...मुझे सफ़ेद फूल पसंद हैं तो उन्हें सुर्ख़ फूल...इसलिए कमरे में दोनों ही तरह के फूल अपनी मौजूदगी का ख़ुशनुमा अहसास कराते हैं...
इसके बाद बारी आती है किताबों की...हमारे पास बहुत सी किताबें हैं...घर पर तो अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी है...सबसे ज़्यादा उर्दू की किताबें हैं...दूसरे तीसरे और चौथे दर्जे पर बारी आती है पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेजी की किताबों की...हिन्दी में रूसी साहित्य की किताबों का अच्छा ख़ासा ज़ख़ीरा है... अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वनी की... यहां यानी दिल्ली में भी हमारे पास किताबों का ज़ख़ीरा है...हम अकसर किताबें ख़रीदते रहते हैं...इसके अलावा समीक्षा के लिए प्रकाशक भी ढेरों किताबें भेजते रहते हैं...

किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ से दस किताबें पढ़ लेते थे. लाइब्रेरी में उर्दू और पंजाबी की किताबें पढ़ने वाले हम अकेले थे. उर्दू या पंजाबी का कोई बुज़ुर्ग पाठक कभी साल-दो-साल में ही वहां आता था. कई बार लाइब्रेरी के लोग किताबों को तरतीब से लगाने के लिए हमारी मदद लेते थे तो कभी फटी पुरानी या कभी-कभी नई किताबों के नाम, लेखक और प्रकाशक के नाम हिन्दी में लिखने में. हमें यह सब काम करना बहुत अच्छा लगता था.

किताबों से मुताल्लिक़ एक ख़ास बात. कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वो अच्छी किताब देखते ही आपसे मांग लेंगे. आपने एक बार किताब दे दी तो फिर मजाल है कि वो आपको वापस मिल जाए. किताबों के पन्ने मोड़ने, पैन से लाइनें खींचकर किताबों की अच्छी सूरत को बिगाड़ने में भी लोगों को बहुत मज़ा आता है. हमारे पास मुल्क के नामी कहानीकारों की कहानियों का एक संग्रह था. एक रोज़ हम उसे अपने साथ दफ़्तर ले गए  एक लड़की ने हमसे मांग लिया. कई महीने गुज़र गए, लेकिन उसने वापस नहीं किया. हमें पूछा तो कहने लगी-वक़्त ही नहीं मिला. खैर क़रीब दो साल बाद हमारा उसके घर जाना हुआ तो उसने उसे लौटा दिया. लेकिन उसे वापस पाकर हमें बेहद दुख हुआ. तक़रीबन हर सफ़े पर पैन से लाइनें खींची हुईं थीं. कवर पेज भी बेहद अजनबी लगा. जब भी उस किताब को देखते तो बुरा लगता. छोटे भाई असलम ने हमारी  सालगिरह पर नई किताब लाकर दी और उस किताब को अलमारी से हटा दिया. ऐसे कितने ही क़िस्से हैं अपनी प्यारी किताबों से जुदा होने के...

कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे...  उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता...  फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि  तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...

हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...

जाने कब तक तेरी तस्वीर निगाहों में रही
हो गई रात तेरे अक्स को तकते तकते
मैंने फिर तेरे तसव्वुर के किसी लम्हे में
तेरी तस्वीर पे लब रख दिये अहिस्ता से...  परवीन शाकिर  
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पनाह


मेरे महबूब !
मैं तुम्हारी पनाह में हूं
गोया 
अपने रब की पनाह में हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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ज़िन्दगी के सफ़र सी कविताएं


फ़िरदौस ख़ान
युवा कवि आलोक मिश्र की कविताएं ज़िन्दगी के बेहद क़रीब हैं. अपनी कविताओं के बारे में आलोक जी कहते हैं- "जब भी मैं देखता हूं दुनिया को, वह मुझसे कुछ कहती है और जो कहती है वह मेरी कविता है.”
कवि आलोक मिश्र की कविताएं भाव प्रधान कविताएं हैं. पिछले दिनों नई दिल्ली की ग्रंथ अकादमी ने उनका काव्य संग्रह ’लखनपुर और अन्य कविताएं’ प्रकाशित किया है. 104 पृष्ठों के इस कविता संग्रह में कुल 54 कविताएं हैं. ये कविताएं ज़िन्दगी के सफ़र की तरह हैं, जिसमें रफ़्तार भी और ठहराव भी है. इन  कविताओं में प्रेम भी है और वियोग भी है. कहीं मिलन की चाह है, तो कहीं टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का दर्द है. कवि ने जहां राजनीति पर कटाक्ष किया है, वहीं प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य का भी बखूबी चित्रात्मक वर्णन किया है. कवि ने आज के दौर में बढ़ते अपराधों, सांप्रदायिकता और नफ़रतों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इनसे उपजे दर्द को अपनी कविताओं में समेटने की भी भरपूर कोशिश की है.
यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि ज़िन्दगी के तमाम दुखों और तकलीफ़ों के बावजूद इन कविताओं में उम्मीद की एक ऐसी किरण भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. यह सूरज की रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ सुबह का उजियारा बनकर बिखर जाना चाहती है. ये कविताएं पाठक को अपने साथ भावों की नदी में बहा ले जाना चाहती हैं. ऐसी ही एक कविता है-
लिखूंगा तुम्हारा नाम
और पढूंगा सिर्फ़ तुमको
क्योंकि 
तुमको ज़बान से नहीं 
नज़रों से और 
प्रेम की भाषा में पढ़ा जा सकता है  

काव्य सृजन के मामले में भी यह काव्य संग्रह उत्कृष्ट है. कविता की भाषा में रवानगी है. कवि ने कम से कम शब्दों में अपनी बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि ने अपनी भावनाओं को मार्मिक शब्दों और सुन्दर बिम्बों के माध्यम से उकेरा है. कविता में चिंतन और विचारों को सहज और सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे कविता का मर्म और अर्थ पाठक को सहजता से समझ में आ जाता है. पुस्तक का आवरण भी आकर्षक है. अलबत्ता काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : लखनपुर और अन्य कविताएं 
कवि : आलोक मिश्र 
प्रकाशक : ग्रंथ प्रकाशन, नई दिल्ली 
पेज : 104
मूल्य : 200 रुपये
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सुनना...


आज के दौर में हर इंसान किसी न किसी बात को लेकर परेशान है... वो अपनी बात कहना चाहता है, लेकिन उसे सुनने वाला कोई नहीं है... कोई किसी के दुख नहीं सुनना चाहता, क्योंकि उसकी अपनी परेशानियां है... दूसरों के दुख, उनकी तकलीफ़ें सुनकर वो अपने सर में दर्द नहीं करना चाहता...
ऐसे में हर इंसान इसी तलाश में रहता है कि उसे कोई ऐसा मिल जाए, जिससे वो अपनी बात कह सके... हमारी एक हमसाई हैं... उनकी अपनी बहुत सी घरेलू परेशानियां हैं... बहुत परेशान रहती हैं... अकसर उनकी किसी न किसी से लड़ाई होती रहती है... वजह है, वो परेशानियां, जिनका ज़िक्र वो किसी से नहीं कर पातीं और अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं...
एक दिन हमने उनसे कहा कि आप अपनी हर बात हमसे कह लिया करें, तब से वो अपनी बातें हमसे शेयर करनी लगीं... अकसर वो कहतीं कि आज ’उनसे’ बात करके ही रहूंगी, चाहे जो हो जाए... हमने उनसे कहा कि अंकल थके हुए घर आते हैं. आप उनसे लड़ाई-झगड़े की बातें करेंगी, तो वो आपसे दूर होने लगेंगे... बेहतर है कि घरेलू और रिश्तेदारों के झगड़े आप ख़ुद ही सुलझाएं... सबसे अच्छा ये है कि आप उन लोगों और उनकी बातों को नज़र अंदाज़ करें, जिनका मक़सद आपको तकलीफ़ देना है... जब वो लोग देखेंगे कि उनकी किसी बात से आपको तकलीफ़ ही नहीं हो रही है, तो वो आपको तकलीफ़ देना छोड़ देंगे... आप उन लोगों पर अपना वक़्त और अपने जज़्बात क्यों ज़ाया करती हैं, जो आपको रुलाते हैं... बेहतर है कि आप अपना वक़्त और जज़्बात उन लोगों पर निसार करें, जो आपसे मुहब्बत करते हैं, आपकी परवाह करते हैं...
दरअसल,किसी भी रिश्ते के लिए एक अच्छा श्रोता होना बहुत ज़रूरी है...
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सफ़ेदी से दमकती दिवालें


आंगन की दिवालों को चूने से पोता गया है...
हमारा 'माज़ी' अब भी हमारे 'आज' से वाबस्ता है... भले ही पूरे घर में एशियन पेंट हुआ हो, लेकिन घर का सबसे प्यारा हिस्सा सफ़ेदी से दमकता हुआ बहुत ही भला लग रहा है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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अक़ीदत के दिये...


मेरे महबूब
मेरी रूह में रौशन हैं
तुम्हारी मुहब्बत के दिये
जैसे
घर में के आंगन में
दमकते हैं
अक़ीदत के दिये...
-फ़िरदौस ख़ान
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ज़ियारतगाह


मेरे महबूब !
तुम्हारा दर ही तो 
मेरी ज़ियारतगाह है
जहां 
मैं अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान    
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