ग़ज़ल


ज़िन्दगी में जीने का बस यही सहारा है
बन्दगी तुम्हारी है, ज़िक्र भी तुम्हारा है

घर में अर्शे-आज़म से, रहमतें उतर आईं 
सरवरे-दो आलम को, मैंने जब पुकारा है

मन्नतों के धागों को बांध के महब्बत से
औलिया की चौखट पर हाथ भी पसारा है

ग़म नहीं, ख़ज़ां भी हो, या बहार का मौसम 
साथ हमसफ़र है तो, ख़ुल्द का नज़ारा है

मैं ज़मीं प्यासी, तुम भीगता हुआ सावन 
ज़िन्दगी के गुलशन को तुमने ही निखारा है

तुम फ़िरौन हो तो क्या, ज़ालिमों ये मत भूलो
जो ख़ुदा तुम्हारा है, वह  ख़ुदा हमारा है

शुक्रे-ख़ुदा में फ़िरदौस अब, सर को रख के सजदे में 
हर घड़ी ये कहती हैं, ख़ूब ही संवारा है 
-फ़िरदौस ख़ान
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उम्मीद


मेरे महबूब! 
ज़ुल्म-ओ-सितम के 
इस दौर में 
उम्मीद की रौशनी हो तुम... 
-फ़िरदौस ख़ान
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यादें


मेरे महबूब! 
ये बूंदें हैं या तुम्हारी यादें
जो ज़िन्दगी को महका रही हैं... 
-फ़िरदौस ख़ान
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रौशनी


मेरे महबूब! 
गहरे स्याह अंधेरे में
जगमगाती रौशनी हो तुम... 
-फ़िरदौस ख़ान
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क़ुर्ब




मेरे महबूब! 
तुम्हारा क़ुर्ब
क़ुर्बे-इलाही है
तुम्हारे साये में
मेरी बेचैन रूह सुकून पाती है... 
-फ़िरदौस ख़ान

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शबे ज़र्री


मेरे महबूब! 
शबे ज़र्री मुबारक हो... 
मुहब्बत से सराबोर हर लम्हा मुबारक हो... 
मां की दुआओं के साये में गुज़रा वक़्त मुबारक हो... 
ख़ुदा करे, हम हमेशा यूं ही साथ रहें... आमीन
-फ़िरदौस ख़ान 
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सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं

हमने पत्रकार, संपादक, मीडिया प्राध्यापक और संस्कृति कर्मी, मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी की किताब 'उर्दू पत्रकारिता का भविष्य' की समीक्षा की है.
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं 
-फ़िरदौस ख़ान
उर्दू पत्रकारिता की अहमियत से किसी भी सूरत में इंकार नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता का इतिहास बहुत पुराना है. या यूं कहें कि जब से इंसानी नस्लों ने एक-दूसरे को समझना और जानना शुरू किया, तभी से पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी. उस वक़्त लोग एक-दूसरे से बातचीत के ज़रिये अपनी बात अपने रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों तक पहुंचाते थे. बादशाहों के अपने क़ासिद होते थे, जो ख़बरों को दूर-दराज के मुल्कों के बादशाहों तक पहुंचाते थे. गुप्तचर भी बादशाहों के लिए ख़बरें एकत्रित करने का काम करते थे. बादशाहों के शाही फ़रमानों से अवाम में मुनादी के ज़रिये बात पहुंचाई जाती थी. फ़र्क़ बस इतना था कि ये सूचनाएं विशेष लोगों के लिए ही हुआ करती थीं. वक़्त गुज़रता गया, इसके साथ ही सूचनाओं का दायरा बढ़ता गया और तरीक़ा बदलता गया. कबूतरों ने भी संदेश या ख़बरें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम किया. आज यही काम अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट और मोबाइल के ज़रिये किया जा रहा है.
हाल में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफ़ेसर संजय द्विवेदी की उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक किताब उर्दू पत्रकारिता का भविष्य प्रकाशित हुई है. इसमें तहसीन मुनव्वर, फ़िरोज़ अशऱफ, डॉ. अख्तर आलम, असद रज़ा, शाहिद सिद्दीक़ी, फ़िरदौस ख़ान, रघु ठाकुर, एहतेशाम अहमद ख़ान, डॉ. ए अज़ीज़ अंकुर, डॉ. मरज़िया आरिफ़, डॉ. हिसामुद्दीन फ़ारूक़ी, डॉ. आरिफ़ अज़ीज़, डॉ. राजेश रैना, शारिक नूर, इशरत सग़ीर, एज़ाज़ुर रहमान, संजय कुमार, डॉ. माजिद हुसैन, आऱिफ ख़ान मंसूरी, डॉ. जीए क़ादरी, मासूम मुरादाबादी और धनंजय चोपड़ा आदि के उर्दू की हालत को बयां करते कई लेख शामिल हैं. उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे पर हिंदी में किताब प्रकाशित करना, वाक़ई उर्दू की लोकप्रियता को दर्शाता है.
किताब के संपादक संजय द्विवेदी कहते हैं कि इस किताब के बहाने हमने एक छोटी शुरुआत की है, इस भरोसे के साथ कि उर्दू सहाफ़त के मुस्तक़बिल पर बातचीत किसी अंजाम तक पहुंचेगी ज़रूर. वह कहते हैं कि आज की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं. समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का ख़तरा मंडरा रहा है. कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाज़ार की ताक़तों को चुभ रहा है. उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा (अंग्रेज़ी) में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं. अपनी मातृभाषा को भूलकर अंग्रेज़ी में गपियाने वाली जमातें तैयार की जा रही हैं, जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं. अमेरिकी और पश्चिमी देशों की तरफ़ उड़ान भरने को तैयार यह पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है. उसे ग़ालिब, रहीम, रसखान, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, मलिक मोहम्मद जायसी की बजाय पश्चिमी धुनों पर थिरकाया जा रहा है. जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताक़त से बचाया जा सकता है. अपनी भाषाओं, ज़मीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है. उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है. उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाज़ारवाद के ख़िलाफ़, प्रतिरोध है उस अधिनायकवादी मानसिकता के ख़िलाफ़ जो विविधताओं को, बहुलताओं को, स्वीकारने और आदर देने के लिए तैयार नहीं है. यह प्रतिरोध हिंदुस्तान की सभी भाषाओं का है, जो मरने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अंग्रेज़ी के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ डटकर खड़ी हैं और खड़ी रहेंगी.
उर्दू के भविष्य को लेकर जहां कुछ लोग फ़िक्रमंद नज़र आते हैं, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो उर्दू के मुस्तक़बिल को रौशन मानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और शायर तहसीन मुनव्वर कहते हैं कि फ़िल्में हों या टीवी धारावाहिक सब जगह उर्दू की ज़रूरत है. इसलिए यही कहा जा सकता है कि उर्दू पत्रकारिता का भविष्य रौशन है, मगर सवाल इस बात का है कि जिनके हाथ में यह भविष्य है, वह रौशन ज़ेहन और रौशन क़लम और क़लम के धनी हैं कि नहीं? इसी तरह आकाशवाणी केंद्र भोपाल में संवाददाता शारिक नूर कहते हैं कि यदि उर्दू मीडिया के उजले पक्ष को देखा जाए, तो यह पीत पत्रकारिता से काफ़ी हद तक दूर है. केंद्र सरकार और कुछ अन्य मीडिया समूह उर्दू चैनल्स लाए हैं. उर्दू अख़बारों की बेवसाइट्स और ई-संस्करण हैं. हिंदी के कुछ अख़बार भी उर्दू भाषियों को आकर्षित करने के लिए उर्दू पन्ने प्रकाशित कर रहे हैं. भोपाल से प्रकाशित होने वाला एक हिंदी अख़बार उर्दू अदब नाम से हिंदी का पन्ना प्रकाशित करता है, तो एक अन्य मीडिया समूह रविवार के दिन फ़ारसी लिपि में ही उर्दू का एक पृष्ठ दे रहा है. इससे तो यही संकेत मिलता है कि उर्दू पत्रकारिता के लिए माहौल साज़गार है.
हिंदुस्तान में उर्दू मीडिया का भविष्य बहुत उज्जवल है, बशर्ते इस दिशा में गंभीरता से काम किया जाए. मौजूदा दौर में उर्दू अख़बारों के सामने कई मुश्किलें हैं. इस मुल्क में उर्दू के हज़ारों अख़बार हैं, लेकिन ज़्यादातर अख़बारों की माली हालत अच्छी नहीं है. उर्दू के पाठक कम होने की वजह से अख़बारों की प्रसार संख्या भी सीमित है. उर्दू अख़बारों को साल में गिने-चुने दिनों में ही विज्ञापन मिल पाते हैं. उर्दू अख़बारों को यह भी शिकायत रहती है कि सरकारी विज्ञापन भी उन्हें बहुत कम मिलते हैं. इसके अलावा क़ाग़ज़ की बढ़ती क़ीमतों ने अख़बारों के लिए मुश्किलें ही पैदा की हैं.
उर्दू मूल रूप से तुर्की भाषा का शब्द है. इसका मतलब है-शाही शिविर या ख़ेमा. तुर्कों के साथ यह शब्द भी हिंदुस्तान आया. उर्दू भारतीय संघ की 18 भाषाओं में से एक है. उर्दू के लिए फ़ारसी लिपि का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन कुछ ऐसी पत्रिकाएं भी हैं, जिनकी लिपि फ़ारसी न होकर हिंदी है. फ़िलहाल देश में उर्दू की हालत को बयान करने के लिए यह शेअर काफ़ी है-
सब मेरे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं
मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं
बहरहाल, यह किताब उर्दू पत्रकारिता पर आधारित एक बेहतर दस्ताव़ेज है. संजय द्विवेदी कहते हैं कि यह किताब देवनागरी में प्रकाशित की जा रही है, ताकि हिंदी भाषी पाठक भी उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम अतीत और वर्तमान में उसके संघर्ष का आकलन कर सकें. बेशक, इस बेहतरीन कोशिश के लिए संजय द्विवेदी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं.

समीक्ष्य कृति : उर्दू पत्रकारिता का भविष्य
संपादक : संजय द्विवेदी
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
क़ीमत : 295 रुपये


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उस लड़के का मिलना...




बात बचपन की है...उस वक़्त हमारी उम्र सात साल के आसपास रही होगी...गर्मियों की छुट्टियों में पूरा परिवार उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में गया था...हम सब बच्चे सुबह के क़रीब दस बजे आम के बाग़ में चले गए...खेल-खेल में हम बाग़ के क़रीब बने तालाब का पास पहुंच गए...पानी में उतरने का मन हुआ...तालाब कच्चा था...टांगें मिट्टी में धंस गईं...हम रोने लगे...तभी हमने देखा कि एक लड़का दौड़ता हुआ हमारे पास आया और उसने हमें पानी से बाहर निकाला...हम ज़ार-ज़ार रो रहे थे...उसने हमें चुप कराया...हमें डर लग रहा था कि घर पर डांट पड़ेगी...हालांकि कभी डांट नहीं पड़ती थी, लेकिन डर तो लगता ही था... हमारी गहरे आसमानी रंग की फ्राक कमर तक भीग गई थी...और कपड़ों पर मिट्टी भी लगी थी...उस लड़के ने अपनी हथेलियों में पानी भर-भरकर हमारी फ्राक धोई...अब फ्राक पूरी तरह साफ़ हो चुकी थी...
अब हम चहक रहे थे... हम दौड़कर अपने साथ खेल रहे बच्चों के पास गए...इस दौरान हमने कई बार पीछे मुड़कर देखा...वो लड़का वहीं तालाब के किनारे खड़ा हमें देख रहा था...

बचपन के इस वाक़िये को हम कभी नहीं भूल पाए...कहते हैं कि इंसान ज़िन्दगी में दो चीज़ें कभी नहीं भूलता...एक ख़ुशी देने वाली बात और दूसरी तकलीफ़ देने वाला हादसा...लेकिन यादों के संदूक़ में हम सिर्फ़ सुकून देने वाले लम्हों को ही सहेजकर रखते हैं...इसलिए तकलीफ़ देने वाली बातें कुछ वक़्त बात बेमानी हो जाती हैं...

कुछ वक़्त पहले हमें पता चला कि वो लड़का मुल्क की एक बहुत बड़ी हस्ती है...कई बार उससे मिलना हुआ... उसने बताया कि हमें तालाब से बाहर उसी ने निकाला था...वह अपने पापा के साथ वहां आया हुआ था...
उसने यह भी कहा कि जबसे उसने हमें गहरे आसमानी रंग की फ्राक में देखा था, तबसे उसे आसमान ज़्यादा ख़ूबसूरत लगने लगा था...

अजीब इत्तेफ़ाक़ है...हमें गहरा आसमानी रंग बहुत पसंद है...हमेशा हमारे पास गहरे आसमानी रंग के लिबास रहते हैं...बचपन में पापा गहरे आसमानी रंग की कई-कई फ्राकें दिलाकर लाते थे...स्कूल में इसी रंग की वर्दी थी...आधा दिन गहरे आसमानी रंग की वर्दी पहनने के बावजूद हम घर में भी इसी शोख़ रंग का लिबास पहनते थे... कुछ रोज़ पहले हमारे एक पाकिस्तानी दोस्त, जो हमारे रिश्तेदार भी हैं, जब जापान गए तो वहां से हमारे लिए गहरे आसमानी रंग का लिबास लेकर आए... गहरे आसमानी रंग की ज़मीन पर रंग-बिरंगे फूल...
ज़िन्दगी में बहुत-कुछ ऐसा भी होता है, जो किसी परी कथा सा लगता है... बचपन में उस लड़के का मिलना, हमारी मदद करना और फिर उम्र के इस मोड़ पर मिलना...सच कितना भला लगता है...वाक़ई ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...
-फ़िरदौस ख़ान
 

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एक तस्वीर...


कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे... उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता... फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...
हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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नज़्म और शदीद मुहब्बत


यूं तो हर शायरा को अपनी हर नज़्म अज़ीज़ हुआ करती है, लेकिन कुछ कलाम ऐसे होते हैं, जिनसे कुछ ज़्यादा ही उन्सियत होती है... हमें भी अपनी एक नज़्म बहुत पसंद है... इसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है... शायद इसलिए कि इसमें अपने महबूब के लिए शदीद मुहब्बत का इज़हार किया गया है... ये नज़्म हमने उनके लिए लिखी थी, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं...

मेरे महबूब...
नज़्म
मेरे महबूब !
उम्र की
तपती दोपहरी में
घने दरख़्त की
छांव हो तुम
सुलगती हुई
शब की तन्हाई में
दूधिया चांदनी की
ठंडक हो तुम
ज़िन्दगी के
बंजर सहरा में
आबे-ज़मज़म का
बहता दरिया हो तुम
मैं
सदियों की
प्यासी धरती हूं
बरसता-भीगता
सावन हो तुम
मुझ जोगन के
मन-मंदिर में बसी
मूरत हो तुम
मेरे महबूब
मेरे ताबिन्दा ख़्यालों में
कभी देखो
सरापा अपना
मैंने
दुनिया से छुपकर
बरसों
तुम्हारी परस्तिश की है...
-फ़िरदौस ख़ान
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