काश ! उनसे एक मुलाक़ात हो जाए...

कई बरस पहले की बात है... हमारा अमरोहा जाना हुआ... वहां एक ख़ातून से मुलाक़ात हुई, जो ख़ानाबदोश ज़िन्दगी बसर करती हैं... उनका अपना न तो कोई ठिकाना है और न ही कोई मोबाइल नंबर, जिसके ज़रिये उनसे राब्ता किया जा सके... वे हमारे रिश्तेदार के पड़ौस में ही एक घर में ठहरी हुई थीं... वे बेहद ज़हीन थीं... उनकी उम्र भी बहुत ज़्यादा नहीं थी, पचपन साल के आसपास रही होगी...  उन्होंने इतनी ही बताई थी... उनसे गुफ़्तगू शुरू हुई, तो ज़िक्रे-इलाही तक पहुंच गई... हम उनसे मुतासिर हुए बिना नहीं रह सके... हमने उनसे कहा कि हम आपसे फिर मिलना चाहते हैं... उन्होंने कहा कि वे रात में हमारे पास आएंगी...
दिसंबर का महीना था... उस दिन ठंड भी ख़ूब थी... हम उनका इंतज़ार करते रहे... आधी रात गुज़र गई, लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी... हमारी मामी जान और मामूज़ाद बहन भी जाग रही थीं... रात के तक़रीबन दो बजे उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी... मामी जान ने दरवाज़ा खोला... आते ही उन्होंने कहा कि तुमसे मिलने का वादा किया था, तो आना ही था...
उनसे बहुत सी बातें हुईं... उन्होंने हमें दो बातें बताईं और कहा कि वे हमारी अम्मी जान से मिलना चाहती हैं... वे उन्हें हमारे बारे में कुछ बताना चाहती हैं... फ़ोन पर बात करने को उन्होंने मना कर दिया और कहा कि रूबरू होने पर ही वे बात करेंगी... ख़ैर...

हमने उनसे एक ऐसा सवाल किया, जो बरसों से हमारे ज़ेहन में था, लेकिन अब तक उसका जवाब हमें नहीं मिला था... सवाल सुनकर वे मुस्कराईं और उन्होंने एक लफ़्ज़ में जवाब दे दिया... जवाब सुनकर दिल को जो तस्कीन हुई, बेचैन रूह को जो क़रार मिला, वह बयान से बाहर है...
जिस सवाल का जवाब बड़े-बड़े आलिम नहीं दे पाए, उन्होंने इतनी आसानी से दे दिया... जवाब भी ऐसा लाजवाब कि फिर किसी सवाल की गुंजाइश ही बाक़ी नहीं रही...

उनसे मुलाक़ात के लम्हे हमारी ज़िन्दगी की किताब के वो वर्क़ हैं, जिन्हें हम बार-बार पढ़ना चाहते हैं... कई बरस बीत गए, लेकिन उनसे मुलाक़ात नहीं हो पाई... काश ! एक बार ही सही, उनसे एक मुलाक़ात और हो जाए... काश ! वो कहीं से आकर हमारे सामने खड़ी हो जाएं... काश ! ऐसा हो... आमीन...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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राहुल गांधी को समर्पित एक ग़ज़ल

भारत की मुहब्बत ही इस दिल का उजाला है
आंखों में मेरी बसता एक ख़्वाब निराला है

बेटा हूं मैं भारत का, इटली का नवासा हूं
रिश्तों को वफ़ाओं ने हर रूप में पाला है

राहों में सियासत की, ज़ंजीर है, कांटें हैं
सुख-दुख में सदा मुझको जनता ने संभाला है

धड़कन में बसा मेरी, इस देश की गरिमा का
मस्जिद कहीं, गिरजा कहीं, गुरुद्वारा, शिवाला है

बचपन से ले के अब तक ख़तरे में जां है, लेकिन
दुरवेशों की शफ़क़त का इस सर पे दुशाला है

नफ़रत, जलन, अदावत दिल में नहीं है मेरे
अख़लाक़ के सांचे में अल्लाह ने ढाला है

पतझड़ में, बहारों में, फ़िरदौस नज़ारों में
हर दौर में देखोगे राहुल ही ज़ियाला है
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ : दुरवेश- संत,  शफ़क़त- सहानुभूति, अदावत- शत्रुता, अख़लाक़- संस्कार,  फ़िरदौस- स्वर्ग, ज़ियाला- उजाला



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तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ

फ़िरदौस ख़ान
फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के वह शायर हैं, जो जंगे-आज़ादी से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक से जुडे रहे. उनकी ज़ाती ज़िंदगी बेहद कड़वाहटों से भरी हुई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपने कलाम को इश्क़ के रंगों से सजाया. वह कहते हैं-
तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ
इस एक चिराग़ से कितने चिराग़ जल उठे फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनका असली नाम रघुपति सहाय था, लेकिन उन्होंने फ़िराक़ गोरखपुरी नाम से लेखन किया. उन्होंने एमए किया और आईसीएस में चुने गए. 1920 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी स्वराज आंदोलन में शामिल हो गए. वह डेढ़ साल तक जेल में भी रहे और यहां से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू के कहने पर अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ़्तर में अवर सचिव बना दिए गए. नेहरू के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और 1930 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक बन गए. उन्होंने 1959 तक यहां अध्यापन कार्य किया.

फ़िराक़ गोरखपुरी को 1968 में पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. अगले साल 1969 में उन्हें साहित्य का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया. फिर 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी का मनोनीत सदस्य नियुक्त किया गया. 1981 में उन्हें ग़ालिब अकादमी अवॉर्ड दिया गया. उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग़मा, गुले-राना, मशाल, रूहे-कायनात, रूप, शबिस्तां, सरगम, बज़्मे-ज़िंदगी रंगे-शायरी, धरती की करवट, गुलबाग़, रम्ज़ कायनात, चिराग़ां, शोला व साज़, हज़ार दास्तान, और उर्दू की इश्क़िया शायरी शामिल हैं. उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियां भी लिखीं. उनकी उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुईं.

आम तौर पर ख़्याल किया जाता है कि फ़नकार को ऐसी बुनियाद और कमज़ोर हालात से बेनियाज़ होना चाहिए. ग़ालिब ज़िंदगी भर परेशान रहे, अपनी बीवी की शिकायत करते रहे. अपनी तमाम मुस्कराहटों के साथ जीवन पद्धति निभाते रहे. इसलिए मुश्किलें आसान लगने लगीं. मंटों ने तो हंस-हंस कर जीना सीखा था. ज़िंदगी की सारी तल्ख़ियां अपनी हंसी में पी गया और भी अच्छे फ़नकारों ने कुछ ऐसे ही जिया होगा.

29 जून, 1914 को उनका विवाह ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी हुआ, लेकिन वह पत्नी को पसंद नहीं करते थे. इसका उनकी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी, एक साहब ने मेरी शादी एक ऐसे ख़ानदान और एक ऐसी लड़की से कर दी कि मेरी ज़िंदगी एक नाक़ाबिले-बर्दाश्त अज़ाब बन गई. पूरे एक साल तक मुझे नींद न आई. उम्र भर मैं इस मुसीबत को भूल नहीं सका. आज तक मैं इस बात के लिए तरस गया कि मैं किसी को अपना कहूं ओर कोई मुझे अपना समझे.

फ़िराक़ के इश्क़ और मोहब्बत के चर्चे आम रहे. वह इस क़िस्म की शौहरत चाहते भी थे. कभी-कभी ख़ुद भी क़िस्सा बना लिया करते थे, ताकि ज़माना उन्हें एक आदर्श आशिक़ समझे. वह ख़ुद लिखते हैं-इन तकली़फ़देह और दुख भरे हालात में मैंने शायरी की ओर आहिस्ता-आहिस्ता अपनी आवाज़ को पाने लगा. अब जब शायरी शुरू की तो मेरी कोशिश यह हुई कि अपनी नाकामियों और आने ज़ख्मी ख़ुलूस के लिए अशआर के मरहम तैयार करूं. मेरी ज़िंदगी जितनी तल्ख़ हो चुकी थी, उतने ही पुरसुकून और हयात अफ़ज़ा अशआर कहना चाहता था. फ़िराक़ का ख़्याल है कि इस उलझन, द्वंद्व और टकराव से बाहर निकलने में सिर्फ़ एक भावना काम करती है और वह है इश्क़.

इश्क़ अपनी राह ले तो दिल क्या पूरी दुनिया जीत सकता है, बस इन दर्जों और हालात के ज्ञान की ज़रूरत हुआ करती है. फ़िराक़ का इश्क़, इस दर्जे का इश्क़ न सही जहां ख़ुदा और बंदे का फ़र्क़ उठ जाया करता है. फ़िराक़ का वह रास्ता न था. वह भक्ति और ईश्वर प्रेम की दुनिया के आदमी न थे. वह शमा में जलकर भस्म हो जाने पर यक़ीन भी नहीं रखते थे, बल्कि वह उस दुनिया के आशिक़ थे, जहां इंसान बसते हैं और उनका ख़्याल है कि इंसान का इंसान से इश्क़ ज़िंदगी और दुनिया से इश्क़ की बुनियाद जिंस (शारीरिक संबंध) है. किसी से जुनून की हद तक प्यार, ऐसा प्यार जो हड्डी तक को पिघला दे, जो दिलो-दिमाग़ में सितारों की चमक, जलन और पिघलन भर दे. फिर कोई भी फ़लसफ़ा हो, फ़लसफ़ा-ए-इश्क़ से आगे उसकी चमक हल्की रहती है. हर फ़लसफ़ा इसी परिपेक्ष्य, इसी पृष्ठभूमि को तलाश करता रहता है. फ़िराक़ ने जब होश व हवास की आंखें खोलीं दाग़ और अमीर मीनाई का चिराग़ गुल हो रहा था. स़िर्फ उर्दू शायरी में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक नई बिसात बिछ रही थी. क़ौमी ज़िंदगी एक नए रंग रूप से दो चार थी. समाजवाद का बोलबाला था. वह समाजवाद से प्रभावित हुए. प्रगतिशील आंदोलन से जु़डे. वह स्वीकार करते हैं इश्तेराकी फ़लसफ़े ने मेरे इश्क़िया शायरी और मेरी इश्क़िया शायरी को नई वुस्अतें (विस्तार) और नई मानवियत (अर्थ) अता की.
अब उनकी शायरी में बदलाव देखने को मिला. बानगी देखिए-

तेरा फ़िराक़ तो उस दम तेरा फ़िराक़ हुआ
जब उनको प्यार किया मैंने जिनसे प्यार नहीं

फ़िराक़ एक हुए जाते हैं ज़मानों मकां
तलाशे दोस्त में मैं भी कहां निकल आया

तुझी से रौनक़े-बज़्मे-हयात है ऐ दोस्त
तुझी से अंजुमने-महर व माह है रौशन

ज़िदगी को भी मुंह दिखाना है
रो चुके तेरे बेक़रार बहुत

हासिले हुस्नो-इश्क़ बस है यही
आदमी आदमी को पहचाने

इस दश्त को नग़मों से गुलज़ार बना जाएं
जिस राह से हम गुज़रें कुछ फूल खिला जाएं

अजब क्या कुछ दिनों के बाद ये दुनिया भी दुनिया हो
ये क्या कम है मुहब्बत को मुहब्बत कर दिया मैंने

क्या है सैर गहे ज़िंदगी में रुख़ जिस सिम्त
तेरे ख़्याल टकरा के रह गया हूं मैं

फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे- शायरी उस हैजान (अशांति) का नाम है, जिसमें सुकून के सिफ़ात (विशेषता) पाए जाएं. सुकून से उनका मतलब रक़्स की हरकतों में संगीत के उतार-च़ढाव से है.उनके कुछ अशआर देखिए-
रफ़्ता-रफ़्ता इश्क़ मानूसे-जहां होता गया
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम

मेहरबानी को मुहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह अब मुझसे तेरी रंजिशें बेजा भी नहीं

बहुत दिनों में मुहब्बत को यह हुआ मालूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वह रात, रात हुई

इश्क़ की आग है वह आतिशे-सोज़ फ़िराक़
कि जला भी न सकूं और बुझा भी न सकूं

मुहब्बत ही नहीं जिसमें वह क्या दरसे-अमल देगा
मुहब्बत तर्क कर देना भी आशिक़ ही को आता है

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

तेरी निगाहों से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया है रगे जां में नश्तर फिर भी

फ़िराक़ गोरखपुरी का देहांत 3 मार्च, 1982 को नई दिल्ली में हुआ. बेशक वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने जनमानस को अपनी शायरी के ज़रिये ज़िंदगी की दुश्वारियों में भी मुस्कुराते रहने का जो पैग़ाम दिया, वह हमेशा मायूस लोगों की रहनुमाई करता रहेगा. बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी-
अब तुमसे रुख़्सत होता हू, आओ संभालो साज़े-ग़ज़ल
नये तराने छेड़ो, मेरे नग़मों को नींद आती है...
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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दुनियावी रिश्ते


दुनियावी रिश्ते शर्तों पर ही हुआ करते हैं, ख़ासकर शादी का रिश्ता...
शौहर कमाकर लाता है, बीवी को घर, कपड़े, खाना और उसकी ज़रूरत की हर चीज़ उसे मुहैया कराता है... बीवी घर का कामकाज करती है, शौहर की ख़िदमत करती है... दोनों एक-दूसरे की ज़रूरतें पूरी करते हैं... शादी का रिश्ता ही एक-दूसरे की ज़रूरत पूरी करने का रिश्ता है... जहां एक ने भी दूसरे की ज़रूरत पूरी करने से इंकार किया, रिश्ता टूटने लगता है, बिखरने लगता है और अकसर रिश्ता ख़त्म ही हो जाता है... जो ख़त्म नहीं हो पाता, वो पल-पल सिसकता रहता है...

कोरे आदर्शवादी चाहें, तो इसे झुठला सकते हैं... मगर हक़ीक़त यही है...

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इश्क़ का रंग

मेरे महबूब !
होली
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इन्द्रधनुषी रंगों में
तुम्हारे इश्क़ का रंग भी शामिल है...
-फ़िरदौस ख़ान
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टेडी बियर

ज़िन्दगी में ऐसे मुक़ाम भी आया करते हैं, जब इंसान बहुत अकेला होता है... इतना अकेला कि उसे दूर-दूर तक कोई ऐसा दिखाई नहीं देता, जिससे पल दो पल वो अपने दिल की बात कर सके, जिसे बता सके कि वो कितना अकेला है... उसके पास कोई ऐसा नहीं होता, जिसे वो अपना कह सके... ऐसी हालत में कई बेजान चीज़ें अकेलेपन का सहारा बन जाया करती हैं, भले ही वह टेडी बियर जैसा कोई खिलौना ही क्यों न हो...

बहुत साल पहले की बात है. हमारे छोटे भाई ने हमारी सालगिरह पर तोहफ़े में हमें एक टेडी बियर दिया... हमें वह बहुत अच्छा लगा... हालत ये थी कि हम उसे बैग में रखते... यानी हम जिस शहर भी जाते, वह टेडी बियर हमारे साथ जाता...

जब घर से दूर होते, अकेले होते, उदास होते, तो वह टेडी बियर हमारा साथी होता... अम्मी ने कहा कि ये क्या बचपना है... हमने उसे अपनी अलमारी में रख दिया... जब मालूम हुआ कि आज टेडी डे है, तो न जाने क्यों उस टेडी बियर की बहुत याद आ रही है... वह बियर हमसे दूर है... इंशा अल्लाह इस बार उसे साथ लेकर आएंगे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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तुम्हारे नाम की आंच

मेरे महबूब !
तुम्हारे नाम की आंच ने
मुझे आ घेरा है
जब से
क़ुदरत ने
मौसम में बर्फ़ घोली है...
-फ़िरदौस ख़ान
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तुम हो जाऊं...

मेरे महबूब !
मैं
मैं न रहूं
तुम हो जाऊं...
-फ़िरदौस ख़ान
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गुनगुनी धूप

मेरे महबूब !
जाड़ो की
ख़ुनकी में
गुनगुनी धूप का
अहसास हो तुम...
-फ़िरदौस ख़ान

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नारी की नारी की संपूर्णता और प्रेम...

फ़िरदौस ख़ान
समय बदला, हालात बदले लेकिन नहीं बदली तो नारी की नियति. नारी सदैव प्रेम के नाम पर छली गई. उसने पुरुष से प्रेम किया, मन से, विचारों से और तन से. मगर बदले में उसे क्या मिला धोखा और स़िर्फ धोखा. पुरुष शायद प्रेम के महत्व को जानता ही नहीं, तभी तो वह नारी के साथ प्रेम में रहकर भी प्रेम से वंचित रह जाता है, जबकि नारी प्रेम में पूर्णता प्राप्त कर लेती है. राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. प्रतिभा रॉय की पुस्तक महामोह अहल्या की जीवनी में नारी जीवन के संघर्ष की इसी कथा-व्यथा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है. डॉ. प्रतिभा रॉय कहती हैं कि अहल्या एक पात्र नहीं, एक प्रतीक है. जब प्रतीक व्याख्यायित होता है, तब एक पात्र बन जाता है. जब पात्र विमोचित होता है, तब दिखने लगता है प्रतीक में छिपा अंतर्निहित तत्व. अहल्या सौंदर्य का प्रतीक है, इंद्र भोग का, गौतम अहं का प्रतीक है, तो राम त्याग एवं भाव का प्रतीक है. महामोह की अहल्या वैदिक नहीं है, पौराणिक नहीं है, ब्रह्मा की मानसपुत्री नहीं है, वह ईश्वर की कलाकृति हैं, चिरंतन मानवी हैं. वैदिक से लेकर अनंतकाल तक है उनकी यात्रा. वे अतीत में थीं, वर्तमान में हैं, भविष्य में रहेंगी. मोक्ष अहल्या की नियति नहीं, संघर्ष ही है उनकी नियति. अहल्या के माथे से कलंक का टीका नहीं मिटता. अत: अहल्या देवी नहीं है, अहल्या है मानवीय क्रांति. अहल्या का संघर्ष केवल नारी का संघर्ष नहीं है, न्याय के अधिकार के लिए मनुष्य का संघर्ष है.
अहल्या अपने द्वार पर आए इंद्र से पूछती है-क्या वरदान चाहिए प्रभु?
मैं हाथ जो़डे ख़डी थी. अपने मनोरम हाथ ब़ढाकर उन्होंने मेरी हथेली को स्पर्थ किया. स्पर्श के अहसास से ज़ड में भी जान आ जाती है. यह कैसा मधुकंपन होने लगा मेरे भीतर? अनुभूत सुख ढूंढते-ढूंढते मानो मैं परमानंद प्राप्त करने का जा रही थी. अपने हाथ का स्पर्श देने से अधिक भला मैं और क्या कर सकती थी? एक स्पर्श में ही अथाह शक्ति होती है? मेरा लौहबंधन तार-तार हो गया स्पर्श की शक्ति से. महाकाल के वक्ष पर वे अभिलाषा पूर्ण घ़िडयां थीं नि:शर्त. वहां लाभ-हानि, यश-अपयश, अतीत-भविष्य, स्वर्ग-नर्क, वरदान-अभिशाप का द्वंद्व नहीं था, जबकि प्रतिश्रुति, वरदान और प्रतिदान की कठोर शय्या पर पैर रखकर उतर आई थीं वे घ़िडयां देह से मनोभूमि में.
मुझे यह अनुभूति हुई कि सारी सीमाएं अनुशासित होते हुए भी मेरे भीतर ऐसा कोई नहीं था, जिसने मुझे अगम्य स्थान की ओर उ़ड जाने को प्रेरित किया. उस शक्ति ने सारे बंधन और बेडियां तो़ड डालीं. बे़डियां तो़डना मनुष्य का सहज स्वभाव है. रिश्ते जब बे़डियां बन जाते हैं, तभी वे रिश्ते टूटते हैं, बंधन टूटते हैं. बंधन टूटने के विषाद और मुक्ति के उद्‌घोष एवं विषाद-प्रफुल्लित भावावेग से वे घ़िडयां थीं मधुर पी़डादायी. वह घ़डी, निष्कपट समर्पण की घ़डी है. स्वयं को दूसरे के लिए उ़डेल देने की घ़डी. वह घ़डी थी प्रेम की घ़डी, जिस प्रेम मंं दूसरा पक्ष नहीं होता. लेन-देन का हिसाब नहीं होता. उस घ़डी का आकर्षण दुर्दम्य होता है कि वहां पाम-पुण्य, नीति-नियम अंधे और बहरे हो जाते हैं. उस घ़डी मेरे भीतर छल-कपट नहीं था. वह घ़डी निष्कपट, विशुद्ध प्रेम की घ़डी थी. उस समय मैं विभाजित नहीं थी. पूरी की पूरी इंद्र की थी. वह घ़डी भ्रांति की घ़डी नहीं थी, क्रांति की घ़डी थी. उस घ़डी ने प्रलय को स्तब्ध कर दिया था.
मैं नहीं जानती, प्रेम की वह घ़डी इंद्र के लिए नि:शर्त और निष्कपट थी या नहीं, किंतु नारी के लिए प्रेम नि:शर्त होता है. देह भोग की वासना उस प्रेम की शर्त नहीं होती, किंतु क्या पुरुष के लिए देह भोग प्रेम की शर्त है? अत: प्रेम की उपलब्धि से इंद्र की अपूर्णता पूर्ण हुई या नहीं, मैं नहीं जानती. किंतु मैं पूर्ण, परिपूर्ण हो गई थी. मैं इंद्रलुब्धा नहीं थी-मैं थी इंद्रमुग्धा. मैं इंद्र से होकर उत्तरण के सोपानों पर च़ढती जा रही थी, पृथ्वी की अतल में, आकाश से होते हुए आकाश से भी ऊंची. इंद्रिय आनंद से इंद्रानंद में-परमानंद की उपलब्धि में. इंद्रानंद सोमरस पान की तरह अपार्थिव है.
आत्म मुक्ति या जगत की मुक्ति? इस प्रश्न का उत्तर इंद्र पा चुके थे. आत्म मुक्ति के द्वार पर इंद्र सदैव बाधा उत्पन्न करते हैं. क्या गौतम के यक्ष का लक्ष्य आत्म मुक्ति था? अपरिपक्व, ज्ञान, साधना और अनुभूति के बिना उत्तरण, मुक्ति और अमरत्व की कामना करना विडंबना है. देवतागण मनुष्य की इस बुरी आकांक्षा का विरोध करते हैं. संभवत: इसलिए इंद्र ने गौतम का विरोध किया और मुझे प्रदान की सत्य की अंतरंग अनुभूतियां. स्वाहा है यक्ष की आत्मा. यक्ष के मंत्र का अंतिम और श्रेष्ठ भाग है स्वाहा. सु-आहुति स्वाहा का श्रेष्ठ गुण है. मैंने इंद्रदेव के लिए स्वयं को स्वाहा कर दिया. मेरी मिथ्या देह है सत्य की सिद्धिभूमि. मैं थी कन्या, पत्नी, गृहिणी, किंतु मैं नारी नहीं बन पाई थी. इंद्र के स्पर्श से मैं नारी बन गई. मैं पूर्ण हो गई. पूर्ण से पूर्ण निकालने की शक्ति भला किसमें है? यदि किसी में हुई तो पूर्ण से पूर्ण निकल जाने पर भी मैं पूर्ण ही रहूंगी.
हे, इंद्रदेव! मैं कृतज्ञ हूं. आपने मुझे पूर्णता का अहसास कराया. आपने मेरे ज़ड बन चुके नारीत्व में फिर से प्राण फूंक दिए.
मैंने इंद्रदेव को प्रणाम किया. प्रभात हो चला था. क्या पक्षियों ने रात का महाप्रलय का सामना नहीं किया? उनके कलरव में कहीं कोई अस्वाभाविकता नहीं थी. इंद्रदेव प्रस्थान करने को उतावले थे. विदा की घ़डी आ गई. इंद्रदेव निर्लिप्त-निराकार थे. किंतु वे तृप्त थे, यह स्वीकारने में उनमें कोई झिझक नहीं थी.
अहल्या, मैं तृप्त हुआ. तुम्हारा दान अतुलनीय है. प्रेम की चिर-आराध्या देवी बनकर तुम मेरी अंतरवेदी में सदैव पूजी जाओगी. आज के इस देह-संगम की स्मृतियां, तुम्हारी देह की सारी सुरभित सुगंध मेरी देह की समस्त ग्रंथियों में सदा भाव-तरंग बनाते रहेंगे. तुम्हारे पति के पदचाप सुनाई देने लगे हैं. मैं तुम्हारा मुक्तिदाता नहीं, मैं तुम्हारा भाग्य और नियति नहीं. मैं तुम्हारी परीक्षा भी नहीं. तुम स्वयं ही अपनी परीक्षा, भाग्य और नियति हो. साधना का द्वार अब तुम्हारे लिए खुल चुका है. मुझे विदा दो और अपनी रक्षा करो.
इंद्र के विदा होते समय मुझे ठेस नहीं पहुंच रही थी, क्योंकि मैं जानती थी, मैं मर्त्य की नारी हूं. इंद्र मेरे भाग्यविधाता नहीं बन सकते. यह विदाई तय थी. किंतु मुझे ऐसी अवस्था में छो़डकर, गौतम के पहुंचने से पहले किसी लम्पट पुरुष की तरह जल्दी-जल्दी वहां से भागने लगना मुझे बहुत कष्ट दे रहा था. तो क्या इंद्र भाव के सम्राट नहीं हैं, क्या वे भोग-लम्पट हैं, एक सामान्य पुरुष? क्या मेरे क्षणभंगुर सुंदर देहभूमि पर विजय पताका फहराकर गौतम को नीचा दिखाना था इस प्रेम का लक्ष्य? तब तो यह प्रेम नहीं था, एक भ्रांति थी. क्या मैं इंद्रयोग्या नहीं थी, इंद्रभोग्या थी? यह सोचकर दुख और आत्मग्लानि से उदास हो उठी. इंद्र ने गर्व के साथ गौतम का सामना किया होता तो मैं इंद्र को परम प्रेमी के स्थान पर रखकर बाक़ी का जीवन पूर्णता से रंग लेती. प्रेम निर्भीक होता है, प्रेम निरहंकार होता है, प्रेम नि:स्वार्थ होता है, जबकि एक कामुक पुरुष की तरह अपने स्वार्थ को ब़डा करके ऋषि के कोप के भय से मुझे असहाय अवस्था में छोड कर वहां से खिसक लेने के कारण मेरे सच्चे अहसास पर एक काली रेखा खींच दी उन्होंने. यह प्रेम है या भ्रम, पाप है या पुण्य? उचित है या अनुचित?
किंतु मैंने जो कुछ किया, जान-बूझकर किया. जब आत्मा प्रेम के लिए समर्पित हो जाती है, तब देह अपनी सत्ता खो देती है और आत्मा के साथ देह भी समर्पित हो जाती है. इसलिए उस क्षण मुझमें ग्लानि या पापबोध नहीं हुआ. मिलन के सुख और विरह के दुख दोनों से मेरा नारीत्व आज परिपूर्ण था.
बहरहाल, यह किताब बेहद रोचक है. लेकिन संस्कृतनिष्ठ हिंदी होने के कारण पाठकों को कुछ शब्दों को समझने में द़िक्क़त पेश आ सकती है. अगर भाषा थो़डी सरल होती तो सोने पे सुहागा होता.

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