जो दूसरों के लिए जीते हैं


कुछ लोग ऐसे हुआ करते हैं, जो अपने दुख-सुख की परवाह किए बग़ैर दूसरों के लिए जीते हैं, उनके दुख-सुख में शामिल होते हैं... ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं जो सिर्फ़ अपने लिए ही जीते हैं, उनके लिए सिर्फ़ अपने दुख-सुख ही मायने रखते हैं... वो हर वक़्त सिर्फ़ अपने दुखों की ही बात करते हैं...
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सच क्या है


सच क्या है... सच की तलाश में उम्र बीत जाया करती है... सच को जान लेना कोई आसान काम नहीं है... सबके अपने-अपने सच हुआ करते हैं... जैसे आज का दिन किसी शख़्स की ज़िन्दगी का अब तक का सबसे ख़ूबसूरत दिन है... ये उसका सच है... और आज ही का दिन किसी दूसरे शख़्स की ज़िन्दगी का अब तक का सबसे तकलीफ़देह दिन है... ये उसका सच है... इसलिए सबको अपने-अपने सच के साथ जीने का पूरा हक़ है...
हम जो जीते हैं, महसूस करते हैं, वही लिखते हैं... हम नहीं कहते कि आप इसे universal truth यानी सार्वभौमिक सच मानें...
बेहतर यही है कि आप अपने सच के साथ जियें और दूसरों को उनके सच के साथ जीने दें...

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जब हरि था तो मैं नहीं अब हरि है मैं नाहि


इंसान में जब तक अहंकार है, ’मैं’ है, वो ख़ुदा को क्या, किसी अच्छे इंसान तक को मुतासिर नहीं कर पाएगा...
मैं यानी मेरा मज़हब सबसे बड़ा, मेरी ज़ात सबसे ऊंची, मैं ही सच्चा, मैं ही सबसे अच्छा, मैं ही सही... यानी जब तक मैं-मैं की रट लगी रहती है, तब तक इंसान न कुछ देख पाता है, न सुन पाता है और न ही समझ पाता है... उसकी अक़्ल पर अहंकार की धूल जमी रहती है...
जिस दिन इंसान ने ’मैं’ यानी अपने अहंकार का त्याग कर दिया, तभी वह सही मायने में इंसान कहलाने लायक़ है...
कबीर चचा कह गए हैं-
जब हरि था तो मैं नहीं अब हरि है मैं नाहि
प्रेम गलि अति सांकरी ता में दो न समाये

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जादूगरनियां


क़िस्से-कहानियों में सुना है कि बंगाल में जादूगरनियां रहा करती हैं... उन्हें कोई परदेसी भा जाता है, तो उसे अपने पास क़ैद कर लेती हैं... इसलिए पहले ज़माने में जब कोई मर्द बंगाल जाता था, तो उसकी महबूबा ये सोच-सोचकर हल्कान हो जाती थे कि कहीं कोई जादूगरनी उसके पिया को क़ैद न कर ले...
न जाने क्यूं आज बंगाल की जादूगरनियों की बहुत-सी कहानियां याद आ गईं...


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मेरे ख़ुदा


मेरे ख़ुदा
मेरे प्यारे ख़ुदा
मेरे महबूब के ख़ुदा
मैं तुझ पर क्यों न क़ुर्बान जाऊं
तू उनका ख़ुदा है
जिनके नाम का मैं कलमा पढ़ती हूं
तू मेरा भी तो ख़ुदा है
मेरे महबूब के प्यारे ख़ुदा...
-फ़िरदौस ख़ान
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मुहब्बत का नाम


इंसान के कई नाम हुआ करते हैं... कुछ नाम आम होते हैं और कुछ पोशीदा होते हैं... मसलन वो नाम जो किसी इंसान की पैदाइश पर रखा जाता है... ये वो नाम हुआ करता है, जो उसके दस्तावेज़ों में दर्ज होता है... इसे असली नाम कहा जाता है... एक घर का नाम हुआ करता है, जिस नाम से घर के फ़र्द और बाहर के लोग पुकारते हैं... ये दोनों ही आम नाम हुआ करते हैं...
एक नाम ऐसा भी हुआ करता है, जो सबसे प्यारा होता है... ये वो नाम हुआ करता है, जिस नाम से महबूब मुख़ातिब होता है... ये नाम पोशीदा रहता है, जो एक कहता है और दूसरा सुनता है...
सच कितना प्यारा होता है, ये मुहब्बत का ये नाम... 
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ठहराव


ठहराव शायद कभी भी अच्छा नहीं होता... ठहराव बुरा हो, तो तकलीफ़ देता है... और अगर अच्छा हो, तो भी उससे कोफ़्त होने लगती है... शायद इसीलिए क़ुदरत की हर चीज़ में रवानी है... वक़्त का दरिया भी मुसलसल बहता रहता है और ज़िन्दगी भी तो चलते रहने का ही नाम है...
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ईस्टर संडे


ये त्यौहार ही तो हुआ करते हैं, जब लोग इकट्ठे होते हैं... एक-दूजे से मिलते हैं... कुछ अपनी कहते हैं, कुछ अपनी सुनाते हैं...
हमारी कई सहेलियां हैं, जो विदेशों में रहती हैं... त्यौहार के मौक़े पर वे अपने मायके आती हैं और उनसे मुलाक़ात हो जाती है... ये त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखते हैं, बहुत-सी यादें ताज़ा हो जाती हैं... कल कई सहेलियों से मुलाक़ात हुई... वाक़ई कल का दिन बहुत प्यारा था, एक यादगार दिन था...

कल ईस्टर संडे था... ईस्टर संडे, गुड फ़्राइडे के बाद आने वाले इतवार को मनाया जाता है... ईसाई मान्यता के मुताबिक़ सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद तीसरे दिन यीशु (ईसा मसीह) दोबारा ज़िन्दा हो गए थे... ईस्टर ख़ुशी का दिन होता है... इस त्यौहार को ज़िन्दगी में नये बदलाव के प्रतीक के तौर पर मनाए जाने की रिवायत है. यीशु के चाहने वाले गिरजाघर जाते हैं, अपने ईष्ट को याद करते हैं, प्रभु भोज में शामिल होते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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गुड फ़्राइडे


आज गुड फ़्राइडे है... गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे या ग्रेट फ्राइडे भी कहा जाता है... आज के दिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को सलीब पर चढ़ाया गया था...
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आज भी हयात हैं और क़यामत से पहले लोगों के सामने आएंगे...
किताबों के मुताबिक़ एक दिन सुबह की नमाज़ के वक़्त और एक रिवायत के मुताबिक़ अस्र की नमाज़ के वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम दो फ़रिश्तों के कांधों पर हाथ रखे हुए दमिश्क की जामा मस्जिद के शरक़ी मीनार पर नुज़ूल फ़रमाएंगे. हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम उनका इस्तक़बाल करेंगे कि आप नमाज़ पढ़ाइये. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहेंगे कि यह मुमकिन नहीं है, आप ही नमाज़ पढ़ाइये. लिहाज़ा इमाम महदी अलैहिस्सलाम इमामत फ़रमाएंगे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम उनके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे और उनकी तस्दीक़ करेंगे.
(नूर उल अबसार सफ़ा न.154 व ग़ायत उल मक़सूद सफ़ा न. 104से 154 व मिशकात सफ़ा न. 458)
उस वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की उम्र चालीस साल के जवान जैसी होगी और आप इस दुनिया में शादी करेंगे और उनके दो लड़के पैदा होंगे, एक नाम अहमद और दूसरे का नाम मूसा होगा.


(औसाफ़ उर राग़ेबीन व क़ियामत नामा सफ़ा न. 9 व सिराज उल क़ुलूब सफ़ा न. 77)
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मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...

गरमी से बेहाल
प्यासी चिड़ियों के लिए
घने दरख्तों की शाख़ों पर
ठंडे पानी से भरे
मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...
किसी न ख़त्म होने वाले
सवाब की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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