उस लड़के का मिलना...




बात बचपन की है...उस वक़्त हमारी उम्र सात साल के आसपास रही होगी...गर्मियों की छुट्टियों में पूरा परिवार उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में गया था...हम सब बच्चे सुबह के क़रीब दस बजे आम के बाग़ में चले गए...खेल-खेल में हम बाग़ के क़रीब बने तालाब का पास पहुंच गए...पानी में उतरने का मन हुआ...तालाब कच्चा था...टांगें मिट्टी में धंस गईं...हम रोने लगे...तभी हमने देखा कि एक लड़का दौड़ता हुआ हमारे पास आया और उसने हमें पानी से बाहर निकाला...हम ज़ार-ज़ार रो रहे थे...उसने हमें चुप कराया...हमें डर लग रहा था कि घर पर डांट पड़ेगी...हालांकि कभी डांट नहीं पड़ती थी, लेकिन डर तो लगता ही था... हमारी गहरे आसमानी रंग की फ्राक कमर तक भीग गई थी...और कपड़ों पर मिट्टी भी लगी थी...उस लड़के ने अपनी हथेलियों में पानी भर-भरकर हमारी फ्राक धोई...अब फ्राक पूरी तरह साफ़ हो चुकी थी...
अब हम चहक रहे थे... हम दौड़कर अपने साथ खेल रहे बच्चों के पास गए...इस दौरान हमने कई बार पीछे मुड़कर देखा...वो लड़का वहीं तालाब के किनारे खड़ा हमें देख रहा था...

बचपन के इस वाक़िये को हम कभी नहीं भूल पाए...कहते हैं कि इंसान ज़िन्दगी में दो चीज़ें कभी नहीं भूलता...एक ख़ुशी देने वाली बात और दूसरी तकलीफ़ देने वाला हादसा...लेकिन यादों के संदूक़ में हम सिर्फ़ सुकून देने वाले लम्हों को ही सहेजकर रखते हैं...इसलिए तकलीफ़ देने वाली बातें कुछ वक़्त बात बेमानी हो जाती हैं...

कुछ वक़्त पहले हमें पता चला कि वो लड़का मुल्क की एक बहुत बड़ी हस्ती है...कई बार उससे मिलना हुआ... उसने बताया कि हमें तालाब से बाहर उसी ने निकाला था...वह अपने पापा के साथ वहां आया हुआ था...
उसने यह भी कहा कि जबसे उसने हमें गहरे आसमानी रंग की फ्राक में देखा था, तबसे उसे आसमान ज़्यादा ख़ूबसूरत लगने लगा था...

अजीब इत्तेफ़ाक़ है...हमें गहरा आसमानी रंग बहुत पसंद है...हमेशा हमारे पास गहरे आसमानी रंग के लिबास रहते हैं...बचपन में पापा गहरे आसमानी रंग की कई-कई फ्राकें दिलाकर लाते थे...स्कूल में इसी रंग की वर्दी थी...आधा दिन गहरे आसमानी रंग की वर्दी पहनने के बावजूद हम घर में भी इसी शोख़ रंग का लिबास पहनते थे... कुछ रोज़ पहले हमारे एक पाकिस्तानी दोस्त, जो हमारे रिश्तेदार भी हैं, जब जापान गए तो वहां से हमारे लिए गहरे आसमानी रंग का लिबास लेकर आए... गहरे आसमानी रंग की ज़मीन पर रंग-बिरंगे फूल...
ज़िन्दगी में बहुत-कुछ ऐसा भी होता है, जो किसी परी कथा सा लगता है... बचपन में उस लड़के का मिलना, हमारी मदद करना और फिर उम्र के इस मोड़ पर मिलना...सच कितना भला लगता है...वाक़ई ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...
-फ़िरदौस ख़ान
 

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एक तस्वीर...


कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे... उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता... फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...
हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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नज़्म और शदीद मुहब्बत


यूं तो हर शायरा को अपनी हर नज़्म अज़ीज़ हुआ करती है, लेकिन कुछ कलाम ऐसे होते हैं, जिनसे कुछ ज़्यादा ही उन्सियत होती है... हमें भी अपनी एक नज़्म बहुत पसंद है... इसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है... शायद इसलिए कि इसमें अपने महबूब के लिए शदीद मुहब्बत का इज़हार किया गया है... ये नज़्म हमने उनके लिए लिखी थी, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं...

मेरे महबूब...
नज़्म
मेरे महबूब !
उम्र की
तपती दोपहरी में
घने दरख़्त की
छांव हो तुम
सुलगती हुई
शब की तन्हाई में
दूधिया चांदनी की
ठंडक हो तुम
ज़िन्दगी के
बंजर सहरा में
आबे-ज़मज़म का
बहता दरिया हो तुम
मैं
सदियों की
प्यासी धरती हूं
बरसता-भीगता
सावन हो तुम
मुझ जोगन के
मन-मंदिर में बसी
मूरत हो तुम
मेरे महबूब
मेरे ताबिन्दा ख़्यालों में
कभी देखो
सरापा अपना
मैंने
दुनिया से छुपकर
बरसों
तुम्हारी परस्तिश की है...
-फ़िरदौस ख़ान
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इतवार...


आज इतवार है... हमेशा की तरह आज भी तुम चर्च गए होंगे... फ़र्क़ बस इतना है कि आज हम तुम्हारे साथ नहीं हैं... आज ही क्या... न जाने कितने अरसे से हम एक साथ चर्च नहीं गए...
तुम्हें मालूम है... हर इतवार को वही बीता हुआ इतवार सामने आकर खड़ा हो जाता है... वही सर्दियों वाला इतवार... जब फ़िज़ा में ठंडक घुल चुकी थी... सुबहें और शामें कोहरे से ढकी हुई थीं... गुनगुनी धूप भी कितनी सुहानी लगती थी... ज़र्द पत्ते अपनी शाख़ों से जुदा होकर गिर रहे थे... चर्च के सामने वाली सड़क पर सूखे पत्तों का ढेर लग जाता था... चर्च की क्यारियों में कितने रंग-बिरंगे फूल अपनी शाख़ों पर इठलाते थे... माहौल में गुलाब की भीनी-भीनी महक होती थी...
तुम्हें याद है, जब ठंडी हवाएं चल रही थीं, तब तुमने अपना गर्म कोट उतार कर हमें पहना दिया था... बिना यह परवाह किए कि तुम्हें भी उस कोट की उतनी ही ज़रूरत थी... हमारे कोट लेने से मना करने पर तुमने मुस्कराते हुए कहा था- मर्दों को उतनी ठंड नहीं लगती... सच, उस कोट में हमने जो गर्मी महसूस की, उसमें तुम्हारी मुहब्बत की शिद्दत भी शामिल थी... कितने बरस बीत गए... जाड़ो के कई मौसम गुज़र गए... लेकिन उस कोट की गरमाहट हमारी रूह में अब तक बसी हुई है...
आज भी चर्च देखते हैं, तो तुम बहुत याद आते हो... और यह इतवार... भी उसी इतवार में जा बसा है, या यूं कहें कि वो इतवार अब हर इतवार में शामिल रहता है...
सुनो, हमें फिर से तुम्हारे साथ उसी इतवार को जीना है...

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सुर्ख़ फूल पलाश के...


फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं.
पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है. एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं.

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है.  इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है.

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं.
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.

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ज़िन्दगी के रंग समेटे एक कविता संग्रह

फ़िरदौस ख़ान
कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को बहुत ज़रूरी माना जाता था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से आज़ाद हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का दौर शुरू हुआ. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. आज मुक्त छंद कविताओं की नदियां बह रही हैं. मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मन में हिलोरें लेने वाले जज़्बात, उसके ज़ेहन में उठने वाले ख़्याल और अनुभव प्रभावी हो गए और छंद लुप्त हो गए. मगर इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को इनसे बांधे रखती है. शौकत हुसैन मंसूरी की ऐसी ही कविताओं का एक संग्रह है-‘कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का’. इसे राजस्थान के उदयपुर के अंकुर प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.  इस कविता संग्रह में एक गीत और कुछ क्षणिकाएं भी हैं. 

बक़ौल शौकत हुसैन मंसूरी हृदय में यदि कोई तीक्ष्ण हूक उठती है.एक अनाम-सी व्यग्रता सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर छाई रहती है और कुछ कर गुज़रने की उत्कट भावना हमारी आत्मा को झिंझोड़ती रहती है. ऐसी परिस्थिति में, कितना ही दीर्घ समय का अंतराल हमारी रचनाशीलता में पसर गया हो, तब भी अवसर मिलते ही, हृदय में एकत्रित समस्त भावनाएं, विचार और संवेदनाएं अपनी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त होती ही हैं. सिर्फ़ ज्वलंत अग्नि पर जमी हुई राख को हटाने मात्र का अवसर चाहिए होता है. तदुपरांत प्रसव पीड़ा के पश्चात जो अभिव्यक्ति का जन्म होता है. वह सृजनात्मक एवं गहन अनुभूति का सुखद चरमोत्कर्ष होता है. यह काव्य संग्रह ऐसी ही प्रसव पीड़ा के पश्चात जन्मा हुआ अभिव्यक्ति का संग्रह है. 

उनकी कविताओं में ज़िंदगी के बहुत से रंग हैं. अपनी कविता ‘आत्महन्ता’ में जीवन के संघर्ष को बयां करते हुए वे कहते हैं-
विपत्तियां क्या हैं
रहती हैं आती-जातीं
सारा जीवन ही यूं
भरा होता है संघर्षों से...

बदलते वक़्त के साथ रिश्ते-नाते भी बदल रहे हैं. इन रिश्तों को कवि ने कुछ इस अंदाज़ में पेश किया है-
रिश्तों की अपनी-अपनी
होती है दुनिया
कुछ रिश्ते होते हैं दिल के
क़रीब और कुछ सिर्फ़
होते हैं निबाहने की ख़ातिर...
कविताओं में मौसम से रंग न हों, ऐसा भला कहीं होता है. दिलकश मौसम में ही कविताएं परवान चढ़ती हैं. कवि ने फागुन के ख़ुशनुमा रंग बिखेरते हुए कहा है-
खिल गए हैं फूल सरसों के
पड़ गया है दूध
गेहूं की बाली में
लगे बौराने आम
खट्टी-मीठी महक से बौरा गए वन-उपवन

कवि ने समाज में फैली बुराइयों पर भी कड़ा प्रहार किया है, वह चाहे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध हों, भ्रष्टाचार हो, सांप्रदायिकता का ज़हर हो, भीड़ द्वारा किसी को भी घेरकर उनका सरेआम बेरहमी से क़त्ल कर देना हो, रूढ़ियों में जकड़ी ज़िदगियां हों, या फिर दरकती मानवीय संवेदनाएं हों. सभी पर कवि ने चिंतन किया है. इतना ही नहीं, कवि ने  निराशा के इस घने अंधकार में भी आस का एक नन्हा दीया जलाकर रखा है. कवि का कहना है-
ज़िन्दगी में फैले अंधेरे को
मिटाने का आत्म विश्वास इंसानों को
स्वयं पैदा करना होता है     

बहरहाल, भावनाओं के अलावा काव्य सृजन के मामले में भी कविताएं उत्कृष्ट हैं. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीक़े से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण सूफ़ियाना है, जो इसे आकर्षक बनाता है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का
कवि : शौकत हुसैन मंसूरी
प्रकाशक : अंकुर प्रकाशन, उदयपुर (राजस्थान)
पेज : 112
मूल्य : 150 रुपये

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साल का आख़िरी दिन

हमारे लिए आज का दिन बेहद ख़ास होता है... सुबह से पहले तारों भरे आसमान को निहारना... चमकते चांद को देखना कितना भला लगता है... अल सुबह रात की स्याही को दिन के उजाले में बदलते देखना.. और इसी तरह भरी दोपहरी में धूप में बैठकर अपनी पसंद की किताब पढ़ना... फिर शाम को डूबते सूरज को देखना... ये सूरज भी कितने गुज़रे दिनों की याद दिला जाता है... सुरमई शाम के बाद फिर तारों भरी रात आ जाएगी... नये साल के जश्न की रात... दिलकश संगीत होगा और संगीत पर थिरकती ख़ुशियां... आंखों में नये साल के कितने ही इंद्रधनुषी ख़्वाब होंगे... दिल में हज़ारों ख़्वाहिशें होंगी...
बहरहाल, आप सबको आज का दिन मुबारक हो, आज की शाम मुबारक हो... नये साल का जश्न मुबारक हो... और नया साल मुबारक हो...
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नया साल...


हर साल की तरह यह साल भी बीत रहा है... जल्द ही नया साल शुरू होने वाला है एक नई उम्मीद और एक नई रौशनी की किरन के साथ... हर साल से हम कोई न कोई उम्मीद ज़रूर करते हैं... इस साल जो पाना चाहते थे, अगर वो नहीं मिला, तो यह उम्मीद रहती है कि इस बार नये साल में हमारी ख़्वाहिश ज़रूर पूरी होगी...
हम चाहते हैं कि हर साल यादगार हो... साल में कहीं कुछ ऐसा ज़रूर हो, जो साल को यादगार बना जाए... यादों की किताब में एक और ख़ूबसूरत याद जुड़ जाए... लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता... कोई साल बहुत प्यारा होता है, उसमें सबकुछ अच्छा ही अच्छा होता है... घर और ज़िंदगी में कोई नया मेहमान आता... और फिर वह हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाता है... लेकिन कई बार कोई अपना इस दुनिया से चला जाता है... और उसकी कमी उम्रभर खलती रहती है... लेकिन ज़िंदगी तो यूं ही चलती आई है और यूं ही चलती रहेगी... वक़्त भी पल-दर-पल गुज़रता रहा है और गुज़रता रहेगा...
हमारी कोशिश तो बस यही होनी चाहिए कि ज़िंदगी की किताब में कोई ख़ुशनुमा वर्क़ जोड़ लें...
चलो किसी चेहरे पर मुस्कान बनकर बिखर जाएं... (हमारी डायरी से)
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एक और ख़ुशनुमा दिसम्बर...

पिछले साल की तरह इस बार भी दिसम्बर का महीना अपने साथ ख़ुशियों की सौग़ात लेकर आया है... ये एक ख़ुशनुमा इत्तेफ़ाक़ है कि इस बार भी माह के पहले हफ़्ते में हमें वो ख़ुशी मिली, जो हमारी ज़िन्दगी का हासिल है... ये ख़ुशी हमारी परस्तिश से वाबस्ता है... दूसरे हफ़्ते में भी पिछली बार की तरह ऐसी ख़ुशी मिली, जो मुल्क की ख़ुशहाली से भी वाबस्ता है... यानी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कामयाबी हासिल हुई है...
पिछले साल राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे और इस साल उनकी मेहनत रंग लाई... ये हर उस शख़्स के लिए ख़ुशी की बात है, जो इंसानियत में यक़ीन रखता है और सबकी भलाई चाहता है...

अल्लाह सबको ख़ुशियां नसीब करे, सबकी ज़िन्दगी में इसी तरह बहार का मौसम आए, आमीन... सुम्मा आमीन... अल्लाह हुम्मा आमीन...

दिसम्बर का महीना चल रहा है... दिसम्बर हमें बहुत पसंद है... क्योंकि इसी माह में क्रिसमस आता है... जिसका हमें सालभर बेसब्री से इंतज़ार रहता है... यानी क्रिसमस के अगले दिन से ही इंतज़ार शुरू हो जाता है... इस महीने में दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं... और रातें छोटी होने लगती हैं... ये बात अलग है कि इसका असर जनवरी में ही नज़र आता है... दिसम्बर में ठंडी हवाएं चलने लगती हैं... सुबह और शामें कोहरे से ढकी होती हैं... क्यारियों में गेंदा और गुलाब महकने लगते हैं... सच, बहुत ख़ूबसूरत होता है दिसम्बर का महीना...

इसी महीने में अपने साल भर के कामों पर ग़ौर करने का मौक़ा भी मिल जाता है... यानी इस साल में क्या खोया और क्या पाया...? नये साल में क्या पाना चाहते हैं... और उसके लिए क्या तैयारी की है... वग़ैरह-वग़ैरह...
ग़ौरतलब है कि दिसम्बर ग्रेगोरी कैलंडर के मुताबिक़ साल का बारहवां महीना है. यह साल के उन सात महीनों में से एक है, जिनके दिनों की तादाद 31 होती है. दुनिया भर में ग्रेगोरी कैलंडर का इस्तेमाल किया जाता है. यह जूलियन कालदर्शक का रूपातंरण है. ग्रेगोरी कालदर्शक की मूल इकाई दिन होता है. 365 दिनों का एक साल होता है, लेकिन हर चौथा साल 366 दिन का होता है, जिसे अधिवर्ष कहते हैं. सूर्य पर आधारित पंचांग हर 146,097 दिनों बाद दोहराया जाता है. इसे 400 सालों मे बांटा गया है. यह 20871 सप्ताह के बराबर होता है. इन 400 सालों में 303 साल आम साल होते हैं, जिनमें 365 दिन होते हैं, और 97 अधि वर्ष होते हैं, जिनमें 366 दिन होते हैं. इस तरह हर साल में 365 दिन, 5 घंटे, 49 मिनट और 12 सेकंड होते है. इसे पोप ग्रेगोरी ने लागू किया था.
(Firdaus Diary)

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3 दिसम्बर 2018

वो तारीख़ 3 दिसम्बर 2018 थी... ये एक बेहद ख़ूबसूरत दिन था. जाड़ो के मौसम के बावजूद धूप में गरमाहट थी... फ़िज़ा गुलाबों के फूलों से महक रही थी...
ये वही दिन था जब उन्होंने एक कोरे काग़ज़ पर एक नाम लिखा था... वो नाम जो उनके दिल की गहराइयों में उतर चुका था... उनकी रूह में बस चुका था...


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