सुर्ख़ फूल पलाश के...


फ़िरदौस ख़ान
सुर्ख़ फूल पलाश के, जब खिलते हैं तो फ़िज़ा सिंदूरी हो जाती है. पेड़ की शाख़ें दहकने लगती हैं और पेड़ के नीचे ज़मीन पर बिखरे पलाश के फूल माहौल को रूमानी कर देते हैं.
पलाश को कई नामों से जाना जाता है, जैसे पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू. पलाश का दरख़्त बहुत ऊंचा नहीं होता यानी दर्मियाने क़द का होता है. इसके फूल सुर्ख़ रंग के होते हैं, इसीलिए इसे ’जंगल की आग’ भी कहा जाता है. यह तीन रूपों में पाया जाता है, मसलन वृक्ष रूप में, झाड़ रूप में और बेल रूप में. लता पलाश दो क़िस्म का होता है. सुर्ख़ फूलों वाला पलाश और सफ़ेद फूलों वाला पलाश. सुर्ख़ फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, जबकि सफ़ेद फूलों वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है. एक पीले फूलों वाला पलाश भी होता है.

पलाश दुनियाभर में पाया जाता है. पलाश मैदानों, जंगलों और ऊंचे पहाड़ों पर भी अपनी ख़ूबसूरती के जलवे बिखेरता है. बग़ीचों में यह पेड़ के रूप में होता, जबकि जंगलों और पहाड़ों में ज़्यादातर झाड़ के रूप में पाया जाता है. लता रूप में यह बहुत कम मिलता है. सभी तरह के पलाश के पत्ते, फूल और फल एक जैसे ही होते हैं. इसके पत्ते गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं, जिनका रंग हरा होता है. पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन-तीन पत्ते होते हैं. इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है. पलाश की लकड़ी टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसका फूल बड़ा, आधे चांद जैसा और गहरा लाल होता है. फागुन के आख़िर में इसमें फूल लगते हैं. जिस वक़्त पलाश फूलों से लद जाता है, तब इसके हरे पत्ते झड़ चुके होते हैं. पलाश के दरख़्त पर सिर्फ़ फूल ही फूल नज़र आते हैं. फूल झड़ जाने पर इसमें चौड़ी फलियां लगती हैं, जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं.

पलाश के अमूमन सभी हिस्से यानी पत्ते, फूल, फल, छाल और जड़ बहुत काम आते हैं. पलाश के फूलों से रंग बनाए जाते हैं. फलाश के फूल कई बीमारियों के इलाज में भी काम आते हैं. पत्तों से पत्तल और दोने आदि बनाए जाते हैं. इनसे बीडियां भी बनाई जाती हैं. बीज दवाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. छाल से निकले रेशे जहाज़ के पटरों की दरारों में भरने के काम आते हैं. जड़ की छाल के रेशे से रस्सियां बटी जाती हैं. इससे दरी और काग़ज़ भी बनाया जाता है.  इसकी छाल से गोंद बनाया जाता है, जिसे  'चुनियां गोंद' या पलाश का गोंद कहते हैं. इसकी पतली डालियों से कत्था बनाया जाता है, जबकि मोटी डालियों और तनों को जलाकर कोयला तैयार किया जाता है.

पलाश हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले वृक्षों में से है. इसका ज़िक्र वेदों तक में मिलता है. आयुर्वेद ने इसे ब्रह्मवृक्ष कहा है. मान्यता है कि इस वृक्ष में तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास है. पलाश का धार्मिक महत्व भी बहुत ज़्यादा है.  पलाश का इस्तेमाल ग्रहों की शांति में किया जाता है. इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है. पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं, जिसे दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन को अपने गाय-बैलों को बांधते हैं.
पलाश कवियों और साहित्यकारों का भी प्रिय वृक्ष है, इस पर अनेक रचनाएं रची गई हैं और रची जा रही हैं.

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ज़िन्दगी के रंग समेटे एक कविता संग्रह

फ़िरदौस ख़ान
कविता अपने ख़्यालात, अपने जज़्बात को पेश करने का एक बेहद ख़ूबसूरत ज़रिया है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को बहुत ज़रूरी माना जाता था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से आज़ाद हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का दौर शुरू हुआ. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. आज मुक्त छंद कविताओं की नदियां बह रही हैं. मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मन में हिलोरें लेने वाले जज़्बात, उसके ज़ेहन में उठने वाले ख़्याल और अनुभव प्रभावी हो गए और छंद लुप्त हो गए. मगर इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को इनसे बांधे रखती है. शौकत हुसैन मंसूरी की ऐसी ही कविताओं का एक संग्रह है-‘कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का’. इसे राजस्थान के उदयपुर के अंकुर प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.  इस कविता संग्रह में एक गीत और कुछ क्षणिकाएं भी हैं. 

बक़ौल शौकत हुसैन मंसूरी हृदय में यदि कोई तीक्ष्ण हूक उठती है.एक अनाम-सी व्यग्रता सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर छाई रहती है और कुछ कर गुज़रने की उत्कट भावना हमारी आत्मा को झिंझोड़ती रहती है. ऐसी परिस्थिति में, कितना ही दीर्घ समय का अंतराल हमारी रचनाशीलता में पसर गया हो, तब भी अवसर मिलते ही, हृदय में एकत्रित समस्त भावनाएं, विचार और संवेदनाएं अपनी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त होती ही हैं. सिर्फ़ ज्वलंत अग्नि पर जमी हुई राख को हटाने मात्र का अवसर चाहिए होता है. तदुपरांत प्रसव पीड़ा के पश्चात जो अभिव्यक्ति का जन्म होता है. वह सृजनात्मक एवं गहन अनुभूति का सुखद चरमोत्कर्ष होता है. यह काव्य संग्रह ऐसी ही प्रसव पीड़ा के पश्चात जन्मा हुआ अभिव्यक्ति का संग्रह है. 

उनकी कविताओं में ज़िंदगी के बहुत से रंग हैं. अपनी कविता ‘आत्महन्ता’ में जीवन के संघर्ष को बयां करते हुए वे कहते हैं-
विपत्तियां क्या हैं
रहती हैं आती-जातीं
सारा जीवन ही यूं
भरा होता है संघर्षों से...

बदलते वक़्त के साथ रिश्ते-नाते भी बदल रहे हैं. इन रिश्तों को कवि ने कुछ इस अंदाज़ में पेश किया है-
रिश्तों की अपनी-अपनी
होती है दुनिया
कुछ रिश्ते होते हैं दिल के
क़रीब और कुछ सिर्फ़
होते हैं निबाहने की ख़ातिर...
कविताओं में मौसम से रंग न हों, ऐसा भला कहीं होता है. दिलकश मौसम में ही कविताएं परवान चढ़ती हैं. कवि ने फागुन के ख़ुशनुमा रंग बिखेरते हुए कहा है-
खिल गए हैं फूल सरसों के
पड़ गया है दूध
गेहूं की बाली में
लगे बौराने आम
खट्टी-मीठी महक से बौरा गए वन-उपवन

कवि ने समाज में फैली बुराइयों पर भी कड़ा प्रहार किया है, वह चाहे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध हों, भ्रष्टाचार हो, सांप्रदायिकता का ज़हर हो, भीड़ द्वारा किसी को भी घेरकर उनका सरेआम बेरहमी से क़त्ल कर देना हो, रूढ़ियों में जकड़ी ज़िदगियां हों, या फिर दरकती मानवीय संवेदनाएं हों. सभी पर कवि ने चिंतन किया है. इतना ही नहीं, कवि ने  निराशा के इस घने अंधकार में भी आस का एक नन्हा दीया जलाकर रखा है. कवि का कहना है-
ज़िन्दगी में फैले अंधेरे को
मिटाने का आत्म विश्वास इंसानों को
स्वयं पैदा करना होता है     

बहरहाल, भावनाओं के अलावा काव्य सृजन के मामले में भी कविताएं उत्कृष्ट हैं. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीक़े से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण सूफ़ियाना है, जो इसे आकर्षक बनाता है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : कर जाऊंगा पार मैं दरिया आग का
कवि : शौकत हुसैन मंसूरी
प्रकाशक : अंकुर प्रकाशन, उदयपुर (राजस्थान)
पेज : 112
मूल्य : 150 रुपये

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साल का आख़िरी दिन

हमारे लिए आज का दिन बेहद ख़ास होता है... सुबह से पहले तारों भरे आसमान को निहारना... चमकते चांद को देखना कितना भला लगता है... अल सुबह रात की स्याही को दिन के उजाले में बदलते देखना.. और इसी तरह भरी दोपहरी में धूप में बैठकर अपनी पसंद की किताब पढ़ना... फिर शाम को डूबते सूरज को देखना... ये सूरज भी कितने गुज़रे दिनों की याद दिला जाता है... सुरमई शाम के बाद फिर तारों भरी रात आ जाएगी... नये साल के जश्न की रात... दिलकश संगीत होगा और संगीत पर थिरकती ख़ुशियां... आंखों में नये साल के कितने ही इंद्रधनुषी ख़्वाब होंगे... दिल में हज़ारों ख़्वाहिशें होंगी...
बहरहाल, आप सबको आज का दिन मुबारक हो, आज की शाम मुबारक हो... नये साल का जश्न मुबारक हो... और नया साल मुबारक हो...
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नया साल...


हर साल की तरह यह साल भी बीत रहा है... जल्द ही नया साल शुरू होने वाला है एक नई उम्मीद और एक नई रौशनी की किरन के साथ... हर साल से हम कोई न कोई उम्मीद ज़रूर करते हैं... इस साल जो पाना चाहते थे, अगर वो नहीं मिला, तो यह उम्मीद रहती है कि इस बार नये साल में हमारी ख़्वाहिश ज़रूर पूरी होगी...
हम चाहते हैं कि हर साल यादगार हो... साल में कहीं कुछ ऐसा ज़रूर हो, जो साल को यादगार बना जाए... यादों की किताब में एक और ख़ूबसूरत याद जुड़ जाए... लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता... कोई साल बहुत प्यारा होता है, उसमें सबकुछ अच्छा ही अच्छा होता है... घर और ज़िंदगी में कोई नया मेहमान आता... और फिर वह हमारी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाता है... लेकिन कई बार कोई अपना इस दुनिया से चला जाता है... और उसकी कमी उम्रभर खलती रहती है... लेकिन ज़िंदगी तो यूं ही चलती आई है और यूं ही चलती रहेगी... वक़्त भी पल-दर-पल गुज़रता रहा है और गुज़रता रहेगा...
हमारी कोशिश तो बस यही होनी चाहिए कि ज़िंदगी की किताब में कोई ख़ुशनुमा वर्क़ जोड़ लें...
चलो किसी चेहरे पर मुस्कान बनकर बिखर जाएं... (हमारी डायरी से)
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एक और ख़ुशनुमा दिसम्बर...

पिछले साल की तरह इस बार भी दिसम्बर का महीना अपने साथ ख़ुशियों की सौग़ात लेकर आया है... ये एक ख़ुशनुमा इत्तेफ़ाक़ है कि इस बार भी माह के पहले हफ़्ते में हमें वो ख़ुशी मिली, जो हमारी ज़िन्दगी का हासिल है... ये ख़ुशी हमारी परस्तिश से वाबस्ता है... दूसरे हफ़्ते में भी पिछली बार की तरह ऐसी ख़ुशी मिली, जो मुल्क की ख़ुशहाली से भी वाबस्ता है... यानी राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कामयाबी हासिल हुई है...
पिछले साल राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे और इस साल उनकी मेहनत रंग लाई... ये हर उस शख़्स के लिए ख़ुशी की बात है, जो इंसानियत में यक़ीन रखता है और सबकी भलाई चाहता है...

अल्लाह सबको ख़ुशियां नसीब करे, सबकी ज़िन्दगी में इसी तरह बहार का मौसम आए, आमीन... सुम्मा आमीन... अल्लाह हुम्मा आमीन...

दिसम्बर का महीना चल रहा है... दिसम्बर हमें बहुत पसंद है... क्योंकि इसी माह में क्रिसमस आता है... जिसका हमें सालभर बेसब्री से इंतज़ार रहता है... यानी क्रिसमस के अगले दिन से ही इंतज़ार शुरू हो जाता है... इस महीने में दिन बड़े होने शुरू हो जाते हैं... और रातें छोटी होने लगती हैं... ये बात अलग है कि इसका असर जनवरी में ही नज़र आता है... दिसम्बर में ठंडी हवाएं चलने लगती हैं... सुबह और शामें कोहरे से ढकी होती हैं... क्यारियों में गेंदा और गुलाब महकने लगते हैं... सच, बहुत ख़ूबसूरत होता है दिसम्बर का महीना...

इसी महीने में अपने साल भर के कामों पर ग़ौर करने का मौक़ा भी मिल जाता है... यानी इस साल में क्या खोया और क्या पाया...? नये साल में क्या पाना चाहते हैं... और उसके लिए क्या तैयारी की है... वग़ैरह-वग़ैरह...
ग़ौरतलब है कि दिसम्बर ग्रेगोरी कैलंडर के मुताबिक़ साल का बारहवां महीना है. यह साल के उन सात महीनों में से एक है, जिनके दिनों की तादाद 31 होती है. दुनिया भर में ग्रेगोरी कैलंडर का इस्तेमाल किया जाता है. यह जूलियन कालदर्शक का रूपातंरण है. ग्रेगोरी कालदर्शक की मूल इकाई दिन होता है. 365 दिनों का एक साल होता है, लेकिन हर चौथा साल 366 दिन का होता है, जिसे अधिवर्ष कहते हैं. सूर्य पर आधारित पंचांग हर 146,097 दिनों बाद दोहराया जाता है. इसे 400 सालों मे बांटा गया है. यह 20871 सप्ताह के बराबर होता है. इन 400 सालों में 303 साल आम साल होते हैं, जिनमें 365 दिन होते हैं, और 97 अधि वर्ष होते हैं, जिनमें 366 दिन होते हैं. इस तरह हर साल में 365 दिन, 5 घंटे, 49 मिनट और 12 सेकंड होते है. इसे पोप ग्रेगोरी ने लागू किया था.
(Firdaus Diary)

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3 दिसम्बर 2018

वो तारीख़ 3 दिसम्बर 2018 थी... ये एक बेहद ख़ूबसूरत दिन था. जाड़ो के मौसम के बावजूद धूप में गरमाहट थी... फ़िज़ा गुलाबों के फूलों से महक रही थी...
ये वही दिन था जब उन्होंने एक कोरे काग़ज़ पर एक नाम लिखा था... वो नाम जो उनके दिल की गहराइयों में उतर चुका था... उनकी रूह में बस चुका था...


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अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद मत होना

ऐसा नहीं है कि ज़िन्दगी के आंगन में सिर्फ़ ख़ुशियों के ही फूल खिलते हैं, दुख-दर्द के कांटे भी चुभते हैं... कई बार उदासियों का अंधेरा घेर लेता है... ऐसे में कुछ चीज़ें हुआ करती हैं, जो उम्मीद की रौशनी बनकर हिम्मत बढ़ाती हैं... और हाथ थाम कर रौशनी की सिम्त ले चलती हैं... क़ुरान की ऐसी ही एक आयत है-
ﻻ ﺗَﻘْﻨَﻄُﻮﺍ ﻣِﻦ ﺭَّﺣْﻤَﺔِ ﺍﻟﻠَّﻪِ
La Taqnatu Min Rahmatillah
Don't Lose Hope In ALLAH's Mercy
यानी अल्लाह की रहमत से ना उम्मीद मत होना

जब भी मन उदास होता है, तो इसे याद कर लेते हैं...

यक़ीनन आपके पास भी ऐसा कुछ होगा, जो मुसीबत में आपका सहारा बनता हो...
चाहें, तो शेयर कर सकते हैं...
(Firdaus Diary)
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मैं तुझे फिर मिलूंगी...


फ़िरदौस ख़ान
अमृता प्रीतम की रचनाओं को पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है...शायद इसलिए कि उन्होंने भी वही लिखा जिसे उन्होंने जिया...
अमृता प्रीतम ने ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने शब्दों में पिरोकर रचनाओं के रूप में दुनिया के सामने रखा. पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त, 1919 में जन्मी अमृता प्रीतम पंजाबी की लोकप्रिय लेखिका थीं. उन्हें पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. उन्होंने क़रीब एक सौ किताबें लिखीं, जिनमें उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है. उनकी कई रचनाओं का अनेक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. अमृता की पंजाबी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हुई. इसमें उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए उसके वक़्त के हालात बयां किए थे.
अज्ज आखां वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरक़ा फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे वैण
अज्ज लक्खां धीयां रोंदियां तैनू वारिस शाह नू कहिण

ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा गया. इससे पहले उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कृत किया गया. अमृता को 1988 में अंतरराष्ट्रीय बल्गारिया वैरोव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें 1982 में देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया. अमृता प्रीतम जनवरी 2002 में अपने ही घर में गिर पड़ी थीं और तब से बिस्तर से नहीं उठ पाईं. उनकी मौत 31 अक्टूबर, 2005 को नई दिल्ली में हुई.

अमृता प्रीतम ने रसीदी टिकट में अपनी ज़िंदगी के बारे में लिखा है, यूं तो मेरे भीतर की औरत सदा मेरे भीतर के लेखक से सदा दूसरे स्थान पर रही है. कई बार यहां तक कि मैं अपने भीतर की औरत का अपने आपको ध्यान दिलाती रही हूं. स़िर्फ लेखक का रूप सदा इतना उजागर होता है कि मेरी अपनी आंखों को भी अपनी पहचान उसी में मिलती है. पर ज़िंदगी में तीन वक़्त ऐसे आए हैं, जब मैंने अपने अंदर की सिर्फ़ औरत को जी भर कर देखा है. उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया. वहां उस वक़्त थोड़ी सी भी ख़ाली जगह नहीं थी, जो उसकी याद दिलाती. यह याद केवल अब कर सकती हूं, वर्षों की दूरी पर खड़ी होकर. पहला वक़्त तब देखा था जब मेरी उम्र पच्चीस वर्ष की थी. मेरे कोई बच्चा नहीं था और मुझे प्राय: एक बच्चे का स्वप्न आया करता था. जब मैं जाग जाती थी. मैं वैसी की वैसी ही होती थी, सूनी, वीरान और अकेली. एक सिर्फ़ औरत, जो अगर मां नहीं बन सकती थी तो जीना नहीं चाहती थी. और जब मैंने अपनी कोख से आए बच्चे को देख लिया तो मेरे भीतर की निरोल औरत उसे देखती रह गई.

दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा था, जब एक दिन साहिर आया था, उसे हल्का सा बुख़ार चढ़ा हुआ था. उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था. उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने विक्स मली थी. कितनी ही देर मलती रही थी, और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खड़े-खड़े मैं पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र ग़ुजार सकती हूं. मेरे अंदर की सिर्फ़ औरत को उस समय दुनिया के किसी काग़ज़ क़लम की आवश्यकता नहीं थी.

और तीसरी बार यह सिर्फ़ औरत मैंने तब देखी थी, जब अपने स्टूडियो में बैठे हुए इमरोज़ ने अपना पतला सा बु्रश अपने काग़ज़ के ऊपर से उठाकर उसे एक बार लाल रंग में डुबोया था और फिर उठकर उस बु्रश से मेरे माथे पर बिंदी लगा दी थी. मेरे भीतर की इस सिर्फ़ औरत की सिर्फ़ लेखक से कोई अदावत नहीं. उसने आप ही उसके पीछे, उसकी ओट में ख़डे होना स्वीकार कर लिया है. अपने बदन को अपनी आंखों से चुराते हुए, और शायद अपनी आंखों से भी, और जब तक तीन बार उसने अगली जगह पर आना चाहा था, मेरे भीतर के सिर्फ़ लेखक ने पीछे हटकर उसके लिए जगह ख़ाली कर दी थी.

मशहूर शायर साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम को लेकर कई क़िस्से हैं. अमृता प्रीतम ने भी बेबाकी से साहिर के प्रति अपने प्रेम को बयां किया है. वह लिखती हैं, मैंने ज़िंदगी में दो बार मुहब्बत की. एक बार साहिर से और दूसरी बार इमरोज़ से. अक्षरों के साये में जवाहर लाल नेहरू और एडविना पर लिखी एक किताब का हवाला देते हुए वह कहती हैं, मेरा और साहिर का रिश्ता भी कुछ इसी रोशनी में पहचाना जा सकता है, जिसके लंबे बरसों में कभी तन नहीं रहा था, सिर्फ़ मन था, जो नज़्मों में धड़कता रहा दोनों की.

लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिए आता था, तो जैसे मेरी ही ख़ामोशी से निकला हुआ ख़ामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था. वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था. और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े-छोटे टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी, एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले जलाती थी, और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं. वह कहती हैं-
मेरे इस जिस्म में
तेरा सांस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
उम्र की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क़ की महक
कुछ तेरी सांसों में
कुछ हवा में मिल गई

अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में इमरोज़ के बारे में भी विस्तार से लिखा है. एक जगह वह लिखती हैं:-
मुझ पर उसकी पहली मुलाक़ात का असर-मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था. मन में कुछ घिर आया, और तेज़ बुख़ार चढ़ गया. उस दिन-उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था-बहुत बुख़ार है? इन शब्दों के बाद उसके मुंह से केवल एक ही वाक्य निकला था- आज एक दिन में मैं कई साल बड़ा हो गया हूं.
कभी हैरान हो जाती हूं. इमरोज़ ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत, जो उसकी अपनी ख़ुशी का मुख़ालिफ़ है. एक बार मैने हंसकर कहा था, ईमू! अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिलता, और वह मुझे, मुझसे भी आगे, अपनाकर कहने लगा- मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ पढ़ते हुए ढूंढ लेता. सोचती हूं, क्या ख़ुदा इस जैसे इंसान से कहीं अलग होता है. अपनी एक कविता में वह अपने जज़्बात को कुछ इस तरह बयां करती है-
मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूं
कि वक़्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनूंगी
मैं तुझे फिर मिलूंगी

एक बार जब अमृता प्रीतम से पूछा गया कि ज़िंदगी में उन्हें किस चीज़ ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया तो जवाब में उन्होंने एक क़िस्सा सुनाते हुए कहा था, 1961 में जब मैं पहली बार रूस गई थी तब ताजिकस्तान में एक मर्द और एक औरत से मिली, जो एक नदी के किनारे लकड़ी की एक कुटिया बनाकर रहते थे. औरत की नीली और मर्द कि काली आंखों में क्षण-क्षण जिए हुए इश्क़ का जलाल था. पता चला अब कि साठ-सत्तर बरस की उम्र इश्क़ का एक दस्तावेज़ है. मर्द की उठती जवानी थी, जब वह किसी काम से कश्मीर से यहां आया था और उस नीली आंखों वाले सुंदरी की आंखों में खोकर यहीं का होकर रहा गया था और फिर कश्मीर नहीं लौटा. वह दो देशों की नदियों की तरह मिले और उनका पानी एक हो गया. वे यहीं एक कुटिया बनाकर रहने लगे. अब यह कुटिया उनके इश्क़ की दरगाह है औरत माथे पर स्कार्फ बांधकर और गले में एक चोग़ा पहनकर जंगल के पेड़ों की देखभाल करने लगी और मर्द अपनी पट्टी का कोट पहनकर आज तक उसके काम में हाथ बंटाता है. वहां मैंने हरी कुटिया के पास बैठकर उनके हाथों उस पहाड़ी नदी का पानी पीया और एक मुराद मांगी थी कि मुझे उनके जैसी ज़िंदगी नसीब हो. यह ख़ुदा के फज़ल से कहूंगी कि मुझे वह मुराद मिली है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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आलमे-अरवाह

मेरे महबूब !
हम
आलमे-अरवाह के
बिछड़े हैं
दहर में नहीं तो
रोज़े-मेहशर में मिलेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ : आलमे-अरवाह- जन्म से पहले जहां रूहें रहती हैं
दहर- दुनिया
रोज़े-मेहशर- क़यामत का दिन
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चैन की नींद...

उन्होंने हमसे कहा, तुम बहुत चैन की नींद सोती हो...
अम्मी को जब हमने ये बात बताई, तो उन्होंने कहा, मैं ये दुआ भी करती हूं कि मेरे बच्चे चैन की नींद सोयें...
सच ! मां की दुआओं में कितना असर होता है... अल्लाह हमेशा उन्हें सलामत रखे, आमीन

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