नज़्म...


वो
मेरी रूह तक को
बरहना करने पर
आमादा है
जिसे
ये हक़ था
मेरी हिफ़ाज़त करता
मेरे सर का
आंचल बनता...
-फ़िरदौस ख़ान
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... और वो चली गई


कई साल पहले हमारे एक शनासा ने दिल्ली का एक क़िस्सा सुनाया था... आज न जाने क्यूं याद आ गया...
एक लड़का था और एक लड़की... लड़का बिहार का रहने वाला था... लड़की झारखंड की थी... दोनों में प्यार था, जैसा बताया गया... हुआ यूं कि एक रोज़ दोनों कहीं से आ रहे थे... लड़का मोटर साइकिल चला रहा था और लड़की उसके पीछे बैठी थी... जिस तरह लड़की ने उस लड़के को अपनी बांहों की गिरफ़्त में लिया हुआ था, उससे साफ़ ज़ाहिर था कि दोनों में मुहब्बत है...
रात का वक़्त था और सर्दियों का मौसम... हमारे शनासा अपने दोस्त के साथ सड़क किनारे खड़े बात कर रहे थे... तभी अचानक एक गाड़ी ने मोटर साइकिल को टक्कर मार दी... मोटर साइकिल घिसटते हुए दूर जा गिरी... लड़के को बहुत ज़्यादा चोट आई थी... वो सड़क पर बेसुध पड़ा था... चोट लड़की को भी चोट आई थी, लेकिन शायद उसे ज़्यादा चोट नहीं लगी थी... जल्द ही वह उठ बैठी और अपने कपड़े झाड़ते हुए उसने एक ऒटो को इशारा करके रोका... फिर उसमें बैठकर चली गई... उसने नज़र भरकर भी लड़के को नहीं देखा कि वह ज़िन्दा भी है या नहीं... बस उसे जाने की जल्दी थी और इस बात की फ़िक्र कि कहीं कोई उसे न देख ले...
हमारे शनासा ये सब देख रहे थे... उन्होंने अपने दोस्त की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया... कुछ और लोगों ने भी उनकी मदद की... उन्होंने लड़के के परिचितों को फ़ोन किया... लड़के के पैर में फ़्रेक्चर हो गया था... उस लड़के ने ही उन्हें बताया कि वह उस लड़की से प्यार करता है... उसे इस बात का दुख था कि लड़की उसे ज़ख़्मी हालत में सड़क पर पड़ा छोड़कर चली गई...

सोचते हैं, ये कैसी मुहब्बत है, जो अपने महबूब को ज़ख़्मी हालत में सड़क पर छोड़ कर चली जाए...
हम तो इसे मुहब्बत क़तई नहीं कहेंगे...

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अपना घर...


फ़िरदौस खान
जब हम अपनी एक क़रीबी रिश्तेदार के घर जाते हैं, तो रास्ते में एक घर पड़ता है... यूं तो वहां और भी घर हैं, लेकिन हमें यह घर बहुत अच्छा लगता है... इसलिए एक घर ही कहेंगे... ज़िक्र भी इसी घर का है... कोने का घर है, यानी उसके दो तरफ़ सड़क है... आसपास की जगह ख़ाली पड़ी है... इस घर की ख़ास बात यह है कि यह घर सिर्फ़ 17 गज़ ज़मीन पर बना है... ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर एक कमरा बना है... कमरे के अंदर ही सीढ़ी है, जो छत पर जाती है... छत पर किचन, बाथरूम और टॊयलेट बने हुए हैं, जिनकी छतें टीन की चादरों से बनी हैं... एक दो छती भी है... घर के आगे चबूतरा बना है... चबूतरे के पास ही नल है... हम जब भी उधर जाते हैं, तो दूर से ही घर दिख जाता है... उस घर को देखना बहुत अच्छा लगता है... चबूतरे पर एक औरत बैठी रहती है... घर के काफ़ी सारे काम वो इसी चबूतरे पर बैठ कर करती है... वो कपड़े धोती है, बर्तन धोती है, सब्ज़ी काटती है, दाल-चावल बीनती है... उसके पास ही उसके दो छोटे-छोटे बच्चे खेलते रहते हैं... घर बहुत छोटा है, लेकिन उसका अपना है... यानी उसका अपना घर... 
कितने प्यार से उसने इसे बनाया होगा, संवारा होगा... इसकी एक-एक ईंट में अपना घर होने की ख़ुशी का अहसास बसा होगा... है न...  
इस दुनिया में कितने ही लोग ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें अपना घर कभी नसीब नहीं होता...

तस्वीर : गूगल से साभार
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सुख...


मुहब्बत के सुख
ज़िन्दगी का सवाब
और
मुहब्बत के दुख
ज़िन्दगी का अज़ाब...
-फ़िरदौस ख़ान
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हरे कांच की चूड़ियां...


मेरे महबूब !
आज भी यादों में
खनक उठती हैं
हरे कांच की चूड़ियां...
यूं लगता है
जैसे तुमने
इन्हें हौले से छुआ हो...
-फ़िरदौस ख़ान
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मुहब्बत बनाम कैमिकल लोचा...


एक मशहूर लेखक ने हमसे कहा- जानती हो मुहब्बत क्या है...?
हमने कहा- आप ही बताएं...
कहने लगे कि जब इंसान किसी को पसंद करता है, तो वह उसे पाना चाहता है... इस दौरान उसके दिमाग़ जो कैमिकल लोचा होता है, उसकी वजह से उसे बेचैनी होती है, दरअसल वही मुहब्बत है... जब वह उसे पा लेता है, तो उसकी बेचैनी ख़त्म हो जाती है और उसके साथ मुहब्बत भी...

फिर काफ़ी अरसे बाद उन्होंने कहा कि उन्होंने एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने मुहब्बत के बारे में बहुत दिल से लिखा है... पढ़ना ज़रूर...  हम सोचने लगे कि उन्होंने ’मुहब्बत’ के बारे में लिखा है या ’कैमिकल लोचा’ के बारे में... :)
लेखक से माज़रत चाहते हैं...

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लड़की...


फ़िरदौस ख़ान
लड़की छत पर टहल रही थी. मौसम ख़ुशगवार था. आसमान में काली घटायें छाई हुई थीं. ठंडी हवा चल रही थी. लगता था, कहीं दूर बारिश हो रही है. लड़की बेचैन थी. वह क्यों बेचैन थी, इसका जवाब वह ख़ुद भी नहीं जानती थी. बस वो भीगना चाहती थी. वह चाहती थी कि सारी घटा यहीं बरस जाए और उसका रोम-रोम बारिश में भीग जाए. बूंदों की ठंडक उसके जिस्म में समा जाए, उसकी रूह में उतर जाए. लेकिन किसी के चाहने से घटायें कहां बरसने वाली थीं. उन्हें जब और जहां बरसना होता है, वहीं बरसा करती हैं.
वहीं कुछ दूर छत पर एक लड़का पतंग उड़ा रहा था. उसकी नज़र लड़की पर पड़ती है. न जाने क्या सोचकर लड़का पतंग की डोर एक बच्चे को पकड़ा देता है और ख़ुद लड़की को निहारने लगता है. शायद उसे लंबे बालों वाली लड़की अच्छी लगी थी. लड़की का सब्ज़ लिबास और हवा में लहराता उसका दुपट्टा उसे अपनी तरफ़ खींच रहा था. अचानक लड़की की नज़र उस लड़के पर पड़ती है. पहली ही नज़र में उसे लड़का अच्छा लगता है. उसने महसूस किया कि उसकी बेचैनी ख़त्म हो चुकी है. तभी बारिश होने लगती है और लड़की पानी की बूंदों को अपनी हथेलियों के कटोरे में भर लेना चाहती है. लड़का अब भी उसे निहार रहा है. लड़की को महसूस होता है कि अचानक सावन आग बरसाने लगा है, जिसमें वह झुलसती जा रही है. लड़की छत से नीचे उतर आती है. मौसम अब भी ख़ुशगवार है. बादल बरस रहे हैं और वो भीगना चाहती है, लेकिन छत पर नहीं जाना चाहती. उसे लगता है कि लड़के की नज़रों से ये सावन सुलगने लगा है. 
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मार्मिक कथाओं का बेहतरीन संग्रह


फ़िरदौस ख़ान
बीसवीं सदी के यशस्वी कथाकार कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन के शीर्षस्थ स्तंभ थे, जिनकी लेखनी का बड़े-बड़े कथा मर्मज्ञों ने लोहा माना है. उन्होंने दो सौ से ज़्यादा कहानियां लिखीं. हिन्द पॉकेट बुक्स ने उनकी कहानियों को पेपरबैक्स में प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू किया है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक उनकी कहानियां पहुंच सकें. हाल में प्रकाशित कहानी संग्रह एक अश्लील कहानी में कमलेश्वर की कई चर्चित कहानियों को शामिल किया गया है.

इंसान ज़िंदगी में बहुत कुछ चाहता है, जैसे दौलत, इज़्ज़त और शौहरत, लेकिन इन सबके बीच वह सुकून को भूल जाता है. जब वह दुनिया का हर सुख भोग लेता है, तब उसे सुकून की तलाश होती है. और इसी सुकून को पाने के लिए वह न जाने कहां-कहां भटकता है. मगर सुकून बाहर कहीं भी नहीं मिलता, क्योंकि इसे इंसान को अपने भीतर ही खोजना प़डता है. दरअसल, सुकून इंसान को उसके नेक कर्मों की बदौलत ही मिलता है. नीली झील भी एक ऐसी ही कहानी है, जो इंसान को नेक काम करने की नसीहत देती है. हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित कमलेश्वर के कहानी संग्रह एक अश्लील कहानी में संग्रहीत नीली झील में कहानी का एक पात्र महेस पांडे मंदिर बनवाने की बजाय परिंदों को शिकारियों के निशाने से बचाने के लिए नीली झील ख़रीद लेता है. पारबती की ख़्वाहिश थी कि उसका पति महेस पांडे चबूतरे के पास वाला कू़डा़ख़ना ख़रीद ले, क्योंकि वह चबूतरे पर एक मंदिर और उसके पास ही मुसाफ़िरों के लिए एक धर्मशाला बनवाना चाहती थी. मरते वक़्त भी उसने अपने पति से यही वचन लिया था. पारबती की मौत के बाद महेस पांडे ने कुल जमा पूंजी इकट्ठी की और जब पैसे कम पड़ गए, तो उसने गांववालों से मंदिर और धर्मशाला के लिए चंदा एकत्र किया. लेकिन उसके साथ एक वाक़या ऐसा पेश आया कि उसका इरादा बदल गया और उसने मंदिर के लिए जमा पैसा कहीं और लगा दिया. कहानी का यह अंश देखिए, सुबह उठा, तो मन नहीं लगा और वह शांति पाने के लिए झील की ओर चला. झील पर पहुंच कर अपनी लाठी से वह काई को छितराता रहा. सिवार के सूतों को उलझाकर उसने निकाला, नन्हे-नन्हे बीज चुनकर मुंह में डाल लिए और उठकर उधर चला गया, जिस ओर जलमंजरी खिली हुई थी. जलमंजरी के पास से ही दलदल शुरू हो जाता था. नारी की बेल पानी में तारों की तरह बिछी हुई थी और गांठों के पास नन्हे-नन्हे घोंघे चिपके हुए थे. सूत-सी सफ़ेद नन्ही-नन्ही जड़े मछली के उजले पंखों की तरह धीरे-धीरे कांप रही थीं. दलदल में घुसकर उसने जलमंजरी के फूल तोड़े और गुच्छा बनाकर लौटने लगा. सोनापतारी का एक झुंड रात भर चारा खाकर उड़ने ही वाला था कि एक गोली उस पार से छूटी और उड़ते सोनापतारी के झुंड में से एक पक्षी बिलबिलाकर छप्प से झील के बीचों-बीच गिर पड़ा. उसके सोने से पर छितरा गए और नीली झील के ख़ामोश पानी पर एक हलचल हुई. एक क्षण बाद ही लाल ख़ून की एक पतली-सी लकीर पानी पर खिंची और सोनापतारी तैरती हुई उस पार जाने की कोशिश करने लगी. उसके नरम पर फड़फड़ा रहे थे और पानी पर ख़ून की लकीर उसका पीछा कर रही थी. झुरमुट में से शिकारी निकले. उन्होंने देखा, पर वह पक्षी तैरता हुआ उस किनारे निकलकर किसी झाड़ी में दुबक कर ख़ामोश हो गया. शिकारियों ने बहुत खोजा, पर पक्षी नहीं मिला. झील पर मिटती हुई लकीर के बीच एकाध पंख पड़ा था. उसका मन उचाट हो गया. जलमंजरी के फूलों को वहीं फेंककर वह लौट आया. पारबती की याद उसे फिर आई और नीलाम वाले दिन उसने तीन हज़ार की बोली लगाकर चबूतरे के पास वाली ज़मीन नहीं, दलदली नीली झील ख़रीद ली. लोगों की आंखें फट गईं. इसका दिमाग़ ख़राब नहीं हो गया? मंदिर का नाम लेकर इसने धोखा दिया है. रुपया हज़म कर गया है? लेकिन उसने किसी को कोई जवाब नहीं दिया और मन में लगता कि अब तो वह पारबती को भी जवाब नहीं दे सकता. उसके पास जवाब है ही क्या? फागुन आते-आते मेहमान पक्षी उड़ गए. पवनहंस चले गए. सफ़ेद सुरख़ाब अपने घरों में लौट गए.  मुअर, संद, करकर्रा और सरपपच्छी भी चले गए. झील बहुत सूनी हो गई थी, पर महेस पांडे को विश्वास था कि ये फिर हमेशा की तरह अपने झुंडों के साथ कार्तिक-अगहन तक वापस आएंगे. महेस पांडे लिखना-पढ़ना तो जानता नहीं था, बस, झील वाले रास्ते के पहले पेड़ पर उसने एक तख्ती टांग दी थी, जिस पर उसने लिखा था, यहां शिकार करना मना है. और नीचे की पंक्ति थी, दस्तख़त नीली झील का मालिक-महेस पांडे.

कमलेश्वर ने अपने शब्द चित्रण के ज़रिये नीली झील का बेहद मनोहारी वर्णन किया है. कहानी पढ़ते वक़्त ऐसा लगता है कि हम साक्षात सारी घटनाओं को अपने सामने घटित होते हुए देख रहे हैं. वह जनमानस की व्यथा-कथा को मार्मिक शब्दों के माध्यम से अपनी कहानी में इस तरह उतार देते थे कि पढ़ने वाला भावुक हो जाता है. उनके पात्र जीवंत नज़र आते हैं. इस किताब में शामिल अन्य कहानियां नागमणि, गर्मियों के दिन, और कितने पाकिस्तान, एक अश्लील कहानी, जामातलाशी, मुर्दों की दुनिया, आज़ादी मुबारक, रात, औरत और गुनाह, भरे-पूरे-अधूरे, मरियम, रावल की रेल, एक रुकी हुई ज़िंदगी भी मन को छू लेती हैं. दरअसल, बीसवीं सदी के यशस्वी कथाकार कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन के शीर्षस्थ स्तंभ थे, जिनकी लेखनी का बड़े-बड़े कथा मर्मज्ञों ने लोहा माना है. बक़ौल कमलेश्वर, नई कहानी के दौर का सुख और विलक्षण अनुभव था, जब कहानियों के साथ और कहानियों की बदौलत चेतना को रेखांकित करने के लिए पाठकों की एक बहुत बड़ी जमात कथा-रचना के जीवंत और मनुष्य-परक उत्सव में शामिल हुई थी. कहानी अपने समय के मनुष्य पर ज़्यादा खरी उतरी थी. अपने समय के यथार्थ और सामान्य-जन के आत्मिक और भौतिक संतापों का सामना किया था.

कमलेश्वर ने दो सौ से ज़्यादा कहानियां लिखीं. हिन्द पॉकेट बुक्स ने कमलेश्वर की कहानियों को पेपरबैक्स में प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू किया है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक ये कहानियां पहुंच सकें. यह किताब इसी सिलसिले का एक हिस्सा है, जो पाठकों को ख़ासी पसंद आएगी.
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शदीद मुहब्बत...


शदीद मुहब्बत... 
जैसे 
जून में 
सूरज ज़मीन पर उतर आए 
जैसे 
सावन में आग बरसे...
-फ़िरदौस ख़ान
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सही पता न होने से ज़िन्दगी अज़ाब बनी...


-फ़िरदौस ख़ान
सही पता न होने की वजह से ज़िन्दगी में कितनी बड़ी मुसीबतें आ सकती हैं...  इसका ख़ामियाज़ा भुगत रहे लोगों को भी शायद इसका अंदाज़ा नहीं होगा... ग़ौर करने पर यही बातें सामने आती हैं कि सही पता न होने की वजह से डाक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाती... लोगों को घर ढूंढने में दिक़्क़त होती है... वग़ैरह-वग़ैरह... लेकिन मसला यहीं आकर ख़त्म नहीं हो जाता...
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सही पता न होने की वजह से बहुत से लोगों की ज़िन्दगी अज़ाब बन गई है... अफ़सोस की बात यह है कि वे ख़ुद इस बारे में नहीं जानते होंगे...

हुआ यूं कि कई बरस पहले गुमशुदा बच्चों से वाबस्ता एक स्टोरी के लिए हमने दिल्ली के कई पुलिस थानों का दौरा किया... ज़्यादातर मामलों में पुलिस ने बच्चों को बरामद कर लिया था, लेकिन इसके बावजूद बच्चे अपने घर नहीं पहुंच सके... वजह, बच्चों के वालदेन ने जो पते लिखवाए थे, वे सही नहीं थे... पुलिस उन पतों पर गई, लेकिन वहां वे लोग नहीं मिले, जिनके नाम पुलिस के रजिस्टर में दर्ज थे... आख़िरकार पुलिस ने बच्चों को अनाथ आश्रम वग़ैरह में भेज दिया... पुलिस का कहना था कि शुरू में तो लोग अपने बच्चों की खोज-ख़बर के लिए आते हैं, लेकिन कुछ वक़्त बाद आना छोड़ देते हैं...

हमें इस बात पर हैरानी हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है कि लोग अपने ही लिखवाए पते पर न मिलें... इसलिए हमने बच्चों के वालदेन को तलाशने का फ़ैसला किया... हमने पुलिस के रजिस्टर से उन बच्चों के घरों के पते लिए, जो पुलिस ने बरामद किए थे... हमने दो दिन दिल्ली के न जाने कितने इलाक़ों की ख़ाक छानी... लेकिन जब काग़ज़ पर लिखे पते पर पहुंचते, तो पता चलता कि इस इलाक़े में, इस नंबर की गली है ही नहीं... या इस गली में इस नंबर का मकान ही नहीं है... अगर कोई मकान मिल गया, तो पता चला कि उस मकान में उस नाम का शख़्स कभी रहा ही नहीं... वग़ैरह-वग़ैरह...

न जाने कितने बच्चे सही पता न होने की वजह से अनाथों की तरह पल रहे हैं... और उनके मां-बाप अपने बच्चों की याद में तड़प रहे होंगे...
बेहद तकलीफ़देह हालत है...

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