नामवर सिंह की कविताई विशेषताएं


फ़िरदौस ख़ान
नामवर सिंह हिंदी के प्रसिद्ध कवि और प्रमुख समकालीन आलोचक हैं. 26 जुलाई, 1926 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले के गांव जीयनपुर में जन्मे नामवर सिंह ने साहित्यिक जीवन की शुरुआत काव्य लेखन से की थी. उन्होंने पहली कविता 1938 में लिखी. पहले वह ब्रजभाषा में कवित्त और सवैया लिखते थे. 1941 में अध्ययन के लिए वह बनारस आए और यहां उनकी मुलाक़ात त्रिलोचन शास्त्री से हुई. त्रिलोचन ने उन्हें खड़ी बोली में लिखने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने दो बार अपनी कविताओं की किताब प्रकाशित कराने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए. इसके बाद वह गद्य लेखन करने लगे. 1951 में उनका निबंध संग्रह बक़लम ख़ुद प्रकाशित हुआ. इसका पुस्तक परिचय त्रिलोचन शास्त्री ने कुछ यूं लिखा, बक़लम ख़ुद में 17 व्यक्ति व्यंजक निबंध हैं. व्यंजना तो इस प्रकार की है कि पुस्तक की बजाय यह ज़िंदादिल आदमी ही लगेगी. बक़लम ख़ुद जनता की जय का उद्घोष, संघर्ष की प्रेरणा और अभियान की आकांक्षा है. निरुद्देश्य मज़ाक़ नहीं, यह सोद्देश्य संजीदगी है, जो सत्य को सुपाच्य रूप देती है. नामवर सिंह की कृतियों में क़लम ख़ुद, हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग, पृथ्वीराज रासो की भाषा, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, छायावाद और इतिहास और आलोचना शामिल हैं. उन्हें उत्कृष्ट रचनाओं के लिए हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान भी मिला.

हाल में राजकमल प्रकाशन ने नामवर सिंह की प्रारंभिक रचनाओं की एक किताब प्रकाशित की है, जिसका नाम है प्रारम्भिक रचनाएं नामवर सिंह. इसके पहले खंड में कविताएं, दूसरे में विविध विधाओं की गद्य रचनाएं और तीसरे में बक़लम ख़ुद के निबंधों को शामिल किया गया है. उनकी कविताओं में भाव भी है, ग़ज़ब का प्रवाह भी. देखिए-

नभ के नीले सूनेपन में
हैं टूट रहे बरसे बादर
जाने क्यों टूट रहा है तन
बन में चिड़ियों के चलने से
हैं टूट रहे पत्ते चरमर
जाने क्यों टूट रहा है मन
घर के बरतन की खन-खन में
हैं टूट रहे दुपहर के स्वर
जाने कैसा लगता जीवन

नामवर सिंह सबसे पहले कवि हैं. शुरुआती साहित्य जीवन में उन्होंने कविताएं ही ज़्यादा रचीं, लेकिन बहुत कम कविताएं ही प्रकाशित हो पाईं. ख़ास बात यह है कि उनकी छंद पर अच्छी पक़ड थी. उनकी कविता नहीं बीतती सांझ की कुछ पंक्तियां देखिए-

दिन बीता, पर नहीं बीतती, नहीं बीतती सांझ
नहीं बीतती, नहीं बीतती, नहीं बीतती सांझ
ढलता-ढलता दिन दृग की कोरों से ढुलक न पाए
मुक्त कुंतले! व्योम मौन मुझ पर तुम-सा ही छाया
मन में निशि है किंतु नयन से नहीं बीतती सांझ

उन्हें प्रकृति से भी बेहद प्रेम है, इसलिए उनकी रचनाओं में प्रकृति के कई मनोहारी रूप देखने को मिलते हैं. उनकी कविता हरित फौवारों सरीखे धान को लीजिए, जो उन्होंने धान के खेत को देखकर रची.

हरित फौवारों सरीखे धान
हाशिये-सी विंध्य-मालाएं
नम्र कंधों पर झुकीं तुम प्राण
सप्तवर्णी कैश फैलाए
जोत का जल पोंछती-सी छांह
धूप में रह-रहकर उभर आए
स्वप्न के चिथ़डे नयन-तल आह
इस तरह क्यों पोंछते जाएं?

उनकी कविताओं में एक अलग तरह का आकर्षण है. पाठकों को वे इसलिए भी पसंद आती हैं, क्योंकि इनमें कहीं न कहीं उनकी ख़ुद की अनुभूतियों की झलक होती है. किताब के संपादक भारत यायावर भूमिका में लिखते हैं कि नामवर सिंह की भाषा में सफ़ाई और निखार होते हुए भी जहां-तहां छायावादी झलक है. क्लिष्ट-कल्पनाओं को भी उनकी कविताओं में देखा जा सकता है. त्रिलोचन शास्त्री ने जिस भाषा-शैली और अनोखे अंदाज़ में नामवर सिंह की रचनाओं की कविताई विशेषताओं को रेखांकित किया है, वह अपूर्व है, बेमिसाल है. काव्य की तरह गद्य लेखन में भी नामवर सिंह अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं. उनकी प्रारंभिक रचनाओं में कहानी की कहानी भी है, जिसमें उन्होंने खरपत्तू नामक चरित्र का प्रभावी शब्द चरित्र पेश किया है. इसी तरह दार्जिलिंग की एक झलक में उन्होंने काव्यात्मक भाषा का इस्तेमाल किया है. दरअसल, नामवर सिंह की प्रारंभिक रचनाओं का अपना अलग ही महत्व है. उनकी रचनाओं में कच्चापन नहीं मिलता. इसका कारण यह है कि विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने सघन साहित्य-साधना की थी. उनकी स्मरणशक्ति लाजवाब थी. बौद्धिक ओजस्विता से वह भरे हुए थे. इसीलिए बहुत कम उम्र में ही वह एक बौद्घिक ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं. बहरहाल, यह किताब नामवर जी के कृतित्व को पेश करती है. हिंदी साहित्य के शोधार्थियों के लिए यह बेहद उपयोगी किताब है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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चांदनी रात में कुछ भीगे ख़्यालों की तरह


चांदनी रात में कुछ भीगे ख़्यालों की तरह
मैंने चाहा है तुम्हें दिन के उजालों की तरह

साथ तेरे जो गुज़ारे थे कभी कुछ लम्हें
मेरी यादों में चमकते हैं मशालों की तरह

इक तेरा साथ क्या छूटा हयातभर के लिए
मैं भटकती रही बेचैन ग़ज़ालों की तरह

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

तेरे आने की ख़बर लाई हवा जब भी कभी
धूप छाई मेरे आंगन में दुशालों की तरह

कोई सहरा भी नहीं, कोई समंदर भी नहीं
अश्क आंखों में हैं वीरान शिवालों की तरह
 
पलटे औराक़ कभी हमने गुज़श्ता पल के
दूर होते गए ख़्वाबों से मिसालों की तरह
-फ़िरदौस ख़ान
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उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए...


कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गए
अहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गए

जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

माज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ा
औराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गए

कब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशां
रातें मिली स्याह, उजाले निखर गए

सहरा में ढूंढते हो घटाओं के सिलसिले
दरिया समन्दरों में ही जाकर उतर गए

कुछ कर दिखाओ, वक़्त नहीं सोचने का अब
शाम हो गई तो परिंदे भी घर गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए
-फ़िरदौस ख़ान
   
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नग़में रफ़ाक़तों के सुनाती हैं बारिशें


नग़में रफ़ाक़तों के सुनाती हैं बारिशें
अरमान ख़ूब दिल में जगाती हैं बारिशें

पानी में भीगती है, कभी उसकी याद तो
इक आग-सी हवा में लगाती हैं बारिशें

मिस्ले-धनक जुदाई के लम्हाते ज़िंदगी
रंगीन मेरे ख़्वाब बनाती हैं बारिशें

ख़ामोश घर की छ्त की मुंडेरों पे बैठकर
परदेसियों को आस बंधाती हैं बारिशें

जैसे बग़ैर रात के होती नहीं सहर
यूं साथ बादलों का निभाती हैं बारिशें

सहरा में खिल उठे कई महके हुए चमन
बंजर ज़मीं में फूल खिलाती हैं बारिशें

'फ़िरदौस’ अब क़रीब मौसम बहार का
आ जाओ कब से तुमको बुलाती हैं बारिशें
-फ़िरदौस ख़ान 
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संगीत...


संगीत प्रकृति के कण-कण में बसा है... चिड़ियों की चहचहाहट, नदियों का कल-कल करता जल, झरनों की झर-झर, हवा की सांय-सांय और रिमझिम बूंदों की टिप-टिप... सभी में संगीत मौजूद है... हिन्दुस्तानी संस्कृति और संगीत का चोली-दामन का साथ है... घर में कोई मंगल कार्य हो या कोई त्योहार, कोई भी गीत-संगीत के बिना मुकम्मल ही नहीं होता...

यह हमारी ख़ुश नसीबी है कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत ग्रहण करने का मौक़ा मिला... कई साल हमने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की साधना की है... संगीत की देवी सरस्वती की वन्दना से सुर साधना का सफ़र शुरू हुआ और इस दौरान कई संगीत के कार्यक्रमों में जाने का मौक़ा मिला... कई सम्मान भी मिले..., लेकिन सबसे बड़ा सम्मान यही था कि हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को क़रीब से जानने, समझने और सीखने का मौक़ा मिला...

हिन्दुस्तान में आज भी पारंपरिक कलाओं में गुरु-शिष्य की परंपरा क़ायम है... हमें भी एक ऐसे गुरु मिले, जिस पर किसी भी शिष्य को नाज़ होगा...
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।।
हमारे गुरु का संगीत के लिए कितना समर्पण भाव है,  इसके बारे में अगली पोस्ट में लिखेंगे...
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बहार


  • बहार आई है... पतझड़ में वीरान हुए दरख़्तों पर सब्ज़ पत्ते मुस्करा रहे हैं... क्यारियों में रंग-बिरंगे फूल खिले हैं... सच ! कितना प्यारा मौसम है... दिल चाहता है कि कहीं दूर चलें, बहुत दूर... क़ुदरत के बहुत क़रीब... किसी पहाड़ पर... 
  • काली घटाओं से न जाने कौन-सा रिश्ता... जब भी छाई हैं... उम्र के बंजर सहरा में बहार आई है...  
  • फूल पलाश के... कितनी ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हैं पलाश के दहकते फूलों से... पलाश के सुर्ख़ फूलों को अपने कमरे में मेज़ पर या फिर खिड़की के पास रखकर उन्हें देर तक निहारना और यह सोचना कि काश इस बार भी वो हमारे लिए फलाश के दहकते फूल लाते... काश... ! 
  • सफ़ेद फूल... सफ़ेद फूलों में तो हमारी रूह बसती है...
  • सुबह-सवेरे उगता सूरत देखना कितना भला लगता है...
  • कुछ चीज़ें, कुछ चेहरे ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें देखकर दिल पुरसुकून हो जाता है, आंखें को ठंडक पहंचती है... तुमको देखा तो ये ख़्याल आया, ज़िन्दगी धूप तुम घना साया
  • उनका पैग़ाम आया, उनसे मुलाक़ात हुई... वाक़ई आसमान से रहमत बरसी और फ़िज़ा में मुहब्बत घुल गई... हवायें रक्स करने लगीं...

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घर की दीवारें चमचमाती...


आज हम चाहते हैं कि घर की दीवारें चमचमाती रहें, उन पर ज़रा-सा भी कोई दाग़-धब्बा तक न लगे... अगर कोई बच्चा दीवार पर पेंसिल से आड़ी-तिरछी लकीरें खींच दे, तो बुरा लगता है... लेकिन हम अपने बचपन के दिन भूल जाया करते हैं, जब चाक और पेंसिल से घर की दीवारों पर कितनी ही आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर घर, पहाड़, नदियां, पेड़, बेल-बूटे और न जाने क्या-क्या बनाया करते थे...
आज अपने पसंदीदा पेंटर ईमान मलेकी की पेंटिंग्स देखकर बचपन याद आ गया... सच ! बचपन कितना प्यारा हुआ करता है...

Painting by Iman Maleki

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भुट्टे...

भुट्टे...
दहकते कोयलों पर भुने
गरमा-गरम भुट्टे
आज भी उतना ही लुभाते हैं
जितना बचपन में भाते थे...
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डायरी


  • हमें डायरी लिखने की आदत है... स्कूल के वक़्त से ही डायरी लिख रहे हैं... कुछ साल पहले अंतर्जाल पर भी बलॊग लिखना शुरू किया... शुरुआत हिंदी से की थी... बाद में उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी में भी बलॊग लिखने लगे... डायरी लिखना ही नहीं, पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता है... अकसर अपनी पुरानी डायरियां पढ़ने बैठ जाते हैं... दरअसल, डायरी ज़िंदगी की एक किताब ही हुआ करती है, जिसके औराक़ (पन्नों) पर हमारी यादें दर्ज होती हैं... वो यादें, जो हमारे माज़ी का अहम हिस्सा हैं...
  • डायरी लिखनी चाहिए... डायरी में लिखी गईं ख़ूबसूरत बातें ताज़ा फूलों की तरह होती हैं... जो ख़ुशी देती हैं... हम बरसों से डायरी लिख रहे हैं...
  • लिखने से पहले लफ़्ज़ों को जीना पड़ता है... तभी तो उनमें इतना असर पैदा होता है कि वो सीधे दिल में उतर जाते हैं... रूह की गहराई में समा जाते हैं... 
  • लॊर्ड बायरन की रूमानी कविताएं... कुछ ख़त, एक तस्वीर और बहुत-सी ख़ुशनुमा यादें... माज़ी के संदूक़ में यही सब तो हुआ करता है... 
  • अल्फ़ाज़ वही हैं, जज़्बात वही हैं...बस उन्हें महसूस करने और बयां करने का सबका तरीक़ा जुदा हुआ करता है... 
  • कामयाबी और नाकामी के जवाज़ ज़्यादा मुख़्तलिफ़ नहीं हुआ करते... इंसान कामयाब हो जाए, तो जवाज़ उम्दा हो जाते हैं, लेकिन बंदा नाकाम हो जाए, तो वही जवाज़ तोहमत बन जाया करते हैं... कामयाब लोगों की जीवनियां पढ़कर यही समझ में आया...
  • इंसान तब नहीं हारता, जब वो हार जाता है... बल्कि वो तब हारता है, जब वो हार मान लेता है... इसलिए हम फिर खड़े होंगे... लड़ेंगे और जीतेंगे...
  • बहुत से लोग लफ़्ज़ों के साथ खिलवाड़ करते हैं, कुछ लोग लफ़्ज़ों से खेलते हैं, लेकिन बहुत कम ही लोग लफ़्ज़ों को जीते है...  
  • बच्चे कितने सच्चे होते हैं... कभी इल्म की झूठी क़सम नहीं खाते... ये क़सम उनके लिए सबसे बड़ी हुआ करती है... बचपन की ख़ूबसूरत यादें... 
  • विश्वास और अंधविश्वास एक ही चीज़ के दो नाम हैं...हम तो ऐसा ही मानते हैं... 
  • पेट भरा हो, तो हर चीज़ अच्छी लगती है... इंसान भूखा हो, तो उसे खाने के सिवा कुछ नहीं सूझता...
  • वही लफ़्ज़ दिल को छू पाते हैं, जो अपने से लगते हैं... पराई चीज़ कितनी ही बेशक़ीमती और नायाब क्यों न हो, उससे उन्सियत नहीं हो पाती... इसी तरह बनावटी लफ़्ज़ भी दिल को नहीं छू पाते, उन्हें कितने ही क़रीने से क्यूं न सजाया जाए...
  • सबसे बड़ा सम्मान... पढ़ने वाले को हमारा लिखा एक भी लफ़्ज़ याद रह गया, तो वही हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है... एक लेखक को और क्या चाहिए...
  • कुछ ऐसा लिखना चाहते हैं, जिसे पढ़ते हुए उम्र बीत जाए, लेकिन तहरीर से नज़र हटाने को दिल न चाहे..
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रंग-बिरंगी कढ़ाई वाले रुमाल...


फ़िरदौस ख़ान
तुम्हें मालूम है न... कुछ काम हमें कितना सुकून देते हैं... जैसे सफ़ेद रुमालों पर रंग-बिरंगे रेशम से बेल-बूटे टांकना... स्कूल के दिनों में बहुत रुमालों पर एक से एक ख़ूबसूरत फूल काढ़े हैं... लाल, गुलाबी, पीले, नीले और कई शेड वाले गुलाब, चम्पा और न जाने कौन-कौन से फूल... कुछ फूलों के आकार पेंसिल से बनाए, तो कुछ दादी जान के फ़र्मों से... पहले फ़र्मों पर हल्की-सी रौशनाई लगाई, फिर उसे रुमाल के एक कोने पर छाप दिया... उसके बाद रुमाल को फ़्रेम पर कसकर रेशम से फूल काढ़े... पत्तियां हरे रंगों से... कलियां हल्के रंगों से और फूल गहरे रंगों से... एक रुमाल की कढ़ाई में कई-कई दिन लग जाते थे, क्योंकि सुबह स्कूल जाना... ढेर सारा होमवर्क करना... खेलना भी तो ज़रूरी होता था... रात में रुमाल याद आते थे... देर तक जागने पर दादी जान कहती थीं- सुबह कौन-सा इम्तिहान है... यह काम कल कर लेना... और न चाहते हुए भी हमें कढ़ाई छोड़नी पड़ती...

रेशम ख़रीदने के लिए पापा के साथ बाज़ार जाया करते थे... दुकान पर जब बहुत से प्यारे-प्यारे रंग देख कर समझ नहीं पाते थे कि कौन-से रंग का रेशम ख़रीदें और कौन-सा छोड़े... सभी तो एक से बढ़कर एक हुआ करते थे... तब पापा कहते- बबीता सभी ले लो...  बचपन में पापा हमें बबीता ही कहा करते थे... बाद में फ़िरदौस कहने लगे... क्योंकि हमें लोग फ़िरदौस नाम से ही जानते हैं...जो हमारा असली नाम है... वैसे भी हमारे कई नाम रहे हैं... इस बारे में फिर कभी बात करेंगे... बहरहाल, हम ढेर सारे रेशम ख़रीदकर घर आते... हां, रास्ते में पापा हमें आईसक्रीम, छोले, समौसे और भी न जाने क्या-क्या खिलाते थे... पापा के साथ खायी सभी चीज़ें हम आज भी खाते हैं, पर वो मज़ा नहीं आता, जो पापा के साथ आया करता था...

पापा के साथ ख़रीदे गए रेशम आज भी एक डिब्बे में रखे हुए हैं... जब भी इन्हें देखते हैं, तो पापा बहुत याद आते हैं... हमने कितने ही रुमाल काढ़े... अपनी टीचर को दिए... मम्मा को दिए... मम्मा के पास कभी रुमाल टिके ही नहीं, क्योंकि जो भी रुमाल देखता मांग लेता... मम्मा कभी मना ही नहीं कर पाती थीं... लेकिन हमें हमेशा इस बात का अफ़सोस रहा कि हमने कभी तुम्हें रुमाल नहीं दिया... क्योंकि हमारी एक सहेली ने कहा था-रुमाल देने से रिश्ता टूट जाता है... यह बात कितनी सच है... हम नहीं जानते, लेकिन तुम्हारे मामले में कोई रिस्क लेना नहीम चाहते थे... देखो, हमने तुम्हें कोई रुमाल नहीं दिया... फिर भी तुम कितने दूर हो... मन के सबसे क़रीब होकर भी दूर... बहुत दूर...

अब हम एक रुमाल काढ़ना चाहते हैं, तुम्हारे लिए... रंग-बिरंगे रेशम से... क्योंकि हम जान गए हैं कि रिश्ते तो क़िस्मत से बनते और बिखरते हैं... फिर क्यों हम तुम्हें उस रुमाल से महरूम रखें, जो तुम हमेशा से चाहते हो...

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मेहंदी


एक उम्र होती है, जब कोई अच्छा लगने लगता है... और लड़कियां मेहंदी से हथेली पर उसका नाम लिख लिया करती हैं... और फिर चुपके-चुपके उस नाम को निहारा करती हैं... दिन भर उनका सारा ध्यान अपनी हथेली पर ही रहता है कि कहीं कोई उनके महबूब का नाम न पढ़ ले... बरसों पहले हमने एक ग़ज़ल लिखी थी... उसका एक शेअर अर्ज़ है-
हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के
जब हथेली पे तेरा नाम लिखा होता है...
-फ़िरदौस ख़ान
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दो तबक़े


दुनिया में दो ही तबक़े हुआ करते हैं... एक ताक़तवर और दूसरा कमज़ोर... हमेशा ताक़तवर सही (?) होता है और कमज़ोर ग़लत... यह बात बहुत जगह लागू होती है... जब इंसान जंगली था और जंगलों में रहता था, तब भी ऐसा होता था... और आज भी कमोबेश यही हो रहा है... यानी इंसान का रहन-सहन और खान-पान बदला है, लेकिन उसकी सोच आज भी वही है...
इसे कई संदर्भों में देखा जा सकता है...
-महिलाओं का शोषण (अत्याचार)
-दलितों का शोषण
-मज़दूरों का शोषण
-ज़मींदारों द्वारा ग़रीब किसानों का शोषण...
बहरहाल, ताक़तवरों द्वारा कमज़ोरों के शोषण की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है...

इसीलिए हम हमेशा एक बात कहते हैं- कुछ लोग हमेशा सही (?) होते हैं...
(हमारी डायरी से)
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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...


कुछ चीज़ें दिल के बहुत क़रीब होती हैं, जैसे कोई नज़्म, जिसे हमेशा सुनना अच्छा लगता है... कफ़ील आज़ार साहब की ऐसी ही एक नज़्म है
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी... कॊलेज के दिनों में भी यह नज़्म बहुत अच्छी लगती थी... और आज भी उतनी ही पसंद है... कुछ चीज़ें कभी नहीं बदला करतीं...
नज़्म
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे के तुम इतनी परेशां क्यूं हो
उंगलियां उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
एक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएंगे
कांपते हाथों पे भी फ़िकरे कसे जाएंगे

लोग ज़ालिम हैं हर एक बात का ताना देंगे
बातों बातों में मेरा ज़िक्र भी ले आएंगे
उनकी बातों का ज़रा-सा भी असर मत लेना
वरना चेहरे के तासुर से समझ जाएंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात ना करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी...
वाक़ई, इस नज़्म का कोई जवाब नहीं... एक-एक लफ़्ज़ दिल की गहराई में उतरता चला जाता है... और इंसान इसके जादू में खो जाता है... ख़ुदा कफ़ील आज़र साहब को जन्नतुल-फ़िरदौस में जगह दे, जो हमारे लिए इतने प्यारा कलाम लिखकर छोड़ गए...

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लड़कियां...

हम लड़कियां बिलकुल ऐसी ही होती है... ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में भी हंसती और खिलखिलाती रहती हैं...

परवीन शाकिर के शब्दों में-
चिड़िया पूरी भीग चुकी है
और दरख्त भी पत्ता-पत्ता टपक रहा है
घोंसला कब का बिखर चुका है
चिड़िया फिर भी चहक रही है
अंग-अंग से बोल रही है
इस मौसम में भीगते रहना कितना अच्छा लगता है... 
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मुहब्बत...

जो अच्छा लगता है, उसकी हर बात अच्छी लगती है... शायद यही मुहब्बत है... 

बक़ौल परवीन शाकिर- 
मैं ऐसे शख्स की मासूमियत पर क्या लिखूं 
जो मुझको अपनी ख़ताओं में भी भला ही लगा 
जो ख़्वाब देने पर क़ादिर था, मेरी नज़रों में 
अज़ाब देते हुए भी मुझे ख़ुदा ही लगा...
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बचपन...


बचपन... सच में कितना प्यारा होता है... ज़िंदगी की जद्दोजहद से बेफ़िक्र... जिसकी भूली-बिसरी यादें... उम्र का सरमाया बन जाया करती हैं... अपने बड़ों से सुनी अपने बचपन की बातें सुनना कितना भला लगता है... काश ! बचपन फिर से लौट सकता... अगर ऐसा होता, तो शायद हर इंसान हमेशा अपने बचपन में ही जीना चाहता... बिलकुल हमारी तरह...
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मुहब्बत से महकते ख़त...



ख़त...सच, कितना प्यारा लफ़्ज़ है ख़त...संदूक़ में कपड़ों की तह में छुपाकर रखे गए ख़त कितने अच्छे लगते हैं...जब भी इन्हें पढ़ो, तो हमेशा नयेपन का अहसास होता है...मानो इन्हें अभी-अभी लिखा गया हो...और पहली बार ही पढ़ा जा रहा हो... ख़तों से आती गुलाब और मोगरे की महक तो मदहोश कर देने वाली होती ही है...उससे ज़्यादा क़यामत ढहाती हैं इनकी तहरीरें... दूधिया काग़ज़ पर मुहब्बत की रौशनाई से लिखे लफ़्ज़...सीधे दिल में उतर जाते हैं...अकसर सोचती हूं कि कितना अच्छा हो कि तुम हमेशा ऐसे ही लिखते रहो...मैं हमेशा ऐसे ही पढ़ती रहूं...और फिर यूं ही उम्र बीत जाए...

कुछ रोज़ पहले तुम्हारा ख़त पढ़ा, तो तुम पर निसार होने को जी चाहा...क्योंकि उस तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ वही था जो मैं सुनना चाहती थी, या यूं कहें कि पढ़ना चाहती थी...लगा, तुमने मेरे दिल की बात जान ली...और फिर उसे काग़ज़ पर ही टांक दिया...किसी बेल-बूटे की तरह...कितनी ही बार ख़त को पढ़ा और कभी ख़ुद पर तो कभी अपनी क़िस्मत पर नाज़ किया...कि 'तुम' मेरे हो...

एक नज़्म
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
डूबा होता है
जज़्बात के समंदर में
और मैं
जज़्बात की इस ख़ुनक को
उतार लेना चाहती हूं
अपनी रूह की गहराई में
क्यूंकि
मेरी रूह भी प्यासी है
बिल्कुल मेरी तरह
और ये प्यास
दिनों या बरसों की नहीं
बल्कि सदियों की है
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
तुम्हारी तहरीर का
हर इक लफ्ज़
अया होता है
उम्मीद की सुनहरी किरनों से
और मैं
इन किरनों को अपने आंचल में समेटे
चलती रहती हूं
उम्र की उस रहगुज़र पर
जो हालात की तारीकियों से दूर
बहुत दूर जाती है
सच !
तुम्हारे ख़त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

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मुहब्बत


ज़िंदगी में इंसान को वही मिलता है, जिसके वो क़ाबिल होता है... मुहब्बत का नूर भी हर किसी को नसीब नहीं होता... हमारे Sir कहते हैं कि जो शख़्स किसी इंसान से मुहब्बत नहीं कर सकता, वो ख़ुदा से भी मुहब्बत नहीं कर सकता...
हज़रत राबिया बसरी कहती हैं- इश्क़ का दरिया अज़ल से अबद तक गुज़रा, मगर ऐसा कोई न मिला, जो उसका एक घूंट भी पीता... आख़िर इश्क़ विसाले-हक़ हुआ...
बक़ौल निदा फ़ाज़ली-
हर एक शय हैं मोहब्बत के नूर से रौशन
ये रौशनी जो ना हो, ज़िन्दगी अधूरी हैं...
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वक़्त...

वक़्त से बड़ा कोई मरहम नहीं... और वक़्त से बड़ा कोई ज़ालिम भी नहीं है... क्योंकि परेशानी का वक़्त कटता नहीं और हसीन लम्हे बहुत जल्दी बीत जाया करते हैं... मुहब्बतें और रफ़ाक़तें भी गुज़रते वक़्त के साथ-साथ माज़ी का भूला-बिसरा क़िस्सा और यादें बनकर ही रह जाती हैं...
एक शायर ने कहा है-
हम अपनी कहानी किससे कहें, खु़द हमको झूठी लगती है
वो कौन था, जिसको चाहा था, ऐ उम्रे-गुरेज़ां भूल गए...
 
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होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह...


फ़िरदौस ख़ान
होली बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला रंगों का पावन पर्व है. फाल्गुन माह में मनाए जाने की वजह से इसे फागुनी भी कहा जाता है. देश भर में हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाता है. म़ुगल शासनकाल में भी होली को पूरे जोश के साथ मनाया जाता था. अलबरूनी ने अपने स़फरनामे में होली का खूबसूरती से ज़िक्र किया है. अकबर द्वारा जोधा बाई और जहांगीर द्वारा नूरजहां के साथ होली खेलने के अनेक क़िस्से प्रसिद्ध हैं. शाहजहां के दौर में होली खेलने का अंदाज़ बदल गया था. उस वक़्त होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी कहा जाता था. आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में कहा जाता है कि उनके वज़ीर उन्हें गुलाल लगाया करते थे. सूफ़ी कवियों और मुस्लिम साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं में होली को बड़ी अहमियत दी है.

खड़ी बोली के पहले कवि अमीर ख़ुसरो ने हालात-ए-कन्हैया एवं किशना नामक हिंदवी में एक दीवान लिखा था. इसमें उनके होली के गीत भी हैं, जिनमें वह अपने पीर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ होली खेल रहे हैं. वह कहते हैं-
गंज शकर के लाल निज़ामुद्दीन चिश्त नगर में फाग रचायो
ख्वाजा मुईनुद्दीन, ख्वाजा क़ुतुबुद्दीन प्रेम के रंग में मोहे रंग डारो
सीस मुकुट हाथन पिचकारी, मोरे अंगना होरी खेलन आयो

अपने रंगीले पे हूं मतवारी, जिनने मोहे लाल गुलाल लगायो
धन-धन भाग वाके मोरी सजनी, जिनोने ऐसो सुंदर प्रीतम पायो...

कहा जाता है कि अमीर ख़ुसरो जिस दिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुरीद बने थे, उस दिन होली थी. फिज़ा में अबीर-गुलाल घुला था. उन्होंने अपने मुरीद होने की ख़बर अपनी मां को देते हुए कहा था-
आज रंग है, ऐ मां रंग है री
मोहे महबूब के घर रंग है री
सजन गिलावरा इस आंगन में
मैं पीर पायो निज़ामुद्दीन औलिया
गंज शकर मोरे संग है री...

पंजाबी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि बाबा बुल्ले शाह अपनी एक रचना में होली का ज़िक्र कुछ इस अंदाज़ में करते हैं-
होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह
नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी इल्लल्लाह
रंग-रंगीली उही खिलावे, जो सखी होवे फ़ना फ़ी  अल्लाह
होरी खेलूंगी कहकर बिस्मिल्लाह...

प्रसिद्ध कृष्ण भक्त रसखान ने भी अपनी रचनाओं में होली का मनोहारी वर्णन किया है. होली पर ब्रज का चित्रण करते हुए वह कहते हैं-
फागुन लाग्यौ सखि जब तें तब तें ब्रजमंडल में धूम मच्यौ है
नारि नवेली बचै नाहिं एक बिसेख मरै सब प्रेम अच्यौ है
सांझ सकारे वही रसखानि सुरंग गुलालन खेल मच्यौ है
को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटु जिहिं मान बच्यौ है...

होली पर प्रकृति ख़ुशनुमा होती है. हर तरफ़ हरियाली छा जाती है और फूल भी अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को महका देते हैं. इसी का वर्णन करते हुए प्रसिद्ध लोक कवि नज़ीर अकबराबादी कहते हैं-
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की
और ढफ के शोर खड़कते हों
तब देख बहारें होली की...

परियों के रंग दमकते हों
तब देख बहारें होली की
खम शीश-ए-जाम छलकते हों
तब देख बहारें होली की...

गुलज़ार खिले हों परियों के
और मजलिस की तैयारी हो
कपड़ों पर रंग के छीटों से
खुश रंग अजब गुलकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अंगिया पर तक कर मारी हो
तब देख बहारें होली की…

नज़ीर अकबराबादी की ग्रंथावली में होली से संबंधित 21 रचनाएं हैं. बहादुर शाह ज़फ़र सहित कई मुस्लिम कवियों ने होली पर रचनाएं लिखी हैं. बहरहाल, मुग़लों के दौर में शुरू हुआ होली खेलने का यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. नवाबों के शहर लखनऊ  में तो हिंदू-मुसलमान मिलकर होली बारात निकालते हैं. रंगों का यह त्योहार सांप्रदायिक सद्‌भाव का प्रतीक है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)



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ज़िन्दगी ख़ाक न थी, ख़ाक उड़ाते गुज़री

कुछ चीज़ें दिल को छू जाती हैं... जैसे पाकिस्तान के ’हम’ टीवी चैनल पर प्रसारित हुए नाटक ’ज़िन्दगी गुलज़ार है’ का ये टाइटल सॊन्ग...

ज़िन्दगी ख़ाक न थी, ख़ाक उड़ाते गुज़री
तुझसे क्या कहते, तेरे पास जो आते गुज़री

दिन जो गुज़रा तो, किसी याद की रौ में गुज़रा
शाम आई तो कोई ख़्वाब दिखाते गुज़री

अच्छे वक़्तों की तमन्ना में रही उम्र-ए-रवां
वक़्त ऐसा था के बस नाज़ उठाते गुज़री

ज़िन्दगी जिसके मुक़द्दर में हों ख़ुशियां तेरी
उसको आता है निभाना सो निभाते गुज़री

ज़िन्दगी नाम उधर है किसी सरशारी का
और उधर दूर से एक आस लगाते गुज़री

रात क्या आई के तन्हाई की सरगोशी में
हू का आलम था, मगर सुनते-सुनते गुज़री

बारहा चौंक सी जाती है मुसाफ़त दिल की
किसकी आवाज़ थी ये, किसको बुलाते गुज़री

मशहूर शायर नसीर तुराबी साहब के इस कलाम को हदीक़ा किआनी ने अपनी आवाज़ दी है... ’हम’ टीवी चैनल पर ’ज़िन्दगी गुलज़ार है’ 30 नवंबर 2012 को शुरू हुआ था, जो 24 मई 2013 तक प्रसारित हुआ... फ़िलहाल यह नाटक ’ज़िन्दगी’ चैनल पर पर प्रसारित हो रहा है...

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वजूद...

बरसों से
जिन्नात की ज़द में है
मेरा वजूद
कोई तो हो
जो मुझे आज़ाद कराए...
-फ़िरदौस ख़ान

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