मेरी रूह महक रही है, तुम्हारी मुहब्बत से...


मेरे महबूब !
मुहब्बत के शहर की
ज़मीं का वो टुकड़ा
आज भी यादों की ख़ुशबू से महक रहा है
जहां
मैंने सुर्ख़ गुलाबों की
महकती पंखुड़ियों को
तुम्हारे क़दमों में बिछाया था...
तुमने कहा था-
यह फूल क़दमों में बिछाने के लिए नहीं
तुम्हारे बालों में सजाने के लिए हैं...
फिर तुमने
मेरे खुले बालों में
सुर्ख़ गुलाब लगाते हुए कहा था-
हमेशा मेरे दिल में रहना
तब से मेरे बाल ही नहीं
मेरी रूह भी महक रही है
तुम्हारी मुहब्बत से...
-फ़िरदौस ख़ान

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दुनियावी ख़्वाहिशात और रूहानी सफ़र


इंसान जब दुनियावी ज़िन्दगी बसर करता है, तो उसे वो सब चाहिए होता है, जो ज़िन्दगी के लिए बहुत ही ज़रूरी है... उसे मुहब्बत चाहिए, रिश्ते चाहिए, घर चाहिए... इन्हें पाने के लिए वो दिन-रात जद्दोजहद करता है... मन्नतें-मुरादे मानता है... और अपनी इन्हीं ख़्वाहिशों के जंगल में भटकता रहता है...

लेकिन जब वो दुनियावी ज़िन्दगी छोड़कर रूहानी सफ़र पर निकल पड़ता है, तब उसे सिवाय दीदारे-इलाही के कुछ नज़र नहीं आता... वो हर चीज़ को, हर ख़्वाहिश को पीछे छोड़ जाता है...
(हमारी डायरी से)

तस्वीर गूगल से साभार
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क़ैंची...


फ़िरदौस ख़ान
बहुत साल पहले की बात है... हमारे पड़ौस में एक आंटी रहती थी... उनकी एक आदत थी... आए-दिन कुछ न कुछ मांगती रहती थी... कभी कहतीं चीनी ख़त्म हो गई, कभी चाय पत्ती मांग लेतीं, कभी प्याज़ या टमाटर, तो कभी अचार मांग लेतीं... अम्मी गर्मियों में सुबह-शाम उन्हें बर्फ़ दे दिया करती थीं...
एक दिन की बात है... हमें अपना सूट सीलना था... कपड़ा काटने बैठे, तो देखा कि क़ैंची की धार ठीक नहीं है... धार रखवाने के लिए बाज़ार जाना पड़ता... हमने सोचा कि आंटी से ही क़ैची मांग लेते हैं... हमने उनसे क़ैंची के लिए कहा, तो बहाने बनाने लगीं... पहले बोलीं, उसकी धार बहुत ख़राब है, कपड़ा नहीं कटेगा.. जब हमने याद दिलाया कि अभी कुछ दिन पहले ही तो उन्होंने धार रखवाई है... फिर कहने लगीं, कैंची तो उनकी जेठानी मांग कर ले गई... हमने कहा, कोई बात नहीं...
छोटे भाई ने क़ैची की धार रखवा कर ला दी... हमने कपड़ा काटा और सूट सील लिया... उसी दिन शाम को हमने देखा कि वो उसी क़ैंची से घी की थैली काट रही हैं...
हमने इसे अनदेखा कर दिया...
आख़िर कुछ लोग ऐसे क्यों होते हैं...? सामने वाले से उन्हें सबकुछ चाहिए और ख़ुद देने की बारी आ जाए, तो नज़रें चुराने लगते हैं...

(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़) 
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उसने कहा...


जान !
ये कैसी आज़माइश है
तुम न मेरे साथ रह सकती हो
न मेरे बग़ैर रह सकती हो...
मैं न तुम्हारे साथ रह सकता हूं
और न ही तुम्हारे बग़ैर रह सकता हूं

मेरे महबूब !
ये क्या कम है
कि हम एक-दूसरे के दिल में रहते हैं
-फ़िरदौस ख़ान

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ईदी बनाम अहसान


कई साल पहले की बात है... हम रिश्ते के मामा के घर गए हुए थे... हमने अपने मामूज़ाद भाई ज़ुल्फ़िक़ार को ईदी में पांच सौ रुपये दे दिए, उसने बहुत ना-नुकर की... हमने कहा कि ईदी को मना नहीं करते... सो, उसने पैसे ले लिए... कुछ देर बाद मामी आईं, शायद वो पड़ौस में गई हुई थीं... हमने उन्हें मिठाई का डिब्बा दिया... उन्होंने बहुत ना-नुकर की और कहने लगीं, देने का फ़र्ज़ तो हमारा है, हम कैसे ले सकते हैं... हमने कहा कि अम्मी ने भिजवाई है... ख़ैर उन्होंने मिठाई ले ली...
कुछ देर बाद उनके जेठ आए... उन्होंने हमें और ज़ुल्फ़िक़ार को दो-दो सौ रुपये की ईदी दी... मामी फिर ना-नुकर करने लगीं, लेकिन बड़े मामा पैसे देकर चले गए... दोपहर में मामा आए, तो मामी कहने लगीं, तुम्हारे बड़े भाई आए थे. ज़ुल्फ़िक़ार को दो सौ रुपये दे गए हैं. जाओ अपनी भतीजी को तीन सौ रुपये दे आओ, हम किसी का अहसान नहीं रखते... मामा बोले, पहले कुछ खाने को दे दो, लेकिन वो नहीं मानी कहने लगी, पहले अहसान उतार कर आओ, फिर कुछ खाना-पीना...
हम सोचने लगे कि ये हमारे साथ भी यहीं करने वाली हैं... हुआ भी यही, जब हम चलने लगे, तो उन्होंने हमारे हाथ पर छह सौ रुपये रख दिए... हमने बहुत मना किया, लेकिन वो नहीं मानी...
घर आकर हमने अम्मी से कहा कि अब इस मामी की चौखट पर कभी क़दम नहीं रखेंगे...

ईदी तो ख़ुशी की चीज़ हुआ करती है और उन्होंने इसे ’अहसान’ कहकर ’बोझ’ बनाकर रख दिया... हम सोचने लगे, अगर मामी किसी को एक गिलास पानी पिलाती होंगी, तो सोचती होंगी कि उन्होंने सामने वाले पर कितना बड़ा अहसान किया है... ज़िन्दगी में हम प्यासे मर जाएंगे, लेकिन मामी से कभी एक बूंद पानी नहीं लेंगे...

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कभी किसी को हक़ीर न समझें...


हर इंसान अपनी हैसियत के हिसाब से अल्लाह की राह में ख़र्च करता है... साहिबे-हैसियत मस्जिदों की तामीरे करवाते हैं, मदरसे खुलवाते हैं, ग़रीब लड़कियों की शादी का ख़र्च उठाते हैं... ग़रीबों के लिए मज़ारों पर खाने की देग़े रखवाते हैं... वो ये सब अल्लाह की ख़ुशी के लिए करते हैं...
लेकिन जो ग़रीब है, वो किसी भूखे को खाना खिला देते हैं, किसी ज़रूरतमंद को कपड़े दे देते हैं... अल्लाह को ख़ुश करने के लिए नफ़ली नमाज़ें पढ़ लेते हैं, नफ़ली रोज़े रख लेते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि कितनी शिद्दत की गर्मी है या सेहत इस क़ाबिल नहीं है कि रोज़ा रखा जा सके...
ठीक इसी तरह इंसान अपनों के लिए भी अपनी हैसियत के हिसाब से ही कुछ करता है... जिसके पास दौलत है, वो दौलत ख़र्च कर सकता है, जिसके पास ओहदा है, वो ओहदे का फ़ायदा पहुंचा सकता है... जिसके पास ताक़त है, वो ताक़त का इस्तेमाल कर सकता है....
लेकिन जिसके पास ये सब नहीं है, जो ख़ुद मज़लूम है, वो सिर्फ़ दुआएं ही दे सकता है... अपने हलक़ का निवाला दे सकता... अपनी मुहब्बत दे सकता है...
इसलिए कभी किसी को हक़ीर न समझें...

तस्वीर गूगल से साभार

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दुआ...


हम जब भी किसी वजह से परेशान होते हैं, तो अपनी परेशानी अल्लाह से कह देते हैं... और फिर बेफ़िक्र हो जाते हैं... अल्लाह किसी की दुआ रद्द नहीं करता... इंसान मुंह फेर सकता है, लेकिन अल्लाह अपने बंदों से कभी ग़ाफ़िल नहीं होता...
बेशक, हम बहुत गुनाहगार हैं और वो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है...
वो अपने बंदों के तौबा करने पर उन्हें मुआफ़ कर देता है...
अल्लाह हमेशा उनका निगेहबान रहे... उन्हें अपनी रहमत के साये में रखे... आमीन
अल्लाह सबको ख़ुश रखे... आमीन


हमारी डायरी से

  • वो हमारी दुआओं के साये में रहते हैं...

तस्वीर गूगल से साभार



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सिर्फ़ अहसास है...


अहसास सिर्फ़ अहसास हुआ करता है... अहसास है, तो ज़िन्दगी है... रिश्ते हैं... अगर अहसास ही दम तोड़ दे, तो फिर सबकुछ ख़त्म हो जाता है...
अहसास इंसान से जो न कराए, कम है... कहीं आग लगी है और लोग जान बचाने के लिए दौड़ रहे हैं... ऐसे में कुछ लोग अपनी जान की परवाह किए बग़ैर दूसरों को बचाने के लिए आग में कूद पड़ते हैं... बहुत अरसे पहले मेरठ में लगी ख़ौफ़नाक आग में जावेद नाम का लड़का कूद पड़ा था... उसने बहुत से बच्चों को आग से निकाला, लेकिन ख़ुद मौत के मुंह में चला गया...
यह अहसास ही तो था, जो जावेद ने अपनी ज़िन्दगी की परवाह किए बग़ैर औरों के लिए अपनी जान दे दी...
ज़रूरी नहीं कि अहसास को कोई नाम ही दिया जाए, बिना रिश्ते के भी लोग आपके लिए अपनी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर दिया करते हैं...
गुलज़ार साहब ने भी क्या ख़ूब लिखा है-
हमने देखी है इन आंखों की महकती ख़ुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो
सिर्फ़ अहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो
हमने देखी है...
प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं
एक ख़ामोशी है सुनती है कहा करती है
ना ये बुझती है ना रुकती है ना ठहरी है कहीं
नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है
सिर्फ़ अहसास है ये, रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम ना दो
हमने देखी है...
मुस्कराहट सी खिली रहती है आंखों में कहीं
और पलकों पे उजाले से छुपे रहते हैं
होंठ कुछ कहते नहीं, कांपते होंठों पे मगर
कितने ख़ामोश से अफ़साने रुके रहते हैं
सिर्फ़ अहसास है ये, रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम ना दो
हमने देखी है...

तस्वीर गूगल से सभार
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मुहब्बत...


  • एक औरत आख़िर मर्द से चाहती क्या है... क्या सिर्फ़ एक छत, दो वक़्त का खाना और चार जोड़ी कपड़े... जो एक छत, दो वक़्त का खाना और चार जोड़ी कपड़े देता है, वो मुहब्बत नहीं देता... और जो मुहब्बत करता है, वो घर नहीं दे सकता...
  • मुहब्बत का ख़ूबसूरती से कोई ताल्लुक़ नहीं है... अगर ऐसा होता, तो वो लोग मुहब्बत से महरूम रह जाते, जो ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं हैं...
  • क्यूं इंसान किसी को इतनी शिद्दत से चाहता है कि उसके बग़ैर अपना ही वजूद पराया लगने लगता है...
  • जो लोग औरत को ’सामान’ समझते हैं, वो औरत की मुहब्बत से महरूम रह जाते हैं... क्योंकि दुनिया की कोई भी औरत किसी भी ऐसे शख़्स से मुहब्बत नहीं कर सकती, जो उसे ’इंसान’ नहीं, ’सामान’ समझता हो...
  • मुहब्बत उसी को मिलती है, जो मुहब्बत के क़ाबिल होता है...
  • मुहब्बत में लोग बादशाहत ठोकर मार दिया करते हैं और महबूब की ग़ुलामी क़ुबूल कर लेते हैं...
  • कुछ क़र्ज़ ऐसे हुआ करते हैं, जिसे इंसान कभी नहीं चुका सकता, जैसे रफ़ाक़त का क़र्ज़...
  • उसके बिना हर मौसम उदास लगता है...उन दमकती आंखों की ये मेहर क्या कम है कि उन्होंने ख़ुश रहने की वजह दी है...
  • कुछ लोग घरों में रहा करते हैं, और कुछ दिलों में, जैसे तुम...
  • वो मेरी ज़िन्दगी का हासिल है, जो नज़रों से दूर है, पर दिल के क़रीब है...
  • (हमारी एक कहानी से)

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मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग


फ़िरदौस ख़ान
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी क्रांतिकारी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं. नोबेल पुरस्कार के लिए नामित फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर साम्यवादी होने और इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ लिखने के भी आरोप लगते रहे. उनका जन्म 11 फ़रवरी, 1911 को पाकिस्तान के स्यालकोट शहर में हुआ था. उनके पिता वकील थे. रिवायत के मुताबिक़, उनकी शुरुआती तालीम उर्दू, अरबी और फ़ारसी में हुई. इसके बाद उन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल और लाहौर विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. उन्होंने 1933 में अंग्रेज़ी और 1934 में अरबी में एमए किया. कुछ वक़्त तक उन्होंने अमृतसर के एमएओ कॉलेज में बतौर लेक्चरर काम किया. मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर 1936 में वह प्रगतिवादी लेखक संघ से जुड़ गए. उन्होंने उस वक़्त मार्क्सवादी नेता सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर प्रगतिवादी लेखक संघ की पंजाब शाखा की स्थापना की. 1938 से 1946 तक उन्होंने उर्दू साहित्यिक मासिक अदब-ए-लतीफ़ का संपादन किया. 1941 में उनके छंदों का पहला काव्य संकलन नक़्श-ए-फ़रियादी प्रकाशित हुआ, जो बेहद सराहा गया. 1952 में दस्त-ए-सबा, 1956 में ज़िंदानामा, 1964 में दस्ते-तहे-संग, 1971 में सरे-वादिए-सीना, 1978 में शाम-ए-शहर-ए-यारां, 1980 में मेरे दिल मेरे मुसाफिर प्रकाशित हुआ, जबकि ग़ुबार-ए-अय्याम (दिनों की गर्द) उनकी मौत के बाद प्रकाशित हुआ. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने गद्य रचनाएं भी कीं. 1963 में उनके लेखों का संग्रह मीज़ान प्रकाशित हुआ. 1971 में सलीबें मेरे दरीचे प्रकाशित हुआ, जो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ द्वारा पत्नी को लिखे गए ख़तों का संग्रह है. 1973 में उनके भाषणों, लेखों और साक्षात्कारों का संग्रह माताए-लौह-ओ-क़लम प्रकाशित हुआ, जो उनके चाहने वालों को ख़ासा पसंद आया. 1962 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया.

उन्होंने एक अंग्रेज़ महिला एलिस जॉर्ज से शादी की और दिल्ली आकर बस गए. ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और कर्नल के पद तक पहुंचे. 1942 से लेकर 1947 तक वह सेना में रहे, लेकिन हिंदुस्तान के बंटवारे के वक़्त वह पद से इस्तीफ़ा देकर लाहौर वापस चले गए. वहां उन्होंने इमरोज़ और पाकिस्तान टाइम्स का संपादन किया. 1951 में लियाक़त अली खां की सरकार के तख्तापलट की साज़िश के आरोप में उन्हें जेल जाना पड़ा और 1955 में वह क़ैद से रिहा हुए. इसके बाद 1962 तक वह लाहौर में पाकिस्तानी कला परिषद में रहे. 1963 में उन्होंने यूरोप, अल्जीरिया और मध्य पूर्व का भ्रमण किया और अगले साल स्वदेश लौटे. 1958 में स्थापित एशिया-अफ्रीका लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में वह भी शामिल थे. भारत-पाक के 1965 के युद्ध के वक़्त वह पाक के सूचना मंत्रालय में कार्यरत थे. 1978 में वह एशियाई-अफ्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष बने और 1982 तक बैरूत (लेबनान) में कार्यरत रहे. 1982 में वापस लाहौर लौट आए. 1978 से उन्होंने एशियाई-अफ्रीकी लेखक संघ के मुखपत्र लोटस का संपादन भी किया. उनका निधन 73 साल की उम्र में 20 नवंबर, 1984 को लाहौर में हुआ.

उन्होंने पाकिस्तानी फ़िल्मों में गीत भी लिखे. उनकी यह ग़ज़ल बहुत मशहूर हुई, जो उन्होंने हैदराबाद के मशहूर शायर मख़दूम मुहीउद्दीन को समर्पित की थी, जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन में शिरकत की थी-
आपकी याद आती रही रात भर
चांदनी दिल दुखाती रही रात भर
गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर
कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात भर… 

उनके गीत भी बहुत मशहूर हुए, जिनमें से एक है-जब तेरी समंदर आंखों में-
ये धूप किनारा, शाम ढले
मिलते हैं दोनों व़क्त जहां
जो रात न दिन, जो आज न कल
पल भर को अमर, पल भर में धुआं
इस धूप किनारे पल दो पल
होंठों की लपक, बांहों की छनक
ये मेल हमारा, झूठ न सच
क्यूं रार करो, क्यूं दोष धरो
किस कारन झूठी बात करो
जब तेरी समंदर आंखों में
इस शाम का सूरज डूबेगा
सुख सोएंगे घर दर वाले
और राही अपनी रह लेगा...

उनकी शायरी में रूमानियत है और महबूब से शिकवे-गिले भी-
आके वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझसे
जिसने इस दिल को परी़खाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा था
आशना हैं तेरे क़दमों से वो राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवां गुज़रे हैं जिनसे उसी रानाई के
जिसकी इन आंखों ने बेसूद इबादत की है...

उनका कलाम नौजवानों के दिल की आवाज़ बन गया. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी में जहां रूमानियत मिलती है, वहीं मौजूदा हालात का तब्सिरा भी मिलता है. पहले जहां प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका ही सब कुछ थी, लेकिन अब वह सिर्फ़ कुछ है, सब कुछ नहीं. वह कहते हैं-
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूं हो जाए
यूं न था, मैंने फ़क़्त चाहा था यूं हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग...

जब उन्हें देशद्रोह-रावलपिंडी साज़िश मामले में जेल जाना पड़ा, तो उनके कलाम में भी उनकी ज़िंदगी की तरह बदलाव आ गया. उनकी ग़ज़ल का यह शेअर पाकिस्तानी फ़ौजी हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत का प्रतीक बन गया-
वो बात, सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है...

उन्होंने सियासत पर भी जमकर क़लम चलाई. उनके कलाम में अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी छाए रहे, मामला चाहे अफ्रीका की आज़ादी का हो या अरबों के संघर्ष का. अफ्रीकी स्वतंत्रता प्रेमियों के लिए उन्होंने जहां नज़्म अफ्रीका कम बैक लिखी, वहीं साम्राज्यवादियों से संघर्षरत अरबों के लिए सर-ए-वादी-ए-सीना, बैरूत में किए गए जनसंहार के खिला़फ एक नग़मा कर्बला-ए-बैरूत लिखकर अपने ग़ुस्से का इज़हार किया. फ़िलीस्तीन के शहीदों को श्रद्धांजलि पेश करते हुए वह लिखते हैं-
मैं जहां पर भी गया अर्ज़-ए-वतन
तेरी तज़लील के दाग़ों की जलन दिल में लिए
तेरी हुरमत के चिराग़ों की लगन दिल में लिए
तेरी उल्फ़त, तेरी यादों की कसक साथ गई
तेरे नारंज शगूफ़ों की महक साथ गई
सारे अनदेखे राफ़ीक़ों का जिलौ साथ रहा
कितने हाथों से हम आग़ोश मेरा हाथ रहा...

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के कलाम में मानव प्रेम भी है और दबे-कुचले लोगों का दर्द भी इसमें झलकता है. यही उनकी शायरी की जान भी है-
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
देख के आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने हैं कह ले...

दरअसल, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की समूची शायरी आम इंसान के दर्द को बयां करती है. यह पीड़ितों की आवाज़ बनकर बुलंद होती है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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