ऐ चांद ! मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...

ऐ चांद !
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...
अब नहीं उठते हाथ
दुआ के लिए
तुम्हें पाने की ख़ातिर...

दिल की वीरानियों में
दफ़न कर दिया
उन सभी जज़्बात को
जो मचलते थे
तुम्हें पाने के लिए...

तुम्हें बेपनाह चाहने की
अपनी हर ख़्वाहिश को
फ़ना कर डाला...

अब नहीं देखती
सहर के सूरज को
जो तुम्हारा ही अक्स लगता था...

अब नहीं बरसतीं
मेरी आंखें
फुरक़त में तम्हारी
क्योंकि
दर्द की आग ने
अश्कों के समन्दर को
सहरा बना दिया...

अब कोई मंज़िल है
न कोई राह
और
न ही कोई हसरत रही
जीने की
लेकिन
तुमसे कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं...

ऐ चांद !
मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...
-फ़िरदौस ख़ान
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13 Response to "ऐ चांद ! मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना..."

  1. अपना अपना आसमां says:
    7 नवंबर 2008 को 3:39 pm

    एक दुआ आपके लिए...
    बिछड़े हुए का ग़म काश चांद साझा कर जाए...
    किसी की फ़रियाद सुनकर
    कसूरवार को अपनी दूधिया चांदनी में समेट लाए
    और बिखेर दे
    हर जगह..हर ओर
    ओस की नन्ही झिलमिलाती बूंदों की तरह
    कि बचना भी चाहे कोई तो बच न पाए
    दिल का पोर-पोर गीला कर जाए...
    सुमित सिंह

  2. अपना अपना आसमां says:
    7 नवंबर 2008 को 3:42 pm

    एक दुआ आपके लिए...
    बिछड़े हुए का ग़म काश चांद साझा कर जाए...
    किसी की फ़रियाद सुनकर
    कसूरवार को अपनी दूधिया चांदनी में समेट लाए
    और बिखेर दे
    हर जगह..हर ओर
    ओस की नन्ही झिलमिलाती बूंदों की तरह
    कि बचना भी चाहे कोई तो बच न पाए
    दिल का पोर-पोर गीला कर जाए...
    सुमित सिंह

  3. seema gupta says:
    7 नवंबर 2008 को 3:43 pm

    अब नहीं बरसतीं
    मेरी आंखें
    फुरक़त में तम्हारी
    क्योंकि
    दर्द की आग ने
    अश्कों के समन्दर को
    सहरा बना दिया...
    " very emotional and lil painful to read... touched me deeply"

    Regards

  4. रंजना [रंजू भाटिया] says:
    7 नवंबर 2008 को 5:59 pm

    हमने
    दिल की वीरानियों में
    दफ़न कर दिया
    उन सभी जज़्बात को
    जो मचलते थे
    तुम्हें पाने के लिए...

    बहुत खूब .बढ़िया लगा यह

  5. Dineshrai Dwivedi दिनेशराय द्विवेदी says:
    7 नवंबर 2008 को 6:15 pm

    सुंदर नज्म है। पर हमेशा की तरह उदास है।

  6. pallavi trivedi says:
    7 नवंबर 2008 को 9:26 pm

    अब नहीं बरसतीं
    मेरी आंखें
    फुरक़त में तम्हारी
    क्योंकि
    दर्द की आग ने
    अश्कों के समन्दर को
    सहरा बना दिया...

    waah...bahut sundar.

  7. एस. बी. सिंह says:
    7 नवंबर 2008 को 11:55 pm

    अब नहीं बरसतीं
    मेरी आंखें
    फुरक़त में तम्हारी
    क्योंकि
    दर्द की आग ने
    अश्कों के समन्दर को
    सहरा बना दिया...


    दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।
    बहुत भाव पूर्ण कविता।

  8. तसलीम अहमद says:
    8 नवंबर 2008 को 12:07 am

    A chand sun kisi ki
    fariyaad ek baar
    mil jaye uska chanda,
    tera shukriya baar-baar.

  9. मीत says:
    8 नवंबर 2008 को 7:07 am

    कोई शिकवा भी नहीं कोई शिकायत भी नहीं
    और हम भूल गए हों उन्हें, ऐसा भी नहीं

    बहुत उम्दा.

  10. Rachna Singh says:
    8 नवंबर 2008 को 11:48 am

    ati sunder

  11. Dr. Nazar Mahmood says:
    8 नवंबर 2008 को 12:23 pm

    तुम्हें बेपनाह चाहने की
    अपनी हर ख़्वाहिश को
    फ़ना कर डाला...

    अब नहीं देखती
    सहर के सूरज को
    जो तुम्हारा ही अक्स लगता था...


    very nice..... wats the comparison of beloved with the dawn...... subah ka suraj aur mehboob ki shakl achcha ahsaas hai

  12. PD says:
    8 नवंबर 2008 को 1:18 pm

    bahut khubsoorat..
    sidha dil tak utar gaya..

  13. dr. ashok priyaranjan says:
    11 नवंबर 2008 को 1:47 am

    bahut sundar

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