उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए...


कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गए
अहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गए

जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

माज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ा
औराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गए

कब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशां
रातें मिली स्याह, उजाले निखर गए

सहरा में ढूंढते हो घटाओं के सिलसिले
दरिया समन्दरों में ही जाकर उतर गए

कुछ कर दिखाओ, वक़्त नहीं सोचने का अब
शाम हो गई तो परिंदे भी घर गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए
-फ़िरदौस ख़ान
   
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27 Response to "उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए..."

  1. संजय भास्कर says:
    2 जून 2010 को 9:44 am

    मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
    क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html
    आप अपनी अनमोल प्रतिक्रियाओं से  प्रोत्‍साहित कर हौसला बढाईयेगा
    सादर ।

  2. संजय भास्कर says:
    2 जून 2010 को 9:44 am

    आप की ग़ज़ल दिल में हलचल पैदा करती है.मैं यह बिलकुल नहीं कहूँगा की आप दनादन लिखिए.बस "आँखों में उजाले" यों ही रोशन रहें.

  3. दिलीप says:
    2 जून 2010 को 10:12 am

    waah Firdaus ji pehli baar aaya hun aapke blog par aur ek shandar nazm padhne mili,,,aur haan aapko janmdivas ki shubhkamnayein ..ek din late ho gaya

  4. kunwarji's says:
    2 जून 2010 को 11:22 am

    "बादल मेरे शहर से जाने किधर गए...."

    पता नहीं क्या सोच रहा हूँ जब से इस पंक्ति को पढ़ा है.....

    कई दिनों से आपकी कमी महसूस की गयी जी हमारे ब्लॉग पर....

    कुंवर जी,

  5. माधव says:
    2 जून 2010 को 11:50 am

    बहुत सुंदर भाव.

  6. वन्दना says:
    2 जून 2010 को 12:48 pm

    वाह...........बहुत ही सुन्दर ..........हर शेर दिल मे उतरता चला गया.

  7. शेष says:
    2 जून 2010 को 12:51 pm

    ख़ारिज़ करें चलो अब इन आवारा बादलों को,
    अपनी अतल गहराइयों के पानी में उतर के...

  8. Avinash Chandra says:
    2 जून 2010 को 2:02 pm

    har sher behad khubsurat hua.. bahut hi sundar

  9. M VERMA says:
    2 जून 2010 को 2:40 pm

    लाजवाब गज़ल

  10. Udan Tashtari says:
    2 जून 2010 को 3:43 pm

    बहुत उम्दा शेर निकाले हैं..लाजबाब!

  11. Dr. Ayaz ahmad says:
    2 जून 2010 को 4:31 pm

    एक और अच्छी पोस्ट के साथ आपने अपनी योग्यता साबित की । और हर बार की तरह हम भी आपके हर अच्छी पोस्ट और हर अच्छे काम मे साथ है और आगे भी रहेंगे

  12. aarya says:
    2 जून 2010 को 5:14 pm

    सादर !
    बहुत ही लाजबाब !
    आखिरी नहीं है मौज, फिर टूटीं हैं कस्तिया
    उजड़ेंगी शायद आज, कुछ और बस्तियां
    गर है तुम्हे यकीन उस की रहमत पे
    पतवार बन जाएँगी किस्मत की तख्तियां
    रत्नेश त्रिपाठी

  13. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ says:
    2 जून 2010 को 5:22 pm

    मन के तारों को झंकृत कर गयी आपकी गजल।
    --------
    क्या आप जवान रहना चाहते हैं?
    ढ़ाक कहो टेसू कहो या फिर कहो पलाश...

  14. सुनील दत्त says:
    2 जून 2010 को 6:17 pm

    कहीं यह गजल उनके लिए तो नहीं जिन्हें हम जानते नहीं

  15. सतीश सक्सेना says:
    2 जून 2010 को 9:12 pm

    कमाल का लिखती हैं आप ! हार्दिक शुभकामनाएं !

  16. khalid says:
    3 जून 2010 को 12:12 am

    हमने तुमको भुलाना तो चाहा मगर भुला न सके
    परसों जन्‍मदिन था तुम्‍हारा हमें कहा सबने जिधर भी गये

    बधाई बेमिसाल की तरफ से दूसरी बार

  17. मीनाक्षी says:
    3 जून 2010 को 3:10 am

    लिखा वही सफ़ल होता है जो किसी के दिल को गहराई तक छू जाए.....एक एक शेर मन मे उतर गया..

  18. ePandit says:
    3 जून 2010 को 6:46 am

    "भीगने की तमन्ना ही रह गई, बादल मेरे शहर से न जाने किधर गये।"

    वाह-वाह, आखिरी दो पंक्तियों में गजल की सारी खूबसूरती सिमट गयी।

  19. alex says:
    3 जून 2010 को 4:51 pm

    जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
    उसके बगैर कितने ज़माने गुजर गए

    यूं ही ज़माने गुज़र जाते हैं मगर उसकी याद, कभी न कभी देखने की उम्मीद
    हौसला देती है जीने का वरना तो.......
    कितना मुश्किल होता है देखे बिना जीना यह वही समझ सकता है
    जिसे अहसास हुआ हो.............

    छू गयी
    दिल को
    हमेशा की तरह......

  20. sumit says:
    4 जून 2010 को 3:21 pm

    bhaut acchigazal hai'

  21. योगेश शर्मा says:
    5 जून 2010 को 9:15 pm

    kuchh behad achhe sher...bahut khoob

  22. acharyakeshav says:
    5 जून 2010 को 10:22 pm

    लंबे समय बाद कुछ नया मिला है

  23. RAJAN says:
    5 जून 2010 को 10:53 pm

    bahut khubsurat.

  24. RAJAN says:
    6 जून 2010 को 12:01 am
    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
  25. स्वाति says:
    8 जून 2010 को 3:03 pm

    एक एक शेर मन मे उतर गया..

  26. सतीश सक्सेना says:
    12 जून 2010 को 10:42 pm

    हमेशा की तरह वैसी ही खूबसूरत ग़ज़ल ! शुभकामनायें आपको !!

  27. main... ratnakar says:
    17 जून 2010 को 5:51 pm

    bahut hee sundar, kamaal ka likha hai aap ne, aisa laga ki koi mujhe mere hee man kee baat suna raha ho. mumkin ho to pls mujhe apana link bhejiyega. aisee achchhee rachnaen bhala kaun padhana naheen chahega.
    www.mainratnakar.blogspot.com

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